Category: Health

  • सौंफ का पानी पीने से पहले जान लें एक्सपर्ट की सलाह, फायदे के साथ ये सावधानियां भी हैं जरूरी..

    सौंफ का पानी पीने से पहले जान लें एक्सपर्ट की सलाह, फायदे के साथ ये सावधानियां भी हैं जरूरी..

    सौंफ का पानी पीने से पहले जान लें एक्सपर्ट की सलाह, फायदे के साथ ये सावधानियां भी हैं जरूरी..

    भारतीय घरों में खाने के बाद माउथ फ्रेशनर के रूप में इस्तेमाल होने वाली सौंफ सिर्फ मुंह की दुर्गंध ही दूर नहीं करती, बल्कि यह औषधीय गुणों का खजाना है। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक न्यूट्रिशन साइंस तक में सौंफ को सेहत के लिए बेहद गुणकारी माना गया है। खासकर सुबह खाली पेट ‘सौंफ का पानी’ पीना आज के समय में एक लोकप्रिय हेल्थ ट्रेंड बन चुका है। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि यह न केवल आपके पाचन तंत्र को दुरुस्त रखता है, बल्कि खून को साफ करके स्किन में भी नेचुरल निखार लाता है।

    डॉक्टर के मुताबिक सौंफ के पानी का सेवन करने से पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है। ये पानी गैस, एसिडिटी, ब्लोटिंग, पेट में भारीपन और कब्ज जैसी समस्याओं का इलाज करने में काफी असरदार साबित होता है। सौंफ में मौजूद प्राकृतिक तत्व एनेथॉल (Anethole), फैंचोन (Fenchone) और एस्ट्रा गोल (Estragole) आंतों की मांसपेशियों को आराम पहुंचाने में मदद करते हैं। इससे पेट की ऐंठन कम होती है और भोजन आसानी से आगे बढ़ता है।

    एक्सपर्ट के मुताबिक सौंफ पाचन एंजाइमों के स्राव को भी बढ़ावा देती है, जिससे भोजन अच्छी तरह पचता है, पोषक तत्वों का अवशोषण बेहतर होता है और पेट हल्का महसूस होता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि सौंफ के पानी का सेवन करने से सेहत को कौन कौन सा फायदा होता है।

    बॉडी रहती है एनर्जेटिक

    एक्सपर्ट ने बताया जब पाचन सही रहता है तो शरीर को भोजन से पर्याप्त पोषण मिलता है। इससे ऊर्जा का स्तर बेहतर रहता है और व्यक्ति अधिक सक्रिय महसूस करता है। सौंफ के पानी का सेवन आप रोज सुबह खाली पेट करें आपको फायदा होगा।

    स्किन की रंगत में होता है सुधार

    हंसा जी योगेंद्र के अनुसार स्किन की अधिकांश समस्याओं की शुरुआत शरीर के अंदर से होती है। अगर पाचन सही नहीं रहता तो शरीर में टॉक्सिन जमा होने लगते हैं, जिसका असर चेहरे पर भी दिखाई देता है। इन टॉक्सिन के जमा होने से चेहरे पर मुंहासे, स्किन की चमक कम होना, चेहरे पर सूजन होना, थकी हुई स्किन और समय से पहले झुर्रियां आने लगती हैं। सौंफ में विटामिन E और क्वेरसेटिन (Quercetin) जैसे एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो शरीर में फ्री रेडिकल्स के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं, जिससे स्किन की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।

    बॉडी को ठंडा रखता है सौंफ का पानी

    हंसा जी योगेंद्र का कहना है कि सौंफ का पानी शरीर की अतिरिक्त गर्मी यानी पित्त को शांत करने में मदद करता है। उनके अनुसार इससे शरीर अंदर से संतुलित रहता है। सौंफ का पानी लीवर को हेल्दी रखने और खून को साफ रखने में मदद करता है। उनका कहना है कि जब शरीर अंदर से साफ रहता है तो इसका असर स्किन पर भी दिखाई देता है।

    सौंफ का पानी बनाने का पहला तरीका

    हंसा जी योगेंद्र के अनुसार सौंफ का पानी बनाने के लिए एक चम्मच सौंफ लें और उसे हल्का-सा कूट लें। एक गिलास पानी में रातभर भिगो दें और सुबह पानी छानकर खाली पेट पी लें। गर्मी में इस पानी का सेवन शरीर को ठंडक पहुंचाएगा। एसिडिटी की समस्या में राहत देगा।

    सौंफ के पानी के नुकसान और सावधानियां (Side Effects & Precautions)

    1. यूं तो सौंफ का पानी सेहत के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है लेकिन कुछ हेल्थ कंडीशन में सौंफ के पानी का अत्याधिक सेवन नुकसान भी पहुंचा सकता है जैसे गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं इसका ज्यादा सेवन करने से बचें। सौंफ में एनेथॉल होता है जो एस्ट्रोजन हार्मोन की तरह काम कर सकता हैं, इसलिए प्रेग्नेंसी में और ब्रेस्ट फीडिंग कराने वाली महिलाएं इसका सेवन करने से परहेज करें।
    2. जिन लोगों को एलर्जी की समस्या है वो सौंफ का सेवन करने से परहेज करें। इससे स्किन पर रैशेज, खुजली या सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।
    3. लो ब्लड शुगर (Hypoglycemia) के मरीजों को सौंफ का सेवन करने से परहेज करना चाहिए। सौंफ का पानी ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है। ऐसे में जो लोग पहले से ही डायबिटीज की दवाएं ले रहे हैं वो डॉक्टर की सलाह से सौंफ के पानी का सेवन करें।
    4. सौंफ पाचन को दुरुस्त करती है, लेकिन इसका ज्यादा सेवन पेट में मरोड़ या Loose motions का कारण भी बन सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख हंसा जी योगेंद्र द्वारा साझा की गई जानकारी और उपलब्ध सामान्य स्वास्थ्य तथ्यों पर आधारित है। सौंफ का पानी एक प्राकृतिक घरेलू उपाय है, लेकिन यह किसी भी बीमारी का इलाज या डॉक्टर द्वारा दी गई दवा का विकल्प नहीं है। यदि आपको लगातार गैस, एसिडिटी, पाचन संबंधी समस्या हैं, तो सौंफ का पानी नियमित रूप से पीने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें। बिना चिकित्सकीय सलाह के किसी भी दवा या उपचार में बदलाव न करें।

  • चेहरे का खोया निखार लौटाएगा मलाई का ये आसान उपाय, हफ्ते में 2 बार करें इस्तेमाल

    चेहरे का खोया निखार लौटाएगा मलाई का ये आसान उपाय, हफ्ते में 2 बार करें इस्तेमाल

    चेहरे का खोया निखार लौटाएगा मलाई का ये आसान उपाय, हफ्ते में 2 बार करें इस्तेमाल

    अगर आप बिना महंगे ब्यूटी प्रोडक्ट्स के चेहरे पर नेचुरल ग्लो चाहते हैं, तो दूध की मलाई और आलू के रस से बना ये होममेड फेस पैक आपके काम आ सकता है. आज हम आपको दादी-नानी के इस नुस्खों को बनाने का सही तरीका, फायदे, इस्तेमाल का तरीका बताने वाले हैं.

    Glowing Skin Home Remedy: शायद ही कोई हो जो अपनी स्किन को साफ, मुलायम और ग्लोइंग ना रखना चाहता हो. सभी सुंदर दिखने के साथ ही चाहते हैं कि उनका चेहरा साफ, मुलायम और चमकदार दिखे. इसके लिए लोग खूब महंगी-महंगी फेस क्रीम से लेकर सीरम और स्किन केयर प्रोडक्ट्स खरीदते हैं. ये सब खरीदने के लिए पैसे खर्च करने में भी कतराते नहीं हैं. लेकिन लोग ये नहीं जानते हैं कि कई बार जिस चीज की तलाश वो बाजार में करते हैं, वो घर की रसोई में ही मौजूद होती है.

    दादी-नानी के बताए कुछ घरेलू नुस्खे आज भी काफी मशहूर हैं, जिनकी मदद से स्किन को साफ-सुथरा रखने के साथ ही ग्लोइंग बनाने में भी मदद मिलती है. ऐसा ही एक आसान उपाय है ताजे दूध की मलाई में एक खास चीज मिलाकर चेहरे पर लगाना. अगर ये आपकी स्किन को सूट करे, तो इससे स्किन को नेचुरल ग्लो और नमी बनाए रखने में मदद मिल सकती है. चलिए जानते हैं स्किन को ग्लोइंग बनाने का ये देसी और सस्ता तरीका क्या है.

    स्किन के लिए क्यों फायदेमंद है मलाई?
    पिछले कई दशकों से दूध की ताजी मलाई को लंबे समय से स्किन केयर में इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसमें लैक्टिक एसिड होता है, जो स्किन की ऊपरी लेयर पर जमा डेड स्किन सेल्स को धीरे-धीरे हटाने में मदद करता है. इसके साथ ही मलाई में मौजूद नेचुरल फैट स्किन को अच्छी तरह मॉइश्चराइज करता है, जिससे चेहरा मुलायम और हाइड्रेटेड महसूस होता है.

    मलाई में मिलाएं आलू का रस
    अगर आप मलाई के साथ आलू का रस मिलाते हैं, तो ये एक होममेड फेस पैक बन जाता है. इसके लिए 1-2 चम्मच ताजी मलाई में थोड़ा सा ताजा आलू का रस मिलाकर अच्छी तरह मिक्स कर लें. अगर आपकी स्किन पर आलू का रस सूट नहीं करता, तो उसकी जगह चावल का पानी भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

    आलू का रस क्यों माना जाता है असरदार?
    स्किन पर मलाई के साथ आलू का रस मिलाकर लगाना बहुत फायदेमंद माना जाता है. आलू के रस में विटामिन सी और कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं, जो स्किन को फ्रेश दिखाने में मदद कर सकते हैं. इसे अक्सर दाग-धब्बों, हल्की टैनिंग और पिगमेंटेशन हटाने के लिए घरेलू नुस्खों में इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, ये किस व्यक्ति की स्किन पर कैसा और कितना असर करती है वो अलग-अलग हो सकता है. 

    फेस पैक लगाने का सही तरीका
    इस फेस पैक को हफ्ते में 2 से 3 बार लगाया जा सकता है.

  • किस उम्र में कौन-सा हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए? 20 से 60 साल तक की पूरी चेकअप गाइड..

    किस उम्र में कौन-सा हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए? 20 से 60 साल तक की पूरी चेकअप गाइड..

    किस उम्र में कौन-सा हेल्थ टेस्ट कराना चाहिए? 20 से 60 साल तक की पूरी चेकअप गाइड..

    जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, सेहत से जुड़े जोखिम भी बदलते रहते हैं, इसलिए उम्र के हिसाब से हेल्थ चेक-अप करवाना बचाव के लिए जरूरी हो जाता है। जवानी से लेकर बुढ़ापे तक अलग-अलग तरह की बीमारियां होने का खतरा रहता है, जिसके लिए खास तरह की प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग और रेगुलर मेडिकल टेस्ट की ज़रूरत होती है। यह जानना कि जिंदगी के किस पड़ाव पर कौन से टेस्ट ज़रूरी हैं, सेहत से जुड़ी समस्याओं का जल्दी पता लगाने और उन्हें सही ढंग से संभालने में मदद करता है। यह गाइड अलग-अलग उम्र के लोगों के लिए ज़रूरी स्क्रीनिंग के बारे में बताती है, ताकि आप अपनी सेहत और भलाई को लेकर पहले से ही सतर्क रह सकें।

    उम्र के हिसाब से हेल्थ चेक-अप क्यों ज़रूरी हैं

    समय के साथ इंसानी शरीर बदलता है और सेहत से जुड़े संभावित जोखिम भी बदलते हैं। जवानी के शुरुआती दौर में ध्यान बीमारियों से बचाव और सेहत के बेसलाइन (शुरुआती स्तर) को ट्रैक करने पर होता है, जबकि बाद के चरणों में पुरानी या गंभीर बीमारियों की निगरानी जरूरी हो जाती है। नियमित प्रिवेंटिव केयर (बचाव वाली देखभाल) से लक्षणों के दिखने से पहले ही छिपी हुई बीमारियों का पता लगाने में मदद मिलती है। इससे समय पर इलाज हो पाता है, बेहतर नतीजे मिलते हैं और लंबे समय तक रहने वाली जटिलताओं का खतरा कम होता है।


    जवानी के शुरुआती दौर में हेल्थ चेक-अप (उम्र 20–29)

    इस दौर को अक्सर सबसे सेहतमंद माना जाता है, लेकिन लंबे समय तक सेहतमंद रहने के लिए मज़बूत नींव बनाना ज़रूरी है। जवानी के शुरुआती दौर में सुझाए गए हेल्थ टेस्ट:

    -ब्लड प्रेशर की जांच (हर 1–2 साल में)
    -बॉडी मास इंडेक्स (BMI) और वजन की निगरानी
    -बेसिक ब्लड टेस्ट (CBC, अगर जोखिम के कारण हों तो ब्लड शुगर)
    -लिपिड प्रोफ़ाइल (अगर परिवार में बीमारी का इतिहास हो या जीवनशैली से जुड़ा जोखिम हो)
    -यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की जांच
    मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन (तनाव, एंग्जायटी, नींद के पैटर्न)

    ये रूटीन हेल्थ टेस्ट जीवनशैली से जुड़े शुरुआती जोखिमों की पहचान करने और सेहत का बेसलाइन तय करने में मदद करते हैं।

    युवावस्था में हेल्थ चेक-अप (उम्र 30–39)

    जैसे-जैसे मेटाबॉलिज़्म बदलने लगता है, इस दौर में ज़्यादा व्यवस्थित प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग की ज़रूरत होती है। उम्र (30–39) के हिसाब से सुझाए गए मेडिकल टेस्ट:

    -हर साल ब्लड प्रेशर की निगरानी
    -फास्टिंग ब्लड शुगर और HbA1c
    -लिपिड प्रोफ़ाइल (कोलेस्ट्रॉल का स्तर)
    -थायरॉइड फंक्शन टेस्ट
    -लिवर और किडनी फंक्शन टेस्ट
    -सर्वाइकल स्क्रीनिंग (महिलाओं के लिए पैप स्मीयर)
    -तनाव, नींद और जीवनशैली का आकलन

    ये स्क्रीनिंग डायबिटीज़ या हार्मोनल असंतुलन जैसी बीमारियों के शुरुआती लक्षणों का पता लगाने में मदद करती हैं।


    मध्य-आयु में हेल्थ चेक-अप (उम्र 40–49)

    यह एक अहम दौर है जब कई छिपी हुई बीमारियां सामने आने लगती हैं। 40 साल की उम्र के बाद ज़रूरी टेस्ट:

    -डायबिटीज की जांच (फास्टिंग ग्लूकोज, HbA1c)
    -दिल की सेहत की जांच (ECG, लिपिड प्रोफाइल)
    -ब्लड प्रेशर की नियमित जांच
    -मैमोग्राम (महिलाओं के लिए, जोखिम के आधार पर)
    -प्रोस्टेट हेल्थ स्क्रीनिंग (पुरुषों के लिए, अगर सलाह दी जाए)
    -आंखों की जांच (दृष्टि और ग्लूकोमा की जांच)
    -विटामिन D और हड्डियों की सेहत की जांच

    इस उम्र में, नियमित प्रिवेंटिव हेल्थ स्क्रीनिंग से गंभीर समस्याओं का जोखिम काफी कम हो सकता है।


    बाद की उम्र में हेल्थ चेक-अप (50 साल और उससे ज़्यादा उम्र)

    उम्र बढ़ने के साथ पुरानी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है, इसलिए नियमित चेक-अप ज़रूरी हो जाते हैं। बाद की उम्र में सुझाई गई हेल्थ स्क्रीनिंग:

    -कैंसर की जांच (कोलन, ब्रेस्ट, प्रोस्टेट)
    -बोन डेंसिटी टेस्ट (ऑस्टियोपोरोसिस की जांच)
    -कार्डियोवैस्कुलर स्क्रीनिंग (ECG, ज़रूरत पड़ने पर स्ट्रेस टेस्ट)
    -ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की निगरानी
    -सुनने और देखने की क्षमता की जांच
    -किडनी और लिवर के कामकाज की जांच

    नोट: किसी भी मेडिकल कंडीशन का खुद से इलाज करने की बजाय अपने डॉक्टर की सलाह लें।

  • चीनी छोड़ने का 30-Day Challenge, जानिए शरीर पर पड़ने वाले जबरदस्त असर

    चीनी छोड़ने का 30-Day Challenge, जानिए शरीर पर पड़ने वाले जबरदस्त असर

    चीनी छोड़ने का 30-Day Challenge, जानिए शरीर पर पड़ने वाले जबरदस्त असर

    आज के समय में फिट और हेल्दी रहने के लिए लोग अपनी डाइट पर पहले से ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इसी वजह से ’30 Days No Sugar Challenge’ तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। इस चैलेंज में 30 दिनों तक ऐडेड शुगर (Added Sugar) यानी बाहर से मिलाई गई चीनी वाले चीजें और पेय पदार्थों से दूरी बनाई जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर आप एक महीने तक अतिरिक्त चीनी का सेवन बंद कर संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाते हैं, तो शरीर में कई सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। इससे ब्लड शुगर कंट्रोल, वजन प्रबंधन, ऊर्जा स्तर और दिल की सेहत पर अच्छा असर पड़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको फलों, दूध या अन्य नेचुरल मिठास (Natural Sugar) वाले खाद्य पदार्थों का सेवन भी छोड़ देना चाहिए। उनका सेवन संतुलित मात्रा में किया जा सकता है।

    क्या है ’30 Days No Sugar Challenge’?

    इस चैलेंज में उन सभी चीजों से दूरी बनाई जाती है जिनमें बाहर से चीनी मिलाई जाती है। 
    इनमें शामिल हैं, कोल्ड ड्रिंक और सॉफ्ट ड्रिंक्स
    मिठाइयां, केक और पेस्ट्री
    पैक्ड जूस, कुकीज और कैंडी 
    फ्लेवर्ड योगर्ट
    मीठी सॉस और प्रोसेस्ड स्नैक्स
    इनकी जगह ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, अंडे, ड्राई फ्रूट्स और घर का बना संतुलित भोजन खाने की सलाह दी जाती है।

    ब्लड शुगर रहेगा ज्यादा संतुलित

    बार-बार मीठा खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता और फिर अचानक गिरता है। इससे थकान, कमजोरी और बार-बार भूख लगने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। अगर आप 30 दिनों तक अतिरिक्त चीनी कम कर देते हैं, तो ब्लड शुगर अधिक स्थिर रहने में मदद मिल सकती है। इससे इंसुलिन बेहतर तरीके से काम कर सकता है और लंबे समय में टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

    वजन घटाने में मिल सकती है मदद

    मीठे खाद्य पदार्थों में कैलोरी अधिक होती है, लेकिन इनमें फाइबर और प्रोटीन बहुत कम होता है। यही वजह है कि इन्हें खाने के बाद जल्दी भूख लग सकती है। जब आप अतिरिक्त चीनी कम करते हैं, तो कुल कैलोरी का सेवन भी कम हो सकता है, जिससे वजन नियंत्रित रखने और वजन घटाने में मदद मिल सकती है।

    दिनभर महसूस होगी बेहतर एनर्जी

    बहुत ज्यादा चीनी खाने के बाद कुछ समय के लिए एनर्जी बढ़ती है, लेकिन फिर अचानक गिर जाती है। इसे शुगर क्रैश कहा जाता है। 30 दिनों तक ज्यादा चीनी कम करने पर कई लोगों को दिनभर अधिक स्थिर ऊर्जा, कम सुस्ती और बेहतर फोकस महसूस हो सकता है।

    दांत रहेंगे ज्यादा स्वस्थ

    चीनी मुंह में मौजूद बैक्टीरिया को बढ़ावा देती है। ये बैक्टीरिया एसिड बनाते हैं, जो दांतों की ऊपरी परत (एनामेल) को नुकसान पहुंचाते हैं। मीठे खाद्य पदार्थ कम खाने से कैविटी, दांतों की सड़न और मसूड़ों से जुड़ी समस्याओं का खतरा कम हो सकता है।

    दिल और लिवर को मिल सकता है फायदा

    लंबे समय तक अधिक मात्रा में अतिरिक्त चीनी का सेवन मोटापा, फैटी लिवर, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और हृदय रोगों के जोखिम को बढ़ा सकता है। अगर आप संतुलित आहार के साथ अतिरिक्त चीनी कम करते हैं, तो इससे दिल और लिवर की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

    मीठा खाने की आदत भी कम हो सकती है

    शुरुआती कुछ दिनों में मीठा खाने की इच्छा ज्यादा हो सकती है, लेकिन धीरे-धीरे स्वाद बदलने लगता है। कई लोगों को कुछ सप्ताह बाद पहले जितनी मिठास की जरूरत महसूस नहीं होती और प्राकृतिक मिठास वाले फल भी ज्यादा स्वादिष्ट लगने लगते हैं।

    क्या प्राकृतिक चीनी भी छोड़नी चाहिए?

    नहीं। फलों, दूध और बिना चीनी वाले दही में मौजूद प्राकृतिक शुगर के साथ फाइबर, विटामिन, मिनरल्स और अन्य पोषक तत्व भी मिलते हैं। इसलिए ‘नो शुगर चैलेंज’ का उद्देश्य ऐडेड शुगर को कम करना है, न कि प्राकृतिक शुगर को पूरी तरह छोड़ना।

    बेहतर परिणाम के लिए इन बातों का रखें ध्यान

    रोज कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें।
    पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं।
    7–8 घंटे की नींद लें।
    पैक्ड फूड खरीदते समय लेबल जरूर पढ़ें।
    प्रोटीन और फाइबर से भरपूर भोजन करें।
    मीठे पेय की जगह सादा पानी, नारियल पानी या बिना चीनी की छाछ लें।

    30 दिनों तक अतिरिक्त चीनी छोड़ना आपकी सेहत के लिए एक सकारात्मक शुरुआत हो सकती है। इससे ब्लड शुगर कंट्रोल, वजन प्रबंधन, दांतों की सुरक्षा, बेहतर ऊर्जा और हृदय स्वास्थ्य जैसे कई फायदे मिल सकते हैं। हालांकि, केवल चीनी छोड़ना ही पर्याप्त नहीं है। लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और सक्रिय जीवनशैली अपनाना भी उतना ही जरूरी है।

    नोट: यदि आपको डायबिटीज, थायरॉयड या कोई अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, तो अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या रजिस्टर्ड डाइटिशियन की सलाह जरूर लें।

  • सिरदर्द को हर बार माइग्रेन समझना पड़ सकता है भारी, जानिए Headache के प्रकार..

    सिरदर्द को हर बार माइग्रेन समझना पड़ सकता है भारी, जानिए Headache के प्रकार..

    सिरदर्द को हर बार माइग्रेन समझना पड़ सकता है भारी, जानिए Headache के प्रकार..

    अकसर यही मान लिया जाता है सिरदर्द मतलब माइग्रेन।  सिरदर्द की बीमारी नर्वस सिस्टम की सबसे आम बीमारियों में से हैं। हालांकि  इसका कारण सिर्फ माइग्रेन ही नहीं है  कई बार सिरदर्द विकलांगता, खराब क्वालिटी ऑफ लाइफ और पैसे के बोझ जैसे पर्सनल और सामाजिक बोझ से जुड़ा होता है। दुनिया भर में सिरदर्द को कम आंका गया है, कम पहचाना गया है और कम इलाज किया गया है। आज हम आपको  सिरदर्द की समस्याओं और माइग्रेन की जटिलताओं के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

    सिरदर्द की बीमारियां, जिनमें बार-बार सिरदर्द होता है, नर्वस सिस्टम की सबसे आम बीमारियों में से हैं। सिरदर्द प्राइमरी सिरदर्द की बीमारियों, जैसे माइग्रेन, टेंशन-टाइप सिरदर्द और क्लस्टर सिरदर्द का एक दर्दनाक और कमज़ोर करने वाला लक्षण है। सिरदर्द कई दूसरी बीमारियों की वजह से भी हो सकता है या उनके बाद हो सकता है, जिनमें सबसे आम है दवा के ज़्यादा इस्तेमाल से होने वाला सिरदर्द। यह बच्चों और किशोरों को भी हो सकता है, लेकिन यह उन्हें अलग-अलग तरीकों से प्रभावित कर सकता है।  दुनिया भर में, सिरदर्द की बीमारी लगभग 40% आबादी, या 2021 में 3.1 बिलियन लोगों को प्रभावित करती है, और पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज़्यादा आम है।


    सिरदर्द क्यों है इतना खतरनाक

    ग्लोबल हेल्थ एस्टिमेट्स 2021 के अनुसार, स्ट्रोक और नियोनेटल एन्सेफैलोपैथी के बाद, माइग्रेन सिरदर्द दुनिया भर में डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ ईयर्स (DALYs) का तीसरा सबसे बड़ा कारण पाया गया। बार-बार सिरदर्द के दौरे और अक्सर अगले दौरे का लगातार डर, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन और नौकरी को नुकसान पहुंचाता है। लंबे समय तक सिरदर्द की पुरानी बीमारी से निपटने की कोशिश करने से व्यक्ति को दूसरी बीमारियां भी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, माइग्रेन से पीड़ित लोगों में एंग्जायटी और डिप्रेशन होना, स्वस्थ लोगों की तुलना में काफी आम है।

    माइग्रेन, टेंशन वाले सिरदर्द, क्लस्टर सिरदर्द और दवा के ज़्यादा इस्तेमाल से होने वाले सिरदर्द पब्लिक हेल्थ के लिए ज़रूरी हैं क्योंकि ये आबादी में विकलांगता और खराब सेहत के बड़े लेवल के लिए ज़िम्मेदार हैं। माइग्रेन की पहचान बार-बार होने वाले दौरे हैं और यह अक्सर ज़िंदगी भर रहता है। यह एक प्राइमरी सिरदर्द की बीमारी है, जो ज़्यादातर मामलों में एपिसोडिक होती है, आमतौर पर 4–72 घंटे तक रहती है, और इसके साथ जी मिचलाना, उल्टी और/या फोटोफोबिया और फोनोफोबिया भी होता है। कभी-कभी इससे पहले ठीक हो सकने वाले, देखने वाले, सेंसरी या दूसरे लक्षणों का एक औरा होता है। माइग्रेन ज़्यादातर प्यूबर्टी में शुरू होता है और आमतौर पर 35 से 45 साल की उम्र के लोगों को प्रभावित करता है। यह महिलाओं में ज़्यादा आम है, शायद हॉर्मोनल असर की वजह से। अटैक में आमतौर पर सिरदर्द शामिल होता है, जो अक्सर: मध्यम या तेज़ तीव्रता का, एक तरफ़ या आंख के पीछे, एक जैसी धड़कन, रोज़ाना की शारीरिक गतिविधि से बढ़ जाना रोशनी और आवाज़ों के प्रति सेंसिटिव होना; औजी मिचलाने के साथ होता है।


    टेंशन-टाइप सिरदर्द

    टेंशन-टाइप सिरदर्द (TTH) को दबाव या जकड़न के रूप में बताया जाता है, जो अक्सर सिर के चारों ओर एक बैंड जैसा होता है, कभी-कभी गर्दन में या उससे फैल जाता है। ये तनाव से जुड़े हो सकते हैं या गर्दन में मस्कुलोस्केलेटल समस्याओं से जुड़े हो सकते हैं। ये अक्सर टीनएज में शुरू होते हैं और पुरुषों की तुलना में महिलाओं को 50% ज़्यादा प्रभावित करते हैं। एपिसोडिक TTH, जो महीने में 15 दिन से भी कम होता है कुछ आबादी के 70% से ज़्यादा लोग इसकी रिपोर्ट करते हैं। एपिसोडिक TTH अटैक आमतौर पर कुछ घंटों तक रहते हैं लेकिन कई दिनों तक रह सकते हैं।


    क्लस्टर सिरदर्द

    क्लस्टर सिरदर्द (CH) एक प्राइमरी सिरदर्द की बीमारी है जिसकी पहचान बार-बार होने वाला (दिन में कई बार तक), छोटा लेकिन बहुत तेज़ सिरदर्द है, जो आमतौर पर एक आंख में या उसके आस-पास होता है, जिसमें आंख से पानी आता है और वह लाल हो जाती है। प्रभावित हिस्से पर अक्सर नाक बहती है या बंद हो जाती है और पलक झुक सकती है। CH काफ़ी कम होता है और यह 1000 में से 1 से भी कम वयस्कों को प्रभावित करता है, हर महिला पर छह पुरुषों को प्रभावित करता है। CH से पीड़ित ज़्यादातर लोग 20 साल या उससे ज़्यादा उम्र के होते हैं। CH में एपिसोडिक और ch होते हैं।

    इलाज

    सिरदर्द से परेशान बहुत से लोगों को सही डायग्नोसिस और देखभाल नहीं मिल पाती। सिरदर्द की समस्याओं के सही इलाज के लिए हेल्थ प्रोफेशनल्स की ट्रेनिंग, सही डायग्नोसिस और स्थिति की पहचान, किफायती दवाओं से सही इलाज, जीवनशैली में आसान बदलाव और मरीज़ को जानकारी देना ज़रूरी है।  माइग्रेन के इलाज के लिए, दर्द शुरू होने से रोकने के लिए लक्षणों (जैसे विज़ुअल ऑरा) के दिखते ही एनाल्जेसिक दवाएं लेनी चाहिए। दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल से होने वाले सिरदर्द, माइग्रेन को बढ़ाने वाली चीज़ों (ट्रिगर्स) और जीवनशैली में बदलाव के बारे में लोगों को जागरूक करने के आसान उपाय बहुत असरदार होते हैं।

    नोट: किसी भी मेडिकल कंडीशन का खुद से इलाज करने की बजाय अपने डॉक्टर की सलाह लें।

  • सिगरेट के अलावा ये लाइफस्टाइल हैबिट्स भी कर सकती हैं स्पर्म काउंट को प्रभावित..

    सिगरेट के अलावा ये लाइफस्टाइल हैबिट्स भी कर सकती हैं स्पर्म काउंट को प्रभावित..

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    पुरुषों की फर्टिलिटी से जुड़ी एक आम समस्या है लो स्पर्म काउंट, जिसे मेडिकल भाषा में ओलिगोस्पर्मिया कहा जाता है। जब एक मिलीलीटर वीर्य में स्पर्म की संख्या 1.5 करोड़ से कम हो जाती है, तो इसे सामान्य से कम माना जाता है। वहीं अगर वीर्य में स्पर्म बिल्कुल न हों, तो इस स्थिति को एजूस्पर्मिया कहा जाता है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण की संभावना काफी कम हो जाती है।

    क्या होते हैं इसके लक्षण

    लो स्पर्म काउंट का सबसे बड़ा संकेत यही है कि लंबे समय तक कोशिश करने के बावजूद गर्भधारण नहीं हो पाता। कई मामलों में इसके अलावा कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। हालांकि कुछ पुरुषों में हार्मोन असंतुलन की वजह से यौन इच्छा में कमी, इरेक्शन से जुड़ी समस्या, टेस्टिकल में दर्द, सूजन या गांठ जैसी परेशानियां भी देखने को मिल सकती हैं।

    सिर्फ धूम्रपान नहीं, ये कारण भी जिम्मेदार

    अक्सर लोग मानते हैं कि स्पर्म काउंट कम होने की वजह सिर्फ सिगरेट या तंबाकू है, लेकिन इसके पीछे कई और कारण भी हो सकते हैं। मोटापा, लगातार तनाव, ज्यादा शराब का सेवन और नशीले पदार्थ भी पुरुषों की फर्टिलिटी पर असर डालते हैं। इसके अलावा हार्मोन असंतुलन, थायरॉयड की समस्या, वैरिकोसील जैसी बीमारी, कुछ इंफेक्शन और लंबे समय तक कुछ दवाओं का सेवन भी स्पर्म की गुणवत्ता और संख्या को प्रभावित कर सकता है।

    कब करानी चाहिए जांच

    अगर कोई कपल एक साल तक बिना किसी गर्भनिरोधक के नियमित प्रयास के बाद भी गर्भधारण नहीं कर पाता, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी माना जाता है। जिन लोगों को पहले से टेस्टिकल या प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या रही है, उन्हें भी समय पर जांच करानी चाहिए ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके।

    क्या इसे ठीक किया जा सकता है

    अच्छी बात यह है कि हर केस में लो स्पर्म काउंट का मतलब बांझपन नहीं होता। कई मामलों में लाइफस्टाइल सुधार और सही इलाज से स्थिति बेहतर की जा सकती है। संतुलित आहार, नियमित एक्सरसाइज, वजन कंट्रोल, तनाव कम करना और धूम्रपान-शराब से दूरी बनाना स्पर्म की गुणवत्ता सुधारने में मदद करता है। इसके अलावा आधुनिक फर्टिलिटी ट्रीटमेंट्स की मदद से भी गर्भधारण की संभावना बढ़ाई जा सकती है।

  • जवानी में ही धुंधली पड़ सकती है नजर, Diabetes और High BP वालों के लिए जरूरी चेतावनी..

    जवानी में ही धुंधली पड़ सकती है नजर, Diabetes और High BP वालों के लिए जरूरी चेतावनी..

    जवानी में ही धुंधली पड़ सकती है नजर, Diabetes और High BP वालों के लिए जरूरी चेतावनी..

    मोतियाबिंद एक आम समस्या है जिसमें लोगों की नजर धीरे-धीरे और बिना किसी दर्द के कम होने लगती है। अक्सर इसे बुढ़ापे से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है। क्या आप जानते हैं कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी पुरानी बीमारियां मोतियाबिंद को बढा देती है और कुछ लोगों को उम्र से पहले ही दिखना बंद हो जाता है। आज समझते हैं इसके बारे में विस्तार से।

    HT लाइफ़स्टाइल से बात करते हुए मोतियाबिंद, कॉर्निया और रिफ्रैक्टिव सर्जन  ने बताया कि  “मोतियाबिंद तब होता है जब आंख का नैचुरल लेंस धीरे-धीरे अपनी स्पष्टता खोने लगता है और धुंधला हो जाता है, जिससे रोशनी अंदर नहीं जा पाती। लक्षणों के धीरे-धीरे बढ़ने के कारण कई लोगों के लिए यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि उनकी नज़र कैसे लगातार खराब होती जा रही है।” मोतियाबिंद के आम लक्षणों में शामिल है: धुंधली नज़र, रात में गाड़ी चलाते समय चकाचौंध महसूस होना, रंग फीके दिखना, पढ़ने में कठिनाई और चश्मे के नंबर में बार-बार बदलाव।


    डायबिटीज इस तरह आंखों पर करती है अटैक

    डॉक्टर कहते हैं- डायबिटीज़ के मरीज़ों में कम उम्र में ही मोतियाबिंद होने की संभावना ज़्यादा होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि लंबे समय तक ब्लड शुगर का लेवल बढ़ा रहने से आंख के लेंस में धीरे-धीरे बदलाव आते हैं, जिससे समय के साथ उसमें धुंधलापन आ जाता है। हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) को “साइलेंट किलर” कहा जाता है क्योंकि यह व्यक्ति की सेहत पर बुरा असर डालता है। हालाँकि, यह एक ऐसी स्थिति भी है जो आंखों की सेहत को प्रभावित कर सकती है और आंखों की रोशनी जा सकती है।

    डॉक्टर का कहना है कि- “लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से शरीर की सभी रक्त वाहिकाओं (blood vessels) को नुकसान पहुंच सकता है, जिनमें आंखों तक रक्त पहुंचाने वाली वाहिकाएं भी शामिल हैं। अध्ययनों से पता चला है कि उम्र के साथ होने वाले मोतियाबिंद का संबंध हाइपरटेंशन से है, खासकर तब जब शरीर में अन्य बीमारियाँ भी मौजूद हों। मरीजों को एक ही समय में आंखों से जुड़ी अन्य गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं, जैसे डायबिटिक रेटिनोपैथी या ग्लूकोमा, इसलिए आंखों की नियमित जांच बहुत ज़रूरी है।


    मोतियाबिंद से आंखों का बचाव कैसे करें

    आई सर्जन के अनुसार, अच्छी बात यह है कि मोतियाबिंद का इलाज संभव है। आधुनिक मोतियाबिंद सर्जरी से कई लोगों की आंखों की रोशनी वापस आ गई है और हालांकि उम्र बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन ब्लड प्रेशर और शुगर को कंट्रोल में रखकर आंखों की सेहत को सुरक्षित रखा जा सकता है। नियमित और पूरी तरह से आंखों की जांच करवाने से, खासकर 40 साल की उम्र के बाद, मोतियाबिंद और आंखों की अन्य बीमारियों का शुरुआती दौर में ही पता लगाया जा सकता है, इससे पहले कि वे आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर असर डालें।

  • बाल झड़ने से लेकर कमजोर पाचन तक, भृंगराज दे सकता है कई समस्याओं में राहत.

    बाल झड़ने से लेकर कमजोर पाचन तक, भृंगराज दे सकता है कई समस्याओं में राहत.

    बाल झड़ने से लेकर कमजोर पाचन तक, भृंगराज दे सकता है कई समस्याओं में राहत.

    भृंगराज का नाम आते ही सबसे पहले बालों की देखभाल का ख्याल आता है। आयुर्वेद में इसे बालों को मजबूत और स्वस्थ बनाए रखने वाली महत्वपूर्ण जड़ी-बूटियों में गिना जाता है। हालांकि, इसके गुण केवल बालों तक ही सीमित नहीं हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञ के अनुसार, भृंगराज का सही तरीके से उपयोग करने पर यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाए रखने और गैस, अपच जैसी सामान्य समस्याओं में भी सहायक हो सकता है।

    भृंगराज में पाए जाते हैं औषधीय गुण

    आयुर्वेद के अनुसार भृंगराज में कई ऐसे प्राकृतिक तत्व मौजूद होते हैं, जिनमें एंटीऑक्सीडेंट और सूजन कम करने वाले गुण पाए जाते हैं। ये गुण शरीर को स्वस्थ बनाए रखने में मदद कर सकते हैं। इसी कारण सदियों से आयुर्वेदिक उपचारों में भृंगराज का उपयोग किया जाता रहा है।

    बालों के लिए क्यों माना जाता है फायदेमंद?

    भृंगराज को बालों की देखभाल के लिए सबसे प्रभावी आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों में से एक माना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि इसका तेल नियमित रूप से लगाने से बालों की जड़ों को पोषण मिल सकता है और स्कैल्प स्वस्थ बनी रहती है।

    जानें इसके फायदे

    बालों का झड़ना कम करने में मदद मिल सकती है।
    समय से पहले सफेद होने वाले बालों की समस्या में सहायक माना जाता है।
    रूखे और बेजान बालों को पोषण देकर उन्हें मुलायम और चमकदार बनाने में मदद कर सकता है।
    स्कैल्प को स्वस्थ रखने में सहायक हो सकता है।

    पाचन तंत्र के लिए भी हो सकता है लाभकारी

    आयुर्वेद में भृंगराज को पाचन तंत्र के लिए भी उपयोगी माना गया है। विशेषज्ञ के अनुसार, इसका सीमित और उचित मात्रा में सेवन गैस, अपच और कब्ज जैसी सामान्य समस्याओं में राहत देने में सहायक हो सकता है। साथ ही यह पाचन क्रिया को बेहतर बनाने और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने की प्राकृतिक प्रक्रिया को समर्थन दे सकता है। हालांकि, यदि आपको लंबे समय से पेट की समस्या है या कोई गंभीर बीमारी है, तो केवल भृंगराज के भरोसे इलाज करने के बजाय डॉक्टर से जांच और सलाह जरूर लें।

    भृंगराज का उपयोग किन-किन रूपों में किया जाता है?

    भृंगराज का इस्तेमाल कई तरीकों से किया जाता है, जैसे
    भृंगराज तेल: बालों और स्कैल्प की देखभाल के लिए।
    भृंगराज चूर्ण: आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार सेवन किया जाता है।
    भृंगराज रस: स्वास्थ्य संबंधी लाभ के लिए सीमित मात्रा में उपयोग किया जाता है।
    भृंगराज काढ़ा: कुछ आयुर्वेदिक उपचारों में प्रयोग किया जाता है।
    किसी भी रूप में इसका सेवन या उपयोग विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए।

    इस्तेमाल करते समय रखें ये सावधानियां

    विशेषज्ञ के अनुसार, कुछ लोगों को भृंगराज का उपयोग करने से पहले विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
    गर्भवती महिलाएं बिना डॉक्टर की सलाह के इसका सेवन न करें।
    स्तनपान कराने वाली महिलाओं को भी पहले विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
    किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित व्यक्ति इसका सेवन डॉक्टर की निगरानी में ही करें।
    यदि भृंगराज के उपयोग के बाद एलर्जी, त्वचा पर खुजली, पेट दर्द या कोई अन्य परेशानी महसूस हो, तो तुरंत इसका इस्तेमाल बंद कर डॉक्टर से संपर्क करें।
    निर्धारित मात्रा से अधिक सेवन करने से बचें।

    भृंगराज आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधीय जड़ी-बूटी मानी जाती है। यह बालों की देखभाल के साथ-साथ पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में भी सहायक हो सकती है। हालांकि, इसे किसी बीमारी का निश्चित इलाज नहीं माना जाना चाहिए। बेहतर परिणाम और सुरक्षा के लिए इसका उपयोग हमेशा योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करें।

  • दूध ही नहीं, सहजन की पत्तियां भी हैं कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत; जानिए सेवन का सही तरीका..

    दूध ही नहीं, सहजन की पत्तियां भी हैं कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत; जानिए सेवन का सही तरीका..

    दूध ही नहीं, सहजन की पत्तियां भी हैं कैल्शियम का बेहतरीन स्रोत; जानिए सेवन का सही तरीका..

    जब भी शरीर में कैल्शियम की कमी या हड्डियों की मजबूती की बात आती है, तो हमारे दिमाग में सबसे पहला नाम दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स का आता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुदरत ने हमें एक ऐसी हरी पत्ती दी है जिसमें दूध से भी ज्यादा कैल्शियम मौजूद होता है। हम बात कर रहे हैं ‘सहजन’ की, जिसे अंग्रेजी में मोरिंगा (Moringa) कहा जाता है। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक मेडिकल साइंस तक में सहजन को एक ‘सुपर फूड’ माना गया है, जो न सिर्फ हड्डियों को फौलाद बनाने में मदद करता है बल्कि इम्यूनिटी को भी बूस्ट करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने मोरिंगा को कुपोषण के खिलाफ एक शक्तिशाली हथियार के रूप में मान्यता दी है।

    आयुर्वेदिक एक्सपर्ट और योग गुरु बाबा रामदेव ने हड्डियों को मजबूत करने के लिए, नसों की कमजोरी को दूर करने के लिए मोरिंगा के पत्तों का सेवन करने की सलाह दी है। ये पत्ते बॉडी में विटामिन बी 12 की कमी को पूरा करते हैं। अगर आप दूध नहीं पीते, लैक्टोज इनटॉलरेंस से परेशान हैं या प्लांट-बेस्ड डाइट फॉलो करते हैं, तो कैल्शियम की कमी पूरी करने के लिए मोरिंगा एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। मोरिंगा की पत्तियां कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन K और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होती हैं, जो हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने में मदद करती हैं।

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    किन लोगों के लिए फायदेमंद है मोरिंगा?

    • बढ़ते बच्चों और किशोरों के लिए ये पत्ते फायदेमंद है।
    • बुजुर्गों के लिए, जिन्हें ऑस्टियोपोरोसिस का खतरा रहता है वो इन पत्तों का सेवन करें।
    • शाकाहारी या डेयरी-फ्री डाइट लेने वाले लोगों के लिए ये पत्ते बेहद उपयोगी हैं।
    • मेनोपॉज के बाद महिलाओं के लिए के लिए इन पत्तों का सेवन असरदार साबित होता है।

    रोजाना डाइट में ऐसे करें शामिल

    1. आटे में मिलाएं:
      आधा से एक चम्मच मोरिंगा पाउडर गेहूं के आटे में मिलाकर रोटी या पराठा बना सकते हैं।
    2. दाल और सब्जी में डालें:
      दाल, सांभर, सब्जी, खिचड़ी या चावल में थोड़ा-सा मोरिंगा पाउडर मिलाने से कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व बढ़ जाते हैं।
    3. स्मूदी या ड्रिंक बनाएं:
      आप मोरिंगा का सेवन केला, बादाम का दूध, पालक, सेब या आम की स्मूदी में पाउडर के रूप में मिलाकर पी सकते हैं। इसे गुनगुने पानी, हर्बल टी या नारियल पानी में भी मिलाया जा सकता है।
    4. ताजी पत्तियों की सब्जी बनाएं:
      मोरिंगा की ताजी पत्तियों की हल्की आंच पर सब्जी बनाएं या इन्हें दाल, कढ़ी, रसम, ऑमलेट और सूप में डालें। ज्यादा देर तक पकाने से पोषक तत्व कम हो सकते हैं।
    5. नाश्ते में करें इस्तेमाल:
      डोसा, चीला, उपमा, पोहा या वेज सैंडविच में मोरिंगा पाउडर मिलाकर दिन की शुरुआत करें।
    6. चटनी या पेस्ट बनाएं:
      मोरिंगा की पत्तियों से नारियल, लहसुन और मसालों के साथ स्वादिष्ट चटनी बनाई जा सकती है, जिसे रोटी, डोसा या इडली के साथ खाया जा सकता है।  

    कितनी मात्रा लेना सही है?

    एक्सपर्ट के मुताबिक मोरिंगा का सेवन वयस्कों के लिए रोजाना आधा से एक चम्मच करना पर्याप्त है। अगर ताजी पत्तियां खा रहे हैं, तो सप्ताह में कुछ बार एक छोटी कटोरी का सेवन पर्याप्त है। शुरुआत कम मात्रा से करें और शरीर की प्रतिक्रिया के अनुसार धीरे-धीरे बढ़ाएं।

    बेहतर अवशोषण के लिए क्या करें?

    मोरिंगा के साथ विटामिन D, मैग्नीशियम और हेल्दी फैट्स जैसे नट्स और बीज लेने से कैल्शियम का अवशोषण बेहतर हो सकता है। वहीं अत्यधिक नमक और कैफीन का सेवन कैल्शियम के अवशोषण में बाधा डाल सकता है।

    इन बातों का रखें ध्यान

    • गर्भवती महिलाएं डॉक्टर की सलाह के बिना मोरिंगा या इसके सप्लीमेंट्स का सेवन न करें।
    • लो ब्लड प्रेशर, थायरॉयड या नियमित दवाएं लेने वाले लोग पहले डॉक्टर से सलाह लें।
    • अधिक मात्रा में सेवन करने से पेट संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं।
    • आपको बता दें कि मोरिंगा पोषक तत्वों का अच्छा स्रोत है, लेकिन इसे संतुलित आहार का विकल्प नहीं बनाएं बल्कि उसका हिस्सा बनाकर ही सेवन करना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जागरूकता, शैक्षणिक उद्देश्य और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है। सहजन की पत्तियों या इसके पाउडर को अपनी दैनिक डाइट में शामिल करने या इसका सप्लीमेंट लेने से पहले हमेशा किसी प्रमाणित न्यूट्रिशनिस्ट, डाइटीशियन या अपने डॉक्टर से व्यक्तिगत परामर्श ज़रूर लें। विशेष रूप से गर्भवती महिलाएं और किसी गंभीर बीमारी की दवा ले रहे लोग चिकित्सीय सलाह के बिना इसका सेवन न करें।

  • विटामिन B12 की कमी शरीर को बना सकती है कमजोर, पाचन पर भी पड़ सकता है असर; जानिए लक्षण और बचाव…

    विटामिन B12 की कमी शरीर को बना सकती है कमजोर, पाचन पर भी पड़ सकता है असर; जानिए लक्षण और बचाव…

    विटामिन B12 की कमी शरीर को बना सकती है कमजोर, पाचन पर भी पड़ सकता है असर; जानिए लक्षण और बचाव…

    क्या आप भी बिना किसी भारी काम के दिनभर थकान, कमजोरी या सुस्ती महसूस करते हैं? अक्सर लोग इसे काम का तनाव या नींद की कमी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, कई मामलों में ये लक्षण शरीर में विटामिन B12 की कमी का संकेत भी हो सकते हैं। विटामिन B12 नसों को स्वस्थ रखने, रेड ब्लड सेल्स बनाने और शरीर के कई जरूरी कार्यों के लिए अहम पोषक तत्व है।

    अपोलो दिल्ली के सर्जन डॉ. अंशुमान कौशल ने इंस्टाग्राम पर वीडियो शेयर कर बताया कि कई मरीजों में बी 12 की कमी के लक्षण जैसे थकान, पैरों में झनझनाहट,याददाश्त से जुड़ी समस्याओं, मूड स्विंग के रूप में दिखते हैं जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। कुछ लोगों में विटामिन बी 12 की कमी से पाचन से जुड़ी परेशानी भी हो सकती है। आइए एक्सपर्ट से समझते हैं कि बी 12 की कमी कैसे पाचन को प्रभावित करती है, इसके मुख्य लक्षण क्या हैं और इससे सुरक्षित तरीके से कैसे बचा जा सकता है?

    विटामिन बी 12 की कमी क्या है?

    विटामिन B12 की कमी (Vitamin B12 Deficiency) एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर में इस विटामिन का स्तर नॉर्मल स्तर से काफी कम हो जाता है। ये परेशानी सबसे ज्यादा शाकाहारी लोगों में होती है। Harvard Health और National Institutes of Health (NIH) की रिपोर्ट्स के मुताबिक, विटामिन B12 प्राकृतिक रूप से केवल पशु-आधारित खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। यही कारण है कि शाकाहारी और विशेषकर वीगन (Vegan) आबादी में इसकी कमी का खतरा 60% से 80% तक देखा गया है।

    विटामिन B12 बॉडी के लिए जरूरी विटामिन है जिसे हमारी बॉडी खुद नहीं बनाती बल्कि इसे डाइट से हासिल किया जाता है। इस विटामिन का काम डीएनए बनाना, स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं (Red Blood Cells) का निर्माण करना, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) का सही कामकाज रखना और ऊर्जा का उत्पादन करना होता है। इसकी कमी होने पर बॉडी में ऑक्सीजन की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और बॉडी में कुछ लक्षण दिख सकते हैं।

    बात करें इसकी कमी से होने वाली परेशानियों की तो लगातार थकान होना, कमजोरी, हाथ-पैरों में झुनझुनी, संतुलन बिगड़ना, याददाश्त में कमी और कुछ मामलों में एनीमिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। यदि लंबे समय तक इस कमी का इलाज न किया जाए, तो नसों को स्थायी नुकसान भी पहुंच सकता है। बॉडी में इस विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए दूध, दही, अंडे, मछली, चिकन और मांस जैसे एनिमल बेस्ड फूड्स का सेवन करें।

    बी 12 की कमी कैसे पाचन को करती है प्रभावित

    विटामिन B12 सीधे तौर पर भोजन को पचाने का काम नहीं करता, लेकिन यह पाचन तंत्र (Digestive System) की कोशिकाओं और नसों को हेल्दी रखने में अहम किरदार निभाता है। बॉडी में इस विटामिन की कमी होने पर पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है। रिसर्च बताती है कि पेट में बनने वाला ‘इंट्रिन्सिक फैक्टर’ (Intrinsic Factor) नाम का प्रोटीन विटामिन B12 को अवशोषित करने के लिए जरूरी होता है। उम्र बढ़ने के साथ या ‘पर्निशियस एनीमिया’ (Pernicious Anemia) के कारण जब यह प्रोटीन कम बनता है, तो शरीर भोजन से B12 सोख नहीं पाता, जिससे गैस, कब्ज और भूख न लगना जैसी पेट की समस्याएं शुरू हो जाती हैं।

    बॉडी में इस विटामिन की कमी होने से कुछ लोगों को भूख कम लगती है, जी मिचलाना, मतली (Nausea), कब्ज या दस्त, पेट में गैस, पेट फूलना और वजन कम होने जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। इसके अलावा, विटामिन B12 की कमी आंतों और पेट से जुड़े कुछ रोगों, जैसे Pernicious anemia, Crohn’s disease का कारण बन सकती है, क्योंकि इन स्थितियों में शरीर भोजन से विटामिन B12 को ठीक से अवशोषित (Absorb) नहीं कर पाता। हालांकि पाचन से जुड़ी समस्याएं सिर्फ बी 12 की कमी के कारण नहीं बल्कि और भी कई कारणों की वजह से हो सकती है।

    विटामिन B12 की कमी पूरी करने के लिए क्या खाएं?

    विटामिन B12 की कमी को दूर करने के लिए सबसे अच्छे प्राकृतिक स्रोत पशु-आधारित खाद्य पदार्थ हैं। नॉनवेज खाने वाले लोग अपनी डाइट में मछली, चिकन, अंडे, लाल मांस (Red Meat), दूध, दही और पनीर जैसी चीजें शामिल कर सकते हैं। वहीं, शुद्ध शाकाहारी लोगों के लिए नेचुरल रूप से विटामिन B12 के विकल्प सीमित होते हैं। ऐसे में वे B12-फोर्टिफाइड (Vitamin B12 Fortified) दूध, प्लांट-बेस्ड मिल्क, ब्रेकफास्ट सीरियल्स और न्यूट्रिशनल यीस्ट जैसे फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकते हैं। यदि शरीर में B12 की कमी अधिक हो, तो डॉक्टर की सलाह पर विटामिन B12 सप्लीमेंट्स या इंजेक्शन की जरूरत पड़ सकती है।

    क्या फल और सब्जियां विटामिन B12 की कमी पूरी करते हैं?

    सेब, केला, संतरा, आम और ब्लूबेरी जैसे फल विटामिन B12 के स्रोत नहीं हैं। हरी पत्तेदार सब्जियों में भी यह न के बराबर होता है। शाकाहारी लोगों के लिए केवल फोर्टिफाइड फूड्स जैसे कुछ खास अनाज या प्लांट मिल्क या डेयरी प्रोडक्ट्स  जैसे दूध, पनीर ही बी 12 का एकमात्र जरिया हैं। ये विटामिन, मिनरल्स, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होता हैं, जो शरीर के समग्र स्वास्थ्य और इम्यूनिटी को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। इसलिए इन्हें संतुलित आहार का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए, लेकिन केवल फलों के भरोसे विटामिन B12 की कमी पूरी नहीं किया जा सकता।