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  • ओडिशा के आदिवासी किसान का कमाल, 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में; 80 किसान भी जुड़े.

    ओडिशा के आदिवासी किसान का कमाल, 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में; 80 किसान भी जुड़े.

    ओडिशा के आदिवासी किसान का कमाल, 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में; 80 किसान भी जुड़े.

    भुवनेश्वर, ओडिशा: देश में हरित क्रांति के बाद अधिक उपज देने वाली धान की किस्मों का चलन बढ़ा, तो कई पारंपरिक बीज धीरे-धीरे खेती से गायब होने लगे। ऐसे समय में ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के एक आदिवासी किसान ने देशी बीजों को बचाने की मुहिम शुरू की। करीब एक दशक की मेहनत से उन्होंने न केवल धान की 100 से ज्यादा पारंपरिक किस्मों को संरक्षित किया, बल्कि दूसरे किसानों को भी इस अभियान से जोड़ दिया।

    सुंदरगढ़ जिले के धारूडीही गांव के किसान सुरथा किसान ने वर्ष 2014-15 में सिंग्हा बाहिनी सीड बैंक (SBSB) की स्थापना की थी। उनका उद्देश्य उन पारंपरिक बीजों को बचाना था, जिनका इस्तेमाल स्थानीय किसान पीढ़ियों से करते आए थे, लेकिन आधुनिक खेती में उनकी जगह लगातार कम होती जा रही थी।

    35 किस्मों से शुरू हुआ सफर, अब 110 देशी धान के बीज

    सुरथा ने संबलपुर स्थित गैर-सरकारी संगठन देसी बिहाना सुरक्षा मंच (DBSM) के सहयोग से बीज संरक्षण का काम शुरू किया। शुरुआत में उनके पास धान की केवल 35 देशी किस्मों के बीज थे। धीरे-धीरे इस संग्रह का विस्तार होता गया और अब बीज बैंक में धान की करीब 110 पारंपरिक किस्में संरक्षित हैं।

    धान के अलावा यहां छह देशी दलहनी फसलों, मोटे अनाज की 18 किस्मों, सब्जियों की 10 किस्मों और तिलहन की दो किस्मों के बीज भी रखे गए हैं। इस पहल से अब करीब 80 सक्रिय किसान जुड़े हुए हैं, जो देशी बीजों को बचाने और उनका इस्तेमाल बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

    काला जीरा से लेकर लाल जुईगुड़ा तक, कई खास किस्में संग्रह में शामिल

    सुरथा के बीज बैंक में धान की कई पारंपरिक किस्में संरक्षित हैं। इनमें काला काला जीरा, बारीक सुनाकठी, लाल लुसुरी, सुगंधित कर्पूर क्रांति, काली कलाबती, बारीक मच्छकांता, लाल जुईगुड़ा और कटिया जैसी किस्में शामिल हैं।

    बीज बैंक में केवल धान ही नहीं, बल्कि लाल भिंडी, तुरई, खीरा, टमाटर, करेला और लोबिया जैसी सब्जियों के देशी बीज भी सुरक्षित रखे जाते हैं। इसका मकसद खेती में फसलों की विविधता बनाए रखना और किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बीज उपलब्ध कराना है।

    पिता ने अपनाई थीं ज्यादा उपज देने वाली किस्में

    सुरथा के पिता बनेश्वर किसान पहले करीब पांच एकड़ जमीन पर नीलमणि, भोस्का और बांसभोट्टा जैसी देशी धान की किस्मों की खेती करते थे। लेकिन वर्ष 1995 में उन्होंने ज्यादा उत्पादन पाने की उम्मीद में स्वर्णा और प्रतीक्षा जैसी उन्नत किस्मों की खेती शुरू कर दी।

    बारिश पर निर्भर इस इलाके में अधिक उपज देने वाली किस्मों से प्रति एकड़ करीब 12 से 14 क्विंटल धान मिलता है, जबकि देशी किस्मों से लगभग 8 से 10 क्विंटल उत्पादन होता है। हालांकि, सुरथा के मुताबिक, खेती में केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि लागत, मिट्टी की स्थिति और मौसम के असर को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

    रासायनिक खेती का खर्च घटा, देशी बीजों की ओर लौटे सुरथा

    वर्ष 2012 में DBSM से जुड़ने के बाद सुरथा ने प्राकृतिक खेती के तरीकों को समझना शुरू किया। उन्हें महसूस हुआ कि अधिक उपज वाली किस्मों की खेती में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर खर्च बढ़ सकता है। लंबे समय तक रासायनिक उर्वरकों का अनुचित इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकता है।

    इसके बाद उन्होंने देशी धान की किस्मों और प्राकृतिक खेती पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। वर्तमान में वह करीब पांच एकड़ में देशी धान और लगभग 25 डिसमिल जमीन पर सब्जियों की खेती करते हैं।

    सुरथा के अनुसार, पहले अधिक उपज वाली धान की खेती में उन्हें प्रति एकड़ सालाना करीब 6,000 से 8,000 रुपये खर्च करने पड़ते थे। देशी किस्मों की खेती में यह खर्च घटकर लगभग 3,000 से 4,000 रुपये प्रति एकड़ रह गया है। हालांकि, वास्तविक लागत मिट्टी, मौसम, बीज और खेती के तरीकों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

    कई पारंपरिक किस्मों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल माना जाता है। कुछ किस्में कम पानी या सूखे जैसी परिस्थितियों को बेहतर ढंग से सहन कर सकती हैं और उनमें कुछ कीटों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोध भी पाया जा सकता है। लेकिन हर देशी किस्म के गुण अलग होते हैं और उनका प्रदर्शन क्षेत्र के अनुसार बदल सकता है।

    दूसरे किसानों को भी सिखा रहे प्राकृतिक खेती के तरीके

    सुरथा का प्रयास केवल अपने खेत तक सीमित नहीं है। वह दूसरे किसानों को भी देशी बीजों के इस्तेमाल और पर्यावरण के अनुकूल खेती के तरीकों के बारे में जानकारी देते हैं। उनके गांव में अब करीब 25 एकड़ जमीन पर देशी धान और लगभग पांच एकड़ में सब्जियों की खेती की जा रही है।

    इस काम के लिए उन्हें विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और मीडिया संस्थानों से सम्मान मिला है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।

    DBSM के संयोजक सरोज कुमार महंती के मुताबिक, संगठन ने शुरुआती दौर में ही सुरथा को प्राकृतिक खेती के लिए प्रशिक्षित किया था। वर्ष 2013-14 के दौरान पद्मश्री प्रोफेसर राधामोहन, महाराष्ट्र के पद्मश्री सुभाष पालेकर और कृषि विशेषज्ञ नटबर सारंगी से भी उन्हें प्रेरणा मिली। इन प्रयासों ने उन्हें देशी बीजों का संग्रह बढ़ाने और अपना बीज बैंक स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया।

    कृषि विज्ञान केंद्र से भी मिला प्रशिक्षण

    सुंदरगढ़ जिले के किरेई स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और DBSM की ओर से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सुरथा ने हिस्सा लिया। मृदा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार जेना के अनुसार, उन्हें बीज उपचार, मिट्टी में पोषक तत्वों का आकलन, बीज संरक्षण, मल्चिंग और वर्मी-कम्पोस्ट बनाने जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया गया।

    उन्होंने बीजामृत और जीवामृत जैसे जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाले घोल तैयार करना और उनका उपयोग करना भी सीखा। इसके साथ ही नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र और दशपर्णी जैसे पारंपरिक जैव-कीट नियंत्रण उपायों की जानकारी भी हासिल की।

    बीज उधार लेकर लौटाते हैं किसान

    सुरथा का बीज बैंक आसपास के किसानों को देशी बीज उपलब्ध कराने का एक अलग तरीका अपनाता है। किसान यहां से बीज उधार ले सकते हैं और फसल कटने के बाद तय मात्रा से अधिक बीज वापस करते हैं। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई किसान 10 किलोग्राम बीज लेता है, तो उसे फसल कटाई के बाद 15 किलोग्राम बीज लौटाना होता है। इससे बीज बैंक का भंडार बनाए रखने और दूसरे किसानों की मदद करने में सहूलियत मिलती है।

    बीज बैंक जरूरत के अनुसार दूर-दराज के किसानों को बीज बेचता भी है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, कुसुमकली और मच्छकांता जैसी धान की किस्मों के बीज क्रमशः 30 रुपये और 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचे जाते हैं। सरकारी परियोजनाओं के तहत बीज खरीदने वाले संस्थानों के लिए कीमत अलग हो सकती है।

    यदि किसी खास किस्म का बीज उपलब्ध नहीं होता, तो सुरथा पश्चिमी ओडिशा के दूसरे बीज बैंकों के साथ बीजों का आदान-प्रदान भी करते हैं। इसके अलावा, वह बीजों का पर्याप्त भंडार बनाए रखने के लिए खुद भी अलग-अलग फसलों की खेती करते हैं। आधे एकड़ में धान, मोटे अनाज और सब्जियों के बीज उगाए जाते हैं, जबकि मांग वाली मच्छकांता किस्म के लिए करीब डेढ़ एकड़ जमीन का इस्तेमाल किया जाता है।

    सुरथा किसान की पहल बताती है कि पारंपरिक बीजों को बचाने के लिए केवल उनका संग्रह करना ही पर्याप्त नहीं है। किसानों के बीच उनका आदान-प्रदान, नियमित खेती और नई पीढ़ी तक उनका ज्ञान पहुंचाना भी जरूरी है। उनकी कोशिश स्थानीय कृषि विविधता को सुरक्षित रखने और किसानों को खेती के अधिक विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दिए गए आंकड़े, लागत और बीजों की संख्या संबंधित रिपोर्ट में बताए गए विवरण पर आधारित हैं; स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इनमें अंतर हो सकता है।

  • रायपुर में बेटे पर पिता की हत्या का आरोप, सब्जी काटने वाले चाकू से किए कई वार; वारदात को आत्महत्या दिखाने की कोशिश.

    रायपुर में बेटे पर पिता की हत्या का आरोप, सब्जी काटने वाले चाकू से किए कई वार; वारदात को आत्महत्या दिखाने की कोशिश.

    रायपुर में बेटे पर पिता की हत्या का आरोप, सब्जी काटने वाले चाकू से किए कई वार; वारदात को आत्महत्या दिखाने की कोशिश.

    रायपुर, छत्तीसगढ़: राजधानी रायपुर के केंद्री गांव में पिता-पुत्र के विवाद ने खौफनाक रूप ले लिया। आरोप है कि 22 वर्षीय बेटे ने घर में रखे सब्जी काटने वाले चाकू से अपने 48 वर्षीय पिता पर कई वार कर उनकी जान ले ली। इसके बाद उसने कथित तौर पर घटना को आत्महत्या का मामला दिखाने की कोशिश की और गांव के लोगों को भी इसी तरह की जानकारी दी। सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। पूछताछ के दौरान आरोपी ने शुरुआती तौर पर वारदात में शामिल होने की बात स्वीकार की है।

    घर में विवाद के बाद चाकू से हमला

    पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार, ग्राम केंद्री निवासी डोमार साहू 9 अक्टूबर की शाम करीब 7 बजे अपनी पत्नी के साथ विवाद कर रहे थे। इसी दौरान उनका बेटा डोमेश साहू घर पहुंचा। बताया गया है कि विवाद के बीच पिता ने पत्नी और बेटे के संबंध में आपत्तिजनक आरोप लगाए, जिससे नाराज होकर बेटे ने रसोई में रखा सब्जी काटने वाला चाकू उठा लिया।

    आरोप है कि उसने पिता के गले पर वार किया। जब पिता ने बचाव करने की कोशिश की, तो उनके दाहिने हाथ की कलाई के पास भी चाकू से हमला किया गया। इसके बाद गले पर कई और वार किए गए, जिससे उनकी मौत हो गई। घटना के समय मृतक की पत्नी भी मौके पर मौजूद थी।

    हत्या को आत्महत्या बताने की कोशिश का आरोप

    वारदात के बाद आरोपी ने कथित तौर पर अपने पहने हुए कपड़े गांव के बड़े नहर-नाले में फेंक दिए। इसके बाद वह घर लौटा और घटना को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की। कुछ समय बाद परिजनों और आसपास के लोगों को पिता की आत्महत्या की जानकारी दी गई।

    हालांकि, घटना की परिस्थितियों पर संदेह होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। ग्राम केंद्री के सरपंच ने रात करीब 11:30 बजे पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद अभनपुर थाना पुलिस घटनास्थल पर पहुंची।

    एफएसएल टीम ने जुटाए साक्ष्य

    पुलिस ने घटनास्थल और शव को सुरक्षित करते हुए आवश्यक कार्रवाई की। फॉरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) की टीम को भी बुलाया गया। टीम ने मौके का निरीक्षण किया और जरूरी साक्ष्य जुटाए। इसके बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया।

    पुलिस ने संदेह के आधार पर डोमेश साहू से पूछताछ की। शुरुआती पूछताछ में उसने कथित तौर पर घटना को अंजाम देने की बात स्वीकार की। पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल किए गए चाकू सहित अन्य साक्ष्य जब्त किए हैं।

    आरोपी के खिलाफ आगे की कार्रवाई जारी

    पुलिस के अनुसार, आरोपी डोमेश साहू की उम्र 22 वर्ष है और वह मृतक डोमार साहू का बेटा है। वह रायपुर जिले के अभनपुर थाना क्षेत्र के ग्राम केंद्री का निवासी बताया गया है।

    फिलहाल पुलिस मामले से जुड़े साक्ष्यों की जांच कर रही है। हत्या के पीछे की परिस्थितियों, घटनाक्रम और अन्य पहलुओं की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। आरोपी के खिलाफ आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध पुलिस जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। मामले में आरोपों और घटनाक्रम की अंतिम पुष्टि जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के निष्कर्षों के बाद ही होगी।

  • खराब खानपान से बढ़ सकता है दिल की बीमारियों का खतरा, हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनाएं ये 10 आदतें.

    खराब खानपान से बढ़ सकता है दिल की बीमारियों का खतरा, हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनाएं ये 10 आदतें.

    खराब खानपान से बढ़ सकता है दिल की बीमारियों का खतरा, हार्ट अटैक से बचाव के लिए अपनाएं ये 10 आदतें.

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ स्वादिष्ट खाना खाना ही काफी नहीं है, बल्कि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि आपकी थाली में क्या शामिल है। ज्यादा तला-भुना भोजन, अतिरिक्त चीनी, जरूरत से ज्यादा नमक और लंबे समय तक शारीरिक गतिविधि की कमी दिल की सेहत पर बुरा असर डाल सकती है। समय के साथ ये आदतें मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज और असामान्य कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकती हैं, जो हृदय रोगों से जुड़ी हैं।

    दिल की धमनियों में जब वसा, कोलेस्ट्रॉल और अन्य पदार्थों से बना प्लाक जमा होने लगता है, तो उन्हें एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। इससे धमनियां संकरी हो सकती हैं। यदि प्लाक फट जाए और वहां खून का थक्का बन जाए, तो रक्त प्रवाह अचानक रुक सकता है और हार्ट अटैक हो सकता है। यह प्रक्रिया लंबे समय तक बिना स्पष्ट लक्षणों के भी आगे बढ़ सकती है।

    कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. बिमल झांजेर ने दिल की सेहत के लिए जीवनशैली में सुधार और जोखिम कारकों को नियंत्रित रखने पर जोर दिया है। आइए जानते हैं ऐसी 10 आदतें, जो हृदय रोगों का खतरा कम करने में मदद कर सकती हैं।

    1. कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर रखें नजर

    खून में एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने से धमनियों में प्लाक जमा होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना और उसके स्तर को नियंत्रित रखना जरूरी है।

    इसके लिए खाने में ओट्स, दालें, फल, सब्जियां, साबुत अनाज, मेवे और फाइबर से भरपूर चीजें शामिल करें। घी, मक्खन, वसायुक्त मांस और अधिक सैचुरेटेड फैट वाले खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें।

    कितनी बार लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराना चाहिए, यह आपकी उम्र, पारिवारिक इतिहास और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों पर निर्भर करता है। इसके लिए डॉक्टर से सलाह लें।

    2. ट्राइग्लिसराइड बढ़ाने वाली आदतों से बचें

    ट्राइग्लिसराइड खून में पाया जाने वाला एक प्रकार का फैट है। इसका स्तर बढ़ने पर हृदय रोगों का जोखिम बढ़ सकता है, खासकर जब इसके साथ खराब कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज या मोटापे जैसी समस्याएं भी हों।

    ज्यादा मीठे पेय, मिठाइयां, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और जरूरत से ज्यादा कैलोरी लेने से ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ सकता है। इसलिए मीठे पेय और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन कम करें। भोजन में संतुलन रखें और नियमित शारीरिक गतिविधि अपनाएं।

    3. रोजाना टहलें और शारीरिक रूप से सक्रिय रहें

    नियमित व्यायाम दिल की सेहत के लिए महत्वपूर्ण है। इससे ब्लड प्रेशर, वजन और ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है।

    वयस्कों के लिए सामान्य तौर पर सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि की सलाह दी जाती है। उदाहरण के लिए, सप्ताह में पांच दिन 30 मिनट तेज चाल से चल सकते हैं। अपनी क्षमता के अनुसार शुरुआत करें और धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।

    अगर आपको पहले से हृदय रोग है या व्यायाम के दौरान सीने में दर्द, सांस फूलने या चक्कर आने की समस्या होती है, तो व्यायाम शुरू करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लें।

    4. योग और प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल करें

    योग और सांस से जुड़े कुछ अभ्यास तनाव कम करने, मन को शांत रखने और सामान्य स्वास्थ्य बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं। नियमित योग से शारीरिक सक्रियता भी बढ़ सकती है।

    हालांकि, यह समझना जरूरी है कि योग या प्राणायाम धमनियों में मौजूद ब्लॉकेज को सीधे खत्म नहीं करते और न ही हार्ट अटैक से पूरी सुरक्षा की गारंटी देते हैं। इन्हें संतुलित आहार, व्यायाम और डॉक्टर की सलाह के साथ अपनाएं।

    5. तनाव को नियंत्रित करने की कोशिश करें

    लंबे समय तक तनाव में रहने से नींद, खानपान और ब्लड प्रेशर प्रभावित हो सकते हैं। तनाव के दौरान कुछ लोग ज्यादा खाते

  • पूर्णिया: डायन होने के शक में एक ही परिवार के 5 लोगों को जिंदा जलाया, नवविवाहित जोड़े की भी हुई हत्या; अंधविश्वास ने उजाड़ दिया पूरा घर.

    पूर्णिया: डायन होने के शक में एक ही परिवार के 5 लोगों को जिंदा जलाया, नवविवाहित जोड़े की भी हुई हत्या; अंधविश्वास ने उजाड़ दिया पूरा घर.

    पूर्णिया: डायन होने के शक में एक ही परिवार के 5 लोगों को जिंदा जलाया, नवविवाहित जोड़े की भी हुई हत्या; अंधविश्वास ने उजाड़ दिया पूरा घर.

    पूर्णिया, बिहार: अंधविश्वास और जादू-टोने के शक ने बिहार के पूर्णिया जिले के टेटगामा गांव में एक परिवार को ऐसा दर्द दिया, जिसे भुला पाना आसान नहीं है। 6 जुलाई 2025 को कथित तौर पर डायन होने के संदेह में एक ही परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी गई। मृतकों में तीन महिलाएं और एक नवविवाहित जोड़ा भी शामिल था। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर कब तक अंधविश्वास के नाम पर निर्दोष लोगों की जान ली जाती रहेगी?

    एक झटके में उजड़ गया पूरा परिवार

    टेटगामा गांव पूर्णिया शहर से लगभग 13 किलोमीटर दूर रानीपतरा इलाके में स्थित है। यह गांव प्रशासनिक रूप से पूर्णिया पूर्व प्रखंड की रजीगंज पंचायत के अंतर्गत आता है। घटना के बाद गांव में डर और मातम का माहौल था।

    रिपोर्ट के मुताबिक, मृतकों में बाबू लाल उरांव, सीता देवी, मंजीत उरांव, रानी देवी और काकतो मसोमास शामिल थे। पांचों के शव बिसारिया बहियार से बरामद किए गए थे। परिवार के लोगों के लिए यह घटना किसी भयावह सपने से कम नहीं थी।

    बाबू लाल उरांव के घर तक जाने वाली सड़क का कुछ हिस्सा कच्चा था। घर की हालत और आसपास के माहौल के बीच यह दर्दनाक घटना गांव में व्याप्त सामाजिक समस्याओं की ओर भी ध्यान खींचती है।

    बच्चे की मौत के बाद परिवार पर लगा आरोप

    रिपोर्ट में बताया गया कि पड़ोस में रहने वाले एक परिवार के बच्चे की मौत हो गई थी। इसके बाद कथित तौर पर बाबू लाल उरांव के परिवार पर जादू-टोना करने का आरोप लगाया गया। इसी संदेह ने हिंसक रूप ले लिया।

    परिजनों के अनुसार, बाबू लाल के परिवार पर पहले भी इस तरह के आरोप लगाए जाते रहे थे। उनके भाई ने बताया कि करीब दस साल पहले उनकी मां पर भी डायन होने का आरोप लगा था। उस समय गांव के कुछ लोग उन्हें एक ओझा के पास ले गए थे, जहां कथित तौर पर आरोप को खारिज कर दिया गया था।

    इसके बावजूद परिवार को लेकर संदेह और अंधविश्वास खत्म नहीं हुआ। आखिरकार, इसी तरह के आरोपों के बीच पांच लोगों की जान चली गई।

    हथियारों से लैस भीड़ का दावा

    मृतकों के परिजनों ने घटना को याद करते हुए बताया कि उस दिन बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। परिवार के एक सदस्य के मुताबिक, भीड़ में करीब 150 लोग थे और कुछ लोगों के पास लाठी-डंडे, तलवार, सरिया तथा अन्य हथियार थे।

    परिजनों का कहना था कि उन्होंने अपने लोगों को बचाने की कोशिश की, लेकिन जान से मारने की धमकियों के कारण वे बेबस हो गए। परिवार के एक करीबी ने पांच लोगों की मौत पर दुख जताते हुए कहा कि एक ही खानदान के इतने लोगों को खोने से उनका घर सूना हो गया।

    इन बयानों के आधार पर पुलिस ने मामले में कार्रवाई शुरू की थी। घटना से जुड़े आरोपों और जिम्मेदार लोगों की भूमिका का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के जरिए किया जाना है।

    प्रशासन ने क्या बताया था?

    घटना के बाद पूर्णिया के तत्कालीन जिलाधिकारी अंशुल कुमार के हवाले से रिपोर्ट में बताया गया कि शव बरामद कर पोस्टमार्टम कराया गया था और अंतिम संस्कार भी हो चुका था।

    रिपोर्ट के अनुसार, मामले में 23 नामजद लोगों और 150 से 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। मुख्य आरोपी सहित तीन लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी भी दी गई थी, जिनमें एक नाबालिग शामिल था।

    ये जानकारियां घटना के समय की रिपोर्ट पर आधारित हैं। मामले में बाद की कानूनी कार्रवाई या वर्तमान स्थिति की पुष्टि अलग से किए जाने की जरूरत है।

    बिहार में डायन के नाम पर हिंसा का पुराना सवाल

    बिहार में डायन होने के संदेह में महिलाओं को प्रताड़ित करने और हिंसा की घटनाएं लंबे समय से चिंता का विषय रही हैं। ऐसी घटनाओं के पीछे अंधविश्वास, अशिक्षा, सामाजिक दबाव और पुरानी दुश्मनी जैसे कई कारण हो सकते हैं।

    डायन होने का आरोप किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा करने का कोई आधार नहीं है। किसी बच्चे या अन्य व्यक्ति की बीमारी अथवा मृत्यु का कारण बिना वैज्ञानिक और चिकित्सकीय जांच के किसी महिला या परिवार पर थोपना गंभीर अन्याय है।

    बिहार में वर्ष 1999 में डायन प्रथा से जुड़ी प्रताड़ना और पहचान के खिलाफ कानून बनाया गया था। इसका उद्देश्य किसी महिला को डायन बताकर अपमानित करने, धमकाने या नुकसान पहुंचाने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाना था। हालांकि, कानून के मौजूद होने के बावजूद ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी कार्रवाई, जागरूकता और पीड़ितों की सुरक्षा बेहद जरूरी है।

    अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता क्यों जरूरी है?

    टेटगामा की घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा गंभीर सवाल भी है। जब किसी बीमारी या मौत का कारण जादू-टोना मान लिया जाता है, तो बिना प्रमाण के किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का खतरा बढ़ जाता है।

    ऐसे मामलों में पुलिस जांच, चिकित्सकीय जानकारी और कानूनी प्रक्रिया पर भरोसा करना जरूरी है। गांवों में जागरूकता अभियान, शिक्षा, स्थानीय प्रशासन की सक्रियता और पीड़ित परिवारों को सुरक्षा देना भी महत्वपूर्ण है।

    किसी भी व्यक्ति को डायन बताकर मारना या प्रताड़ित करना अपराध है। किसी पर आरोप होने से वह दोषी साबित नहीं हो जाता। दोष का फैसला सबूतों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख घटना के समय प्रकाशित रिपोर्ट और उसमें दर्ज बयानों पर आधारित है। आरोपों, गिरफ्तारियों और मामले की आगे की स्थिति को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

  • ऑफिस डेस्क पर ये 3 पौधे: रखने से बचने की सलाह, जानें तुलसी, बांस और कैक्टस से जुड़ी मान्यताएं.

    ऑफिस डेस्क पर ये 3 पौधे: रखने से बचने की सलाह, जानें तुलसी, बांस और कैक्टस से जुड़ी मान्यताएं.

    ऑफिस डेस्क पर ये 3 पौधे: रखने से बचने की सलाह, जानें तुलसी, बांस और कैक्टस से जुड़ी मान्यताएं.

    वास्तु टिप्स: ऑफिस की डेस्क पर पौधे रखने से कार्यस्थल सुंदर और खुशनुमा नजर आता है। कई लोग अपने आसपास हरियाली बनाए रखने के लिए छोटे-छोटे पौधे लगाते हैं। हालांकि, वास्तु शास्त्र में कुछ पौधों को कार्यस्थल के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। मान्यता है कि पौधों का चुनाव और उनकी देखभाल कार्यस्थल के माहौल से जुड़ी हो सकती है। आइए जानते हैं तुलसी, नुकीले बांस और कैक्टस को लेकर क्या मान्यताएं प्रचलित हैं।

    1. ऑफिस डेस्क पर तुलसी रखने से जुड़ी मान्यता

    तुलसी को भारतीय परंपरा में पवित्र पौधा माना जाता है। घरों में इसकी पूजा की जाती है और इसे सुख-समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। वास्तु से जुड़ी कुछ मान्यताओं में ऑफिस डेस्क पर तुलसी रखने के बजाय ऐसे स्थान पर रखने की सलाह दी जाती है, जहां पौधे को पर्याप्त रोशनी और नियमित देखभाल मिल सके।

    हालांकि, तुलसी को ऑफिस में रखने से करियर में बाधा आती है, ऐसा साबित करने वाला कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यदि कार्यस्थल पर पर्याप्त रोशनी और उचित देखभाल की व्यवस्था है, तो पौधा वहां रखा जा सकता है।

    2. नुकीले बांस के पौधे को लेकर क्या कहता है वास्तु?

    बांस के पौधे को आमतौर पर विकास, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। कई लोग इसे ऑफिस डेस्क पर सजावट के लिए रखते हैं। वहीं, वास्तु की कुछ मान्यताओं में बहुत नुकीले आकार वाले पौधों को काम करने की जगह पर रखने से बचने की सलाह दी जाती है।

    व्यावहारिक रूप से भी ऐसा पौधा चुनना बेहतर है, जिसकी पत्तियां या डंठल काम करते समय हाथों में न चुभें और डेस्क पर ज्यादा जगह न घेरें। बांस का पौधा रखने से प्रमोशन रुक जाता है या निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है, इसका कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

    3. कैक्टस को ऑफिस डेस्क पर रखने से क्यों बचने की सलाह दी जाती है?

    कैक्टस कम पानी में भी जीवित रह सकता है और इसकी देखभाल अपेक्षाकृत आसान होती है। इसके बावजूद, वास्तु से जुड़ी कुछ मान्यताओं में कांटेदार पौधों को ऑफिस डेस्क पर रखने से बचने की सलाह दी जाती है। माना जाता है कि ऐसे पौधे कार्यस्थल के माहौल के अनुकूल नहीं होते।

    लेकिन कैक्टस रखने से तनाव, गुस्सा, खराब किस्मत या करियर में रुकावट बढ़ती है, इस दावे का वैज्ञानिक आधार नहीं है। यदि आप कैक्टस पसंद करते हैं, तो उसे सुरक्षित जगह पर रख सकते हैं, जहां उसके कांटों से किसी को चोट लगने का खतरा न हो।

    ऑफिस डेस्क के लिए पौधा चुनते समय इन बातों का रखें ध्यान

    • ऐसा पौधा चुनें, जिसकी देखभाल आप नियमित रूप से कर सकें।
    • डेस्क पर पर्याप्त जगह रखें, ताकि काम करने में परेशानी न हो।
    • पौधे की जरूरत के अनुसार रोशनी और पानी की व्यवस्था करें।
    • कांटेदार या नुकीले पौधों को ऐसी जगह रखें, जहां उनसे चोट लगने का खतरा न हो।
    • ऑफिस में पौधे रखने का उद्देश्य कार्यस्थल को आरामदायक और सुंदर बनाना रखें।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में बताई गई वास्तु संबंधी बातें धार्मिक आस्था और पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। किसी पौधे को ऑफिस डेस्क पर रखने से प्रमोशन रुकने, नकारात्मक ऊर्जा बढ़ने या करियर प्रभावित होने का कोई प्रमाणित वैज्ञानिक आधार नहीं है। करियर में तरक्की मुख्य रूप से काम की गुणवत्ता, कौशल, अनुभव और कार्यस्थल से जुड़ी परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

  • 14 साल की शादी, पांच बच्चे और प्रताड़ना के आरोप… पहले जहर खाया, फिर फंदा लगाने की कोशिश; तीन दिन बाद विवाहिता की मौत.

    14 साल की शादी, पांच बच्चे और प्रताड़ना के आरोप… पहले जहर खाया, फिर फंदा लगाने की कोशिश; तीन दिन बाद विवाहिता की मौत.

    14 साल की शादी, पांच बच्चे और प्रताड़ना के आरोप… पहले जहर खाया, फिर फंदा लगाने की कोशिश; तीन दिन बाद विवाहिता की मौत.

    अंबाला, हरियाणा: शादी के करीब 14 साल बाद एक परिवार की जिंदगी ऐसी त्रासदी में बदल गई, जिसने पांच बच्चों को मां से दूर कर दिया। 35 वर्षीय विवाहिता ने कथित घरेलू प्रताड़ना से परेशान होकर जहरीला पदार्थ निगल लिया और फिर फंदा लगाकर जान देने की कोशिश की। गंभीर हालत में उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां तीन दिन तक इलाज चलने के बाद उसकी मौत हो गई। अब मृतका के पिता की शिकायत पर पुलिस ने ससुराल पक्ष के सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    मायके आने पर पिता से बयां करती थी अपना दर्द

    मृतका उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के बछरजापुर गांव की रहने वाली थी। उसके पिता के मुताबिक, उन्होंने करीब 14 साल पहले बेटी की शादी अंबाला जिले के नन्हेड़ा निवासी युवक से की थी। दंपती के पांच बच्चे हैं।

    पिता ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही बेटी को ससुराल में किसी न किसी बात को लेकर परेशान किया जाता था। उनका कहना है कि जब भी बेटी मायके आती थी, तो वह रोते हुए अपने साथ हो रहे कथित दुर्व्यवहार के बारे में बताती थी।

    परिवार का आरोप है कि लगातार मानसिक तनाव और प्रताड़ना के कारण बेटी परेशान रहने लगी थी। हालांकि, ससुराल पक्ष पर लगाए गए इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

    4 अक्टूबर की शाम बिगड़ी हालत, अस्पताल में तीन दिन चला इलाज

    पिता की शिकायत के अनुसार, 4 अक्टूबर की शाम करीब 6:30 बजे विवाहिता ने पहले जहरीला पदार्थ निगल लिया और इसके बाद चुन्नी से फंदा लगाकर आत्महत्या का प्रयास किया। घटना की जानकारी मिलने पर उसका पति उसे इलाज के लिए मोहड़ी स्थित आदेश अस्पताल ले गया।

    महिला की हालत गंभीर थी और डॉक्टरों ने उसका उपचार शुरू किया। परिवार को उम्मीद थी कि उसकी जान बच जाएगी, लेकिन हालत में सुधार नहीं हो सका। आखिरकार 7 अक्टूबर की रात इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

    महिला की मौत के बाद उसके पिता ने ससुराल पक्ष के कई सदस्यों पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए पुलिस से कार्रवाई की मांग की।

    सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज, कथित वीडियो की भी चर्चा

    पुलिस ने मृतका के पिता के बयान के आधार पर ससुर, सास, दो देवर, देवरानी, ननद और एक अन्य व्यक्ति समेत सात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 और 61 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित आरोप लगाए गए हैं।

    पिता ने यह भी दावा किया कि बेटी ने मौत से पहले एक वीडियो बनाया था और उसे अपने भाई के पास भेजा था। हालांकि, पुलिस के अनुसार शिकायत के समय यह वीडियो उपलब्ध नहीं कराया गया था। अधिकारियों ने कहा है कि वीडियो मिलने पर उसकी जांच कर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

    फिलहाल पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है। सात लोगों पर लगे आरोपों की जांच की जाएगी और संबंधित पक्षों से पूछताछ के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध रिपोर्ट और शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपियों की जिम्मेदारी अभी अदालत में साबित नहीं हुई है। मामले की वास्तविक स्थिति पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद स्पष्ट होगी।

  • समय पर नहीं खुली नींद, ट्रेडर को एक दिन में ₹61 लाख का नुकसान! न मार्केट ने दिया धोखा, न सेटअप बिगड़ा, जानें कैसे हुई इतनी बड़ी चूक.

    समय पर नहीं खुली नींद, ट्रेडर को एक दिन में ₹61 लाख का नुकसान! न मार्केट ने दिया धोखा, न सेटअप बिगड़ा, जानें कैसे हुई इतनी बड़ी चूक.

    समय पर नहीं खुली नींद, ट्रेडर को एक दिन में ₹61 लाख का नुकसान! न मार्केट ने दिया धोखा, न सेटअप बिगड़ा, जानें कैसे हुई इतनी बड़ी चूक.

    शेयर बाजार की वायरल कहानी: शेयर बाजार में ट्रेडिंग के दौरान छोटी-सी लापरवाही भी भारी पड़ सकती है। इसका एक उदाहरण उस ट्रेडर की कहानी है, जिसने कथित तौर पर सिर्फ समय पर नहीं उठ पाने के कारण एक ही दिन में ₹61 लाख गंवा दिए। न बाजार में कोई बड़ी गिरावट का झटका लगा और न ही ट्रेडिंग का पूरा सेटअप गलत साबित हुआ। नुकसान की मुख्य वजह बताई गई कि ट्रेडर समय पर अपनी खुली पोजीशन संभाल नहीं पाया और स्टॉप-लॉस लगाने का मौका चूक गया।

    सुबह देर से उठना पड़ा लाखों में भारी

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मयंक राज नाम के एक ट्रेडर ने अपनी ट्रेडिंग से जुड़ा अनुभव साझा किया। उनके मुताबिक, उन्होंने एक दिन पहले निफ्टी के कॉल ऑप्शन में शॉर्ट पोजीशन बनाई थी। लेकिन अगली सुबह समय पर नींद नहीं खुलने के कारण वह अपनी ओपन पोजीशन की निगरानी नहीं कर सके।

    जब उनकी नींद खुली और उन्होंने ट्रेडिंग अकाउंट चेक किया, तब तक नुकसान काफी बढ़ चुका था। ट्रेडर ने बताया कि अगर वह समय पर उठ जाते और अपने तय स्टॉप-लॉस के मुताबिक पोजीशन बंद कर देते, तो नुकसान को लगभग ₹15 लाख से ₹20 लाख के बीच सीमित किया जा सकता था।

    उनके मुताबिक, इस नुकसान की वजह ट्रेडिंग सेटअप से ज्यादा अनुशासन की कमी रही। यह घटना दिखाती है कि बाजार में सही रणनीति बनाने के साथ-साथ जोखिम को समय पर नियंत्रित करना भी जरूरी है।

    ₹71 लाख का घाटा, दूसरे ट्रेड से ₹10 लाख का फायदा

    ट्रेडर की ओर से साझा किए गए ट्रेडिंग डैशबोर्ड के स्क्रीनशॉट के मुताबिक, निफ्टी के 22,000 कॉल ऑप्शन में शॉर्ट पोजीशन पर करीब ₹71 लाख का नुकसान दिखाई दिया। वहीं, उसी एक्सपायरी के 22,500 कॉल ऑप्शन को खरीदने से लगभग ₹10 लाख का मुनाफा हुआ।

    इन दोनों ट्रेडों को मिलाकर उनका कुल शुद्ध नुकसान करीब ₹61 लाख बताया गया। हालांकि, ये आंकड़े ट्रेडर की ओर से साझा की गई जानकारी पर आधारित हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

    ट्रेडर ने यह भी बताया कि पिछले सप्ताह उन्हें कुछ मुनाफा हुआ था, लेकिन इस बड़े नुकसान ने अक्टूबर महीने के उनके कुल ट्रेडिंग परिणाम को नुकसान में पहुंचा दिया। अब उनका ध्यान धीरे-धीरे नुकसान से उबरने, अनुशासन बनाए रखने और आगे की ट्रेडिंग में सावधानी बरतने पर है।

    सोशल मीडिया पर लोगों ने दी ये सलाह

    इस घटना के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ट्रेडर को जोखिम प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देने की सलाह दी। कुछ यूजर्स ने कहा कि अगर कोई ट्रेडर बाजार बंद होने के बाद भी अपनी पोजीशन खुली रखता है, तो उसे संभावित नुकसान के लिए पहले से योजना बनानी चाहिए।

    कुछ लोगों ने ओवरनाइट या बीटीएसटी ट्रेडिंग के दौरान जोखिम सीमित करने के लिए उपलब्ध जोखिम-प्रबंधन सुविधाओं का इस्तेमाल करने की बात कही। हालांकि, स्टॉप-लॉस ऑर्डर भी हर परिस्थिति में नुकसान को किसी निश्चित रकम तक सीमित रखने की गारंटी नहीं देता। बाजार खुलने पर कीमत में बड़ा अंतर आने या तेजी से उतार-चढ़ाव होने पर ऑर्डर अपेक्षित कीमत से अलग स्तर पर निष्पादित हो सकता है।

    9 अक्टूबर को बाजार में आई थी तेजी

    यह मामला ऐसे समय सामने आया, जब शुक्रवार, 9 अक्टूबर को भारतीय शेयर बाजार में अच्छी रिकवरी देखने को मिली थी। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के मुताबिक, निफ्टी 50 करीब 1.30 प्रतिशत बढ़कर 22,520.45 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स में लगभग 1.23 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई और यह 72,472.33 के स्तर पर पहुंचा।

    आईटी शेयरों में खरीदारी और दिग्गज कंपनियों के तिमाही नतीजों को लेकर उम्मीदों से बाजार को समर्थन मिला। हालांकि, किसी एक दिन बाजार का बढ़ना या गिरना यह तय नहीं करता कि हर ट्रेडर को फायदा होगा या नुकसान। ऑप्शन ट्रेडिंग में पोजीशन की दिशा, स्ट्राइक प्राइस, एक्सपायरी, अस्थिरता और जोखिम प्रबंधन जैसे कई कारक परिणाम को प्रभावित करते हैं।

    ट्रेडिंग करने वालों के लिए क्या है सबक?

    इस घटना से कुछ जरूरी बातें सामने आती हैं। पहली, बाजार में कोई भी पोजीशन बिना स्पष्ट जोखिम योजना के नहीं रखनी चाहिए। दूसरी, अगर ट्रेडर किसी समय बाजार की निगरानी नहीं कर सकता, तो उसे पहले से तय करना चाहिए कि उस दौरान खुली पोजीशन का जोखिम कैसे संभाला जाएगा। तीसरी, नुकसान होने के बाद उसे तुरंत पूरा करने की कोशिश में जल्दबाजी से नए ट्रेड लेना जोखिम को और बढ़ा सकता है।

    खासकर फ्यूचर एंड ऑप्शन (F&O) ट्रेडिंग में मुनाफे की संभावना के साथ नुकसान का जोखिम भी काफी अधिक होता है। इसलिए केवल संभावित कमाई पर ध्यान देने के बजाय पूंजी की सुरक्षा और अनुशासित ट्रेडिंग को प्राथमिकता देना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सोशल मीडिया पर साझा किए गए दावों और उपलब्ध बाजार जानकारी पर आधारित है। ट्रेडर के बताए नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की गई है। यह निवेश या ट्रेडिंग की सलाह नहीं है। शेयर बाजार और खासकर F&O ट्रेडिंग में बड़ा नुकसान हो सकता है। कोई भी निर्णय लेने से पहले अपनी जोखिम क्षमता समझें और जरूरत पड़ने पर प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।

  • आदिवासी इलाकों में आज भी पारंपरिक दाइयों पर क्यों भरोसा करती हैं महिलाएं? अस्पताल दूर, गरीबी और पुरानी परंपराएं बनी बड़ी वजह.

    आदिवासी इलाकों में आज भी पारंपरिक दाइयों पर क्यों भरोसा करती हैं महिलाएं? अस्पताल दूर, गरीबी और पुरानी परंपराएं बनी बड़ी वजह.

    आदिवासी इलाकों में आज भी पारंपरिक दाइयों पर क्यों भरोसा करती हैं महिलाएं? अस्पताल दूर, गरीबी और पुरानी परंपराएं बनी बड़ी वजह.

    नई दिल्ली: सरकार लंबे समय से गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों में प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहित कर रही है, ताकि मां और नवजात शिशु को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सके। इसके बावजूद ओडिशा और छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी इलाकों में पारंपरिक दाइयों की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। इसकी वजह केवल पुरानी परंपराएं नहीं, बल्कि गरीबी, अस्पतालों से दूरी, परिवहन की कमी और स्थानीय समुदायों का इन दाइयों पर भरोसा भी है।

    दो अलग-अलग अध्ययनों से सामने आया है कि आदिवासी क्षेत्रों में मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय संस्कृति को समझना, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान बनाना और समुदाय के भरोसेमंद लोगों को स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ना भी जरूरी है।

    ओडिशा के गांवों में सामने आई क्या स्थिति?

    ओडिशा के कालाहांडी जिले में किए गए एक अध्ययन में आदिवासी महिलाओं की गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद मिलने वाली देखभाल का विश्लेषण किया गया। यह शोध लांजीगढ़ प्रखंड के चार दूरदराज के गांवों में किया गया था।

    नवंबर 2024 से फरवरी 2025 के बीच हुए क्षेत्रीय अध्ययन में 17 से 45 वर्ष की 100 महिलाओं के साथ-साथ पारंपरिक दाइयों, स्वास्थ्यकर्मियों और हाल ही में मां बनी महिलाओं से बातचीत की गई।

    अध्ययन में सामने आया कि इन इलाकों में घर पर प्रसव की परंपरा अब भी काफी प्रचलित है। शोध में शामिल महिलाओं में 66 प्रतिशत के प्रसव घर पर होने की जानकारी दी गई, जबकि 34 प्रतिशत ने स्वास्थ्य संस्थानों में बच्चे को जन्म दिया था।

    ये आंकड़े अध्ययन में शामिल महिलाओं और गांवों की स्थिति बताते हैं। इन्हें पूरे ओडिशा या देश के सभी आदिवासी समुदायों की स्थिति नहीं माना जाना चाहिए।

    अस्पताल में प्रसव कराने से क्यों हिचकती हैं महिलाएं?

    अध्ययन में अस्पताल में प्रसव कराने के रास्ते में कई सामाजिक और आर्थिक बाधाएं सामने आईं।

    • खर्च की चिंता: 68 प्रतिशत महिलाओं ने अस्पताल में प्रसव को महंगा माना।
    • घर पर प्रसव की प्राथमिकता: 71 प्रतिशत महिलाओं ने घर पर बच्चे को जन्म देना पसंद किया।
    • परिवार का प्रभाव: 60 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनकी सास ने अस्पताल में प्रसव कराने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया।
    • परिवहन की समस्या: 45 प्रतिशत महिलाओं ने आने-जाने के लिए पैसे की कमी बताई।
    • स्वास्थ्य केंद्रों से दूरी: 33 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि चिकित्सा सुविधा उनके घर से काफी दूर थी।
    • झिझक और असहजता: 30 प्रतिशत महिलाओं ने स्वास्थ्य केंद्र जाने में शर्मिंदगी या झिझक महसूस करने की बात कही।

    इन आंकड़ों से पता चलता है कि संस्थागत प्रसव का निर्णय केवल महिला की पसंद पर निर्भर नहीं करता। परिवार की सोच, आर्थिक स्थिति, दूरी और स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली सुविधाएं भी इस फैसले को प्रभावित करती हैं।

    गरीबी और शिक्षा की कमी भी बड़ी चुनौती

    अध्ययन में शामिल परिवारों की आर्थिक स्थिति भी चिंता का विषय थी। करीब 87 प्रतिशत परिवारों की मासिक आय 10,000 रुपये से कम बताई गई। महिलाओं में कई दिहाड़ी मजदूरी, खेती और जंगल पर आधारित आजीविका से जुड़ी थीं।

    ऐसी स्थिति में गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक भोजन, जांच, दवाइयों और अस्पताल तक पहुंचने का खर्च उठाना मुश्किल हो सकता है। रोज कमाकर खाने वाले परिवारों के लिए अस्पताल जाने का मतलब काम और आय का नुकसान भी हो सकता है।

    शिक्षा के मामले में भी चुनौतियां सामने आईं। अध्ययन में लगभग एक-तिहाई महिलाएं निरक्षर थीं, जबकि विश्वविद्यालय स्तर तक पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या बहुत कम थी। इससे गर्भावस्था की नियमित जांच, पोषण और प्रसव संबंधी स्वास्थ्य जानकारी तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।

    पारंपरिक दाइयों पर क्यों कायम है भरोसा?

    आदिवासी समुदायों में पारंपरिक दाइयां केवल प्रसव में मदद करने वाली महिलाएं नहीं होतीं। कई जगह वे पीढ़ियों से अर्जित अनुभव के आधार पर गर्भवती महिलाओं को भावनात्मक सहारा देती हैं और प्रसव के बाद भी उनकी देखभाल में मदद करती हैं।

    उनकी भाषा, स्थानीय रीति-रिवाजों और परिवारों की परिस्थितियों की समझ उन्हें समुदाय के करीब लाती है। दूरदराज के गांवों में, जहां स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचना कठिन हो सकता है, यह भरोसा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    पारंपरिक दाइयां स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कुछ औषधीय पौधों और पारंपरिक तरीकों का भी इस्तेमाल करती हैं। हालांकि, किसी पारंपरिक उपाय की सुरक्षा और प्रभावशीलता को चिकित्सकीय प्रमाण के आधार पर परखना जरूरी है।

    छत्तीसगढ़ के बैगा समुदाय में भी सामने आई ऐसी तस्वीर

    छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल बैगा समुदाय पर 2024 में एक अलग अध्ययन किया गया था। इसमें चार पारंपरिक दाइयों, एक सरकारी मितानिन और 10 आदिवासी महिलाओं के अनुभव दर्ज किए गए।

    इस अध्ययन में बताया गया कि पारंपरिक दाइयां गर्भावस्था से लेकर प्रसव और प्रसव के बाद की देखभाल तक महिलाओं का साथ देती हैं। उनका ज्ञान औपचारिक चिकित्सा शिक्षा के बजाय पीढ़ियों से परिवारों और समुदायों में मिले अनुभवों पर आधारित होता है।

    शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि पारंपरिक दाइयों की संख्या, उनके कार्यक्षेत्र और उनके योगदान का व्यवस्थित राष्ट्रीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इससे स्वास्थ्य नीतियां बनाते समय उनकी वास्तविक भूमिका को समझना मुश्किल हो सकता है।

    पारंपरिक दाइयों की अपनी सीमाएं भी हैं

    पारंपरिक दाइयों पर समुदाय का भरोसा महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके अनुभव को प्रशिक्षित चिकित्सकीय देखभाल का विकल्प नहीं माना जा सकता।

    प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव, उच्च रक्तचाप, बच्चे की असामान्य स्थिति या अन्य गंभीर जटिलताएं मां और नवजात दोनों के लिए जानलेवा हो सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों, आवश्यक उपकरणों और समय पर अस्पताल पहुंचने की जरूरत होती है।

    अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुछ पारंपरिक दाइयां जटिल मामलों में महिलाओं को अस्पताल ले जाने में मदद करती हैं। कई स्थितियों में वे गर्भवती महिला के साथ जाकर उसे भावनात्मक सहारा भी देती हैं, जबकि चिकित्सा संबंधी जिम्मेदारी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी संभालते हैं।

    क्या पारंपरिक दाइयों को सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है?

    शोधकर्ताओं का सुझाव है कि पारंपरिक दाइयों को पूरी तरह अलग करने के बजाय उन्हें सुरक्षित मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रमों से जोड़ा जा सकता है। इसके लिए उन्हें खतरे के संकेत पहचानने, गर्भवती महिलाओं को समय पर जांच के लिए प्रोत्साहित करने और जरूरत पड़ने पर अस्पताल भेजने के बारे में प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

    इसके साथ ही कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं:

    • दूरदराज के गांवों के लिए बेहतर परिवहन और आपातकालीन सहायता उपलब्ध कराना।
    • प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षित कर्मचारियों और जरूरी सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना।
    • स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाना।
    • पारंपरिक दाइयों और सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों के बीच सहयोग बढ़ाना।
    • गर्भवती महिलाओं को जांच, पोषण और प्रसव के विकल्पों की सही जानकारी देना।

    जननी सुरक्षा योजना और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम जैसी सरकारी पहल संस्थागत प्रसव तथा मातृ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से चलाई जाती हैं। लेकिन इन योजनाओं का लाभ दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय समस्याओं का समाधान भी जरूरी है।

    आदिवासी महिलाओं के लिए सुरक्षित प्रसव कैसे सुनिश्चित हो?

    ओडिशा और छत्तीसगढ़ के इन अध्ययनों का मुख्य संदेश यह है कि मातृ स्वास्थ्य में सुधार के लिए आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं और सामुदायिक भरोसे के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

    पारंपरिक दाइयों का स्थानीय ज्ञान और भावनात्मक सहयोग उपयोगी हो सकता है, लेकिन सुरक्षित प्रसव के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाओं तक समय पर पहुंच सुनिश्चित करना बेहद महत्वपूर्ण है।

    जब तक गरीबी, दूरी, परिवहन की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर झिझक जैसी बाधाएं दूर नहीं होतीं, तब तक केवल अस्पताल में प्रसव कराने की अपील से अपेक्षित बदलाव लाना मुश्किल हो सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध शोध-विवरणों पर आधारित है। इसमें दिए गए प्रतिशत संबंधित अध्ययनों के नमूनों से जुड़े हैं और इन्हें सभी आदिवासी समुदायों पर लागू नहीं माना जाना चाहिए। गर्भावस्था और प्रसव संबंधी निर्णय योग्य स्वास्थ्यकर्मी की सलाह के अनुसार लेने चाहिए।

  • धमतरी में होटल के कमरा नंबर 106 में मिली युवती की लाश, शादी से मुकरने और प्रताड़ना के आरोप में प्रेमी गिरफ्तार.

    धमतरी में होटल के कमरा नंबर 106 में मिली युवती की लाश, शादी से मुकरने और प्रताड़ना के आरोप में प्रेमी गिरफ्तार.

    धमतरी में होटल के कमरा नंबर 106 में मिली युवती की लाश, शादी से मुकरने और प्रताड़ना के आरोप में प्रेमी गिरफ्तार.

    धमतरी, छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ के धमतरी में एक होटल के कमरे में युवती की मौत के मामले में पुलिस ने उसके प्रेमी को गिरफ्तार किया है। आरोपी पर शादी का वादा करके मुकरने, मारपीट करने, मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने तथा युवती को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है। पुलिस ने जांच के बाद उसके खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई की है।

    होटल के कमरे में मिला था युवती का शव

    मृतका की पहचान 22 वर्षीय पिंकी मानिकपुरी के रूप में हुई है। वह कवर्धा जिले की रहने वाली थी। पुलिस के अनुसार, पिंकी का धमतरी के गोकुलपुर वार्ड नंबर 36 में रहने वाले टिकेश्वर उर्फ टिंकू साहू के साथ लंबे समय से प्रेम संबंध था।

    आरोप है कि दोनों के बीच शादी को लेकर बातचीत चल रही थी। इसी दौरान पिंकी को पता चला कि युवक के दूसरी लड़कियों से भी संबंध हैं। इसके बाद वह 24 सितंबर को कवर्धा से धमतरी पहुंची और सिटी कोतवाली थाना क्षेत्र के एक होटल में ठहरी। होटल के कमरा नंबर 106 में उसका शव मिला था।

    शादी की बात पर हुआ था विवाद

    पुलिस के मुताबिक, 25 सितंबर की शाम टिकेश्वर युवती से मिलने होटल पहुंचा था। वहां दोनों के बीच शादी को लेकर बातचीत हुई। आरोप है कि इस दौरान युवक ने शादी करने से इनकार कर दिया। इसके बाद दोनों के बीच विवाद बढ़ गया और गाली-गलौज के साथ हाथापाई भी हुई।

    जांच में यह आरोप भी सामने आया कि युवक पहले से ही युवती को मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान करता था। पुलिस के अनुसार, इसी घटनाक्रम के बाद पिंकी ने 25 सितंबर को होटल के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।

    जांच के बाद प्रेमी गिरफ्तार

    युवती की मौत के बाद सिटी कोतवाली पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। पुलिस ने जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर टिकेश्वर उर्फ टिंकू साहू के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया।

    पुलिस ने 9 अक्टूबर को आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी के बाद उसे न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया गया है। फिलहाल पुलिस इस मामले की आगे की जांच कर रही है।

    जांच में सामने आएंगे अन्य तथ्य

    यह मामला प्रेम संबंध, शादी के वादे और कथित प्रताड़ना से जुड़ा है। पुलिस का कहना है कि जांच अभी जारी है। मामले में आगे मिलने वाले साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही पूरे घटनाक्रम की स्थिति स्पष्ट होगी।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की अंतिम पुष्टि अदालत में होने वाली न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही मानी जाएगी।

  • कैंसर से जुड़े खतरनाक माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, रिसर्च में HPV का स्तर 93% तक घटा; जानें वैज्ञानिकों ने क्या पाया.

    कैंसर से जुड़े खतरनाक माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, रिसर्च में HPV का स्तर 93% तक घटा; जानें वैज्ञानिकों ने क्या पाया.

    कैंसर से जुड़े खतरनाक माइक्रोब्स पर असर दिखाने वाली खास च्युइंग गम, रिसर्च में HPV का स्तर 93% तक घटा; जानें वैज्ञानिकों ने क्या पाया.

    मुंह और गले के कैंसर की रोकथाम और इलाज के क्षेत्र में वैज्ञानिक लगातार नए तरीकों पर काम कर रहे हैं। इसी दिशा में अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया के शोधकर्ताओं ने एक खास बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम पर अध्ययन किया है। शुरुआती शोध में इस गम से जुड़े तत्वों ने मुंह के नमूनों में कुछ कैंसर-संबंधी संक्रमणों और बैक्टीरिया के स्तर को कम करने की क्षमता दिखाई। हालांकि, इसे कैंसर का इलाज या बीमारी से बचाव का प्रमाणित तरीका मानना अभी सही नहीं होगा।

    यह शोध इसलिए चर्चा में है क्योंकि सामान्य च्युइंग गम की तरह इस्तेमाल किए जाने वाले उत्पाद के जरिए मुंह में मौजूद कुछ खास सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाने की संभावना पर काम किया जा रहा है। लेकिन इस तकनीक की प्रभावशीलता और सुरक्षा को समझने के लिए अभी और अध्ययन जरूरी हैं।

    क्या है यह खास बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम?

    शोधकर्ताओं ने लैब में तैयार की गई एक खास गम पर काम किया, जो लैबलैब बीन्स (Lablab beans) से जुड़े प्रोटीन FRIL का इस्तेमाल करती है। इस प्रोटीन में कुछ वायरस से जुड़ने और उन्हें निष्क्रिय करने की क्षमता का अध्ययन किया गया है।

    शोध का उद्देश्य मुंह में मौजूद ऐसे सूक्ष्मजीवों को कम करना है, जिनका संबंध सिर और गर्दन के कुछ कैंसर या उनके परिणामों से पाया गया है। वैज्ञानिक यह भी देख रहे हैं कि क्या इस तरीके से मुंह में मौजूद उपयोगी बैक्टीरिया को अपेक्षाकृत सुरक्षित रखा जा सकता है।

    रिसर्च में किन तीन माइक्रोब्स पर ध्यान दिया गया?

    अध्ययन में तीन प्रमुख सूक्ष्मजीवों पर ध्यान दिया गया:

    • ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV): HPV के कुछ प्रकार गले के ऊपरी हिस्से के कैंसर, खासकर ऑरोफैरिंक्स के कैंसर, से जुड़े हैं। हालांकि, HPV संक्रमण होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को कैंसर हो ही जाएगा।
    • Porphyromonas gingivalis (Pg): यह बैक्टीरिया मसूड़ों की बीमारी से जुड़ा है। कुछ शोधों में इसका संबंध मुंह और दूसरे कैंसरों से भी देखा गया है, लेकिन संबंध पाए जाने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि बैक्टीरिया सीधे कैंसर पैदा करता है।
    • Fusobacterium nucleatum (Fn): यह बैक्टीरिया मुंह में पाया जा सकता है और मसूड़ों की बीमारी से जुड़ा है। इसके कुछ कैंसरों के साथ संबंध पर भी वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं।

    इन सूक्ष्मजीवों पर शोध का उद्देश्य कैंसर से जुड़े जोखिमों और संक्रमण की भूमिका को बेहतर समझना है।

    अध्ययन में HPV का स्तर कितना कम हुआ?

    शोध में बताए गए परिणामों के अनुसार, बीन गम से प्राप्त तत्वों के इस्तेमाल के बाद लार के नमूनों में HPV का स्तर लगभग 93 प्रतिशत तक और माउथ-रिंस नमूनों में करीब 80 प्रतिशत तक कम पाया गया।

    इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने प्रोटेग्रिन नामक एक एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड के साथ Pg और Fn बैक्टीरिया पर प्रभाव का भी अध्ययन किया। प्रयोगों में इन बैक्टीरिया के स्तर में उल्लेखनीय कमी देखी गई।

    यहां एक अहम बात समझना जरूरी है: नमूनों में किसी वायरस या बैक्टीरिया का स्तर कम होना, शरीर में कैंसर का खत्म हो जाना या भविष्य में कैंसर न होने की गारंटी नहीं है। ये परिणाम शुरुआती शोध के संकेत हैं, जिन्हें वास्तविक मरीजों में आगे जांचने की जरूरत है।

    क्या यह च्युइंग गम मुंह के अच्छे बैक्टीरिया को सुरक्षित रखती है?

    शोधकर्ताओं की दिलचस्पी ऐसे तरीके विकसित करने में है, जो हानिकारक माने जाने वाले खास सूक्ष्मजीवों को निशाना बनाएं और मुंह के सामान्य माइक्रोबायोम पर कम असर डालें। शुरुआती प्रयोगों में कुछ उपयोगी सूक्ष्मजीवों को सुरक्षित रखने की संभावना दिखाई गई।

    हालांकि, यह निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि यह गम हर व्यक्ति के मुंह में सभी अच्छे बैक्टीरिया को सुरक्षित रखेगी। इसके लिए अधिक विस्तृत और स्वतंत्र क्लिनिकल अध्ययनों की जरूरत होगी।

    सिर और गर्दन के कैंसर के लिए यह शोध क्यों महत्वपूर्ण है?

    सिर और गर्दन के कैंसर में मुंह, गले और आसपास के कुछ हिस्सों में होने वाले कैंसर शामिल हैं। इन बीमारियों का उपचार कैंसर के प्रकार और उसकी अवस्था के अनुसार सर्जरी, रेडिएशन, दवाओं या अन्य तरीकों से किया जा सकता है।

    HPV संक्रमण कुछ प्रकार के गले के कैंसर का महत्वपूर्ण जोखिम कारक है। वहीं, Pg और Fn जैसे बैक्टीरिया की भूमिका को लेकर वैज्ञानिक अभी अध्ययन कर रहे हैं। यदि भविष्य में इस तरह की तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो इसे मौजूदा चिकित्सा के साथ सहायक उपाय के रूप में परखने की संभावना हो सकती है।

    फिलहाल इस गम को कैंसर का प्रमाणित इलाज या कैंसर रोकने का स्थापित उपाय नहीं माना जाना चाहिए। इसकी प्रभावशीलता, सही खुराक, लंबे समय की सुरक्षा और वास्तविक मरीजों पर असर की पुष्टि के लिए आगे के क्लिनिकल परीक्षण आवश्यक हैं।

    मुंह के कैंसर से बचाव के लिए अभी क्या करें?

    किसी नई तकनीक के उपलब्ध होने का इंतजार करने के बजाय मुंह की सेहत और कैंसर के ज्ञात जोखिमों पर ध्यान देना जरूरी है।

    • तंबाकू, गुटखा, खैनी और सुपारी से दूर रहें।
    • शराब का सेवन न करें या इससे बचें, क्योंकि यह मुंह और गले के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकती है।
    • नियमित रूप से दांतों और मसूड़ों की सफाई करें और जरूरत के अनुसार दंत चिकित्सक से जांच कराएं।
    • पात्रता और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार HPV टीकाकरण पर विचार करें।
    • मुंह में लंबे समय तक रहने वाला घाव, सफेद या लाल धब्बा, गांठ, निगलने में परेशानी या आवाज में लगातार बदलाव हो, तो डॉक्टर या दंत विशेषज्ञ से जांच कराएं।

    निष्कर्ष: बायोइंजीनियर्ड च्युइंग गम पर हुआ शोध कैंसर से जुड़े कुछ वायरस और बैक्टीरिया को निशाना बनाने की एक संभावित नई दिशा दिखाता है। शुरुआती प्रयोगों में HPV के स्तर में कमी देखी गई, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि इस गम से कैंसर ठीक हो सकता है या इसे रोका जा सकता है। इसे फिलहाल शोध के शुरुआती नतीजों के रूप में ही देखना चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं। शोध में मिले शुरुआती परिणामों को प्रमाणित उपचार न समझें। मुंह या गले से जुड़ी किसी समस्या के लिए योग्य डॉक्टर से सलाह लें और निर्धारित कैंसर उपचार को किसी अप्रमाणित उत्पाद से न बदलें।