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  • बिहार: राजगीर की इस “गुफा में छिपा है राजा का सोना? अंग्रेजों ने तोप से तोड़ने की कोशिश की, फिर भी नहीं खुली रहस्यमयी दीवार.

    बिहार: राजगीर की इस “गुफा में छिपा है राजा का सोना? अंग्रेजों ने तोप से तोड़ने की कोशिश की, फिर भी नहीं खुली रहस्यमयी दीवार.

    बिहार: राजगीर की इस “गुफा में छिपा है राजा का सोना? अंग्रेजों ने तोप से तोड़ने की कोशिश की, फिर भी नहीं खुली रहस्यमयी दीवार.

    बिहार के राजगीर में मौजूद सोन भंडार गुफाएं सदियों से अपने भीतर छिपे खजाने की कहानी को लेकर चर्चा में हैं। कहा जाता है कि इन गुफाओं की एक पत्थर की दीवार के पीछे प्राचीन राजा का सोना छिपा हुआ है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, अंग्रेजों ने भी इस दीवार को तोड़कर खजाना निकालने की कोशिश की थी। दावा है कि तोप से हमला करने के बावजूद दीवार नहीं टूटी और उस पर निशान रह गया। लेकिन इन कहानियों के पीछे का ऐतिहासिक सच क्या है?

    सोन भंडार गुफाओं का रहस्य क्या है?

    बिहार के राजगीर में वैभार पहाड़ियों के पास चट्टानों को काटकर बनाई गई दो प्राचीन गुफाएं मौजूद हैं। इन्हें सोन भंडार गुफाओं के नाम से जाना जाता है। इनका नाम सुनते ही लोगों के मन में छिपे हुए सोने और किसी गुप्त खजाने की तस्वीर उभर आती है।

    इनमें से बड़ी गुफा का आकार आयताकार है। इसकी छत ऊपर की ओर नुकीली दिखाई देती है और प्रवेश द्वार भी खास बनावट वाला है। गुफा के भीतर की चट्टानों को बेहद चिकना बनाया गया है। सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है इसकी पिछली दीवार, जिसे लेकर दावा किया जाता है कि इसके पीछे किसी खजाने तक पहुंचने का रास्ता मौजूद है।

    हालांकि, अब तक इस दीवार के पीछे किसी खजाने या गुप्त तहखाने के होने की पुष्टि नहीं हुई है।

    राजा बिंबिसार और छिपे हुए खजाने की कहानी

    सोन भंडार गुफाओं से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानी मगध के प्राचीन राजा बिंबिसार की है। बिंबिसार का नाम भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के समकालीन शासकों में लिया जाता है।

    स्थानीय किंवदंती के अनुसार, जीवन के अंतिम दौर में राजा बिंबिसार सांसारिक मोह-माया से दूर होकर अपनी संपत्ति दान करना चाहते थे। लेकिन उनके बेटे अजातशत्रु की महत्वाकांक्षाएं अलग थीं। कहानी में बताया जाता है कि अजातशत्रु ने सत्ता अपने हाथ में ले ली और अपने पिता को कैद कर लिया।

    कहा जाता है कि राजा की संपत्ति को अपने कब्जे में जाने से बचाने के लिए उनकी रानी ने सोने और दूसरे कीमती सामान को पहाड़ियों में बनी एक गुफा के भीतर छिपा दिया। इसके बाद उस स्थान को पत्थर से बंद कर दिया गया।

    इसी कहानी के कारण इन गुफाओं को सोन भंडार यानी सोने का भंडार कहा जाने लगा। हालांकि, खजाने को छिपाने वाली इस घटना का ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

    दीवार पर लिखे रहस्यमयी अक्षरों का क्या है राज?

    गुफा की दीवार पर एक प्राचीन और सजावटी लिपि में लिखे अक्षर भी दिखाई देते हैं। इनके घुमावदार आकार के कारण इन्हें शंखलिपि कहा जाता है। इस लिपि के बारे में स्थानीय मान्यता है कि इसमें खजाने तक पहुंचने का रहस्य छिपा है।

    कहानी के अनुसार, जो व्यक्ति इन अक्षरों का सही अर्थ समझ लेगा, वह गुप्त दरवाजे को खोलने का तरीका जान सकता है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई प्रमाण नहीं है।

    गुफा में एक दूसरा शिलालेख भी है, जिसे पढ़ा जा सकता है। यह गुप्तकालीन लिपि में है और इसमें वैरदेव नाम के एक जैन मुनि का उल्लेख मिलता है। इस अभिलेख के आधार पर माना जाता है कि गुफाओं का निर्माण जैन साधुओं के रहने और ध्यान करने के उद्देश्य से कराया गया था।

    इन गुफाओं को आम तौर पर तीसरी या चौथी शताब्दी ईस्वी का माना जाता है, हालांकि कुछ विद्वान इनके निर्माण को इससे भी पुराने समय से जोड़ते हैं।

    क्या अंग्रेजों ने तोप से तोड़ने की कोशिश की थी?

    सोन भंडार गुफाओं से जुड़ी एक और चर्चित कहानी अंग्रेजों के समय की है। स्थानीय लोगों और गाइडों के अनुसार, अंग्रेज अधिकारी भी इस कथित खजाने का रहस्य जानना चाहते थे।

    कहानी कहती है कि दीवार के पीछे खजाना होने की बात पर विश्वास करके अंग्रेज सैनिक एक तोप लेकर आए और उन्होंने गुफा की पिछली दीवार पर हमला किया। लेकिन चट्टान नहीं टूटी और खजाना भी बाहर नहीं आया।

    आज भी दीवार पर मौजूद एक निशान को इसी कथित हमले से जोड़कर दिखाया जाता है। हालांकि, इस घटना की पुष्टि करने वाला कोई ठोस समकालीन दस्तावेज सामने नहीं है। इसलिए तोप से हमला करने की कहानी को प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के बजाय स्थानीय परंपरा के रूप में देखना उचित है।

    खजाने के बजाय गुफाओं का ऐतिहासिक महत्व

    सोन भंडार गुफाओं की अहमियत केवल खजाने की कहानी तक सीमित नहीं है। इनकी चट्टानों पर की गई नक्काशी, चिकनी सतह और प्राचीन शिलालेख उस समय की स्थापत्य कला और धार्मिक परंपराओं की जानकारी देते हैं।

    गुफाओं के बाहरी हिस्से में जैन तीर्थंकरों की आकृतियां भी उकेरी गई हैं। ये आकृतियां इस स्थान के जैन धर्म से जुड़े महत्व को दर्शाती हैं। राजगीर का क्षेत्र बौद्ध और जैन दोनों परंपराओं के लिए ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।

    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने यहां किसी छिपे हुए सोने के खजाने की पुष्टि नहीं की है। अब तक न तो कोई प्रमाणित खजाना मिला है और न ही दीवार के पीछे किसी गुप्त तहखाने का प्रमाण सामने आया है।

    आखिर दीवार के पीछे क्या है?

    उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के आधार पर सबसे संभावित व्याख्या यही है कि सोन भंडार गुफाएं जैन साधुओं के निवास और ध्यान के लिए बनाई गई थीं। इनके शिलालेख भी इसी धार्मिक उद्देश्य की ओर संकेत करते हैं।

    राजा बिंबिसार, उनकी रानी और छिपे हुए सोने की कहानी ने इन गुफाओं को रहस्य का रूप दे दिया। दीवार पर मौजूद निशान और प्राचीन लिपि ने इस जिज्ञासा को और बढ़ाया है। लेकिन किसी कहानी का सदियों तक प्रचलित रहना इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसके सभी दावे सच हैं।

    आज भी लोग इस दीवार को देखने और इसके रहस्य के बारे में जानने के लिए राजगीर पहुंचते हैं। खजाना मिले या न मिले, सोन भंडार गुफाएं प्राचीन भारत की कला, धर्म और इतिहास की एक महत्वपूर्ण धरोहर हैं।

    डिस्क्लेमर: इस लेख में खजाने, राजा बिंबिसार और अंग्रेजों द्वारा तोप से हमला करने से जुड़ी बातें स्थानीय किंवदंतियों और प्रचलित विवरणों पर आधारित हैं। छिपे हुए सोने या दीवार के पीछे गुप्त खजाने की मौजूदगी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

  • Vastu Tips: गिफ्ट देते समय इन 5 चीजों का रखें ध्यान, मान्यताओं के अनुसार रिश्तों से जुड़ी हैं ये बातें.

    Vastu Tips: गिफ्ट देते समय इन 5 चीजों का रखें ध्यान, मान्यताओं के अनुसार रिश्तों से जुड़ी हैं ये बातें.

    Vastu Tips: गिफ्ट देते समय इन 5 चीजों का रखें ध्यान, मान्यताओं के अनुसार रिश्तों से जुड़ी हैं ये बातें.

    वास्तु टिप्स: जन्मदिन, शादी, सालगिरह या किसी खास मौके पर अपनों को उपहार देना प्यार और अपनापन जताने का एक खूबसूरत तरीका है। लेकिन वास्तु शास्त्र की कुछ मान्यताओं में ऐसी पांच चीजों का जिक्र मिलता है, जिन्हें उपहार में देना शुभ नहीं माना जाता। इनमें चाकू-कैंची, पर्स, घड़ी, जूते-चप्पल और काले रंग की वस्तुएं शामिल हैं। हालांकि, इन चीजों को गिफ्ट करने से रिश्ते खराब होते हैं या जीवन में परेशानियां आती हैं, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

    1. चाकू और कैंची जैसी नुकीली चीजें

    वास्तु से जुड़ी मान्यताओं में चाकू, कैंची और अन्य धारदार वस्तुओं को उपहार में देने से बचने की सलाह दी जाती है। इन्हें रिश्तों में दूरी या टकराव का प्रतीक माना जाता है।

    हालांकि, वास्तविक जीवन में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि किसी को चाकू या कैंची गिफ्ट करने से रिश्ता टूट सकता है। रसोई के उपयोग या किसी खास जरूरत के लिए ऐसी वस्तुएं उपहार में देना सामान्य बात है। यदि सामने वाले को इनकी जरूरत है, तो उसकी पसंद और सुविधा को प्राथमिकता दें।

    2. पर्स या बटुआ

    पर्स और बटुआ आमतौर पर जन्मदिन या अन्य खास अवसरों पर दिए जाने वाले उपयोगी उपहार हैं। वास्तु की कुछ मान्यताओं में इन्हें उपहार में देने को लेकर सावधानी बरतने की बात कही जाती है, क्योंकि पर्स को धन और आर्थिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है।

    लेकिन पर्स गिफ्ट करने से देने वाले या पाने वाले की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। यदि आप किसी को बटुआ उपहार में दे रहे हैं, तो उसकी पसंद का रंग, डिजाइन और उपयोगिता ध्यान में रख सकते हैं।

    3. घड़ी को लेकर क्या कहती हैं मान्यताएं?

    घड़ी समय का प्रतीक है और इसे एक लोकप्रिय उपहार माना जाता है। हालांकि, कुछ पारंपरिक मान्यताओं में घड़ी उपहार में देने से बचने की सलाह दी जाती है। ऐसी धारणाओं में इसे समय के बीतने या रिश्ते में दूरी आने से जोड़कर देखा जाता है।

    वास्तव में घड़ी देने से रिश्ते पर नकारात्मक असर पड़ता है, ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। किसी को उसकी पसंद की घड़ी देना प्यार, सम्मान और यादगार पलों का प्रतीक भी हो सकता है।

    4. जूते-चप्पल देने से पहले जान लें यह बात

    जूते और चप्पल उपयोगी उपहार हो सकते हैं, खासकर जब आपको सामने वाले की पसंद और सही नाप पता हो। लेकिन वास्तु से जुड़ी कुछ मान्यताओं में इन्हें उपहार में देना शुभ नहीं माना जाता।

    यह धारणा भी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है कि जूते-चप्पल देने से रिश्ते टूट जाते हैं या घर में परेशानियां बढ़ती हैं। यदि आप किसी को फुटवियर गिफ्ट करना चाहते हैं, तो उसकी जरूरत, पसंद और आराम का ध्यान रखें।

    5. काले रंग की वस्तुओं को लेकर मान्यता

    कुछ धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं में काले रंग को नकारात्मकता या अशुभता से जोड़ा जाता है। इसी वजह से कुछ लोग काले रंग के कपड़े या दूसरी वस्तुएं उपहार में देने से बचते हैं।

    हालांकि, काला रंग अपने आप में नकारात्मक ऊर्जा पैदा करता है या इसे गिफ्ट करने से मानसिक तनाव बढ़ता है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। काला रंग कई लोगों की पसंद होता है और फैशन में भी इसका खूब इस्तेमाल किया जाता है। उपहार चुनते समय सामने वाले की पसंद को महत्व देना ज्यादा व्यावहारिक है।

    गिफ्ट देते समय किन बातों का रखें ध्यान?

    • उपहार चुनते समय सामने वाले की पसंद और जरूरत को प्राथमिकता दें।
    • केवल रंग या वस्तु से जुड़ी मान्यताओं के आधार पर किसी के उपहार को अशुभ न मानें।
    • बजट के अनुसार उपयोगी और अर्थपूर्ण चीज चुनें।
    • उपहार के साथ स्नेह और सम्मान व्यक्त करें।
    • यदि सामने वाला किसी धार्मिक या पारंपरिक मान्यता को मानता है, तो उसकी भावनाओं का सम्मान करते हुए उपहार चुन सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख वास्तु शास्त्र और प्रचलित लोक मान्यताओं पर आधारित है। इन पांच वस्तुओं को उपहार में देने से रिश्ते खराब होने, आर्थिक नुकसान या नकारात्मक ऊर्जा बढ़ने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। रिश्तों की मजबूती मुख्य रूप से आपसी सम्मान, विश्वास और संवाद पर निर्भर करती है।

  • कनाडा से रिश्तेदार बनकर आया फोन, बेटे को विदेश भेजने का दिखाया सपना; फर्जी मैसेज के जाल में फंसा बुजुर्ग, 2 लाख रुपये ठगे.

    कनाडा से रिश्तेदार बनकर आया फोन, बेटे को विदेश भेजने का दिखाया सपना; फर्जी मैसेज के जाल में फंसा बुजुर्ग, 2 लाख रुपये ठगे.

    कनाडा से रिश्तेदार बनकर आया फोन, बेटे को विदेश भेजने का दिखाया सपना; फर्जी मैसेज के जाल में फंसा बुजुर्ग, 2 लाख रुपये ठगे.

    मोहाली, पंजाब: बेटे को विदेश भेजने की उम्मीद एक परिवार को इतनी महंगी पड़ेगी, इसका अंदाजा शायद उन्हें नहीं था। साइबर ठगों ने कनाडा में रहने वाला रिश्तेदार बनकर फोन किया और पहले परिवार का भरोसा जीता। फिर बैंक खाते में 10 लाख रुपये आने का फर्जी मैसेज भेजकर उन्हें विश्वास दिलाया कि मदद के लिए रकम भेजी जा रही है। इसके बाद वीजा लगवाने के नाम पर दो लाख रुपये ट्रांसफर करवा लिए। जब ठगों ने और रकम मांगी, तब परिवार को शक हुआ कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है।

    विदेशी नंबर से आया फोन, रिश्तेदार बनकर की बात

    मामला मोहाली के बनूड़ क्षेत्र के गांव मनौली सूरत का है। शिकायत के मुताबिक, 68 वर्षीय बुजुर्ग के परिवार को 24 अगस्त को एक विदेशी नंबर से फोन आया। फोन करने वाले ने अपना नाम अमन बताया और दावा किया कि वह कनाडा में रहता है। उसने परिवार के बेटे को विदेश भेजने में मदद करने की बात कही।

    कथित रिश्तेदार ने यह भी कहा कि वह 6 सितंबर को भारत आएगा और परिवार की महिला सदस्य के बैंक खाते में 10 लाख रुपये भेजेगा। उसकी बातों पर भरोसा करते हुए परिवार ने महिला के एसबीआई खाते की जानकारी साझा कर दी।

    कुछ समय बाद खाते में 10 लाख रुपये आने का संदेश मिला। इससे परिवार को लगा कि फोन करने वाला सचमुच मदद कर रहा है। लेकिन यही भरोसा ठगी के जाल का हिस्सा था।

    बैंक कर्मचारी बनकर भी किया संपर्क

    रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद एक अन्य व्यक्ति ने फोन कर खुद को बैंक कर्मचारी बताया। उसने कहा कि खाते में आई रकम अगले दिन निकाली जा सकेगी। इस बातचीत से परिवार का संदेह दूर करने की कोशिश की गई।

    इसके बाद कथित रिश्तेदार ने वीजा बनवाने के नाम पर दो लाख रुपये मांगे और एक बैंक खाते की जानकारी भेज दी। बेटे को लगा कि विदेश जाने की प्रक्रिया के लिए यह रकम जरूरी है। शिकायत के मुताबिक, उसने अपने पिता के यूनियन बैंक खाते से चेक के माध्यम से दो लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए।

    एक लाख रुपये और मांगे तो खुलने लगा शक

    दो लाख रुपये मिलने के बाद भी ठगों का लालच खत्म नहीं हुआ। उसी शाम कथित रिश्तेदार ने एक लाख रुपये और मांगे। लगातार रकम मांगे जाने पर परिवार को संदेह हुआ और उन्हें एहसास हुआ कि वे साइबर ठगी का शिकार हो सकते हैं।

    परिवार ने मामले की शिकायत पुलिस से की। शुरुआती जांच के बाद साइबर क्राइम थाना पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।

    फोन नंबर और बैंक खातों की जांच में जुटी पुलिस

    पुलिस के अनुसार, 7 अक्टूबर को भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) और 61(2) के साथ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66 के तहत केस दर्ज किया गया। जांच में संबंधित फोन नंबरों, बैंक खातों और पैसों के लेनदेन की पड़ताल की जा रही है।

    यह घटना बताती है कि साइबर ठग अब केवल अनजान लोगों को ही नहीं, बल्कि रिश्तेदार बनकर परिवारों का भरोसा जीतने की कोशिश भी कर रहे हैं। किसी विदेशी नंबर से रिश्तेदार होने का दावा करने वाले व्यक्ति को बिना पुष्टि के पैसे भेजना जोखिम भरा हो सकता है। बैंक खाते में रकम आने का संदेश मिलने पर भी वास्तविक बैलेंस और लेनदेन की पुष्टि बैंक के आधिकारिक माध्यम से करनी चाहिए।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध रिपोर्ट और शिकायत में बताए गए विवरण पर आधारित है। मामले में आरोपियों की पहचान और धोखाधड़ी से जुड़ी पूरी सच्चाई पुलिस जांच के बाद स्पष्ट होगी।

  • शेयर बाजार में जोरदार उछाल, 12 अक्टूबर को कैसी रहेगी बाजार की चाल? निफ्टी के सामने 22,600 का अहम स्तर.

    शेयर बाजार में जोरदार उछाल, 12 अक्टूबर को कैसी रहेगी बाजार की चाल? निफ्टी के सामने 22,600 का अहम स्तर.

    शेयर बाजार में जोरदार उछाल, 12 अक्टूबर को कैसी रहेगी बाजार की चाल? निफ्टी के सामने 22,600 का अहम स्तर.

    शेयर बाजार आउटलुक: भारतीय शेयर बाजार में शुक्रवार को जोरदार तेजी देखने को मिली। हालिया गिरावट के बाद सेंसेक्स और निफ्टी में अच्छी रिकवरी दर्ज की गई। आईटी, एफएमसीजी और सरकारी बैंकों के शेयरों में खरीदारी से बाजार को सहारा मिला। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले कारोबारी सत्र में बाजार की दिशा कई अहम स्तरों, कंपनियों के तिमाही नतीजों और महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर करेगी।

    सेंसेक्स और निफ्टी में शानदार तेजी

    शुक्रवार को कारोबार के अंत में सेंसेक्स 879 अंक यानी 1.23 प्रतिशत की बढ़त के साथ 72,472 अंक पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी 289 अंक यानी 1.30 प्रतिशत चढ़कर 22,520 के स्तर पर पहुंच गया। बाजार में तेजी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 2,344 शेयर बढ़त के साथ बंद हुए, जबकि 1,686 शेयरों में गिरावट दर्ज की गई।

    सेक्टर के लिहाज से आईटी शेयरों ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया और इस क्षेत्र में 3.02 प्रतिशत की तेजी आई। एफएमसीजी सेक्टर में 2.25 प्रतिशत और सरकारी बैंकों के शेयरों में 1.62 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई। मिडकैप शेयर 1.46 प्रतिशत और स्मॉलकैप शेयर 0.55 प्रतिशत चढ़े। बाजार में उतार-चढ़ाव को दर्शाने वाले इंडिया वीआईएक्स में भी 6.09 प्रतिशत की गिरावट आई। टीसीएस, आईटीसी और अपोलो हॉस्पिटल्स के शेयरों में 4 प्रतिशत से अधिक की तेजी देखने को मिली।

    खरीदारी और शॉर्ट कवरिंग से बाजार को मिला सहारा

    जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च प्रमुख विनोद नायर के मुताबिक, हाल में आई तेज गिरावट के बाद निवेशकों ने चुनिंदा शेयरों में खरीदारी की। इसके साथ ही शॉर्ट कवरिंग ने भी बाजार की तेजी को समर्थन दिया। कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजों की शुरुआत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई से जुड़ी कारोबारी संभावनाओं के कारण आईटी शेयरों में खास दिलचस्पी दिखाई दी।

    कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और भू-राजनीतिक चिंताओं में कमी से भी निवेशकों की धारणा में सुधार हुआ। हालांकि, विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली और वैश्विक बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी बाजार के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। निवेशकों की नजर अब घरेलू महंगाई के आंकड़ों और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर रहेगी।

    निफ्टी के लिए 22,600 का स्तर क्यों है अहम?

    एलकेपी सिक्योरिटीज के वरिष्ठ तकनीकी विश्लेषक रूपक डे के अनुसार, निफ्टी में अच्छी रिकवरी जरूर आई है, लेकिन इंडेक्स 22,600 के आसपास मौजूद 50-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज के स्तर को पार नहीं कर पाया।

    उनके मुताबिक, अगर निफ्टी 22,600 से 22,650 के रेजिस्टेंस जोन के ऊपर टिकने में सफल रहता है, तो बाजार में रिकवरी आगे बढ़ सकती है। इसके विपरीत, इस स्तर को पार करने में नाकाम रहने पर दोबारा कमजोरी देखने को मिल सकती है।

    निफ्टी के लिए 22,450, 22,350 और 22,100 के स्तर अहम सपोर्ट माने जा रहे हैं। निवेशकों को इन स्तरों के साथ बाजार में आने वाली नई हलचल पर भी नजर रखनी होगी।

    बाजार में अभी और उतार-चढ़ाव की आशंका

    360 वन वेल्थ की अध्यक्ष अनु जैन ने बाजार की लंबी अवधि की तकनीकी स्थिति को लेकर चिंता जताई। उनके अनुसार, बाजार का 200-सप्ताह के मूविंग एवरेज से नीचे आना कमजोरी का संकेत हो सकता है। ऐसे में बाजार में कुछ समय तक और गिरावट या सीमित दायरे में कारोबार देखने को मिल सकता है।

    बजाज ऑल्ट्स की निवेश प्रमुख लक्ष्मी अय्यर का मानना है कि पहले आई असामान्य तेजी के बाद बाजार में सुधार की प्रक्रिया जारी है। निवेशकों को मजबूत स्थिति लौटने से पहले उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने मौजूदा हालात की तुलना समुद्र मंथन से करते हुए संकेत दिया कि बेहतर अवसर सामने आने से पहले बाजार को मुश्किल दौर से गुजरना पड़ सकता है।

    मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में सोच-समझकर निवेश जरूरी

    विशेषज्ञों के मुताबिक, बाजार के सभी हिस्सों में वैल्यूएशन अभी आकर्षक नहीं हैं। बड़े शेयरों यानी लार्जकैप में मूल्यांकन अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई दे रहा है, लेकिन मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में अब भी सावधानी बरतने की जरूरत है।

    लक्ष्मी अय्यर के अनुसार, मिडकैप शेयर लार्जकैप की तुलना में लगभग 55 से 60 प्रतिशत प्रीमियम पर कारोबार कर रहे हैं। स्मॉलकैप शेयरों में भी इसी तरह का प्रीमियम देखा जा रहा है। हालांकि, कुछ मध्यम आकार की कंपनियों की कमाई मजबूत बनी हुई है। इसलिए मौजूदा बाजार में बिना विश्लेषण के खरीदारी करने के बजाय कंपनियों की वित्तीय स्थिति और मूल्यांकन को देखकर निवेश करना अहम हो सकता है।

    विदेशी निवेशकों की नजर में भारत की स्थिति

    नुवामा एसेट मैनेजमेंट के अध्यक्ष अंशु कपूर के अनुसार, वैश्विक निवेशकों को फिलहाल दूसरे बाजारों में तुलनात्मक रूप से बेहतर अवसर दिखाई दे रहे हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय बाजार का दीर्घकालिक आकर्षण समाप्त हो गया है, लेकिन निकट भविष्य में उतार-चढ़ाव बने रहने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

    12 अक्टूबर को बाजार की चाल किन बातों पर निर्भर करेगी?

    12 अक्टूबर को बाजार की दिशा समझने के लिए निवेशकों को कुछ प्रमुख संकेतकों पर नजर रखनी चाहिए:

    • निफ्टी का रेजिस्टेंस: 22,600 से 22,650 के स्तर के ऊपर टिकना तेजी को मजबूती दे सकता है।
    • महंगाई के आंकड़े: घरेलू सीपीआई आंकड़े ब्याज दरों और बाजार की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं।
    • कंपनियों के नतीजे: दूसरी तिमाही के परिणामों से शेयरों की चाल प्रभावित हो सकती है।
    • विदेशी निवेशकों की गतिविधियां: एफआईआई की खरीदारी या बिकवाली बाजार की दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।
    • वैश्विक संकेत: कच्चे तेल की कीमतें, बॉन्ड यील्ड और भू-राजनीतिक घटनाक्रम भी बाजार पर असर डाल सकते हैं।

    कुल मिलाकर, शुक्रवार की तेजी से बाजार को राहत जरूर मिली है, लेकिन इसे मजबूत तेजी की शुरुआत मानने से पहले निफ्टी के अहम प्रतिरोध स्तरों पर नजर रखना जरूरी होगा। निवेशकों के लिए जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय जोखिम, मूल्यांकन और अपनी निवेश अवधि को ध्यान में रखना बेहतर रहेगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख बाजार से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों और विशेषज्ञों के विचारों पर आधारित है। इसे निवेश की सलाह न समझें। शेयर बाजार में निवेश जोखिम के अधीन है। निवेश का कोई भी निर्णय लेने से पहले प्रमाणित वित्तीय सलाहकार से परामर्श करें।

  • अकबर की दहसाला व्यवस्था कैसे काम करती थी? 10 साल की औसत उपज से तय होता था किसानों का लगान, जानिए टोडरमल की राजस्व नीति.

    अकबर की दहसाला व्यवस्था कैसे काम करती थी? 10 साल की औसत उपज से तय होता था किसानों का लगान, जानिए टोडरमल की राजस्व नीति.

    अकबर की दहसाला व्यवस्था कैसे काम करती थी? 10 साल की औसत उपज से तय होता था किसानों का लगान, जानिए टोडरमल की राजस्व नीति.

    मुगलकालीन भारत: सम्राट अकबर के शासन में भूमि से मिलने वाला राजस्व साम्राज्य की अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था। सेना के खर्च, प्रशासन और शाही दरबार को चलाने के लिए सरकार को नियमित आय की जरूरत थी। इसी उद्देश्य से भूमि की माप, उपज के आकलन और लगान तय करने की व्यवस्थाओं को व्यवस्थित किया गया। इनमें दहसाला व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्थान था, जिसे राजा टोडरमल से जोड़ा जाता है।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य खेती से होने वाली आय का अनुमान लगाकर राजस्व निर्धारित करना था, ताकि हर साल फसल की पैदावार और बाजार में कीमतों के बदलाव से पैदा होने वाली अनिश्चितता कुछ कम हो सके।

    क्या थी अकबर की दहसाला व्यवस्था?

    दहसाला व्यवस्था में आम तौर पर पिछले दस वर्षों की कृषि उपज और फसलों की कीमतों के आंकड़ों का औसत लेकर नकद लगान की दर निर्धारित की जाती थी। दस वर्षों के आंकड़ों के इस्तेमाल के कारण इसे दहसाला कहा गया।

    इस पद्धति के तहत प्रशासन अलग-अलग फसलों की पैदावार और उनके बाजार मूल्य का हिसाब रखता था। इन आंकड़ों के आधार पर भूमि से मिलने वाले संभावित राजस्व का अनुमान लगाया जाता था और फिर लगान तय किया जाता था।

    इससे राज्य को आय का अधिक व्यवस्थित अनुमान मिलता था। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं था कि हर किसान और हर क्षेत्र पर एक जैसी दर लागू होती थी। स्थानीय परिस्थितियों, खेती के प्रकार और प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार अंतर बना रहता था।

    राजा टोडरमल की क्या थी भूमिका?

    राजा टोडरमल अकबर के प्रशासन में राजस्व व्यवस्था से जुड़े प्रमुख अधिकारियों में गिने जाते हैं। भूमि की माप, कृषि योग्य जमीन का वर्गीकरण और राजस्व निर्धारण को व्यवस्थित करने में उनका नाम विशेष रूप से लिया जाता है।

    भूमि की माप के लिए जरीब जैसी माप इकाइयों का उपयोग किया जाता था। जमीन का क्षेत्रफल दर्ज करने और उसकी कृषि क्षमता का आकलन करने से प्रशासन को यह समझने में मदद मिलती थी कि किस इलाके से कितना राजस्व मिलने की संभावना है।

    इन सुधारों ने भूमि और राजस्व से जुड़े रिकॉर्ड को अधिक व्यवस्थित बनाने में भूमिका निभाई। हालांकि, मुगल राजस्व व्यवस्था का विकास एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया थी; इसे केवल एक व्यक्ति के अकेले प्रयास का परिणाम मानना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

    जमीन को चार श्रेणियों में बांटा गया था

    भूमि की खेती की स्थिति और उपयोग की नियमितता को समझने के लिए उसे अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता था। इनमें प्रमुख थीं:

    1. पोलज: ऐसी जमीन जिस पर नियमित रूप से खेती की जाती थी और जिसे आम तौर पर हर साल बोया जाता था।

    2. परौती: ऐसी जमीन जिसे कुछ समय के लिए खेती से खाली छोड़ दिया जाता था, ताकि उसे फिर से खेती के योग्य बनाया जा सके।

    3. चाचर: ऐसी भूमि जो कई वर्षों तक खेती से खाली रहने के बाद दोबारा खेती में लाई जाती थी।

    4. बंजर: ऐसी जमीन जिस पर लंबे समय से खेती नहीं हो रही थी या जो खेती के लिए अनुपयोगी अथवा कठिन मानी जाती थी।

    इस वर्गीकरण से प्रशासन को जमीन के उपयोग और उसकी कृषि स्थिति का अनुमान लगाने में मदद मिलती थी। अलग-अलग प्रकार की भूमि की उत्पादकता समझना राजस्व निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण था।

    क्या पूरे मुगल साम्राज्य में एक ही व्यवस्था लागू थी?

    नहीं। दहसाला और जब्त जैसी व्यवस्थाएं उन क्षेत्रों में अधिक प्रभावी थीं, जहां भूमि की माप, उपज और कीमतों के पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध थे। लेकिन पूरे मुगल साम्राज्य में कृषि की परिस्थितियां एक जैसी नहीं थीं।

    कुछ क्षेत्रों में बटाई यानी उपज के हिस्से के आधार पर राजस्व लिया जाता था। कहीं नस्क जैसी आकलन पद्धतियों और स्थानीय व्यवस्थाओं का इस्तेमाल भी होता था। इस कारण मुगल प्रशासन को अलग-अलग क्षेत्रों की परिस्थितियों के अनुसार राजस्व वसूलने के तरीके अपनाने पड़ते थे।

    किसानों पर क्या पड़ता था इसका असर?

    दहसाला व्यवस्था का एक उद्देश्य राजस्व निर्धारण को अधिक अनुमान योग्य बनाना था। लेकिन किसानों के लिए इसका अनुभव हमेशा आसान नहीं रहा होगा।

    यदि किसी वर्ष फसल खराब हो जाती, पैदावार घट जाती या किसान को नकद भुगतान करने में कठिनाई होती, तो तय लगान चुकाना बोझ बन सकता था। स्थानीय अधिकारियों की कठोरता और वसूली के तरीकों से भी किसानों पर दबाव पड़ने की आशंका रहती थी।

    इसलिए इस व्यवस्था को केवल एक आदर्श सुधार या केवल किसानों के शोषण का माध्यम कहना सही नहीं होगा। इसका प्रभाव क्षेत्र, फसल, प्रशासनिक व्यवहार और उस समय की आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करता था।

    अकबर की राजस्व नीति का ऐतिहासिक महत्व

    दहसाला व्यवस्था ने भूमि की माप, कृषि उपज के आंकड़ों और कीमतों के औसत को राजस्व निर्धारण से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे मुगल प्रशासन को अपनी आय का अनुमान लगाने और राजस्व संबंधी रिकॉर्ड व्यवस्थित करने में मदद मिली।

    फिर भी, यह व्यवस्था हर क्षेत्र में समान रूप से लागू नहीं थी और न ही इससे किसानों की सभी समस्याएं समाप्त हो गई थीं। इसे समझने के लिए प्रशासनिक जरूरतों, कृषि की वास्तविक परिस्थितियों और किसानों पर पड़ने वाले प्रभाव—तीनों को ध्यान में रखना जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख अकबरकालीन भूमि-राजस्व व्यवस्था का सामान्य ऐतिहासिक विवरण है। अलग-अलग क्षेत्रों में लागू नियमों और उनके प्रभावों में अंतर हो सकता था।

  • खूबसूरत बहु को देख डोला ससुर का दिल, बेटे की दुल्हनिया से कर लिया निकाह, गांव में मचा हड़कंप.

    खूबसूरत बहु को देख डोला ससुर का दिल, बेटे की दुल्हनिया से कर लिया निकाह, गांव में मचा हड़कंप.

    खूबसूरत बहु को देख डोला ससुर का दिल, बेटे की दुल्हनिया से कर लिया निकाह, गांव में मचा हड़कंप.

    छत्तीसगढ़: बेटे की शादी के बाद उसी की पत्नी से ससुर के निकाह करने की एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। इस घटना को लेकर गांव में चर्चा तेज होने का दावा किया जा रहा है। हालांकि, फिलहाल उपलब्ध जानकारी में घटना की सही जगह, निकाह की परिस्थितियों और संबंधित लोगों के पक्ष का विवरण नहीं मिला है।

    रिश्ते को लेकर उठे सवाल

    खबर के शीर्षक में दावा किया गया है कि ससुर ने अपने बेटे की दुल्हन से निकाह कर लिया। यदि यह दावा सही है, तो मामला पारिवारिक रिश्तों और विवाह से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। लेकिन केवल शीर्षक के आधार पर घटना की पूरी कहानी या इसके पीछे की वजह बताना उचित नहीं होगा।

    पूरी जानकारी की पुष्टि जरूरी

    इस मामले में संबंधित परिवार की स्थिति, महिला की सहमति, निकाह की परिस्थितियों और स्थानीय प्रशासन की प्रतिक्रिया जैसी अहम जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए घटना को लेकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले विश्वसनीय विवरण की पुष्टि जरूरी है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध शीर्षक के आधार पर तैयार किया गया है। घटना की स्वतंत्र पुष्टि और विस्तृत जानकारी उपलब्ध न होने के कारण इसमें किए गए दावों को सत्यापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

  • गले में बार-बार जमा होता है बलगम? इन 5 चीजों पर रखें नजर, जानें कौन-से फूड्स बढ़ा सकते हैं परेशानी और कैसे मिलेगी राहत.

    गले में बार-बार जमा होता है बलगम? इन 5 चीजों पर रखें नजर, जानें कौन-से फूड्स बढ़ा सकते हैं परेशानी और कैसे मिलेगी राहत.

    गले में बार-बार जमा होता है बलगम? इन 5 चीजों पर रखें नजर, जानें कौन-से फूड्स बढ़ा सकते हैं परेशानी और कैसे मिलेगी राहत.

    गले में बलगम जमा होना, बार-बार गला साफ करने की जरूरत महसूस होना या सुबह उठते ही खांसी आना कई लोगों की आम परेशानी है। बलगम यानी म्यूकस शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा है। यह नाक, गले और सांस की नलियों को नम रखने के साथ धूल, कीटाणुओं और दूसरे बाहरी कणों को बाहर निकालने में मदद करता है। लेकिन जब बलगम ज्यादा महसूस होने लगे या गाढ़ा होकर गले में अटकने लगे, तो रोजमर्रा के कामों में परेशानी हो सकती है।

    सर्दी-जुकाम, एलर्जी, साइनस की समस्या और नाक से गले की ओर म्यूकस बहने जैसी स्थितियां इसकी वजह हो सकती हैं। कुछ लोगों को खानपान की कुछ चीजों से भी परेशानी महसूस होती है। हालांकि, यह मानना सही नहीं है कि हर व्यक्ति में कुछ खास खाद्य पदार्थ सीधे बलगम का उत्पादन बढ़ाते हैं। आइए जानते हैं किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए और राहत पाने के लिए क्या किया जा सकता है।

    1. दूध और डेयरी उत्पाद

    दूध, पनीर, दही और चीज जैसे डेयरी उत्पादों को अक्सर बलगम बढ़ने से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण यह साबित नहीं करते कि दूध सामान्य रूप से शरीर में बलगम का उत्पादन बढ़ाता है।

    कुछ लोगों को दूध पीने के बाद मुंह या गले में गाढ़ी परत जैसा एहसास हो सकता है। यह दूध की बनावट के कारण भी हो सकता है, न कि वास्तव में बलगम बनने की मात्रा बढ़ने के कारण।

    अगर आपको लगता है कि किसी खास डेयरी उत्पाद से परेशानी बढ़ती है, तो अपने लक्षणों पर ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ से सलाह लें। बिना कारण दूध और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थों को पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है।

    2. ज्यादा चीनी और पैकेटबंद खाद्य पदार्थ

    मिठाइयां, मीठे पेय, बिस्कुट और ज्यादा चीनी वाले पैकेटबंद खाद्य पदार्थ सीमित मात्रा में खाना बेहतर है। इनमें से कई चीजों में अतिरिक्त चीनी, नमक या संतृप्त वसा की मात्रा ज्यादा हो सकती है।

    हालांकि, यह दावा कि चीनी खाते ही बलगम बढ़ जाता है या शरीर में पानी की कमी होने लगती है, सभी लोगों के लिए सही नहीं है। बलगम की परेशानी को केवल चीनी से जोड़ने के बजाय अपने संपूर्ण खानपान, पानी के सेवन और दूसरे लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए।

    3. तली-भुनी चीजें और ज्यादा वसा वाला भोजन

    समोसे, पकौड़े, फ्रेंच फ्राइज और बहुत ज्यादा वसा वाले भोजन को नियमित रूप से अधिक मात्रा में खाना सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि तली-भुनी चीजें सीधे बलगम का उत्पादन बढ़ाती हैं।

    कुछ लोगों में भारी या तैलीय भोजन एसिड रिफ्लक्स की परेशानी बढ़ा सकता है। एसिड रिफ्लक्स में पेट का एसिड गले तक पहुंचने से खांसी, गले में जलन या बार-बार गला साफ करने की समस्या हो सकती है। यदि खाने के बाद ऐसे लक्षण बढ़ते हैं, तो भोजन की मात्रा कम रखना और खाने के तुरंत बाद न लेटना मददगार हो सकता है।

    4. रेड मीट और प्रोसेस्ड मीट

    बीफ, पोर्क और लैम्ब जैसे रेड मीट के साथ-साथ सॉसेज और बेकन जैसे प्रोसेस्ड मीट का अधिक सेवन सीमित रखना बेहतर है। खासकर प्रोसेस्ड मीट का नियमित अधिक सेवन कई स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है।

    हालांकि, रेड मीट खाने से सीधे बलगम ज्यादा बनने लगता है, इसका ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। यदि आपको गले में बलगम की शिकायत है, तो केवल मीट को दोष देने के बजाय एलर्जी, संक्रमण, साइनस और एसिड रिफ्लक्स जैसे संभावित कारणों पर भी ध्यान देना जरूरी है।

    5. चाय, कॉफी और अल्कोहल

    चाय और कॉफी में कैफीन होता है। सामान्य मात्रा में कैफीन लेने से हर व्यक्ति में शरीर में पानी की कमी नहीं होती, लेकिन बहुत अधिक कैफीन लेने से कुछ लोगों को परेशानी हो सकती है। अल्कोहल का सेवन भी कुछ लोगों में गले में जलन या एसिड रिफ्लक्स के लक्षण बढ़ा सकता है।

    यदि चाय, कॉफी या अल्कोहल लेने के बाद गले में परेशानी महसूस होती है, तो इसकी मात्रा कम करके देखें। पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, क्योंकि शरीर में पानी की कमी होने पर म्यूकस गाढ़ा महसूस हो सकता है।

    बलगम कम करने के लिए क्या करें?

    पर्याप्त पानी पिएं

    दिनभर नियमित रूप से पानी पीते रहें। पर्याप्त तरल पदार्थ म्यूकस को कम गाढ़ा रखने में मदद कर सकते हैं, जिससे उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। जरूरत हर व्यक्ति की उम्र, गतिविधि, मौसम और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकती है।

    गर्म पेय से मिल सकती है राहत

    गुनगुना पानी या गर्म सूप गले को आराम दे सकता है। अदरक या पुदीने की चाय भी कुछ लोगों को सुखद लग सकती है, लेकिन इन्हें बलगम का प्रमाणित इलाज नहीं मानना चाहिए।

    नाक की सफाई पर ध्यान दें

    यदि नाक से म्यूकस गले में गिरता रहता है, तो सलाइन नेजल स्प्रे या सलाइन से नाक की सफाई कुछ लोगों को राहत दे सकती है। नाक धोने के लिए केवल स्टेराइल, डिस्टिल्ड या उबालकर ठंडा किया हुआ पानी इस्तेमाल करें। सामान्य नल का पानी सीधे नाक में इस्तेमाल न करें।

    भाप लेते समय सावधानी बरतें

    गर्म भाप से कुछ लोगों को अस्थायी आराम महसूस हो सकता है, लेकिन उबलते पानी के बर्तन के ऊपर झुककर भाप लेना जलने का जोखिम पैदा करता है। इसलिए इस तरीके से बचें। कमरे में हवा की नमी उचित रखना या गर्म शॉवर लेना अधिक सुरक्षित विकल्प हो सकता है। यूकेलिप्टस या दूसरे एसेंशियल ऑयल हर किसी के लिए सुरक्षित नहीं होते और संवेदनशील लोगों में जलन पैदा कर सकते हैं।

    शहद का इस्तेमाल कब करें?

    एक साल से अधिक उम्र के लोगों में शहद खांसी को कुछ हद तक शांत करने में मदद कर सकता है। लेकिन एक साल से कम उम्र के बच्चों को शहद बिल्कुल न दें। डायबिटीज वाले लोग शहद को भी चीनी के स्रोत के रूप में ध्यान में रखें।

    कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

    यदि बलगम लंबे समय तक बना रहे, बार-बार लौट आए या उसके साथ अन्य लक्षण हों, तो चिकित्सकीय जांच कराना उचित है। खासकर इन स्थितियों में डॉक्टर से सलाह लें:

    • कई सप्ताह तक खांसी या बलगम बना रहना।
    • बार-बार बुखार आना या सीने में दर्द होना।
    • बलगम में खून दिखाई देना।
    • बिना वजह वजन कम होना या लगातार कमजोरी महसूस होना।
    • सांस लेने में परेशानी होना।

    यदि सांस लेने में गंभीर कठिनाई हो या सीने में तेज दर्द हो, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें।

    निष्कर्ष

    गले में बलगम जमा होने की वजह हमेशा खानपान नहीं होती। सर्दी-जुकाम, एलर्जी, साइनस की समस्या और एसिड रिफ्लक्स भी इसके कारण हो सकते हैं। दूध, चीनी या तली-भुनी चीजों को सभी लोगों के लिए बलगम बढ़ाने वाला मानने के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। बेहतर है कि संतुलित भोजन करें, पर्याप्त पानी पिएं और जिन चीजों से व्यक्तिगत रूप से परेशानी बढ़ती है, उन पर ध्यान दें।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है, व्यक्तिगत चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं। बलगम या खांसी लंबे समय तक बनी रहे, बढ़ती जाए या सांस लेने में परेशानी हो, तो योग्य डॉक्टर से परामर्श लें। अपनी डाइट में बड़े बदलाव करने से पहले भी स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।

  • नवादा में रेलवे ट्रैक पर रील बनाने का मामला आया सामने, वायरल क्लिप के बाद RPF ने शुरू की जांच.

    नवादा में रेलवे ट्रैक पर रील बनाने का मामला आया सामने, वायरल क्लिप के बाद RPF ने शुरू की जांच.

    नवादा में रेलवे ट्रैक पर रील बनाने का मामला आया सामने, वायरल क्लिप के बाद RPF ने शुरू की जांच.

    नवादा, बिहार: सोशल मीडिया पर लोकप्रियता पाने के लिए खतरनाक जगहों पर रील बनाने का चलन लोगों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर रहा है। बिहार के नवादा क्षेत्र से जुड़ा ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां एक महिला रेलवे ट्रैक पर खड़ी होकर रील बनाती दिखाई देने का दावा किया जा रहा है। इस क्लिप के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद रेलवे सुरक्षा बल (RPF) ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच शुरू कर दी।

    रेलवे लाइन पर खड़ी होकर बना रही थी रील

    सोशल मीडिया पर प्रसारित क्लिप में एक महिला रेलवे ट्रैक पर खड़ी दिखाई देती है। रिपोर्ट के मुताबिक, महिला कथित तौर पर कैमरे के सामने कहती सुनाई देती है कि उसे किसी का डर नहीं है। हालांकि, वायरल क्लिप के आधार पर घटना के समय, स्थान और परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    रेलवे ट्रैक पर इस तरह खड़े होकर रील बनाना बेहद खतरनाक हो सकता है। ट्रेन अचानक पहुंच सकती है और तेज रफ्तार से गुजरती ट्रेन से सुरक्षित दूरी बनाए रखना जरूरी होता है। कुछ सेकंड की लापरवाही भी गंभीर हादसे की वजह बन सकती है।

    वायरल क्लिप के बाद RPF ने लिया संज्ञान

    मामले की जानकारी सामने आने के बाद रेलवे सुरक्षा बल ने जांच शुरू की। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, महिला के खिलाफ शिकायत दर्ज किए जाने की बात कही गई है और आवश्यक कार्रवाई के लिए संबंधित अधिकारियों को सूचित किया गया है।

    जांच के तहत वायरल क्लिप और उससे जुड़ी सोशल मीडिया जानकारी की पड़ताल की जा रही है। महिला की पहचान का पता लगाने की भी कोशिश की जा रही है। फिलहाल मामले में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगी।

    रेलवे ट्रैक पर रील बनाना क्यों है खतरनाक?

    रेलवे लाइन यात्रियों और ट्रेनों की सुरक्षित आवाजाही के लिए होती है, न कि फोटो या रील बनाने के लिए। ट्रैक पर खड़े होकर मोबाइल से रिकॉर्डिंग करने के दौरान व्यक्ति का ध्यान आसपास की गतिविधियों से हट सकता है। कई बार ट्रेन की आवाज सुनाई देने के बावजूद उसकी गति और दूरी का सही अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

    सोशल मीडिया पर लाइक और फॉलोअर्स पाने के लिए जोखिम उठाना जानलेवा साबित हो सकता है। लोगों को रेलवे ट्रैक और प्रतिबंधित रेल क्षेत्रों में जाने से बचना चाहिए तथा ऐसी कोई गतिविधि दिखाई देने पर संबंधित रेलवे अधिकारियों को सूचना देनी चाहिए।

    जांच के बाद स्पष्ट होगी आगे की कार्रवाई

    इस घटना ने एक बार फिर सोशल मीडिया के लिए खतरनाक स्टंट और रील बनाने के चलन पर चर्चा शुरू कर दी है। हालांकि, वायरल क्लिप सामने आने का मतलब यह नहीं है कि उससे जुड़े सभी दावे अपने आप साबित हो जाते हैं। घटना की वास्तविक परिस्थितियों और संबंधित व्यक्ति की पहचान की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध रिपोर्टों और वायरल क्लिप से जुड़ी जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में किसी व्यक्ति की जिम्मेदारी और आगे की कार्रवाई संबंधित अधिकारियों की जांच के आधार पर तय होगी।

  • ओडिशा के आदिवासी किसान ने 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में, 80 किसानों को भी जोड़ा.

    ओडिशा के आदिवासी किसान ने 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में, 80 किसानों को भी जोड़ा.

    ओडिशा के आदिवासी किसान ने 10 साल में बचाईं धान की 110 देशी किस्में, 80 किसानों को भी जोड़ा.

    सुंदरगढ़, ओडिशा: आधुनिक खेती में अधिक उत्पादन देने वाली धान की किस्मों का चलन बढ़ने के साथ कई पारंपरिक बीज धीरे-धीरे खेतों से गायब होने लगे। लेकिन ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के एक आदिवासी किसान ने इन देशी किस्मों को बचाने की जिम्मेदारी उठाई। करीब एक दशक की मेहनत से उन्होंने धान की 100 से ज्यादा पारंपरिक किस्मों को संरक्षित किया और आसपास के किसानों को भी इस मुहिम से जोड़ा।

    सुंदरगढ़ जिले के धारूडीही गांव के किसान सुरथा किसान ने वर्ष 2014-15 में सिंग्हा बाहिनी सीड बैंक (SBSB) की स्थापना की। उनका मकसद उन पारंपरिक बीजों को बचाना था, जिनका इस्तेमाल स्थानीय किसान लंबे समय से करते आए थे, लेकिन जिनकी खेती धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।

    35 किस्मों से शुरू हुआ सफर, अब 110 देशी धान के बीज

    सुरथा ने संबलपुर स्थित गैर-सरकारी संगठन देसी बिहाना सुरक्षा मंच (DBSM) के सहयोग से बीज संरक्षण का काम शुरू किया। शुरुआत में उनके बीज बैंक में धान की 35 देशी किस्में थीं। समय के साथ यह संग्रह बढ़ता गया और अब इसमें धान की करीब 110 पारंपरिक किस्में संरक्षित हैं।

    धान के अलावा बीज बैंक में छह देशी दलहन किस्मों, मोटे अनाज की 18 किस्मों, सब्जियों की 10 किस्मों और तिलहन की दो किस्मों के बीज भी रखे गए हैं। इस पहल से अब करीब 80 सक्रिय किसान जुड़े हुए हैं, जो देशी बीजों को बचाने और खेती में उनका इस्तेमाल बढ़ाने में योगदान दे रहे हैं।

    काला जीरा से लाल जुईगुड़ा तक, कई पारंपरिक किस्में सुरक्षित

    सुरथा के बीज बैंक में धान की कई पारंपरिक किस्में शामिल हैं। इनमें काला काला जीरा, बारीक सुनाकठी, लाल लुसुरी, काली कलाबती, बारीक मच्छकांता, लाल जुईगुड़ा और कटिया जैसी किस्में शामिल हैं। सुगंधित कर्पूर क्रांति भी इस संग्रह का हिस्सा है।

    बीज बैंक में केवल धान ही नहीं, बल्कि लाल भिंडी, तुरई, खीरा, टमाटर, करेला और लोबिया जैसी सब्जियों के देशी बीज भी संरक्षित किए जाते हैं। इसका उद्देश्य खेती में फसलों की विविधता बनाए रखना और किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल बीज उपलब्ध कराना है।

    पिता ने भी बदली थी खेती की पद्धति

    सुरथा के दिवंगत पिता बनेश्वर किसान करीब पांच एकड़ जमीन पर नीलमणि, भोस्का और बांसभोट्टा जैसी देशी धान की किस्में उगाते थे। हालांकि, वर्ष 1995 में अधिक उत्पादन पाने की उम्मीद में उन्होंने स्वर्णा और प्रतीक्षा जैसी अधिक उपज देने वाली किस्मों की खेती शुरू कर दी।

    इस बारिश पर निर्भर क्षेत्र में अधिक उपज वाली किस्मों से प्रति एकड़ करीब 12 से 14 क्विंटल धान उत्पादन होता है, जबकि देशी किस्मों से लगभग 8 से 10 क्विंटल उपज मिलती है। हालांकि, खेती का परिणाम मौसम, मिट्टी, पानी और इस्तेमाल की गई किस्म पर भी निर्भर करता है।

    देशी बीजों की खेती से लागत घटाने की कोशिश

    वर्ष 2012 में DBSM से जुड़ने के बाद सुरथा ने प्राकृतिक खेती के तरीकों को समझना शुरू किया। उन्हें महसूस हुआ कि अधिक उपज वाली किस्मों की खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च उनकी खेती की लागत बढ़ा रहा था।

    इसके बाद उन्होंने देशी धान की किस्मों और प्राकृतिक खेती पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। वर्तमान में वह करीब पांच एकड़ जमीन पर देशी धान और लगभग 25 डिसमिल जमीन पर सब्जियों की खेती करते हैं।

    सुरथा के अनुसार, पहले अधिक उपज वाली धान की खेती में उन्हें प्रति एकड़ सालाना करीब 6,000 से 8,000 रुपये खर्च करने पड़ते थे। देशी किस्मों की खेती में यह खर्च घटकर लगभग 3,000 से 4,000 रुपये प्रति एकड़ रह गया है।

    कई पारंपरिक किस्में स्थानीय मौसम और खेती की परिस्थितियों के अनुकूल हो सकती हैं। कुछ किस्मों में सूखा सहने या कुछ कीटों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोध की क्षमता भी होती है। हालांकि, ये गुण सभी किस्मों में समान नहीं होते और उनका प्रदर्शन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।

    गांव के दूसरे किसान भी अपनाने लगे देशी किस्में

    सुरथा केवल अपने खेतों में ही देशी बीजों का संरक्षण नहीं कर रहे, बल्कि दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती के तरीके अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उनके गांव में अब करीब 25 एकड़ जमीन पर देशी धान और लगभग पांच एकड़ में सब्जियों की खेती की जा रही है।

    देशी बीजों को बचाने के प्रयासों के लिए उन्हें विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और मीडिया संस्थानों से सम्मान मिला है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी भी उन्हें सम्मानित कर चुके हैं।

    DBSM के संयोजक सरोज कुमार महंती के मुताबिक, संगठन ने सुरथा को प्राकृतिक खेती की दिशा में प्रशिक्षित किया। वर्ष 2013-14 के दौरान पद्मश्री प्रोफेसर राधामोहन, महाराष्ट्र के पद्मश्री सुभाष पालेकर और कृषि विशेषज्ञ नटबर सारंगी से मिली प्रेरणा ने भी उन्हें देशी किस्मों की खेती और बीज बैंक स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया।

    कृषि विज्ञान केंद्र से सीखे बीज संरक्षण के तरीके

    सुंदरगढ़ जिले के किरेई स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और DBSM की ओर से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी सुरथा ने हिस्सा लिया। मृदा विज्ञान विशेषज्ञ डॉ. मनोज कुमार जेना के अनुसार, उन्हें बीज उपचार, मिट्टी में पोषक तत्वों का आकलन, बीज संरक्षण, मल्चिंग और वर्मी-कम्पोस्ट तैयार करने जैसे विषयों पर प्रशिक्षण दिया गया।

    उन्होंने बीजामृत और जीवामृत जैसे जैविक खेती में इस्तेमाल होने वाले घोल तैयार करने और उनका उपयोग करने की जानकारी हासिल की। इसके साथ ही नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र, अग्निअस्त्र और दशपर्णी जैसे पारंपरिक जैव-कीट नियंत्रण उपायों के बारे में भी सीखा।

    बीज बैंक से किसानों को मिलता है बीज, फसल के बाद लौटाना होता है ज्यादा

    सुरथा का बीज बैंक आसपास के किसानों को देशी बीज उपलब्ध कराने के लिए एक खास व्यवस्था अपनाता है। किसान यहां से बीज उधार ले सकते हैं और फसल कटाई के बाद तय मात्रा से अधिक बीज वापस करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई किसान 10 किलोग्राम बीज लेता है, तो उसे फसल कटने के बाद 15 किलोग्राम बीज लौटाना होता है।

    इस व्यवस्था से बीज बैंक का भंडार बनाए रखने और दूसरे किसानों तक बीज पहुंचाने में मदद मिलती है। बीज बैंक दूर-दराज के किसानों को बीज बेचता भी है। रिपोर्ट के अनुसार, कुसुमकली और मच्छकांता जैसी धान की किस्मों के बीज क्रमशः 30 रुपये और 40 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचे जाते हैं। संस्थानों या सरकारी परियोजनाओं के तहत होने वाली खरीद में कीमत अलग हो सकती है।

    यदि बीज बैंक में किसी खास किस्म का बीज उपलब्ध नहीं होता, तो सुरथा पश्चिमी ओडिशा के दूसरे बीज बैंकों के साथ बीजों का आदान-प्रदान करते हैं। वह भंडार बनाए रखने के लिए खुद भी अलग-अलग फसलों के बीज उगाते हैं। आधे एकड़ में धान, मोटे अनाज और सब्जियों के बीज तैयार किए जाते हैं, जबकि अधिक मांग वाली मच्छकांता किस्म की खेती करीब डेढ़ एकड़ में की जाती है।

    सुरथा किसान की यह पहल दिखाती है कि पारंपरिक बीजों को बचाने के लिए केवल उनका संग्रह करना ही पर्याप्त नहीं है। नियमित खेती, किसानों के बीच बीजों का आदान-प्रदान और पारंपरिक कृषि ज्ञान को आगे बढ़ाना भी जरूरी है। उनकी कोशिश स्थानीय फसल विविधता को सुरक्षित रखने और किसानों को खेती के अधिक विकल्प उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध प्रकाशित जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें दिए गए आंकड़े, खेती की लागत और बीजों की संख्या संबंधित रिपोर्ट में बताए गए विवरण पर आधारित हैं। वास्तविक परिणाम स्थानीय मिट्टी, मौसम और खेती के तरीकों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

  • अलवर की विवाहित महिला का गंभीर आरोप, दिल्ली के होटल में दुष्कर्म के बाद 6 महीने तक ब्लैकमेल करने का दावा.

    अलवर की विवाहित महिला का गंभीर आरोप, दिल्ली के होटल में दुष्कर्म के बाद 6 महीने तक ब्लैकमेल करने का दावा.

    अलवर की विवाहित महिला का गंभीर आरोप, दिल्ली के होटल में दुष्कर्म के बाद 6 महीने तक ब्लैकमेल करने का दावा.

    अलवर, राजस्थान: राजस्थान के अलवर जिले में दो बच्चों की मां ने एक युवक पर गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला का दावा है कि आरोपी ने दिल्ली के एक होटल में उसके साथ दुष्कर्म किया और कथित तौर पर अश्लील सामग्री बनाकर करीब छह महीने तक उसे ब्लैकमेल करता रहा। पीड़िता ने युवक पर जबरन धर्म परिवर्तन कराने और शादी करने का दबाव बनाने का आरोप भी लगाया है। मामले में अदालत के हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।

    दिल्ली के होटल में दुष्कर्म का आरोप

    शिकायत के मुताबिक, महिला शादीशुदा है और उसके दो बच्चे हैं। उसने आरोप लगाया है कि दिल्ली के एक होटल में युवक ने उसके साथ दुष्कर्म किया। महिला का दावा है कि इस दौरान आरोपी ने उसकी आपत्तिजनक सामग्री तैयार कर ली और बाद में उसी के आधार पर उसे धमकाने लगा।

    पीड़िता के अनुसार, कथित घटना के बाद आरोपी ने लंबे समय तक उस पर दबाव बनाए रखा। महिला ने आरोप लगाया कि करीब छह महीने तक उसे ब्लैकमेल किया गया, जिससे वह परेशान रही।

    धर्म परिवर्तन और शादी के लिए दबाव बनाने का दावा

    महिला ने अपनी शिकायत में यह भी आरोप लगाया है कि युवक उस पर धर्म परिवर्तन करने और उससे शादी करने के लिए दबाव बना रहा था। इन आरोपों के सामने आने के बाद मामला गंभीर हो गया है।

    हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। पुलिस को कथित घटनाक्रम, दोनों पक्षों के बीच संपर्क और उपलब्ध साक्ष्यों की पड़ताल करनी होगी।

    पहले थाने पहुंची, फिर अदालत का दरवाजा खटखटाया

    पीड़िता का आरोप है कि वह शुरुआत में शिकायत लेकर अलवर के एनआईबी थाने पहुंची थी, लेकिन उस समय तत्काल कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने अदालत का रुख किया।

    मिली जानकारी के अनुसार, अदालत के हस्तक्षेप और आदेश के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की। अब पुलिस की जांच में महिला की शिकायत में लगाए गए आरोपों और उनसे जुड़े साक्ष्यों की पड़ताल की जाएगी।

    जांच के बाद स्पष्ट होगी पूरी सच्चाई

    इस मामले में पुलिस के सामने आरोपों की पुष्टि करना और घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को जुटाना महत्वपूर्ण होगा। जांच के दौरान संबंधित साक्ष्यों और बयानों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई तय की जाएगी।

    फिलहाल, मामला दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए सभी आरोप साबित हो चुके हैं। मामले की वास्तविक स्थिति जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।

    डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध जानकारी और शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायालय की प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगा।