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  • सिर्फ रोटी गिनने से नहीं घटता वजन! जानिए पेट निकलने की असली वजह और आम गलतियां..

    सिर्फ रोटी गिनने से नहीं घटता वजन! जानिए पेट निकलने की असली वजह और आम गलतियां..

    सिर्फ रोटी गिनने से नहीं घटता वजन! जानिए पेट निकलने की असली वजह और आम गलतियां..

    बढ़ता पेट और लटकती तोंद आज कई लोगों की सबसे बड़ी परेशानी बन चुकी है. इसे कम करने के लिए कोई जिम जॉइन करता है, कोई सुबह-शाम वॉक शुरू कर देता है, तो कई लोग सबसे पहले अपनी थाली छोटी कर देते हैं. जो पहले 5-6 रोटी खाते थे, वे खुद को 2 रोटी तक सीमित कर लेते हैं. लेकिन कई बार महीनों बाद भी पेट वैसा का वैसा ही रहता है. ऐसे में मन में सवाल आना बिल्कुल स्वाभाविक है, “मैं तो सिर्फ 2 रोटी खाता हूं, फिर भी पेट क्यों निकल रहा है?” अगर आपके मन में भी यही सवाल है, तो इसका जवाब सिर्फ रोटी की संख्या में नहीं, बल्कि आपकी पूरी लाइफस्टाइल में छिपा हो सकता है.

    सिर्फ रोटी कम करने से पेट कम नहीं होता

    बहुत से लोग मान लेते हैं कि पेट बढ़ने की सबसे बड़ी वजह रोटी है. इसलिए सबसे पहले रोटी कम कर देते हैं, लेकिन हकीकत ये है कि वजन और पेट बढ़ना सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप कितनी रोटी खाते हैं. बल्कि, पूरे दिन में शरीर कितनी कैलोरी ले रहा है और कितनी खर्च कर रहा है, यह ज्यादा अहम है.

    अगर आप दो रोटी ही खाते हैं, लेकिन पूरा दिन कुर्सी पर बैठकर काम करते हैं और शरीर की एक्टिविटी बहुत कम है, तो कैलोरी खर्च नहीं हो पाएगी. ऐसी स्थिति में पेट की चर्बी कम होने की बजाय बढ़ भी सकती है. रोज कम से कम 30 से 45 मिनट की वॉक या दूसरी फिजिकल एक्टिविटी जरूरी मानी जाती है.

    रोटी कम, लेकिन बाकी चीजें ज्यादा?

    कई लोग रोटी तो दो कर देते हैं, लेकिन दिनभर चाय के साथ बिस्किट, नमकीन, मिठाई, कोल्ड ड्रिंक या तली हुई चीजें खाते रहते हैं. ऐसे में कुल कैलोरी पहले जितनी या उससे ज्यादा हो जाती है. इसलिए सिर्फ रोटी गिनने से फायदा नहीं होगा, पूरी डाइट पर ध्यान देना जरूरी है.

    प्लेट में प्रोटीन कम है तो भी दिक्कत

    अगर आपकी प्लेट में सिर्फ रोटी और सब्जी है, लेकिन दाल, दही, पनीर, अंडा या दूसरी प्रोटीन वाली चीजें कम हैं, तो जल्दी भूख लग सकती है. इससे बार-बार कुछ न कुछ खाने की आदत बन जाती है, जो वजन बढ़ाने का कारण बन सकती है.

    यही नहीं, अगर रोज पर्याप्त नींद नहीं मिलती या तनाव लगातार बना रहता है, तो इसका असर शरीर के हार्मोन पर पड़ सकता है. कई रिसर्च बताती हैं कि ऐसी स्थिति में पेट के आसपास चर्बी जमा होने की संभावना बढ़ सकती है. इसलिए सिर्फ खाना कम करना काफी नहीं, अच्छी नींद और तनाव पर कंट्रोल भी उतना ही जरूरी है.

    उम्र बढ़ने के साथ लाइफस्टाइल पर ध्यान देना जरूरी

    जैसे जैसे उम्र बढ़ती है शरीर की कैलोरी खर्च करने की रफ्तार धीरे-धीरे कम होने लगती है. इसलिए पहले जितना खाना खाते थे, वही अब वजन बढ़ाने की वजह बन सकता है. ऐसे में सिर्फ रोटी कम करने की बजाय पूरी लाइफस्टाइल पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है.

    तो अगर आप सच में पेट कम करना चाहते हैं, तो सिर्फ रोटी गिनना छोड़िए. संतुलित डाइट लें, प्रोटीन और फाइबर बढ़ाएं, रोज एक्टिव रहें, अच्छी नींद लें और बार-बार स्नैकिंग से बचें. याद रखिए, पेट सिर्फ दो रोटी से नहीं बढ़ता, बल्कि कई छोटी-छोटी आदतों का नतीजा होता है.

  • बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर स्मार्टफोन का क्या असर पड़ता है? नई स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे…

    बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर स्मार्टफोन का क्या असर पड़ता है? नई स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे…

    बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य पर स्मार्टफोन का क्या असर पड़ता है? नई स्टडी में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे…

    आज के समय में स्मार्टफोन हर उम्र के लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. खासकर बुजुर्गों के लिए यह तकनीक अपने परिवार और दुनिया से जुड़े रहने का एक आसान जरिया है, लेकिन हाल ही में एक नई स्टडी में यह बात सामने आई है कि अगर स्मार्टफोन का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा या आदत के तौर पर किया जाए तो यह मानसिक स्वास्थ्य पर उल्टा असर भी डाल सकता है. 60 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में इसके कारण डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है.

    क्या कहती है नई स्टडी?

    यह स्टडी रटगर्स स्कूल ऑफ सोशल वर्क के प्रोफेसर चिएन-चुंग हुआंग के नेतृत्व में की गई और इसे जेएमआईआर एजिंग नाम की जर्नल में प्रकाशित किया गया है, इसमें चीन के ग्वांगझू शहर के 87 कम्युनिटीज में रहने वाले 2,585 बुजुर्ग लोगों को शामिल किया गया. इन लोगों से उनके स्मार्टफोन इस्तेमाल करने की आदतों, सोशल लाइफ और रोजमर्रा की गतिविधियों के बारे में जानकारी ली गई साथ ही उनकी उम्र, शिक्षा, आय और पारिवारिक स्थिति जैसे आंकड़े भी इकट्ठा किए गए.

    डिप्रेशन से जुड़े सबसे बड़े कारण कौन से पाए गए?

    शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल करके यह समझने की कोशिश की कि कौन-कौन से कारण डिप्रेशन से सबसे ज्यादा जुड़े हुए हैं. इसमें सबसे बड़ा कारण कम सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना पाया गया. इसके बाद स्मार्टफोन की लत या बहुत ज्यादा इस्तेमाल को दूसरा बड़ा कारण माना गया. जिन लोगों में स्मार्टफोन का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा और आदतन पाया गया, उनमें डिप्रेशन के लक्षण भी ज्यादा देखे गए.

    क्या स्मार्टफोन हमेशा नुकसान पहुंचाता है?

    स्टडी में यह भी पाया गया कि फोन का इस्तेमाल हमेशा नुकसानदायक नहीं होता. अगर बुजुर्ग लोग वीडियो कॉल, मैसेजिंग या फोटो शेयरिंग के जरिए अपने परिवार और दोस्तों से जुड़े रहते हैं तो यह उनके मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकता है. समस्या तब शुरू होती है जब फोन सिर्फ अकेले बैठकर वीडियो देखने, स्क्रॉल करने या गेम खेलने का जरिया बन जाता है, इससे व्यक्ति धीरे-धीरे असल दुनिया के लोगों से दूरी बनाने लगता है.

    फोन का गलत इस्तेमाल कैसे बढ़ाता है अकेलापन?

    एक शोधकर्ता ने बताया कि जब कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपने फोन को असली सामाजिक जीवन की जगह इस्तेमाल करने लगता है तो यह डिप्रेशन का एक बड़ा संकेत हो सकता है. इसका मतलब यह नहीं है कि फोन ही बीमारी की वजह है, बल्कि यह कि फोन का गलत इस्तेमाल सामाजिक दूरी को बढ़ा सकता है.

    किन बुजुर्गों में ज्यादा देखा गया जोखिम?

    स्टडी में यह भी सामने आया कि कुछ खास समूहों में डिप्रेशन का खतरा ज्यादा देखा गया. जैसे वे बुजुर्ग पुरुष जिनकी शिक्षा कम थी और जो स्मार्टफोन का ज्यादा इस्तेमाल करते थे. इनके लिए डिजिटल दुनिया को समझना थोड़ा मुश्किल होता है, इसलिए वे अक्सर सिर्फ मनोरंजन वाले कंटेंट पर निर्भर हो जाते हैं और धीरे-धीरे अकेलेपन में चले जाते हैं. वहीं दूसरी तरफ, ज्यादा पढ़े-लिखे और अच्छे आर्थिक हालात वाले बुजुर्ग भी अगर फोन की लत में फंस जाते हैं तो उनके लिए भी अकेलापन और डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है.

    क्या स्मार्टफोन और डिप्रेशन का रिश्ता दोतरफा है?

    शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह जरूरी नहीं है कि ज्यादा स्मार्टफोन इस्तेमाल सीधे डिप्रेशन का कारण हो. यह भी हो सकता है कि जो लोग पहले से अकेलापन या उदासी महसूस कर रहे हों, वे ज्यादा फोन का इस्तेमाल करने लगें.  यानी यह रिश्ता एक चक्र की तरह हो सकता है, जहां दोनों चीजें एक-दूसरे को बढ़ाती हैं.

  • क्या आपको हमेशा अकेले रहना पसंद आने लगा है? जानें कब हो सकती है मानसिक तनाव की निशानी..

    क्या आपको हमेशा अकेले रहना पसंद आने लगा है? जानें कब हो सकती है मानसिक तनाव की निशानी..

    क्या आपको हमेशा अकेले रहना पसंद आने लगा है? जानें कब हो सकती है मानसिक तनाव की निशानी..

    आज की तेज रफ्तार जिंदगी में काम का दबाव, पारिवारिक जिम्मेदारियां, आर्थिक चिंताएं और लगातार बदलती जीवनशैली लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल रही है. ऐसे माहौल में बहुत से लोग कुछ समय अकेले बिताना पसंद करते हैं. कई लोगों को लगता है कि अकेले रहना उन्हें सुकून देता है. इसे अगर मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो हर व्यक्ति का स्वभाव अलग होता है. कुछ लोग दोस्तों या सगे-संबंधियों से मिलकर अच्छा महसूस करते हैं, जबकि कुछ लोग अकेले समय बिताकर खुद को बेहतर महसूस करते हैं. ऐसे लोगों के लिए अकेलापन नहीं, बल्कि एकांत जरूरी होता है.

    कब है चिंता का विषय

    मनोवैज्ञानिक रिसर्च के अनुसार, सीमित समय का स्वस्थ एकांत तनाव कम करने, भावनाओं को समझने और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद कर सकता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि समस्या तब शुरू होती है, जब अकेले रहने की आदत धीरे-धीरे सामाजिक दूरी में बदलने लगे. अगर कोई व्यक्ति लगातार दोस्तों, परिवार या सहकर्मियों से मिलने से बचने लगे, फोन उठाना बंद कर दे, बातचीत में रुचि न ले या पहले जिन लोगों के साथ समय बिताना पसंद करता था, उनसे भी दूरी बनाने लगे, तो इसे सामान्य व्यवहार नहीं माना जाता. यह मानसिक तनाव, चिंता या डिप्रेशन जैसी समस्याओं का शुरुआती संकेत हो सकता है.

    फर्क समझना है जरूरी

    साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, स्वस्थ एकांत और नुकसानदायक सोशल आइसोलेशन में फर्क समझना बेहद जरूरी है. स्वस्थ एकांत में व्यक्ति अकेला जरूर होता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर लोगों से जुड़ने में उसे कोई परेशानी नहीं होती. वह अपने काम, परिवार और रिश्तों की जिम्मेदारियां सामान्य तरीके से निभाता रहता है. वहीं, सामाजिक अलगाव में व्यक्ति धीरे-धीरे रिश्तों से दूरी बना लेता है, दूसरों से मिलने की इच्छा खत्म होने लगती है और कई बार जीवन के प्रति उत्साह भी कम हो जाता है. यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है.

    शरीर पर पड़ता है असर

    मेडिकल और साइकोलॉजी रिसर्च बताती हैं कि लंबे समय तक सोशल आइसोलेशन शरीर को भी प्रभावित करता है. लगातार अकेले रहने से तनाव बढ़ाने वाले हार्मोन, खासतौर से कोर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है. इसका असर नींद, याददाश्त, ध्यान लगाने की क्षमता और प्रतिरक्षा प्रणाली पर भी पड़ सकता है. कई अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि लंबे समय तक सामाजिक दूरी बनाए रखने वाले लोगों में चिंता और डिप्रेशन का खतरा ज्यादा देखा जाता है.

    क्या करें

    रोजाना कुछ समय खुले वातावरण में टहलना, प्रकृति के बीच समय बिताना और नियमित शारीरिक गतिविधियां मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होती हैं. योग और श्वास संबंधी अभ्यास, जैसे भ्रामरी प्राणायाम, बालासन और सेतुबंधासन, तनाव कम करने और मन को शांत रखने में सहायक माने जाते हैं. पर्याप्त नींद, संतुलित भोजन और नियमित दिनचर्या भी मानसिक संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.

  • मूंग, मसूर या अरहर… कौन-सी दाल है सेहत के लिए सबसे बेहतर? डॉक्टर की 10 में रेटिंग जानें…

    मूंग, मसूर या अरहर… कौन-सी दाल है सेहत के लिए सबसे बेहतर? डॉक्टर की 10 में रेटिंग जानें…

    मूंग, मसूर या अरहर… कौन-सी दाल है सेहत के लिए सबसे बेहतर? डॉक्टर की 10 में रेटिंग जानें…

    Best Dal For Health: हर दिन दाल खाते हैं, लेकिन क्या सच में आपको पता है कि कौन-सी दाल आपके शरीर के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है? मूंग, मसूर, चना या उड़द. हर दाल की अपनी खासियत है, लेकिन डॉक्टर के मुताबिक एक दाल ऐसी है जिसे ‘परफेक्ट’ कहा जा सकता है. किसी दाल में प्रोटीन ज्यादा होता है, तो कोई फाइबर से भरपूर होती है. कुछ दालें डायबिटीज के मरीजों के लिए बेहतर मानी जाती हैं, तो कुछ हड्डियों और पाचन की सेहत का खास ध्यान रखती हैं.

    ऐसे में अगर आप भी सोचते हैं कि कौन-सी दाल रोज खानी चाहिए, तो दिल्ली के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. अभिनव गर्ग की बताई रेटिंग आपके लिए काम की हो सकती है. आइए जानते हैं किस दाल को सबसे ज्यादा नंबर मिले हैं और किसका क्या फायदा है.

    दालें प्रोटीन, फाइबर और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स का अच्छा स्रोत होती हैं.

    रोज कौन-सी दाल खानी चाहिए?

    रोज खाने के लिए मूंग दाल सबसे अच्छा विकल्प मानी जाती है क्योंकि यह हल्की, आसानी से पचने वाली और प्रोटीन व फाइबर से भरपूर होती है. अगर वैरायटी चाहिए तो मिक्स दाल भी खाई जा सकती है, जिससे शरीर को अलग-अलग पोषक तत्व मिलते हैं.

    सबसे ज्यादा प्रोटीन किस दाल में होता है?

    आमतौर पर उड़द दाल और मसूर दाल में प्रोटीन अच्छी मात्रा में पाया जाता है. इसके अलावा चना दाल भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है. हालांकि सही पोषण के लिए अलग-अलग दालों को मिलाकर खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है.

    डायबिटीज में कौन-सी दाल खानी चाहिए?

    डायबिटीज के मरीजों के लिए मसूर दाल और चना दाल बेहतर मानी जाती हैं क्योंकि इनमें फाइबर ज्यादा होता है, जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में मदद करता है. मूंग दाल भी एक अच्छा विकल्प है क्योंकि यह पाचन के लिए हल्की होती है.

    क्या मिक्स दाल ज्यादा हेल्दी है?

    हाँ, मिक्स दाल को ज्यादा हेल्दी माना जाता है क्योंकि इसमें अलग-अलग दालों के पोषक तत्व एक साथ मिलते हैं. इससे प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स का बैलेंस बेहतर होता है, जो शरीर की ओवरऑल हेल्थ के लिए फायदेमंद है.

    किसे कौन-सी दाल खानी चाहिए?

    वजन घटाने वाले : मूंग दालडायबिटीज : मसूर / चनाहड्डियों के लिए : उड़दपाचन कमजोर : मूंग

    मूंग, मसूर या चना? जानिए किस दाल को मिले 10/10 और क्यों

    मूंग दाल – 10/10 (सबसे बेस्ट)

    डॉ. अभिनव गर्ग ने मूंग दाल को पूरे 10 में 10 नंबर दिए हैं और इसे दालों का राजा बताया है. उनके मुताबिक ये सबसे बैलेंस्ड दाल है. इसमें प्रोटीन और फाइबर दोनों अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं. बीमारी से ठीक हो रहे लोगों, डायबिटीज के मरीजों और पेट की सेहत का ध्यान रखने वालों के लिए ये सबसे अच्छे विकल्पों में गिनी जाती है.

    मसूर दाल – 9/10 (महिलाओं के लिए फायदेमंद)

    मसूर दाल को डॉक्टर ने 10 में 9 नंबर दिए हैं. इसमें प्रोटीन, फाइबर, आयरन और फोलेट अच्छी मात्रा में होता है. खासकर महिलाओं के लिए इसे फायदेमंद माना जाता है. अगर इसे चावल और नींबू के साथ खाया जाए, तो विटामिन सी की मदद से शरीर आयरन को बेहतर तरीके से एब्जॉर्ब कर पाता है.

    चना दाल – 8/10 (डायबिटीज कंट्रोल)

    चना दाल को 10 में 8 नंबर मिले हैं. इसमें फाइबर काफी ज्यादा होता है, जो ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने और पेट के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ाने में मदद कर सकता है. हालांकि कुछ लोगों को इसे खाने के बाद गैस या पेट फूलने की परेशानी हो सकती है. इसलिए इसे 4 से 6 घंटे भिगोकर पकाने की सलाह दी जाती है.

    उड़द दाल – 8/10 (हड्डियों के लिए)

    उड़द दाल को भी 10 में 8 नंबर मिले हैं. ये प्रोटीन और कैल्शियम का अच्छा स्रोत मानी जाती है. हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत रखने में इसका अहम योगदान हो सकता है. अगर इसे खाने के बाद पेट भारी लगता है, तो इडली या डोसा जैसे फर्मेंट किए गए रूप में खाना बेहतर माना जाता है.

    राजमा – 7/10

    राजमा को डॉक्टर ने 10 में 7 नंबर दिए हैं. इसमें भी प्रोटीन और फाइबर अच्छी मात्रा में होते हैं. हालांकि इसे कम से कम 8 घंटे भिगोकर ही पकाना चाहिए. कुछ लोगों को इससे गैस या पाचन से जुड़ी परेशानी हो सकती है. इसलिए इसे हफ्ते में एक बार खाना बेहतर माना जाता है.

    मिक्स दाल – 10/10 (सबसे balanced)

    अगर एक ही विकल्प चुनना हो, तो डॉक्टर मिक्स दाल को भी पूरे 10 में 10 नंबर देते हैं. उनके मुताबिक मूंग, मसूर, चना और अरहर दाल को 40:25:20:15 के अनुपात में मिलाकर बनाया जा सकता है.

    इसे 1 से 2 घंटे भिगोने के बाद घी में हींग का तड़का लगाकर पकाने से अलग-अलग दालों के पोषक तत्वों का फायदा एक साथ मिल सकता है. अगर आपको कोई बीमारी है या पाचन से जुड़ी परेशानी रहती है, तो डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह जरूर लें.

  • कब खाना चाहिए मीठा? गलत समय पर खाने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर और वजन…

    कब खाना चाहिए मीठा? गलत समय पर खाने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर और वजन…

    कब खाना चाहिए मीठा? गलत समय पर खाने से बढ़ सकता है ब्लड शुगर और वजन…

    त्योहार, शादी-ब्याह, जन्मदिन या कोई भी खुशी का मौका बिना मीठे के अधूरा लगता है. लेकिन डॉक्टरों की मानें तो, मीठा खाने का एक सही समय होता है, जिसको लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. गलत समय पर खाया गया मीठा ब्लड शुगर बढ़ने का कारण बनता है और धीरे-धीरे वजन भी बढ़ने लगता है.

    कई लोग सुबह उठते ही मिठाई, चॉकलेट, बिस्कुट या मीठी चीजें खा लेते हैं. ऐसा करना शरीर के लिए नुकसादायक हो सकता है. खाली पेट मीठा खाने से उसमें मौजूद चीनी बहुत जल्दी खून में पहुंच जाती है. इससे ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है. कुछ समय बाद यह अचानक नीचे भी आ जाता है. इस वजह से जल्दी भूख लगती है, कमजोरी महसूस होती है और बार-बार कुछ मीठा खाने का मन भी करता है.

    मीठा कब खाना चाहिए

    इसके मुकाबले, अगर मीठा खाना खाने के बाद खाया जाए तो शरीर उसे बेहतर तरीके से संभाल लेता है. जब हम पहले दाल, रोटी, सब्जी, चावल, सलाद या दूसरी पौष्टिक चीजें खाते हैं, तब शरीर को फाइबर, प्रोटीन और दूसरे जरूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं.

    ये चीजें मीठे में मौजूद चीनी को धीरे-धीरे शरीर में पहुंचने देती हैं. इससे ब्लड शुगर एकदम से नहीं बढ़ती और शरीर पर ज्यादा दबाव भी नहीं पड़ता. इसलिए डॉक्टर भी यही सलाह देते हैं कि अगर मीठा खाना हो तो उसे भोजन के बाद थोड़ी मात्रा में खाना बेहतर होता है.

    दिन या रात कब खाएं मीठा

    डॉक्टर बताते हैं कि दिन और रात के समय में भी काफी फर्क होता है. रात के खाने के बाद ज्यादा मीठा खाना शरीर के लिए सही नहीं माना जाता. रात में हमारा शरीर आराम करने की तैयारी करता है. ऐसे में मीठे से मिलने वाली ज्यादा चीनी और कैलोरी शरीर में जमा होने लगती है.

    इससे ब्लड शुगर बढ़ सकता है और धीरे-धीरे वजन भी बढ़ने लगता है. वैज्ञानिक शोध की मानें, तो रात में बार-बार मीठा खाने की आदत से आगे चलकर कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं.

    अगर दिन में, खासकर दोपहर के खाने के बाद, थोड़ी मात्रा में मीठा खाया जाए तो उसे बेहतर माना जाता है. इसकी वजह यह है कि दिन के समय लोग ज्यादा सक्रिय रहते हैं.

    ना करें ये गलती

    कुछ लोग जल्दी के चक्कर में सिर्फ केक, पेस्ट्री, चॉकलेट या मीठे पेय पीकर ही काम चला लेते हैं. ऐसा करने से शरीर को जरूरी पोषण नहीं मिलता. शरीर को स्वस्थ रखने के लिए दाल, रोटी, सब्जी, फल और दूसरी पौष्टिक चीजें खाना जरूरी है.

    जिन लोगों को डायबिटीज, प्री-डायबिटीज, मोटापा या ब्लड शुगर की समस्या है, उन्हें मीठा खाने में और भी ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए.

  • प्यास बुझाने के लिए पी रहे हैं ठंडी बीयर? एक्सपर्ट ने बताया क्यों बढ़ सकती है डिहाइड्रेशन की समस्या…

    प्यास बुझाने के लिए पी रहे हैं ठंडी बीयर? एक्सपर्ट ने बताया क्यों बढ़ सकती है डिहाइड्रेशन की समस्या…

    प्यास बुझाने के लिए पी रहे हैं ठंडी बीयर? एक्सपर्ट ने बताया क्यों बढ़ सकती है डिहाइड्रेशन की समस्या…

    पेरिस में अब पब्लिक प्लेस पर शराब पीने पर बैन लग गया है. इसके पीछे वजह है कि शराब का सेवन करने पर किडनी पर पड़ने वाला असर. शराब का सेवन करने के बाद किडनी पर दबाव पड़ता है. इस वजह से इसे एक मूत्रवर्धक कहा गया है. जिसका अर्थ है कि ये किडनी को ज्यादा यूरिन बनाने के लिए प्रेरित करती है. यह वासोप्रेसिन हार्मोन को दबाकर ऐसा करती है, जो सामान्य रूप से शरीर को पानी को रोककर रखने का निर्देश देता है. भीषण गर्मी में, जब आप पहले से ही शरीर को ठंडा रखने के लिए कई लीटर तरल पदार्थ पसीने के रूप में बहा रहे होते हैं, तो शराब उन भंडारों को और भी तेजी से खत्म कर देती है और बॉडी को डिहाइड्रेड कर देती है.

    बता दें कि पेरिस में तो ये नियम कुछ दिनों से लागू हुआ है, लेकिन भारत में ये नियम काफी समय पहले से है.

    गर्मियों में लोग ठंडी-ठंडी चीजों का सेवन करते हैं और ड्रिंक लेने पर ज्यादा जोर देते हैं. जब तक ठंडा पानी या ड्रिंक्स ना पियो तो प्यास नहीं बुझती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि ठंडी ड्रिंक प्यास बुझाने की जगह आपके शरीर से एक्सट्रा पानी को बाहर निकाल सकती हैं. खासकर जब आप ठंडी बीयर का सेवन करते हैं तो ये सेहत को और ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है.

    अगर आप भी गर्मियों में ठंडी-ठंडी बीयर पीने के शौकीन है तो आपके लिए ये जानना बेहद जरूरी है कि ये शरीर पर किस तरह असर डालता है. एनडीटीवी ने इस बारे में पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉक्टर समीर भाटी से बातचीत की. उन्होंने इस बारे में क्या बताया आइए जानते हैं.

    ठंडी बीयर पीने से क्या होता है? (What happens when you drink cold beer?)

    डॉक्टर समीर भाटी ने बताया कि कई लोगों को ऐसा लगता है कि गर्मी है और अगर वो एल्कोहल या व्हिस्की का सेवन नहीं करते हैं और ठंडी बीयर पीते हैं तो उनके शरीर को आराम मिल सकता है. क्योंकि बीयर ठंडी है तो ये शरीर में गर्मी नहीं होने देगी तो ये धारणा बिल्कुल गलत है. बल्कि ठंडी बीयर पीने पर शरीर पर इसका बिल्कुल उल्टा असर पड़ता है. ठंडी बीयर पीने से शरीर डिहाइट्रेड होता है. इसका मतलब ये है कि शरीर से पानी ज्यादा मात्रा में बाहर निकलता है और बॉडी में पानी की कमी हो जाती है.

    डॉक्टर के मुताबिक सिर्फ ठंडी बीयर ही नहीं बल्कि कॉफी का सेवन करने पर भी शरीर पर ऐसा ही असर होता है.

    डिहाइड्रेशन होने पर क्या संकेत मिलते हैं (What are the signs of dehydration?)

    शरीर में पानी की कमी होने पर यानी डिहाइड्रेशन होने पर शरीर कुछ संकेत देता है. डिहाइड्रेशन होने पर बार-बार प्यास लगना, मुंह सूखना, गहरे रंग का पेशाब आना, पेशाब कम आना, थकान, चक्कर आना और सिरदर्द जैसे लक्षण दिखते हैं.

    कैसे करें बचाव (How to Prevent Dehydration)

    डॉक्टर समीर भाटी बताते हैं कि-

    • गर्मियों में डिहाइड्रेशन से बचने के लिए शराब का सेवन न करें.
    • पार्टी वगैरह में जा रहे हैं तो भी अल्कोहल से दूर रहें.
    • कॉफी का भी अधिक सेवन कम करें, ये भी शरीर से पानी बाहर निकालती है.
    • पानी में नमक डाल कर पिएं.
    • नारियल पानी पिएं.
  • सिर्फ रोटी गिनने से नहीं घटता वजन! जानिए पेट निकलने की असली वजह और आम गलतियां..

    सिर्फ रोटी गिनने से नहीं घटता वजन! जानिए पेट निकलने की असली वजह और आम गलतियां..

    सिर्फ रोटी गिनने से नहीं घटता वजन! जानिए पेट निकलने की असली वजह और आम गलतियां..

    जब गर्मियों में चिलचिलाती धूप पूरे दिन आपकी एनर्जी सोख लेती है, तो मानसून का आना गर्मी से राहत जैसा लगता है. चाय के साथ स्नैक्स खाने की जबरदस्त इच्छा के साथ-साथ, मॉनसून आपकी सेहत के लिए कई नई चुनौतियां भी लाता है. बारिश के महीनों में मौसमी इन्फेक्शन, पेट खराब होना, फ्लू और एनर्जी की कमी आम बात है. इस मौसम में इम्यूनिटी में बदलाव, धीमे डाइजेशन सिस्टम और बैक्टीरिया और वायरस के ज्यादा संपर्क में आने जैसी स्थितियों से भी जूझ रहा होता है. ऐसे में आपकी डाइट बहुत जरूरी हो जाती है. खान-पान में कुछ समझदारी भरे बदलाव करके, आप अपने डाइजेशन को ठीक रख सकते हैं और एनर्जी लेवल को पूरी तरह स्थिर बनाए रख सकते हैं. आइए, कुछ ऐसे मौसमी फूड्स के बारे में जानते हैं जिन्हें डॉक्टर बारिश के मौसम की परेशानियों से बचने के लिए आपकी रोजाना की डाइट में शामिल करने की सलाह देते हैं.

    करेला

    बारिश के मौसम में सेहतमंद रहने के लिए डॉक्टर करेला खाने की सलाह देते हैं. इसका कड़वापन असल में इसके मजबूत एंटीवायरल और एंटी बैक्टीरियल गुणों की निशानी है. करेले में जरूरी विटामिन और ताकतवर एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो आपके लिवर को अच्छी तरह साफ करते हैं और पाचन तंत्र को बेहतर बनाते हैं. करेला खाने से आपका शरीर उन पैरासाइट्स और पेट के नुकसानदायक बैक्टीरिया को प्राकृतिक रूप से खत्म कर पाता है जो दूषित पानी या स्ट्रीट फूड के जरिए आसानी से आपके शरीर में पहुंच जाते हैं.

    खट्टे फल

    हालांकि संतरा, मौसंबी और ऐसे ही दूसरे फल साल भर मिलते हैं, लेकिन मॉनसून के दौरान इनमें मौजूद विटामिन C की वजह से ये बहुत फायदेमंद होते हैं. विटामिन C इम्यून सिस्टम को ठीक से काम करने में अहम भूमिका निभाता है और शरीर को पौधों से मिलने वाले खाने से आयरन सोखने में भी मदद करता है. पैकेट वाले जूस के बजाय, जब भी हो सके साबुत फल चुनें ताकि आपको उनके प्राकृतिक फाइबर का भी फायदा मिल सके.

    मूंग दाल

    जब पेट खराब या असहज महसूस हो, तो डॉक्टर औरडायटीशियन अक्सर सबसे पहले मूंग दाल खाने की सलाह देते हैं. यह आसानी से पच जाती है, अच्छी क्वालिटी का प्लांट प्रोटीन देती है और इसमें फोलेट, मैग्नीशियम और पोटैशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व होते हैं.

    चाहे इसे सादी दाल के तौर पर खाया जाए या खिचड़ी बनाकर, यह बिना भारीपन महसूस कराए पोषण देती है, इसलिए पाचन संबंधी परेशानी के समय यह खास तौर पर फायदेमंद होती है.

    जामुन

    जामुन उन फलों में से एक है जो ठीक उसी समय मिलते हैं जब आपके शरीर को इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है. विटामिन C, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर जामुन इम्यूनिटी को मजबूत करने और ब्लड शुगर लेवल को सही रखने में मदद करता है, क्योंकि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है.

    जामुन में पाया जाने वाला ‘जाम्बोलिन’ कंपाउंड ब्लड ग्लूकोज के अचानक बढ़ने को कंट्रोल करने में असरदार साबित हुआ है. यह हल्का कसैला भी होता है, जो पाचन स्वास्थ्य में मदद करता है.

    पपीता

    जब मौसम आपके शरीर के अंदरूनी सिस्टम को धीमा कर देता है, तो पपीता पाचन में बहुत मदद कर सकता है. इस ट्रॉपिकल फल में ‘पपेन’ नाम का एक खास डाइजेस्टिव एंजाइम होता है. यह एंजाइम आपके पेट में भारी प्रोटीन को आसानी से तोड़ने में मदद करता है.

    इसमें विटामिन C भी बहुत ज्यादा होता है, जो व्हाइट ब्लड सेल्स के बनने को बढ़ावा देता है. एक कटोरा ताजा पपीता खाने से पेट फूलने और कब्ज जैसी गंभीर समस्याओं से बचने में मदद मिलती है, जो मॉनसून के दौरान मेटाबॉलिज्म कम होने पर अक्सर लोगों को परेशान करती हैं.

  • पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मददगार हैं ये सुपरफूड्स, डॉक्टर ने बताए दही से बेहतर विकल्प…

    पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मददगार हैं ये सुपरफूड्स, डॉक्टर ने बताए दही से बेहतर विकल्प…

    पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मददगार हैं ये सुपरफूड्स, डॉक्टर ने बताए दही से बेहतर विकल्प…

    आज के समय में पेट से जुड़ी समस्याएं काफी देखने को मिलती हैं. इसका एक सबसे बड़ा कारण हमारी अनहेल्दी लाइफस्टाइल और खान-पान है. लेकिन जब भी पेट को साफ और दुरुस्त रखने की बात आती है सबसे पहला नाम दही का आता है. दही पेट के लिए काफी अच्छी भी मानी जाती है. लेकिन क्या आप ये जानते हैं कि दही के अलावा भी हमारी किचन में कई ऐसी चीजें हैं, जो हमारे गट हेल्थ के लिए वरदान से कम नहीं हैं.

    हाल ही में डॉक्टर ने अपने सोशल मीडिया पर एक बेहद काम की जानकारी शेयर की है. उन्होंने बताया है कि हमारे घरों में बनने वाली कुछ खास चीजें हमारी गट हेल्थ के लिए किसी औषधी से कम नहीं हैं.

    ​क्या होती है गट हेल्थ और यह क्यों जरूरी है?

    ​सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ‘गट हेल्थ’ (Gut Health) का मतलब क्या है. आसान भाषा में कहें तो हमारे पेट और आंतों के अंदर लाखों-करोड़ों छोटे-छोटे अच्छे बैक्टीरिया होते हैं. ये बैक्टीरिया हमारे खाने को पचाने, शरीर को बीमारियों से बचाने और हमारे मूड को अच्छा रखने में मदद करते हैं. जब पेट में इन अच्छे बैक्टीरिया की कमी हो जाती है, तो हमें गैस, कब्ज, एसिडिटी और ब्लोटिंग जैसी परेशानियां होने लगती हैं.

    गट हेल्थ को हेल्दी रखने में मददगार हैं ये 4 चीजें-

    ​1. कांजी- (Kanji)

    ​डॉक्टर अभिनव गर्ग के मुताबिक, कांजी हमारी गट हेल्थ के लिए सबसे बेस्ट ड्रिंक्स में से एक है. इसे बनाने के लिए पानी में गाजर, राई और नमक डालकर कुछ दिनों के लिए धूप में रख दिया जाता है. इस प्रोसेस (फर्मेंटेशन) से इसमें भरपूर मात्रा में प्रोबायोटिक्स यानी अच्छे बैक्टीरिया पैदा होते हैं. यह पेट को ठंडा रखती है और पाचन क्रिया को एकदम ट्रैक पर ले आती है.

    ​2. इडली और ढोकला- (Idli and Dhokla)

    ​साउथ इंडियन इडली हो या गुजरात का मशहूर ढोकला, ये दोनों ही चीजें पेट के लिए बहुत हल्की और फायदेमंद होती हैं. इन्हें बनाने के लिए चावल, दाल या बेसन के घोल को रातभर खमीर (Ferment) उठने के लिए रखा जाता है. डॉक्टर का कहना है कि खमीर उठने की वजह से इसमें ऐसे विटामिंस और गुड बैक्टीरिया बन जाते हैं, जो हमारे डाइजेशन को बहुत मजबूत बनाते हैं. यह आसानी से पच जाते हैं और पेट पर कोई भारीपन नहीं होने देते.

    ​3. घर का बना अचार- (Homemade Pickle)

    ​डॉक्टर अभिनव गर्ग ने बताया है कि अगर अचार घर का बना हो, तो यह पेट के लिए बहुत फायदेमंद है. बाजार के अचार में खराब केमिकल और बहुत ज्यादा प्रिजर्वेटिव्स होते हैं, लेकिन घर में पारंपरिक तरीके से तेल, नमक और मसालों के साथ धूप में पकाकर बनाया गया अचार प्रोबायोटिक्स का खजाना होता है. रोज के खाने के साथ सिर्फ एक छोटा चम्मच घर का अचार खाने से आपके पेट के अच्छे बैक्टीरिया तेजी से बढ़ते हैं.

    ​क्यों खास हैं ये फर्मेंटेड फूड्स?

    ​डॉक्टर अभिनव गर्ग के अनुसार, इन सभी चीजों को ‘फर्मेंटेड फूड्स’ (Fermented Foods) कहा जाता है. जब किसी खाने की चीज को प्राकृतिक तरीके से कुछ समय के लिए रखा जाता है, तो उसमें अच्छे बैक्टीरिया की संख्या कई गुना बढ़ जाती है. यह बैक्टीरिया सीधे हमारे पेट में जाकर पाचन तंत्र को दुरुस्त करते हैं, जिससे खाना जल्दी पचता है, न्यूट्रिएंट्स शरीर को अच्छे से लगते हैं और पेट साफ रहता है.

  • क्या रोटी और चावल साथ खाने से शुगर बढ़ती है? डायबिटीज एक्सपर्ट्स से समझिए पूरी सच्चाई..

    क्या रोटी और चावल साथ खाने से शुगर बढ़ती है? डायबिटीज एक्सपर्ट्स से समझिए पूरी सच्चाई..

    क्या रोटी और चावल साथ खाने से शुगर बढ़ती है? डायबिटीज एक्सपर्ट्स से समझिए पूरी सच्चाई..

    Diabetes Management Tips: भारत में डायबिटीज मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और इसके साथ ही सोशल मीडिया पर खान-पान को लेकर कई तरह के भ्रम भी फैल रहे हैं। डायबिटीज फ्रेंडली डाइट को लेकर अक्सर मरीजों के मन में यह सवाल उठता है कि वो दोपहर या रात के भोजन में क्या खाएं? रोटी खाएं या चावल, किसे खाने से ब्लड शुगर का स्तर बढ़ता है। डाइटिशियन श्वेता जे पंचाल के अनुसार, डेली  और खानपान में किए गए साधारण बदलाव करके लंबे समय तक सकारात्मक असर डाल सकते हैं। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में बताया कि यदि परिवार में किसी को डायबिटीज है, तो लाइफस्टाइल और डाइट में किए गए कुछ आसान बदलाव सेहत पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। घर में किसी सदस्य को डायबिटीज है तो रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें ब्लड शुगर को कंट्रोल रखने या बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाती हैं।

    खाने के समय में बदलाव से लेकर खाद्य पदार्थों के कॉम्बिनेशन पर ध्यान देने तक एक्सपर्ट ने शुगर कंट्रोल करने के लाइफस्टाइल और डाइट से जुड़े बदलाव बताए है,जिन्हें आसानी से अपनाया जा सकता है। उन्होंने सुझाव दिया फलों पर दालचीनी छिड़कें,  यह शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद करती है। रात का खाना 7 बजे तक खत्म कर लें, देर से खाना खाने से ब्लड शुगर बढ़ सकता है। खाने के बाद 10 मिनट टहलें, भले ही घर पर ही क्यों न हो। चावल और रोटी को एक साथ न खाएं, इससे शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। हर भोजन की शुरुआत फाइबर से करें, यह शुगर के अवशोषण को धीमा करता है। आइए एक्सपर्ट की इस सलाह की तसदीक डॉक्टर से करते हैं। क्या सचमुच चावल और रोटी का सेवन सेहत के लिए खतरा है?

    चावल और रोटी साथ खाने से ब्लड शुगर पर क्या असर पड़ता है?

    कंसल्टेंट डाइटिशियन और डायबिटीज एजुकेटर कनिका मल्होत्रा ने बताया कि यदि ब्लड शुगर को एक बाल्टी माना जाए, तो एक ही भोजन में चावल और रोटी दोनों खाना ऐसा है जैसे एक साथ दो नलों से पानी बाल्टी में डाला जा रहा हो। दोनों ही कार्बोहाइड्रेट से भरपूर होते हैं और साथ खाने पर ब्लड शुगर तेजी से बढ़ा सकते हैं। उन्होंने सलाह दी कि एक समय में केवल एक कार्ब स्रोत चुनें और प्लेट में अधिक मात्रा में सब्जियां या दाल शामिल करें। इससे ब्लड ग्लूकोज को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।

    क्या छोटे बदलाव बड़े डाइट प्लान जितने प्रभावी हो सकते हैं?

    कनिका मल्होत्रा के अनुसार, भोजन के बाद टहलना और दालचीनी का सीमित उपयोग जैसी छोटी आदतों को असरदार बताया गया है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि इन आदतों की मदद से भोजन के बाद ब्लड शुगर में आने वाली तेजी को 15 से 30 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। हालांकि, यदि व्यक्ति की मूल खानपान की आदतें असंतुलित बनी रहती हैं तो इन छोटे बदलावों का असर एक सीमा तक ही रहता है। फिर भी नियमित रूप से अपनाए गए छोटे सुधार लंबे समय में ब्लड शुगर कंट्रोल में उतने ही प्रभावी साबित हो सकते हैं जितने बड़े डाइटरी बदलाव।

    डायबिटीज में भोजन का समय कितना महत्वपूर्ण है?

    कनिका मल्होत्रा बताती हैं कि जल्दी डिनर करने का फायदा इसलिए होता है क्योंकि इंसुलिन की कार्यक्षमता और ग्लूकोज मेटाबॉलिज्म हमारे शरीर की जैविक घड़ी (सर्कैडियन रिद्म) से जुड़े होते हैं। देर रात भोजन करने पर रात के समय ब्लड शुगर अधिक बढ़ सकता है और अगली सुबह फास्टिंग शुगर भी ज्यादा रह सकता है। उनके अनुसार, कई लोगों में रात 9 बजे की बजाय शाम 7 बजे डिनर करने से फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज 10 से 15 mg/dL तक कम हो सकता है।

    हर व्यक्ति के लिए भोजन का समय अलग हो सकता है

    विशेषज्ञों का कहना है कि हर व्यक्ति का मेटाबॉलिज्म और दिनचर्या अलग होती है। उदाहरण के लिए, नाइट शिफ्ट में काम करने वाले या देर से उठने वाले लोगों को अपने सोने-जागने के समय के अनुसार भोजन का समय निर्धारित करना पड़ सकता है। केवल घड़ी का समय ही नहीं, बल्कि भोजन का शरीर की डेली रूटीन के साथ तालमेल भी महत्वपूर्ण होता है। कंटीन्यूअस ग्लूकोज मॉनिटरिंग (CGM) से भी यह देखा गया है कि भोजन का समय बदलने से ब्लड शुगर पर असर पड़ता है, भले ही भोजन एक जैसा ही क्यों न हो।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी और सुझाव केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षिक उद्देश्यों के लिए हैं। इसे किसी भी तरह से योग्य डॉक्टर की चिकित्सा सलाह, निदान या डायबिटीज के पेशेवर उपचार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। हर व्यक्ति के शरीर का मेटाबॉलिज्म और शुगर का स्तर अलग होता है। अपनी डाइट, दवाओं या जीवनशैली में कोई भी बदलाव करने से पहले हमेशा अपने डॉक्टर से परामर्श जरूर लें।

  • कब्ज से छुटकारा पाना है? एक्सपर्ट से जानिए क्या हैं इसके कारण और बचाव के तरीके..

    कब्ज से छुटकारा पाना है? एक्सपर्ट से जानिए क्या हैं इसके कारण और बचाव के तरीके..

    कब्ज से छुटकारा पाना है? एक्सपर्ट से जानिए क्या हैं इसके कारण और बचाव के तरीके..

    अक्सर लोग पुरानी या बार-बार होने वाली कब्ज (Chronic Constipation) से राहत पाने के लिए लंबे समय तक चूर्ण, लैक्सेटिव (Laxatives) या घरेलू नुस्खों का सहारा लेते रहते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार बिना चिकित्सीय सलाह के इन उपायों का लगातार इस्तेमाल आंतों की प्राकृतिक कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सामान्य उपायों के बावजूद कब्ज की समस्या बनी रहती है, तो इसे नजरअंदाज करने या दबाने के बजाय इसके मूल कारण को समझकर वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से उपचार करना जरूरी है।

    हाल ही में सात्विक मूवमेंट की एक्सपर्ट ने अपने वीडियो में कब्ज के कारणों, लक्षणों और इससे राहत पाने के प्राकृतिक उपायों के बारे में जानकारी साझा की। एक्सपर्ट के मुताबिक, खराब खानपान, पर्याप्त शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव और शरीर के प्राकृतिक वेग को बार-बार रोकना कब्ज की प्रमुख वजहें हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि कुछ आसान लाइफस्टाइल के बदलावों और घरेलू उपायों को अपनाकर पाचन तंत्र को बेहतर बनाया जा सकता है और कब्ज से राहत पाई जा सकती है। आइए जानते हैं कब्ज के प्रमुख लक्षण, इसके सामान्य कारण और कुछ ऐसे देसी उपाय, जो इस समस्या को दूर करने में मददगार साबित हो सकते हैं।

    कब्ज के कारण

    कब्ज एक ऐसी परेशानी है जिसके लिए बॉडी एक्टिविटी में कमी भी जिम्मेदार है। कम चलना-फिरना या नियमित व्यायाम न करना आंतों की गति को धीमा कर सकता है, जिससे कब्ज की समस्या बढ़ सकती है। शरीर में पर्याप्त पानी न होने पर मल सख्त हो सकता है और उसे बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है। अत्यधिक तनाव पाचन तंत्र को प्रभावित करता है और आंतों की सामान्य कार्यप्रणाली में बाधा डाल सकता है। प्राकृतिक वेग को नजरअंदाज करने से आंतों की आदत बिगड़ सकती है और धीरे-धीरे कब्ज की समस्या विकसित हो सकती है। फल, सब्जियां और फाइबर कम खाने तथा अत्यधिक प्रोसेस्ड या सूखा भोजन लेने से मल त्याग में कठिनाई हो सकती है।

    कब्ज के लक्षण

    1. पेट पूरी तरह साफ न होना-
      कब्ज का सबसे आम लक्षण है शौच के बाद भी पेट भरा हुआ या अधूरा साफ होने का एहसास होना। व्यक्ति को बार-बार टॉयलेट जाने की जरूरत महसूस हो सकती है।
    2. पेट फूलना और गैस बनना-
      आंतों में मल जमा रहने से गैस बनने लगती है, जिससे पेट फूलने, भारीपन और असहजता की समस्या हो सकती है।
    3. शरीर में ऊर्जा की कमी-
      कब्ज की वजह से कई लोगों को दिनभर थकान, सुस्ती और काम में मन न लगने जैसी परेशानी हो सकती है।
    4. सिरदर्द और चिड़चिड़ेपन-
      पाचन तंत्र ठीक से काम नहीं करने पर कुछ लोगों को बार-बार सिरदर्द, बेचैनी और मूड खराब होने की शिकायत हो सकती है।
    5. मल त्याग के समय जोर लगाना-
      मल सख्त होने के कारण शौच करते समय ज्यादा दबाव लगाना पड़ता है, जिससे असुविधा महसूस होती है।

    कब्ज दूर करने के 5 उपाय

    टॉयलेट में फुट स्टूल का इस्तेमाल करें

    वेस्टर्न टॉयलेट पर बैठते समय पैरों के नीचे छोटा स्टूल रखने से शरीर स्क्वाटिंग जैसी स्थिति में आ जाता है। इससे मल त्याग आसान हो सकता है और जोर लगाने की जरूरत कम पड़ती है।

    सुबह पाचन को बेहतर बनाने वाले ड्रिंक पीएं

    आंवला जूस, नारियल पानी में सब्जा सीड्स या सौंफ की चाय जैसे पेय पाचन तंत्र को सक्रिय करने में मदद कर सकते हैं। इन्हें सुबह खाली पेट या नाश्ते से पहले लिया जा सकता है।

    पानी और फाइबर से भरपूर भोजन खाएं

    पपीता, तरबूज, खीरा, लौकी, टमाटर और अन्य फल-सब्जियां शरीर को नमी और फाइबर प्रदान करती हैं। इससे मल नरम रहता है और कब्ज की समस्या कम हो सकती है।

    रोजाना व्यायाम और योग करें

    तेज चलना, साइकिलिंग, योग और स्ट्रेचिंग जैसी गतिविधियां आंतों की गति को बढ़ावा देती हैं। आंतों की सेहत में सुधार करना चाहते हैं तो आप मलासन, अर्ध मत्स्येंद्रासन और पश्चिमोत्तानासन जैसे योगासन पाचन के लिए लाभकारी माने जाते हैं।

    पर्याप्त पानी पिएं और प्रोसेस्ड फूड कम करें

    दिनभर पर्याप्त पानी पीने के साथ मैदा, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और जंक फूड का सेवन सीमित करें। इससे पाचन बेहतर रहता है और कब्ज की समस्या कम हो सकती है।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता और पारंपरिक नेचुरल लाइफस्टाइल  के अनुभवों पर आधारित है। यह किसी भी तरह से योग्य एलोपैथिक डॉक्टर, गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या प्रमाणित चिकित्सा विशेषज्ञ के निदान, उपचार या चिकित्सा नुस्खे का विकल्प नहीं है। हर व्यक्ति के शरीर की तासीर, बीमारियां और चिकित्सा इतिहास अलग होते हैं। यदि आप लंबे समय से जिद्दी या पुरानी कब्ज की समस्या से जूझ रहे हैं, मल त्याग के साथ खून आने या गंभीर पेट दर्द जैसे लक्षण महसूस कर रहे हैं, तो किसी भी घरेलू उपाय या सप्लीमेंट को आजमाने से पहले तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।