खांसी (Cough) एक सामान्य समस्या है, लेकिन यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं होती। यह शरीर का एक सुरक्षा तंत्र (Protective Reflex) है, जो गले और श्वसन मार्ग में मौजूद धूल, वायरस, बैक्टीरिया या बलगम को बाहर निकालने का काम करता है। हालांकि, जब खांसी बार-बार होने लगे, कई दिनों तक बनी रहे या इसके साथ बुखार, सांस लेने में तकलीफ या खून आने जैसी समस्या हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
इस लेख में जानिए खांसी के प्रकार, घरेलू उपाय, क्या खाना चाहिए, क्या नहीं खाना चाहिए और किन लक्षणों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
खांसी कितने प्रकार की होती है?
1. सूखी खांसी (Dry Cough)
इस प्रकार की खांसी में बलगम नहीं निकलता। गले में खराश, खुजली या जलन महसूस होती है। यह वायरल संक्रमण, एलर्जी, धूल, धुएं या एसिड रिफ्लक्स के कारण हो सकती है।
2. बलगम वाली खांसी (Wet/Productive Cough)
इसमें खांसी के साथ बलगम निकलता है। यह वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण, ब्रोंकाइटिस या अन्य श्वसन संक्रमण के कारण हो सकती है।
3. एलर्जिक खांसी
यह धूल, परागकण (Pollen), पालतू जानवरों के बाल, धुआं या अन्य एलर्जी पैदा करने वाले पदार्थों के संपर्क में आने से होती है।
खांसी का घरेलू इलाज
सूखी खांसी का घरेलू इलाज
1 चम्मच शहद में चुटकीभर हल्दी मिलाकर लें। (एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों को शहद न दें।)
दिन में 2-3 बार भाप (Steam) लें।
गुनगुना पानी पीते रहें।
धूल, धुआं और ठंडी हवा से बचें।
बलगम वाली खांसी का घरेलू इलाज
गुनगुने नमक वाले पानी से गरारे करें।
अदरक, तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा पी सकते हैं।
पर्याप्त मात्रा में गुनगुना पानी पिएं।
दिन में 2 बार भाप लें, जिससे बलगम पतला होकर आसानी से बाहर निकल सके।
रात में खांसी ज्यादा क्यों होती है?
कई लोगों की खांसी रात में बढ़ जाती है। इसके मुख्य कारण हैं—
लेटने पर गले में नाक का स्राव (Post Nasal Drip) आना।
एसिड रिफ्लक्स (Acid Reflux)।
कमरे की सूखी हवा।
एलर्जी।
बचाव कैसे करें?
सिर थोड़ा ऊंचा रखकर सोएं।
सोने से पहले हल्का भोजन करें।
पर्याप्त पानी पिएं।
जरूरत हो तो कमरे में ह्यूमिडिफायर का उपयोग करें।
खांसी में क्या खाना चाहिए?
✔️ गुनगुना पानी
✔️ हल्दी वाला दूध (यदि दूध से परेशानी न हो)
✔️ अदरक
✔️ तुलसी
✔️ शहद (1 वर्ष से अधिक उम्र में)
✔️ गर्म सूप
✔️ विटामिन C युक्त फल
खांसी में क्या नहीं खाना चाहिए?
बहुत ठंडा पानी
आइसक्रीम
कोल्ड ड्रिंक
अत्यधिक तला-भुना भोजन
ज्यादा मसालेदार खाना
धूम्रपान और शराब
क्या खांसी में एंटीबायोटिक लेनी चाहिए?
नहीं। अधिकांश मामलों में खांसी वायरल संक्रमण के कारण होती है, जिनमें एंटीबायोटिक असर नहीं करती। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेने से नुकसान हो सकता है और भविष्य में दवाएं कम प्रभावी हो सकती हैं।
एलर्जी की खांसी का इलाज
यदि खांसी बार-बार एलर्जी के कारण होती है, तो सबसे पहले एलर्जी के कारण की पहचान करना जरूरी है।
धूल और धुएं से बचें।
घर की नियमित सफाई करें।
आवश्यकता होने पर एलर्जी विशेषज्ञ से जांच कराएं।
डॉक्टर की सलाह के अनुसार उपचार लें।
टीबी की खांसी कैसे पहचानें?
यदि आपको निम्न लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें—
2–3 सप्ताह से अधिक लगातार खांसी
खांसी में खून आना
रात में ज्यादा पसीना आना
लगातार बुखार
तेजी से वजन कम होना
ऐसी स्थिति में जांच कराना जरूरी होता है।
डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?
निम्न परिस्थितियों में घरेलू उपचार पर निर्भर न रहें—
खांसी 2–3 सप्ताह से अधिक रहे।
तेज बुखार हो।
सांस लेने में तकलीफ हो।
सीने में दर्द हो।
खून वाली खांसी आए।
छोटे बच्चों, बुजुर्गों या गर्भवती महिलाओं में लगातार खांसी हो।
निष्कर्ष
खांसी का सही इलाज उसकी वजह पर निर्भर करता है। सामान्य वायरल खांसी में आराम, पर्याप्त पानी, भाप और कुछ घरेलू उपाय राहत दे सकते हैं। लेकिन यदि खांसी लंबे समय तक बनी रहे, बार-बार लौटे या गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत योग्य डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। बिना सलाह के एंटीबायोटिक या अन्य दवाओं का सेवन करने से बचें।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। किसी भी दवा या उपचार को शुरू करने से पहले योग्य चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।
झालावाड़.
जिले के सारोला थाना क्षेत्र के नूरजी गाडरवाड़ा गांव में रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली घटना सामने आई है. यहां आपसी पारिवारिक विवाद के चलते एक भतीजे ने अपने ही चाचा पर धारदार हथियार से जानलेवा हमला कर दिया. हमले में गंभीर रूप से घायल बुजुर्ग की इलाज के दौरान मौत हो गई. घटना के बाद आरोपी भतीजा मौके से फरार हो गया, जिसकी तलाश पुलिस कर रही है.
सारोला थाना पुलिस के अनुसार नूरजी गाडरवाड़ा गांव निवासी बुजुर्ग जगन्नाथ बैरवा का परिवार के कुछ सदस्यों के साथ किसी घरेलू बात को लेकर विवाद चल रहा था. इसी विवाद को लेकर परिवार के बीच बहस शुरू हो गई. देखते ही देखते कहासुनी इतनी बढ़ गई कि आरोपी भतीजे कुलदीप ने अपना आपा खो दिया और अपने काका जगन्नाथ बैरवा पर धारदार हथियार से हमला कर दिया. हमले के बाद जगन्नाथ बैरवा गंभीर रूप से घायल हो गए. घटना के बाद आसपास के लोगों और परिजनों में हड़कंप मच गया. परिजन तत्काल घायल अवस्था में उन्हें उपचार के लिए झालावाड़ जिला अस्पताल लेकर पहुंचे.
इलाज के दौरान बुजुर्ग ने तोड़ा दम
जिला अस्पताल में चिकित्सकों ने जगन्नाथ बैरवा की गंभीर हालत को देखते हुए उपचार शुरू किया, लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. डॉक्टरों द्वारा मृत घोषित किए जाने के बाद परिजनों में कोहराम मच गया. घटना की सूचना मिलते ही सारोला थाना पुलिस मौके पर पहुंची और घटनास्थल का निरीक्षण किया. पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर जिला अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया है. मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम की कार्रवाई के बाद शव परिजनों को सौंपा जाएगा. पुलिस ने परिजनों की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि घटना के पीछे पारिवारिक विवाद मुख्य कारण हो सकता है. पुलिस घटनाक्रम से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रही है. फिलहाल सारोला थाना पुलिस आरोपी भतीजे कुलदीप की तलाश में जुटी हुई है. पुलिस का कहना है कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद ही घटना के वास्तविक कारणों और पूरे घटनाक्रम की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी.
भारतीय भोजन में दही को बहुत पौष्टिक माना जाता है। रायता, लस्सी और छाछ के रूप में लोग इसका सेवन रोजाना करते हैं। लेकिन अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि क्या रात को दही खाना सही है?
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों के अनुसार, रात में दही खाने के कुछ फायदे भी हैं और कुछ नुकसान भी। आइए आसान भाषा में समझते हैं।
रात को दही खाने के फायदे
1. पाचन बेहतर बनाने में मददगार
दही में प्रोबायोटिक्स यानी अच्छे बैक्टीरिया पाए जाते हैं, जो पेट को स्वस्थ रखने और भोजन पचाने में मदद करते हैं।
2. कैल्शियम से भरपूर
दही में कैल्शियम और फॉस्फोरस अच्छी मात्रा में होता है, जिससे हड्डियां और दांत मजबूत रहते हैं।
3. अच्छी नींद में मदद
दही में मौजूद पोषक तत्व शरीर को रिलैक्स महसूस कराने में मदद कर सकते हैं, जिससे नींद बेहतर हो सकती है।
4. शरीर को ठंडक देना
गर्मी के मौसम में सीमित मात्रा में दही खाने से शरीर को ठंडक मिल सकती है।
रात को दही खाने के नुकसान
1. सर्दी और बलगम बढ़ सकता है
जिन लोगों को जल्दी सर्दी-जुकाम या खांसी होती है, उन्हें रात में दही खाने से परेशानी हो सकती है।
2. पेट भारी लगना
रात में ज्यादा मात्रा में दही खाने से अपच या पेट भारी होने की समस्या हो सकती है।
3. जोड़ों के दर्द में परेशानी
कुछ लोगों में रात के समय दही खाने से जोड़ों के दर्द या सूजन की समस्या बढ़ सकती है।
रात में दही खाने का सही तरीका
बहुत ठंडी दही न खाएं
दही में भुना जीरा या काली मिर्च मिला सकते हैं
कम मात्रा में सेवन करें
खट्टा दही रात में खाने से बचें
सर्दी-जुकाम होने पर दही न खाएं
निष्कर्ष
रात में दही खाना हर व्यक्ति के शरीर पर अलग असर कर सकता है। अगर आपको दही खाने से कोई परेशानी नहीं होती, तो सीमित मात्रा में सही तरीके से इसका सेवन किया जा सकता है। लेकिन जिन लोगों को खांसी, सर्दी या बलगम की समस्या रहती है, उन्हें रात में दही खाने से बचना चाहिए।
नोट: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
दिल्ली पुलिस की सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट पुलिस ने एक ऐसे अंतरराज्यीय चाइल्ड ट्रैफिकिंग सिंडिकेट का खुलासा किया है, जो गरीब और मजबूर परिवारों से नवजात बच्चों को लेकर उन्हें लाखों रुपये में निसंतान दंपतियों या बेटा चाहने वाले परिवारों को बेचता था. पुलिस की जांच में सामने आया है कि यह कोई छोटा-मोटा गिरोह नहीं, बल्कि कई राज्यों में फैला एक संगठित नेटवर्क था, जिसमें बिचौलिए, अस्पताल संचालक, लैब टेक्नीशियन, आशा वर्कर, ड्राइवर, बच्चों के सप्लायर, खरीदार दंपति और यहां तक कि कुछ मामलों में बच्चों के जैविक माता-पिता भी शामिल थे.
दिल्ली पुलिस के मुताबिक इस मामले में अब तक 23 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है. इनमें अस्पताल संचालक, बच्चे सप्लाई करने वाले एजेंट, खरीदार दंपति, बिचौलिए और जैविक माता-पिता शामिल हैं. वहीं, 9 मासूम बच्चों को इस नेटवर्क से मुक्त कराया गया है. पुलिस का कहना है कि जांच अभी जारी है और आने वाले दिनों में कई और गिरफ्तारियां हो सकती हैं.
एक आम नागरिक की सूचना से खुला पूरा नेटवर्क
डीसीपी रोहित राजबीर सिंह के मुताबिक पूरे मामले की शुरुआत किसी बड़ी एजेंसी की सूचना से नहीं बल्कि एक आम नागरिक की सतर्कता से हुई. एक व्यक्ति ने पुलिस को बताया कि पहाड़गंज इलाके में एक महिला अक्सर अलग-अलग नवजात बच्चों के साथ दिखाई देती है. कभी उसके पास लड़का होता, कभी लड़की. कुछ दिनों बाद वही महिला फिर किसी दूसरे बच्चे के साथ नजर आती थी. उसकी गतिविधियां संदिग्ध लगीं तो सूचना पुलिस तक पहुंची.
सूचना मिलते ही सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट की ऑपरेशन यूनिट सक्रिय हो गई. पुलिस ने सबसे पहले पहाड़गंज और आसपास के इलाके के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू की. कई दिनों तक फुटेज देखने के बाद महिला की पहचान ज्योति उर्फ कमलेश के रूप में हुई.
सीसीटीवी के बाद शुरू हुई गुप्त निगरानी
महिला की पहचान होने के बाद पुलिस ने जल्दबाजी में कार्रवाई नहीं की. उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर रखी गई. उसके मिलने-जुलने वाले लोगों की जानकारी जुटाई गई और यह पता लगाने की कोशिश की गई कि वह बच्चों के साथ आखिर करती क्या है. जांच के दौरान पता चला कि वह नवजात बच्चों के सौदे में शामिल है. इसके बाद पुलिस ने उसे रंगे हाथों पकड़ने के लिए डिकॉय ऑपरेशन की योजना बनाई.
पुलिस बनी ग्राहक, 20 हजार में तय हुई पहली डील
एक पुलिसकर्मी को ग्राहक बनाकर ज्योति से संपर्क कराया गया. बातचीत के दौरान ज्योति ने दावा किया कि वह नवजात बच्चा उपलब्ध करा सकती है. दोनों के बीच सौदा तय हुआ और आरोपी ने 20 हजार रुपये एडवांस मांगे. इसके बाद पुलिस ने पूरी योजना तैयार की और तय समय पर आर.के. आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास जाल बिछा दिया.
5 जून को रंगे हाथों पकड़े गए आरोपी
5 जून 2026 को ज्योति उर्फ कमलेश अपने दो साथियों शालू और ललित के साथ चार से पांच दिन के एक नवजात लड़के को लेकर आर.के. आश्रम मेट्रो स्टेशन पहुंची. जैसे ही बच्चे को ग्राहक के हवाले किया जाने लगा, पहले से मौजूद पुलिस टीम ने तीनों को घेर लिया. मौके से चार-पांच दिन का नवजात सुरक्षित बरामद कर लिया गया. पुलिस ने 20 हजार रुपये की टोकन राशि भी बरामद की. इसी मामले में पहाड़गंज थाने में बीएनएस और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई.
पूछताछ में खुला करोड़ों के नेटवर्क का राज
शुरुआत में पुलिस को लगा कि यह सिर्फ एक बच्चे की खरीद-बिक्री का मामला है. लेकिन जैसे-जैसे तीनों आरोपियों से पूछताछ आगे बढ़ी, पुलिस के सामने हैरान करने वाली जानकारी आती गई. पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह कई राज्यों में सक्रिय है और पिछले करीब डेढ़ साल से बच्चों की खरीद-फरोख्त कर रहा है.
इसके बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए एडिशनल डीसीपी-2 प्रशांत चौधरी की अगुवाई में विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया. इस टीम में एसीपी, एसएचओ, स्पेशल स्टाफ, महिला पुलिस अधिकारी और कानूनी विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया, ताकि जांच के दौरान किसी भी कानूनी पहलू की अनदेखी न हो.
सात राज्यों तक फैला था नेटवर्क
एसआईटी ने दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में एक साथ जांच शुरू की. मोबाइल लोकेशन, बैंक खातों, सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान और तकनीकी निगरानी के जरिए एक-एक कड़ी जोड़ी गई धीरे-धीरे पुलिस के सामने पूरा नेटवर्क खुलता चला गया.
हर सदस्य की अलग जिम्मेदारी
जांच में पता चला कि गिरोह पूरी तरह संगठित तरीके से काम करता था.
कुछ लोग गरीब परिवारों की तलाश करते थे.
कुछ लोग गर्भवती महिलाओं पर नजर रखते थे.
कुछ लोग अस्पतालों से संपर्क रखते थे.
कुछ नवजात बच्चों को एक राज्य से दूसरे राज्य तक पहुंचाते थे.
कुछ लोग खरीदार ढूंढते थे.
कुछ बैंक खातों के जरिए पैसों का लेनदेन संभालते थे.
जबकि कुछ लोग फर्जी दस्तावेज तैयार कराने का काम करते थे.
यानी पूरे नेटवर्क में हर व्यक्ति की भूमिका पहले से तय थी.
ज्योति थी पूरे नेटवर्क की सबसे अहम कड़ी
पुलिस जांच में सामने आया कि ज्योति उर्फ कमलेश इस पूरे नेटवर्क की सबसे महत्वपूर्ण सदस्य थी. वह हरियाणा में आशा वर्कर के रूप में काम करती थी. लेकिन पुलिस के मुताबिक उसकी असली भूमिका बच्चों की खरीद-फरोख्त कराना थी. वह अलग-अलग राज्यों से बच्चों की व्यवस्था करती और फिर उन्हें खरीदने वाले परिवारों तक पहुंचाती थी. दिल्ली पुलिस के मुताबिक ज्योति पहले भी मानव तस्करी के मामलों में गिरफ्तार हो चुकी है. उसके खिलाफ पंजाबी बाग थाने में आईपीसी की धारा 363, 370, 370A और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज है.
प्रतिभा और विपिन की गिरफ्तारी से मिले नए सुराग
ज्योति से पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रतिभा और विपिन को गिरफ्तार किया. दोनों एक और बच्चे की डील करने जा रहे थे. जब पुलिस ने उन्हें पकड़ा तो उनके पास से 2 लाख 92 हजार 400 रुपये नकद मिले. पूछताछ में पता चला कि यह रकम नवजात बच्चे की खरीद के लिए रखी गई थी. प्रतिभा पेशे से फ्रीलांस लैब टेक्नीशियन थी और हीरा मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल से जुड़ी हुई थी. वहीं विपिन पूरे नेटवर्क का ड्राइवर था. वह बच्चों और आरोपियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम करता था.
अस्पताल से लेकर आदिवासी गांवों तक फैला था नेटवर्क
जांच आगे बढ़ी तो पुलिस के सामने सबसे चौंकाने वाला खुलासा दिल्ली के बेगमपुर स्थित हीरा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल को लेकर हुआ. पुलिस का आरोप है कि यह अस्पताल सिर्फ इलाज का केंद्र नहीं था, बल्कि नवजात बच्चों की अवैध खरीद-फरोख्त के इस नेटवर्क की एक अहम कड़ी बन चुका था. जांच के मुताबिक अस्पताल की संचालक डॉ. विवेकी कपूर गिरोह के अन्य सदस्यों के संपर्क में थी. आरोप है कि अस्पताल में ऐसे नवजात बच्चों को रखा जाता था, जिन्हें गिरोह विभिन्न राज्यों से लेकर आता था.
पुलिस का दावा है कि अस्पताल में इलाज या आईवीएफ और स्त्री रोग संबंधी परामर्श के लिए आने वाले निसंतान दंपतियों की पहचान की जाती थी और बाद में उन्हें अवैध तरीके से बच्चे उपलब्ध कराने की पेशकश की जाती थी. पुलिस का आरोप है कि अस्पताल के जरिए कई सौदे तय हुए और बच्चों के जन्म से जुड़े दस्तावेज, अस्पताल रिकॉर्ड और अन्य कागजात तैयार कर उनकी पहचान बदलने की कोशिश भी की गई. फिलहाल अस्पताल से बरामद दस्तावेजों, जन्म रिकॉर्ड और मेडिकल फाइलों की फोरेंसिक जांच कराई जा रही है.
गुरुग्राम से गुजरात तक फैला था सप्लाई नेटवर्क
जांच में सामने आया कि गिरोह का सबसे बड़ा सप्लायर साहिबा उर्फ कालिया गमार और उसका सहयोगी शंकर गमार थे. दोनों गुजरात और राजस्थान के गरीब तथा आदिवासी इलाकों में जाकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की तलाश करते थे. पुलिस के मुताबिक कई परिवारों को कुछ लाख रुपये का लालच देकर उनके नवजात बच्चे ले लिए जाते थे. इसके बाद बच्चों को दिल्ली और अन्य राज्यों में भेज दिया जाता था, जहां पहले से तैयार खरीदार उनका इंतजार करते थे.
तकनीकी निगरानी और लगातार पीछा करने के बाद पुलिस ने शंकर गमार और अन्य आरोपियों तक पहुंच बनाई. गुजरात के साबरकांठा जिले से जैविक माता-पिता कांतीभाई गमार और सुग्नाबेन गमार को भी गिरफ्तार किया गया. जांच में सामने आया कि उन्होंने पैसों के बदले अपना नवजात बच्चा गिरोह को सौंप दिया था. बाद में उसी बच्चे को कई गुना अधिक कीमत पर दूसरे परिवार को बेच दिया गया. पुलिस का दावा है कि कालिया गमार अब तक 30 से अधिक बच्चों को इस नेटवर्क तक पहुंचा चुका है. उसके पूरे नेटवर्क की जांच अभी जारी है.
गरीबी, मजबूरी और सामाजिक दबाव का उठाया जाता था फायदा
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह केवल गरीब परिवारों को ही निशाना नहीं बनाता था, बल्कि उन महिलाओं की भी पहचान करता था जो अविवाहित थीं या किसी कारणवश बच्चे का पालन-पोषण नहीं करना चाहती थीं. ऐसे ही एक मामले में दिल्ली की रहने वाली एक युवती ने अविवाहित होने के कारण बच्चा अपने पास रखने से इनकार कर दिया. पुलिस के मुताबिक डिलीवरी के बाद बच्चे को मां को वापस देने के बजाय गिरोह के कब्जे में रखा गया और बाद में उसे दूसरे परिवार को बेच दिया गया. जैविक मां को कोई पैसा भी नहीं दिया गया.
डिमांड पहले, बच्चा बाद में
पुलिस की जांच में सबसे अहम खुलासा यह हुआ कि यह गिरोह पहले बच्चे नहीं ढूंढता था, बल्कि पहले ग्राहक तलाशता था. जिन दंपतियों की संतान नहीं थी, या जिनके घर पहले से बेटियां थीं और वे बेटा चाहते थे, उनसे संपर्क किया जाता था. जब खरीदार तैयार हो जाता था, तब गिरोह अपने नेटवर्क के जरिए नवजात बच्चे की व्यवस्था करता था. यानी पूरा कारोबार डिमांड एंड सप्लाई के मॉडल पर चल रहा था.
बच्चों की कीमत कैसे तय होती थी?
पुलिस जांच के मुताबिक गिरोह गरीब परिवारों से नवजात बच्चों को डेढ़ से दो लाख रुपये में हासिल करता था. इसके बाद वही बच्चा 6 से 8 लाख रुपये में बेच दिया जाता था. कुछ मामलों में कीमत 9 लाख रुपये तक पहुंच जाती थी. कीमत इस बात पर निर्भर करती थी कि बच्चा कितना छोटा है, लड़का है या लड़की, खरीदार कितना संपन्न है और उसकी जरूरत कितनी ज्यादा है.
बेटे की चाह में बने आरोपी
पुलिस जांच में कई ऐसे परिवार सामने आए जो वर्षों से निसंतान थे, जबकि कुछ परिवारों के पास पहले से बेटी थी, लेकिन वे बेटा चाहते थे. रोहिणी निवासी गरिमा जैन और उसके परिवार पर आरोप है कि उन्होंने करीब 8 लाख रुपये देकर नवजात बच्चा लिया.
ऋषिकेश की केतकी गुप्ता ने कथित तौर पर लगभग 4 लाख रुपये देकर एक बच्चा खरीदा.
हरिद्वार के अमित प्रताप सिंह और उनकी पत्नी अभा सिंह पर लगभग 5 लाख रुपये देकर बेटा खरीदने का आरोप है.
ग्वालियर निवासी मुकेश पाल और रीमा पाल को दो बच्चों की खरीद के आरोप में गिरफ्तार किया गया.
पानीपत के सनी अरोड़ा, रितु अरोड़ा और सरिता के खिलाफ भी बच्चों की खरीद के आरोप में कार्रवाई की गई.
पुलिस ने साफ किया है कि बच्चों की खरीद-फरोख्त में शामिल खरीदारों को भी आरोपी बनाया गया है.
चार और बच्चों का रेस्क्यू, कुल 9 मासूम सुरक्षित
ताजा कार्रवाई में पुलिस ने चार और बच्चों को सुरक्षित बरामद किया. रोहिणी से 16 दिन का एक नवजात लड़का, ऋषिकेश से एक महीने का नवजात. मथुरा से लगभग एक साल एक महीने का बच्चा और हरिद्वार से करीब आठ महीने का बच्चा बरामद किया गया है.
इससे पहले भी पांच बच्चों को हरियाणा, पानीपत और ग्वालियर समेत विभिन्न स्थानों से मुक्त कराया जा चुका था. इनमें 27 दिन के जुड़वां बच्चों सहित कई नवजात शामिल थे. पुलिस के अनुसार रेस्क्यू किए गए चार बच्चे आदिवासी परिवारों से जुड़े हुए हैं.
अब तक कुल 9 बच्चों को सुरक्षित बचाया जा चुका है. सभी बच्चों को CWC की निगरानी में भेजा गया है. रेस्क्यू किए गए सभी बच्चों को बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee) के समक्ष पेश किया गया. समिति के निर्देश पर सभी बच्चों की देखभाल, चिकित्सा, सुरक्षा और पुनर्वास की व्यवस्था की गई है. पुलिस जैविक माता-पिता की पहचान, डीएनए मिलान और कानूनी प्रक्रिया भी पूरी कर रही है.
IVF और सरोगेसी का एंगल नहीं मिला
जांच के दौरान पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक आईवीएफ या सरोगेसी से जुड़े किसी संगठित रैकेट के सबूत नहीं मिले हैं. पुलिस के अनुसार आरोपी सीधे जैविक माता-पिता से बच्चे लेकर उन्हें जरूरतमंद दंपतियों को बेचते थे. यानी पूरा नेटवर्क केवल अवैध खरीद-फरोख्त पर आधारित था.
बैंक खातों से खुल रही है करोड़ों की मनी ट्रेल
पुलिस को जांच के दौरान कई बैंक खातों में लाखों रुपये के लेनदेन के सबूत मिले हैं. अब इन खातों की गहन जांच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस पूरे नेटवर्क से किसने कितना पैसा कमाया और रकम किन-किन लोगों तक पहुंची. मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड, व्हाट्सऐप चैट, डिजिटल पेमेंट, अस्पताल रिकॉर्ड और जन्म प्रमाणपत्र से जुड़े दस्तावेज भी जांच के दायरे में हैं.
अभी और बढ़ सकती है गिरफ्तारियों की संख्या
दिल्ली पुलिस का कहना है कि यह जांच अभी शुरुआती चरण में है. कई अन्य राज्यों में भी इस गिरोह के तार मिलने की संभावना है. पुलिस उन अस्पतालों, एजेंटों, ट्रांसपोर्टरों, दस्तावेज तैयार करने वालों और अन्य सहयोगियों की पहचान कर रही है जो इस नेटवर्क का हिस्सा रहे हैं. अधिकारियों के मुताबिक आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं. साथ ही कई और बच्चों को इस गिरोह के चंगुल से मुक्त कराए जाने की संभावना है.
दिल्ली पुलिस का मानना है कि यह हाल के सालों में सामने आए नवजात बच्चों की तस्करी के सबसे संगठित और बड़े मामलों में से एक है, जिसमें गरीबी, सामाजिक दबाव, बेटे की चाह और अवैध कमाई की लालच ने मिलकर मासूम बच्चों को खरीद-फरोख्त का सामान बना दिया था.
आजकल की तेज भागदौड़ भरी जिंदगी में ज्यादातर लोग तनाव, थकान और कमजोरी जैसी समस्याओं से परेशान रहते हैं। काम का दबाव, कम नींद और गलत खानपान धीरे-धीरे शरीर और दिमाग दोनों को कमजोर बना देते हैं। ऐसे समय में आयुर्वेद में इस्तेमाल होने वाली एक जड़ी-बूटी का नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिलता है — अश्वगंधा।
सदियों से आयुर्वेद में अश्वगंधा का उपयोग शरीर को ताकत देने और मानसिक तनाव कम करने के लिए किया जाता रहा है। यही वजह है कि आज भी बहुत लोग इसे अपनी डेली लाइफ में इस्तेमाल करते हैं।
अश्वगंधा क्या है?
अश्वगंधा एक आयुर्वेदिक औषधीय पौधा है, जिसकी जड़ का इस्तेमाल सबसे ज्यादा किया जाता है। इसे “इंडियन जिनसेंग” भी कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे शरीर की ऊर्जा बढ़ाने और कमजोरी दूर करने वाली जड़ी-बूटी माना गया है।
तनाव और चिंता कम करने में मददगार
अगर कोई व्यक्ति ज्यादा तनाव, चिंता या मानसिक दबाव महसूस करता है, तो अश्वगंधा उसके लिए फायदेमंद हो सकता है। कुछ लोगों का मानना है कि इसके सेवन से दिमाग शांत महसूस करता है और स्ट्रेस कम करने में मदद मिल सकती है।
शरीर को ताकत और ऊर्जा देने में सहायक
बार-बार थकान महसूस होना, कमजोरी लगना या शरीर में एनर्जी कम महसूस होना आजकल आम समस्या बन चुकी है। अश्वगंधा शरीर की ताकत बढ़ाने और कमजोरी कम करने में मदद कर सकता है। इसी कारण कई लोग इसे दूध के साथ लेना पसंद करते हैं।
अच्छी नींद लाने में मदद कर सकता है
जिन लोगों को रात में ठीक से नींद नहीं आती या बार-बार नींद टूटती है, उनके लिए भी अश्वगंधा फायदेमंद माना जाता है। यह शरीर को रिलैक्स महसूस कराने में मदद कर सकता है।
इम्यूनिटी मजबूत करने में सहायक
अश्वगंधा में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में मदद कर सकते हैं। मौसम बदलने पर बार-बार बीमार पड़ने वाले लोग भी इसका सेवन करते हैं।
पुरुषों की सेहत के लिए क्यों माना जाता है फायदेमंद?
आयुर्वेद में अश्वगंधा को पुरुषों की ताकत और स्टैमिना बढ़ाने वाली औषधि माना गया है। कई लोग इसे शरीर की कमजोरी दूर करने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
अश्वगंधा लेने का सही तरीका
अश्वगंधा पाउडर को गुनगुने दूध के साथ लिया जा सकता है
रात को सोने से पहले इसका सेवन करना बेहतर माना जाता है
जरूरत से ज्यादा मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए
किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होता है
किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?
गर्भवती महिलाएं
हाई या लो ब्लड प्रेशर वाले लोग
गंभीर बीमारी से परेशान लोग
जो लोग रोजाना दवाइयां लेते हैं
ऐसे लोगों को बिना डॉक्टर की सलाह के इसका सेवन नहीं करना चाहिए।
निष्कर्ष
अश्वगंधा आयुर्वेद की एक लोकप्रिय और उपयोगी जड़ी-बूटी मानी जाती है। सही तरीके और सही मात्रा में सेवन करने पर यह तनाव कम करने, शरीर को ताकत देने और ऊर्जा बढ़ाने में मदद कर सकती है।
हालांकि, किसी भी आयुर्वेदिक चीज का सेवन करने से पहले अपनी सेहत के अनुसार सलाह लेना जरूरी होता है।
शिलाजीत ऊँचे पर्वतों पर पत्थर की दरारों में पाया जाना वाला गोंद जैसा पदार्थ है। साधारण जनता इसे केवल यौन क्षमता बढ़ाने की दवाई के नाम से जानती है जबकि यह बहुत से गंभीर रोगों की शानदार औषधि भी है। आजकल शिलाजीत के लिए बाजार में बहुत से विज्ञापन चल रहे हैं जिसमें शिलाजीत के बारे में अधूरी जानकारी दी जाती है। आज जानिये शिलाजीत के बारे सब बातें।
शिलाजीत कैसे पैदा होती है –
शिलाजीत उन पहाड़ी स्थानों पर होती है जहाँ डंडा थोर, तिपतिया, दाढ़ी घास, मोस प्रजाति के पौधे, थूजा, मर्केन्शिया , हार्न वेर्ट, रीसेल के पौधे बहुतायत में पाए जाते हैं। तेज धूप पड़ने पर इन पौधे से गोंद निकलता हैं जो पत्थर के ऊपर से बहता हुआ पहाड़ की दरारों में जाकर सूखकर जम जाता हैं। यह गोंद पत्थर के संपर्क में आकर पत्थर के अंदर मौजूद खनिज को अपने साथ ले लेती है। इसी गोंद की अशुद्ध शिला जीत कहते है। बाजार में इसे ही बेचा जाता है।
अशुद्ध शिलाजीत से शुद्ध शिलाजीत कैसे बनाते हैं?
अशुद्ध शिलाजीत में गोंद, मिटटी, पत्थर, घास, पौधे के अवशेष सहित तमाम गन्दगी रहती है। इसे त्रिफला के गर्म काढ़े में 12 से 18 घंटे तक भिगोया जाता है। जो हिस्सा पानी में घुलता है उसे बाद में पकाकर पानी समाप्त कर सूखा लिया जाता है। इसे शुद्ध शिलाजीत कहते हैं। सीस शुद्ध शिलाजीत में विभिन्न जड़ी बूटियां मिलाकर टेबलेट, सिरप, कैप्सूल, मलहम आदि बनाये जाते हैं।
शिलाजीत में क्या होता है?
शिलाजीत में पौधे के गोंद के अनुरूप विभिन्न पदार्थ होते हैं। जटिल रूप से इसके अंदर केल्सियम अधिक मात्रा में होता है। साथ ही फुलविक एसिड, हुमिक एसिड, प्राकृतिक स्टेरॉयड, चिकनाई , प्रोटीन , विटामिन, एलुमिनियम, मेगनीसियम, आयरन पाया जा सकता है। अच्छी शिलाजीत उसे कहते हैं जो ऐसे स्थान से ली गयी हो जहाँ ऊपर बताये गए पौधे अच्छी मात्रा में हो और पहाड़ पर सीधी धूप पड़ती हो।
शिलाजीत कहाँ पैदा होती है ?
शिलाजीत की सबसे अधिक प्राप्ति रूस से होती है उसके बाद पकिस्तान के हिस्से वाले कश्मीर, तिब्बत में होती है। बहुत थोड़ी मात्रा में लदाख, कश्मीर में मिलती है। वर्तमान में भारत में शिलाजीत पाकिस्तान से चीन के रास्ते आती है।
शिलाजीत को किन रोगों में उपयोग करते हैं?
शिलाजीत को पथरी, सूजन, डाइबिटीज, पेट और आँतों के घाव, शुक्राणु समस्या में अन्य दवाइओं के साथ मिश्रण के रूप में प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त यह इम्युनिटी बढ़ाने, शरीर को पोषण देने, कमजोरी दूर करने, यौन शक्ति वर्धन, सप्लीमेंट के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।
कितनी मात्रा में सेवन करना चाहिए?
शिलाजीत की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति की उम्र, बीमारी, प्रकृति (तासीर ) के अनुसार निर्धारित की जाती है। जिसे केवल पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सक ही निर्धारत कर सकता है। मोटे तौर पर 250 मिलीग्राम से लेकर 1500 मिलीग्राम प्रतिदिन के बीच में निर्धारत की जा सकती है।
शिलाजीत के साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं ?
प्रत्येक औषधि या पदार्थ के अपने साइड इफेक्ट्स भी होते हैं। शिलाजीत के उपयोग से पेट में जलन, दिल धड़कन का का अनियमित होना, पेट में भारीपन, बदहजमी, दस्त, छाती में दर्द, चक्कर, चेहरे के अंगों में सूजन आदि अनुभव हो सकते हैं। यदि ऐसा कोई लक्षण अनुभव हो रहा है तो औषध उपयोग को बंद कर तत्काल चिकित्सक परामर्श लिया जांचा चाहिए। इनमे से अधिकतर लक्षण ख़राब क्वालिटी की शिलाजीत या शिलाजीत के तत्वों से एलर्जी होने पर देखे गए हैं।
शिलाजीत के सेवन के समय कोई परहेज आवश्यक होता है ?
शिलाजीत के उपयोग के दौरान कुलथी दाल, शराब, अधिक मात्रा में चाय / काफी, अचार, सिरका से बने पदार्थ उपयोग नहीं किये जाने चाहिए।
शिलाजीत के सेवन से कितने समय में लाभ प्राप्त होता है ?
स्वस्थ व्यक्तियों को योग्य आयुर्वेद चिकित्सक के परामर्श से इसका सेवन कम से कम छह माह तक करना चाहिए। रोगियों में सेवन अवधि केवल आयुर्वेद चिकित्सक तय कर सकते हैं।
शिलाजीत कहाँ से लेनी चाहिए ?
शिलाजीत वास्तव में एक औषधि है। साइड इफेक्ट रहित, उचित लाभ के लिए अच्छी क्वालिटी, सही शुद्धिकरण, सही मात्रा आदि का निर्धारण बहुत आवश्यक है। यह वास्तव में एक सप्लीमेंट नहीं है। इसलिए किसी योग्य आयुर्वेद चिकित्सक से परामर्श के पश्चात ही उचित औषध को खरीदना एवं प्रयोग करना चाहिए।
17 साल की सारिका पढ़ाई के लिए दिल्ली के एक पीजी में रहती है। उसके साथ रहने वाले लोग जानते हैं कि उसे साफ-सफाई का बेहद ध्यान रहता है। वह दिन में कई बार हाथ धोती है, बार-बार किचन में जाकर गैस सिलेंडर चेक करती है और घर का ताला दो-तीन बार खींचकर देखने के बाद ही उसे तसल्ली मिलती है। आसपास के लोग उसकी इन आदतों को ‘परफेक्शनिज्म’ (हर काम एकदम सही करना) मानते हैं। लेकिन आप जानते हैं कि इस तरह का व्यवहार और विचार कोई आदत नहीं बल्कि एक मानसिक विकार Obsessive-Compulsive Disorder (OCD) हो सकता है जो प्रभावित इंसान की पढ़ाई, नौकरी या सामाजिक रिश्तों में बाधा बनता है। इस परेशानी से ग्रसित इंसान को किसी काम को बार-बार दोहराने के बाद भी मानसिक संतुष्टि महसूस नहीं होती?
फोर्टिस हेल्थकेयर में अदायु माइंडफुलनेस हॉस्पिटल में सलाहकार मनोचिकित्सक डॉ. नेहा अग्रवाल ने बताया अक्सर लोग इसे केवल एक आदत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा एक विकार है, जो समय के साथ व्यक्ति के आत्म-विश्वास और कार्यक्षमता को कमजोर कर देता है। आखिर OCD क्या है, इसके शुरुआती लक्षण क्या हैं, यह क्यों होता है और मेडिकल साइंस में इसका क्या इलाज है? आइए मानसिक रोग विशेषज्ञ (Psychologist) से जानते हैं इसके पीछे की पूरी सच्चाई।
OCD क्या है?
डॉ. अग्रवाल ने बताया Obsessive–compulsive disorder (OCD) यानी ऑब्सेसिव-कम्पल्सिव डिसऑर्डर एक ऐसा मानसिक विकार है जिसमें व्यक्ति के मन में बार-बार ऐसे अनचाहे विचार (Obsessions), तस्वीरें या आशंकाएं आती हैं, जिन्हें वह चाहकर भी रोक नहीं पाता। इन विचारों से होने वाली घबराहट और बेचैनी को कम करने के लिए वह कुछ काम बार-बार करता है, जिन्हें कम्पल्शन (Compulsions) कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर बार-बार हाथ धोना, ताला जांचना या गैस बंद है या नहीं, इसे बार-बार चेक करना।
आदत और OCD में क्या अंतर है?
हर व्यक्ति में कुछ न कुछ आदतें या परफेक्शनिस्ट व्यवहार हो सकते हैं, लेकिन इससे यह नहीं कहा जा सकता कि उसे OCD है। डॉक्टर के अनुसार, जब ये विचार और व्यवहार इतने बढ़ जाएं कि व्यक्ति की पढ़ाई, नौकरी, सामाजिक जीवन या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगें, तभी इसे बीमारी माना जाता है।
क्या परफेक्शनिज्म भी OCD का हिस्सा है?
परफेक्शनिज्म OCD का एक लक्षण हो सकता है, लेकिन हर परफेक्शनिस्ट व्यक्ति OCD का मरीज नहीं होता। यदि परफेक्शनिज्म के साथ अन्य ऑब्सेसिव विचार और बार-बार किए जाने वाले व्यवहार भी मौजूद हों, तो डॉक्टर OCD की संभावना पर विचार करते हैं।
भारत में OCD कितना आम है?
डॉक्टर के अनुसार, OCD एक आम मानसिक स्वास्थ्य विकार है। मनोचिकित्सा विभागों में इसके मरीज अक्सर देखने को मिलते हैं। हालांकि, लोगों में अभी भी इसके सभी लक्षणों के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं है। अधिकांश लोग केवल बार-बार हाथ धोने को ही OCD समझते हैं, जबकि इसके और भी कई लक्षण हैं।
OCD के सामान्य लक्षण क्या हैं?
OCD के लक्षण व्यक्ति-व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। कुछ सामान्य लक्षण हैं
बार-बार हाथ धोना।
बार-बार ताला, गैस या बिजली का स्विच चेक करना।
चीजों को बार-बार गिनना।
पढ़ाई करते समय एक ही पैराग्राफ को बार-बार पढ़ना।
किसी काम को बार-बार दोहराना क्योंकि तसल्ली नहीं होती।
मन में लगातार अनचाहे और परेशान करने वाले विचार आना।
OCD किस उम्र के लोगों में हो सकता है?
डॉक्टर के मुताबिक, OCD के लक्षण अक्सर किशोरावस्था (Teenage) में दिखाई देने लगते हैं, जब व्यक्तित्व का विकास हो रहा होता है। हालांकि, कुछ मामलों में यह बचपन में भी शुरू हो सकता है और कुछ लोगों में वयस्क होने के बाद भी इसकी शुरुआत होती है।
OCD होने के पीछे क्या कारण हैं?
OCD के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इसमें आनुवंशिक (Genetic), पारिवारिक (Hereditary) और पर्यावरणीय (Environmental) कारकों की भूमिका होती है। इसके अलावा मस्तिष्क में सेरोटोनिन (Serotonin) और नोरएपिनेफ्रीन (Norepinephrine) जैसे रसायनों का असंतुलन भी इस बीमारी से जुड़ा माना जाता है।
क्या हल्के OCD को नजरअंदाज करना चाहिए?
यदि किसी व्यक्ति में OCD के हल्के लक्षण हैं और वह अपनी दिनचर्या सामान्य रूप से संभाल पा रहा है, तब भी उन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर का कहना है कि समय के साथ यह समस्या बढ़ सकती है। शुरुआती अवस्था में इलाज शुरू करने से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
OCD का रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ता है?
OCD व्यक्ति की एकाग्रता (Concentration), याददाश्त (Memory) और कार्यक्षमता (Productivity) को प्रभावित कर सकता है। मरीज का काफी समय बार-बार एक ही काम करने या एक ही विचार में उलझे रहने में निकल जाता है। गंभीर मामलों में इसका असर पारिवारिक रिश्तों, नौकरी और पढ़ाई पर भी पड़ सकता है।
क्या OCD सिर्फ साफ-सफाई तक सीमित है?
अक्सर लोगों का मानना है कि OCD सिर्फ साफ-सफाई तक ही सीमित है लेकिन ऐसा नहीं है। OCD केवल हाथ धोने या सफाई से जुड़ा नहीं है। कुछ लोगों को बार-बार यह डर सताता है कि उन्होंने कोई गलती कर दी है, किसी को नुकसान पहुंचा दिया है या कोई काम ठीक से नहीं हुआ। कुछ मरीजों में धार्मिक, नैतिक या हिंसक विचार भी बार-बार आ सकते हैं, जिन्हें वे खुद भी गलत मानते हैं।
OCD का इलाज कैसे किया जाता है?
यदि बीमारी शुरुआती या हल्की अवस्था में है, तो मनोवैज्ञानिक (Psychologist) द्वारा दी जाने वाली काउंसलिंग और साइकोथेरेपी से काफी लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि बीमारी मध्यम या गंभीर हो जाए और व्यक्ति अपने विचारों या व्यवहार पर नियंत्रण न रख पाए, तो मनोचिकित्सक (Psychiatrist) दवाइयों की सलाह देते हैं।
क्या OCD पूरी तरह ठीक हो सकता है?
डॉक्टर के अनुसार अधिकांश मरीज सही इलाज से काफी हद तक ठीक हो जाते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में OCD दवाइयों से भी नियंत्रित नहीं हो पाता, जिसे ‘रेजिस्टेंट OCD’ कहा जाता है। ऐसे मामलों में rTMS (Repetitive Transcranial Magnetic Stimulation) और Modified ECT जैसी न्यूरो मॉड्यूलेशन तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?
यदि बार-बार आने वाले विचार, डर या दोहराए जाने वाले व्यवहार आपकी पढ़ाई, नौकरी, रिश्तों या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो उन्हें सामान्य आदत समझकर नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में जल्द से जल्द मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। शुरुआती पहचान और समय पर इलाज से OCD को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी विशेषज्ञ से हुई बातचीत पर आधारित है और यह किसी भी प्रकार की चिकित्सा सलाह, निदान (Diagnosis) या उपचार (Treatment) का विकल्प नहीं है।
पेट की रहस्यमयी गांठें, अगर पेट में बार बार दर्द, दस्त होना, पेट खराब रहना, बार बार जुकाम -बुखार – खांसी – गले की समस्या रहती है और पेट का अल्ट्रासाउंड कराने पर mesenteric lymphedinitis (पेट में गांठे) आती हैं। आइए जानते इस बीमारी की विस्तृत जानकारी।
लिम्फ़ सिस्टम क्या होती है शरीर में जिस तरह रक्त के संचरण के लिए नसों का नेटवर्क होता है उसी तरह शरीर में लिम्फ के संचार के लिए लिम्फ सिस्टम होता है। इस सिस्टम में पूरे शरीर में जगह जगह गांठें होती हैं। जिनमें लिम्फ़ इकट्ठा रहता है। इन गांठों को lymph nodes कहते हैं।
लिम्फ़ क्या होता है यह एक सफेद गाढ़ा तरल होता है जिसमें शरीर को विभिन्न वायरस, बैक्टीरिया, फंगस से बचाती है। यह एक प्रकार से शरीर के रोग से लड़ने के तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पूरे शरीर में बहता है।
लिम्फ नोड्स क्या होते हैं? लिम्फ नोड्स शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली (immune system) का हिस्सा होते हैं। ये छोटे-छोटे, बीज के आकार की ग्रंथियाँ होती है जो शरीर मे संक्रमण से लड़ने मे सहायता करती हैं। पेट में जो लिंफ नोड्स होते हैं, उन्हें मेसेंटरिक लिम्फ नोड्स कहा जाता है।
लिम्फ़ नोड्स में सूजन lymphadinitis के कौन कौन से कारण होते हैं
घर से बाहर का खाना।
अस्वच्छ भोजन। •बहुत ठंडा पानी पीना •देर से तथा असमय भोजन करना
रात को देर तक जागना, नींद की कमी, अत्यधिक चिंता और तनाव •एलोपैथिक दवाओं का निरंतर प्रयोग करना
वायरल संक्रमण
बैक्टेरियल संक्रमण
श्वास प्रणाली में संक्रमण
टॉन्सिल या गले का संक्रमण
मेसेंटरिक लिम्फैडेनाइटिस – मेसेंटरिक लिम्फैडेनाइटिस एक ऐसी स्थिति है जिसमें पेट में मौजूद लिंफ नोड्स (गाँठें) सूज जाती हैं। यह समस्या अक्सर बच्चों और किशोरों में देखी जाती है, लेकिन कभी-कभी युवाओं को भी हो सकती है।
मेसेंटरिक लिम्फैडेनाइटिस के लक्षण –
पेट दर्द,
बुखार,
उल्टी, जी मचलना,
खांसी और गले में खराश होना,
दस्त या कब्ज़ का होना
क्या यह कैंसर हो सकता है? सामान्यतया यह कैंसर नहीं होता है लेकिन इलाज में लापरवाही, बिना चिकित्सक की सलाह के दवाईयां लेना, परहेज नहीं करना, इम्यून सिस्टम का अधिक कमजोर होने से यह कैंसर में बदल सकती हैं।
इसकी जांच कैसे होती है। इस रोग की जांच सामान्यतया अनुभवी चिकित्सक क्लीनिक में ही कर लेते हैं। आवश्यकता पड़ने पर रोग के निश्चितीकरण के लिए पेट का अल्ट्रासाउंड समुचित होता है। यदि चिकित्सक को किसी अन्य रोग स्थिति का संदेह होता है तो अन्य जांचों की तरफ जाना पड़ता है।
क्या इससे बचाव संभव है?
जी हाँ, बच्चों में स्वर्णप्राशन संस्कार द्वारा इससे बचाव संभव है।
व्यस्कों में खान-पान सही रखने और नियमित व्यायाम करने से इससे बचाव किया जा सकता है।
क्या यह ठीक हो सकती है? यह रोग पूरी तरह ठीक हो सकता अगर रोगी समय रहते अनुभवी और योग्य चिकित्सक से सलाह और चिकित्सा ले, चिकित्सक के निर्देशों का पालन करें।
क्या इसमें आपरेशन कराना जरूरी है? नहीं यह कोई आवश्यक नहीं कि सर्जरी से ही इस रोग का इलाज होता है लेकिन यदि गांठ का साइज एक निश्चित सीमा से अधिक बढ़ जाए तब सर्जरी एक उचित विकल्प हो सकता है।
क्या इसकी चिकित्सा संभव है?
जी हाँ,आयुर्वेद क्लिनिक के चिकित्सक इस रोग की चिकित्सा में विशेषज्ञ हैं।
समय रहते इलाज शुरू करने से रोग जड़ से समाप्त हो सकता है।
तेज मिर्च-मसाले पेट में अम्लता (Acidity) बढ़ाते हैं, जिससे गैस्ट्रिक अल्सर, एसिड रिफ्लक्स (GERD) और पेट की जलन हो सकती है।
कब्ज और अपच:
फास्ट फूड में फाइबर की कमी होती है, और आंतों की गति धीमी कर देते हैं, जिससे कब्ज और अपच हो सकता है।
आंतों की सूजन (IBD) और बवासीर (Piles):
फास्ट फूड आंतों में सूजन (Inflammatory Bowel Disease – IBD) और कब्ज बढ़ा सकते हैं, जिससे बवासीर और फिशर जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
2. लिवर और किडनी पर प्रभाव
फैटी लिवर और लिवर सिरोसिस:
फास्ट फूड में मौजूद ट्रांस फैट लिवर में फैट जमा कर देते हैं, जिससे फैटी लिवर, लिवर फाइब्रोसिस और अंततः लिवर सिरोसिस (Liver Cirrhosis) हो सकता है।
किडनी स्टोन और किडनी फेल्योर:
यूरिक एसिड बढ़ाकर किडनी स्टोन और किडनी डैमेज का खतरा बढ़ाते हैं। किडनी के फिल्टरिंग सिस्टम को कमजोर कर सकती है, जिससे किडनी फेल्योर का खतरा बढ़ जाता है।
3. हृदय और ब्लड प्रेशर पर प्रभाव
हाई ब्लड प्रेशर और हार्ट अटैक:
फास्ट फूड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं, धमनियों को सख्त करते हैं, जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है और हार्ट अटैक/स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
दिल की धड़कन असामान्य होना (Arrhythmia):
तेज मिर्च दिल की धड़कन को असामान्य रूप से तेज (Tachycardia) या धीमा (Bradycardia) कर सकते हैं।
4. मानसिक और तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव
ब्रेन फॉग और याददाश्त कमजोर होना:
फास्ट फूड मस्तिष्क की तंत्रिकाओं (Neurons) को नुकसान पहुँचाते हैं, जिससे याददाश्त कमजोर हो सकती है और ब्रेन फॉग (सोचने-समझने की क्षमता में कमी) आ सकता है।
नींद की समस्या और डिप्रेशन:
मेलाटोनिन (Melatonin) हॉर्मोन को डिस्टर्ब कर सकते हैं, जिससे अनिद्रा, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन हो सकता है।
5. सेक्सुअल हेल्थ पर प्रभाव
फास्ट फूड टेस्टोस्टेरोन हार्मोन को कम करते हैं, जिससे सेक्स ड्राइव घटती है और स्पर्म काउंट कम होता है।
पीरियड्स में अनियमितता और हार्मोनल असंतुलन (महिलाओं में):
अधिक जंक फूड एस्ट्रोजन-प्रोजेस्टेरोन हार्मोन को असंतुलित कर सकते हैं, जिससे पीरियड्स अनियमित और गर्भधारण में समस्या हो सकती है।
6. कैंसर का खतरा
मुंह, गले और पेट के कैंसर का खतरा:
मसालेदार फास्ट फूड और मांस में मौजूद कार्सिनोजेनिक पदार्थ (जैसे नाइट्रेट्स और ट्रांस फैट) कैंसर कोशिकाओं को ट्रिगर कर सकते हैं।
7. इम्यूनिटी पर प्रभाव
प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कमजोर होना:
फास्ट फूड शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immune System) को कमजोर कर देते हैं, जिससे बार-बार सर्दी-जुकाम, इन्फेक्शन और सूजन की समस्या हो सकती है।
समाधान –
यदि आप लम्बे समय से या लगातार फ़ास्ट फ़ूड का सेवन करते हैं और आप ऊपर बताये गए सभी रोगों से बचना चाहते हैं तो आप इस प्रकार अपना बचाव कर सकते हैं। 1 फास्ट फ़ूड का सेवन बहुत कम कर दें। अधिकतम महीने में एक या दो बार सेवन करने से खतरा काफी कम रहने की सम्भावना रहती है। 2 अभी तक की गयी लापरवाही से शरीर के अंदर जो दूषित तत्व इकट्ठे हो गए हैं उन्हें बाहर निकालने के लिए अनुभवी आयुर्वेद चिकित्सक से संपर्क करें और सात्विक भोजन एवं व्यायाम की मदद लें। 3 दूषित तत्व बाहर निकालने, कमजोर हुए अंगों को मजबूत करने, शरीर को उचित पोषण देने के लिए आयुर्वेद मल्टी स्पेशलिटी क्लिनिक के विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा तैयार विशेष फार्मूला का उपयोग करना उत्तम रहेगा।
मधुमेह : भारत में करोड़ों मधुमेह रोगियों को राहत देने के लिए एक नया चिकित्सीय आविष्कार सामने आया है। डेनमार्क की अग्रणी दवा कंपनी नोवो नॉर्डिस्क ने भारतीय बाजार में विश्व का पहला साप्ताहिक बेसल इंसुलिन इंजेक्शन ‘अविक्ली’ लॉन्च किया है। आमतौर पर, मधुमेह की गंभीरता के आधार पर, रोगियों को प्रतिदिन इंसुलिन इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। लेकिन, यह नया इंजेक्शन सप्ताह में केवल एक बार ही पर्याप्त है। चिकित्सा विशेषज्ञों ने पुष्टि की है कि यह टाइप-1 और टाइप-2 दोनों प्रकार के मधुमेह के उपचार में चमत्कारिक रूप से कारगर है। इस नवोन्मेषी इंसुलिन के कारण, रोगियों द्वारा एक वर्ष में लिए जाने वाले इंजेक्शनों की संख्या 365 से घटकर मात्र 52 रह जाएगी। इससे रोगियों को प्रतिदिन सुई चुभने के दर्द से बड़ी राहत मिलेगी।
कीमत: 2,611 रुपये। आम आदमी के लिए दस सप्ताह की खुराक उपलब्ध है।
कंपनी ने इस इंजेक्शन की कीमत इस तरह तय की है कि यह न केवल चिकित्सकीय रूप से बल्कि आर्थिक रूप से भी मरीजों के लिए फायदेमंद हो। भारतीय बाजार में 1 मिलीलीटर पेन की कीमत 2,611 रुपये निर्धारित की गई है। इस एक पेन में लगभग 700 यूनिट इंसुलिन होता है। इसकी खासियत यह है कि यह 1 मिलीलीटर पेन एक सामान्य मधुमेह रोगी के लिए लगभग 10 सप्ताह (ढाई महीने) तक लगातार पर्याप्त है। इसका मतलब है कि यह प्रीमियम चिकित्सा सेवा, जिसे सप्ताह में एक बार लिया जाता है, औसतन प्रति माह एक हजार रुपये से कम की लागत पर उपलब्ध होगी। चिकित्सा सूत्रों को उम्मीद है कि यह ‘अविकली’ इंजेक्शन उन लोगों के लिए जीवनरक्षक साबित होगा जो हर दिन इंसुलिन लेना भूल जाते हैं और जो बहुत यात्रा करते हैं, और इससे मधुमेह को नियंत्रित करना आसान हो जाएगा।