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  • दिल्ली में आंदोलनों के बीच सुप्रीम: कोर्ट के पास कितनी ताकत? प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से लेकर पुलिस की कार्रवाई तक, जानिए पूरी बात

    दिल्ली में आंदोलनों के बीच सुप्रीम: कोर्ट के पास कितनी ताकत? प्रदर्शनकारियों के अधिकारों से लेकर पुलिस की कार्रवाई तक, जानिए पूरी बात

    देश में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों को लेकर जब बड़े आंदोलन होते हैं, तो एक अहम सवाल सामने आता है कि ऐसे हालात में सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है? क्या शीर्ष अदालत प्रदर्शनकारियों को सुरक्षा देने, मनमानी गिरफ्तारी रोकने या प्रशासन को निर्देश जारी करने का आदेश दे सकती है? भारतीय संविधान सुप्रीम कोर्ट को मौलिक अधिकारों की रक्षा और कानून की संवैधानिकता की समीक्षा करने की व्यापक शक्तियां देता है। हालांकि, इन शक्तियों का इस्तेमाल मामले के तथ्यों, संबंधित कानूनों और अदालत के सामने रखी गई याचिका के आधार पर होता है।

    दिल्ली में इंडिया गठबंधन के नेताओं और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करने की खबरों के बीच न्यायपालिका की भूमिका को समझना जरूरी है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह मार्च मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग से जुड़े राजनीतिक विवाद के बीच निकाला जा रहा है। इस तरह के मामलों में यह समझना भी जरूरी है कि किसी राजनीतिक मांग और अदालत के अधिकार क्षेत्र में क्या अंतर है।

    1. शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा

    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक, बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इसका अर्थ है कि नागरिक सरकार की नीतियों या किसी सार्वजनिक मुद्दे के विरोध में अपनी बात रख सकते हैं।

    हालांकि, ये अधिकार असीमित नहीं हैं। कानून के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और अन्य संवैधानिक हितों की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

    यदि किसी मामले में प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप हो, तो सुप्रीम कोर्ट कानून और तथ्यों के आधार पर हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर प्रदर्शन के लिए अदालत की अनुमति जरूरी है या हर आंदोलन पर रोक लगाने का फैसला केवल सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है।

    2. अवैध हिरासत और गिरफ्तारी के खिलाफ राहत

    प्रदर्शन के दौरान किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने या गिरफ्तार करने पर पुलिस को कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। किसी व्यक्ति को केवल इसलिए मनमाने ढंग से हिरासत में नहीं रखा जा सकता कि वह सरकार या प्रशासन की आलोचना कर रहा है।

    यदि किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखे जाने का आरोप हो, तो उचित परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट या संबंधित हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यानी हैबियस कॉर्पस दाखिल की जा सकती है। अदालत मामले की परिस्थितियों के अनुसार हिरासत की वैधता की जांच कर सकती है और गैरकानूनी हिरासत पाए जाने पर रिहाई का आदेश दे सकती है।

    हालांकि, हर गिरफ्तारी अपने आप गैरकानूनी नहीं होती। अदालत यह देखती है कि कार्रवाई कानून के अनुरूप हुई या नहीं।

    3. बैरिकेडिंग और आम लोगों की आवाजाही

    बड़े आंदोलनों के दौरान पुलिस सुरक्षा के लिए बैरिकेडिंग कर सकती है और कुछ रास्तों पर पाबंदियां लगा सकती है। इसका उद्देश्य संवेदनशील स्थानों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखना हो सकता है।

    लेकिन सुरक्षा व्यवस्था और नागरिकों की आवाजाही के बीच संतुलन जरूरी है। यदि किसी प्रतिबंध को मनमाना, गैरकानूनी या मौलिक अधिकारों के विपरीत बताया जाता है, तो अदालत उसकी समीक्षा कर सकती है और उचित निर्देश दे सकती है।

    इसका मतलब यह नहीं कि सुप्रीम कोर्ट हर आंदोलन के दौरान सीधे बैरिकेडिंग हटाने का आदेश देता है। ऐसे मामलों में प्रशासन के फैसले, सुरक्षा संबंधी कारण और उपलब्ध कानूनी उपाय महत्वपूर्ण होते हैं।

    4. मेट्रो, बस और दूसरी सार्वजनिक सेवाओं का सवाल

    प्रदर्शन के दौरान यातायात प्रभावित होने से आम यात्रियों, कर्मचारियों और कारोबारियों को परेशानी हो सकती है। प्रशासन को सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ सामान्य जनजीवन को यथासंभव सुचारू रखने की जरूरत होती है।

    यदि सार्वजनिक सेवाओं को बंद करने या आवाजाही पर रोक लगाने के फैसले को अदालत में चुनौती दी जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट संबंधित परिस्थितियों की समीक्षा कर सकता है। जरूरत के मुताबिक प्रशासन से जवाब मांगा जा सकता है या कानूनी निर्देश जारी किए जा सकते हैं।

    हालांकि, मेट्रो या बस सेवा चालू रखने का कोई एक सार्वभौमिक आदेश हर प्रदर्शन पर लागू नहीं होता। सुरक्षा की वास्तविक स्थिति और संबंधित नियमों के आधार पर फैसला लिया जाता है।

    5. इंटरनेट बंद करने के फैसले की न्यायिक समीक्षा

    कई बार कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका के चलते प्रशासन इंटरनेट सेवाओं पर अस्थायी रोक लगाता है। ऐसी पाबंदियां लोगों के संवाद, कारोबार, शिक्षा और डिजिटल सेवाओं को प्रभावित कर सकती हैं।

    सुप्रीम कोर्ट ने अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में जनवरी 2020 में इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए थे। अदालत ने कहा था कि इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति और कारोबार से जुड़े अधिकारों पर प्रतिबंधों की कानूनी समीक्षा की जा सकती है। इंटरनेट बंद करने के आदेशों को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराना और उनकी समय-समय पर समीक्षा करना भी महत्वपूर्ण है।

    इसलिए इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाना प्रशासन के लिए बिना शर्त अधिकार नहीं है। संबंधित आदेश कानून के अनुरूप होना चाहिए और उसकी आवश्यकता तथा अवधि की समीक्षा की जा सकती है।

    6. हिंसा होने पर पुलिस की कार्रवाई

    शांतिपूर्ण प्रदर्शन और हिंसक गतिविधियों में अंतर करना जरूरी है। यदि किसी आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या लोगों की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है, तो पुलिस कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है।

    लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर बल प्रयोग भी कानूनी सीमाओं के भीतर होना चाहिए। कार्रवाई की आवश्यकता, परिस्थितियों और उसकी आनुपातिकता जैसे पहलुओं पर सवाल उठने पर अदालत न्यायिक समीक्षा कर सकती है।

    सुप्रीम कोर्ट जरूरत पड़ने पर प्रशासन से जवाब मांग सकता है और यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देश दे सकता है कि कार्रवाई कानून और संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप हो। हालांकि, अदालत सामान्य तौर पर मौके पर पुलिस की हर कार्रवाई का संचालन नहीं करती।

    7. सुप्रीम कोर्ट की सबसे अहम शक्तियां क्या हैं?

    सुप्रीम कोर्ट की भूमिका केवल आंदोलनों तक सीमित नहीं है। भारतीय संविधान के तहत उसे कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं।

    • मौलिक अधिकारों की रक्षा: अनुच्छेद 32 के तहत नागरिक मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।
    • संवैधानिक समीक्षा: अदालत कानूनों और सरकारी कार्रवाइयों की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकती है।
    • रिट जारी करना: उचित मामलों में अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी कर सकती है।
    • सरकार और प्रशासन से जवाब मांगना: किसी मामले में आवश्यक होने पर अदालत संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर सकती है और जवाब मांग सकती है।
    • कानूनी विवादों का निपटारा: संविधान और कानून के तहत आने वाले मामलों में अदालत निर्णय दे सकती है। उसके फैसले अनुच्छेद 141 के तहत देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होते हैं।

    क्या सुप्रीम कोर्ट किसी राजनीतिक मांग पर सीधे फैसला दे सकता है?

    यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट के पास व्यापक संवैधानिक शक्तियां हैं, लेकिन वह हर राजनीतिक विवाद में स्वतः हस्तक्षेप नहीं करता। किसी मांग पर अदालत क्या कदम उठाएगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके सामने कौन-सा मामला आया है, याचिका में क्या राहत मांगी गई है और संबंधित विषय कानून के तहत अदालत के अधिकार क्षेत्र में आता है या नहीं।

    किसी संवैधानिक पदाधिकारी से इस्तीफे की मांग करना राजनीतिक अधिकार और प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन केवल ऐसी मांग के आधार पर अदालत इस्तीफे का आदेश दे देगी, यह मानना सही नहीं है। इसके लिए संबंधित कानून, संवैधानिक प्रावधान और मामले के तथ्यों को देखना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख संवैधानिक प्रावधानों और उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर सामान्य जानकारी देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी विशेष मामले में अदालत क्या आदेश दे सकती है, यह संबंधित तथ्यों और लागू कानून पर निर्भर करता है।

  • भारत नहीं, पाकिस्तान के कराची में सजा माता रानी का दरबार, नवरात्रि पर गरबा-डांडिया करते दिखे श्रद्धालु

    भारत नहीं, पाकिस्तान के कराची में सजा माता रानी का दरबार, नवरात्रि पर गरबा-डांडिया करते दिखे श्रद्धालु

    भारत नहीं, पाकिस्तान के कराची में सजा माता रानी का दरबार, नवरात्रि पर गरबा-डांडिया करते दिखे श्रद्धालु

    पाकिस्तान के कराची से नवरात्रि उत्सव की ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जिन्होंने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींचा है। यहां स्थित श्री रत्नेश्वर महादेव मंदिर में हिंदू श्रद्धालु माता रानी की पूजा करते और गरबा की धुन पर झूमते नजर आए। मंदिर परिसर में भक्तों की मौजूदगी, धार्मिक आयोजन और प्रसाद वितरण की झलक देखकर कई लोग हैरान रह गए। सोशल मीडिया पर साझा की गई इन तस्वीरों को लेकर भारतीय यूजर्स भी अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

    भारत में नवरात्रि के दौरान जगह-जगह माता के पंडाल सजाए जाते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा होती है और कई शहरों में गरबा व डांडिया के आयोजन किए जाते हैं। ऐसे में जब पड़ोसी देश पाकिस्तान के कराची से भी इसी तरह के धार्मिक उत्सव की तस्वीरें सामने आईं, तो यह चर्चा का विषय बन गईं।

    कराची के मंदिर में माता रानी की पूजा, गरबा करते दिखे श्रद्धालु

    सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के मुताबिक, ये तस्वीरें कराची के श्री रत्नेश्वर महादेव मंदिर में आयोजित नवरात्रि उत्सव से जुड़ी हैं। पोस्ट में मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के जुटने और त्योहार मनाने की झलक दिखाई गई है।

    साझा की गई सामग्री में भक्त गरबा करते, पूजा में शामिल होते और एक-दूसरे के साथ त्योहार का आनंद लेते नजर आते हैं। कुछ श्रद्धालुओं ने सिर पर ‘जय माता दी’ लिखी पट्टियां भी पहन रखी हैं। माता रानी की प्रतिमा और मंदिर में उत्सव का माहौल इस आयोजन को खास बना रहा है।

    पोस्ट के साथ साझा संदेश में बताया गया कि नवरात्रि के पहले दिन से ही मंदिर में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। हालांकि, आयोजन से जुड़ी सभी जानकारियों और इसकी पूरी अवधि की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी के आधार पर नहीं की जा सकती।

    नौ दिनों तक मनाया जाता है नवरात्रि का त्योहार

    नवरात्रि हिंदू धर्म का प्रमुख त्योहार है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। श्रद्धालु व्रत रखते हैं, मंदिरों में दर्शन करते हैं और कई जगहों पर सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

    सोशल मीडिया पर आयोजन से जुड़ी जानकारी साझा करने वाली महिला के अनुसार, कराची के मंदिर में भी नवरात्रि के दौरान कई दिनों तक पूजा और पारंपरिक कार्यक्रम होते हैं। उसने एक अन्य पोस्ट में आयोजन के समय और लोगों की भागीदारी को लेकर भी जानकारी दी थी। इन विवरणों को संबंधित सोशल मीडिया पोस्ट में किए गए दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

    सोशल मीडिया पर लोगों ने जताई खुशी

    कराची के मंदिर में नवरात्रि मनाते श्रद्धालुओं की तस्वीरें सामने आने के बाद कई यूजर्स ने खुशी जाहिर की। कुछ लोगों ने श्रद्धालुओं के लिए शुभकामनाएं देते हुए ‘जय माता दी’ लिखा, तो कुछ ने इस आयोजन को देखकर भावनात्मक प्रतिक्रिया दी।

    एक यूजर ने श्रद्धालुओं के लिए आशीर्वाद और शुभकामनाएं भेजीं। वहीं, कुछ लोगों ने इच्छा जताई कि उन्हें भी कभी इस तरह के आयोजन में शामिल होने और भक्तों के साथ त्योहार मनाने का मौका मिले। कुछ यूजर्स ने भारत और पाकिस्तान के लोगों के बीच आपसी सद्भाव और शांति की उम्मीद भी जताई।

    इन प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि धार्मिक परंपराओं से जुड़ी तस्वीरें सीमाओं के पार भी लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। खासकर तब, जब दोनों देशों के बीच संबंधों को लेकर अक्सर तनाव की चर्चा होती रहती है।

    पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की स्थिति पर भी होती रही है चर्चा

    कराची के मंदिर में नवरात्रि उत्सव की तस्वीरें वहां रहने वाले हिंदू समुदाय की धार्मिक गतिविधियों की एक झलक पेश करती हैं। लेकिन किसी एक आयोजन के आधार पर पूरे पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति के बारे में निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

    पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, जबरन धर्म परिवर्तन के आरोप और कम उम्र में विवाह जैसे मुद्दे समय-समय पर चर्चा में आते रहे हैं। इन विषयों को समझने के लिए विश्वसनीय रिपोर्टों, कानूनी स्थितियों और अलग-अलग क्षेत्रों के अनुभवों को देखना जरूरी है।

    इसी तरह, किसी मंदिर में त्योहार मनाए जाने की तस्वीर अपने आप में पूरे देश में सभी अल्पसंख्यकों की स्थिति का प्रमाण नहीं बन जाती। धार्मिक आयोजनों की मौजूदगी और समुदायों के सामने मौजूद चुनौतियों को अलग-अलग तथ्यों के आधार पर समझना चाहिए।

    त्योहारों की खुशियां सीमाओं से परे भी लोगों को जोड़ती हैं

    कराची के श्री रत्नेश्वर महादेव मंदिर से जुड़ी इन तस्वीरों ने नवरात्रि उत्सव और धार्मिक परंपराओं को लेकर चर्चा छेड़ दी है। श्रद्धालुओं को पूजा करते और गरबा में भाग लेते देख कई लोगों ने खुशी जाहिर की है।

    त्योहार लोगों को अपनी संस्कृति, आस्था और परंपराओं से जुड़ने का अवसर देते हैं। ऐसी तस्वीरें यह भी याद दिलाती हैं कि अलग-अलग देशों में रहने वाले लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं कई बार एक जैसी हो सकती हैं। हालांकि, वायरल पोस्ट में किए गए दावों और आयोजन से जुड़ी जानकारियों को स्वतंत्र पुष्टि के बिना अंतिम सच नहीं मानना चाहिए।

     

     

     

    डिस्क्लेमर: यह खबर सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। आयोजन से जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

  • नौकरी का झांसा देकर 12 लड़कियों को बंधक बनाने का आरोप, आर्केस्ट्रा में जबरन नचाने का दावा; 9 नाबालिगों समेत सभी मुक्त, महिला सहित 2 गिरफ्तार.

    नौकरी का झांसा देकर 12 लड़कियों को बंधक बनाने का आरोप, आर्केस्ट्रा में जबरन नचाने का दावा; 9 नाबालिगों समेत सभी मुक्त, महिला सहित 2 गिरफ्तार.

    नौकरी का झांसा देकर 12 लड़कियों को बंधक बनाने का आरोप, आर्केस्ट्रा में जबरन नचाने का दावा; 9 नाबालिगों समेत सभी मुक्त, महिला सहित 2 गिरफ्तार.

    बिहार के भोजपुर जिले में नौकरी दिलाने का भरोसा देकर लड़कियों को बुलाने और फिर कथित तौर पर बंधक बनाकर उनसे आर्केस्ट्रा में जबरन नृत्य कराने का मामला सामने आया है। पुलिस ने धोबहा थाना क्षेत्र में छापेमारी कर 12 लड़कियों को मुक्त कराया है। इनमें नौ नाबालिग और तीन बालिग बताई गई हैं। कार्रवाई के दौरान एक महिला समेत दो आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब इस मामले में कथित तौर पर शामिल अन्य लोगों की भूमिका की जांच कर रही है।

    यह कार्रवाई ‘ऑपरेशन नया सवेरा 3.0’ के तहत की गई। पुलिस को सूचना मिली थी कि धोबहा इलाके के एक बगीचे में टिन और करकट से बने मकान में कई लड़कियों को उनकी इच्छा के विरुद्ध रोका गया है। सूचना मिलने के बाद पुलिस टीम ने मौके पर छापा मारा और वहां मौजूद सभी 12 लड़कियों को मुक्त कराया।

    नौकरी का भरोसा देकर बुलाने का आरोप

    पुलिस के अनुसार, शुरुआती पूछताछ में लड़कियों ने बताया कि उन्हें रोजगार दिलाने का भरोसा देकर वहां लाया गया था। लेकिन वहां पहुंचने के बाद कथित तौर पर उनसे उनकी इच्छा के विरुद्ध आर्केस्ट्रा में नर्तकी का काम कराया जाने लगा।

    लड़कियों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें कई दिनों से वहां रोककर रखा गया था। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि उन्हें किसने नौकरी का भरोसा दिया, उन्हें वहां तक कैसे पहुंचाया गया और उनके रहने तथा काम करने की व्यवस्था कौन संभाल रहा था।

    मुक्त कराई गई लड़कियां बिहार के सीतामढ़ी, रोहतास, बक्सर और भोजपुर जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ की रहने वाली बताई गई हैं। अलग-अलग राज्यों से लड़कियों के आने के कारण पुलिस उनके संपर्कों और इस कथित नेटवर्क के दूसरे संभावित ठिकानों की भी जांच कर रही है।

    उत्तर प्रदेश की महिला समेत दो आरोपित गिरफ्तार

    पुलिस ने छापेमारी के दौरान उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले की निवासी जुली कुमारी और भोजपुर जिले के बबुरा गांव के निवासी मुकेश कुमार पासवान को गिरफ्तार किया है।

    पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान लड़कियों ने कथित तौर पर इस मामले से जुड़े कुछ अन्य लोगों के नाम भी बताए हैं। इनमें केशो पासवान, किशोर राम और सोनू यादव के नाम शामिल हैं। पुलिस इन लोगों की भूमिका की जांच कर रही है और उनकी तलाश में कार्रवाई की जा रही है।

    हालांकि, जिन लोगों के नाम जांच के दौरान सामने आए हैं, उनके खिलाफ आरोपों की पुष्टि कानूनी प्रक्रिया और साक्ष्यों के आधार पर ही होगी।

    नौ नाबालिग लड़कियों के मिलने से मामला गंभीर

    मुक्त कराई गई 12 लड़कियों में नौ के नाबालिग होने की बात सामने आई है। इस कारण मामले में बच्चों की सुरक्षा और उनके शोषण से जुड़े कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण हो गए हैं।

    पुलिस ने मामले में पॉक्सो अधिनियम, किशोर न्याय अधिनियम, बाल श्रम से संबंधित कानूनों और अन्य लागू कानूनी प्रावधानों के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। मामले की प्रकृति को देखते हुए महिला थाना और मानव तस्करी निरोधक इकाई (एएचटीयू) के अधिकारियों के साथ महिला पुलिसकर्मियों ने भी कार्रवाई में हिस्सा लिया।

    अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि लड़कियों को रोजगार का झांसा देने में किन लोगों की भूमिका थी और क्या उन्हें दूसरे स्थानों पर भी इसी तरह काम करने के लिए मजबूर किया गया था।

    ‘ऑपरेशन नया सवेरा 3.0’ के तहत कार्रवाई

    भोजपुर पुलिस आर्केस्ट्रा से जुड़े कुछ ठिकानों पर इस अभियान के तहत पहले भी कार्रवाई कर चुकी है। ताजा मामले में पुलिस का मुख्य उद्देश्य लड़कियों को बुलाने, उन्हें कथित तौर पर रोककर रखने और उनसे जबरन काम कराने में शामिल सभी लोगों की भूमिका का पता लगाना है।

    मुक्त कराई गई लड़कियों की सुरक्षा, उनके परिजनों से संपर्क और आगे की आवश्यक प्रक्रिया भी इस मामले में महत्वपूर्ण है। पुलिस गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ कर रही है और जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

    महत्वपूर्ण सूचना: यह रिपोर्ट उपलब्ध जानकारी और पुलिस की शुरुआती जांच से जुड़े विवरणों पर आधारित है। आरोपितों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

  • शिवा शर्मा मौत केस में श्रद्धा दुबे और बहन की तलाश तेज, नेपाल भागने की आशंका; कथित मददगारों और प्रभावशाली लोगों के संपर्कों की जांच.

    शिवा शर्मा मौत केस में श्रद्धा दुबे और बहन की तलाश तेज, नेपाल भागने की आशंका; कथित मददगारों और प्रभावशाली लोगों के संपर्कों की जांच.

    शिवा शर्मा मौत केस में श्रद्धा दुबे और बहन की तलाश तेज, नेपाल भागने की आशंका; कथित मददगारों और प्रभावशाली लोगों के संपर्कों की जांच.

    उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कारोबारी और कैफे संचालक शिवा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले में पुलिस की जांच तेज हो गई है। मामले में आरोपित मॉडल श्रद्धा दुबे और उसकी बहन की तलाश की जा रही है। पुलिस को आशंका है कि दोनों घटना के बाद नेपाल की ओर गई हो सकती हैं। जांच के दौरान कुछ ऐसे लोगों के नाम भी सामने आए हैं, जिन पर दोनों बहनों को फरार होने में मदद पहुंचाने का संदेह है। हालांकि, उनके ठिकाने और कथित मददगारों की भूमिका की अभी पुष्टि नहीं हुई है।

    चौक में परिचितों से मिलने के बाद नेपाल जाने की आशंका

    जांच के दौरान पुलिस को जानकारी मिली है कि घटना के बाद श्रद्धा और उसकी बहन लखनऊ के चौक इलाके में कुछ परिचितों से मिली थीं। इसके बाद उनके सीतापुर और बहराइच के रास्ते नेपाल जाने की आशंका जताई जा रही है। पुलिस इन सूचनाओं के आधार पर दोनों की तलाश कर रही है।

    जांच एजेंसियों की नजर आमिर और दानिश नाम के दो लोगों पर भी है। पुलिस टीमों ने उनके घरों पर दबिश दी, लेकिन दोनों वहां नहीं मिले। इसके बाद उनके परिजनों से पूछताछ कर उनके बारे में जानकारी जुटाई गई।

    फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि दोनों बहनें वास्तव में नेपाल पहुंची हैं या नहीं। पुलिस अलग-अलग सूचनाओं की जांच कर उनके संभावित ठिकानों का पता लगाने की कोशिश कर रही है।

    बिल्डरों और प्रभावशाली लोगों से संपर्कों की भी पड़ताल

    शिवा शर्मा की मौत की जांच के साथ श्रद्धा दुबे और उसकी बहन के संपर्कों की भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस को आशंका है कि कुछ बिल्डरों और अन्य प्रभावशाली लोगों ने उन्हें मदद पहुंचाई हो सकती है। इसी सिलसिले में कॉल रिकॉर्ड, परिचितों और अन्य संपर्कों से जुड़ी जानकारियां खंगाली जा रही हैं।

    इवेंट कंपनियों और फैशन शो से जुड़े कुछ लोगों के संपर्कों की भी जांच किए जाने की बात सामने आई है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि घटना के बाद दोनों बहनों ने किन लोगों से संपर्क किया और क्या किसी ने उन्हें ठिकाना बदलने या पुलिस से बचने में मदद की।

    हालांकि, किसी व्यक्ति का आरोपितों से संपर्क होना अपने आप में अपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं है। किसी भी व्यक्ति की भूमिका जांच में मिले साक्ष्यों के आधार पर ही स्पष्ट हो सकेगी।

    चौथी मंजिल से गिरने के बाद हुई थी शिवा शर्मा की मौत

    शिवा शर्मा लखनऊ के बालू अड्डा स्थित अवध ग्रीन अपार्टमेंट में रहते थे। शुक्रवार रात वह अपार्टमेंट की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए थे। बाद में उनका शव परिसर में मिला। शिवा चिकन कारोबार और कैफे संचालन से जुड़े हुए थे तथा श्रद्धा दुबे के साथ लिव-इन संबंध में रह रहे थे।

    शिवा की मौत के बाद परिवार ने घटना को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उनकी मां रंजना ने श्रद्धा, उसकी बहन और कुछ अन्य लोगों पर आरोप लगाए हैं। परिवार को संदेह है कि यह सामान्य हादसा नहीं था और शिवा के साथ कथित तौर पर हुई हिंसा का उनकी मौत से संबंध हो सकता है।

    पुलिस इन आरोपों और मौत से जुड़ी परिस्थितियों की जांच कर रही है। अभी तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि शिवा की मौत दुर्घटना थी या इसके पीछे किसी की आपराधिक भूमिका थी। इसका पता जांच और साक्ष्यों के विश्लेषण के बाद ही चल सकेगा।

    फ्लैट से मिली दवाओं और अन्य वस्तुओं की फोरेंसिक जांच

    जांच के दौरान श्रद्धा के फ्लैट से मिली कुछ दवाओं और अन्य वस्तुओं को परीक्षण के लिए भेजा गया है। पुलिस फोरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार कर रही है। रिपोर्ट से इन वस्तुओं की प्रकृति और मामले से उनके संभावित संबंध के बारे में जानकारी मिल सकती है।

    इसके अलावा, पुलिस श्रद्धा और उसकी बहन के पुराने संपर्कों तथा पहले दर्ज कराए गए मामलों से जुड़े पहलुओं की भी पड़ताल कर रही है। जांच का उद्देश्य घटना से पहले और बाद की गतिविधियों की कड़ियां जोड़ना और शिवा की मौत की परिस्थितियों को स्पष्ट करना है।

    पुलिस के सामने अब क्या हैं प्रमुख चुनौतियां?

    इस मामले में पुलिस के सामने फिलहाल तीन प्रमुख काम हैं—श्रद्धा दुबे और उसकी बहन का पता लगाना, उन लोगों की भूमिका की जांच करना जिन पर कथित तौर पर मदद करने का संदेह है, और शिवा शर्मा की मौत से जुड़े साक्ष्यों का विश्लेषण करना।

    कॉल रिकॉर्ड, फोरेंसिक रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य उपलब्ध साक्ष्य जांच की दिशा तय करने में अहम हो सकते हैं। पुलिस की कार्रवाई और जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।

    महत्वपूर्ण सूचना: यह रिपोर्ट उपलब्ध जानकारी और जांच से जुड़े दावों पर आधारित है। श्रद्धा दुबे, उनकी बहन या अन्य व्यक्तियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। किसी की भूमिका या दोष का अंतिम निर्धारण जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।

  • दुनिया का कौन-सा देश है जहां 40 रुपये से भी कम में मिलती है शराब की बोतल? वियतनाम से लेकर गोवा तक, जानिए सस्ती शराब के पीछे की वजह

    दुनिया का कौन-सा देश है जहां 40 रुपये से भी कम में मिलती है शराब की बोतल? वियतनाम से लेकर गोवा तक, जानिए सस्ती शराब के पीछे की वजह

    दुनिया का कौन-सा देश है जहां 40 रुपये से भी कम में मिलती है शराब की बोतल? वियतनाम से लेकर गोवा तक, जानिए सस्ती शराब के पीछे की वजह

    दुनिया के अलग-अलग देशों में शराब की कीमतों में काफी अंतर देखने को मिलता है। कहीं टैक्स और उत्पादन लागत अधिक होने के कारण शराब महंगी मिलती है, तो कहीं स्थानीय उत्पादन और कर नीतियों की वजह से कुछ पेय अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं। इसी वजह से वियतनाम जैसे देशों का नाम अक्सर सस्ती बीयर के संदर्भ में लिया जाता है। हालांकि, यह दावा कि किसी देश में शराब की पूरी बोतल मात्र 40 रुपये में मिल जाती है, हर तरह की शराब और हर आकार की बोतल पर लागू नहीं होता।

    शराब की वास्तविक कीमत ब्रांड, मात्रा, शराब के प्रकार, दुकान, टैक्स और स्थानीय नियमों के आधार पर बदलती है। ऐसे में किसी देश को सबसे सस्ता बताने से पहले इन बातों को समझना जरूरी है।

    वियतनाम में क्यों सस्ती मिलती है बीयर?

    वियतनाम को उसकी स्थानीय बीयर संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहां कई जगहों पर स्थानीय बीयर अपेक्षाकृत कम कीमत में मिल सकती है। खासकर स्थानीय दुकानों और साधारण खानपान वाले इलाकों में बीयर की कीमत कुछ दूसरे पर्यटन स्थलों के मुकाबले कम हो सकती है।

    इसका एक कारण स्थानीय उत्पादन और प्रतिस्पर्धा है। जब किसी देश में बीयर का उत्पादन बड़े स्तर पर होता है और स्थानीय ब्रांड आसानी से उपलब्ध होते हैं, तो कुछ उत्पादों की कीमत अपेक्षाकृत कम रह सकती है।

    हालांकि, वियतनाम में हर तरह की शराब सस्ती हो, ऐसा जरूरी नहीं है। आयातित ब्रांड, प्रीमियम शराब और महंगे होटलों या पर्यटन क्षेत्रों में मिलने वाले पेय की कीमत काफी अधिक हो सकती है। इसलिए 40 रुपये में पूरी बोतल मिलने के दावे को बिना ब्रांड, मात्रा और दुकान की जानकारी के सही नहीं माना जा सकता।

    यूक्रेन में वोदका की कीमत कितनी होती है?

    यूक्रेन में वोदका लोकप्रिय मादक पेय पदार्थों में शामिल है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध ब्रांड कुछ बाजारों में अपेक्षाकृत किफायती हो सकते हैं। लेकिन शराब की कीमतें समय, आर्थिक परिस्थितियों, टैक्स और ब्रांड के अनुसार बदलती रहती हैं।

    इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि यूक्रेन में हर जगह वोदका बेहद कम कीमत पर मिलती है या उसकी कीमत दूसरे सभी यूरोपीय देशों से कम है। किसी भी तुलना के लिए एक ही मात्रा और समान श्रेणी के उत्पादों की कीमत देखना जरूरी है।

    जांबिया में भी मिलते हैं स्थानीय पेय

    अफ्रीकी देश जांबिया में भी बीयर और दूसरे मादक पेय उपलब्ध हैं। स्थानीय उत्पादों की कीमत आयातित ब्रांडों से अलग हो सकती है। शराब की कीमत पर उत्पादन लागत, परिवहन, टैक्स और बिक्री की जगह का असर पड़ता है।

    हालांकि, जांबिया में शराब की हर बोतल 40 रुपये से कम में मिलने का दावा करने के लिए विश्वसनीय और वर्तमान कीमतों की जानकारी जरूरी है। बिना ऐसे प्रमाण के किसी निश्चित कीमत को पूरे देश पर लागू नहीं किया जा सकता।

    भारत में कहां मिलती है अपेक्षाकृत सस्ती शराब?

    भारत में शराब की कीमतें राज्यों के आबकारी कर, लाइसेंस व्यवस्था और स्थानीय नीतियों के आधार पर अलग-अलग होती हैं। इसी कारण एक ही ब्रांड की कीमत दो राज्यों में अलग हो सकती है।

    गोवा: गोवा में शराब की कीमतें कुछ अन्य भारतीय राज्यों की तुलना में कम हो सकती हैं। यहां पर्यटन और स्थानीय बाजार के कारण शराब के कई ब्रांड उपलब्ध रहते हैं। फिर भी कीमत ब्रांड और दुकान के हिसाब से बदलती है।

    सिक्किम: सिक्किम में भी शराब की कीमत स्थानीय कर नीतियों और उपलब्ध ब्रांडों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। हर उत्पाद को दूसरे राज्यों के मुकाबले सस्ता मानना सही नहीं होगा।

    हिमाचल प्रदेश: यहां शराब की कीमत राज्य की आबकारी नीति और संबंधित उत्पाद के आधार पर तय होती है। अलग-अलग ब्रांडों में कीमत का अंतर देखने को मिल सकता है।

    लद्दाख: लद्दाख में शराब की कीमत उपलब्धता, परिवहन और स्थानीय बिक्री व्यवस्था से प्रभावित हो सकती है। इसलिए इसे हर परिस्थिति में सस्ता विकल्प कहना उचित नहीं है।

    शराब की कीमत कम होने के पीछे क्या कारण होते हैं?

    किसी देश या राज्य में शराब अपेक्षाकृत सस्ती मिलने के पीछे कई कारण हो सकते हैं:

    • टैक्स और आबकारी शुल्क: अलग-अलग सरकारें शराब पर अलग दरों से कर लगाती हैं।
    • स्थानीय उत्पादन: स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर उत्पादन होने से कुछ उत्पादों की लागत कम हो सकती है।
    • परिवहन खर्च: दूर से मंगाए जाने वाले उत्पादों की कीमत में परिवहन और भंडारण का खर्च जुड़ सकता है।
    • ब्रांड और गुणवत्ता: साधारण श्रेणी के उत्पादों और प्रीमियम ब्रांडों की कीमतों में काफी अंतर होता है।
    • बिक्री की जगह: सामान्य दुकानों, बार, रेस्तरां और पर्यटन स्थलों पर एक ही पेय की कीमत अलग हो सकती है।

    क्या सच में 40 रुपये से कम में मिलती है शराब की पूरी बोतल?

    इस सवाल का सीधा जवाब देने से पहले यह जानना जरूरी है कि दावा किस पेय, किस मात्रा और किस समय की कीमत से जुड़ा है। स्थानीय बीयर की छोटी सर्विंग, पूरी बोतल और तेज शराब की बोतल एक जैसी चीजें नहीं हैं। मुद्रा विनिमय दर में बदलाव भी भारतीय रुपये में बताई जाने वाली कीमत को प्रभावित करता है।

    इसलिए वियतनाम, यूक्रेन या जांबिया में शराब की पूरी बोतल 40 रुपये से कम में मिलने का दावा प्रमाणित वर्तमान मूल्य सूची के बिना निश्चित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। इसी तरह भारत के किसी राज्य में शराब सस्ती होने का अर्थ यह नहीं है कि वहां हर ब्रांड की कीमत कम होगी।

    जरूरी सूचना: शराब का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। शराब खरीदने और सेवन करने से जुड़े स्थानीय कानूनों, न्यूनतम कानूनी उम्र और अन्य नियमों का पालन करें। इस लेख में बताई गई कीमतों और देशों की तुलना सामान्य जानकारी पर आधारित है; 40 रुपये से कम में पूरी बोतल मिलने के दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है।

  • एक सेल्फी से खाली हो सकता है बैंक खाता, भूलकर भी न खिंचवाएं ऐसे फोटोज!..

    एक सेल्फी से खाली हो सकता है बैंक खाता, भूलकर भी न खिंचवाएं ऐसे फोटोज!..

    एक सेल्फी से खाली हो सकता है बैंक खाता, भूलकर भी न खिंचवाएं ऐसे फोटोज!..

    आज के डिजिटल युग में जहां हम अपनी सुरक्षा के लिए बायोमेट्रिक्स और फिंगरप्रिंट लॉक पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, वहीं एक ताजा चेतावनी ने स्मार्टफोन यूजर्स की नींद उड़ा दी है. साइबर सिक्युरिटी एक्सपर्ट्स ने आगाह किया है कि सोशल मीडिया पर ‘V’ साइन (तर्जनी और मध्यमा उंगली को बाहर की ओर फैलाकर) दिखाते हुए सेल्फी पोस्ट करना आपके लिए भारी मुसीबत बन सकता है. आधुनिक हाई-डेफिनिशन कैमरों और उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सॉफ्टवेयर के आने से अब यह तकनीकी रूप से संभव हो गया है कि आपकी तस्वीरों से आपके फिंगरप्रिंट की विस्तृत जानकारी चुराई जा सके और इसका उपयोग आपके बायोमेट्रिक सुरक्षा सिस्टम को भेदने के लिए किया जा सके. साथ ही उंगलियों के निशान से साइबर अपराधी बैंक खाता भी खाली कर सकते हैं.

    चीनी सिक्युरिटी एक्सपर्ट ली चांग ने हाल ही में एक रियलिटी शो के दौरान एक मशहूर हस्ती की सेल्फी का उदाहरण देते हुए यह दिखाया कि ‘V’ पोज वाली फोटो में उंगलियां कितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं. चांग के विश्लेषण के अनुसार, यदि तस्वीर 1.5 मीटर से कम की दूरी से ली गई है और उंगलियां सीधे कैमरे के सामने हैं, तो फिंगरप्रिंट की जानकारी पूरी तरह से निकाली जा सकती है. सेल्फी के मामले में यह दूरी और भी कम होती है, जो इसे विशेष रूप से खतरनाक बनाती है. हैरान करने वाली बात यह है कि 3 मीटर तक की दूरी से ली गई तस्वीरों से भी लगभग आधे फिंगरप्रिंट डेटा को आसानी से निकाला जा सकता है. इस खतरे को और भी अधिक वास्तविक बनाता है आधुनिक AI तकनीक का विकास.

    एक टीवी शो में ली चांग ने दर्शकों को तब चौंका दिया, जब उन्होंने फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर और AI की मदद से उन फिंगरप्रिंट्स को बहुत करीब से साफ-साफ दिखाया, जो खुली आंखों से देखने पर धुंधले नजर आ रहे थे. ‘चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज’ के क्रिप्टोग्राफी प्रोफेसर जिंग जिउ ने भी इस बात की पुष्टि की है कि हाई-डेफिनिशन कैमरों की मदद से केवल ‘V’ पोज का उपयोग करके हाथ की जानकारी निकाली जा सकती है और उसके फिंगरप्रिंट्स भी बनाए जा सकते हैं. हालांकि, इस खबर के वायरल होने के बाद कुछ एक्सपर्ट्स ने स्पष्ट किया है कि फिंगरप्रिंट चोरी करना और उसका गलत इस्तेमाल करना इतना आसान भी नहीं है.

    आसान नहीं है फिंगरप्रिंट्स कॉपी करना
    उन्होंने कहा कि किसी के बायोमेट्रिक्स को सफलतापूर्वक कॉपी करने के लिए रोशनी की स्थिति, कैमरे का फोकस और इमेज की स्पष्टता जैसे कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. साथ ही, पहचान चुराने वालों को सटीक मिलान के लिए एक ही व्यक्ति की कई अलग-अलग तस्वीरों की जरूरत पड़ सकती है. फिर भी, तकनीक जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए सुरक्षा विशेषज्ञ इसे एक उभरते हुए और गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं. ऐसे में यदि आप अपनी बायोमेट्रिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, लेकिन सेल्फी में ‘V’ साइन बनाने की अपनी आदत को भी नहीं छोड़ पा रहे हैं, तो विशेषज्ञ ली चांग ने इसके लिए कुछ आसान उपाय सुझाए हैं.

    कैसे बचें ठगी से?
    उनका सुझाव है कि सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें पोस्ट करने से पहले डिजिटल एडिटिंग टूल्स का उपयोग करके अपनी उंगलियों के पोरों को ‘ब्लर’ (धुंधला) कर दें या अपने फिंगरप्रिंट के निशानों को स्मूथ (सपाट) कर दें. सुरक्षा के लिहाज से यह एक छोटी सी सावधानी आपके डिजिटल डेटा और वित्तीय खातों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे कैमरे और अधिक शक्तिशाली होंगे, हमें अपनी ऑनलाइन प्राइवेसी को लेकर और भी अधिक जागरूक होना होगा. हालांकि, इस तरह की ठगी से बचने का सबसे बेहतर उपाय है कि वी सेप में उंगलियों के साथ फोटो ही न शेयर करें.

  • इस भारतीय को भगवान मानता है पूरा चीन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी झुकाते हैं सिर, फैमिली से बिना मिले नहीं लौटते देश..?

    इस भारतीय को भगवान मानता है पूरा चीन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी झुकाते हैं सिर, फैमिली से बिना मिले नहीं लौटते देश..?

    इस भारतीय को भगवान मानता है पूरा चीन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी झुकाते हैं सिर, फैमिली से बिना मिले नहीं लौटते देश..?

    एक ऐसा हिंदुस्तानी, जिसे खुद उसका अपना देश लगभग भूल चुका है. लेकिन सरहद पार हमारा पड़ोसी मुल्क चीन, आज भी उसे किसी मसीहा की तरह पूजता है. वहां के बच्चों को स्कूलों में उनकी कहानी पढ़ाई जाती है. उनके चेहरे वाले डाक टिकट जारी होते हैं. उनके नाम पर मेडिकल कॉलेज चलते हैं. यकीन मानिए, अगर इस जाबांज डॉक्टर की जिंदगी को आज के सिनेमाई परदे पर उतारा जाए, तो पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबा लेगी.

    बात शुरू होती है साल 1938 की. उस वक्त जापान ने चीन पर धावा बोल दिया था. चारों तरफ तबाही थी, चीख-पुकार थी और लाखों चीनी नागरिक और सैनिक लहूलुहान पड़े थे. मगर इलाज करने वाले डॉक्टर उंगलियों पर गिनने लायक भी नहीं थे. ऐसे में चीन के सेनापति जनरल झू दे ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक ख़त लिखा- ‘दोस्त, हमारी मदद करो, कुछ डॉक्टर भेजो’. तब का चीन आज जैसा ताकतवर और अमीर मुल्क नहीं था. नेहरू ने इस पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मशविरा किया, जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे.

    नेताजी ने तुरंत पहल की और भारत के लोगों से पाई-पाई जोड़कर 22,000 रुपये का फंड इकट्ठा किया. फिर क्या था, पांच जाबांज हिंदुस्तानी डॉक्टरों की एक टीम समंदर के रास्ते चीन के लिए रवाना हो गई.

    Dr Dwarkanath Kotnis indian Doctor Hero in China Story

    पिता की मौत, लेकिन डॉक्टर का ईमान

    चीन गए तो पांच डॉक्टर थे, लेकिन जब जंग खत्म हुई तो लौटे सिर्फ चार. डॉक्टर कोटनीस वहीं रुक गए. उन्होंने वहां हजारों दम तोड़ते चीनी लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला. इसी बीच भारत से खबर आई कि उनके पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया है. कोई और होता तो घर भाग आता, लेकिन कोटनीस नहीं लौटे. उन्होंने रोते हुए भी यही कहा कि इस वक्त चीन के इन बेबस मरीजों को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है और मरीजों को बीच में छोड़ना एक डॉक्टर के ईमान के खिलाफ है.

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    72-72 घंटे लगातार ड्यूटी

    कोटनीस सीधे जंग के मैदान में कूद पड़े. पहाड़ों की कड़कड़ाती ठंड और पत्थरों की गुफाओं में, जहां बुनियादी दवाइयां तक नसीब नहीं थीं, उन्होंने एक के बाद एक कई ऑपरेशन किए. कई-कई बार तो वो लगातार 72-72 घंटे बिना पलक झपकाए मरीजों की जान बचाते रहे. इस अकेले मोर्चे पर उन्होंने करीब 800 चीनी सैनिकों की जान बचाई. चीनी लोग उन्हें आदर से ‘के दिहुआ’ (Ke Dihua) पुकारने लगे, इसके मतलब था भारत की भूमि से आया हुआ उपकारी.

    लगातार बिना सोए काम करना, खराब मौसम और कम साधनों के बीच दिन-रात मरीजों की सेवा करने का असर डॉक्टर कोटनीस की सेहत पर पड़ने लगा. उनका शरीर थक चुका था. दिसंबर 1942 में, अपने बेटे के जन्म के महज तीन महीने बाद, सिर्फ 32 साल की उम्र में इस मसीहा ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं. उनकी मौत की खबर से पूरा चीन सदमे में डूब गया. खुद माओ त्से तुंग ने बेहद भावुक होकर लिखा- “आज चीन ने अपना एक अनमोल दोस्त खो दिया है. हम उनके इस बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे. उनका नाम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा.”

    Dr Dwarkanath Kotnis indian Doctor Hero in China Story

    मगर यह कहानी यहां खत्म नहीं होती. चीन के सबसे बड़े नेता माओ त्से तुंग ने खुद अपने हाथों से उनके सम्मान में शोक संदेश लिखा था. उन्होंने कहा था- ‘हमारी सेना ने अपना एक मजबूत हाथ खो दिया है और हमारे देश ने अपना सबसे सच्चा दोस्त गंवा दिया है’.

    आज भी चीन के शीजियाझुआंग (Shijiazhuang) शहर में उनकी एक भव्य समाधि और स्मारक है. उनके नाम पर वहां एक मेडिकल स्कूल चलाया जाता है. आज भी जब उस मेडिकल स्कूल के छात्र डॉक्टर बनकर निकलते हैं, तो वे डॉक्टर कोटनीस के नाम की शपथ लेते हैं.

    साल 2009 में जब चीन में वोटिंग हुई, तो वहां की जनता ने डॉक्टर कोटनीस को सदी के ‘टॉप 10 विदेशी नायकों’ में चुना. दशकों तक तो यह परंपरा ही बन गई थी कि चीन का कोई भी बड़ा नेता जब भी भारत के दौरे पर आता, तो डॉक्टर कोटनीस के परिवार से मिलने उनके घर जरूर जाता था. डॉक्टर कोटनीस को किसी सरहद या नक्शे से प्यार नहीं था, उन्हें तो बस इंसानों की जान बचाने से सरोकार था. सचमुच, इंसानी जज्बे की ऐसी मिसालें हर सदी में पैदा होनी चाहिए.

  • 10 मिनट के लिए मरकर दोबारा जिंदा हुआ शख्स, अब मौत को लेकर किया ऐसा खुलासा..

    10 मिनट के लिए मरकर दोबारा जिंदा हुआ शख्स, अब मौत को लेकर किया ऐसा खुलासा..

    10 मिनट के लिए मरकर दोबारा जिंदा हुआ शख्स, अब मौत को लेकर किया ऐसा खुलासा..

    क्या आप जानते हैं कि मौत के बाद की दुनिया कैसी दिखती है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए लोग सदियों से रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन रोमफोर्ड, ईस्ट लंदन के रहने वाले मैथ्यू एलिक के पास इस बारे में एक ऐसा जवाब है, जो आपको निराश कर सकता है. यकीनन, बहुत कम लोगों को पता होगा कि 43 साल के मैथ्यू, जो एक पिता, एक्टर और मॉडल हैं, अगस्त 2023 में करीब 10 मिनट के लिए क्लीनिकली डेड घोषित कर दिए गए थे. उस वक्त उन्हें एक बहुत बड़ा हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उनकी सांसें थम गईं और दिल ने धड़कना बंद कर दिया था.

    मैथ्यू को सांस लेने में दिक्कत और पैरों में सूजन की वजह से अस्पताल ले जाया गया था. डॉक्टरों ने पाया कि उनके दिल और फेफड़ों में क्रिकेट की गेंद के आकार के खून के थक्के जम गए थे. पल्मोनरी एम्बोलिज्म की वजह से उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ और वे वहीं गिर पड़े. डॉक्टरों ने उन्हें वापस लाने के लिए डिफिब्रिलेटर का इस्तेमाल किया और इतनी ताकत से सीपीआर दिया कि उनके शरीर के अंदर ब्लीडिंग होने लगी. लगभग 10 मिनट तक क्लीनिकली डेड रहने के बाद आखिरकार डॉक्टरों ने उन्हें होश में ला दिया और फिर वे तीन दिनों तक कोमा में रहे.

    मौत का वो ‘निराश’ करने वाला अनुभव
    मैथ्यू जब कोमा से बाहर आए, तो उनसे सबसे पहला सवाल यही पूछा गया कि उन्होंने ‘दूसरी दुनिया’ में क्या देखा? मैथ्यू का जवाब सुनकर सब हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ भी याद नहीं है. उनके मुताबिक, मौत का अनुभव किसी दिव्य रोशनी या स्वर्ग जैसा नहीं था, बल्कि यह एक बेहद शांतिपूर्ण नींद से जागने जैसा महसूस हुआ. मैथ्यू का यह खुलासा उन लोगों के लिए निराशाजनक हो सकता है, जो मौत के बाद किसी जादुई दुनिया की उम्मीद करते हैं.

    जिंदगी की चुनौतियों से मुकाबला
    मौत के मुंह से वापस आने के बाद मैथ्यू की जिंदगी आसान नहीं थी. पिछले दो सालों में उन्होंने एक रिश्ता टूटने, नौकरी जाने, आर्थिक तंगी और अपने बेटे की खराब सेहत जैसी कई बड़ी चुनौतियों का सामना किया. लेकिन मैथ्यू का कहना है कि जब आप मौत को हरा देते हैं, तो कोई भी चुनौती आपको डरा नहीं सकती. उन्होंने रोने और हार मानने के बजाय खुद को दोबारा खड़ा करने का फैसला किया. आज वे अपनी बेस्ट फ्रेंड से सगाई कर चुके हैं, दोनों ने अपना घर खरीद लिया है और उनके बच्चे भी लाइफ में अच्छा कर रहे हैं.

    किताब के जरिए दी नई प्रेरणा
    मैथ्यू ने अपनी मौत और उसके बाद के 18 महीनों के संघर्ष को एक किताब ‘लाइफ आफ्टर बीइंग क्लीनिकली डेड’ बताया है. डिस्लेक्सिया (पढ़ने-लिखने की बीमारी) होने के बावजूद उन्होंने डिक्टाफोन में बोलकर अपनी कहानी लिखी और आज उनकी किताब की 1,000 से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. मैथ्यू अब मोटिवेशनल स्पीच देते हैं और ब्लड फाउंडेशन के साथ काम करते हैं, क्योंकि 7 बार खून चढ़ने की वजह से ही उनकी जान बच पाई थी. मैथ्यू की सेहत अब पहले जैसी नहीं रही और उन्हें पूरी उम्र खून पतला करने वाली दवा लेनी होगी, लेकिन वे अपनी कमियों पर नहीं बल्कि अपनी काबिलियत पर ध्यान दे रहे हैं. उनका मानना है कि जिंदगी बहुत छोटी है और हमें हर पल का लुत्फ उठाना चाहिए.

  • हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना..

    हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना..

    हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना..
    हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना 

    मिस्र यानी इजिप्ट की राजधानी काहिरा अपनी हिस्ट्री और आर्किटेक्चर के लिए दुनियाभर में जानी जाती है. इन दिनों इंटरनेट पर काहिरा के एक बिजी मार्केट में हजारों साल पुराना एक ऐसा ऐतिहासिक ढांचा मौजूद है, जिसकी छत पूरी तरह से लकड़ी की बनी हुई है. इस लकड़ी की छत की ऊंचाई जमीन से लगभग 25 से 30 फीट है. इतने सालों बाद भी लकड़ी का ये काम बिना किसी नुकसान और बिना किसी मरम्मत के वैसे ही बेहद खूबसूरती से नजर आ रहा है. शायद यही वजह है कि, ये वीडियो लोगों का ध्यान खींच रहा है.

    वायरल हो रहे इस वीडियो में देखा जा सकता है कि, इस पुरानी इमारत की दीवारों पर पत्थरों की बहुत बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, ये पुराना ढांचा और उसकी लकड़ी की छत लगभग हजारों साल पुरानी है. खास बात ये है कि इस पुरानी इमारत में अब तक कोई बड़ा मरम्मत का काम नहीं हुआ है. बावजूद इसके ये आज भी अपनी पुरानी चमक और मजबूती बनाए हुए है.

     

     
    आपके

    वीडियो में देखा जा सकता है कि, इमारत के नीचे के एरिया में आज दुकानें और मार्केट सज रहे हैं, जबकि इसके अंदर मदरसा भी मौजूद है. पत्थरों का महीन काम और ऊपर से लकड़ी की बड़ी सी छत इसे देखने आने वाले हर शख्स को हैरान कर देती है.

  • बेजुबान के लिए बुजुर्ग का ऐसा प्यार देख नम हो गईं आंखें, घायल डॉगी को अस्पताल ले जाकर बने सहारा

    बेजुबान के लिए बुजुर्ग का ऐसा प्यार देख नम हो गईं आंखें, घायल डॉगी को अस्पताल ले जाकर बने सहारा

    बेजुबान के लिए बुजुर्ग का ऐसा प्यार देख नम हो गईं आंखें, घायल डॉगी को अस्पताल ले जाकर बने सहारा

    कहते हैं कि इंसानियत के लिए न तो दौलत जरूरी है और न ही कोई बड़ा पद। सच्ची संवेदना हो तो इंसान किसी भी जीव के दर्द को अपना समझ सकता है। ऐसा ही एक भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग ने घायल आवारा कुत्ते के लिए जो किया, उसने लोगों का दिल जीत लिया।

    दरअसल, बुजुर्ग को सड़क पर एक घायल आवारा डॉगी मिला। उसकी हालत देखकर उन्होंने उसे अकेला छोड़ने के बजाय इलाज कराने का फैसला किया। वह डॉगी को लेकर पशु अस्पताल पहुंचे और उसके इलाज के दौरान लगातार उसके पास खड़े रहे।

    इलाज के दौरान डॉगी के पास खड़े रहे बुजुर्ग

    अस्पताल में डॉक्टर जब घायल डॉगी की जांच और इलाज कर रहे थे, उस दौरान बुजुर्ग उसके बिल्कुल पास खड़े रहे। वह लगातार इस बात का ख्याल रखते नजर आए कि घायल जानवर इलाज के दौरान खुद को अकेला या असहाय महसूस न करे।

    बुजुर्ग का यह व्यवहार बताता है कि इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। किसी बेजुबान के दर्द को समझना और मुश्किल वक्त में उसका साथ देना भी सच्ची संवेदनशीलता की निशानी है।

    लोगों ने जमकर की बुजुर्ग की तारीफ

    घटना की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद लोगों ने बुजुर्ग की जमकर तारीफ की। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि असली अमीरी इंसान के बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उसके दिल में मौजूद दया और करुणा में होती है।

    कुछ लोगों ने घायल डॉगी के इलाज में आर्थिक मदद करने की इच्छा भी जताई। इस घटना ने एक बार फिर दिखा दिया कि किसी बेजुबान के लिए किया गया छोटा सा प्रयास भी लोगों के दिल को छू सकता है।

    यह घटना हमें यही संदेश देती है कि किसी जरूरतमंद जीव की मदद करने के लिए बड़े साधनों की नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दिल की जरूरत होती है।