क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और IBD में क्या अंतर है? जानिए लक्षण, कारण, जटिलताएं और इलाज.

क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और IBD में क्या अंतर है? जानिए लक्षण, कारण, जटिलताएं और इलाज.
क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और IBD में क्या अंतर है? जानिए लक्षण, कारण, जटिलताएं और इलाज.

पेट और आंतों से जुड़ी कुछ बीमारियों के नाम सुनकर अक्सर लोग भ्रमित हो जाते हैं। IBD यानी Inflammatory Bowel Disease, Crohn’s Disease और Ulcerative Colitis (UC) को कई बार एक ही बीमारी समझ लिया जाता है। हालांकि, इन तीनों के बीच महत्वपूर्ण अंतर है।

आसान भाषा में समझें तो IBD एक व्यापक श्रेणी है, जिसमें मुख्य रूप से क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस शामिल हैं। दोनों बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली आंतों में लंबे समय तक सूजन पैदा कर सकती है। इनके कई लक्षण एक जैसे होते हैं, लेकिन आंत के किस हिस्से में सूजन होती है और बीमारी शरीर को किस तरह प्रभावित करती है, इसमें अंतर होता है।

IBD क्या होता है?

IBD यानी Inflammatory Bowel Disease ऐसी स्थितियों का समूह है, जिसमें पाचन तंत्र में लंबे समय तक सूजन बनी रह सकती है। इसमें क्रोहन डिजीज और अल्सरेटिव कोलाइटिस प्रमुख रूप से शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार IBD के विकास में आनुवंशिक कारणों के साथ-साथ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली और आंतों के बैक्टीरिया से जुड़े कई कारक भूमिका निभा सकते हैं।

IBD आमतौर पर लंबे समय तक रहने वाली स्थिति होती है। इसमें कभी लक्षण कम हो जाते हैं या पूरी तरह शांत हो सकते हैं, जिसे रिमिशन कहा जाता है। वहीं जब लक्षण दोबारा बढ़ जाते हैं तो इसे फ्लेयर-अप कहा जाता है।

फिलहाल IBD का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन उपलब्ध उपचारों की मदद से बीमारी के लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है और कई लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं। उपचार का मुख्य उद्देश्य सूजन और लक्षणों को कम करना तथा बीमारी को रिमिशन में रखना होता है।

क्रोहन डिजीज क्या है?

Crohn’s Disease IBD का एक प्रकार है। यह पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकता है। मुंह से लेकर गुदा तक इसका असर हो सकता है, हालांकि यह अक्सर छोटी आंत के अंतिम हिस्से और बड़ी आंत की शुरुआत को प्रभावित करता है।

क्रोहन डिजीज के लक्षण

इस बीमारी में व्यक्ति को कई तरह की परेशानियां हो सकती हैं, जैसे:

  • बार-बार दस्त होना
  • कभी-कभी कब्ज की समस्या
  • पेट में दर्द या ऐंठन
  • बुखार
  • मल में खून आना
  • लगातार थकान
  • वजन कम होना
  • भूख कम लगना
  • पोषण की कमी
  • जोड़ों में दर्द
  • त्वचा से जुड़ी समस्याएं

क्रोहन डिजीज का असर केवल पाचन तंत्र तक सीमित नहीं रहता। कुछ लोगों में त्वचा, आंखों, जोड़ों और लिवर से जुड़ी समस्याएं भी दिखाई दे सकती हैं।

खाना खाने के बाद लक्षण बढ़ने की वजह से कुछ लोग भोजन कम करने लगते हैं, जिससे वजन कम होने और पोषण की कमी का खतरा बढ़ सकता है।

क्रोहन डिजीज की जटिलताएं

अगर बीमारी को नियंत्रित करना मुश्किल हो, तो आंत में सूजन और निशान पड़ने के कारण आंत में रुकावट जैसी समस्या हो सकती है।

आंत में घाव यानी अल्सर भी बन सकते हैं। कुछ मामलों में ये असामान्य रास्ते बना सकते हैं, जिन्हें फिस्टुला कहा जाता है।

अगर क्रोहन डिजीज बड़ी आंत के काफी हिस्से को प्रभावित करती है, तो लंबे समय में कोलन कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि जोखिम व्यक्ति की बीमारी की स्थिति और प्रभावित आंत के हिस्से समेत कई कारकों पर निर्भर करता है।

क्रोहन डिजीज का इलाज कैसे होता है?

इलाज बीमारी की गंभीरता और व्यक्ति की स्थिति के अनुसार तय किया जाता है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार अलग-अलग दवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • कुछ स्थितियों में सीमित अवधि के लिए स्टेरॉयड
  • संक्रमण या फोड़े जैसी समस्या होने पर एंटीबायोटिक्स
  • इम्यून सिस्टम की गतिविधि को नियंत्रित करने वाली दवाएं
  • बायोलॉजिक दवाएं

कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। हालांकि सर्जरी से क्रोहन डिजीज हमेशा के लिए खत्म नहीं होती।

अल्सरेटिव कोलाइटिस क्या है?

Ulcerative Colitis यानी UC भी IBD का एक प्रकार है, लेकिन यह क्रोहन डिजीज से अलग तरीके से आंतों को प्रभावित करता है।

UC मुख्य रूप से बड़ी आंत और मलाशय तक सीमित रहता है और आमतौर पर आंत की अंदरूनी परत में लगातार सूजन पैदा करता है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस के लक्षण

इसके सामान्य लक्षणों में शामिल हैं:

  • पेट में दर्द
  • बार-बार ढीला मल आना
  • मल में खून
  • अचानक शौच जाने की तेज इच्छा
  • थकान
  • भूख कम लगना
  • वजन कम होना
  • पोषण की कमी

लक्षण इस बात पर भी निर्भर कर सकते हैं कि बड़ी आंत का कितना हिस्सा प्रभावित हुआ है।

UC के प्रमुख प्रकार

अल्सरेटिव कोलाइटिस को प्रभावित हिस्से के आधार पर अलग-अलग प्रकारों में समझा जाता है।

अल्सरेटिव प्रोक्टाइटिस: इसमें मुख्य रूप से मलाशय प्रभावित होता है और इसे UC का सीमित रूप माना जाता है।

लेफ्ट-साइडेड कोलाइटिस: इसमें मलाशय के साथ बड़ी आंत का बायां हिस्सा प्रभावित हो सकता है।

एक्सटेंसिव कोलाइटिस: इसमें बड़ी आंत का काफी बड़ा हिस्सा या पूरी बड़ी आंत प्रभावित हो सकती है।

अल्सरेटिव कोलाइटिस की जटिलताएं

गंभीर या लंबे समय तक अनियंत्रित UC में कुछ जटिलताएं हो सकती हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • बड़ी आंत में छेद होना
  • कोलन कैंसर का बढ़ा हुआ जोखिम
  • लिवर से जुड़ी समस्याएं
  • एनीमिया
  • हड्डियों की कमजोरी या ऑस्टियोपोरोसिस

इसलिए लंबे समय तक बने रहने वाले लक्षणों को नजरअंदाज करना उचित नहीं है।

Crohn’s और UC में सबसे बड़ा अंतर क्या है?

दोनों IBD के प्रकार हैं, लेकिन इनके बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं।

क्रोहन डिजीज पाचन तंत्र के किसी भी हिस्से को प्रभावित कर सकती है और सूजन आंत की अलग-अलग गहराई तक पहुंच सकती है।

वहीं अल्सरेटिव कोलाइटिस मुख्य रूप से बड़ी आंत और मलाशय को प्रभावित करता है तथा सूजन आमतौर पर आंत की अंदरूनी परत तक सीमित रहती है।

दोनों में पेट दर्द, दस्त, थकान और वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं, इसलिए केवल लक्षणों के आधार पर खुद से बीमारी की पहचान करना सही नहीं है।

डॉक्टर Crohn’s और UC की पहचान कैसे करते हैं?

अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय से दस्त, मल में खून, पेट दर्द, वजन कम होना या बार-बार शौच की समस्या हो रही है, तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

स्थिति के अनुसार डॉक्टर गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट यानी पाचन तंत्र के विशेषज्ञ के पास भेज सकते हैं।

जांच में जरूरत के अनुसार:

  • ब्लड टेस्ट
  • स्टूल टेस्ट
  • कोलोनोस्कोपी
  • सिग्मॉइडोस्कोपी
  • CT स्कैन
  • अन्य इमेजिंग या एंडोस्कोपिक जांच

का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इन जांचों से डॉक्टर यह समझने की कोशिश करते हैं कि सूजन कहां है और बीमारी किस प्रकार की है। इसके आधार पर इलाज की योजना बनाई जाती है।

IBD में रोजमर्रा की जिंदगी कैसी हो सकती है?

IBD लंबे समय तक चलने वाली बीमारी हो सकती है, लेकिन उचित चिकित्सा, नियमित फॉलो-अप और डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार से इसके लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

दवाएं नियमित रूप से लेना, अपनी बीमारी के ट्रिगर को समझना, पर्याप्त पोषण लेना और डॉक्टर की सलाह के अनुसार जीवनशैली में बदलाव करना महत्वपूर्ण हो सकता है।

अगर पेट की समस्या लगातार बनी हुई है, मल में खून आ रहा है, बिना वजह वजन कम हो रहा है या बार-बार दस्त हो रहे हैं, तो इसे सामान्य पेट की समस्या मानकर लंबे समय तक नजरअंदाज न करें।

जरूरी बात: क्रोहन डिजीज, अल्सरेटिव कोलाइटिस और अन्य आंतों की समस्याओं के लक्षण एक-दूसरे से मिल सकते हैं। इसलिए सही बीमारी की पहचान के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी है। इलाज और दवाएं व्यक्ति की स्थिति के अनुसार अलग हो सकती हैं।

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