Category: Health

  • गट हेल्थ खराब होने पर शरीर देता है कई संकेत, डॉक्टर से जानिए किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए..​​​

    गट हेल्थ खराब होने पर शरीर देता है कई संकेत, डॉक्टर से जानिए किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए..​​​

    गट हेल्थ खराब होने पर शरीर देता है कई संकेत, डॉक्टर से जानिए किन लक्षणों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए..​​​

    अगर आपको लगता है कि खराब गट हेल्थ का असर सिर्फ पेट तक सीमित रहता है, तो ऐसा नहीं है। MD (Anesthesiology – Pain Medicine) डॉ के अनुसार, गट हेल्थ बिगड़ने पर आपके शरीर में कई संकेत दिखाई दे सकते हैं। उन्होंने वीडियो शेयर करते हुए बताया है कि ख़राब गट हेल्थ होने पर शरीर में कौन से लक्षण नज़र आ सकते हैं

    खराब गट हेल्थ होने पर दिख सकते हैं ये लक्षण

    • बदबूदार मल
      : सड़े हुए अंडे जैसी बदबू का मतलब हो सकता है कि आपके पेट के बैक्टीरिया का बैलेंस बिगड़ गया है। कुछ बैक्टीरिया सल्फर गैस बनाते हैं जिनकी बदबू खराब होती है और ये क्रोहन (Crohn’s) या पोषक तत्वों के ठीक से न पचने जैसी पेट की समस्याओं से जुड़े होते हैं।

    • खाने के बाद पेट फूलना
      : अगर खाना खाने के बाद आपका पेट फूल जा रहा है तो यह भी एक गंभीर लक्षण है। हालांकि, यह हमेशा इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपने कितना खाया है। यह कब्ज या पेट के खाली होने में दिक्कत के कारण भी हो सकता है।

    • कम एनर्जी:
      लीकी गट की वजह से एंडोटॉक्सिन ब्लड सर्कुलेशन में पहुंच जाते हैं, जिससे शरीर में इन्फ्लेमेशन होती है और एनर्जी मेटाबॉलिज़्म पर बुरा असर पड़ता है। गट में असंतुलन से विटामिन B12, आयरन, फोलेट और मैग्नीशियम के एब्ज़ॉर्प्शन में भी रुकावट आ सकती है, जो एनर्जी के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

    • पिंपल्स निकलना:
      अगर आपके चेहरे पर बार बार एक्ने की समस्या हो रही हो तो इसका कनेक्शन आपकी गट हेल्थ से भी हो सकता है। जब पेट के माइक्रोबायोम में असंतुलन होता है तो यह शरीर में पुरानी सूजन को बढ़ावा देता है, जिससे मुँहासे (acne) बढ़ सकते हैं। मुँहासे वाले मरीज़ों में अक्सर लैक्नोस्पिरेसी की कमी और बैक्टेरॉइड्स की अधिकता देखी जाती है, जो पेट से जुड़ी समस्या की ओर इशारा करती है।

    • फूड इनटॉलरेंस
      : अगर कुछ खास तरह के खाने, जैसे डेयरी या ग्लूटेन से आपको अचानक परेशानी होने लगती है, तो हो सकता है कि आपका पेट उन पर ठीक से प्रतिक्रिया न कर रहा हो, क्योंकि उन्हें पचाने में मदद करने वाले बैक्टीरिया या तो गायब हैं या सही ढंग से काम नहीं कर रहे हैं।

    Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

  • पेट की जलन और गैस से राहत दिलाने में कारगर है इलायची, जानें सेवन का सही तरीका

    पेट की जलन और गैस से राहत दिलाने में कारगर है इलायची, जानें सेवन का सही तरीका

    पेट की जलन और गैस से राहत दिलाने में कारगर है इलायची, जानें सेवन का सही तरीका

    सुबह सुबह पेट की जलन और गैस आज के समय में एक बेहद आम समस्या बन चके हैं। खराब खानपान, देर तक बैठना और तनाव इसके मुख्य कारण हैं। इस तकलीफ से राहत पाने के लिए लोग अक्सर दवाओं का सहारा लेते हैं, लेकिन शायद आपको मालूम नहीं है कि हमारी रसोई में कुछ ऐसे मसाले हैं जो गैस औप पेट की जलन से आसानी से छुटकारा दिला सकते हैं। हम जिस मसाले की बात कर रहे हैं उसका नाम इलायची है। हरी इलायची सिर्फ स्वाद और खुशबू बढ़ाने के काम नहीं आती, बल्कि आयुर्वेद में इसे पेट की कई समस्याओं की अचूक दवा माना गया है। ऐसे में यहां हम जानने की कोशिश करेंगे कि पेट से जुड़ी समस्याओं से छुटकारा दिलाने में इलायची किस तरह कारगर है।

    इलायची क्यों है पेट के लिए फायदेमंद?

    इलायची की तासीर ठंडी होती है, जो पेट में बन रहे एसिड को शांत करने में मदद करती है। इसमें मौजूद एसेंशियल ऑयल्स पाचन तंत्र की को आराम पहुंचाते हैं, जिससे पेट की ऐंठन कम होती है। इसके अलावा, इलायची पाचन एंजाइम्स को सक्रिय करती है, जिससे खाना जल्दी पचता है और गैस व ब्लोटिंग की समस्या नहीं होती।

    इलायची इस्तेमाल करने के 4 सबसे सही तरीके

    1. खाना खाने के बाद चबाएं
    यह सबसे आसान और तुरंत असर दिखाने वाला तरीका है। भारी या मसालेदार खाना खाने के बाद 1 से 2 हरी इलायची को मुंह में रखकर धीरे-धीरे चबाएं। इसका रस जब आपके पेट में जाएगा, तो एसिडिटी की वजह से होने वाली सीने और पेट की जलन में तुरंत आराम मिलेगा। यह माउथ फ्रेशनर का काम भी करती है।

    2. इलायची का गुनगुना पानी
    गैस और भारीपन से छुटकारा पाने के लिए इलायची का पानी बेहद फायदेमंद है। इसके लिए एक गिलास पानी में 2 से 3 कुचली हुई इलायची डालकर अच्छी तरह उबाल लें। जब पानी आधा रह जाए, तो इसे छान लें। इस पानी को गुनगुना होने पर चाय की तरह घूंट-घूंट करके पिएं। सुबह खाली पेट इसका सेवन करने से पूरे दिन पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है।

    3. इलायची और सौंफ का मिश्रण
    सौंफ और इलायची दोनों की ही तासीर ठंडी होती है, इसलिए इनका कॉम्बिनेशन गैस और एसिडिटी पर अच्छा असर करता है। आप भुनी हुई सौंफ और इलायची के दानों को मिलाकर एक डिब्बे में रख सकते हैं। खाना खाने के बाद आधा चम्मच इस मिश्रण का सेवन करने से अपच की समस्या दूर हो जाती है।

    4. इलायची की हर्बल चाय
    अगर आपको दूध वाली चाय पीने से गैस बनती है, तो उसकी जगह इलायची की हर्बल चाय पिएं। इसके लिए पानी में इलायची, थोड़ा सा अदरक और पुदीने की पत्तियां उबालकर काली चाय की तरह पिएं। यह पेट को ठंडक देगी और गैस को तुरंत बाहर निकालने में मदद करेगी। इलायची का सेवन सीमित मात्रा में ही करें। एक दिन में 2 से 3 इलायची से ज्यादा का सेवन करने से बचें, क्योंकि किसी भी चीज की अति नुकसानदेह हो सकती है। अगर आपको लंबे समय से क्रॉनिक एसिडिटी या पेट में अल्सर की शिकायत है, तो घरेलू नुस्खों के साथ-साथ डॉक्टर से संपर्क जरूर लें।

    Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

  • बारिश के मौसम में स्वस्थ रहना है तो अपनाएं आयुर्वेदिक डाइट, जानें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं..

    बारिश के मौसम में स्वस्थ रहना है तो अपनाएं आयुर्वेदिक डाइट, जानें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं..

    बारिश के मौसम में स्वस्थ रहना है तो अपनाएं आयुर्वेदिक डाइट, जानें क्या खाना चाहिए और क्या नहीं..

    मानसून में बारिश की वजह से आस-पास गंदगी जमा हो जाती है। जिससे मच्छर, मक्खियां और दूसरे कीड़े-मकोड़े बहुत बढ़ जाते हैं और संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है। इस मौसम में होने वाली उमस से शरीर में वात दोष का असंतुलन होता है और पाचन शक्ति भी कमजोर हो जाती है। इसके अलावा वात के बिगड़ने और बारिश की वजह से पाचन क्रिया पर बुरा असर पड़ता है। बीच-बीच में होने वाली ड्राईनेस की वजह से शरीर में पित्त दोष भी बढ़ने लगता है।

    मानसून में होने वाले संक्रमणों के कारण मलेरिया, फाइलेरिया बुखार, सर्दी-जुकाम, दस्त, पेचिश, हैजा, कोलाइटिस, गठिया, जोड़ों का दर्द, हाई ब्लड प्रेशर, फोड़े-फुंसी, दाद और खुजली जैसी कई बीमारियां हो सकती हैं। मानसून का मौसम वातावरण में नमी और ठंडक लाता है, आयुर्वेद के अनुसार यही मौसम आपके शरीर में वात और पित्त का असंतुलन का कारण बनता है। जिसमें शामिल है।

    मानसून में आयुर्वेद में क्या खाना चाहिए?

    आशा आयुर्वेद की डॉक्टर शर्मा के मुताबिक मानसून में हल्का, आसानी से पचने वाला, ताज़ा और गर्म खाना खाना चाहिए। इस तरह के खाने से पाचन शक्ति बढ़ती है। ऐसे खाद्य पदार्थ खाने चाहिए जो वात को संतुलित रखें। पुराने अनाज जैसे गेहूं, जौ, शाली और साठी चावल और मक्का खाएं। इसके अलावा सरसों, खीरा, खिचड़ी, दही, लस्सी और हरी मूंग दाल खाएं। इस मौसम में मूंग और अरहर दाल का सेवन करें।

    मानसून में कौन से फल सब्जियां खाएं

    वहीं सब्जियों में आपको लौकी, भिंडी, तोरई, टमाटर और पुदीने की चटनी के साथ सब्जियों का सूप पीना चाहिए। फलों में सेब, केला, अनार, नाशपाती, पके हुए जामुन और पके हुए देसी आम खाने चाहिए। इस समय आम और दूध का सेवन बहुत फायदेमंद माना जाता है। जब इसे सही मात्रा में भोजन के विकल्प के तौर पर लिया जाता है, तो यह शारीरिक शक्ति और शरीर-यष्टि को बेहतर बनाने में मदद करता है।

    मानसून में पानी पीते वक्त बरतें सावधानी

    इस मौसम में पानी दूषित हो जाता है। इसलिए पानी का ध्यान रखें। पानी को किसी भी तरह की गंदगी या प्रदूषण से सुरक्षित रखने का ध्यान रखें। दूषित पानी से हैजा और फ़ूड पॉइज़निंग जैसी कई बीमारियों का कारण हो सकता है। बेहतर होगा कि इस मौसम में घर का उबला हुआ पानी पीएं या वॉटर फिल्टर का इस्तेमाल करें।

    आयुर्वेद के अनुसार 2 महीने तक जब तक बारिश की का पीक सीजन होता है आपको इन बातों का ख्याल रखना चाहिए। इसके साथ ही आपको ऐसी चीजें खानी चाहिए जिससे इम्यून सिस्टम मजबूत होती है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इस तरह आप खुद को और अपने परिवार को बीमार होने से बचा सकते हैं।

    Disclaimer: (इस आर्टिकल में सुझाए गए टिप्स केवल आम जानकारी के लिए हैं। सेहत से जुड़े किसी भी तरह का फिटनेस प्रोग्राम शुरू करने अथवा अपनी डाइट में किसी भी तरह का बदलाव करने या किसी भी बीमारी से संबंधित कोई भी उपाय करने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

  • क्या रोटी-चावल का कॉम्बिनेशन डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है? एक्सपर्ट की राय जानें..

    क्या रोटी-चावल का कॉम्बिनेशन डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है? एक्सपर्ट की राय जानें..

    क्या रोटी-चावल का कॉम्बिनेशन डायबिटीज का खतरा बढ़ा सकता है? एक्सपर्ट की राय जानें..

    Diabetes Management Tips: भारत में डायबिटीज मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और इसके साथ ही सोशल मीडिया पर खान-पान को लेकर कई तरह के भ्रम भी फैल रहे हैं। डायबिटीज फ्रेंडली डाइट को लेकर अक्सर मरीजों के मन में यह सवाल उठता है कि वो दोपहर या रात के भोजन में क्या खाएं? रोटी खाएं या चावल, किसे खाने से ब्लड शुगर का स्तर बढ़ता है। डाइटिशियन श्वेता जे पंचाल के अनुसार, डेली  और खानपान में किए गए साधारण बदलाव करके लंबे समय तक सकारात्मक असर डाल सकते हैं। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में बताया कि यदि परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो लाइफस्टाइल और डाइट में किए गए कुछ आसान बदलाव सेहत पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। घर में किसी सदस्य को डायबिटीज है तो रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने या बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं।

    खाने के समय में बदलाव से लेकर खाद्य पदार्थों के कॉम्बिनेशन पर ध्यान देने तक एक्सपर्ट ने शुगर कंट्रोल करने के लाइफस्टाइल और डाइट से जुड़े बदलाव बताए है,जिन्हें आसानी से अपनाया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया फलों पर दालचीनी छिड़कें,  यह शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद करती है। रात का खाना 7 बजे तक खत्म कर लें, देर से खाना खाने से ब्लड शुगर बढ़ सकता है। खाने के बाद 10 मिनट टहलें, भले ही घर पर ही क्यों न हो। चावल और रोटी को एक साथ न खाएं, इससे शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। हर भोजन की शुरुआत फाइबर से करें, यह शुगर के अवशोषण को धीमा करता है। आइए एक्सपर्ट की इस सलाह की तसदीक डॉक्टर से करते हैं। क्या सचमुच चावल और रोटी का सेवन सेहत के लिए खतरा है?

    चावल और रोटी साथ खाने से ब्लड शुगर पर क्या असर पड़ता है?

    कंसल्टेंट डाइटिशियन और डायबिटीज एजुकेटर कनिका मल्होत्रा ने बताया कि यदि ब्लड शुगर को एक बाल्टी माना जाए, तो एक ही भोजन में चावल और रोटी दोनों खाना ऐसा है जैसे एक साथ दो नलों से पानी बाल्टी में डाला जा रहा हो। दोनों ही कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं और साथ खाने पर ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं। उन्होंने सलाह दी कि एक समय में केवल एक कार्ब स्रोत चुनें और प्लेट में अधिक मात्रा में सब्जियां या दाल शामिल करें। इससे ब्लड ग्लूकोज को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।

    क्या छोटे बदलाव बड़े डाइट प्लान जितने प्रभावी हो सकते हैं?

    कनिका मल्होत्रा के अनुसार, भोजन के बाद टहलना और दालचीनी का सीमित उपयोग जैसी छोटी आदतों को असरदार बताया गया है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि इन आदतों की मदद से भोजन के बाद ब्लड शुगर में आने वाली तेजी को 15 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। हालांकि, यदि व्यक्ति की मूल खानपान की आदतें असंतुलित बनी रहती हैं तो इन छोटे बदलावों का असर एक सीमा तक ही रहता है। फिर भी नियमित रूप से अपनाए गए छोटे सुधार लंबे समय में ब्लड शुगर कंट्रोल में उतने ही प्रभावी साबित हो सकते हैं जितने बड़े डाइटरी बदलाव।

    डायबिटीज में भोजन का समय कितना महत्वपूर्ण है?

    कनिका मल्होत्रा बताती हैं कि जल्दी डिनर करने का फायदा इसलिए होता है क्योंकि इंसुलिन की कार्यक्षमता और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म हमारे शरीर की जैविक घड़ी (सर्कैडियन रिद्म) से जुड़े होते हैं। देर रात भोजन करने पर रात के समय ब्लड शुगर अधिक बढ़ सकता है और अगली सुबह फास्टिंग शुगर भी ज्यादा रह सकता है। उनके अनुसार, कई लोगों में रात 9 बजे की बजाय शाम 7 बजे डिनर करने से फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज 10 से 15 mg/dL तक कम हो सकता है।

    हर व्यक्ति के लिए भोजन का समय अलग हो सकता है

    विशेषज्ञों का कहना है कि हर व्यक्ति का मेटाबॉलिज्म और दिनचर्या अलग होती है। उदाहरण के लिए, नाइट शिफ्ट में काम करने वाले या देर से उठने वाले लोगों को अपने सोने-जागने के समय के अनुसार भोजन का समय निर्धारित करना पड़ सकता है। केवल घड़ी का समय ही नहीं, बल्कि भोजन का शरीर की डेली रूटीन के साथ तालमेल भी महत्वपूर्ण होता है। कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग (CGM) से भी यह देखा गया है कि भोजन का समय बदलने से ब्लड शुगर पर असर पड़ता है, भले ही भोजन एक जैसा ही क्यों न हो।

  • किडनी के मरीजों के लिए कौन-से फल हैं सुरक्षित और किनसे बचना चाहिए? डॉक्टर ने बताया

    किडनी के मरीजों के लिए कौन-से फल हैं सुरक्षित और किनसे बचना चाहिए? डॉक्टर ने बताया

    किडनी के मरीजों के लिए कौन-से फल हैं सुरक्षित और किनसे बचना चाहिए? डॉक्टर ने बताया

    जब बॉडी को हेल्दी रखने के लिए हेल्दी डाइट का जिक्र आता है तो फलों को सबसे बेहतरीन और हेल्दी विकल्प माना जाता है। लेकिन आप जानते हैं कि इन हेल्दी फलों का सेवन भी तब तक हेल्दी है जबतक आपकी बॉडी में कोई मेडिकल कंडीशन नहीं है। जी हां, अगर किडनी की बीमारी से जूझ रहे मरीज बॉडी को हेल्दी रखने के लिए लगातार फलों का सेवन करते हैं तो उनकी बॉडी को फायदे की जगह नुकसान पहुंच सकता है। किडनी मरीजों के लिए पोटैशियम रिच फूड्स का सेवन उनकी मुश्किलें बढ़ा सकता है, क्योंकि खराब किडनी अतिरिक्त पोटैशियम को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती। इससे खून में पोटैशियम बढ़ने का खतरा रहता है, जो दिल और मांसपेशियों पर गंभीर असर डाल सकता है।

    कर्मा आयुर्वेदा के फाउंडर, आयुर्वेदिक एक्सपर्ट डॉक्टर पुनीत धवन ने बताया फल बेहतरीन फूड हैं लेकिन किडनी की परेशानी से जूझ रहे लोगों के लिए ये नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। पोटैशियम रिच फूड्स का सेवन करने से खून में पोटैशियम का स्तर बढ़ सकता है, जिसे हाइपरकलेमिया (Hyperkalemia) कहा जाता है। यह स्थिति दिल की धड़कन और मांसपेशियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि पोटैशियम का शरीर में क्या रोल है और किडनी के मरीजों को पोटैशियम से भरपूर कौन-कौन से फलों से परहेज करने की जरूरत है।

    किडनी के मरीजों के लिए पोटैशियम क्यों है अहम?

    डॉ. बताते हैं कि पोटैशियम शरीर के लिए एक जरूरी मिनरल है जो मांसपेशियों के संकुचन, नसों के कार्य, दिल की धड़कन को सामान्य रखने और शरीर में फ्लूइड बैलेंस बनाए रखने में मदद करता है। लेकिन जब किडनी ठीक से काम नहीं करती, तो अतिरिक्त पोटैशियम शरीर से बाहर नहीं निकल पाता और खून में इसकी मात्रा बढ़ने लगती है। ज्यादा पोटैशियम होने पर दिल की धड़कन अनियमित हो सकती है और मांसपेशियों में कमजोरी या दूसरी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। डॉ. धवन ने बताया हर किडनी मरीज को पोटैशियम पूरी तरह बंद करने की जरूरत नहीं होती। कुछ स्टेज में जैसे

    1. CKD स्टेज 1 और स्टेज 2 के मरीजों को आमतौर पर पोटैशियम पर बहुत सख्त नियंत्रण की आवश्यकता नहीं होती।
    2. CKD स्टेज 3, स्टेज 4, स्टेज 5 या डायलिसिस कराने वाले मरीजों को पोटैशियम का सेवन डॉक्टर की सलाह के अनुसार सीमित रखना चाहिए।

    किन फलों में ज्यादा है पोटैशियम?

    डॉ. धवन के मुताबिक कुछ फलों में पोटैशियम ज्यादा होता है इसलिए किडनी के मरीजों को इन फलों का सेवन सीमित करना चाहिए या डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए। कुछ फल जैसे
    केला, संतरा, आम, कीवी, खरबूजा, स्ट्रॉबेरी, बादाम,किशमिश और अंजीर का सेवन करने से परहेज करना चाहिए। इन खाद्य पदार्थों में पोटैशियम अधिक होता है, जिससे शरीर में इसका स्तर तेजी से बढ़ सकता है।

    किडनी के मरीज कौन से फलों का कर सकते हैं सेवन

    किडनी के मरीजों के लिए कम पोटैशियम वाले फल फायदेमंद होते हैं। इन फलों में सेब, लाल अंगूर,नाशपाती,पपीता, जामुन और तरबूज शामिल है। बात करें सेब की तो

    1. 100 ग्राम सेब में लगभग 107 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। यह फाइबर से भरपूर होता है, पाचन बेहतर बनाता है और ब्लड शुगर नियंत्रित रखने में मदद करता है। इसे छीलकर खाना बेहतर माना जाता है।
    2. लाल अंगूर:
      एक कप (करीब 151 ग्राम) लाल अंगूर में लगभग 110 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो सूजन कम करने और दिल की सेहत बनाए रखने में मदद करते हैं।
    3. नाशपाती:
      100 ग्राम नाशपाती में लगभग 116 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसमें मौजूद फाइबर पाचन सुधारने और वजन कंट्रोल रखने में मदद करता है।
    4. पपीता:
      100 ग्राम पपीते में लगभग 182 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। यह पाचन और इम्यूनिटी के लिए अच्छा माना जाता है, लेकिन किडनी मरीजों को इसे सीमित मात्रा में और डॉक्टर की सलाह पर ही खाना चाहिए।
    5. जामुन:
      100 ग्राम जामुन में लगभग 55 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। यह खासकर डायबिटीज से पीड़ित किडनी मरीजों के लिए फायदेमंद माना जाता है क्योंकि यह ब्लड शुगर कंट्रोल करने में मदद कर सकता है।
    6. तरबूज:
      एक कप तरबूज में लगभग 170 मिलीग्राम पोटैशियम होता है। इसमें पानी की मात्रा भी अधिक होती है, इसलिए किडनी मरीजों को इसे सीमित मात्रा में ही खाना चाहिए। यदि मरीज डायलिसिस पर है या पेशाब कम बन रहा है तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    किडनी मरीजों के लिए फल खाने का तरीका

    • डॉ. धवन ने बताया कि किडनी के मरीज फलों का सेवन बहुत सावधानी से करें। फल हमेशा अच्छी तरह धोकर खाएं और संभव हो तो छीलकर खाएं।
    • फलों के जूस की बजाय साबुत फल खाएं।
    • हफ्ते में 2-3 बार ही फल खाएं या डॉक्टर की सलाह के अनुसार सेवन करें।
    • समय-समय पर ब्लड टेस्ट करवाकर पोटैशियम की जांच कराएं।
    • कुछ फलों को उबालने से उनमें मौजूद पोटैशियम की मात्रा कुछ हद तक कम की जा सकती है।

    किडनी मरीजों के लिए जरूरी सलाह

    डॉ. का कहना है कि किडनी रोगियों को नियमित रूप से किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) करवाते रहना चाहिए और अपनी डाइट किसी सर्टिफाइड डाइटिशियन से बनवानी चाहिए। इसके अलावा वजन, पानी की मात्रा और भोजन पर भी नजर रखना जरूरी है। एक्सपर्ट ने बताया किडनी की बीमारी में फलों को पूरी तरह छोड़ने की जरूरत नहीं होती। सही फल, सही मात्रा और डॉक्टर की सलाह का पालन करके मरीज संतुलित आहार ले सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख डॉक्टर द्वारा साझा की गई जानकारी पर आधारित है। किडनी की बीमारी, डायलिसिस या पोटैशियम से जुड़ी किसी भी डाइट में बदलाव करने से पहले अपने नेफ्रोलॉजिस्ट या सर्टिफाइड डाइटिशियन से सलाह जरूर लें।

  • उमस में एसिडिटी और अपच से हैं परेशान? आयुर्वेदिक डॉक्टर ने सुझाया धनिया पानी का आसान उपाय

    उमस में एसिडिटी और अपच से हैं परेशान? आयुर्वेदिक डॉक्टर ने सुझाया धनिया पानी का आसान उपाय

    उमस में एसिडिटी और अपच से हैं परेशान? आयुर्वेदिक डॉक्टर ने सुझाया धनिया पानी का आसान उपाय

    मसालेदार खाना, चाय-कॉफी की अधिकता और बिगड़ती लाइफस्टाइल के कारण आज एसिडिटी, सीने में जलन और अपच (Indigestion) जैसी समस्याएं बेहद आम हो चुकी हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक अगर इन समस्याओं को लंबे समय तक नजरअंदाज किया जाए तो यह क्रॉनिक अपच (Chronic Indigestion), पोषक तत्वों के खराब अवशोषण (Poor Nutrient Absorption) और बार-बार पेट में असहजता जैसी दिक्कतों का कारण बन सकती हैं।  इन तकलीफों से तुरंत राहत पाने के लिए अक्सर लोग दवाइयों का रुख करते हैं, लेकिन हमारे भारतीय किचन में ही कई ऐसे नेचुरल उपाय मौजूद हैं जो इस समस्या को शांत कर सकते हैं। पारंपरिक चिकित्सा और आयुर्वेद में धनिए के बीजों को पेट के लिए बेहद गुणकारी और ठंडा माना गया है। लेकिन क्या सच में धनिया का पानी पीने से पाचन से जुड़ी परेशानियां दूर हो सकती है, क्या ये पानी एसिडिटी को हमेशा के लिए शांत कर सकता है?

    आयुर्वेद विशेषज्ञ भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र (Hansa Yogendra) के मुताबिक पेट की समस्याओं में धनिया का पानी अमृत की तरह असर करता है। आयुर्वेद में धनिया के बीज (Coriander Seeds) का इस्तेमाल लंबे समय से शरीर की अतिरिक्त गर्मी कम करने, पाचन बेहतर बनाने और एसिडिटी को शांत करने के लिए किया जाता रहा है। एक्सपर्ट के मुताबिक, सही तरीके से तैयार किया गया धनिया का पानी गर्मी और उमस के मौसम में पेट को राहत पहुंचाने में मददगार हो सकता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि धनिया का पानी कैसे उमस भरी गर्मी में पेट को राहत देता है।

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    धनिया के बीज क्यों माने जाते हैं फायदेमंद?

    विशेषज्ञों के अनुसार, धनिया के बीजों में प्राकृतिक कूलिंग (Cooling) गुण पाए जाते हैं। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इन्फ्लेमेटरी तत्व शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने और फ्री रेडिकल्स से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। आयुर्वेदिक एक्सपर्ट ने बताया गर्मी में धनिया के बीज का पानी बनाकर पीने से शरीर की अतिरिक्त गर्मी कंट्रोल रहती है। इसका सेवन करने से एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स से राहत मिलती है। पाचन क्रिया को बेहतर बनाने में ये पानी असरदार साबित होता है। इसका सेवन कई तरह की मेडिकल कंडीशन में भी असरदार साबित होता है। ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में ये पानी बेहद मददगार साबित होता है। इसका सेवन करने से बॉडी से टॉक्सिन बाहर निकलते हैं और इम्यूनिटी मजबूत होती है।

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    धनिया का पानी कैसे तैयार करें

    गर्मी में साबुत धनिया का पानी बनाने के लिए आप एक बड़ा चम्मच साबुत धनिया और एक गिलास नॉर्मल पानी लें। अब धनिया के बीजों को हल्का कूट लें और उन्हें पानी में रात भर भिगो दें। सुबह पानी छानकर खाली पेट पी लें। यह धनिया का पानी पीने का सबसे आसान और पारंपरिक तरीका माना जाता है।

    धनिया का पानी का काढ़ा बनाएं

    अगर गर्मी और उमस ज्यादा हो तो धनिया का पानी उबालकर भी तैयार किया जा सकता है। एक बड़ा चम्मच धनिया लें और दो कप पानी में उबालें। पानी आधा रह जाए तो गैस बंद कर दें। इसे सामान्य तापमान तक ठंडा होने दें और छानकर गुनगुना पिएं। एक्सपर्ट ने बताया इस पानी को आप गुनगुना ही पिएं, इसमें बर्फ या ठंडा करके नहीं पिएं। आप चाहें तो इस पानी में ताजे पुदीने के पत्ते, भीगी हुई सौंफ और नींबू के रस की कुछ बूंदें मिलाकर पी सकते हैं। यह मिश्रण गर्मी के मौसम में शरीर को ठंडक पहुंचाने और पाचन को सपोर्ट करने में मदद कर सकता है।

    पाचन की इन समस्याओं से मिलेगी राहत

    गर्मी में 7 दिनों तक अगर इस ड्रिंक का सेवन किया जाए तो बार-बार एसिडिटी से राहत मिलेगी। इसका सेवन करने से पेट या छाती में जलन कंट्रोल रहती है। जिन लोगों को खाना खाने के बाद ब्लोटिंग होती है उनके लिए ये पानी बेहद उपयोगी है।  गर्मी और उमस में सिरदर्द या भारीपन से राहत दिलाने में ये पानी उपयोगी है। विशेषज्ञ के अनुसार, इसे लगातार लगभग 7 दिन तक सुबह खाली पेट पीने से कुछ लोगों में पाचन संबंधी परेशानियों में सुधार महसूस हो सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख आयुर्वेदिक विशेषज्ञ द्वारा साझा की गई जानकारी और पारंपरिक उपयोगों पर आधारित है। धनिया का पानी किसी बीमारी का इलाज नहीं है। यदि आपको लगातार एसिडिटी, सीने में तेज जलन, पेट दर्द या अन्य गंभीर लक्षण हैं, तो स्वयं उपचार करने के बजाय गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या योग्य चिकित्सक से सलाह लें।

  • 40 की उम्र के बाद हड्डियां पड़ सकती हैं कमजोर, कैल्शियम रिच ये देसी ड्रिंक करेगा मदद, डॉक्टर से जानिए बनाने का सही तरीका..

    40 की उम्र के बाद हड्डियां पड़ सकती हैं कमजोर, कैल्शियम रिच ये देसी ड्रिंक करेगा मदद, डॉक्टर से जानिए बनाने का सही तरीका..

    40 की उम्र के बाद हड्डियां पड़ सकती हैं कमजोर, कैल्शियम रिच ये देसी ड्रिंक करेगा मदद, डॉक्टर से जानिए बनाने का सही तरीका..

    उम्र बढ़ने के साथ शरीर में कई तरह के बदलाव आने लगते हैं, जिनमें से एक है हड्डियों का कमजोर होना। खासकर 40 की उम्र पार करने के बाद शरीर में कैल्शियम का अवशोषण (Absorption) कम हो जाता है, जिससे जोड़ों में दर्द, कट-कट की आवाज आना और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। अक्सर लोग इसके लिए कैल्शियम की गोलियां खाना शुरू कर देते हैं, लेकिन हमारी रसोई में ही कुछ ऐसी देसी चीजें मौजूद हैं जो नेचुरल तरीके से कैल्शियम की कमी को पूरा कर सकती हैं। एम्स के पूर्व कंसल्टेंट और साओल हार्ट सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर डॉ बिमल छाजेड़ ने उम्र बढ़ने पर बॉडी में कैल्शियम की भरपाई करने के लिए एक खास देसी ड्रिंक का सेवन करने की सलाह दी है। ये ड्रिंक हड्डियों को पोषण देने में बेहद मददगार साबित हो सकता है।

    रागी को क्यों माना जाता है कैल्शियम का अच्छा स्रोत?

    कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल छाजेड़ का कहना है कि कैल्शियम से भरपूर पारंपरिक अनाज रागी (Finger Millet) को डाइट में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। रागी प्राकृतिक रूप से कैल्शियम से भरपूर अनाज है। उनका कहना है कि 100 ग्राम रागी में लगभग 340–350 मिलीग्राम कैल्शियम पाया जाता है, जबकि 100 ग्राम दूध में करीब 120 मिलीग्राम कैल्शियम होता है। इसके अलावा रागी में फाइबर, आयरन, कई आवश्यक खनिज और जटिल कार्बोहाइड्रेट भी मौजूद होता हैं, जो इसे एक पौष्टिक खाद्य पदार्थ बनाता हैं। जिन लोगों को दूध पचता नहीं या दूध से एलर्जी है वो लोग इस खास कैल्शियम रिच ड्रिंक का सेवन कर सकते हैं। हालांकि दूध भी प्रोटीन और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है। संतुलित आहार में रागी और दूध दोनों का अपना-अपना महत्व है।

    अंकुरित रागी कैसे सेहत के लिए उपयोगी है?

    विशेषज्ञ के मुताबिक, रागी को अंकुरित (Sprouted) करके खाने से उसमें मौजूद कुछ एंटी-न्यूट्रिएंट्स कम हो सकते हैं, जिससे शरीर कुछ पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से अवशोषित कर पाता है। अंकुरण के दौरान सक्रिय होने वाले एंजाइम इसकी पाचन क्षमता को भी बेहतर बना सकते हैं।

    रागी ड्रिंक बनाने का आसान तरीका

    रागी ड्रिंक तैयार करने के लिए सबसे पहले रागी को रातभर पानी में भिगो दें। अगले दिन पानी निकालकर साफ कपड़े में बांध दें और 24–36 घंटे तक अंकुरित होने दें। इसके बाद अंकुरित रागी को थोड़ा पानी डालकर पीस लें। चाहें तो इसमें थोड़ा नारियल पानी भी मिला सकते हैं। तैयार मिश्रण को छानकर धीमी आंच पर पकाएं। स्वाद के लिए इसमें इलायची, अदरक पाउडर और थोड़ी मात्रा में गुड़ मिलाया जा सकता है।

    रागी ड्रिंक पीने का सही समय क्या है?

    डॉ. ने बताया अगर आप कैल्शियम रिच रागी ड्रिंक का सेवन करना चाहते हैं तो आप सुबह खाली पेट लें या फिर दो भोजन के बीच लें। शुरुआत कम मात्रा से करें और अगर शरीर इसे अच्छी तरह स्वीकार करे तो धीरे-धीरे मात्रा बढ़ाई जा सकती है।

    क्या सिर्फ रागी खाने से कैल्शियम की कमी दूर हो जाएगी?

    एक्सपर्ट के मुताबिक मजबूत हड्डियों के लिए केवल कैल्शियम लेना ही पर्याप्त नहीं है। शरीर में कैल्शियम के बेहतर अवशोषण के लिए विटामिन D भी जरूरी है। इसके लिए नियमित धूप, वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज, योग और संतुलित आहार भी जरूरी हैं। रागी में जटिल कार्बोहाइड्रेट और फाइबर पाया जाता है, जो सामान्य अनाज की तुलना में धीरे-धीरे पचता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी एक विशेषज्ञ के सार्वजनिक वीडियो और उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारी पर आधारित है। रागी या किसी भी खाद्य पदार्थ को उपचार का विकल्प न मानें। यदि आपको कैल्शियम की कमी, ऑस्टियोपोरोसिस, किडनी की बीमारी या कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या है, तो आहार में बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या पंजीकृत डाइटिशियन से सलाह अवश्य लें।

  • ढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स बन सकते हैं फैटी लिवर की वजह, जानिए डॉक्टर के सुझाए 7 लाइफस्टाइल टिप्स..

    ढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स बन सकते हैं फैटी लिवर की वजह, जानिए डॉक्टर के सुझाए 7 लाइफस्टाइल टिप्स..

    ढ़े हुए ट्राइग्लिसराइड्स बन सकते हैं फैटी लिवर की वजह, जानिए डॉक्टर के सुझाए 7 लाइफस्टाइल टिप्स..

    बिगड़ते लाइफस्टाइल, जंक फूड का अधिक सेवन और निष्क्रिय लाइफस्टाइल के कारण फैटी लिवर (Fatty Liver) की समस्या तेजी से पैर पसार रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फैटी लिवर का सीधा संबंध आपके खून में मौजूद एक खास तरह के फैट यानी ‘ट्राइग्लिसराइड्स’ (Triglycerides) के बढ़ने से भी है? जब शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर अनकंट्रोल हो जाता है, तो यह लिवर की कोशिकाओं में जमा होने लगता है, जिससे लिवर की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। शुरुआती चरणों में फैटी लिवर को बिना दवाओं के, सिर्फ सही आदतों से पूरी तरह रिवर्स किया जा सकता है।

    जनरल डायटीशियन और डायबिटोलॉजिस्ट डॉक्टर कोमल कुलकर्णी ने ट्राइग्लिसराइड्स को कंट्रोल करने और फैटी लिवर से मुक्ति पाने के लिए लाइफस्टाइल में  7 जरूरी बदलाव (Lifestyle Changes) करने की सलाह दी है। एक्सपर्ट ने बताया खराब खानपान, मीठे पेय, शारीरिक गतिविधि की कमी और बढ़ता मोटापा आज फैटी लिवर और हाई ट्राइग्लिसराइड्स की बड़ी वजह बन चुके हैं। अगर समय रहते डाइट और लाइफस्टाइल में बदलाव किए जाएं तो ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर कम करने और फैटी लिवर की स्थिति में सुधार लाने में मदद मिल सकती है। आइए जानते हैं कि फैटी लिवर से छुटकारा पाने के लिए लाइफस्टाइल में कौन-कौन से बदलाव करना जरूरी है।

    सबसे पहले मीठे ड्रिंक्स का सेवन नहीं करें

    डॉक्टर ने सलाह दी है कि अगर ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ा हुआ हैं तो सबसे पहले शुगर वाली ड्रिंक्स को डाइट से हटाएं। कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, मीठी चाय-कॉफी और अन्य शुगर युक्त पेय पदार्थ शरीर में अतिरिक्त शुगर पहुंचाते हैं, जो ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ाने और लिवर में फैट जमा होने का कारण बन सकते हैं। इसकी जगह सादा पानी, बिना चीनी वाली ग्रीन टी या नींबू पानी बेहतर विकल्प हो सकते हैं।

    शरीर का 10% वजन कम करने का लक्ष्य रखें

    अगर आपका वजन सामान्य से अधिक है तो कुल वजन का लगभग 10 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य रखें। वजन घटाना लिवर की सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। धीरे-धीरे वजन घटाने से ट्राइग्लिसराइड्स कम करने, इंसुलिन सेंसिटिविटी सुधारने और फैटी लिवर की गंभीरता कम करने में मदद मिल सकती है।

    नियमित एक्सरसाइज करें

    डॉक्टर के अनुसार सप्ताह में कम से कम 150 से 180 मिनट तेज चाल से चलें। बॉडी को एक्टिव रखने के लिए जॉगिंग या एरोबिक एक्सरसाइज करें। इसके अलावा सप्ताह में 2 से 3 दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग भी शामिल करें। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर में जमा अतिरिक्त फैट कम करने और मेटाबॉलिज्म बेहतर बनाने में मदद करती है।

    हर मील में प्रोटीन शामिल करें

    हर भोजन में अच्छी गुणवत्ता वाला प्रोटीन शामिल करें। इसके लिए अंडा, चिकन, मछली, पनीर, टोफू और दालें अच्छे विकल्प हो सकते हैं। पर्याप्त प्रोटीन लेने से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, मांसपेशियां मजबूत रहती हैं और वजन घटाने में भी मदद मिलती है।

    रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट कम करें

    मैदा से बने बिस्कुट, बेकरी प्रोडक्ट्स, सफेद ब्रेड और नमकीन जैसे रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट का सेवन कम करें। इनकी जगह साबुत अनाज और हाई-फाइबर विकल्प चुनें। रिफाइंड कार्ब्स का अधिक सेवन ट्राइग्लिसराइड्स और पेट की चर्बी बढ़ाने से जुड़ा माना जाता है।

    फाइबर से भरपूर भोजन खाएं

    डाइट में फल, हरी सब्जियां, ओट्स और अन्य फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें। फाइबर पाचन को बेहतर बनाने, ब्लड शुगर को संतुलित रखने और ट्राइग्लिसराइड्स के स्तर को कंट्रोल करने में मदद कर सकता है। साथ ही यह लंबे समय तक पेट भरा रखने में भी सहायक होता है।

    रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद लें

    अच्छी नींद भी फैटी लिवर और मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए जरूरी है। रोजाना 7 से 8 घंटे की गुणवत्तापूर्ण नींद लेने से हार्मोन संतुलित रहते हैं, भूख कंट्रोल रहती है और वजन घटाने में मदद मिलती है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी डॉक्टर के सुझावों पर आधारित है। फैटी लिवर या हाई ट्राइग्लिसराइड्स की स्थिति में डाइट, एक्सरसाइज या दवा में बदलाव करने से पहले अपने डॉक्टर या गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें।

  • तुलसी की पत्तियां सिर्फ पूजा के लिए नहीं, ब्लड शुगर कंट्रोल में भी हो सकती हैं फायदेमंद,,

    तुलसी की पत्तियां सिर्फ पूजा के लिए नहीं, ब्लड शुगर कंट्रोल में भी हो सकती हैं फायदेमंद,,

    तुलसी की पत्तियां सिर्फ पूजा के लिए नहीं, ब्लड शुगर कंट्रोल में भी हो सकती हैं फायदेमंद,,

    घर के आंगन में पूजी जाने वाली ‘तुलसी’ न केवल धार्मिक रूप से पूजनीय है, बल्कि आयुर्वेद में इसे औषधियों की रानी (Queen of Herbs) भी कहा गया है। बदलते मौसम में सर्दी-खांसी से राहत दिलाने वाली तुलसी को लेकर अब आधुनिक मेडिकल साइंस भी कई बड़े दावे कर रहा है। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि तुलसी की पत्तियां इतनी ज्यादा असरदार हैं कि ये डायबिटीज को भी कंट्रोल कर सकती हैं।  Journal of Ethnopharmacology और Phytomedicine में प्रकाशित क्लिनिकल रिसर्च के मुताबिक जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन को पहचानना बंद कर देती हैं, तो टाइप-2 डायबिटीज होती है। रिसर्च के अनुसार, तुलसी के पत्तों का अर्क पैंक्रियाज की बीटा-कोशिकाओं (Beta Cells) को सीधे उत्तेजित करता है। यह इंसुलिन के स्राव को बढ़ाता है और कोशिकाओं में इंसुलिन रिसेप्टर्स की संवेदनशीलता को सक्रिय करता है, जिससे खून में तैर रहा ग्लूकोज आसानी से एनर्जी में बदल जाता है।

    आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं के एक्सपर्ट डॉक्टर सलीम जैदी के मुताबिक डायबिटीज मरीज अगर ब्लड शुगर कंट्रोल करना चाहते हैं तो तुलसी के पत्तों का सेवन करें। तुलसी में एंटी ऑक्सीडेंट, एंटी फंगल, एंटी फ्लू, एंटी बैक्टीरियल गुण मौजूद होते हैं जो बॉडी का बीमारियों से बचाव करते हैं और बॉडी को हेल्दी रखते हैं। आइए रिसर्च से भी जान लेते हैं कि तुलसी की पत्तियां कैसे डायबिटीज कंट्रोल करती हैं।

    फास्टिंग और पोस्ट-प्रांडियल शुगर कम करती हैं तुलसी की पत्तियां

    Indian Journal of Clinical Biochemistry में टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों पर किया गया रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल में मरीजों को एक निश्चित समय तक रोज सुबह खाली पेट तुलसी के पत्तों का पाउडर दिया गया। जिन लोगों ने रोज तुलसी के पाउडर का सेवन किया उनकी फास्टिंग ब्लड शुगर (खाली पेट) में 17.6% और पोस्ट-प्रांडियल शुगर यानी भोजन के बाद की शुगर में 7.3% तक की कमी दर्ज की गई। तुलसी भोजन के बाद कार्बोहाइड्रेट के टूटने की रफ्तार को धीमा करती है, जिससे अचानक शुगर स्पाइक नहीं होता।

    एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है तुलसी

    Journal of Clinical and Biochemical Nutrition के मुताबिक हाई ब्लड शुगर के कारण शरीर में फ्री रेडिकल्स बढ़ते हैं, जो आंखों (Retinopathy) और किडनी (Nephropathy) को डैमेज करते हैं। रिसर्च साबित करती है कि तुलसी में प्रचुर मात्रा में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स इन फ्री रेडिकल्स को नष्ट करते हैं। इससे भविष्य में डायबिटीज के कारण होने वाली किडनी, आंखों, नसों और दिल से जुड़ी समस्याओं का खतरा कम हो सकता है।

    इम्यूनिटी मजबूत बनाती हैं ये पत्तियां

    तुलसी में विटामिन C, यूजेनॉल (Eugenol) और कई एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो इम्यूनिटी को मजबूत बनाने में मदद कर सकती हैं। यही वजह है कि सर्दी-जुकाम और मौसमी संक्रमण के दौरान भी इसका उपयोग किया जाता है।

    तनाव कम करने में सहायक

    तुलसी को एक एडाप्टोजेन (Adaptogen) माना जाता है। इसका मतलब है कि यह शरीर को मानसिक और शारीरिक तनाव से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती हैं। कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि तुलसी तनाव हार्मोन कोर्टिसोल (Cortisol) के स्तर को संतुलित रखने में मदद कर सकती है। Evidence-Based Complementary and Alternative Medicine की न्यूरोलॉजिकल रिपोर्ट के मुताबिक मानसिक तनाव होने पर एड्रीनलीन ग्रंथियां ‘कॉर्टिसोल नामक स्ट्रेस हॉर्मोन रिलीज करती हैं, जो लिवर से अतिरिक्त ग्लूकोज निकालकर शुगर लेवल को अचानक बढ़ा देता है। तुलसी को विज्ञान में एक बेहतरीन ‘एडाप्टोजेन माना गया है। क्लिनिकल स्टडी के अनुसार, तुलसी का सेवन मस्तिष्क को शांत कर कोर्टिसोल के स्तर को 30% तक कम कर देता है, जिससे तनाव के कारण बढ़ने वाली शुगर खुद कंट्रोल हो जाती है।

    पाचन तंत्र को बेहतर बना सकती है

    तुलसी पाचन एंजाइमों के स्राव को बढ़ाने, गैस, पेट फूलने और अपच जैसी समस्याओं को कम करने में सहायक मानी जाती है। इसके एंटीमाइक्रोबियल गुण आंतों के स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाने में योगदान दे सकते हैं। International Journal of Food Sciences and Nutrition के मुताबिक तुलसी पेट के गैस्ट्रिक जूस और पाचक एंजाइम्स के स्राव को संतुलित करती है। यह लिवर और आंतों के मेटाबॉलिज्म (चयापचय) में सुधार करती है, जिससे भोजन का अवशोषण सही तरीके से होता है। पाचन तंत्र दुरुस्त रखने से शरीर में ग्लूकोज का स्तर और वजन दोनों ही कंट्रोल में रहते हैं।

    दिल की सेहत को मिल सकता है फायदा

    तुलसी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में मदद करते हैं। कुछ अध्ययनों के अनुसार यह कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी सहायक हो सकती है, जिससे हृदय स्वास्थ्य को लाभ मिल सकता है। हालांकि इस पर और वैज्ञानिक शोध की जरूरत है।

    तुलसी का सेवन करते समय रखें इन बातों का ध्यान

    हालांकि तुलसी को सामान्य रूप से सुरक्षित माना जाता है, लेकिन यदि आप डायबिटीज की दवाएं, खून पतला करने वाली दवाएं (Blood Thinners) या अन्य गंभीर बीमारियों की दवा ले रहे हैं, तो नियमित रूप से तुलसी का अधिक मात्रा में सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी हर्बल उपाय का नियमित सेवन नहीं करना चाहिए। डायबिटीज के मरीज डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं बंद न करें और तुलसी को केवल सहायक उपाय के रूप में ही अपनाएं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। तुलसी कई औषधीय गुणों से भरपूर मानी जाती है, लेकिन यह किसी भी बीमारी का इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा का विकल्प नहीं है। यदि आपको डायबिटीज या कोई अन्य गंभीर बीमारी है, या आप नियमित रूप से दवाएं ले रहे हैं, तो तुलसी का नियमित या अधिक मात्रा में सेवन शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें। किसी भी उपचार या दवा में बदलाव बिना चिकित्सीय सलाह के न करें।

  • हाई प्रोटीन डाइट के लिए ट्राई करें ये रोटी, गेहूं के आटे में मिलाएं ये खास चीज..

    हाई प्रोटीन डाइट के लिए ट्राई करें ये रोटी, गेहूं के आटे में मिलाएं ये खास चीज..

    क्या आप प्लांट-बेस्ड डाइट पर रहकर भी मजबूत मसल्स बनाना चाहते हैं? डॉ. अनूप मिश्रा के मुताबिक, सिर्फ प्रोटीन ही काफी नहीं है, बल्कि ‘ल्यूसीन’ नाम के एक खास अमीनो एसिड की जरूरत होती है। जानिए कैसे सही चुनाव और फूड कॉम्बिनेशन से आप बिना किसी सप्लीमेंट के अपनी फिटनेस गोल को हासिल कर सकते हैं।

    हाई प्रोटीन डाइट के लिए ट्राई करें ये रोटी, गेहूं के आटे में मिलाएं ये खास चीज..

    (Image: AI Generated)

    शाकाहारी लोगों की अक्सर शिकायत रहती है उनके पास प्रोटीन सोर्स की कमी रहती है इसलिए उनके मसल्स जल्दी नहीं बन पाते लेकिन एक डॉक्टर ने इसका तरीका भी बताया है. डॉ. अनूप मिश्रा का कहना है, मसल्स बनाने के लिए सिर्फ प्रोटीन की मात्रा देखना काफी नहीं है बल्कि उसके साथ ल्यूसीन (Leucine) नाम के एक जरूरी अमीनो एसिड का सही लेवल होना बहुत जरूरी है. ल्यूसीन मसल्स के लिए एक ट्रिगर की तरह काम करता है, जो मसल्स प्रोटीन सिंथेसिस को एक्टिवेट करता है.  

    क्यों जरूरी है ल्यूसीन?

    ल्यूसीन एक ऐसा अमीनो एसिड है जो हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता इसलिए इसे डाइट से लेना जरूरी होता है. यह मसल्स को संकेत देता है कि उन्हें प्रोटीन का उपयोग करके बढ़ना और रिकवर होना है. जब आप स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या वजन उठाने वाली एक्सरसाइज करते हैं तो ल्यूसीन का सही सेवन मसल्स को तेजी से रिकवर करने और मजबूती देने में मदद करता है.

    कई रिसर्च बताती हैं कि सही मात्रा में ल्यूसीन मिलने पर प्लांट-बेस्ड प्रोटीन भी मसल्स बिल्डिंग में उतने ही कारगर हो सकते हैं जितने कि एनिमल प्रोटीन.  

    क्या है सही चुनाव?

    डॉ. मिश्रा के अनुसार, बेसन जैसे ऑप्शंस में प्रोटीन की अच्छी मात्रा होती है. 100 ग्राम बेसन में करीब 20 ग्राम प्रोटीन मिल सकता है जो कि गेहूं या अन्य अनाजों के मुकाबले काफी बेहतर है. इसके अलावा, सोयाबीन प्लांट-बेस्ड प्रोटीन के सबसे बेहतरीन सोर्सेज में से एक है. सोया न केवल हाई-प्रोटीन है, बल्कि इसमें ल्यूसीन भी भरपूर होता है, जिससे यह मसल्स बिल्डिंग के लिए एक स्मार्ट और सुलभ विकल्प बन जाता है.  

    डाइट में करें ये छोटा सा बदलाव 

    डॉ. का सुझाव है कि हर मील में प्रोटीन और ल्यूसीन के सही बैलेंस पर ध्यान दें. यदि आप अपनी मील में बेसन या अन्य प्रोटीन सोर्सेज को मिक्स करते हैं तो इससे आपकी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ेगी और कार्बोहाइड्रेट का असर कम हो जाएगा. यह न केवल आपकी मसल्स बनाने में मदद करेगा बल्कि ब्लड शुगर लेवल को भी कंट्रोल में रखने में मददगार हो सकता है. कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स का चुनाव करने और खाने के तरीके को सही रखने से बिना किसी महंगी दवा के आपकी सेहत में बड़ा सुधार आ सकता है.