नई दिल्ली: दुनिया में कई रेलवे स्टेशन अपने इतिहास और वास्तुकला के लिए मशहूर हैं, लेकिन एक स्टेशन ऐसा भी है जो अपने बेहद लंबे नाम की वजह से पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस स्टेशन का आधिकारिक नाम इतना लंबा है कि अधिकांश लोग इसे एक बार में पढ़ भी नहीं पाते।
58 अक्षरों का है स्टेशन का नाम
दुनिया के सबसे लंबे नाम वाले रेलवे स्टेशन का नाम है Llanfairpwllgwyngyllgogerychwyrndrobwllllantysiliogogogoch। यह नाम 58 अक्षरों से मिलकर बना है और इसी वजह से इसे दुनिया के सबसे लंबे आधिकारिक रेलवे स्टेशन नामों में गिना जाता है।
कहां स्थित है यह स्टेशन?
यह अनोखा रेलवे स्टेशन यूनाइटेड किंगडम (UK) के वेल्स (Wales) क्षेत्र के एंगलसी (Anglesey) द्वीप पर स्थित है। यह स्टेशन पर्यटकों के बीच भी काफी लोकप्रिय है, जहां लोग इसके लंबे नाम वाले साइनबोर्ड के साथ तस्वीरें खिंचवाने पहुंचते हैं।
लोग कैसे पुकारते हैं इसका नाम?
इतना लंबा नाम रोजमर्रा की बातचीत में बोलना आसान नहीं है। इसलिए स्थानीय लोग और यात्री इसे संक्षेप में Llanfairpwll या Llanfair PG कहकर पुकारते हैं। यही नाम आम बोलचाल और यात्रा संबंधी जानकारी में भी अधिक इस्तेमाल किया जाता है।
इतना लंबा नाम क्यों रखा गया?
बताया जाता है कि 19वीं सदी में इस स्थान का लंबा नाम प्रचार और पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लोकप्रिय बनाया गया था। वेल्श भाषा में इस नाम का अर्थ उस स्थान के भौगोलिक और धार्मिक इतिहास से जुड़ा है।
भारत में कौन सा स्टेशन है सबसे लंबे नाम वाला?
भारत में सबसे लंबे नाम वाले रेलवे स्टेशन का रिकॉर्ड पुरट्चि तलैवर डॉ. एम.जी. रामचंद्रन सेंट्रल रेलवे स्टेशन (चेन्नई सेंट्रल) के नाम है। इसके आधिकारिक नाम में 57 अक्षर हैं, जिसके कारण इसे दुनिया के सबसे लंबे रेलवे स्टेशन नामों में शामिल किया जाता है।
दुनिया के इस अनोखे रेलवे स्टेशन का लंबा नाम आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और हर साल हजारों पर्यटक केवल इसे देखने और इसके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए वेल्स पहुंचते हैं।
सावन, हरियाली तीज, रक्षाबंधन और जन्माष्टमी जैसे त्योहारों पर मेहंदी लगाना शुभ माना जाता है। हर महिला चाहती है कि उसकी मेहंदी का रंग गहरा, खूबसूरत और लंबे समय तक टिके। अगर आप इस बार बाजार के केमिकल वाले कोन की बजाय घर पर प्राकृतिक मेहंदी बनाना चाहती हैं, तो गुड़ वाली मेहंदी एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है।
गुड़ में मौजूद प्राकृतिक शर्करा मेहंदी के पेस्ट को कुछ समय तक नम बनाए रखने में मदद कर सकती है, जिससे रंग और भी बेहतर उभर सकता है।
गुड़ वाली मेहंदी बनाने के लिए आवश्यक सामग्री
100 ग्राम शुद्ध मेहंदी पाउडर
1 छोटा चम्मच कद्दूकस किया हुआ गुड़
आधा कप हल्का गुनगुना पानी
1 छोटा चम्मच नींबू का रस (इच्छानुसार)
कुछ बूंदें नीलगिरी या लैवेंडर एसेंशियल ऑयल (इच्छानुसार)
पहला तरीका
सबसे पहले मेहंदी पाउडर को अच्छी तरह छान लें ताकि उसमें कोई गांठ न रहे।
अब गुनगुने पानी में गुड़ डालकर पूरी तरह घोल लें।
इस मिश्रण को थोड़ा-थोड़ा करके मेहंदी में मिलाएं और चिकना पेस्ट तैयार करें।
यदि चाहें तो इसमें नींबू का रस और कुछ बूंदें नीलगिरी या लैवेंडर ऑयल भी मिला सकते हैं।
अब बर्तन को ढककर 6 से 8 घंटे या पूरी रात के लिए रख दें ताकि मेहंदी अच्छी तरह तैयार हो जाए।
इसके बाद तैयार पेस्ट को मेहंदी कोन में भरकर हाथों पर लगाएं।
दूसरा पारंपरिक तरीका
एक बर्तन में 4 चम्मच गुड़ का बूरा या पाउडर लें।
उसमें 1 चम्मच चायपत्ती और 2 चम्मच चीनी मिलाएं।
इस मिश्रण को एक धातु के डिब्बे में रखें।
डिब्बे के बीच में एक छोटी कटोरी या गिलास में थोड़ा पानी रखें।
अब डिब्बे को अच्छी तरह ढक दें ताकि भाप बाहर न निकल सके।
इसे धीमी आंच पर कुछ समय तक गर्म करें।
जब गुड़ पिघल जाए तो गैस बंद कर दें और डिब्बे को ठंडा होने दें।
ठंडा होने के बाद अंदर बनने वाला गाढ़ा प्राकृतिक अर्क तैयार होगा।
इस अर्क को रुई या कॉटन स्वैब की सहायता से हाथों पर लगाया जा सकता है।
मेहंदी का रंग गहरा करने के आसान उपाय
मेहंदी लगाने से पहले हाथ अच्छी तरह साफ कर लें।
मेहंदी को कम से कम 6 से 8 घंटे तक हाथों पर लगा रहने दें।
मेहंदी सूखने के बाद पानी से तुरंत न धोएं।
सूखी मेहंदी को धीरे-धीरे रगड़कर हटाएं।
मेहंदी हटाने के बाद 10 से 12 घंटे तक हाथों को पानी से बचाने की कोशिश करें।
नींबू और चीनी का हल्का मिश्रण लगाने से मेहंदी कुछ समय तक नम रह सकती है।
मेहंदी हटाने के बाद सरसों, नारियल या लौंग के हल्के धुएं की गर्माहट लेने से भी रंग बेहतर उभर सकता है।
ध्यान रखने योग्य बातें
हमेशा अच्छी गुणवत्ता वाला शुद्ध मेहंदी पाउडर ही इस्तेमाल करें।
यदि आपकी त्वचा संवेदनशील है, तो किसी भी नए मिश्रण का पहले हाथ के छोटे हिस्से पर परीक्षण कर लें।
केमिकल युक्त रंग या डाई मिलाने से बचें।
निष्कर्ष
यदि आप इस सावन या तीज पर प्राकृतिक तरीके से गहरे रंग की मेहंदी चाहती हैं, तो घर पर बनी गुड़ वाली मेहंदी एक अच्छा विकल्प हो सकती है। सही विधि, थोड़ा धैर्य और उचित देखभाल के साथ आपकी मेहंदी का रंग अधिक खूबसूरत और लंबे समय तक टिक सकता है।
जरा सी सर्दी, खांसी, गले में दर्द या बुखार होते ही कई लोग बिना डॉक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक खरीदकर खाना शुरू कर देते हैं। यह आदत देखने में भले सामान्य लगे, लेकिन इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हाल ही में प्रकाशित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि एंटीबायोटिक दवाओं का गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल भविष्य में इलाज को कठिन बना सकता है।
रिसर्च के अनुसार कई देशों की तरह भारत में भी कुछ शक्तिशाली एंटीबायोटिक दवाओं का आवश्यकता से अधिक उपयोग किया जा रहा है। इससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधक बन जाते हैं और सामान्य एंटीबायोटिक दवाएं असर करना बंद कर देती हैं।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस क्या है?
जब एंटीबायोटिक दवाओं का बार-बार, गलत तरीके से या बिना जरूरत उपयोग किया जाता है, तो बैक्टीरिया धीरे-धीरे उन दवाओं के खिलाफ मजबूत हो जाते हैं। इसके बाद वही दवा भविष्य में संक्रमण को ठीक करने में प्रभावी नहीं रहती।
यही स्थिति एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कहलाती है। इसे आज दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक माना जा रहा है।
हर बुखार में एंटीबायोटिक जरूरी नहीं होती
बहुत से वायरल संक्रमण जैसे सामान्य सर्दी-जुकाम, फ्लू और अधिकांश वायरल बुखार एंटीबायोटिक से ठीक नहीं होते। क्योंकि एंटीबायोटिक केवल बैक्टीरिया पर असर करती हैं, वायरस पर नहीं।
इसलिए बिना जांच और डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक लेना न केवल बेकार हो सकता है, बल्कि भविष्य में दवाओं के असर को भी कम कर सकता है।
एंटीबायोटिक की अलग-अलग श्रेणियां
स्वास्थ्य विशेषज्ञ एंटीबायोटिक दवाओं को उनके उपयोग और जोखिम के आधार पर तीन प्रमुख श्रेणियों में बांटते हैं।
पहली श्रेणी सामान्य संक्रमणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की होती है, जिनमें दवा प्रतिरोध का खतरा अपेक्षाकृत कम होता है।
दूसरी श्रेणी में अधिक शक्तिशाली एंटीबायोटिक आती हैं, जिनका उपयोग केवल विशेष परिस्थितियों में किया जाना चाहिए क्योंकि इनके अधिक उपयोग से दवा प्रतिरोध तेजी से बढ़ सकता है।
तीसरी श्रेणी उन एंटीबायोटिक दवाओं की होती है जिन्हें केवल बेहद गंभीर और अन्य दवाओं से ठीक न होने वाले संक्रमणों में अंतिम विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
गलत तरीके से एंटीबायोटिक लेने के नुकसान
दवा का असर कम हो जाना
भविष्य में गंभीर संक्रमण का इलाज कठिन होना
बार-बार संक्रमण होना
दवा के दुष्प्रभाव बढ़ना
आंतों में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ना
अस्पताल में भर्ती होने का खतरा बढ़ना
क्यों बढ़ रही है यह समस्या?
बिना डॉक्टर की सलाह के दवा खरीद लेना
बीच में दवा बंद कर देना
बची हुई पुरानी दवा दोबारा इस्तेमाल करना
हर बुखार में एंटीबायोटिक लेने की आदत
दूसरों की सलाह पर दवा शुरू कर देना
क्या करें?
एंटीबायोटिक केवल डॉक्टर की सलाह पर ही लें।
दवा का पूरा कोर्स निर्धारित समय तक पूरा करें।
लक्षण कम होने पर भी दवा बीच में बंद न करें।
पुरानी बची हुई एंटीबायोटिक दोबारा इस्तेमाल न करें।
किसी दूसरे व्यक्ति की दवा कभी न लें।
स्वयं दवा लेने की आदत से बचें।
क्या केवल भारत में ही यह समस्या है?
हालिया अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण के अनुसार दुनिया के कई देशों में एंटीबायोटिक का जरूरत से ज्यादा उपयोग हो रहा है। कई स्थानों पर ऐसी दवाओं का भी अत्यधिक इस्तेमाल देखा गया है जिन्हें केवल गंभीर संक्रमण की स्थिति में उपयोग किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो भविष्य में सामान्य संक्रमणों का इलाज भी मुश्किल हो सकता है।
निष्कर्ष
एंटीबायोटिक आधुनिक चिकित्सा की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक हैं, लेकिन इनका गलत उपयोग इन्हें कम प्रभावी बना सकता है। इसलिए हर बुखार, सर्दी या गले के दर्द में खुद से एंटीबायोटिक शुरू करना सही नहीं है। सही समय पर सही दवा और सही अवधि तक उपचार ही संक्रमण से सुरक्षित और प्रभावी तरीके से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। किसी भी एंटीबायोटिक या अन्य दवा का सेवन बिना योग्य चिकित्सक की सलाह के न करें। यदि संक्रमण, तेज बुखार या कोई गंभीर लक्षण हों, तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।
35 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में कई प्राकृतिक बदलाव शुरू होने लगते हैं। इस समय मेटाबॉलिज्म पहले की तुलना में धीमा होने लगता है और हार्मोन के स्तर में भी परिवर्तन आने लगता है। ऐसे में कई लोगों का वजन बहुत अधिक नहीं बढ़ता, लेकिन पेट के आसपास जिद्दी चर्बी जमा होने लगती है।
हर पेट की चर्बी एक जैसी नहीं होती। कई बार यह लगातार तनाव का परिणाम होती है, जबकि कई बार हार्मोनल बदलाव इसकी वजह बनते हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि आपकी बढ़ती पेट की चर्बी Stress Belly है या Hormonal Belly।
Stress Belly क्या होती है?
जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक तनाव में रहता है, तो शरीर में कोर्टिसोल नामक स्ट्रेस हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। लगातार बढ़ा हुआ कोर्टिसोल पेट के अंदरूनी हिस्से में चर्बी जमा होने को बढ़ावा देता है। इसे सामान्य भाषा में Stress Belly कहा जाता है।
यह चर्बी केवल शरीर की बनावट ही नहीं बदलती, बल्कि भविष्य में कई स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम भी बढ़ा सकती है।
Stress Belly के सामान्य लक्षण
लगातार पेट के आसपास चर्बी बढ़ना
बार-बार मीठा या अधिक कैलोरी वाला भोजन खाने की इच्छा होना
हर समय थकान महसूस होना
नींद पूरी न होना या नींद की गुणवत्ता खराब होना
कमर का आकार तेजी से बढ़ना
तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ना
Hormonal Belly क्या होती है?
Hormonal Belly मुख्य रूप से शरीर में हार्मोन के असंतुलन के कारण विकसित होती है। महिलाओं में यह समस्या अक्सर पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज के दौरान अधिक देखने को मिलती है, जबकि पुरुषों में भी बढ़ती उम्र के साथ हार्मोनल बदलाव पेट की चर्बी बढ़ा सकते हैं।
हार्मोन बदलने के कारण पहले जो चर्बी कूल्हों और जांघों में जमा होती थी, वह धीरे-धीरे पेट के आसपास जमा होने लगती है।
Hormonal Belly के सामान्य लक्षण
धीरे-धीरे पेट की चर्बी बढ़ना
मेटाबॉलिज्म का धीमा होना
मांसपेशियों का कम होना
बार-बार थकान महसूस होना
महिलाओं में मासिक धर्म का अनियमित होना
अचानक गर्मी महसूस होना
वजन कम करने में कठिनाई होना
Stress Belly और Hormonal Belly में क्या अंतर है?
Stress Belly का मुख्य कारण लंबे समय तक रहने वाला मानसिक तनाव और बढ़ा हुआ कोर्टिसोल होता है।
Hormonal Belly शरीर में हार्मोनल बदलावों के कारण विकसित होती है।
Stress Belly में मीठा खाने की इच्छा, खराब नींद और मानसिक तनाव अधिक देखने को मिलता है।
Hormonal Belly में मेटाबॉलिज्म धीमा होना, मांसपेशियों की कमी और उम्र से जुड़े हार्मोनल बदलाव प्रमुख कारण होते हैं।
कई लोगों में दोनों समस्याएं एक साथ भी हो सकती हैं।
Stress Belly कम करने के उपाय
रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लें।
तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान और गहरी सांस लेने का अभ्यास करें।
रोज कम से कम 30 से 45 मिनट व्यायाम करें।
प्रोटीन और फाइबर से भरपूर भोजन करें।
मीठे और अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें।
जरूरत से ज्यादा कैफीन लेने से बचें।
Hormonal Belly कम करने के उपाय
सप्ताह में कई दिन स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या रेजिस्टेंस एक्सरसाइज करें।
पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन लें।
विटामिन डी और कैल्शियम का संतुलित सेवन करें।
शारीरिक रूप से सक्रिय रहें।
यदि हार्मोनल बदलाव के लक्षण अधिक दिखाई दें, तो समय पर डॉक्टर से जांच कराएं।
पेट की चर्बी कम करने के लिए जरूरी बातें
संतुलित और पौष्टिक भोजन करें।
हर दिन नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
तनाव को नियंत्रित रखें।
पर्याप्त नींद लें।
धूम्रपान और अत्यधिक शराब के सेवन से बचें।
समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराते रहें।
निष्कर्ष
35 वर्ष की उम्र के बाद पेट के आसपास चर्बी बढ़ना केवल अधिक खाना खाने का परिणाम नहीं होता। कई बार इसके पीछे तनाव, हार्मोनल बदलाव या दोनों कारण एक साथ जिम्मेदार होते हैं। यदि सही समय पर कारण की पहचान कर ली जाए और स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जाए, तो पेट की चर्बी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और भविष्य में होने वाली कई गंभीर बीमारियों के खतरे को भी कम किया जा सकता है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। यदि वजन तेजी से बढ़ रहा हो, हार्मोनल बदलाव के लक्षण दिखाई दें या कोई स्वास्थ्य समस्या हो, तो योग्य चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
बहुत से लोग तनाव, घबराहट, बोरियत या किसी चिंता के दौरान अनजाने में अपने नाखून चबाने लगते हैं। अधिकांश लोग इसे केवल एक बुरी आदत मानते हैं, लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। कुछ मामलों में यह व्यवहार मानसिक तनाव, चिंता या किसी गहरी मनोवैज्ञानिक समस्या का संकेत भी हो सकता है।
यदि कोई व्यक्ति कभी-कभार नाखून चबाता है, तो यह सामान्य आदत हो सकती है। लेकिन जब यह आदत बार-बार होने लगे, चाहकर भी छूटे नहीं और नाखूनों या उंगलियों को नुकसान पहुंचाने लगे, तब इसे गंभीरता से लेने की जरूरत होती है।
ऑनाइकोफेजिया क्या है?
मेडिकल भाषा में लगातार और बार-बार नाखून चबाने की आदत को ऑनाइकोफेजिया (Onychophagia) कहा जाता है। इसे शरीर से जुड़े बार-बार दोहराए जाने वाले व्यवहार (Body-Focused Repetitive Behavior) की श्रेणी में रखा जाता है।
यह समस्या अक्सर बचपन में शुरू होती है। कई बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ यह आदत अपने आप खत्म हो जाती है, लेकिन कुछ लोगों में यह किशोरावस्था और वयस्क होने के बाद भी बनी रह सकती है।
क्या यह सिर्फ बुरी आदत है?
हर व्यक्ति में नाखून चबाने का मतलब मानसिक बीमारी नहीं होता। कई लोग तनाव, बोरियत या सोचते समय अनजाने में ऐसा करते हैं।
लेकिन यदि व्यक्ति बार-बार नाखून चबाए, उसे रोकने की कोशिश करे लेकिन सफल न हो, और इस वजह से नाखून, त्वचा या दांतों को नुकसान होने लगे, तो यह केवल आदत नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा व्यवहार हो सकता है।
नाखून चबाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं?
इस आदत के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे
तनाव
चिंता
घबराहट
बोरियत
भावनात्मक दबाव
पढ़ाई या नौकरी का तनाव
कुछ मामलों में यह ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिसऑर्डर (OCD), एंग्जायटी, ADHD या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से भी जुड़ा हो सकता है। हालांकि हर व्यक्ति में ऐसा होना जरूरी नहीं है।
दिमाग में क्या होता है?
जब कोई व्यक्ति तनाव महसूस करता है, तो मस्तिष्क के वे हिस्से सक्रिय हो जाते हैं जो भावनाओं, डर और तनाव को नियंत्रित करते हैं। नाखून चबाने से कुछ समय के लिए मानसिक राहत महसूस होती है। यही अस्थायी राहत इस व्यवहार को बार-बार दोहराने की आदत बना सकती है।
सामान्य आदत और ऑनाइकोफेजिया में अंतर
यदि कोई व्यक्ति कभी-कभार नाखून चबाता है और आसानी से रोक देता है, तो इसे सामान्य आदत माना जा सकता है।
लेकिन यदि व्यक्ति बार-बार ऐसा करे, चाहकर भी खुद को रोक न पाए, नाखूनों को नुकसान पहुंचा दे और यह आदत उसकी पढ़ाई, नौकरी या सामाजिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो यह ऑनाइकोफेजिया हो सकता है।
किन लोगों में इसका खतरा अधिक होता है?
यह समस्या सबसे अधिक बच्चों और किशोरों में देखी जाती है। हालांकि कई लोगों में यह आदत बड़े होने के बाद भी बनी रहती है।
जो लोग लगातार तनाव, चिंता, भावनात्मक दबाव या मानसिक बेचैनी का सामना करते हैं, उनमें इसका खतरा अधिक हो सकता है।
क्या इससे शरीर को नुकसान हो सकता है?
लगातार नाखून चबाने से कई समस्याएं हो सकती हैं।
नाखून और आसपास की त्वचा को नुकसान पहुंच सकता है।
बैक्टीरिया या फंगल संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
दांत घिस सकते हैं या उनमें दरार आ सकती है।
जबड़े में दर्द हो सकता है।
हाथों पर मौजूद कीटाणु मुंह के जरिए शरीर में जाकर संक्रमण फैला सकते हैं।
कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?
यदि नाखून चबाने की आदत लगातार बढ़ती जा रही हो।
नाखूनों से खून आने लगे।
बार-बार संक्रमण होने लगे।
चाहकर भी आदत न छूट रही हो।
यह आदत पढ़ाई, नौकरी या सामान्य जीवन को प्रभावित करने लगे।
इसके साथ अत्यधिक चिंता, घबराहट, OCD या अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी लक्षण भी दिखाई दें।
ऐसी स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या मनोचिकित्सक से सलाह लेना उचित रहता है।
इलाज कैसे किया जाता है?
इलाज का उद्देश्य केवल नाखून चबाना रोकना नहीं बल्कि उसके पीछे मौजूद कारण को समझना होता है।
यदि समस्या तनाव या चिंता से जुड़ी है तो सबसे पहले उसी पर काम किया जाता है।
व्यवहार परिवर्तन तकनीक (Behavior Modification) और काउंसलिंग कई लोगों में काफी प्रभावी साबित होती है।
हैबिट रिवर्सल ट्रेनिंग (Habit Reversal Training) के माध्यम से व्यक्ति को यह पहचानना सिखाया जाता है कि वह किन परिस्थितियों में नाखून चबाता है और उसकी जगह कोई सुरक्षित आदत कैसे अपनाई जाए।
कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) भी तनाव और नकारात्मक सोच को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है।
यदि इसके पीछे गंभीर एंग्जायटी, OCD या डिप्रेशन हो तो डॉक्टर आवश्यकता के अनुसार दवाएं भी दे सकते हैं। किसी भी दवा का सेवन केवल विशेषज्ञ की सलाह पर ही करें।
परिवार कैसे मदद कर सकता है?
बार-बार डांटना, डराना या सजा देना समस्या का समाधान नहीं है।
परिवार को व्यक्ति के तनाव और व्यवहार को समझने की कोशिश करनी चाहिए।
बच्चों को भावनात्मक सहयोग दें।
उनके तनाव के कारण पहचानें।
जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।
आदत छुड़ाने के आसान उपाय
नाखून हमेशा छोटे रखें।
हाथों को व्यस्त रखने के लिए स्ट्रेस बॉल या फिजेट टॉय का उपयोग करें।
खाली समय में ड्राइंग, लिखने या अन्य रचनात्मक गतिविधियों में खुद को व्यस्त रखें।
तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान और गहरी सांस लेने का अभ्यास करें।
पर्याप्त नींद लें और नियमित दिनचर्या अपनाएं।
क्या यह पूरी तरह ठीक हो सकता है?
अधिकांश मामलों में सही मार्गदर्शन, परिवार के सहयोग और समय पर इलाज से यह आदत काफी हद तक या पूरी तरह खत्म हो सकती है। यदि इसके पीछे कोई मानसिक स्वास्थ्य समस्या हो, तो उसका इलाज करना भी जरूरी होता है।
निष्कर्ष
नाखून चबाना हमेशा केवल एक बुरी आदत नहीं होता। कई बार यह शरीर का संकेत होता है कि व्यक्ति मानसिक तनाव, चिंता या भावनात्मक दबाव से गुजर रहा है। यदि यह आदत लंबे समय तक बनी रहे, नुकसान पहुंचाने लगे या व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो इसे नजरअंदाज करने के बजाय समय रहते विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसे किसी भी प्रकार की चिकित्सकीय सलाह या उपचार का विकल्प न मानें। यदि आपको या आपके बच्चे को यह समस्या लगातार बनी रहे या शारीरिक अथवा मानसिक नुकसान पहुंचा रही हो, तो योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
बारिश का मौसम अपने साथ ठंडक और राहत तो लाता है, लेकिन इसी मौसम में वायरल संक्रमण का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है। नमी, तापमान में बदलाव, जलभराव और दूषित पानी के कारण वायरस तेजी से फैलते हैं। यही वजह है कि इस दौरान सर्दी-जुकाम, खांसी, बुखार, फ्लू, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों के मामले बढ़ने लगते हैं।
यदि आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) कमजोर है, तो मानसून में बार-बार वायरल संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है। आइए जानते हैं इसके मुख्य कारण, शुरुआती लक्षण और बचाव के प्रभावी उपाय।
मानसून में वायरल संक्रमण क्यों बढ़ता है?
बारिश के मौसम में वातावरण में नमी अधिक होती है, जिससे कई तरह के वायरस लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं। जगह-जगह पानी जमा होने से मच्छरों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। वहीं दूषित पानी और अस्वच्छ भोजन शरीर में संक्रमण पहुंचाने का बड़ा कारण बनते हैं। मौसम में अचानक बदलाव के कारण कई लोगों की इम्युनिटी भी कमजोर पड़ जाती है, जिससे वे जल्दी बीमार हो जाते हैं।
• अचानक तेज बुखार आना • गले में खराश और खांसी • नाक बंद होना या लगातार बहना • सिरदर्द • शरीर और जोड़ों में दर्द • कमजोरी और अत्यधिक थकान • कुछ मामलों में मतली, उल्टी या दस्त • डेंगू या चिकनगुनिया में त्वचा पर लाल चकत्ते दिखाई देना
इलाज कैसे किया जाता है?
अधिकांश वायरल संक्रमण कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। इलाज का मुख्य उद्देश्य लक्षणों को कम करना और शरीर को जल्दी स्वस्थ होने में मदद करना होता है।
इसके लिए पर्याप्त आराम करें, भरपूर पानी और अन्य तरल पदार्थ लें, पौष्टिक भोजन करें और डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही बुखार या दर्द की दवा लें। फ्लू जैसी कुछ स्थितियों में डॉक्टर एंटीवायरल दवाएं दे सकते हैं।
ध्यान रखें कि एंटीबायोटिक दवाएं वायरल संक्रमण पर असर नहीं करतीं। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के इनका सेवन बिल्कुल न करें।
वायरल संक्रमण से बचाव कैसे करें?
• साबुन और पानी से नियमित रूप से हाथ धोएं। • हमेशा साफ, उबला या फिल्टर किया हुआ पानी पिएं। • ताजा और स्वच्छ भोजन का सेवन करें। • बीमार व्यक्ति के बहुत नजदीक जाने से बचें। • मच्छरों से बचाव के लिए रिपेलेंट का उपयोग करें और पूरे शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनें। • घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। • रोज पर्याप्त नींद लें और संतुलित आहार अपनाकर इम्युनिटी मजबूत रखें।
किन लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए?
यदि तेज बुखार 2 से 3 दिन से अधिक बना रहे, सांस लेने में तकलीफ हो, लगातार उल्टी हो, शरीर पर लाल चकत्ते दिखाई दें, डिहाइड्रेशन के लक्षण महसूस हों या डेंगू की आशंका हो, तो बिना देर किए तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
निष्कर्ष
मानसून का मौसम आनंददायक जरूर होता है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही गंभीर संक्रमण का कारण बन सकती है। साफ-सफाई, संतुलित भोजन, पर्याप्त पानी, अच्छी नींद और समय पर सावधानी अपनाकर आप खुद को और अपने परिवार को वायरल संक्रमण से काफी हद तक सुरक्षित रख सकते हैं।
अस्वीकरण: यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता के उद्देश्य से दी गई है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी गंभीर लक्षण या स्वास्थ्य समस्या की स्थिति में योग्य डॉक्टर से तुरंत परामर्श लें।
Instagram New Feature: Instagram ने अपने यूजर्स और कंटेंट क्रिएटर्स के लिए एक नया फीचर लॉन्च किया है। अब यूजर्स पहले से पब्लिश किए गए फीड पोस्ट का म्यूजिक आसानी से बदल सकेंगे। इसके लिए पोस्ट डिलीट करके दोबारा अपलोड करने की जरूरत नहीं होगी। कंपनी ने इस नए फीचर का नाम Replace Audio रखा है, जिसकी मदद से कुछ आसान स्टेप्स में पुराने पोस्ट का ऑडियो बदला जा सकेगा।
क्या है Replace Audio फीचर?
अब तक अगर किसी यूजर को अपने पोस्ट का म्यूजिक बदलना होता था, तो उसे पोस्ट हटाकर फिर से अपलोड करना पड़ता था। ऐसा करने से पोस्ट की रीच, लाइक्स और व्यूज पर असर पड़ सकता था। लेकिन Replace Audio फीचर आने के बाद पोस्ट अपनी जगह पर ही रहेगा और केवल उसका म्यूजिक बदला जा सकेगा। इससे पोस्ट का एंगेजमेंट भी प्रभावित नहीं होगा।
कंटेंट क्रिएटर्स को होगा बड़ा फायदा
यह फीचर खासतौर पर कंटेंट क्रिएटर्स के लिए काफी उपयोगी साबित होगा। अगर किसी पोस्ट में गलत ऑडियो लग गया हो या किसी ट्रेंडिंग सॉन्ग को जोड़ना हो, तो अब पोस्ट दोबारा अपलोड करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे समय की बचत होगी और पोस्ट की परफॉर्मेंस भी बनी रहेगी।
प्रोफाइल ग्रिड को भी कर सकते हैं कस्टमाइज
Instagram ने हाल ही में प्रोफाइल ग्रिड को रीऑर्डर करने का फीचर भी पेश किया है। इसकी मदद से यूजर्स अपनी प्रोफाइल पर दिखाई देने वाले पोस्ट को अपनी पसंद के अनुसार ऊपर-नीचे या आगे-पीछे कर सकते हैं। हालांकि इससे पोस्ट की मूल अपलोड डेट में कोई बदलाव नहीं होगा।
पुराने पोस्ट का म्यूजिक कैसे बदलें?
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Number 5 Numerology: अंक ज्योतिष (Numerology) में हर अंक का अपना विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि जन्मतिथि में किसी अंक की अधिकता व्यक्ति के स्वभाव, सोच और निर्णय लेने की शैली को प्रभावित कर सकती है। अंक 5 का संबंध आमतौर पर बुद्धि, संवाद, बदलाव और स्वतंत्रता से जोड़ा जाता है। आइए जानते हैं कि जन्मतिथि में 5 अंक एक से अधिक बार आने को लेकर अंक ज्योतिष क्या कहता है।
कैसे करें जांच?
अपनी पूरी जन्मतिथि (DD-MM-YYYY) में देखें कि अंक 5 कितनी बार आया है। उदाहरण के लिए 05-05-2015 में अंक 5 कुल तीन बार मौजूद है।
जन्मतिथि में 1 बार 5 अंक
अंक ज्योतिष के अनुसार जिन लोगों की जन्मतिथि में 5 केवल एक बार आता है, उन्हें समझदार, व्यवहार कुशल और दूसरों की भावनाओं को समझने वाला माना जाता है। ऐसे लोग सलाह देने में अच्छे हो सकते हैं और रिश्तों को संतुलित रखने की कोशिश करते हैं।
जन्मतिथि में 2 बार 5 अंक
मान्यता है कि ऐसे लोग तेज़ी से निर्णय लेने वाले और नए अवसरों को अपनाने के लिए तैयार रहते हैं। इनमें काम समय पर पूरा करने की क्षमता होती है, लेकिन कई बार जल्दबाजी के कारण गलत फैसले लेने की संभावना भी बताई जाती है।
जन्मतिथि में 3 बार 5 अंक
अंक ज्योतिष के अनुसार तीन बार 5 अंक आने पर व्यक्ति आत्मविश्वासी, साहसी और बदलाव पसंद करने वाला माना जाता है। ऐसे लोग नए अनुभवों और चुनौतियों का सामना करने से नहीं घबराते। हालांकि, कुछ मान्यताओं के अनुसार इन्हें बोलते समय संयम रखने की सलाह दी जाती है, क्योंकि जल्दबाजी में कही गई बातें दूसरों को आहत कर सकती हैं।
जन्मतिथि में 4 बार 5 अंक
अंक ज्योतिष में 5 अंक का चार बार आना संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता का संकेत माना जाता है। मान्यता है कि ऐसे लोगों को मानसिक तनाव, एकाग्रता की कमी या जल्दबाजी में निर्णय लेने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए धैर्य और सोच-समझकर निर्णय लेने की सलाह दी जाती है।
अंक 5 के बारे में क्या कहती हैं मान्यताएं?
अंक ज्योतिष के अनुसार यदि जन्मतिथि में 5 अंक दो या उससे अधिक बार आता है, तो व्यक्ति का स्वभाव अधिक सक्रिय और परिवर्तनशील हो सकता है। ऐसे लोगों को महत्वपूर्ण फैसले लेते समय जल्दबाजी से बचने, धैर्य रखने और अपनी वाणी पर नियंत्रण रखने की सलाह दी जाती है।
ध्यान रखें
अंक ज्योतिष किसी व्यक्ति के स्वभाव या भविष्य का वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित माध्यम नहीं है। किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी परवरिश, शिक्षा, अनुभव और परिस्थितियों से भी प्रभावित होता है। इसलिए अंक ज्योतिष को केवल पारंपरिक मान्यता और आत्मचिंतन के एक माध्यम के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
नोट: यह जानकारी अंक ज्योतिष और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। इन्हें व्यक्तिगत आस्था और विश्वास के आधार पर ही समझें।
आजकल स्ट्रोक केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गया है। बदलती जीवनशैली, लगातार तनाव, अनियमित खानपान और कम नींद के कारण 20 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में भी मिनी स्ट्रोक (Transient Ischemic Attack – TIA) के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अच्छी बात यह है कि यदि इसके शुरुआती संकेत समय रहते पहचान लिए जाएं, तो बड़े स्ट्रोक से बचाव संभव है।
मिनी स्ट्रोक क्या होता है?
मिनी स्ट्रोक, जिसे ट्रांसिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) कहा जाता है, ऐसी स्थिति है जिसमें मस्तिष्क तक रक्त का प्रवाह कुछ समय के लिए रुक जाता है। यह रुकावट कुछ मिनटों या थोड़े समय बाद अपने आप समाप्त हो जाती है, इसलिए लक्षण भी अक्सर जल्दी ठीक हो जाते हैं।
हालांकि लक्षण खत्म हो जाने का मतलब यह नहीं कि खतरा टल गया है। मिनी स्ट्रोक भविष्य में होने वाले गंभीर स्ट्रोक का महत्वपूर्ण चेतावनी संकेत हो सकता है। इसलिए इसे कभी भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
युवाओं में क्यों बढ़ रहा है खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार कई आधुनिक जीवनशैली से जुड़े कारण युवाओं में इस समस्या का जोखिम बढ़ा रहे हैं, जैसे—
लगातार मानसिक तनाव
पर्याप्त नींद न लेना
अनियमित खानपान
धूम्रपान और तंबाकू का सेवन
अत्यधिक शराब का सेवन
मोटापा
हाई ब्लड प्रेशर
डायबिटीज
हाई कोलेस्ट्रॉल
शारीरिक गतिविधि की कमी
प्रोसेस्ड और जंक फूड का अधिक सेवन
कुछ चिकित्सीय स्थितियां भी जोखिम बढ़ा सकती हैं, जैसे—
रक्त के थक्के बनने से जुड़ी आनुवंशिक समस्याएं
ऑटोइम्यून रोग
हृदय की कुछ जन्मजात बीमारियां
अनियमित हृदय गति (Arrhythmia)
गर्दन की धमनियों में चोट
गर्भावस्था एवं प्रसव के बाद का समय
सिकल सेल रोग
कुछ दुर्लभ रक्त वाहिका संबंधी रोग
किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें?
मिनी स्ट्रोक के लक्षण अचानक दिखाई देते हैं और कुछ समय बाद गायब भी हो सकते हैं। फिर भी इन्हें गंभीरता से लेना जरूरी है।
प्रमुख लक्षण
चेहरे के एक तरफ कमजोरी या टेढ़ापन
एक हाथ या पैर में अचानक सुन्नपन या कमजोरी
बोलने या शब्द समझने में कठिनाई
अचानक धुंधला या दोहरा दिखाई देना
संतुलन बिगड़ना या चक्कर आना
भ्रम की स्थिति
अचानक बहुत तेज सिरदर्द
यदि ये लक्षण कुछ मिनट बाद सामान्य भी हो जाएं, तब भी तुरंत अस्पताल जाकर जांच करानी चाहिए।
BE FAST नियम से करें पहचान
B – Balance: अचानक संतुलन बिगड़ना।
E – Eyes: धुंधला या कम दिखाई देना।
F – Face: चेहरे का एक हिस्सा टेढ़ा पड़ जाना।
A – Arms: हाथ या पैर में कमजोरी या सुन्नपन।
S – Speech: बोलने या समझने में परेशानी।
T – Time: समय बर्बाद न करें, तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।
समय पर इलाज क्यों जरूरी है?
स्ट्रोक के दौरान मस्तिष्क की कोशिकाओं तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती। इलाज में जितनी देर होती है, उतनी अधिक मस्तिष्क कोशिकाएं क्षतिग्रस्त होती जाती हैं। इसलिए किसी भी संदिग्ध लक्षण को हल्के में लेना गंभीर परिणाम दे सकता है।
अस्पताल में सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य जांचों की मदद से यह पता लगाया जाता है कि समस्या रक्त प्रवाह रुकने की वजह से हुई है या रक्तस्राव के कारण।
बचाव के आसान उपाय
नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराएं।
ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल नियंत्रित रखें।
धूम्रपान और तंबाकू से पूरी तरह दूरी बनाएं।
शराब का सेवन सीमित रखें।
रोज कम से कम 30–45 मिनट व्यायाम करें।
ताजे फल, हरी सब्जियां और साबुत अनाज का सेवन बढ़ाएं।
जंक और प्रोसेस्ड फूड कम खाएं।
वजन नियंत्रित रखें।
रोज 7–8 घंटे की अच्छी नींद लें।
योग, ध्यान या अन्य तरीकों से तनाव कम करें।
निष्कर्ष
मिनी स्ट्रोक भले ही कुछ मिनटों में ठीक हो जाए, लेकिन यह शरीर का गंभीर चेतावनी संकेत हो सकता है। यदि चेहरे, हाथ, पैर, आंखों या बोलने से जुड़ी कोई भी अचानक समस्या दिखाई दे, तो इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज न करें। समय पर जांच और सही इलाज से बड़े स्ट्रोक तथा उससे होने वाली गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। यह किसी चिकित्सकीय सलाह, जांच या उपचार का विकल्प नहीं है। किसी भी प्रकार के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत योग्य चिकित्सक से संपर्क करें।
Restaurant Service Charge Rule: अगर किसी रेस्टोरेंट में खाना खाने के बाद आपके बिल में बिना आपकी अनुमति के सर्विस चार्ज जोड़ दिया जाता है, तो अब ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई हो सकती है। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि ग्राहकों से जबरन सर्विस चार्ज वसूलना स्वीकार्य नहीं है और नियमों का उल्लंघन करने वाले रेस्टोरेंट्स पर जुर्माना लगाया जा सकता है।
सरकार ने दिए सख्त निर्देश
केंद्रीय उपभोक्ता मामलों के मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि देश के कई शहरों से बिना सहमति के सर्विस चार्ज वसूलने की शिकायतें लगातार मिल रही हैं। उन्होंने अधिकारियों को ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई करने और नियमों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं।
मंत्री ने बताया कि उनके साथ भी एक रेस्टोरेंट में ऐसा हुआ था। जब उन्होंने बिल में जोड़े गए सर्विस चार्ज पर आपत्ति जताई, तो रेस्टोरेंट ने वह राशि हटाकर माफी मांगी।
बिना अनुमति सर्विस चार्ज जोड़ना गलत
सरकार का कहना है कि ग्राहक की सहमति के बिना बिल में सर्विस चार्ज जोड़ना उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है। ग्राहक चाहे तो अपनी इच्छा से टिप दे सकता है, लेकिन रेस्टोरेंट इसे अनिवार्य नहीं बना सकता।
41 रेस्टोरेंट्स पर कार्रवाई शुरू
केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने देशभर के 41 रेस्टोरेंट्स के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। इन प्रतिष्ठानों पर ग्राहकों से जबरन सर्विस चार्ज वसूलने का आरोप है।
सरकार ने रेस्टोरेंट्स को यह भी निर्देश दिया है कि यदि उनके बिलिंग सिस्टम में सर्विस चार्ज अपने आप जुड़ता है, तो उसे तुरंत हटाया जाए।
दिल्ली हाई कोर्ट ने भी दिए स्पष्ट निर्देश
दिल्ली हाई कोर्ट ने भी CCPA की गाइडलाइंस को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि होटल और रेस्टोरेंट ग्राहकों की अनुमति के बिना बिल में सर्विस चार्ज नहीं जोड़ सकते। इस मामले में दायर याचिकाओं को भी अदालत ने खारिज कर दिया।
किन रेस्टोरेंट्स पर हुई कार्रवाई?
CCPA ने कई प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की है। इनमें चायोस (Sunshine Teahouse) पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया और ग्राहक से वसूला गया सर्विस चार्ज लौटाने का आदेश दिया गया।
इसके अलावा कैफे ब्लू बॉटल (पटना), चाइना गेट रेस्टोरेंट, फिएस्टा बार्बेक्यू नेशन, FOO अहमदाबाद, ल’ओपेरा फ्रेंच बेकरी, ज़ोरो और द लक्ज़री नाइट क्लब सहित कई रेस्टोरेंट्स जांच के दायरे में हैं।
अगर जबरन सर्विस चार्ज लिया जाए तो क्या करें?
यदि किसी रेस्टोरेंट ने आपकी अनुमति के बिना सर्विस चार्ज वसूला है, तो आप इसकी शिकायत कर सकते हैं। शिकायत करते समय बिल की कॉपी और अन्य जरूरी जानकारी अपने पास रखें।
सरकार के मुताबिक, ग्राहक नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन (1915) या ईमेल के माध्यम से भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
जानिए आपके अधिकार
रेस्टोरेंट आपकी सहमति के बिना सर्विस चार्ज नहीं जोड़ सकता।
टिप देना पूरी तरह ग्राहक की इच्छा पर निर्भर है।
जबरन सर्विस चार्ज वसूलना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत अनुचित व्यापारिक व्यवहार माना जा सकता है।
ऐसे मामलों में ग्राहक शिकायत दर्ज कर कार्रवाई की मांग कर सकता है।