
ईरान संकट के बीच भारतीय तेल इतिहास की बात करें तो ब्रिटिश काल में भारत विदेशों से पेट्रोल आयात करता था, जिसे बर्मा-शेल जैसी विदेशी कंपनियां नियंत्रित करती थीं. आइए इस बारे में और विस्तार से समझें.
पश्चिम एशिया में जारी ईरान और अमेरिका के बीच की राजनीतिक खींचतान ने वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में हलचल पैदा कर दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे मुख्य जलमार्ग को बंद किए जाने और अमेरिकी पाबंदियों की अनिश्चितता से दुनिया भर में ईंधन की कीमतें चढ़ने लगी हैं. इस संकट ने एक बार फिर भारत की विदेशी तेल पर निर्भरता को चर्चा में ला दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जब देश में गाड़ियां कम थीं, तब पेट्रोल और मिट्टी का तेल कहां से आता था और इसका पूरा कारोबार कौन देखता था? आइए समझ लेते हैं.
शुरुआती दौर में ईंधन भारत में कहां से आता था?
19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही थी. उस समय देश के भीतर परिवहन और रोशनी के लिए केरोसिन तेल की भारी मांग थी. ब्रिटिश प्रशासन अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से विदेशी स्रोतों पर आश्रित था. इसमें सबसे बड़ा योगदान पड़ोसी देश म्यांमार यानी तत्कालीन बर्मा का था. बर्मा के तेल क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल और ईंधन भारत के बंदरगाहों तक पहुंचाया जाता था. इसके अलावा मध्य पूर्व के देशों जैसे ईरान, इराक और सऊदी अरब के कुओं से भी ईंधन की खेप भारत मंगवाई जाती थी.
अंग्रेजी हुकूमत में तेल बाजार के प्रमुख खिलाड़ी कौन?
ब्रिटिश भारत में कच्चे तेल के आयात, भंडारण और बिक्री का पूरा तंत्र चुनिंदा विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में केंद्रित था. इनमें सबसे शक्तिशाली संस्था ‘बर्मा ऑयल कंपनी’ थी, जिसने बर्मा के साथ-साथ असम के क्षेत्रों में भी अपनी जड़ें जमा रखी थीं. इसके अलावा डच और ब्रिटिश पूंजी से बनी ‘एशियाटिक पेट्रोलियम’ देश के बड़े शहरों में वितरण का काम संभालती थी. 1928 में बाजार पर पूरी तरह कब्जा जमाने के मकसद से एशियाटिक पेट्रोलियम और बर्मा ऑयल कंपनी ने हाथ मिलाया और ‘बर्मा-शेल’ की नींव रखी. आगे चलकर आजादी के बाद यही कंपनी सरकारी नियंत्रण में आकर भारत पेट्रोलियम (BPCL) बनी. इसके अलावा ‘कैल्टेक्स’ और ‘स्टैंडर्ड वैक्यूम’ जैसी अमेरिकी कंपनियों की भी बाजार में मौजूदगी थी.
भारत में तेल की पहली खोज
भारत की अपनी धरती पर कच्चे तेल की खोज का इतिहास 19वीं सदी के उत्तरार्ध से जुड़ा हुआ है. साल 1866 में असम के घने जंगलों में पहली बार तेल के निशान देखे गए थे, लेकिन व्यापारिक स्तर पर सफलता 1889 में मिली. असम के डिगबोई इलाके में पहला सफल तेल का कुआं खोदा गया. इस खोज के पीछे एक रोचक किस्सा भी मशहूर है. जब ब्रिटिश इंजीनियरों ने देखा कि डिगबोई के जंगलों में पटरियां बिछा रहे हाथियों के पैरों में काला चिपचिपा पदार्थ लगा है, तो उन्होंने मजदूरों को उत्साहित करते हुए चिल्लाकर कहा- ‘डिग, बॉय, डिग’ यानी ‘खोदो, लड़के, खोदो’. माना जाता है कि इसी वाक्य से इस ऐतिहासिक जगह का नाम डिगबोई पड़ा.
एशिया की पहली रिफाइनरी
डिगबोई में तेल मिलने के बाद भारत में ऊर्जा क्षेत्र की वास्तविक क्रांति की शुरुआत हुई. साल 1901 में ‘असम ऑयल कंपनी’ ने डिगबोई में एक अत्याधुनिक तेल शोधन कारखाना यानी रिफाइनरी स्थापित की गई. यह न केवल भारत की पहली रिफाइनरी थी, बल्कि पूरे एशिया महाद्वीप में अपनी तरह का पहला रिफाइनिंग प्लांट था. इसे आज भी भारतीय पेट्रोलियम उद्योग की गंगोत्री माना जाता है. हालांकि, इस रिफाइनरी की क्षमता इतनी नहीं थी कि वह पूरे अविभाजित भारत की तेजी से बढ़ती जरूरतों को अकेला पूरा कर सके, इसलिए घरेलू उत्पादन के बावजूद विदेशी आयात जारी रहा.
देश के पहले पेट्रोल पंप की शुरुआत
20वीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते भारत के प्रमुख महानगरों में गाड़ियां सड़कों पर दिखने लगी थीं. इससे पहले पेट्रोल मुख्य रूप से टिन के डिब्बों या कैन में बिकता था. ईंधन की बढ़ती मांग को देखते हुए वितरण प्रणाली को आधुनिक बनाने की शुरुआत हुई. साल 1928 में एशियाटिक पेट्रोलियम कंपनी ने मुंबई के लैमिंगटन रोड पर देश का पहला आधिकारिक पेट्रोल पंप स्थापित किया. इस पंप के शुरू होने के बाद देश के अन्य बड़े शहरों जैसे कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में भी पंप खोलने का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने भारत में आधुनिक ऑटोमोबाइल युग का रास्ता साफ किया.

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