देशभर में गणेश उत्सव की धूम के बीच नागपुर के प्रसिद्ध गणेश टेकड़ी मंदिर में आज भगवान गणेश को 1101 किलो का विशाल महालड्डू अर्पित किया गया. भक्तों ने विधिवत पूजा-अर्चना के बाद इस महालड्डू का भोग भगवान गणेश को लगाया.
गणपति बप्पा को भोग लगाने के लिए नागपुर में ऐसा महालड्डू तैयार किया गया, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया. गणेश टेकड़ी मंदिर में भगवान गणेश को 1101 किलो का विशाल लड्डू चढ़ाया गया. करीब 5 फीट ऊंचे इस महालड्डू को तैयार करने में 22 कारीगरों ने 6 दिनों तक दिन-रात मेहनत की. मंदिर में पहुंचे श्रद्धालुओं के लिए भी यह महालड्डू आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र बना रहा.
6 दिन में तैयार हुआ विशाल लड्डू इस खास महालड्डू को तैयार करने के लिए 22 कारीगरों ने लगातार 6 दिनों तक दिन-रात मेहनत की. आयोजकों के मुताबिक, इसे बनाने में बूंदी और सूखे मेवों की कुल 7 परतें लगाई गईं. इन परतों को खास तरीके से जोड़कर लड्डू को विशाल गोल आकार दिया गया.320 किलो बेसन और 320 किलो घी का इस्तेमाल इतने बड़े महालड्डू को बनाने में बड़ी मात्रा में सामग्री का इस्तेमाल किया गया है. इसमें करीब 320 किलो बेसन, 260 किलो शक्कर, 320 किलो देसी घी और 61 किलो सूखे मेवे डाले गए हैं. सूखे मेवों में पिस्ता, बादाम, काजू और किशमिश शामिल हैं. इसके अलावा लड्डू में केसर और गुलाब जल भी मिलाया गया है.
चांदी के वर्क से सजाया गया महालड्डू को सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि देखने में भी खास बनाया गया. इसकी सजावट के लिए ऊपर से चांदी का वर्क लगाया गया. विशाल आकार और खास सजावट के कारण यह महालड्डू मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा. भगवान गणेश को महालड्डू का भोग लगाए जाने के दौरान मंदिर में भक्तों की बड़ी भीड़ नजर आई. श्रद्धालुओं ने गणपति के दर्शन किए और महालड्डू के साथ तस्वीरें भी लीं.
बुधवार को 124वें श्री नंदा देवी महोत्सव के नगर भ्रमण के दौरान सरोवर नगरी का पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा. हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ मां नंदा-सुनंदा के डोले के साथ चलती रही. बारिश आई, लेकिन आस्था के कदम नहीं रुके.
बुधवार को नैनीताल में 124वें श्री नंदा देवी महोत्सव का नगर भ्रमण आस्था और भक्ति के रंग में डूबा नजर आया. मां नंदा-सुनंदा के डोले के साथ हजारों श्रद्धालु बारिश के बीच भी चलते रहे. मंदिर से लेकर शहर की सड़कों तक हर तरफ जयकारे, ढोल-नगाड़े और भक्तों की भीड़ दिखाई दी.पूजा के बाद निकला मां का डोला नयना देवी मंदिर में विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद मां नंदा-सुनंदा का डोला नगर भ्रमण के लिए निकला.
मंदिर के मुख्य द्वार पर डोले पर पुष्पवर्षा की गई. श्रद्धालुओं ने हाथ जोड़कर मां के दर्शन किए और आशीर्वाद लिया. इसके बाद डोला डीएसए मैदान, मस्जिद, शारदा संघ होते हुए माल रोड से तल्लीताल की ओर बढ़ा. बारिश की बूंदों के बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ.
महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और युवा बड़ी संख्या में डोले के साथ चलते रहे. रास्ते में कई जगह आरती उतारी गई और पुष्पवर्षा की गई. ढोल-दमाऊं, बैंड-बाजे और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज ने माहौल को और भव्य बना दिया. पारंपरिक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने कुमाऊं की लोक संस्कृति की झलक भी दिखाई.जगह-जगह लगे सेवा के द्वार नगर भ्रमण में आस्था के साथ सेवा का भाव भी देखने को मिला. श्रद्धालुओं के लिए जगह-जगह भंडारे लगाए गए. लोगों को हलवा-पूरी, पानी, फ्रूटी और प्रसाद बांटा गया. बारिश के बीच स्थानीय लोग और स्वयंसेवक श्रद्धालुओं की सेवा में जुटे रहे.कैलाश के लिए विदा होंगी मां तल्लीताल पहुंचने के बाद डोले को फिर मल्लीताल लाया जाएगा. देर शाम ठंडी सड़क स्थित गोलू देवता मंदिर के पास से मां नंदा-सुनंदा के डोले का नैनी झील में विसर्जन किया जाएगा. इसके साथ ही मां अपने मायके नैनीताल से कैलाश के लिए विदा होंगी. इस दौरान पूरा शहर एक बार फिर ‘जय मां नंदा, जय मां सुनंदा’ के जयकारों से गूंज उठेगा.
इंदौर की झांकी परंपरा का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है. शहर में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 1900 से पहले हुई थी. 21 सितंबर को हुई बैठक के मुताबिक शाम 6 बजे डीआरपी लाइन से झांकी कारवां शुरू होगा. इस बार समारोह में डीजे पर प्रतिबंध रहेगा.
इंदौर की अनंत चतुर्दशी की झांकियां सिर्फ गणेश विसर्जन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये शहर की 150 साल से ज्यादा पुरानी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं. इस साल 25 सितंबर को निकलने वाले झांकी चल समारोह की तैयारियां अंतिम दौर में हैं. 21 सितंबर को हुई बैठक के मुताबिक शाम 6 बजे डीआरपी लाइन से झांकी कारवां शुरू होगा.
इस बार समारोह में डीजे पर प्रतिबंध रहेगा. झांकी चल समारोह में सबसे आगे खजराना गणेश मंदिर की झांकी रहेगी. इसके बाद शास्त्री कॉर्नर नवयुवक मंडल, आईडीए, नगर निगम, होप टेक्सटाइल, कल्याण मिल, मालवा मिल, हुकुमचंद मिल, स्वदेशी मिल, राजकुमार मिल और स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी की झांकियां शामिल होंगी.
रोशनी से सजी ये झांकियां शहर की सड़कों से गुजरेंगी.मिल मजदूरों ने शुरू की थी परंपरा इंदौर की झांकी परंपरा का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है. शहर में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 1900 से पहले हुई थी. इसी दौरान मिल मजदूरों ने झांकी बनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया. हुकुमचंद मिल से निकली शुरुआती झांकी के बाद यह सिलसिला लगातार बढ़ता गया और अनंत चतुर्दशी का झांकी चल समारोह इंदौर की पहचान बन गया. शुरुआत में झांकियां दिन में निकाली जाती थीं. अंधेरा होने पर गैस बत्तियों से रोशनी की जाती थी.
बाद में बिजली के बल्ब और जनरेटर का इस्तेमाल शुरू हुआ. समय के साथ झांकियों में भी कई बदलाव आए.मिलें बंद हुईं, लेकिन कारीगरों ने नहीं छोड़ी विरासत आज इंदौर की कई मिलें बंद हो चुकी हैं, लेकिन झांकियां बनाने वाले कारीगर इस परंपरा को अब भी जिंदा रखे हुए हैं. झांकी निर्माता असलम बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें यह कला सिखाई. उनके परिवार के लिए झांकी बनाना सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है. पहले मिल मजदूरों को झांकी बनाने के लिए लकड़ी और लोहा जैसी सामग्री मिल परिसर से मिल जाती थी. अब मिलें बंद होने के बाद ज्यादातर सामान बाजार से खरीदना पड़ता है.
मोटर, मशीन और चलित पुतलों जैसी तकनीक ने झांकियों को आकर्षक बनाया है, लेकिन इससे खर्च भी बढ़ा है.धार्मिक आयोजन से आगे बनी सांस्कृतिक पहचान झांकी परंपरा को करीब से देखने वाले महेश गौहर के मुताबिक पहले झांकियों में मिल मजदूरों की मेहनत और हाथों का हुनर साफ नजर आता था. समय के साथ मिलें बंद हुईं और तकनीक बदली, लेकिन लोगों का उत्साह कायम रहा. धीरे-धीरे झांकियों में सामाजिक, राष्ट्रीय और समसामयिक विषय भी शामिल होने लगे.
महाराष्ट्र के अकोला स्थित ‘रोज परिवर्तन गणेश पंडाल’ में 1980 के दशक के गांव की जीवनशैली पर आधारित अद्भुत झांकी सजाई गई है. इसमें मिट्टी का चूल्हा, बायोस्कोप, एंटीना टीवी और धागे वाले माचिस फोन जैसी पुरानी यादें दिखाई गई हैं.
आज सोशल मीडिया पर 1980 के दशक की तस्वीरों को AI के जरिए दोबारा बनाने का ट्रेंड चल रहा है, लेकिन महाराष्ट्र के अकोला में एक गणेश पंडाल ने इस दौर को तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा. सिंधी कैंप के रोज परिवर्तन गणेश पंडाल में 1980 के दशक के गांव और देहात की जिंदगी को पूरी झांकी के रूप में सजाया गया है. यहां पहुंचते ही मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया से अलग उस समय का माहौल देखने को मिलता है. इस झांकी में उस दौर की कई ऐसी चीजें दिखाई गई हैं, जिन्हें आज की पीढ़ी शायद ही इस्तेमाल करती हो. दो माचिस की डिब्बियों और धागे से बनाया गया खिलौना फोन भी यहां रखा गया है. बच्चों के लिए यह उस समय का एक मजेदार खेल हुआ करता था. झांकी में कुएं से पानी भरना, बैलगाड़ी और खेती, मिट्टी के चूल्हे पर खाना, सिलबट्टे पर मसाला पीसना और गोबर से लिपे घर भी दिखाए गए हैं. कवेलू की छत, ग्राम पंचायत और खेतों में बैल-हल के जरिए खेती का दृश्य भी उस समय के गांव की तस्वीर सामने रखता है.
साइकिल के टायर से लेकर जमीन पर पढ़ाई तक उस समय बच्चों के मनोरंजन के साधन भी आज से बिल्कुल अलग थे. पंडाल में साइकिल के पुराने टायर को लकड़ी से धकेलकर खेलने का दृश्य दिखाया गया है. वहीं, स्कूल में बच्चों के जमीन पर बैठकर पढ़ने, पुरानी स्कूल ड्रेस, किताबों और स्लेट से पढ़ाई करने की झलक भी दिखाई गई है. यह झांकी सिर्फ पुरानी चीजें दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को यह समझाने की कोशिश करती है कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का बचपन किस तरह बीता था.
मिट्टी का चूल्हा और सिलबट्टा बना आकर्षण 1980 के दशक की रसोई को भी पंडाल में खास जगह दी गई है. उस समय गैस स्टोव और आधुनिक किचन की जगह मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाने का चलन था. मसाले पीसने के लिए सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता था. इन चीजों को देखकर पुरानी पीढ़ी के लोग अपने घर और बचपन की यादों से जुड़ रहे हैं.
टीवी आया तो पूरे घर में जुटता था परिवार झांकी में उस दौर का बॉक्स टीवी और उसकी छत पर लगी एंटीना भी दिखाई गई है. गांव में जब नया-नया टेलीविजन आया था, तब वह अपने आप में बड़ा आकर्षण हुआ करता था. पूरा परिवार स्क्रीन के सामने बैठकर कार्यक्रम देखता था और पसंदीदा कार्यक्रम का इंतजार करता था.
बायोस्कोप और चिट्ठी का इंतजार उस समय गांवों में टॉकीज आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, ऐसे में बायोस्कोप मनोरंजन का एक खास साधन था. पंडाल में बायोस्कोप के जरिए फिल्म देखने का दृश्य भी बनाया गया है. इसके साथ साइकिल पर चिट्ठी लेकर आता पोस्टमैन भी झांकी का हिस्सा है. उस दौर में किसी अपने की चिट्ठी का इंतजार कई दिनों तक रहता था.
दो पीढ़ियों को जोड़ रही है झांकी रोज परिवर्तन गणेश पंडाल के अध्यक्ष राजकुमार गिर के मुताबिक, हर साल गणेश उत्सव के जरिए कोई न कोई संदेश देने की कोशिश की जाती है. इस बार 1980 के दशक के गांव और उस समय की जीवनशैली को दिखाने का प्रयास किया गया है. उनका कहना है कि आज की पीढ़ी मोबाइल और डिजिटल दुनिया में बड़ी हो रही है, इसलिए उसे यह भी पता होना चाहिए कि उनके माता-पिता और बुजुर्ग किस तरह की जिंदगी जीते थे. इस झांकी में एक तरफ स्मार्टफोन और इंटरनेट की आज की दुनिया है तो दूसरी ओर कुआं, मिट्टी का चूल्हा, बैल से खेती, बायोस्कोप, चिट्ठी और साइकिल का टायर वाला बचपन. यही वजह है कि गणपति बप्पा के सामने सजी यह 1980s थीम पुरानी पीढ़ी के लिए यादें और नई पीढ़ी के लिए एक अलग अनुभव बन गई है.
पितृ पक्ष के अवसर पर प्रयागराज स्थित पवित्र गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. लोग संगम में स्नान करने के बाद अपने पितरों के लिए तर्पण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति तथा परिवार के कल्याण की कामना करते हैं. कई परिवार अपने पूर्वजों की निर्धारित तिथि पर श्राद्ध और पिंडदान की धार्मिक विधि भी पूरी करते हैं.
पितृ पक्ष हिंदू धर्म में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है. इस अवधि में लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी तथा अन्य पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है और यह 10 अक्टूबर को समाप्त होगा.
संगम को पितृ कर्म के लिए विशेष श्रद्धा का स्थान माना जाता है. यहां दूर-दूर से लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने आते हैं. कहा जाता है, विष्णु मुख प्रयाग, विष्णु नाभि काशी और विष्णु चरण गया, इन तीन जगहों पर लोग जाकर अपने पुरखों का पिंडदान करते हैं, तभी यह पूर्ण माना जाता है. पितृ पक्ष का यह अवसर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी स्मृतियों को सम्मान देने की परंपरा भी है.
इस बार प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों ने ऑनलाइन पिंडदान की भी व्यवस्था की है. उनका कहना है कि जो लोग देश-विदेश या किसी कारणवश अपने पुरखों का पिंडदान करने नहीं आ सकते, वे ऑनलाइन ही पिंडदान कर सकते हैं. ऐसा करके वे लोग अपने पूर्वजों और अपनी परंपरा से जुड़े रहते हैं.
प्रयागराज में देशभर से लोग पितृ पक्ष में पिंडदान करने आते हैं. भारी संख्या में लोग प्रयागराज आकर अपने पुरखों और पूर्वजों को पिंडदान कर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं.
हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा संस्कारी बने. लेकिन बच्चे को संस्कारी बने के लिए पहले खुद भी अच्छा व्यवहार रखना होता है. साथ ही बढ़ती उम्र के साथ उसे अलग-अलग तरीकों से संस्कार देने चाहिए.
बच्चे का व्यवहार और उसकी आदतें बचपन से ही बननी शुरू हो जाती हैं. घर का माहौल, माता-पिता का व्यवहार, खान-पान, दोस्तों की संगति और रोजमर्रा की आदतें बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा असर डालती हैं. माना जाता है कि जन्म से लेकर करीब 21 वर्ष की उम्र तक बच्चे के संस्कार तेजी से बनते हैं. इसलिए हर उम्र में माता-पिता को कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए.
5 साल तक खान-पान पर दें ध्यान
बच्चे के जीवन के शुरुआती पांच साल बहुत अहम होते हैं. इस दौरान उसकी खाने-पीने की आदतें धीरे-धीरे मजबूत होती हैं. इसलिए बच्चे को पौष्टिक और घर का बना भोजन देने की कोशिश करें. बहुत ज्यादा फास्ट फूड, तला-भुना और जरूरत से ज्यादा मसालेदार खाना देने से बचें. इस उम्र में बच्चे आसपास के लोगों की बातों और व्यवहार की नकल भी करते हैं. इसलिए माता-पिता को उनके सामने अच्छे शब्दों और शांत व्यवहार का इस्तेमाल करना चाहिए.
6 से 10 साल में सिखाएं सही और गलत का फर्क
6 से 10 साल की उम्र में बच्चा अच्छी और बुरी आदतों को समझना शुरू करता है. इसी समय उसे घर के नियम, बड़ों का सम्मान, दूसरों की मदद और सही व्यवहार के बारे में समझाया जा सकता है. घर का माहौल बच्चे की सोच पर असर डालता है. इसलिए माता-पिता को खुद भी ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जिसे वे बच्चे में देखना चाहते हैं. बच्चे को डांटने के बजाय प्यार से सही और गलत का अंतर समझाएं.
11 से 15 साल में समझें बच्चे की रुचि
इस उम्र में बच्चे पढ़ाई, भविष्य और करियर को लेकर सोचने लगते हैं. माता-पिता को बच्चे की रुचि समझनी चाहिए और अपनी पसंद उस पर नहीं थोपनी चाहिए. पढ़ाई के साथ योग, ध्यान या प्रार्थना जैसी अच्छी आदतों के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है. बच्चे से उसकी परेशानी और पसंद के बारे में खुलकर बात करना जरूरी है.
17 से 21 साल में दें जिम्मेदारी
किशोरावस्था के बाद बच्चे में कई बदलाव आते हैं. इस समय उसे छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां खुद संभालने का मौका देना चाहिए. माता-पिता जरूरत पड़ने पर उसका मार्गदर्शन करें, लेकिन हर फैसला उसके लिए खुद न लें. उसकी संगति और दिनचर्या पर ध्यान रखें. परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताने और उनके अनुभव से सीखने के लिए प्रेरित करें.
पितरों के आगमन से पहले घर की ऊर्जा को शुद्ध और संतुलित करना जरूरी है. घर में बेकार सामान और नकारात्मकता से जुड़ी चीजें रखने से तरक्की में रुकावट आ सकती है. आइए जानते हैं पितृपक्ष से पहले किन चीजों को घर से हटा देना चाहिए.
पितृपक्ष को पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का खास समय माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान पितर अपने परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं. इस साल पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है. ऐसे में घर की साफ-सफाई और सकारात्मक माहौल का विशेष ध्यान रखना चाहिए. वास्तु गुरु मान्यता के अनुसार, पितरों के आगमन से पहले घर की ऊर्जा को शुद्ध और संतुलित करना जरूरी है.
घर में बेकार सामान और नकारात्मकता से जुड़ी चीजें रखने से तरक्की में रुकावट आ सकती है. आइए जानते हैं पितृपक्ष से पहले किन चीजों को घर से हटा देना चाहिए.खंडित मूर्तियां और फटी धार्मिक तस्वीरें वास्तु गुरु मान्या के अनुसार, घर के मंदिर या किसी कोने में टूटी हुई मूर्तियां नहीं रखनी चाहिए. इसी तरह फटी या खराब हो चुकी धार्मिक तस्वीरों को भी घर में नहीं रखना चाहिए. वास्तु मान्यता के अनुसार, इससे नकारात्मक ऊर्जा बढ़ सकती है और पूजा-पाठ के दौरान सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है.बंद पड़ी घड़ी अगर घर में कोई घड़ी लंबे समय से बंद पड़ी है तो उसे ठीक करवा लें या हटा दें.
वास्तु के अनुसार, बंद घड़ी को घर में रखना शुभ नहीं माना जाता. मान्यता है कि इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित हो सकती है और कामों में रुकावट आ सकती है.टूटे-चटके बर्तन न रखें श्राद्ध और तर्पण के दौरान पितरों के लिए भोग तैयार किया जाता है. ऐसे में घर में साफ-सफाई का खास ध्यान रखना चाहिए. वास्तु के अनुसार, टूटे या चटके हुए बर्तनों को घर में रखना अशुभ माना जाता है. इन्हें इस्तेमाल से पहले ही हटा देना बेहतर है.जंग लगी धातु और सूखे पौधे वास्तु गुरु के अनुसार, लोहे या किसी अन्य धातु पर लगी जंग घर की ऊर्जा को प्रभावित कर सकती है. वहीं सूखे और मुरझाए हुए फूल-पौधे भी घर में नहीं रखने चाहिए. पितृपक्ष से पहले इन्हें हटाकर घर में हरे-भरे पौधे लगाने की सलाह दी जाती है.
ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, शिक्षा, धन, विवाह, संतान और सौभाग्य का कारक माना जाता है. कुंडली में गुरु की स्थिति कमजोर होने पर व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. खासतौर पर पढ़ाई-लिखाई में बाधा, करियर में रुकावट, आर्थिक परेशानियां और विवाह में देरी जैसी स्थितियों को गुरु की कमजोरी से जोड़कर देखा जाता है. यही वजह है कि गुरु को मजबूत करने के लिए पुखराज धारण करने की सलाह दी जाती है. हालांकि, हर व्यक्ति के लिए महंगा रत्न खरीदना संभव या जरूरी नहीं माना जाता. ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार के दिन कुछ सरल उपाय करके भी बृहस्पति देव की कृपा पाने का प्रयास किया जा सकता है.
क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है बृहस्पति ग्रह?
वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को देवगुरु कहा गया है. इसे ज्ञान, विवेक, धर्म, अध्यात्म, शिक्षा, संतान, विवाह और समृद्धि से संबंधित ग्रह माना जाता है. मान्यता है कि कुंडली में गुरु शुभ और मजबूत स्थिति में हो तो व्यक्ति को जीवन में सही मार्गदर्शन, ज्ञान और अवसर प्राप्त होते हैं. वहीं गुरु के कमजोर होने पर निर्णय लेने में कठिनाई, शिक्षा या नौकरी में रुकावट और आर्थिक मामलों में परेशानी जैसी स्थितियां देखने को मिल सकती हैं.
गुरुवार को करें पीले रंग का उपाय
बृहस्पति देव को पीला रंग प्रिय माना जाता है. इसलिए गुरुवार के दिन पीले वस्त्र पहनना या पूजा में पीले रंग की वस्तुओं का इस्तेमाल करना शुभ माना जाता है. इस दिन भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा करते समय पीले फूल, पीले फल या पीली मिठाई अर्पित की जा सकती है. मान्यता है कि इससे गुरु ग्रह से जुड़े शुभ प्रभावों को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है.
केले के पेड़ की पूजा की मान्यता
गुरुवार के दिन केले के पेड़ की पूजा करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार केले के पौधे में भगवान विष्णु का वास माना जाता है. गुरुवार की सुबह स्नान के बाद केले के पेड़ की पूजा करें और वहां हल्दी, चने की दाल तथा गुड़ अर्पित करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक दीपक जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान किया जा सकता है.
चने की दाल और गुड़ का करें दान
गुरु ग्रह को प्रसन्न करने के लिए गुरुवार को जरूरतमंद व्यक्ति को पीली वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता है. इस दिन चने की दाल, गुड़, पीले वस्त्र या हल्दी का दान किया जा सकता है. अपनी सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है. मान्यता है कि इससे गुरु से संबंधित सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाने में मदद मिलती है.
गुरु मंत्र का जाप करें
गुरुवार के दिन बृहस्पति देव से जुड़े मंत्र का जाप करना भी एक सरल उपाय माना जाता है. पूजा के समय शांत मन से “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप किया जा सकता है. नियमित रूप से मंत्र जाप करने से मन को एकाग्र करने और आध्यात्मिक अनुशासन बनाए रखने में मदद मिल सकती है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इससे बृहस्पति देव की कृपा प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है.
गुरुजनों का सम्मान भी माना जाता है जरूरी
ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं में गुरु, शिक्षक और बड़े-बुजुर्गों का सम्मान बृहस्पति से जोड़ा जाता है. इसलिए गुरुवार के दिन अपने गुरु, शिक्षक या किसी योग्य बुजुर्ग का आशीर्वाद लेना शुभ माना जाता है. जरूरतमंद विद्यार्थियों की पढ़ाई में सहायता करना या किसी को ज्ञान और शिक्षा से जुड़ी सामग्री देना भी सकारात्मक कार्य माना जाता है.
पुखराज के बिना भी कर सकते हैं ये उपाय
पुखराज बृहस्पति का प्रमुख रत्न माना जाता है, लेकिन इसे धारण करने से पहले कुंडली के अनुसार विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित माना जाता है. यदि कोई व्यक्ति पुखराज नहीं पहनना चाहता या खरीदना संभव नहीं है, तो गुरुवार की पूजा, पीली वस्तुओं का दान, गुरुजनों का सम्मान और मंत्र जाप जैसे सरल धार्मिक उपाय किए जा सकते हैं. इन उपायों को आस्था और नियमितता के साथ करना अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है.
इस साल शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक रहेगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा. तो चलिए आपको बताते हैं शारदीय नवरात्रि की जरूरी डेट कौन-कौन सी है.
शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है. भक्त माता रानी की आराधना के साथ व्रत रखते हैं और घरों में कलश स्थापना कर विधि-विधान से पूजा करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा की श्रद्धा से पूजा करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद मिलता है और मनोकामनाएं पूरी होने की मान्यता है. साल 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक रहेगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा.
कब होगी घटस्थापना? शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026, रविवार से होगी. इसी दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना की जाएगी और मां शैलपुत्री की पूजा होगी. दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के पंचांग के अनुसार घटस्थापना का शुभ मुहूर्त सुबह 6:19 बजे से 10:12 बजे तक बताया गया है. वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा. शहर के अनुसार मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है.
नवरात्रि में कब होगी अष्टमी और नवमी? 2026 में नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि का संयोग खास रहेगा. 19 अक्टूबर को दुर्गा अष्टमी और महानवमी के पूजन किए जाएंगे. इस दिन मां महागौरी और मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. कई घरों में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन, हवन और विशेष पूजा भी की जाती है.
कब है दशहरा 2026? नवरात्रि के बाद 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा. इस दिन भगवान राम की रावण पर विजय की याद में रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है. कई जगह रामलीला और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं.
नवरात्रि 2026 की पूरी लिस्ट 11 अक्टूबर: घटस्थापना, मां शैलपुत्री पूजा 12 अक्टूबर: मां ब्रह्मचारिणी पूजा 13 अक्टूबर: मां चंद्रघंटा पूजा 14 अक्टूबर: मां कूष्मांडा पूजा 15 अक्टूबर: मां स्कंदमाता पूजा 16 अक्टूबर: मां कात्यायनी पूजा 17 अक्टूबर: मां कालरात्रि पूजा 18 अक्टूबर: मां महागौरी पूजा 19 अक्टूबर: दुर्गा अष्टमी और महानवमी, मां सिद्धिदात्री पूजा 20 अक्टूबर: विजयादशमी यानी दशहरा
ज्योतिष शास्त्र में राशियों के आधार पर व्यक्ति के स्वभाव, पसंद और रुचियों के बारे में कई तरह की मान्यताएं बताई जाती हैं। कुछ राशियों को यात्रा और रोमांच से जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि इन राशि के लोगों को नई जगहों पर जाना, अलग-अलग लोगों से मिलना और नए अनुभव हासिल करना पसंद होता है।
इसी वजह से ज्योतिषीय मान्यताओं में कुछ राशियों के जातकों को घुमक्कड़ स्वभाव वाला बताया जाता है। आइए जानते हैं उन 3 राशियों के बारे में।
1. मेष राशि
मेष राशि के स्वामी मंगल माने जाते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस राशि के लोग ऊर्जावान और उत्साही स्वभाव के होते हैं। इन्हें घूमना-फिरना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना पसंद हो सकता है।
मेष राशि के जातक समय मिलने पर अचानक यात्रा की योजना भी बना सकते हैं। खास बात यह मानी जाती है कि इन्हें घूमने के लिए हमेशा किसी साथी की जरूरत नहीं होती। ये अकेले यात्रा करने का आनंद भी ले सकते हैं।
2. मिथुन राशि
मिथुन राशि के स्वामी बुध माने जाते हैं। ज्योतिष में बुध को जिज्ञासा, सीखने और संवाद से जोड़कर देखा जाता है। इसी आधार पर माना जाता है कि मिथुन राशि के लोगों को नई जगहों और नए अनुभवों को जानने में रुचि हो सकती है।
प्रकृति के बीच समय बिताना, अलग-अलग स्थानों की सैर करना और नए लोगों से बातचीत करना इन्हें पसंद आ सकता है। इसी वजह से मिथुन राशि को भी यात्रा पसंद करने वाली राशियों में शामिल किया जाता है।
3. धनु राशि
धनु राशि को ज्योतिष में सबसे अधिक यात्रा और रोमांच से जुड़ी राशियों में गिना जाता है। इस राशि के लोगों को नई जगहों की यात्रा करने, अलग-अलग संस्कृतियों को जानने और नए लोगों से मिलने का शौक होने की मान्यता है।
धनु राशि के जातकों को लंबी यात्राएं और एडवेंचर पसंद आ सकते हैं। छुट्टियों के दौरान भी ये नए स्थानों की तलाश में निकलना पसंद कर सकते हैं। इनके लिए यात्रा सिर्फ घूमना नहीं, बल्कि नए अनुभव हासिल करने का जरिया भी मानी जाती है।
ज्योतिषीय मान्यताओं में यात्रा से जुड़ी ये राशियां
ज्योतिष के अनुसार मेष, मिथुन और धनु राशि के लोगों को यात्रा और नई जगहों की खोज से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, किसी व्यक्ति का वास्तविक स्वभाव केवल उसकी राशि से तय नहीं होता। व्यक्तिगत रुचियां, परिस्थितियां और जीवनशैली भी यात्रा करने की पसंद को प्रभावित करती हैं।
नोट: राशियों से जुड़े ये विवरण ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित व्यक्तित्व-विश्लेषण नहीं माना जाता।