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  • पितृपक्ष में घर लाएं:  ये 3 चीजें, पितरों की कृपा से जीवन में आ सकती हैं खुशियां, जानें धार्मिक मान्यताएं.

    पितृपक्ष में घर लाएं: ये 3 चीजें, पितरों की कृपा से जीवन में आ सकती हैं खुशियां, जानें धार्मिक मान्यताएं.

    पितृपक्ष में घर लाएं:  ये 3 चीजें, पितरों की कृपा से जीवन में आ सकती हैं खुशियां, जानें धार्मिक मान्यताएं.

    पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में कुछ विशेष वस्तुओं को घर लाना और पूजा-पाठ में उनका इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है।

    साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी। ऐसे में आइए जानते हैं उन 3 चीजों के बारे में, जिन्हें पितृपक्ष के दौरान घर लाने की परंपरा बताई जाती है।

    1. तांबे, कांसे या पीतल के बर्तन

    पितृपक्ष के दौरान तांबे, कांसे और पीतल के बर्तन खरीदना कुछ धार्मिक मान्यताओं में शुभ माना जाता है। इन धातुओं के बर्तनों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों में भी किया जाता है। मान्यता है कि इन बर्तनों से पितरों का तर्पण करने से पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त होती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

    2. घर लाएं गंगाजल

    हिंदू धर्म में गंगाजल को पवित्र माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान इसे घर लाना और धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है। मान्यता के अनुसार, गंगाजल से तर्पण करने और पूजा के दौरान इसका उपयोग करने से धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है। कुछ परिवार इस अवधि में गंगाजल का छिड़काव भी करते हैं।

    3. काले तिल का करें इस्तेमाल

    पितृपक्ष में काले तिल का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। श्राद्ध और तर्पण के दौरान काले तिल का इस्तेमाल करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काले तिल का दान करना भी शुभ माना जाता है। कई लोग पितृपक्ष के दौरान इन्हें घर लाकर पूजा और तर्पण से जुड़े कार्यों में इस्तेमाल करते हैं।

    पितृपक्ष में इन बातों का भी रखें ध्यान

    पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण करना, श्रद्धापूर्वक श्राद्ध और तर्पण करना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। इन दिनों सात्विक आचरण और परिवार की परंपराओं के अनुसार पूजा-पाठ करने पर भी जोर दिया जाता है।

    ध्यान दें: तांबे, कांसे या पीतल के बर्तन, गंगाजल और काले तिल से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें जीवन में खुशियां आने या पितृदोष दूर होने की वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।

  • गणेश विसर्जन के बाद : कलश के नारियल का क्या करें? जानें 4 धार्मिक मान्यताएं और सही तरीका.

    गणेश विसर्जन के बाद : कलश के नारियल का क्या करें? जानें 4 धार्मिक मान्यताएं और सही तरीका.

    गणेश विसर्जन के बाद : कलश के नारियल का क्या करें? जानें 4 धार्मिक मान्यताएं और सही तरीका.

    गणेश उत्सव के दौरान भगवान गणेश की स्थापना के साथ कई घरों में कलश भी स्थापित किया जाता है। कलश के ऊपर नारियल रखा जाता है, जिसे पूजा में शुभता और मंगल का प्रतीक माना जाता है। लेकिन जब गणपति बप्पा को विदाई देने का समय आता है, तो भक्तों के मन में सवाल उठता है कि कलश पर रखे नारियल और उसके जल का क्या करना चाहिए।

    इस साल 25 सितंबर 2026 को गणेश विसर्जन किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विसर्जन के बाद कलश के नारियल और जल का इस्तेमाल कुछ विशेष तरीकों से किया जा सकता है। आइए जानते हैं इनके बारे में।

    1. नारियल को फोड़कर प्रसाद के रूप में बांटें

    अगर कलश पर रखा नारियल अच्छी स्थिति में है और खराब नहीं हुआ है, तो उसे फोड़कर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, पूजा में चढ़ाई गई सामग्री को श्रद्धापूर्वक प्रसाद के रूप में स्वीकार किया जाता है। परिवार के सदस्य इसे आपस में बांट सकते हैं।

    2. लाल कपड़े में बांधकर रख सकते हैं नारियल

    कुछ धार्मिक मान्यताओं में कलश के नारियल को लाल कपड़े में बांधकर घर के पूजा स्थल या तिजोरी में रखने का सुझाव दिया जाता है। इसे भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा और आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में रखा जाता है। यदि आप ऐसा करते हैं, तो नारियल को साफ और सुरक्षित स्थान पर रखें।

    3. गणपति प्रतिमा के साथ विसर्जित करने का विकल्प

    कुछ परिवार अपनी परंपरा के अनुसार कलश के नारियल को गणपति प्रतिमा के साथ विसर्जित करते हैं। हालांकि, विसर्जन की विधि स्थानीय धार्मिक परंपराओं और पर्यावरण संबंधी नियमों के अनुसार अपनानी चाहिए। प्राकृतिक जलस्रोतों को प्रदूषित करने से बचें और जहां संभव हो, निर्धारित कृत्रिम विसर्जन स्थल का उपयोग करें।

    4. कलश के जल का क्या करें?

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा के बाद कलश के जल को श्रद्धापूर्वक इस्तेमाल किया जा सकता है। कुछ लोग इस जल का घर में छिड़काव करते हैं और बचा हुआ पानी किसी पौधे या गमले में डाल देते हैं। ऐसा करते समय ध्यान रखें कि जल में ऐसी सामग्री न मिली हो जो पौधों या मिट्टी को नुकसान पहुंचा सकती हो।

    धार्मिक मान्यताओं का रखें ध्यान

    गणेश विसर्जन के बाद नारियल और कलश के जल के इस्तेमाल की विधियां परिवारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए अपने घर की परंपरा और पूजा कराने वाले पुरोहित के निर्देशों का पालन कर सकते हैं। इन उपायों को धार्मिक आस्था और परंपरा के रूप में समझें।

  • पितरों की तस्वीर घर : में किस दिशा में लगानी चाहिए? जानें वास्तु के नियम, इन जगहों पर लगाने से बचें..

    पितरों की तस्वीर घर : में किस दिशा में लगानी चाहिए? जानें वास्तु के नियम, इन जगहों पर लगाने से बचें..

    पितरों की तस्वीर घर : में किस दिशा में लगानी चाहिए? जानें वास्तु के नियम, इन जगहों पर लगाने से बचें..

    सनातन धर्म में पितरों यानी अपने दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धा और सम्मान देने की परंपरा रही है। कई परिवार अपने घर में पूर्वजों की तस्वीर लगाते हैं और उनकी स्मृति को संजोकर रखते हैं। वास्तु शास्त्र की मान्यताओं के अनुसार, इन तस्वीरों को लगाते समय दिशा और स्थान का ध्यान रखना चाहिए।

    आइए जानते हैं पितरों की तस्वीर लगाने से जुड़े प्रमुख वास्तु नियम।

    1. किस दिशा में लगानी चाहिए पितरों की तस्वीर?

    वास्तु की कुछ मान्यताओं के अनुसार, पितरों की तस्वीर उत्तर दिशा की दीवार पर लगाना शुभ माना जाता है, ताकि तस्वीर में पूर्वजों का मुख दक्षिण दिशा की ओर रहे। वहीं, कुछ वास्तु परंपराओं में दक्षिण दिशा को भी पितरों से संबंधित माना गया है। इसलिए इस विषय पर अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं।

    2. पूजा घर में तस्वीर लगाने से बचें

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, पितरों की तस्वीर को देवी-देवताओं की तस्वीरों के साथ पूजा स्थल में लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। पूर्वजों के सम्मान के लिए घर में अलग और साफ-सुथरा स्थान चुना जा सकता है।

    3. बेडरूम और रसोई में न लगाएं तस्वीर

    कुछ वास्तु मान्यताओं में पितरों की तस्वीर बेडरूम, रसोई और बाथरूम के पास लगाने से बचने की सलाह दी जाती है। इसके बजाय घर में ऐसी जगह चुनें, जहां तस्वीर सुरक्षित रहे और उसका सम्मानपूर्वक रखरखाव किया जा सके।

    4. जीवित सदस्यों के साथ न लगाएं तस्वीर

    वास्तु की पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, दिवंगत पूर्वजों की तस्वीर को जीवित परिवार के सदस्यों की तस्वीरों के साथ लगाने से बचना चाहिए। कई लोग पूर्वजों के लिए अलग स्थान रखना उचित मानते हैं।

    5. एक ही स्थान पर रखें तस्वीरें

    घर में पूर्वजों की बहुत अधिक तस्वीरें अलग-अलग जगहों पर लगाने के बजाय उन्हें एक निर्धारित स्थान पर व्यवस्थित रखना बेहतर माना जाता है। तस्वीरों की संख्या को लेकर वास्तु संबंधी मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।

    6. तस्वीर की साफ-सफाई का रखें ध्यान

    पूर्वजों की तस्वीर को साफ-सुथरा रखें। अगर तस्वीर का फ्रेम टूट गया है या खराब हो गया है, तो उसकी मरम्मत करवाएं। तस्वीर पर धूल जमा न होने दें और उसके आसपास का स्थान भी व्यवस्थित रखें।

    ध्यान दें: पितरों की तस्वीरों की दिशा और उनसे जुड़े नियम वास्तु एवं धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग परंपराओं में इनके बारे में अलग सुझाव मिल सकते हैं। इन नियमों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित परिणाम या किसी अनहोनी की निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए।

  • पितृपक्ष में क्या खरीदना शुभ : और किन चीजों से करें परहेज? जानें श्राद्धपक्ष में खरीदारी के ये खास नियम

    पितृपक्ष में क्या खरीदना शुभ : और किन चीजों से करें परहेज? जानें श्राद्धपक्ष में खरीदारी के ये खास नियम

    पितृपक्ष में क्या खरीदना शुभ : और किन चीजों से करें परहेज? जानें श्राद्धपक्ष में खरीदारी के ये खास नियम

    पितृपक्ष में खरीदारी को लेकर भी कुछ धार्मिक मान्यताएं और नियम हैं। इस दौरान कुछ चीजों को घर लाना शुभ माना जाता है, जबकि कुछ वस्तुओं की खरीदारी से बचने की सलाह दी जाती है। जानें पितृपक्ष में क्या खरीदना शुभ और किन चीजों को खरीदना वर्जित माना गया है।

    तृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय माना जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष में सात्विक जीवनशैली अपनाने के साथ कुछ खास चीजों को खरीदना और घर लाना भी शुभ हो सकता है। वहीं, कई ऐसी वस्तुएं हैं, जिन्हें इस अवधि में खरीदने से बचने की सलाह दी जाती है। इस साल में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से होगी। आइए जानते हैं इस दौरान किन चीजों की खरीदारी शुभ मानी जाती है और किन चीजों से परहेज करना चाहिए।

    श्राद्ध सामग्री खरीदना शुभ

    पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण से जुड़ी सामग्री खरीदना शुभ माना जाता है। जौ, काले तिल, कुशा, चावल और चमेली का तेल जैसी चीजें इस दौरान खरीदी जा सकती हैं। इसके अलावा धूप और दीपक के साथ धार्मिक पुस्तकें खरीदना भी अच्छा माना जाता है। इन वस्तुओं का इस्तेमाल पूजा-पाठ में करने के साथ जरूरतमंद लोगों को दान भी किया जा सकता है।

    काले तिल का महत्व: पितृपक्ष में काले तिल का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, काले तिल से तर्पण करने से पितरों को संतुष्टि मिलती है। इस अवधि में काले तिल खरीदकर जरूरतमंद व्यक्ति को दान करना भी पुण्यदायी माना जाता है।

    धातु के बर्तन खरीदें: तांबे, कांसे और पीतल के बर्तनों को भी पितृपक्ष में खरीदना शुभ माना जाता है। इनका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता है। अपनी जरूरत और सामर्थ्य अनुसार इनमें से कोई बर्तन खरीदा जा सकता है।

    घर लाएं गंगाजल: पितृपक्ष में गंगाजल का भी विशेष महत्व माना जाता है। इसका इस्तेमाल पितृ तर्पण और पूजा-पाठ में किया जा सकता है। परंपरा के अनुसार, घर के पूजा स्थल और अन्य स्थानों पर गंगाजल का छिड़काव भी किया जाता है।

    कौन सी चीजें वर्जित

    पितृपक्ष में कुछ चीजों की खरीदारी से बचना चाहिए।

    लोहे या लोहे से बनी चीजें खरीदने से बचें।

    नए कपड़ों की खरीदारी न करें।

    सोने-चांदी के आभूषण खरीदने से परहेज करें।

    इस दौरान नया वाहन खरीदने से बचें।

    जमीन या मकान की खरीदारी न करें।

    नए जूते-चप्पल खरीदने से बचें।

    शादी या अन्य मांगलिक कार्यों से जुड़ा सामान न खरीदें।

    पितृपक्ष में नई झाड़ू खरीदने से भी बचने की मान्यता है।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • भाद्रपद पूर्णिमा स्नान और : व्रत क्या एक दिन हैं? यहां दूर करें कंफ्यूजन, जानें सही तारीख और स्नान-दान का मुहूर्त.

    भाद्रपद पूर्णिमा स्नान और : व्रत क्या एक दिन हैं? यहां दूर करें कंफ्यूजन, जानें सही तारीख और स्नान-दान का मुहूर्त.

    भाद्रपद पूर्णिमा स्नान और : व्रत क्या एक दिन हैं? यहां दूर करें कंफ्यूजन, जानें सही तारीख और स्नान-दान का मुहूर्त.

    हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन स्नान-दान करने से पुण्यकारी फलों की प्राप्ति होती है। पूर्णिमा के दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन से पितृ पक्ष भी आरंभ हो रहे हैं। बता दें कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध किया जाता है। पितृ पक्ष में पूर्वजों को याद करने से पितृ दोष दूर होता है और पितरों की कृपा प्राप्त होती है। तो चलिए जानते हैं कि इस भाद्रपद पूर्णिमा कब मनाई जाएगी और स्नान-दान का शुभ मुहूर्त क्या रहेगा।

    भाद्रपद पूर्णिमा 2026 व्रत और स्नान दान डेट

    पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का प्रारंभ 25 सितंबर को रात 11 बजकर 6 मिनट पर होगा। पूर्णिमा तिथि का समापन 26 सितंबर को रात 10 बजकर 18 मिनट पर होगा। भाद्रपद पूर्णिमा 26 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। इसी दिन स्नान-दान किया जाएगा। पूर्णिमा का व्रत भी 26 सितंबर को ही रखा जाएगा।

    भाद्रपद पूर्णिमा 2026 स्नान-दान मुहूर्त

    भाद्रपद पूर्णिमा के दिन स्नान दान के लिए ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4 बजकर 53 मिनट से सुबह 5 बजकर 40 मिनट तक रहेगा। वहीं अभिजित मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 6 मिनट से दोपहर 12 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। ये दोनों ही समय स्नान-दान के लिए उत्तम रहेगा। हालांकि पूर्णिमा का पूरा दिन स्नान-दान के लिए अच्छा माना जाता है।

    भाद्रपद पूर्णिमा 2026 के दिन चंद्रोदय का समय

    भाद्रपद पूर्णिमा के दिन चंद्रोदय शाम 6 बजकर 18 मिनट पर होगा। बता दें कि जो श्रद्धालु पूर्णिमा का व्रत करते है वो रात में चंद्र देव की पूजा करते हैं और अर्घ्य देते हैं। इसके बाद ही पूर्णिमा व्रत का पारण (व्रत खोलते हैं) करते हैं।

    भाद्रपद पूर्णिमा का महत्व

    यह दिन धार्मिक दृष्टि से भाद्रपद पूर्णिमा को अत्यंत पवित्र माना जाता है। व्रत, पूजा, दान आदि कार्यों के लिए यह पूर्णिमा श्रेष्ठ माना गया है। भविष्यपुराण, स्कन्दपुराण और पद्मपुराण आदि धर्मग्रंथों में भाद्रपद पूर्णिमा के पुण्य महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस दिन गंगा स्नान, दान, व्रत, पूर्णिमा कथा श्रवण और भगवान विष्णु का पूजन करने से कई गुना अधिक शुभ फल प्राप्त होता है। अगर आप कहीं गंगा स्नान के लिए नहीं जा पा रहे हैं तो घर पर ही नहाने वाले में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लें। ऐसा करने से भी गंगा स्नान जितना पुण्य फल मिलता है।

  • वृंदावन जा रहे हैं तो भूलकर भी न करें ये 8 गलतियां, वरना…

    वृंदावन जा रहे हैं तो भूलकर भी न करें ये 8 गलतियां, वरना…

    वृंदावन जा रहे हैं तो भूलकर भी न करें ये 8 गलतियां, वरना…

    वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु बांके बिहारी मंदिर, प्रेम मंदिर, इस्कॉन मंदिर समेत कई धार्मिक स्थलों पर दर्शन करने पहुंचते हैं. वीकेंड और त्योहारों के दौरान यहां भीड़ कई गुना बढ़ जाती है. ऐसे में अगर आप भी वृंदावन जाने की तैयारी कर रहे हैं तो कुछ जरूरी सावधानियां बरतना बेहद जरूरी है. छोटी सी लापरवाही आपकी यात्रा का मजा खराब कर सकती है. आइए जानते हैं वृंदावन जाते समय किन 8 गलतियों से बचना चाहिए.बंदरों के सामने सामान न दिखाएं वृंदावन की गलियों और मंदिरों के आसपास बंदर बड़ी संख्या में नजर आते हैं. उनके सामने मोबाइल, चश्मा, प्रसाद या खाने की चीजें दिखाने से बचें.

    बंदर सामान छीनने की कोशिश कर सकते हैं. उन्हें छेड़ें नहीं और न ही उनके पास जाकर खाना खिलाएं.कीमती सामान लेकर न घूमें भीड़भाड़ वाली जगहों पर मोबाइल, पर्स और दूसरे कीमती सामान को संभालकर रखें. जरूरत से ज्यादा कैश लेकर जाने से बचें. जरूरी सामान को बैग में रखें और उसकी चेन बंद रखें. मोबाइल को भी हाथ में लेकर चलते रहने के बजाय सुरक्षित जगह पर रखें.मंदिरों के नियमों को नजरअंदाज न करें हर मंदिर के अपने अलग नियम हो सकते हैं. कहीं फोटोग्राफी की अनुमति नहीं होती तो कहीं मोबाइल ले जाने पर रोक रहती है. मंदिर प्रशासन के निर्देशों का पालन करें. पूजा के दौरान तेज आवाज में बात करने या अनुशासन बिगाड़ने से बचें.

    मंदिर में धक्का-मुक्की न करें वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में दर्शन के लिए काफी भीड़ रहती है. लाइन तोड़कर आगे बढ़ने या धक्का-मुक्की करने से बचें. इससे आपको या दूसरे श्रद्धालुओं को चोट लग सकती है. मंदिर की लाइन में ही खड़े रहें और सुरक्षाकर्मियों के निर्देशों का पालन करें. बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें.खुले में रखा खाना खाने से बचें वृंदावन में कई जगह स्ट्रीट फूड और प्रसाद की दुकानें मिलती हैं. कुछ भी खाने से पहले साफ-सफाई जरूर देखें. काफी देर से खुले में रखा खाना खाने से बचें. यात्रा के दौरान साफ पानी पिएं और संभव हो तो अपनी पानी की बोतल साथ रखें.बच्चों को भीड़ में अकेला न छोड़ें वीकेंड और त्योहारों पर भीड़ काफी बढ़ जाती है. ऐसे में बच्चों का हाथ पकड़कर रखें और उन्हें अकेले कहीं न जाने दें. परिवार के सभी सदस्यों के साथ पहले से एक मिलने की जगह तय कर लें. जरूरी संपर्क नंबर मोबाइल में सेव रखें.संकरी गलियों में सावधानी से चलें वृंदावन की कई गलियां काफी संकरी हैं, जहां पैदल लोगों के साथ ऑटो और ई-रिक्शा भी चलते हैं. सड़क या गली पार करते समय जल्दबाजी न करें. वाहनों से दूरी बनाकर चलें और भीड़ में अपने आसपास नजर रखें.

    जल्दी दर्शन के नाम पर किसी पर भरोसा न करें वृंदावन में कुछ लोग जल्दी दर्शन, पूजा या दूसरी धार्मिक सेवाएं कराने के नाम पर श्रद्धालुओं से संपर्क कर सकते हैं. ऐसे लोगों पर तुरंत भरोसा करके पैसे न दें. किसी भी सेवा के लिए भुगतान करने से पहले शुल्क और व्यवस्था की पूरी जानकारी लें.

  • 1500 साल पुराना चमत्कारी गणेश मंदिर, गणेश चतुर्थी पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब… जानें मंदिर की अनोखी मान्यता..

    1500 साल पुराना चमत्कारी गणेश मंदिर, गणेश चतुर्थी पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब… जानें मंदिर की अनोखी मान्यता..

    1500 साल पुराना चमत्कारी गणेश मंदिर, गणेश चतुर्थी पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब… जानें मंदिर की अनोखी मान्यता..

    जैसलमेर में गणेश चतुर्थी के मौके पर एक अनोखा नजारा देखने को मिला. शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित 1500 साल पुराने चूंधी गणेश मंदिर में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे. मंदिर बरसाती नदी के तेज बहाव वाले क्षेत्र के बीच बना है. इसके बावजूद मान्यता है कि तेज पानी भी गणेश जी की प्रतिमा को आज तक अपनी जगह से नहीं हिला सका. यही वजह है कि इस मंदिर को चमत्कारी माना जाता है.

    सुबह 5 बजे से मंदिर की ओर बढ़ने लगा श्रद्धालुओं का रेला गणेश चतुर्थी के दिन सोमवार सुबह करीब 5 बजे से ही जैसलमेर शहर और आसपास के इलाकों से श्रद्धालु पैदल मंदिर की ओर निकल पड़े. करीब 12 किलोमीटर के रास्ते पर जगह-जगह भक्तों की भीड़ नजर आई. बड़ी संख्या में लोग अपने वाहनों से भी मंदिर पहुंचे. दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी रहीं. मंदिर परिसर को आकर्षक लाइटिंग और फूलों से सजाया गया था. गणेश जी का विशेष श्रृंगार किया गया, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा. मेले में बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले और अलग-अलग खेलों की भी व्यवस्था की गई.51

    हजार लड्डुओं का लगाया गया भोग चूंधी गणेश मेला कमेटी के विमल गोपा के मुताबिक, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए हनुमान चौराहे से मंदिर तक निशुल्क बसों की व्यवस्था की गई. मेले में अलग-अलग देवी-देवताओं की झांकियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं. गणेश जी को 51 हजार लड्डुओं का भोग लगाया गया. शाम 7 बजे महाआरती के बाद भजन संध्या का आयोजन किया गया. इसके अलावा सुंदरकांड का पाठ भी हुआ.नदी में पत्थरों से घर बनाते हैं भक्त इस मंदिर को ‘घर देने वाले गणेश जी’ के नाम से भी जाना जाता है.

    श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां गणेश जी से अपना घर मांगने पर मनोकामना पूरी होती है. इसी आस्था के चलते मंदिर के पास नदी में लोग पत्थरों से छोटे-छोटे घर बनाते हैं. गणेश चतुर्थी पर भी नदी में ऐसे घरों के मॉडल बनाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही.बारिश में होता है गणेश जी का जलाभिषेक मान्यता है कि बारिश के मौसम में बरसाती नदी का पानी मंदिर परिसर से होकर गुजरता है और गणेश जी की प्रतिमा को छूकर निकलता है. भक्त इसे गणेश जी का प्राकृतिक जलाभिषेक मानते हैं. तेज बहाव के बावजूद प्रतिमा के अपनी जगह से नहीं हिलने को लेकर भी यहां लोगों की गहरी आस्था है.

  • जानें क्यों तिरछी बनाई गई 15 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा! 164 साल पुराने इस मंदिर में दूर-दूर से आते हैं भक्त.

    जानें क्यों तिरछी बनाई गई 15 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा! 164 साल पुराने इस मंदिर में दूर-दूर से आते हैं भक्त.

    जानें क्यों तिरछी बनाई गई 15 फीट ऊंची गणेश प्रतिमा! 164 साल पुराने इस मंदिर में दूर-दूर से आते हैं भक्त.

    मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के खिलचीपुर नगर में स्थित 15 फीट ऊंचे चिंतामण गणेश मंदिर में गणेश चतुर्थी के अवसर पर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ी. मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित दूर-दूर से लोग भगवान गणेश के दर्शन करने पहुंचे. प्राचीन मंदिर और विशाल प्रतिमा भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बने हुए हैं.

    164 साल पुराना है मंदिर खिलचीपुर के सोमवारिया चौक को अब गणेश चौक के नाम से जाना जाता है. इसी स्थान पर चिंतामण गणेश जी की विशाल प्रतिमा स्थापित है.मंदिर की स्थापना 164 वर्ष पहले हुई थी. वर्ष 1862 में रेत और चूने से भगवान गणेश की विशाल प्रतिमा का निर्माण कराया गया था. 15 फीट ऊंची यह प्रतिमा अपनी प्राचीनता और निर्माण शैली के कारण खास आकर्षण का केंद्र है.

    विधि-विधान से पूजा और लड्डुओं का महाभोग गणेश चतुर्थी के अवसर पर चिंतामण गणेश जी का सुंदर श्रृंगार किया गया. धूप और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करने के बाद भगवान को लड्डुओं का महाभोग लगाया गया. रात 9:30 बजे ढोल-धमाकों के साथ महाआरती हुई. इसके बाद श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया. महाआरती में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, महिलाएं और बच्चे शामिल हुए. गणपति बप्पा के जयकारों से मंदिर परिसर पूरी तरह भक्तिमय हो गया. श्रद्धालुओं ने भगवान गणेश के दर्शन किए और सुख-समृद्धि की कामना की.

    तिरछी प्रतिमा के पीछे जुड़ी है प्राचीन मान्यता चिंतामण गणेश की इस विशाल प्रतिमा से एक प्राचीन मान्यता भी जुड़ी हुई है. मान्यता के अनुसार, प्रतिमा के निर्माण के समय लोगों को आशंका थी कि भगवान गणेश का चेहरा जिस दिशा में सीधा रहेगा, उस दिशा में रहने वाले लोगों पर दरिद्रता और गरीबी आ सकती है. इसी मान्यता के चलते प्रतिमा को सीधा रखने के बजाय थोड़ा तिरछा स्थापित किया गया.

    मध्य प्रदेश और राजस्थान के लोगों की आस्था का केंद्र खिलचीपुर का चिंतामण गणेश मंदिर मध्य प्रदेश और राजस्थान के हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है. गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां बड़ी संख्या में भक्त भगवान गणेश के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. वहीं, गाड़ गंगा नदी तट पर स्थित भगवान गणेश की दूसरी प्रतिमा भी अति प्राचीन मानी जाती है और यह भी हजारों लोगों की आस्था का केंद्र है.

  • गणेश जी की सवारी मूषक ही क्यों? छोटी-सी सवारी के पीछे छिपा है बड़ा रहस्य, जानिए क्या है पौराणिक मान्यता

    गणेश जी की सवारी मूषक ही क्यों? छोटी-सी सवारी के पीछे छिपा है बड़ा रहस्य, जानिए क्या है पौराणिक मान्यता

    गणेश जी की सवारी मूषक ही क्यों? छोटी-सी सवारी के पीछे छिपा है बड़ा रहस्य, जानिए क्या है पौराणिक मान्यता

    एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, मूषक पहले एक गंधर्व था, जिसे श्राप के कारण मूषक बनना पड़ा. बाद में वह गणेश जी का वाहन बना. प्रतीकात्मक रूप से चूहा बहुत चंचल और चीजों को कुतरने वाला माना जाता है, इसलिए इसे मनुष्य की इच्छाओं, चंचल मन और अहंकार का प्रतीक भी माना गया.

    गणेशजी ने मूषक को बनाया अपना वाहन

    गणेशजी ने मूषक को बनाया अपना वाहन

    गणेशजी की सवारी मूषक ही क्यों?

    गणेशजी की सवारी मूषक ही क्यों?

    14 सितंबर से गणेश उत्सव की शुरुआत हो चुकी है. 10 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में घरों और पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है. गणेशजी को विघ्नहर्ता और बुद्धि-विवेक का देवता माना जाता है. उनकी प्रतिमा में एक चीज खास तौर पर दिखाई देती है उनकी सवारी मूषक यानी चूहा. देखने में बेहद छोटा और साधारण लगने वाला यह जीव आखिर गणेशजी का वाहन क्यों बना? इसके पीछे सिर्फ पौराणिक कथा ही नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े कई गहरे संदेश भी छिपे हैं.

    मूषक चंचल मन और इच्छाओं का प्रतीक धार्मिक मान्यताओं में मूषक को मनुष्य की चंचल इच्छाओं और वासनाओं का प्रतीक माना गया है. जिस तरह चूहा लगातार इधर-उधर भागता रहता है और किसी एक जगह स्थिर नहीं रहता, उसी तरह मनुष्य का मन भी इच्छाओं के पीछे लगातार दौड़ता रहता है. गणेशजी का मूषक पर सवार होना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि बुद्धि और विवेक को इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए.

    छोटा है, लेकिन किसी भी जगह पहुंच सकता है मूषक का शरीर छोटा होता है और वह बहुत संकरी जगह में भी आसानी से पहुंच सकता है. इसी गुण को गणेशजी की बुद्धि से जोड़ा जाता है. भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है. इसका संदेश है कि समझदार व्यक्ति के लिए कोई भी समस्या इतनी बड़ी नहीं होती कि उसका रास्ता न निकाला जा सके. जैसे मूषक छोटी से छोटी जगह में पहुंच जाता है, वैसे ही सच्ची बुद्धि जटिल से जटिल समस्या की गहराई तक पहुंचकर उसका समाधान खोज सकती है.

    कमजोर दिखने वाला मूषक देता है मेहनत का संदेश मूषक आकार में छोटा और कमजोर दिखाई देता है, लेकिन उसके दांत इतने मजबूत होते हैं कि वह कठोर चीजों को भी कुतर सकता है. यही गुण मनुष्य के लिए एक बड़ा संदेश देता है. जीवन में साधन कम होने के बावजूद अगर मेहनत, धैर्य और दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो बड़ी से बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है. यानी सफलता के लिए हमेशा बड़े साधनों की जरूरत नहीं होती, बल्कि लगातार प्रयास और मजबूत इरादे ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं.

    अहंकारी गंधर्व से बना मूषक मूषक को गणेशजी का वाहन बनने की एक पौराणिक कथा भी है. मान्यता के अनुसार, मूषक पहले क्रोंच नाम का एक गंधर्व था. एक बार वह देवराज इंद्र के दरबार में अप्सराओं के साथ हास-परिहास कर रहा था. इसी दौरान उसका पैर ऋषि वामदेव पर पड़ गया. ऋषि इससे क्रोधित हो गए और उन्होंने क्रोंच को चूहा बनने का श्राप दे दिया. श्राप के कारण क्रोंच मूषक बन गया. इसके बाद वह पराशर ऋषि के आश्रम में पहुंचा और वहां उत्पात मचाने लगा. उसने अनाज खा लिया, वस्त्रों को नुकसान पहुंचाया और आश्रम के ग्रंथों तक को कुतर डाला.

    गणेशजी ने मूषक को बनाया अपना वाहन मूषक के उत्पात से परेशान होकर ऋषियों ने भगवान गणेश से सहायता मांगी. गणेशजी ने अपना पाश फेंककर मूषक को पकड़ लिया. मूषक ने अपनी गलती स्वीकार की और गणेशजी से क्षमा मांगी. इसके बाद गणेशजी ने उसे अपना वाहन बना लिया. इस कथा को अहंकार और शक्ति के सही इस्तेमाल से जोड़कर देखा जाता है.

    मूषक से मिलता है जीवन का बड़ा संदेश गणेशजी और मूषक का संबंध केवल भगवान और उनके वाहन का संबंध नहीं माना जाता. इसमें मनुष्य के जीवन का दर्शन भी छिपा है. मूषक चंचल मन, इच्छाओं, अहंकार और छोटी-छोटी बाधाओं का प्रतीक है, जबकि गणेशजी बुद्धि, विवेक और ज्ञान के प्रतीक हैं. इसलिए गणेशजी का मूषक पर विराजमान होना यह संदेश देता है कि जब बुद्धि और विवेक मन की चंचलता, इच्छाओं और अहंकार पर नियंत्रण पा लेते हैं, तब जीवन की बाधाएं भी छोटी लगने लगती हैं.

  • सितंबर को मंगल का पुष्य नक्षत्र में प्रवेश, इन 5 राशियों के शुरू होंगे राजसी ठाठ.

    सितंबर को मंगल का पुष्य नक्षत्र में प्रवेश, इन 5 राशियों के शुरू होंगे राजसी ठाठ.

    सितंबर को मंगल का पुष्य नक्षत्र में प्रवेश, इन 5 राशियों के शुरू होंगे राजसी ठाठ.

    ज्योतिष शास्त्रों में मंगल ग्रह को बड़ा बलवान माना जाता है. कहा जाता है कि जिसके जीवन में मंगल का उद्गम होता है, उसके जिंदगी में ऊर्जा, साहस, पराक्रम और संपत्ति की बढ़ोतरी होने लगती है. 24 सितंबर 2026 को सुबह 5:50 बजे के लगभग मंगल ग्रह पुष्य नक्षत्र में प्रवेश करने जा रहे हैं और 17 अक्टूबर तक इसी नक्षत्र में गोचर करते नजर आएंगे. पुष्य नक्षत्र के स्वामी शनि और अधिष्ठाता देवता बृहस्पति माने जाते हैं. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार मंगल के इस नक्षत्र परिवर्तन का असर कुछ राशियों पर पड़ने जा रहा है. इस परिवर्तन के कारण इन 5 राशियों का राजसी ठाठ जागने के योग हैं.

    मेष राशि मेष राशि के जातकों के लिए यह समय उनके पक्ष में रहेगा. सारे रुके हुए काम अपने आप बनते चले जाएंगे. संपत्ति से जुड़े मामलों में लाभ मिल सकता है. व्यापार जातकों को मुनाफा मिलने वाला है और कोई अच्छी खबर भी सामने आ सकती है. जिनके जीवन में परिवार का सहयोग नहीं है, उन्हें अपनों का सहयोग मिलेगा और जीवनसाथी के साथ भी समय अच्छा बीतेगा. मानसिक तनाव कम होने से राहत महसूस हो सकती है.

    कर्क राशि इस परिवर्तन के दौरान मंगल कर्क राशि में ही मौजूद रहेंगे और इसी दौरान पुष्य नक्षत्र में भी प्रवेश करेंगे. इस वजह से इस राशि के लोगों के लिए काम और निजी जीवन से जुड़े मामलों में पॉजिटिव बदलाव देखने को मिल सकता है. इस समय आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा. इसके साथ फैसले लेने का मौका मिलेगा. हालांकि, मंगल कर्क राशि में नीच अवस्था में माने जाते हैं, इसलिए जल्दबाजी से बचकर काम करें और ऐसे ही कोई फैसला न लें.

    वृश्चिक राशि वृश्चिक राशि वालों के लिए मंगल का यह बदलाव भाग्य से जुड़े मामलों में मददगार माना जा सकता है. कामकाज में मेहनत का अच्छा नतीजा मिल सकता है और आगे बढ़ने के नए रास्ते खुल सकते हैं. नौकरी और कारोबार में अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिलेगा. परिवार और करीबी लोगों का सहयोग भी मिल सकता है.

    कन्या राशि कन्या राशि वालों के लिए मंगल का पुष्य नक्षत्र में जाना मान-सम्मान बढ़ाने वाला माना जा रहा है. नौकरी और व्यापार में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं. लंबे समय से अटके काम पूरे होने की उम्मीद है. रोजी-रोजगार में आगे बढ़ने के मौके मिल सकते हैं और परिवार में भी माहौल अच्छा बना रह सकता है.

    मकर राशि मकर राशि वालों के लिए भी यह समय आर्थिक मामलों में कुछ अच्छे मौके लेकर आ सकता है. कामकाज में मेहनत का फायदा मिल सकता है और व्यापार से जुड़े लोगों को लाभ के अवसर मिल सकते हैं. पुराने कामों को पूरा करने की दिशा में तेजी आ सकती है. धन से जुड़े फैसले लेते समय हालांकि सोच-समझकर आगे बढ़ना बेहतर रहेगा.

    क्या करें उपाय? इस दौरान मंगल से मिलने वाले लाभ पाने के लिए हनुमान जी की पूजा करें और मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे तो सभी चीजें शुभ-शुभ होती चली जाएगी. जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करना और अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भी अच्छा रहेगा. साथ ही मंगल के प्रभाव में जल्दबाजी या गुस्से में कोई बड़ा फैसला लेने से बचें.