Category: Dharam

  • दंग कर देने वाले हैं 1920 से 30 के बीच नीम करोली बाबा के भेष, जानें तलैया बाबा और जटाधारी रूप की कहानी..

    दंग कर देने वाले हैं 1920 से 30 के बीच नीम करोली बाबा के भेष, जानें तलैया बाबा और जटाधारी रूप की कहानी..

    Neem-Karoli-Baba

    Neem Karoli Baba Story: नीम करोली बाबा एक ऐसा नाम हैं, जिनके दर्शन मात्र का पुण्य लाभ लेने के लिए दुनिया के अमीर से अमीर और शक्तिशाली लोग दौड़े चले आते हैं. हर कोई उनके चमत्कारों और उनकी तपस्या की ऊर्जा के आगे नतमस्तक हो जाता है. लेकिन आपको पता नहीं होगा, उनका एक समय, एक दौर ऐसा था, जब उनके भौतिक रूप कई प्रकार के थे. उस समय उनके भेष और साधन के तरीके को देख कर लोग दंग रह जाते थे.

    नीम करोली बाबा के जीवन की 1920 से 1030 तक की अवधि लगभग अज्ञातमय रही है, क्योंकि कहा जाता है कि संभवतः यह उनके जीवन का सबसे कठिन और चमत्कारी दौर भी था. आइए जानते है, इस दौरान बाबा किस भेष में थे और ‘तलैया बाबा’ से ‘जटाधारी’ रूप में कैसे और क्यों आए? आपको बता दें कि बाबा के जीवन के इस काल को बहुत लोग ‘लापता काल’ कह देते हैं, जो गलत है. यह काल उनकी तपस्या का वो समय था, जब वे जनता के बीच कम और ईश्वर के करीब अधिक थे.

    बबानिया के ‘लक्ष्मणदास’ और ‘तलैया बाबा’

    कहते हैं, नीम करोली बाबा ने 1911-12 में अपना घर-बार छोड़ दिया था. वे गृहस्थ जीवन से बाहर निकल आए थे. उन्होंने भारत के भिन्न-भिन्न हिस्सों का भ्रमण किया. उनके जीवनी लिखने वाले लेखक और साधक राम दास जी की ‘मिरैकल ऑफ लव’ और प्रेम प्रकाश जी की ‘नीम करोली बाबा: ही इज विथ अस हियर एंड नाउ’ नामक पुस्तकों में वर्णन मिलता है कि 1920 के दशक के शुरुआती समय वे गुजरात के मोरबी के पास बबानिया गांव में रहते थे. यहां वे एक वैष्णव संत के रूप में थे. लोग उनको ‘लक्ष्मण दास’ कहते थे.

    इसी गांव में एक छोटा सा तालाब था, जिसे बबानिया के लोकल लैंग्वेज में ‘तलैया’ कहा जाता था. बाबा लक्ष्मण दास इस तालाब के किनारे घंटों तक ध्यान लगाए रहते थे. उनकी इस आदत और तालाब के प्रति लगाव को देख स्थानीय लोगों ने उन्हें ‘तलैया बाबा’ कहना शुरू कर दिया.

    गुफा में रहने वाले बाबा का ‘जटाधारी रूप’

    कहते सन 1925 के आसपास बाबा उत्तर प्रदेश के फर्रूखाबाद जिले के ‘नीब करौरी’ गांव पहुंचे. ट्रेन वाली महाचमत्कार की घटना यहीं घटी थी, जहां उन्हें ट्रेन से उतार दिया गया था और इसके बाद ट्रेन एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी थी. कहते हैं, ट्रेन की घटना के बाद सम्मानपूर्वक उन्हें नीब करौरी गांव लाया गया. यहां बाबा का पूरा भेष बदल गया.

    कहते हैं, यहां उन्होंने साधना के लिए जमीन के अंदर एक गुफा तैयार करवाई थी. दिन में में वे इसी गुफा में रहते थे और केवल कभी-कभी रात को बाहर आते थे. इस समय बाबा केवल एक लंगोट धारण करते थे. कहते हैं, उनके बाल भयंकर रूप से उलझ गए थे, जटाएं काफी लंबी हो गई थीं. उनका यह रूप एक दिव्य रूप था, लोग देखकर विस्मित और चकित हो जाते थे.

    1930 में बदला बाबा का भेष

    कहते हैं, 1930 के आसपास बाबा ने नीब करौरी गांव में हनुमान जी का एक भव्य मंदिर बनवाया था. इसके बाद उन्होंने अपनी गुप्त साधना त्याग कर दिया. अपनी लंबी जटाओं का मुंडन करवा दिया. वे लंगोट की जगह सूती धोती पहनने लगे. यही वह समय था, जब लोगों ने उन्हीं नीब करोरी बाबा या ‘नीम करोली बाबा’ कहना शुरू और जो आजतक कहा जा रहा है. आपको बता दें कि इसी कालखंड में लोग उन्हें ‘हांडी वाले बाबा’ और ‘तिकोनिया वाले बाबा’ भी कहते थे.

  •  मेटल या लकड़ी किस प्रकार की नेमप्लेट चमकाती है किस्मत, जानें क्या कहता है वास्तु शास्त्र..

     मेटल या लकड़ी किस प्रकार की नेमप्लेट चमकाती है किस्मत, जानें क्या कहता है वास्तु शास्त्र..

     मेटल या लकड़ी किस प्रकार की नेमप्लेट चमकाती है किस्मत, जानें क्या कहता है वास्तु शास्त्र..

    Nameplate Vastu Tips: हम-आप में से बहुत लोग घर के मेन गेट और दहलीज के पास की दीवाल पर ‘नेमप्लेट’ लगाते हैं, जो भांति-भांति के होते हैं. ये लकड़ी, पत्थर, धातु, कांच, प्लास्टिक आदि में बने भिन्न-भिन्न शेप और साइज के दिखते हैं. वास्तु शास्त्र के मुताबिक, घर की नेमप्लेट केवल इंसान की पहचान की जरिया नहीं है, बल्कि यह घर का भाग्य जगाने वाली एक चाबी या युक्ति भी है. कहते हैं, यह ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा और मां लक्ष्मी का ध्यान आपके घर की खींचती है. लेकिन इसमें दोष होने से यह घर की खुशियों में रुकावट भी बन सकती है. आइए जानते हैं, घर के नेमप्लेट से जुड़ा वास्तु नियम क्या है? मेटल, लकड़ी या पत्थर, कौन-सा नेमप्लेट भाग्य चमका सकती है.

    लकड़ी की नेमप्लेट

    वास्तु शास्त्र में लकड़ी की नेमप्लेट को स्थिरता और तरक्की का प्रतीक माना गया है. लकड़ी जो कि एक काष्ठ तत्व है, यह विकास, स्वास्थ्य और समृद्धि की वृद्धि का प्रतिनिधि है. नेमप्लेट के लिए हमेशा मजबूत और शुभ लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जैसे- सागवान, शीशम, महोगनी, आम। प्लाइबोर्ड, एमडीएफ मैटेरियल, प्लास्टिक आदि से बनी नकली लकड़ी की फील देने वाली नेमप्लेट लगाने से बचना चाहिए.

    मेटल की नेमप्लेट

    मेटल की नेमप्लेट को वास्तुशास्त्र में धन और नए अवसरों का द्वार कहा गया है. धातु की नेमप्लेट बनवाने के लिए पीतल, तांबा, स्टील, लोहे आदि का उपयोग किया जाता है. इनकी कलात्मक प्लेट काफी उपयोगी सिद्ध होती है.

    शुभ दिशा: वास्तु शास्त्र के अनुसार मेटल नेमप्लेट के लिए घर के मुख्यद्वार की उत्तर और पश्चिम दिशा सर्वोत्तम है। ये दिशा मेटल नेमप्लेट के लिय वरदान हैं. उत्तर दिशा कुबेर की है. इस दिशा में ब्रास यानी पीतल की नेम प्लेट पैसों की तंगी खत्म सकती है.

    पत्थर की नेमप्लेट

    वास्तु शास्त्र के अनुसार, पत्थर का संबंध पृथ्वी तत्व है, जो सुरक्षा और मजबूती का परम प्रतीक है. यह देखा गया है कि लोग संगमरमर, ग्रेनाइट और अन्य रंगीन पत्थरों के खूबसूरत नेमप्लेट बनवाते हैं, जो बेहद शुभ माने गए हैं। ये बुरी नजर की नकारात्मक ऊर्जा को सोख लेती है.

    शुभ दिशा: पत्थर के नेमप्लेट के लिए दक्षिण पश्चिम और उत्तर पश्चिम दिशा शुभ होते हैं. दक्षिण पश्चिम के स्वामी पृथ्वी तत्व है. यहां नेमप्लेट लगाने से घर के मुखिया का समाज और परिवार में दबदबा रहता है.

    डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी वास्तु शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है.

  • कोई भी इंसान पूरी तरह से परफेक्ट नहीं होता! कामयाबी पानी है तो तुरंत छोड़ दें ये आदतें, सफलता चूमेगी आपके कदम

    कोई भी इंसान पूरी तरह से परफेक्ट नहीं होता! कामयाबी पानी है तो तुरंत छोड़ दें ये आदतें, सफलता चूमेगी आपके कदम

    Success Tips: कोई भी इंसान पूरी तरह से परफेक्ट नहीं होता! कामयाबी पानी है तो तुरंत छोड़ दें ये आदतें, सफलता चूमेगी आपके कदम

    कई भी व्यक्ति सफल यूं ही नहीं हो जाता है. वह सफलता पानी के लिए कड़ी मेहनत करता है. चूंकि कोई भी व्यक्ति पूरी तरह परफेक्ट नहीं होता है, ऐसे सफल होने के लिए व्यक्ति को अपनी बुरी आदतों को त्याग करना पड़ता है. यदि आप भी जीवन में सफल होना चाह रहे हैं तो हम आपको बता रहे हैं कि आपको तुरंत अपनी किन-किन आदतों को छोड़ देनी चाहिए. आपको मालूम हो कि कई बार हम अपनी कुछ आदतों की वजह से लक्ष्य पाने से पीछे रह जाते हैं. आपको यह मालूम होना चाहिए कि सिर्फ मेहनत ही नहीं बल्कि मानसिक तौर पर मजबूत रहने से सफलता आपके कदम चूमेगी.

    1. सही प्लान बनाएं कई बार हम अपने मन में यह सोच तो लेते हैं कि जीवन में सफल होने के लिए क्या करना है लेकिन इसके लिए कोई ठोस रणनीति नहीं बनाते हैं. इसके चलते हम कड़ी मेहनत करने पर भी सफल नहीं हो पाते हैं. यदि जीवन में सफल होना है, लक्ष्य को पाना है तो एक बेहतरीन प्लान बनाकर काम करना होगा. ऐसे में किसी भी काम को करने से पहले उसके बारे में ए टू जे जानकारी एकत्र कर लेनी चाहिए. फिर एक समय सीमा तय कर पूरी ईमानदारी से अपने लक्ष्य को पाने के लिए जुट जाना चाहिए. ऐसा करने से सफलता जरूर कदम चूमेगी.

    2. कल पर न टालें कोई भी काम यदि आप जीवन में सफल होना चाहते हैं तो किसी भी काम को कल पर न टालें. आप कोशिश करें हर दिन छोटे-छोटे लक्ष्य बनाएं और उन्हें पूरा करके ही दम लें. आपको मालूम हो कि कल पर काम टालने के कारण काम का बोझ इतना बढ़ जाता है कि फिर वह कभी पूरा ही नहीं होता है. आपको काम को टालने की आदत हमें लक्ष्य से बहुत दूर ले जाती है. ऐसे में किसी भी काम को टालने की बजाय उसे तुरंत करने की आदत डालें. आपको मालूम हो कि जो लोग सही समय का इंतजार किए बिना अपना काम करते हैं, ऐसे लोग जल्द ही सफलता प्राप्त कर लेते हैं.

    3. समय-समय पर काम की समीक्षा करते रहें यदि आपने जीवन में कोई लक्ष्य बना लिया है तो उसको प्राप्त करने के लिए जी जान से तुरंत जुट जाइए. इसके साथ ही अपने काम की समय-समय पर समीक्षा करते रहना चाहिए. इससे आपको पता चलेगा कि आप लक्ष्य की प्राप्ति में सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं या नहीं. कई बार ऐसा होता है कि हम अपना लक्ष्य तो बना लेते हैं लेकिन लक्ष्य के प्रति हमारी कोई दिलचस्पी नहीं रहती है. अपने काम की समीक्षा करते रहने से यह पता चलता है कि कहीं हम अपने लक्ष्य से भटक तो नहीं रहे हैं.

    4. नकारात्मक नहीं सकारात्मक सोचें कई बार जब हमें किसी काम में मनचाहा परिणाम नहीं मिल पाता है तो हम चीजों को लेकर नकारात्मक हो जाते हैं. ये हमारी सोच का हिस्सा कब बन जाता है इसका हमें अंदाजा ही नहीं रहता है. ऐसे में हमेशा नकारात्मक नहीं सकारात्मक सोचें. सफलात अवश्य कदम चूमेगी.

    5. हर चीज में परफेक्ट बनने की चाहत छोड़ दें यह ध्यान रखना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति हर चीज में परफेक्ट नहीं होता है. हर चीज में परफेक्ट बनने की चाहत हमें लाभ के बजाय हानि पहुंचाती है. ऐसे में हमें किसी दूसरे से अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए. बस कोशिश यह रहनी चाहिए कि किस तरह से हम अपने आप को बेहतर बनाएं और अपने लक्ष्य को प्राप्त करें.

    6. असफल होने पर हार नहीं मानें यदि आप एक-दो बार असफल होने पर हार मान लेते हैं तो ये करना तुरंत छोड़ दें. आप अपने फेलियर को कभी भी अपने रास्ते की रुकावट नहीं बनने दें. अपनी गलतियों से सीख लें और सफल होने के लिए पूरी मेहनत से फिर जुट जाएं. सफलता आपके कदम जरूर चूमेगी.

  • गणेश जी ने बिना दौड़े जीत ली थी ब्रह्मांड की रेस, जानें क्या है जीवन का असली तीर्थ..

    गणेश जी ने बिना दौड़े जीत ली थी ब्रह्मांड की रेस, जानें क्या है जीवन का असली तीर्थ..

    GANESH-JI

    Ganesha Story: भगवान गणेश का जन्म भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था। वे हर मांगलिक कार्य और पूजा-पाठ में सभी देवताओं से सबसे पहले पूजे और आह्वान किए जाते हैं, क्योंकि वे देवों में ‘प्रथम पूज्य’ हैं। उनके अग्रपूज्य या प्रथम पूज्य बनने की कथा बहुत रोचक, शिक्षाप्रद और मोटिवेशनल है। इसके उन्हें सभी देवताओं के बीच ब्रह्मांड की रेस जीतनी पड़ी थी और उन्होंने बताया की जीवन का असली तीर्थ क्या है। आइए जानते हैं, यह पूरी कथा…

    देवों में प्रथम पूजा का विवाद

    एक बार देवलोक में इंद्र समेत सभी देवताओं में यह विवाद शुरू हो गया कि देवताओं में सबसे पहले पूजा किसकी होगी। अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा सहित सभी देवताओं ने अपने अपने महत्व का बखान किया कि क्यों उनकी पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। हर देवता स्वयं को श्रेष्ठ और प्रथम पूज्य होने का दावेदार बता रहे थे। बहुत विकट स्थिति थी।

    ब्रह्मांड के 3 चक्कर

    कहते जब विवाद का कोई हल नहीं निकला, तो वे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने ही ब्रह्मांड और संसार के नियम बनाए थे। उन्होंने देवताओं से कहा कि आप सभी देवता अपने वाहनों पर सवार होकर इस पूरे ब्रह्मांड का 3 चक्कर लगाएं। जो देव सबसे पहले यह काम पूरा कर लेंगे, उसे देवों में अग्रगण्य और प्रथम पूज्य का अधिकार प्राप्त होगा।

    शुरू हुई देव प्रतियोगिता

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्रथम पूज्य प्रतियोगिता की यह चुनौती प्राप्त होते ही सभी देवता आपने वाहनों और सवारियों पर ब्रह्मांड की दौड़ पर निकल पड़े। यह सृष्टि की पहली प्रतियोगिता थी। इंद्र अपने ऐरावत पर, वायुदेव अपने हिरण पर, कार्तिकेय अपने मोर और दूसरे देव अपनी-अपनी सवारियों पर भागे जा रहे थे।

    गणेश जी ने लगाई बुद्धि

    इधर गणेश जी के समक्ष भारी संकट उपस्थित हो गया। उनके पास मंदगामी छोटा मूषक वाहन था। दूसरे उनके शरीर का वजन अत्यधिक था। वे जानते थे, ब्रह्मांड की इस रेस में वे देवों पराजित नहीं कर पाएंगे। वे परमशास्त्र ज्ञानी थे। उन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और विवेक का सहारा लिया।

    माता-पिता की परिक्रमा

    गणेश जी ने निवेदन कर अपने माता-पिता यानी माता पार्वती और पिता महादेव गणेश को आदरपूर्वक एक आसन पर बैठाया और वे अपने वाहन मूषकराज पर बैठ गए। और इसके बाद उन्होंने श्रद्धापूर्वक 3 चक्कर लगाकर पार्वती जी और शिव जी को नमन किया।

    देवताओं ने की आपत्ति

    पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, जब सभी देवगण पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाकर वापस लौटे तो थके-हारे देवताओं को गणेश जी वहां पहले से उपस्थित मिले। ब्रह्मा जी हर बात जानते थे। उन्होंने गणेश को विजेता घोषित कर दिया। इसपर देवताओं ने काफी आपत्ति जताई, विशेषकर कार्तिकेय जी ने जिन्होंने ब्रह्मांड के 3 चक्कर सबसे पहले लगाए थे।

    ब्रह्मा जी का न्याय

    देवताओं पर आपत्ति पर ब्रह्मा जी ने शास्त्रों का प्रमाण देते हुए कहा कि जो संतान अपने माता-पिता सेवा, पूजा और परिक्रमा करते हैं, उसे पूरे ब्रह्मांड और पृथ्वी की परिक्रमा का फल स्वतः मिल जाता है। माता-पिता की सेवा और पूजा ही असली तीर्थ है। इस अभिभाषण और तर्क के आगे सभी देवताओं का सिर झुक गया। तभी से गणेश जी हिन्दू संस्कृति के देव समूह में ‘प्रथम पूज्य देव’ हैं।

  • वराह जयंती कब है? भगवान विष्णु ने क्यों लिया जंगली सूअर का अवतार? जानें महत्व और पूजा विधि

    वराह जयंती कब है? भगवान विष्णु ने क्यों लिया जंगली सूअर का अवतार? जानें महत्व और पूजा विधि

    वराह जयंती कब है? भगवान विष्णु ने क्यों लिया जंगली सूअर का अवतार? जानें महत्व और पूजा विधि

    Varah Jayanti 2026: हिन्दू धर्म में भगवान विष्णु ने पाप का नाश करने और धर्म की संस्थापना के लिए बहुत अनोखे-अनोखे काम किए और ऐसे-ऐसे अवतार लिए हैं, जिनके बारे में सोचकर हैरत होती है। जरा कल्पना कीजिए, पूरी सृष्टि जलमग्न हो जाती और पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में होता है। तब भगवान विष्णु एक बेहद आक्रामक और अनूठा रूप धारण करते हैं।

    भगवान विष्णु का वराह अवतार एक ऐसा ही अवतार है, जो रहस्यमय और आश्चर्यजनक है। वराह का अर्थ होता है- ‘जंगली सूअर’। इस अवतार में भगवान विष्णु की अदम्य शक्ति और इच्छा सामने उभर कर आती है, जिसमें आक्रामकता के साथ संरक्षण का भाव है। आइए जानते हैं, वर्ष 2026 में उनके इस अवतार की जयंती कब है और पूजा विधि और अनुष्ठान क्या हैं?

    वराह जयंती 2026 कब है?

    वराह जयंती हर साल भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस साल यह तिथि रविवार 13 सितंबर 2026 को पड़ रही है। पंचांग के अनुसार, तृतीया तिथि की शुरुआत 13 तारीख की सुबह में 7 बजकर 8 मिनट पर हो रही है और इस तिथि का समापन 14 सितंबर को 7 बजकर 8 मिनट पर हो रही है।

    पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त: द्रिक पंचांग के अनुसार, भगवान विष्णु के वराह रूप की पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त मध्याह्न यानी दोपहर में है, जो 1 बजकर 30 मिनट से अपराह्न के 4 बजे तक है।

    भगवान ने क्यों लिया वराह अवतार?

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष नामक असुर ने अपनी प्रचंड शक्ति से तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था और देवताओं को भी स्वर्ग से निकाल दिया था। केवल इतना ही नहीं, उसने पृथ्वी को भी चुरा लिया था और उसे समुद्र के गर्भ में छिपा दिया था। इससे पूरी धरती पर भी त्राहि-त्राहि मची हुई थी। सृष्टि का संतुलन बिगड़ गया था।

    तब देवताओं के आह्वान पर भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष के अंत के लिए वराह अवतार लिया था। कहते हैं, हिरण्याक्ष ने ब्रह्मा जी से वरदान मांगा था कि वह किसी ज्ञात जीवों और पशुओं से नहीं मारा जाएगा, लेकिन वह वराह यानी जंगली शूकर या सूअर का नाम लेना भूल गया था। इसी का लाभ लेकर विष्णु जी ने एक विशाल और भयंकर वराह का अवतार लिया और हिरण्याक्ष का अंत कर पृथ्वी की रक्षा की।

    वराह जयंती पूजा विधि

    • वराह जयंती के दिन यानी 13 सितंबर 2026 को सुबह जल्दी उठकर स्नान-आचमन कर व्रत का संकल्प लें.
    • पूजा के समय जल से भरे एक कलश पर भगवान वराह की मूर्ति या फोटो स्थापित करें.
    • फिर, पंचामृत से वराह रूप भगवान विष्णु का अभिषेक करें.
    • भगवान को पीले वस्त्र, पीले पुष्प, मिष्टान्न और नैवेद्य चढ़ाएं.
    • पूजा के दौरान,’ॐ वाराहाय नमः’ मंत्र का जाप करें.

    डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. 

  • भारत के इन मंदिरों में कंकड़-पत्थर अर्पित करने से पूरा होता अपना घर पाने का सपना..

    भारत के इन मंदिरों में कंकड़-पत्थर अर्पित करने से पूरा होता अपना घर पाने का सपना..

    भारत के इन मंदिरों में कंकड़-पत्थर अर्पित करने से पूरा होता अपना घर पाने का सपना..

    भारत में खुद का आशियाना बनाना हर व्यक्ति का एक सबसे बड़ा सपना होता है. देश में कुछ ऐसे अनोखे और पवित्र धार्मिक स्थल भी हैं, जहां ‘घर की मन्नत’ के लिए भारी भरकम दान या महंगे भोग की जरूरत नहीं पड़ती है? यहां सिर्फ कंकड़ पत्थर अर्पित करने से ही खुद के घर का सपना पूरा हो जाता है. आइए जानते हैं, इस देवस्थलों के बारे में विस्तार से

    Temples of India: आज की तेज-रफ्तार जिंदगी में भी परिवार और घर वह जगह है, जहां सुकून के दो पल मिल जाते हैं. भारतीय परिवेश में अपना घर होना हर व्यक्ति का सपना है. हर कोई चाहता है कि उसका खुद का अपना आशियाना हो, जहां वे सपरिवार रह सकें. इसके लोग अपनी जिंदगी भर की कमाई लगा देते हैं. लेकिन आप नहीं जानते होंगे कि भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत में कुछ स्थल ऐसे हैं, जहां ‘ईश्वर की इच्छा’ मायने रखती है. आइए यहां जानते हैं, देश के उन तीन मंदिरों के बारे में जहां जहां भारी-भरकम दान, प्रसाद या महंगे भोग नहीं, बल्कि स्वयं का घर बनाने का सपना कंकड़-पत्थर अर्पित करने से पूरा होता है. आइए जानते हैं, इन विशेष मंदिरों से जुड़ी प्रथाएं…

    बंगारु तिरुपति मंदिर

    यह मंदिर कर्नाटक के कोलार जिले में में एक पहाड़ी पर स्थित है. इसे ‘चिन्न तिरुपति’ भी कहते हैं, जिसका अर्थ है ‘छोटे तिरुपति’. भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित इस मंदिर में भक्त और श्रद्धालु मंदिर परिसर में छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर चुनकर एक निश्चित जगह पर सजाकर कर रखते हैं. कहते हैं, श्रद्धा और विश्वासपूर्वक की गई इस प्रक्रिया से अपना खुद का पक्का मकान पाने का सपना पूरा होता है.

    मां महामाया मंदिर

    मां महामाया मंदिर काफी एतिहासिक मंदिर है, जो छत्तीसगढ़ के बिलासपुर के रतनपुर में स्थित है. इसे एक शक्तिपीठ भी माना जाता है. यहां 3 देवियों के रूप वाली मा दुर्गा की पूजा होती है. यहां की प्रथा बेहद खास है. कहते हैं कि जो भक्त-श्रद्धालु यहां की जमीन पर बिखरे पत्थरों को इकट्ठा कर 3 से 5 पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर सटीकता से संतुलन बनाकर एक घर या छोटी मीनार बना लेते हैं. उनका अपना घर पाने का सपना पूरा हो जाता है.

    हिमाचल प्रदेश के देवस्थान

    हिमाचल प्रदेश की कुल्लू, शिमला, मंडी आदि जगहों पर स्थापित हिडिंबा देवी मंदिर, बिजली महादेव जैसे स्थानीय मंदिरों और देवस्थलों में एक प्रथा काफी लोकप्रिय है. वह है, पहाड़ों में मिलने वाले चपटे पत्थरों से एक छोटा-सा कमरा या दो-तीन मंजिला घर तैयार करना. कहते हैं आस्था और विश्वास से बनाई गई पत्थर की यह आकृति अपने घर के सपने को जल्द पूरा करती है.

    डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है. .

  • हथेली पर मौजूद ये 3 निशान दिला सकते हैं राजनीति में सफलता, बनते हैं बड़े राजनेता..

    हथेली पर मौजूद ये 3 निशान दिला सकते हैं राजनीति में सफलता, बनते हैं बड़े राजनेता..

    हथेली पर मौजूद ये 3 निशान दिला सकते हैं राजनीति में सफलता, बनते हैं बड़े राजनेता..

    Palmistry: हस्तरेखा शास्त्र में हथेली की रेखाओं और पर्वतों को व्यक्ति के स्वभाव, करियर और जीवन में मिलने वाली प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि हथेली पर कुछ खास निशान मौजूद हों तो व्यक्ति में नेतृत्व करने, लोगों को प्रभावित करने और ऊंचा पद हासिल करने की क्षमता हो सकती है। ऐसे ही कुछ संकेत राजनीति और लीडरशिप क्वालिटी से जोड़ा जाता है।

    हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार राजनीति में सफलता के लिए केवल एक रेखा को नहीं देखा जाता, बल्कि गुरु पर्वत, भाग्य रेखा, सूर्य रेखा और हथेली पर बने विशेष चिह्नों का मिलान किया जाता है। खासतौर पर गुरु पर्वत का मजबूत होना, भाग्य रेखा का स्पष्ट होना और सूर्य रेखा का अच्छी स्थिति में होना नेतृत्व और सार्वजनिक प्रतिष्ठा के संकेत माने जाते हैं। आइए जानते हैं ऐसे निशानों के बारे में जो व्यक्ति को राजनीति में सफलता दिलाते हैं। साथ ही ऐसे लोगों के अंदर लीडरशिप क्वालिटी होती है।

    गुरु पर्वत पर त्रिशूल का निशान

    हथेली में तर्जनी उंगली के नीचे स्थित स्थान को गुरु पर्वत कहा जाता है। हस्तरेखा शास्त्र में गुरु पर्वत को महत्वाकांक्षा, नेतृत्व, सम्मान और अधिकार से जोड़ा जाता है।

    अगर इस पर्वत पर स्पष्ट त्रिशूल का निशान दिखाई दे तो इसे काफी शुभ माना जाता है। हस्तरेखा शास्त्र में त्रिशूल को प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा और ऊंचा पद प्राप्त करने की क्षमता से जोड़ा गया है। ऐसे व्यक्ति में नेतृत्व करने और लोगों के बीच अपनी पहचान बनाने की प्रवृत्ति मानी जाती है।

    भाग्य रेखा से गुरु पर्वत की ओर जाती शाखा

    हथेली के निचले हिस्से से ऊपर की तरफ जाने वाली खड़ी रेखा को भाग्य रेखा कहा जाता है। अगर भाग्य रेखा स्पष्ट और मजबूत हो। साथ ही इससे कोई शाखा तर्जनी उंगली के नीचे स्थित गुरु पर्वत की ओर जाती दिखाई दे, तो हस्तरेखा शास्त्र में इसे अधिकार और नेतृत्व से जुड़ा संकेत माना जाता है।

    ऐसे योग को प्रशासनिक क्षमता, महत्वाकांक्षा और उच्च पद हासिल करने की इच्छा से जोड़ा जाता है। यदि इसके साथ गुरु पर्वत भी मजबूत हो तो राजनीति में उच्च पद की प्राप्ति होती है। ऐसे लोगों को मान- सम्मान की प्राप्ति होती है। साथ ही लोग ऐसे व्यक्ति को बात बहुत ध्यान से सुनते हैं और आदर, सत्कार करते हैं।

    स्पष्ट सूर्य रेखा और त्रिशूल का संयोग

    अनामिका उंगली के नीचे स्थित सूर्य पर्वत की ओर जाने वाली खड़ी रेखा को सूर्य रेखा या अपोलो लाइन कहा जाता है। हस्तरेखा शास्त्र में इसका संबंध नाम, यश, पहचान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा से माना जाता है।

    यदि सूर्य रेखा साफ, गहरी और बिना ज्यादा रुकावट के हो तथा इसके ऊपरी हिस्से में त्रिशूल जैसा निशान बनता हो, तो इसे विशेष रूप से शुभ माना जाता है। ऐसी हथेली को प्रसिद्धि और लोगों के बीच पहचान मिलने से जोड़ा जाता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख हस्तरेखा शास्त्र की पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। इसे वैज्ञानिक भविष्यवाणी या निश्चित परिणाम का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

  • भगवान विष्णु ने इसी पवित्र झील में किया था स्नान? वासुकी ताल से जुड़ी है अद्भुत मान्यता..

    भगवान विष्णु ने इसी पवित्र झील में किया था स्नान? वासुकी ताल से जुड़ी है अद्भुत मान्यता..

    भगवान विष्णु ने इसी पवित्र झील में किया था स्नान? वासुकी ताल से जुड़ी है अद्भुत मान्यता..

    उत्तराखंड की केदारनाथ घाटी में स्थित वासुकी ताल धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत संगम है। समुद्र तल से करीब 4,135 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र झील श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है।

    भगवान विष्णु से जुड़ी है मान्यता

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने श्रावण मास की पूर्णिमा के अवसर पर वासुकी ताल में स्नान किया था। इसी कारण इस झील को बेहद पवित्र माना जाता है।

    स्कंद पुराण से जुड़ी मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि यहां मणियों से सुशोभित वासुकी नाग के दर्शन हो सकते हैं। वासुकी नाग का उल्लेख समुद्र मंथन की कथा में भी मिलता है, जहां उन्हें मंथन के लिए रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया था।

    ब्रह्म कमल से बढ़ती है खूबसूरती

    वासुकी ताल के आसपास हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले कई दुर्लभ फूल और वनस्पतियां देखने को मिलती हैं। इनमें ब्रह्म कमल का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता में इसे पवित्र फूल माना जाता है और भगवान शिव को अर्पित किया जाता है।

    प्रकृति का अद्भुत नजारा

    बर्फ से ढकी ऊंची पर्वत चोटियां, शांत वातावरण और झील का मनमोहक दृश्य वासुकी ताल को बेहद खास बनाते हैं। यहां की प्राकृतिक सुंदरता हर यात्री को अपनी ओर आकर्षित करती है।

    वासुकी ताल केदारनाथ धाम से करीब 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां पहुंचने का मार्ग कठिन और चुनौतीपूर्ण है, इसलिए यात्रा से पहले मौसम, रास्ते और स्थानीय प्रशासन की जानकारी जरूर लेनी चाहिए।

    धार्मिक मान्यताओं और हिमालय की अनुपम सुंदरता के कारण वासुकी ताल उत्तराखंड के सबसे खास और रहस्यमयी स्थलों में गिना जाता है।

    डिस्क्लेमर: इस पोस्ट में दी गई जानकारी धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। अलग-अलग ग्रंथों और स्थानीय परंपराओं में इन कथाओं का विवरण अलग हो सकता है।

  • Pitru Paksha 2026 Date: सितंबर में कब से शुरू होगा पितृ पक्ष, जानिए पूर्णिमा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक की तिथियां और धार्मिक महत्व

    Pitru Paksha 2026 Date: सितंबर में कब से शुरू होगा पितृ पक्ष, जानिए पूर्णिमा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक की तिथियां और धार्मिक महत्व

    Pitru Paksha 2026 Date: सितंबर में कब से शुरू होगा पितृ पक्ष, जानिए पूर्णिमा से लेकर सर्वपितृ अमावस्या तक की तिथियां और धार्मिक महत्व

    Pitru Paksh 2026: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष का विशेष महत्व है। पितृ पक्ष 15 दिनों का होता है और यह समय पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके निमित्त तर्पण, पिंडदान व श्राद्ध कर्म करने का विशेष समय माना जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में पितरों का स्मरण और विधि-विधान से किए गए कर्मों से उन्हें संतुष्टि प्राप्त होती है। हर साल भाद्रपद माह में पूर्णिमा तिथि से श्राद्ध प्रारंभ होते हैं और आश्विन माह की अमावस्या तिथि तक चलते हैं। साल 2026 में पितृपक्ष सितंबर के माह में शुरू होंगे और अक्टूबर तक चलेंगे। आइए जानते हैं श्राद्ध पक्ष की सभी तिथियां और धार्मिक महत्व…

    पितृ पक्ष का धार्मिक महत्व

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में अपने दिवंगत पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पितरों की आत्मा को शांति और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दौरान परिवार की परंपरा के अनुसार पितरों की तिथि पर श्राद्ध कर्म किया जाता है। गरुड़ पुराण और अन्य हिंदू धार्मिक परंपराओं में भी पितरों के प्रति श्रद्धा और तर्पण के महत्व का वर्णन मिलता है।

    माना जाता है कि पितरों का सम्मान करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और मंगल की कामना की जाती है। वहीं पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की प्राण त्यागने की तिथि पर ब्राह्मणों को भोजन करने का विधान है। साथ ही उसके बाद दक्षिणा और वस्त्र देने का विधान है।

    डिसक्लेमर- इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

  • श्रीकृष्ण जन्म की वो दिव्य रात, जब प्रकृति भी हो गई थी मंगलमय, जानें क्या हुआ था उस पावन क्षण.

    श्रीकृष्ण जन्म की वो दिव्य रात, जब प्रकृति भी हो गई थी मंगलमय, जानें क्या हुआ था उस पावन क्षण.

    श्रीकृष्ण जन्म की वो दिव्य रात, जब प्रकृति भी हो गई थी मंगलमय, जानें क्या हुआ था उस पावन क्षण.

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में आधी रात के समय भगवान श्रीकृष्ण का मथुरा की कारागार में प्राकट्य हुआ था।

    श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का बेहद सुंदर और दिव्य वर्णन मिलता है। यह प्रसंग केवल भगवान के जन्म की कथा नहीं है, बल्कि उस समय की परिस्थितियों और प्रकृति में आए शुभ बदलावों का भी वर्णन करता है।

    अधर्म बढ़ा तो भगवान ने लिया अवतार

    धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कंस के अत्याचार से धरती पर अधर्म बढ़ता जा रहा था। पृथ्वी अत्याचारों से व्याकुल होकर गौ का रूप धारण कर देवताओं के साथ ब्रह्मा जी के पास पहुंची।

    देवताओं ने भगवान से पृथ्वी का भार कम करने और अधर्म का अंत करने की प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेने का संकल्प किया।

    श्रीकृष्ण के जन्म से पहले बदल गया था प्रकृति का रूप

    श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण के प्राकट्य से पहले के वातावरण का बहुत मनोहारी वर्णन मिलता है। ऐसा बताया गया है कि उस समय चारों ओर शुभ और शांत वातावरण बनने लगा था।

    आकाश स्वच्छ हो गया था और नक्षत्र तथा ग्रह शांत दिखाई दे रहे थे। दिशाएं निर्मल और प्रसन्न थीं। नदियों का जल साफ हो गया था। रात के समय भी सरोवरों में कमल खिलने लगे थे।

    वन और उपवन रंग-बिरंगे फूलों से सज गए थे। पक्षियों की मधुर आवाज और भौरों की गुनगुनाहट वातावरण को आनंदमय बना रही थी। ठंडी और सुगंधित हवा चल रही थी, जिससे चारों ओर सुखद माहौल बन गया था।

    कंस के अत्याचार के कारण जिन स्थानों पर धार्मिक अनुष्ठानों की अग्नि बुझ गई थी, वहां अग्निहोत्र की अग्नियां फिर से प्रज्वलित होने लगीं। संतों और साधुजनों के मन में भी प्रसन्नता छा गई।

    देवताओं ने भी मनाया भगवान का आगमन

    जब भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का समय आया, तब स्वर्ग में देवताओं की दुंदुभियां बजने लगीं। किन्नर और गंधर्व मधुर गीत गाने लगे। सिद्ध और चारण भगवान की स्तुति करने लगे।

    देवताओं और ऋषि-मुनियों ने प्रसन्न होकर पुष्पों की वर्षा की। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे पूरी सृष्टि भगवान के धरती पर आगमन का स्वागत कर रही हो।

    आधी रात को हुआ भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य

    भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी की आधी रात को मथुरा की कारागार में भगवान श्रीकृष्ण देवकी के गर्भ से प्रकट हुए। धार्मिक ग्रंथों में उनके जन्म के समय के दिव्य स्वरूप का विशेष वर्णन मिलता है।

    मान्यता के अनुसार, भगवान ने देवकी और वसुदेव के सामने दिव्य चतुर्भुज रूप धारण किया था। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। उनके शरीर पर पीतांबर और वक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिह्न था।

    भगवान के इस दिव्य स्वरूप को देखकर देवकी और वसुदेव समझ गए कि उनके सामने स्वयं भगवान विष्णु प्रकट हुए हैं।

    देवकी और वसुदेव ने की भगवान की स्तुति

    भगवान का दिव्य स्वरूप देखकर देवकी और वसुदेव ने उनकी स्तुति की। देवकी ने भगवान से प्रार्थना की कि वे अपना दिव्य स्वरूप बदलकर सामान्य शिशु का रूप धारण कर लें, क्योंकि उन्हें कंस से अपने पुत्र की सुरक्षा की चिंता थी।

    भगवान ने उन्हें आश्वासन दिया और बाल रूप धारण किया। इसके बाद श्रीकृष्ण के जीवन की वह अद्भुत कथा शुरू हुई, जिसने आगे चलकर अत्याचार और अधर्म के अंत का मार्ग प्रशस्त किया।

    श्रीकृष्ण जन्म का यह प्रसंग भारतीय धार्मिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर भक्त भगवान श्रीकृष्ण के इसी दिव्य प्राकट्य और उनकी बाल लीलाओं का स्मरण करते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं तथा श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग पर आधारित है। अलग-अलग ग्रंथों और परंपराओं में कथा के विवरण में कुछ भिन्नताएं मिल सकती हैं।