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  • UN में स्थायी सीट मिल: जाए तो क्या बदल जाएगा? जानिए भारत की वैश्विक भूमिका पर कितना पड़ेगा असर.

    UN में स्थायी सीट मिल: जाए तो क्या बदल जाएगा? जानिए भारत की वैश्विक भूमिका पर कितना पड़ेगा असर.

    UN में स्थायी सीट मिल: जाए तो क्या बदल जाएगा? जानिए भारत की वैश्विक भूमिका पर कितना पड़ेगा असर.

    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में स्थायी सदस्यता भारत की लंबे समय से चली आ रही प्रमुख कूटनीतिक मांगों में शामिल है। सितंबर 2026 में रूस ने एक बार फिर भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का समर्थन किया है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के बेहतर प्रतिनिधित्व की जरूरत पर जोर दिया।

    फिलहाल सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन पांच स्थायी सदस्य हैं, जबकि 10 सदस्य दो साल के कार्यकाल के लिए चुने जाते हैं।

    ऐसे में सवाल उठता है कि अगर भविष्य में सुरक्षा परिषद का विस्तार होता है और भारत को स्थायी सीट मिलती है, तो इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका में क्या बदलाव आ सकता है?

    सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?

    स्थायी सदस्य बनने से भारत को सुरक्षा परिषद में लगातार मौजूद रहने का अधिकार मिलेगा। अभी भारत जब भी गैर-स्थायी सदस्य के रूप में चुना जाता है, तो उसका कार्यकाल दो साल का होता है। स्थायी सदस्यता की स्थिति में बार-बार चुनाव लड़कर परिषद में लौटने की जरूरत नहीं होगी।

    सुरक्षा परिषद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों पर विचार करती है। इसलिए स्थायी सदस्य के तौर पर भारत को इन चर्चाओं और निर्णय प्रक्रियाओं में लगातार भाग लेने का अवसर मिलेगा।

    क्या भारत को वीटो पावर भी मिलेगी?

    यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सुरक्षा परिषद के सुधार का अंतिम मॉडल क्या तय करता है।

    मौजूदा व्यवस्था में पांच स्थायी सदस्यों के पास वीटो का अधिकार है। किसी गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्ताव को पारित करने के लिए कम से कम नौ वोटों के साथ स्थायी सदस्यों की सहमति जरूरी होती है। अगर पांच स्थायी सदस्यों में से कोई एक नकारात्मक वोट देता है, तो प्रस्ताव रुक सकता है।

    भारत की वर्तमान स्थिति यह है कि अगर उसे नया स्थायी सदस्य बनाया जाता है तो नए स्थायी सदस्यों को मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान अधिकार और जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए। भारत ने सुरक्षा परिषद सुधार की वार्ताओं में नए स्थायी सदस्यों के लिए वीटो के मुद्दे पर यही रुख रखा है।

    हालांकि यह अभी तय व्यवस्था नहीं है। संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद के सुधार को लेकर अलग-अलग देशों और समूहों के बीच मतभेद हैं। कुछ देश नए स्थायी सदस्यों को वीटो देने के पक्ष में हैं, जबकि कुछ प्रस्ताव स्थायी सदस्यता के विस्तार का ही विरोध करते हैं।

    वैश्विक फैसलों में भारत की लगातार मौजूदगी

    स्थायी सदस्यता से भारत को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लंबे समय तक लगातार अपनी स्थिति रखने का अवसर मिलेगा।

    युद्ध, संघर्ष, शांति स्थापना और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में सुरक्षा परिषद की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ऐसे मामलों पर चर्चा के दौरान भारत की मौजूदगी किसी दो साल के कार्यकाल तक सीमित नहीं रहेगी।

    इससे भारत को बहुपक्षीय कूटनीति में अपनी प्राथमिकताओं को लगातार सामने रखने का अधिक संस्थागत अवसर मिल सकता है।

    ग्लोबल साउथ के मुद्दों को उठाने का मंच

    भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों और कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाने की बात करता रहा है।

    सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलने की स्थिति में भारत एशिया और व्यापक ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को परिषद की स्थायी सदस्यता के जरिए उठाने की कोशिश कर सकता है।

    हालांकि इसे केवल भारत के प्रतिनिधित्व के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। सुरक्षा परिषद सुधार में अफ्रीका, एशिया-प्रशांत और लैटिन अमेरिका समेत विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग प्रस्ताव मौजूद हैं। G4 यानी भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील भी सुरक्षा परिषद के विस्तार की वकालत करते हैं।

    भारत की कूटनीतिक स्थिति पर क्या असर पड़ सकता है?

    स्थायी सदस्यता भारत को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण बहुपक्षीय सुरक्षा संस्थाओं में से एक में स्थायी स्थान देगी।

    इससे भारत को दूसरे देशों के साथ बातचीत, गठबंधन निर्माण और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी स्थिति रखने के लिए एक स्थायी संस्थागत मंच मिलेगा।

    हालांकि इसका यह मतलब नहीं होगा कि सुरक्षा परिषद का हर फैसला भारत के पक्ष में होगा या भारत अकेले किसी अंतरराष्ट्रीय निर्णय को नियंत्रित कर सकेगा। सुरक्षा परिषद की व्यवस्था सामूहिक मतदान और दूसरे स्थायी तथा निर्वाचित सदस्यों के रुख पर भी निर्भर करती है।

    क्या इससे NSG की सदस्यता पक्की हो जाएगी?

    स्थायी UNSC सदस्यता और न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप यानी NSG की सदस्यता दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट मिलने से भारत की NSG सदस्यता अपने आप सुनिश्चित नहीं होगी।

    हां, स्थायी सदस्यता से भारत की बहुपक्षीय कूटनीतिक स्थिति मजबूत हो सकती है और इससे अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बातचीत के लिए उसका संस्थागत प्रभाव बढ़ सकता है। लेकिन NSG में सदस्यता का फैसला अपने अलग नियमों और सदस्य देशों की सहमति से जुड़ा है।

    स्थायी सीट के साथ बढ़ेंगी जिम्मेदारियां भी

    सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता सिर्फ अधिक अधिकारों का मामला नहीं होगी। इसके साथ अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े जटिल मामलों पर लगातार जिम्मेदारी भी आएगी।

    संघर्षों, प्रतिबंधों, शांति अभियानों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रस्तावों पर भारत को लगातार अपना रुख तय करना होगा। वीटो का अधिकार मिलने की स्थिति में यह जिम्मेदारी और महत्वपूर्ण हो सकती है।

    अभी कहां खड़ा है मामला?

    भारत की स्थायी सदस्यता को लेकर रूस सहित कई देशों ने समर्थन व्यक्त किया है, लेकिन सुरक्षा परिषद की संरचना बदलना एक जटिल अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया है। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति और चार्टर में आवश्यक बदलावों की प्रक्रिया से गुजरना होगा।

    इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत को कब स्थायी सीट मिलेगी या नए स्थायी सदस्यों को वीटो का अधिकार किस रूप में दिया जाएगा। फिलहाल सुरक्षा परिषद सुधार पर संयुक्त राष्ट्र में बातचीत जारी है।

    अगर भारत को भविष्य में स्थायी सदस्यता मिलती है, तो सबसे बड़ा संस्थागत बदलाव यह होगा कि वह सुरक्षा परिषद की निर्णय प्रक्रिया में स्थायी रूप से शामिल होगा। वीटो सहित उसके अधिकारों की अंतिम स्थिति सुरक्षा परिषद सुधार के जिस मॉडल पर सदस्य देश सहमत होंगे, उसी पर निर्भर करेगी।

  • चांद पर हथौड़ा और ‘पंख’ एक साथ गिराए जाएं तो कौन पहले पहुंचेगा? जवाब जानकर चौंक जाएंगे.

    चांद पर हथौड़ा और ‘पंख’ एक साथ गिराए जाएं तो कौन पहले पहुंचेगा? जवाब जानकर चौंक जाएंगे.

    चांद पर हथौड़ा और ‘पंख’ एक साथ गिराए जाएं तो कौन पहले पहुंचेगा? जवाब जानकर चौंक जाएंगे.

    अगर किसी भारी हथौड़े और बेहद हल्के पंख को एक ही ऊंचाई से एक साथ नीचे गिराया जाए तो जाहिर तौर पर ज्यादातर लोग यही सोचेंगे कि हथौड़ा पहले जमीन पर पहुंचेगा। आखिर उसका वजन पंख से कई गुना ज्यादा होता है।

    लेकिन अगर यही प्रयोग चांद पर किया जाए तो नतीजा बिल्कुल अलग नहीं, बल्कि हमारी आम धारणा के उलट दिखाई देगा। वहां हथौड़ा और पंख लगभग एक ही समय पर चांद की सतह से टकराएंगे।

    इसके पीछे कोई रहस्य नहीं, बल्कि भौतिक विज्ञान का बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत है।

    चांद पर दोनों एक साथ क्यों गिरते हैं?

    इसका सबसे बड़ा कारण चांद का लगभग निर्वात जैसा वातावरण है। चांद पर पृथ्वी की तरह घना वायुमंडल नहीं है। इसलिए वहां गिरती हुई वस्तुओं को हवा के प्रतिरोध का सामना लगभग नहीं करना पड़ता।

    पृथ्वी पर जब पंख और हथौड़े को एक साथ गिराया जाता है तो हवा पंख को ज्यादा धीमा करती है। पंख का सतह क्षेत्र उसके वजन की तुलना में काफी ज्यादा होता है, इसलिए हवा का प्रतिरोध उस पर अधिक प्रभाव डालता है।

    हथौड़ा ठोस और अपेक्षाकृत सघन होने के कारण हवा से कम प्रभावित होता है। इसलिए पृथ्वी पर हथौड़ा पंख से पहले नीचे पहुंच जाता है।

    लेकिन चांद पर हवा का यह प्रतिरोध लगभग मौजूद ही नहीं है। ऐसे में दोनों वस्तुओं पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव समान त्वरण के रूप में दिखाई देता है।

    क्या भारी चीज हमेशा तेजी से गिरती है?

    नहीं। यदि हवा का प्रतिरोध मौजूद न हो तो किसी वस्तु का द्रव्यमान उसके गुरुत्वीय त्वरण को निर्धारित नहीं करता।

    यानी निर्वात में एक भारी हथौड़ा और हल्का पंख, अगर उन्हें एक ही ऊंचाई से एक साथ छोड़ा जाए, तो दोनों एक ही गुरुत्वीय त्वरण से नीचे आएंगे।

    यह बात पृथ्वी पर रोजमर्रा के अनुभव से थोड़ी अलग लगती है, क्योंकि हम सामान्य तौर पर हवा की मौजूदगी में वस्तुओं को गिरते हुए देखते हैं।

    चांद की ग्रेविटी पृथ्वी से कमजोर है

    चांद पर वस्तुएं पृथ्वी की तुलना में धीमी गति से गिरती हैं। इसका कारण यह है कि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की तुलना में काफी कमजोर है।

    चांद की सतह पर गुरुत्वीय त्वरण करीब 1.62 मीटर प्रति सेकंड² है, जबकि पृथ्वी पर यह करीब 9.81 मीटर प्रति सेकंड² होता है।

    इसका मतलब यह नहीं है कि भारी चीज हल्की चीज से धीरे गिरेगी। दोनों पर चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण का त्वरण लगभग समान रहेगा।

    गैलीलियो ने सदियों पहले क्या बताया था?

    गिरती हुई वस्तुओं को लेकर वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली ने सदियों पहले महत्वपूर्ण विचार दिया था। उनका तर्क था कि अगर हवा के प्रतिरोध को हटा दिया जाए तो अलग-अलग द्रव्यमान वाली वस्तुएं एक ही दर से गिर सकती हैं।

    इस विचार ने उस समय की प्रचलित धारणा को चुनौती दी थी कि भारी वस्तु हमेशा हल्की वस्तु से तेजी से गिरेगी।

    बाद में प्रयोगों और आधुनिक भौतिकी ने निर्वात में इस सिद्धांत को मजबूती से स्थापित किया।

    अपोलो 15 ने चांद पर करके दिखाया था प्रयोग

  • फांसी के बाद कितनी; देर में होती है मौत, जानिए शरीर पर क्या होता है असर.

    फांसी के बाद कितनी; देर में होती है मौत, जानिए शरीर पर क्या होता है असर.

    फांसी के बाद कितनी; देर में होती है मौत, जानिए शरीर पर क्या होता है असर.

    भारत में मृत्युदंड बेहद गंभीर कानूनी सजा है, जिसे कानून के तहत केवल दुर्लभतम मामलों में लागू किया जाता है। किसी दोषी को फांसी दिए जाने से पहले अदालत से आदेश, जेल प्रशासन की तैयारियां और चिकित्सकीय जांच समेत कई निर्धारित प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं।

    फांसी की प्रक्रिया को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि फंदे पर लटकाए जाने के बाद आखिर कितनी देर में व्यक्ति की मौत होती है और उस दौरान शरीर में क्या बदलाव आते हैं। इसका जवाब उतना सीधा नहीं है, क्योंकि बेहोशी और मृत्यु का समय इस्तेमाल की गई विधि और शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।

    फांसी का आदेश कैसे जारी होता है?

    मृत्युदंड की सजा के बाद उसे लागू करने के लिए अदालत की ओर से निर्धारित कानूनी आदेश जारी किया जाता है। भारत में जेल नियमों के तहत फांसी की तारीख तय होने के बाद कैदी को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तैयारी और कानूनी उपायों के लिए समय दिया जाता है।

    इस दौरान कैदी को परिवार से मिलने, अंतिम इच्छा या वसीयत से जुड़ी औपचारिकताएं पूरी करने और धार्मिक या अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि इन व्यवस्थाओं के सटीक नियम संबंधित जेल और लागू कानूनों के अनुसार अलग हो सकते हैं।

    फांसी से पहले जेल में होती हैं तैयारियां

    फांसी की तारीख नजदीक आने पर जेल प्रशासन फांसीघर और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं की जांच करता है। रस्सी और दूसरे उपकरणों की सुरक्षा संबंधी जांच की जाती है और निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक तैयारियों को पूरा किया जाता है।

    फांसी देने की प्रक्रिया में जेल अधिकारी, मेडिकल अधिकारी और अन्य अधिकृत कर्मचारी मौजूद रहते हैं। सुरक्षा और पहचान से जुड़ी औपचारिकताओं का भी पालन किया जाता है।

    फांसी वाले दिन क्या होता है?

    निर्धारित समय से पहले कैदी की पहचान की पुष्टि की जाती है और उसे अदालत के आदेश से जुड़ी जानकारी दी जाती है। इसके बाद जेल नियमों के अनुसार उसे फांसीघर तक ले जाया जाता है।

    वहां अधिकृत अधिकारी और मेडिकल स्टाफ मौजूद रहते हैं। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जल्लाद फंदा तैयार करता है और जेल प्रशासन के अधिकृत अधिकारी के संकेत के बाद फांसी की प्रक्रिया पूरी की जाती है।

    फंदे पर लटकने के बाद शरीर में क्या होता है?

    फांसी के दौरान शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव केवल गर्दन की चोट तक सीमित नहीं होता। इस्तेमाल की गई विधि के आधार पर गर्दन, रक्त प्रवाह और सांस लेने की प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ सकता है।

    लंबे ड्रॉप वाली फांसी में अचानक पड़ने वाला झटका गर्दन की गंभीर चोट और रीढ़ की हड्डी तथा आसपास की संरचनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। दूसरी परिस्थितियों में गर्दन पर दबाव के कारण मस्तिष्क तक ऑक्सीजन और रक्त की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

    इसी कारण व्यक्ति बेहोश हो सकता है। लेकिन यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है कि हर मामले में बिल्कुल कुछ सेकंड में मौत हो जाती है या सभी लोगों में एक निश्चित समय के भीतर दिल और मस्तिष्क पूरी तरह काम करना बंद कर देते हैं। वास्तविक समय परिस्थितियों के अनुसार अलग हो सकता है।

    क्या फांसी के तुरंत बाद मृत्यु की पुष्टि हो जाती है?

    फांसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है। जेल प्रशासन केवल यह देखकर मृत्यु की पुष्टि नहीं करता कि व्यक्ति प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है।

    अधिकृत मेडिकल अधिकारी शरीर की जांच करते हैं और मृत्यु की पुष्टि करते हैं। इसके बाद निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत शव को नीचे उतारा जाता है और आगे की औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं।

    30 मिनट तक शव को लटकाए रखने की बात कितनी सही है?

    कई भारतीय जेल नियमों और पुराने विवरणों में फांसी के बाद कुछ समय तक शव को फंदे पर रहने देने का उल्लेख मिलता है। लेकिन 30 मिनट का समय हर परिस्थिति में सार्वभौमिक चिकित्सकीय नियम है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। मृत्यु की अंतिम पुष्टि अधिकृत चिकित्सकीय अधिकारी की जांच के आधार पर होती है और संबंधित जेल नियमों का पालन किया जाता है।

    इसके बाद पोस्टमॉर्टम तथा शव सौंपने से जुड़ी कानूनी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं।

    आखिर कितनी देर में चली जाती है जान?

    फांसी के बाद बेहोशी और मृत्यु के बीच का समय एक निश्चित संख्या में बताना मुश्किल है। यह फांसी की तकनीक, गर्दन पर पड़े प्रभाव, रक्त प्रवाह और सांस रुकने की स्थिति समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।

    इसलिए “फांसी लगते ही कुछ सेकंड में मौत” या “हर व्यक्ति की मौत 3 से 10 मिनट में होती है” जैसे दावों को सार्वभौमिक वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। वास्तविक मृत्यु की पुष्टि चिकित्सकीय जांच के बाद ही की जाती है।

    भारत में मृत्युदंड की पूरी प्रक्रिया कानूनी और प्रशासनिक नियमों के तहत संचालित होती है और इसके हर चरण में संबंधित अधिकारियों की निर्धारित भूमिका होती है।

  • दुनिया का सबसे ‘ठंडा’ गांव, जहां -50°C में भी चलती है जिंदगी, गाड़ियां बंद करना भी पड़ता है भारी.

    दुनिया का सबसे ‘ठंडा’ गांव, जहां -50°C में भी चलती है जिंदगी, गाड़ियां बंद करना भी पड़ता है भारी.

    दुनिया का सबसे ‘ठंडा’ गांव, जहां -50°C में भी चलती है जिंदगी, गाड़ियां बंद करना भी पड़ता है भारी.

    दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं जहां सर्दियों में तापमान बेहद नीचे चला जाता है, लेकिन रूस के साइबेरिया में स्थित ओइम्याकॉन अपनी जमा देने वाली ठंड के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इसे अक्सर धरती पर इंसानों की स्थायी आबादी वाली सबसे ठंडी जगहों में शामिल किया जाता है। यहां सर्दियों के दौरान तापमान करीब -50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाना असामान्य नहीं है।

    हैरानी की बात यह है कि इतनी मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद यहां करीब 500 लोग रहते हैं। यहां रहने वाले लोगों ने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को मौसम के हिसाब से ढाल लिया है। खाना पकाने से लेकर घर गर्म रखने, पानी की व्यवस्था और आने-जाने तक, यहां जीवन का लगभग हर हिस्सा तापमान को ध्यान में रखकर चलता है।

    कितनी खतरनाक होती है यहां की ठंड?

    ओइम्याकॉन की सर्दियां बेहद कठोर होती हैं। इस इलाके में ऐतिहासिक रूप से -67.7 डिग्री सेल्सियस के आसपास का तापमान दर्ज किया गया है, जबकि अक्सर इंटरनेट पर -71.2°C का आंकड़ा भी बताया जाता है, हालांकि उस रिकॉर्ड की माप और आधिकारिक स्थिति को लेकर स्रोतों में अंतर मिलता है।

    इतनी ठंड में शरीर के खुले हिस्से पर कुछ ही समय में फ्रॉस्टबाइट का खतरा पैदा हो सकता है। सांस से निकलने वाली नमी भी चेहरे, पलकों और बालों पर बर्फ की परत जमा सकती है। इसलिए यहां बाहर निकलते समय बेहद गर्म और शरीर को पूरी तरह ढकने वाले कपड़े जरूरी होते हैं।

    खेती मुश्किल, इसलिए अलग है लोगों का खाना

    इतनी ठंडे वातावरण में खेती करना बेहद कठिन है। जमीन लंबे समय तक जमी रहने और बेहद कम तापमान के कारण स्थानीय लोगों के लिए पारंपरिक कृषि पर निर्भर रहना आसान नहीं है।

    ऐसे में यहां के पारंपरिक भोजन में पशु उत्पादों की बड़ी भूमिका रही है। घोड़े और रेनडियर का मांस, मछली तथा डेयरी उत्पाद स्थानीय खानपान का हिस्सा हैं। ठंडे मौसम में शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देने के लिए ज्यादा कैलोरी वाला भोजन महत्वपूर्ण माना जाता है।

    जमी हुई मछली को खास पारंपरिक तरीकों से खाने की परंपरा भी इस क्षेत्र में देखी जाती है। यहां का खानपान स्थानीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों के साथ लंबे समय में विकसित हुआ है।

    गाड़ियां बंद करना क्यों पड़ सकता है मुश्किल?

    ओइम्याकॉन में बेहद कम तापमान का असर सिर्फ इंसानों पर नहीं, बल्कि मशीनों पर भी पड़ता है। जब तापमान बहुत नीचे चला जाता है तो इंजन ऑयल और दूसरे तरल पदार्थ गाढ़े या जम सकते हैं। इंजन और अन्य मैकेनिकल हिस्सों के लिए भी दोबारा स्टार्ट होना मुश्किल हो सकता है।

    इसी वजह से बेहद ठंडे दिनों में वाहन को लंबे समय तक बंद छोड़ना परेशानी पैदा कर सकता है। कुछ लोग जरूरत के मुताबिक इंजन को चालू रखते हैं या वाहनों को गर्म जगह पर रखने की कोशिश करते हैं।

    मोबाइल फोन, कैमरा और दूसरी बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भी इतनी ठंड में सामान्य परिस्थितियों की तुलना में जल्दी बैटरी खो सकती हैं और ठीक से काम करने में परेशानी हो सकती है।

    पानी की व्यवस्था भी आसान नहीं

    ओइम्याकॉन जैसे इलाके में सामान्य प्लंबिंग सिस्टम बनाए रखना बड़ी चुनौती है। पाइपों में मौजूद पानी जम सकता है, जिससे घरों तक पानी पहुंचाना मुश्किल हो जाता है।

    इसलिए यहां पानी की व्यवस्था स्थानीय परिस्थितियों और उपलब्ध स्रोतों पर निर्भर करती है। अत्यधिक ठंड के कारण पारंपरिक इंडोर प्लंबिंग की जगह कुछ जगहों पर वैकल्पिक व्यवस्थाओं का इस्तेमाल करना पड़ता है। बेहद कम तापमान में सैनिटेशन भी रोजमर्रा की जिंदगी की बड़ी चुनौती बन जाता है।

    घरों को कैसे गर्म रखते हैं लोग?

    यहां घरों का निर्माण और इस्तेमाल इस तरह किया जाता है कि अंदर की गर्मी ज्यादा से ज्यादा समय तक बनी रहे। अच्छी इंसुलेशन व्यवस्था ठंडी हवा को अंदर आने से रोकने में मदद करती है।

    सबसे कड़ाके की ठंड के दौरान हीटिंग व्यवस्था बेहद जरूरी हो जाती है। पारंपरिक तौर पर लकड़ी और कोयला जैसे ईंधनों का इस्तेमाल घरों को गर्म रखने के लिए किया जाता रहा है।

    यहां हीटिंग सिर्फ आराम की चीज नहीं, बल्कि अत्यधिक ठंड में सामान्य जीवन बनाए रखने की बुनियादी जरूरत है।

    बाहर निकलते समय बरतनी पड़ती है खास सावधानी

    ओइम्याकॉन में सर्दियों के दौरान बाहर निकलना किसी सामान्य ठंडे शहर में बाहर जाने जैसा नहीं है। तापमान बेहद कम होने पर शरीर से गर्मी तेजी से निकल सकती है।

    चेहरे की खुली त्वचा, उंगलियां, पैर और नाक जैसे हिस्से फ्रॉस्टबाइट की चपेट में जल्दी आ सकते हैं। लंबे समय तक अत्यधिक ठंड में रहने पर हाइपोथर्मिया का खतरा भी बढ़ जाता है।

    इसीलिए यहां रहने वाले लोगों को मौसम के अनुसार कपड़े पहनने, शरीर को ढककर रखने और बहुत ज्यादा देर तक खुले वातावरण में न रहने जैसी सावधानियां बरतनी पड़ती हैं।

    इतनी ठंड में आखिर कैसे चलती है जिंदगी?

    ओइम्याकॉन की कहानी सिर्फ रिकॉर्ड तोड़ ठंड की नहीं, बल्कि इंसानों के वातावरण के अनुसार खुद को ढाल लेने की भी है। यहां रहने वाले लोगों की दिनचर्या, भोजन, घरों की संरचना, परिवहन और पानी की व्यवस्था—सब कुछ मौसम की कठोर परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित हुआ है।

    जहां दुनिया के कई हिस्सों में -10 या -20 डिग्री तापमान भी असामान्य महसूस होता है, वहीं ओइम्याकॉन के लोग इससे कहीं ज्यादा कम तापमान में भी अपनी जिंदगी और रोजमर्रा के काम जारी रखते हैं। यही वजह है कि यह छोटा सा साइबेरियाई गांव दुनिया की सबसे कठोर आबादी वाली जगहों में एक अनोखा उदाहरण माना जाता है।

  • मुगल काल में 1 रुपये: में क्या-क्या मिल जाता था? आज वही सामान खरीदने में लगेंगे हजारों रुपये.

    मुगल काल में 1 रुपये: में क्या-क्या मिल जाता था? आज वही सामान खरीदने में लगेंगे हजारों रुपये.

    मुगल काल में 1 रुपये: में क्या-क्या मिल जाता था? आज वही सामान खरीदने में लगेंगे हजारों रुपये.

    आज के समय में एक रुपये में शायद ही कोई जरूरी सामान खरीदा जा सकता है। लेकिन कुछ सदियों पीछे मुगल काल के दौरान रुपये की क्रय शक्ति आज की तुलना में काफी अलग थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों में उस दौर की कई वस्तुओं की कीमतों का उल्लेख मिलता है, जिनसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उस समय एक रुपये से कितनी चीजें खरीदी जा सकती थीं।

    खास तौर पर सम्राट अकबर के शासनकाल से जुड़े ‘आईन-ए-अकबरी’ जैसे ऐतिहासिक स्रोत उस समय की अर्थव्यवस्था, वस्तुओं की कीमत और मजदूरी के बारे में जानकारी देते हैं। हालांकि पुराने समय की कीमतों को आज की कीमतों से सीधे जोड़ना आसान नहीं है, क्योंकि मुद्रा, मजदूरी, वजन की इकाइयों और बाजार व्यवस्था में काफी बदलाव आ चुका है।

    एक रुपये में कितना अनाज?

    ऐतिहासिक रिकॉर्ड में मुगल काल के दौरान अनाज की कीमतों का उल्लेख मिलता है। उस समय ‘मन’ जैसी पारंपरिक वजन इकाइयों का इस्तेमाल किया जाता था।

    कुछ उपलब्ध विवरणों के आधार पर एक रुपये में कई मन अनाज खरीदे जाने का उल्लेख मिलता है। एक मन का वजन क्षेत्र और समय के अनुसार अलग-अलग हो सकता था, इसलिए इसे आज के किलो में बदलते समय सावधानी जरूरी है।

    इसी वजह से यह कहना अधिक उचित है कि उस दौर में एक रुपये की मदद से बड़ी मात्रा में अनाज खरीदा जा सकता था, जबकि आज उतनी मात्रा में गेहूं या चावल खरीदने के लिए हजारों रुपये खर्च हो सकते हैं।

    घी और तेल भी थे काफी सस्ते

    मुगल काल से जुड़े कुछ मूल्य विवरणों में घी और तेल जैसी खाद्य वस्तुओं की कीमतें भी दर्ज हैं। इन्हीं ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर कई जगह दावा किया जाता है कि एक रुपये में कई किलोग्राम घी या तेल खरीदा जा सकता था।

    हालांकि यहां भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग जगहों, वर्षों और बाजारों में कीमतें अलग हो सकती थीं। इसलिए इन आंकड़ों को पूरे मुगल साम्राज्य में लागू एक समान कीमत मानना सही नहीं होगा।

    मांस की कीमत भी आज से बिल्कुल अलग थी

    उस समय मांस की कीमत भी आज के मुकाबले बहुत कम थी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के आधार पर एक रुपये में बड़ी मात्रा में मांस खरीदे जाने की बात सामने आती है।

    आज अगर इतनी ही मात्रा में मांस खरीदा जाए तो इसकी कीमत हजारों रुपये तक पहुंच सकती है। लेकिन दोनों दौरों की आर्थिक स्थिति अलग होने के कारण केवल रुपये की संख्या के आधार पर महंगाई की सीधी गणना करना सही तरीका नहीं माना जाता।

    मुगल रुपये में कितनी चांदी होती थी?

    मुगल काल का रुपया सिर्फ एक कागजी मूल्य नहीं था। उस समय का रुपया चांदी का सिक्का था और उसमें काफी मात्रा में चांदी मौजूद होती थी।

    अकबर के दौर के मानक रुपये का वजन लगभग 11.4 से 11.5 ग्राम चांदी के आसपास बताया जाता है। यही वजह है कि उस समय रुपये का मूल्य उसकी धातु की कीमत और निर्धारित मौद्रिक व्यवस्था दोनों से जुड़ा हुआ था।

    अगर आज के चांदी के भाव से केवल उस चांदी की कीमत का हिसाब लगाया जाए, तो एक पुराने मुगल रुपये में मौजूद चांदी का मूल्य करीब एक हजार रुपये के आसपास या उससे अलग हो सकता है, यह मौजूदा चांदी के बाजार भाव पर निर्भर करेगा।

    लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय का एक रुपया सीधे आज के एक हजार रुपये के बराबर था। धातु मूल्य और क्रय शक्ति दो अलग-अलग चीजें हैं।

    मजदूर की कमाई कितनी होती थी?

    मुगल काल की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए केवल वस्तुओं की कीमत देखना पर्याप्त नहीं है। उस समय लोगों की आय और मजदूरी भी काफी अलग थी।

    ऐतिहासिक विवरणों में अलग-अलग श्रेणी के मजदूरों और कर्मचारियों की मजदूरी का उल्लेख मिलता है। कुछ सामान्य मजदूरों की मासिक आय कुछ रुपये के आसपास होने के उदाहरण दिए जाते हैं।

    इससे समझा जा सकता है कि उस दौर में एक रुपया आज के मुकाबले सिर्फ एक छोटी रकम नहीं था। किसी व्यक्ति की आय की तुलना में उसकी वास्तविक क्रय शक्ति काफी महत्वपूर्ण हो सकती थी।

    आज से तुलना करना इतना आसान क्यों नहीं?

    मुगल काल के एक रुपये को आज के रुपये में बदलने की कोशिश करते समय कई चीजों को ध्यान में रखना पड़ता है। उस समय की मजदूरी, जमीन की कीमत, खाद्य पदार्थों के दाम, उत्पादन लागत, परिवहन व्यवस्था और मुद्रा प्रणाली आज से पूरी तरह अलग थी।

    इसलिए यह कहना कि ‘मुगल काल का एक रुपया आज के इतने हजार रुपये के बराबर था’, बिना किसी निश्चित आर्थिक पद्धति के पूरी तरह सटीक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

    अलग-अलग तरीकों से तुलना करने पर अलग परिणाम मिल सकते हैं। उदाहरण के लिए, चांदी के वजन से की गई तुलना अलग होगी और मजदूरी या अनाज की क्रय शक्ति के आधार पर की गई तुलना अलग।

    फिर भी एक रुपये की कहानी क्या बताती है?

    मुगल काल के रुपये और आज के रुपये की तुलना हमें उस समय की अर्थव्यवस्था को समझने का एक दिलचस्प तरीका देती है। उस दौर में चांदी के सिक्के, मजदूरी और जरूरी वस्तुओं की कीमतों का आपस में अलग संबंध था।

    आज एक रुपये से बहुत कम चीजें खरीदी जा सकती हैं, जबकि मुगल काल में एक रुपये से बड़ी मात्रा में रोजमर्रा की जरूरत का सामान खरीदे जाने के ऐतिहासिक उदाहरण मिलते हैं।

    इसलिए मुगल काल का एक रुपया सिर्फ एक मुद्रा इकाई नहीं था, बल्कि उस समय की मजदूरी, बाजार और वस्तुओं की क्रय शक्ति को समझने की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी था।

  • आधार से पासपोर्ट तक, भारत में कितने तरह के पहचान पत्र? जानिए किस दस्तावेज का कहां होता है इस्तेमाल.

    आधार से पासपोर्ट तक, भारत में कितने तरह के पहचान पत्र? जानिए किस दस्तावेज का कहां होता है इस्तेमाल.

    आधार से पासपोर्ट तक, भारत में कितने तरह के पहचान पत्र? जानिए किस दस्तावेज का कहां होता है इस्तेमाल.

    भारत में अलग-अलग सरकारी और प्रशासनिक कामों के लिए कई तरह के पहचान दस्तावेज इस्तेमाल किए जाते हैं। हालांकि सभी दस्तावेजों का काम एक जैसा नहीं होता। किसी का इस्तेमाल वित्तीय लेनदेन के लिए होता है, तो कोई मतदान, वाहन चलाने, सरकारी योजनाओं या विदेश यात्रा के लिए जरूरी होता है।

    आम तौर पर इस्तेमाल होने वाले प्रमुख दस्तावेजों में आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस, पासपोर्ट और राशन कार्ड शामिल हैं। इसके अलावा भी कुछ योजनाओं और संस्थानों से जुड़े पहचान पत्र होते हैं।

    आधार कार्ड

    आधार कार्ड भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण यानी UIDAI की ओर से जारी किया जाता है। इसमें व्यक्ति को 12 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या दी जाती है।

    आधार का इस्तेमाल कई सरकारी और गैर-सरकारी सेवाओं में पहचान और पते की पुष्टि के लिए किया जाता है। सरकारी योजनाओं और सब्सिडी से जुड़ी सेवाओं में भी इसकी जरूरत पड़ सकती है। बैंकिंग, मोबाइल कनेक्शन और कई अन्य सेवाओं में भी आधार का उपयोग पहचान सत्यापन के लिए किया जाता है।

    हालांकि आधार को हर परिस्थिति में नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाता। इसका मुख्य उद्देश्य पहचान की पुष्टि करना है।

    पैन कार्ड

    पैन यानी Permanent Account Number आयकर विभाग की ओर से जारी किया जाता है। इसमें 10 अंकों का अल्फान्यूमेरिक नंबर होता है।

    पैन का मुख्य संबंध आयकर और वित्तीय गतिविधियों से है। आयकर रिटर्न दाखिल करने, कई तरह के बड़े वित्तीय लेनदेन, निवेश, डीमैट अकाउंट और कुछ संपत्ति संबंधी लेनदेन में इसकी आवश्यकता हो सकती है।

    इसलिए पैन कार्ड को मुख्य रूप से वित्तीय पहचान दस्तावेज के तौर पर देखा जाता है।

    वोटर आईडी कार्ड

    वोटर आईडी भारत निर्वाचन आयोग की ओर से जारी किया जाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल चुनाव के दौरान मतदाता की पहचान से जुड़ा है।

    लोकसभा, विधानसभा और अन्य चुनावों में मतदान के लिए मतदाता की पहचान सुनिश्चित करने में इसका इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि मतदान के लिए केवल वोटर आईडी ही एकमात्र स्वीकार्य पहचान दस्तावेज नहीं है; चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित वैकल्पिक दस्तावेज भी मान्य हो सकते हैं।

    ड्राइविंग लाइसेंस

    ड्राइविंग लाइसेंस संबंधित परिवहन प्राधिकरण की ओर से जारी किया जाता है। यह किसी व्यक्ति को निर्धारित श्रेणी का वाहन चलाने की कानूनी अनुमति देता है।

    ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने के लिए आवेदक को संबंधित नियमों और ड्राइविंग टेस्ट की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। वाहन चलाने की अनुमति के अलावा कई जगहों पर यह पहचान और पते के प्रमाण के तौर पर भी स्वीकार किया जाता है।

    पासपोर्ट

    पासपोर्ट विदेश मंत्रालय के अधीन पासपोर्ट प्राधिकरण की ओर से जारी किया जाता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय यात्रा के दौरान होता है।

    विदेश जाने, इमिग्रेशन प्रक्रिया पूरी करने और कई देशों का वीजा हासिल करने के लिए पासपोर्ट आवश्यक होता है। पासपोर्ट व्यक्ति की पहचान और राष्ट्रीयता से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।

    राशन कार्ड

    राशन कार्ड आम तौर पर राज्य सरकार के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग से जुड़ी व्यवस्था के तहत जारी किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पात्र परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत खाद्यान्न और अन्य निर्धारित सुविधाएं उपलब्ध कराना है।

    राशन कार्ड में परिवार के सदस्यों की जानकारी दर्ज हो सकती है। कई जगहों पर इसका इस्तेमाल परिवार और पते से जुड़े दस्तावेज के रूप में भी किया जाता है, लेकिन इसकी स्वीकार्यता काम और संबंधित विभाग के नियमों पर निर्भर करती है।

    आयुष्मान कार्ड

    आयुष्मान कार्ड पात्र लाभार्थियों को सरकार की स्वास्थ्य योजना के तहत सूचीबद्ध अस्पतालों में उपचार संबंधी सुविधाओं का लाभ लेने में मदद करता है।

    इसका उद्देश्य मुख्य रूप से पात्र परिवारों को योजना के तहत मिलने वाले स्वास्थ्य लाभ तक पहुंच उपलब्ध कराना है। इसे सामान्य पहचान पत्र की बजाय सरकारी स्वास्थ्य योजना से जुड़ा लाभार्थी दस्तावेज समझना ज्यादा उचित है।

    कर्मचारी और अन्य संस्थागत पहचान पत्र

    इसके अलावा सरकारी विभागों, कंपनियों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों की ओर से कर्मचारी या संस्थागत पहचान पत्र भी जारी किए जाते हैं।

    इनका इस्तेमाल संबंधित संस्था के भीतर पहचान साबित करने, परिसर में प्रवेश और कुछ निर्धारित सेवाओं का लाभ लेने के लिए किया जाता है। इसी तरह वरिष्ठ नागरिक कार्ड जैसे दस्तावेज भी कुछ विशेष सुविधाओं और सेवाओं के लिए उपयोग किए जा सकते हैं।

    हर पहचान पत्र का काम अलग

    भारत में कई पहचान दस्तावेज होने की वजह से अक्सर लोगों को इनके इस्तेमाल को लेकर भ्रम होता है। लेकिन इन सभी की भूमिका अलग-अलग है।

    आधार मुख्य रूप से पहचान सत्यापन, पैन वित्तीय और कर संबंधी काम, वोटर आईडी चुनावी पहचान, ड्राइविंग लाइसेंस वाहन चलाने की अनुमति, पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा और राशन कार्ड सार्वजनिक वितरण प्रणाली से जुड़ी सेवाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

    इसलिए किसी एक पहचान पत्र को हर काम के लिए अनिवार्य या सभी परिस्थितियों में समान रूप से उपयोगी मानना सही नहीं है। किसी विशेष सेवा के लिए कौन-सा दस्तावेज स्वीकार किया जाएगा, यह संबंधित विभाग या संस्था के मौजूदा नियमों पर निर्भर करता है।

  • असम के इस गांव; में हर साल क्यों गिरने लगते हैं पक्षी? रहस्यमयी घटना के पीछे की कहानी जानकर चौंक जाएंगे.

    असम के इस गांव; में हर साल क्यों गिरने लगते हैं पक्षी? रहस्यमयी घटना के पीछे की कहानी जानकर चौंक जाएंगे.

    असम के इस गांव; में हर साल क्यों गिरने लगते हैं पक्षी? रहस्यमयी घटना के पीछे की कहानी जानकर चौंक जाएंगे.

    असम के दिमा हसाओ जिले में स्थित जतिंगा गांव लंबे समय से एक रहस्यमयी प्राकृतिक घटना के लिए चर्चा में रहा है। मानसून के बाद हर साल बड़ी संख्या में पक्षी यहां घायल या मृत अवस्था में पाए जाते हैं। इसी वजह से जतिंगा को लंबे समय से ‘बर्ड सुसाइड पॉइंट’ जैसे नामों से जाना जाता है।

    हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक, पक्षी जानबूझकर अपनी जान नहीं देते। इसके पीछे मौसम, घना कोहरा, तेज हवाएं, कम दृश्यता और कृत्रिम रोशनी जैसे कई प्राकृतिक और पर्यावरणीय कारणों की भूमिका मानी जाती है।

    सितंबर से नवंबर के बीच बढ़ जाती है घटना

    जतिंगा में यह घटना मुख्य रूप से सितंबर से नवंबर के बीच देखने को मिलती है। मानसून के बाद घाटी में मौसम तेजी से बदलता है। इस दौरान घना कोहरा और तेज हवाएं पक्षियों के लिए उड़ान भरना और सही दिशा में नेविगेट करना मुश्किल बना सकती हैं।

    रात के समय जब पक्षी उड़ते हैं तो अंधेरा, कोहरा और हवा की दिशा में बदलाव मिलकर उनकी सामान्य दिशा पहचानने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में वे भटककर जमीन के करीब आ सकते हैं।

    रोशनी भी बन सकती है वजह

    इस पूरी घटना में कृत्रिम रोशनी को भी एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। जब पक्षी खराब मौसम और कम रोशनी के कारण भ्रमित होते हैं, तो वे गांव में मौजूद लैंप या दूसरी प्रकाश स्रोतों की तरफ आकर्षित हो सकते हैं।

    रोशनी की ओर उड़ते समय घने कोहरे के कारण उन्हें सामने मौजूद पेड़, घर, बांस के खंभे और दूसरी संरचनाएं साफ दिखाई नहीं देतीं। ऐसे में पक्षियों के इन चीजों से टकराने का खतरा बढ़ जाता है।

    टक्कर से घायल होकर गिर सकते हैं पक्षी

    तेज हवा और कम दृश्यता के बीच उड़ते हुए पक्षी जब किसी पेड़ या दूसरी संरचना से टकराते हैं तो उन्हें गंभीर चोट लग सकती है। कई पक्षी घायल होकर जमीन पर गिर जाते हैं, जबकि कुछ की मौत भी हो सकती है।

    इसी वजह से इस मौसम में जतिंगा में बड़ी संख्या में पक्षियों के मृत या घायल मिलने की घटनाएं सामने आती हैं।

    क्या चुंबकीय क्षेत्र भी है जिम्मेदार?

    जतिंगा की घटना को समझाने के लिए समय-समय पर कुछ अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत भी सामने आए हैं। इनमें स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी संभावनाएं भी शामिल हैं।

    एक सिद्धांत के मुताबिक, क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना और भूमिगत जल प्रवाह स्थानीय चुंबकीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पक्षियों की नेविगेशन क्षमता पर असर पड़ने की संभावना हो सकती है। हालांकि इसे इस घटना की अंतिम और पूरी तरह प्रमाणित वजह नहीं माना गया है।

    कभी रहस्य और अंधविश्वास से जुड़ी थी कहानी

    पहले स्थानीय स्तर पर पक्षियों के इस तरह गिरने या मरने को रहस्यमयी और दैवीय घटनाओं से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन समय के साथ पक्षी विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े अध्ययनों ने इस घटना को प्राकृतिक परिस्थितियों से जोड़कर समझने की कोशिश की।

    आज जतिंगा की घटना को पक्षियों के ‘आत्महत्या करने’ के बजाय पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण होने वाली असामान्य पक्षी मृत्यु और चोटों के रूप में समझा जाता है।

    अब पक्षियों की सुरक्षा पर दिया जा रहा जोर

    समय के साथ प्रशासन और वन्यजीव संगठनों का ध्यान इस घटना को देखने के बजाय पक्षियों को सुरक्षित रखने पर भी गया है। रात के समय तेज कृत्रिम रोशनी को नियंत्रित करने और संवेदनशील इलाकों में मानवीय गतिविधियों को कम करने जैसे उपायों का उद्देश्य पक्षियों के भटकने और दुर्घटनाओं के जोखिम को कम करना है।

    जतिंगा की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि जिसे लंबे समय तक ‘पक्षियों की आत्महत्या’ जैसी रहस्यमयी घटना माना गया, उसके पीछे वैज्ञानिकों ने मौसम, भूगोल, प्रकाश और पक्षियों की नेविगेशन संबंधी परेशानियों जैसी संभावित वजहों पर ध्यान दिया है।

    यानी पक्षी यहां अपनी जान देने नहीं आते, बल्कि कुछ खास पर्यावरणीय परिस्थितियां उन्हें ऐसी खतरनाक स्थिति में पहुंचा सकती हैं, जहां उनके घायल होने या मरने का खतरा बढ़ जाता है।

  • 27 साल में PhD, अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी और मरीजों का प्यार… फिर सब छोड़कर डिलीवरी राइडर बनीं चीनी डॉक्टर.

    27 साल में PhD, अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी और मरीजों का प्यार… फिर सब छोड़कर डिलीवरी राइडर बनीं चीनी डॉक्टर.

    27 साल में PhD, अस्पताल में डॉक्टर की नौकरी और मरीजों का प्यार… फिर सब छोड़कर डिलीवरी राइडर बनीं चीनी डॉक्टर.

    आमतौर पर लोग अच्छी डिग्री, सम्मानजनक नौकरी और आर्थिक सुरक्षा को सफलता की निशानी मानते हैं। लेकिन चीन की एक 31 वर्षीय महिला ने अपने करियर में इतना सब हासिल करने के बाद भी एक ऐसा फैसला लिया, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया। मेडिसिन में PhD करने वाली लियू जिहान ने अस्पताल की नौकरी छोड़ दी और इसके बाद डिलीवरी राइडर, पब सिंगर और दूसरे छोटे-मोटे काम करने लगीं।

    लियू का कहना है कि करियर बदलने के बाद उनकी जिंदगी में तनाव कम हुआ है। अब वह अपनी जरूरतों का खर्च निकालने के साथ-साथ जिंदगी को अपनी पसंद के हिसाब से जीने की कोशिश कर रही हैं।

    पढ़ाई के दबाव के बीच हासिल की PhD

    लियू चीन के उत्तरी प्रांत हेबेई से हैं। उनका बचपन पढ़ाई और प्रतियोगिता के दबाव के बीच बीता। उन्होंने कुछ समय हेंगशुई हाई स्कूल में भी पढ़ाई की, जो अपने अनुशासन और कड़े शैक्षणिक माहौल के लिए जाना जाता है।

    इसके बाद उन्होंने सिचुआन यूनिवर्सिटी से मेडिसिन की पढ़ाई की। आगे चलकर उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ मकाऊ के फैकल्टी ऑफ हेल्थ साइंसेज से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की।

    महज 27 साल की उम्र में PhD पूरी करने के बाद लियू ने साल 2022 में अस्पताल में मनोचिकित्सक के तौर पर काम शुरू किया।

    मरीजों से मिला प्यार और सम्मान

    अस्पताल में काम करने के दौरान लियू को मरीजों से काफी सम्मान मिला। कुछ मरीजों ने उनके लिए हाथ से चिट्ठियां लिखीं और उनके सम्मान में बैनर तक बनाए।

    लियू के लिए मरीजों से जुड़ना उनके काम का सबसे अच्छा हिस्सा था। वह मानती थीं कि मरीज की सामाजिक स्थिति या हैसियत से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसे एक इंसान के तौर पर समझा जाए।

    उन्हें लोगों से दिल की बात करना और अलग-अलग तरह के लोगों से जुड़ना पसंद था। लेकिन समय के साथ अस्पताल की नियमित दिनचर्या और तय शेड्यूल उन्हें परेशान करने लगा।

    प्रतिष्ठित अस्पताल की नौकरी भी छोड़ दी

    इस साल फरवरी में लियू ने झुहाई के एक अस्पताल में मनोचिकित्सक और पोस्टडॉक्टरल रिसर्चर की फुल-टाइम नौकरी छोड़ने का फैसला किया।

    उनके पास PhD थी, सम्मानजनक नौकरी थी और एक स्थिर करियर की राह भी खुली हुई थी। इसके बावजूद उन्हें महसूस हुआ कि सिर्फ सुरक्षित करियर के लिए ऐसी जिंदगी जीना, जिसमें उन्हें संतुष्टि नहीं मिल रही, उनके लिए सही नहीं है।

    नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ समय यात्रा में बिताया। इसके बाद उन्होंने ऐसे कई काम आजमाए, जिनका उनके मेडिकल करियर से कोई सीधा संबंध नहीं था।

    कभी नाश्ता बेचा, कभी बनीं डिलीवरी राइडर

    लियू ने नाश्ता बेचने का काम किया, डिलीवरी राइडर के तौर पर काम किया और एक पब में सिंगर के रूप में भी परफॉर्म किया।

    इन कामों के दौरान उन्हें समाज के अलग-अलग वर्गों के लोगों के करीब से मिलने का मौका मिला। रेस्टोरेंट कर्मचारी, डिलीवरी राइडर, पब में काम करने वाले लोग और सड़क किनारे दुकान लगाने वाले लोग उनकी नई जिंदगी का हिस्सा बने।

    लियू के मुताबिक, इन लोगों में उन्हें एक अलग तरह की सकारात्मकता नजर आई। मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद वे एक-दूसरे की मदद करते थे और जिंदगी को ज्यादा सहज तरीके से लेते थे।

    बोलीं- जिंदगी सिर्फ डिग्री और नंबरों का नाम नहीं

    लियू ने महसूस किया कि उनकी पिछली जिंदगी में प्रतियोगिता और उपलब्धियों पर काफी जोर था। उनका मानना है कि युवा अक्सर अच्छे नंबर, डिग्री और करियर की दौड़ में खुद पर जरूरत से ज्यादा दबाव डाल लेते हैं।

    उन्होंने बताया कि डिलीवरी राइडर एक-दूसरे को ट्रैफिक और रास्तों की जानकारी देते हैं। वहीं पब में काम करने वाले लोग और छोटे दुकानदार भी जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे की मदद करते हैं।

    लियू के लिए ऐसे छोटे-छोटे अनुभवों ने जिंदगी को देखने का उनका नजरिया बदल दिया। उनके मुताबिक, सिर्फ उपलब्धियां हासिल करना ही जिंदगी का उद्देश्य नहीं है। लोगों के बीच देखभाल, सहयोग और आपसी जुड़ाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    मेडिसिन से पूरी तरह नाता नहीं तोड़ा

    हालांकि लियू ने मेडिकल क्षेत्र को पूरी तरह नहीं छोड़ा है। वह अब भी पार्ट-टाइम थेरेपिस्ट के तौर पर काम करती हैं। उनका कहना है कि वह अपने काम और निजी जिंदगी के बीच ज्यादा स्वतंत्रता और संतुलन चाहती हैं।

    लियू की कहानी इसलिए चर्चा में है क्योंकि उन्होंने उस समय करियर की दिशा बदली, जब उनके पास आगे बढ़ने के लिए एक मजबूत पेशेवर आधार मौजूद था। उनके लिए यह बदलाव सिर्फ नौकरी छोड़ने का फैसला नहीं था, बल्कि जिंदगी को अपनी प्राथमिकताओं के हिसाब से देखने की कोशिश भी थी।

  • कैब ड्राइवर से ‘लेकर’ एग्जाम सेंटर तक, महिला ने बताए 3 परेशान करने वाले अनुभव, बोली- हर लड़की की अपनी कहानी है.

    कैब ड्राइवर से ‘लेकर’ एग्जाम सेंटर तक, महिला ने बताए 3 परेशान करने वाले अनुभव, बोली- हर लड़की की अपनी कहानी है.

    कैब ड्राइवर से ‘लेकर’ एग्जाम सेंटर तक, महिला ने बताए 3 परेशान करने वाले अनुभव, बोली- हर लड़की की अपनी कहानी है.

    महिलाओं की सुरक्षा को लेकर अक्सर उन्हें सावधान रहने की सलाह दी जाती है। लेकिन कई बार ऐसी परिस्थितियां सामने आती हैं, जिनमें महिला को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर उसे हर समय अपनी सुरक्षा को लेकर इतना सतर्क क्यों रहना पड़ता है। सोशल मीडिया पर एक महिला ने अपने साथ हुई ऐसी ही तीन घटनाएं साझा की हैं, जिनके बाद महिलाओं की सुरक्षा और रोजमर्रा के अनुभवों को लेकर चर्चा शुरू हो गई।

    महिला ने इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए वीडियो में बताया कि अलग-अलग मौकों पर पुरुषों के कुछ व्यवहार ने उन्हें इतना असहज किया कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर काफी चिंता हुई। उनका कहना था कि ऐसी घटनाओं के बाद कई महिलाएं खुद से ही सवाल करने लगती हैं कि उन्होंने क्या पहना था, कहां जा रही थीं या कहीं उनकी तरफ से कोई ऐसी बात तो नहीं हुई, जिसे गलत तरीके से लिया गया।

    पहली घटना ने महिला को घर से निकलने तक से डरा दिया

    महिला ने बताया कि पहली घटना सुबह करीब 6 बजे की है। वह गाजियाबाद से गुरुग्राम जाने के लिए कैब बुक कर रही थीं। पहली कैब काफी देर तक आगे नहीं बढ़ी, इसलिए उन्होंने उसे कैंसिल कर दूसरी कैब बुक करने का फैसला किया।

    कुछ देर बाद पहली कैब का ड्राइवर उनके घर पहुंच गया। महिला के मुताबिक, ड्राइवर ने उनसे पूछा कि क्या उन्होंने कैब बुक की थी। महिला ने बताया कि उन्होंने कैब कैंसिल कर दी है और अब दूसरी कैब से जाएंगी।

    इसके बावजूद ड्राइवर ने उनसे गेट खोलने के लिए कहा और यह भी कहा कि वह खुद उन्हें गुरुग्राम छोड़ देगा। महिला ने गेट खोलने से इनकार किया और यहां तक कहा कि अगर कोई कैंसिलेशन चार्ज बनता है तो वह देने के लिए तैयार हैं। लेकिन उनके मुताबिक, ड्राइवर लगातार गेट खोलने की बात कहता रहा।

    इस घटना से महिला काफी डर गईं। उन्होंने बताया कि वह घर के अंदर घबराई हुई थीं। आखिरकार उन्होंने अपनी कैब भी कैंसिल कर दी और उस दिन गुरुग्राम जाने का प्लान छोड़ दिया। उन्हें इस बात की चिंता थी कि ड्राइवर उनका घर देख चुका था और उनका चेहरा भी पहचानता था।

    दूसरी घटना में रात के समय मचा था डर

    महिला ने 2019 की एक घटना भी साझा की। उस समय वह दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही थीं और एक पीजी में रहती थीं।

    एक रात उनके कुछ दोस्त देर से वापस लौट रहे थे। अचानक वे भागते हुए पीजी पहुंचे और सभी को गेट बंद करके अंदर रहने के लिए कहा।

    महिला के मुताबिक, उनके दोस्तों ने कुछ लोगों को बाइक छोड़कर पीजी की दिशा में आते देखा था। उस समय उन्हें पूरी तरह समझ नहीं आया कि आखिर स्थिति क्या थी, लेकिन उस घटना ने उनके मन में डर जरूर पैदा कर दिया।

    एग्जाम सेंटर पर सीट नंबर को लेकर किया गया कमेंट

    महिला ने तीसरी घटना को हाल की बताया। वह NET परीक्षा देने के लिए लखनऊ गई थीं। परीक्षा केंद्र पर एक कोऑर्डिनेटर उनके दस्तावेज चेक कर रहा था। इसी दौरान उनकी सीट संख्या 69 देखकर उसने कथित तौर पर एक ऐसा कमेंट किया, जिससे महिला असहज हो गईं।

    महिला के मुताबिक, उन्होंने किसी से बातचीत या दोस्ताना व्यवहार करने की कोशिश नहीं की थी। इसके बावजूद उस टिप्पणी ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं कोई उन्हें गलत नजर से तो नहीं देख रहा।

    इसका असर उनकी परीक्षा पर भी पड़ा। महिला ने बताया कि वह पूरे एग्जाम के दौरान इस घटना को लेकर परेशान रहीं और इसी वजह से एक सवाल भी मिस कर दिया।

    बोलीं- किसी पर आरोप नहीं, बस अपना अनुभव बता रही हूं

    महिला ने साफ किया कि उनका मकसद किसी व्यक्ति पर सीधे आरोप लगाना नहीं है। वह सिर्फ यह बताना चाहती हैं कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाएं भी किसी महिला के मन पर कितना असर डाल सकती हैं।

    उनके मुताबिक, कई बार कोई घटना बाहर से छोटी लग सकती है, लेकिन उस समय महिला के मन में पैदा होने वाला डर और असहजता काफी बड़ी होती है।

    सोशल मीडिया पर महिलाओं ने साझा किए अपने अनुभव

    महिला का वीडियो सामने आने के बाद कई यूजर्स ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं। खासतौर पर कई महिलाओं ने कहा कि उनके साथ भी कभी न कभी ऐसी परिस्थितियां हुई हैं, जब उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर

     

     

     
     
  • मैरिज ब्यूरो को छोड़ा’ पीछे! महिला ने पति ढूंढने के लिए बनाया Google Form, 240 से ज्यादा लोगों ने दिखाई दिलचस्पी.

    मैरिज ब्यूरो को छोड़ा’ पीछे! महिला ने पति ढूंढने के लिए बनाया Google Form, 240 से ज्यादा लोगों ने दिखाई दिलचस्पी.

    मैरिज ब्यूरो को छोड़ा’ पीछे! महिला ने पति ढूंढने के लिए बनाया Google Form, 240 से ज्यादा लोगों ने दिखाई दिलचस्पी.

    आज के दौर में पार्टनर तलाशने के तरीके भी तेजी से बदल रहे हैं। कोई डेटिंग ऐप पर प्रोफाइल बनाता है तो कोई मैट्रिमोनी वेबसाइट का सहारा लेता है। लेकिन अमेरिका की एक महिला ने पति की तलाश के लिए ऐसा तरीका अपनाया, जिसने सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।

    महिला ने डेटिंग ऐप्स पर घंटों स्वाइप करने के बजाय सीधे Google Form तैयार कर दिया। इस फॉर्म को उसने सोशल मीडिया पर शेयर किया और इसमें संभावित पार्टनर से जुड़े कई सवाल पूछे। देखते ही देखते बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें रुचि दिखाई।

    डेटिंग ऐप्स से परेशान होकर निकाला अनोखा तरीका

    रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना स्थित शार्लोट की रहने वाली 36 वर्षीय एरिन पैटरसन ने पति की तलाश के लिए यह अनोखा तरीका अपनाया।

    एरिन डेटिंग ऐप्स पर लगातार लोगों की प्रोफाइल देखने और स्वाइप करने से परेशान हो चुकी थीं। उन्हें ऐसा लग रहा था कि इस प्रक्रिया में काफी समय खर्च हो रहा है और गंभीर रिश्ते की तलाश भी पूरी नहीं हो पा रही है।

    इसके बाद उन्होंने एक अलग ही तरीका अपनाने का फैसला किया। उन्होंने संभावित पति के लिए एक तरह का ‘आवेदन फॉर्म’ तैयार कर लिया और उसे अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल पर पिन कर दिया।

    फॉर्म में पूछे गए शादी और जिंदगी से जुड़े सवाल

    यह कोई साधारण फॉर्म नहीं था। इसमें संभावित पार्टनर से उनकी जिंदगी, करियर, आदतों और भविष्य की योजनाओं से जुड़े कई सवाल पूछे गए थे।

    एरिन ने बताया कि वह ऐसे व्यक्ति की तलाश में हैं जो समझदार, दयालु और बातचीत पसंद करने वाला हो। उन्हें ऐसा पार्टनर चाहिए जिसके साथ कॉफी या डिनर पर बैठकर अच्छी बातचीत की जा सके।

    फॉर्म में उम्मीदवारों से उनके करियर गोल, रोजाना की दिनचर्या, फिटनेस रूटीन और शादी को लेकर सोच जैसी चीजों के बारे में भी सवाल किए गए।

    यानी डेटिंग ऐप की तरह सिर्फ फोटो और छोटी सी प्रोफाइल देखने के बजाय एरिन ने संभावित पार्टनर को थोड़ा बेहतर तरीके से समझने के लिए पहले ही कई सवाल पूछ लिए।

    240 से ज्यादा लोगों ने दिखाई दिलचस्पी

    एरिन का यह प्रयोग सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ गया। रिपोर्ट के अनुसार, 240 से ज्यादा लोगों ने फॉर्म भरने में दिलचस्पी दिखाई।

    लोगों को उनका यह तरीका काफी अलग लगा। सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने इसे डेटिंग ऐप्स के मुकाबले ज्यादा सीधा और स्पष्ट तरीका बताया।

    एक यूजर ने उनकी पहल की तारीफ करते हुए कहा कि यह काफी साहसिक और अलग विचार है और लोगों को इसके आगे के नतीजे का इंतजार रहेगा। वहीं कुछ लोगों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अगर यह तरीका सफल रहा तो दूसरे लोग भी पार्टनर तलाशने के लिए ऐसा फॉर्म बना सकते हैं।

    महिला के इस अनोखे प्रयोग ने यह जरूर दिखा दिया कि आज के डिजिटल दौर में प्यार और शादी के लिए पार्टनर तलाशने के तरीके कितने अलग हो सकते हैं। जहां लोग डेटिंग ऐप्स के जरिए रिश्ते तलाश रहे हैं, वहीं एरिन ने अपनी पसंद और उम्मीदों को सवालों के रूप में सामने रखकर संभावित पार्टनर चुनने का नया तरीका अपना लिया।