बिजनौर: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चांदपुर क्षेत्र में पानी की टंकी पर चौकीदारी करने वाले 62 वर्षीय शमशेर अली की मौत से इलाके में सनसनी फैल गई। मंगलवार सुबह उनका शव गांव में स्थित ओवरहेड टैंक परिसर में नाली के पास पड़ा मिला। उनके सिर और चेहरे पर चोट के निशान पाए गए हैं। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू कर दी। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। फिलहाल मौत की परिस्थितियों का पता लगाया जा रहा है।
रात में ड्यूटी पर थे शमशेर अली
शमशेर अली चांदपुर क्षेत्र के शेख सराय हबीब गांव के निवासी थे। वह गांव में बनी पानी की टंकी पर चौकीदार के रूप में काम करते थे। उनका परिवार गांव में ही रहता था, जबकि वह ज्यादातर समय टंकी परिसर में बने कमरे में रहते थे। बताया गया कि वह सुबह और शाम अपने घर जाते थे और बाकी समय ड्यूटी पर रहते थे।
सोमवार रात भी शमशेर अली रोज की तरह पानी की टंकी पर ड्यूटी कर रहे थे। मंगलवार सुबह जब स्थानीय लोग टंकी परिसर की ओर पहुंचे तो उन्हें नाली के पास शमशेर का शव पड़ा दिखाई दिया। उनके शरीर पर चोटों के निशान देखकर लोगों ने पुलिस को सूचना दी।
सिर और चेहरे पर मिले चोट के निशान
चौकीदार का शव मिलने की जानकारी फैलते ही घटनास्थल पर लोगों की भीड़ जुट गई। सूचना पर चांदपुर कोतवाली के प्रभारी राहुल सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और शुरुआती जांच के बाद शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
कोतवाली प्रभारी के अनुसार, शमशेर अली के शरीर पर चोट के निशान मिले हैं। पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि उनकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। चोटों की प्रकृति और मौत के वास्तविक कारणों का पता पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा जांच के अन्य तथ्यों से चलेगा।
हत्या की आशंका, पुलिस जुटा रही जानकारी
शव पर चोट के निशान मिलने के कारण मामले को गंभीरता से लिया जा रहा है। हालांकि, मौत के पीछे की वजह और किसी व्यक्ति की संलिप्तता को लेकर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है। पुलिस आसपास के लोगों से पूछताछ कर रही है और घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी जुटा रही है।
पुलिस का कहना है कि शिकायत मिलने के आधार पर मुकदमा दर्ज कर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जांच को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और पुलिस के शुरुआती बयान पर आधारित है। मौत के कारणों और घटना की परिस्थितियों की पुष्टि जांच तथा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर होगी।
दुर्ग: छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के कातरो गांव में नवरात्रि के दौरान कुंवारी माता वैष्णवी की कठिन साधना श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। बताया जाता है कि वैष्णवी नौ दिनों तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। उनकी साधना को देखने और माता के दर्शन करने के लिए छत्तीसगढ़ के अलावा दूसरे राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं।
नवरात्रि में देवी दुर्गा की आराधना के लिए देशभर में अलग-अलग परंपराएं निभाई जाती हैं। कहीं भक्त उपवास रखते हैं, तो कहीं विशेष पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं। कातरो गांव में वैष्णवी की साधना भी अपनी अनोखी परंपराओं के कारण लोगों का ध्यान खींचती है।
पेट पर जवारा और अखंड ज्योति स्थापित करने की परंपरा
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, कुंवारी माता वैष्णवी नवरात्रि के दौरान अपने पेट पर जवारा और ज्योति कलश स्थापित करती हैं। इस साधना को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। भक्त इसे माता के प्रति गहरी आस्था और समर्पण से जोड़कर देखते हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैष्णवी की साधना के दौरान कीलों से बने बिस्तर पर लेटने की परंपरा है। नौ दिनों तक कठिन नियमों का पालन करने और शरीर को स्थिर रखने की इस साधना को श्रद्धालु तपस्या के रूप में देखते हैं। हालांकि, साधना की पूरी प्रक्रिया और इससे जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती है।
बचपन से ही पूजा-पाठ में रही रुचि
रिपोर्ट के मुताबिक, वैष्णवी की बचपन से ही पूजा-पाठ और देवी-देवताओं की आराधना में गहरी रुचि रही है। परिवार के लोगों ने उन्हें सामान्य जीवन और पढ़ाई के साथ संतुलन बनाए रखने के लिए समझाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी धार्मिक साधना के प्रति लगाव बना रहा।
धीरे-धीरे उनकी साधना की चर्चा आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी। अब नवरात्रि के अवसर पर कई श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए कातरो गांव पहुंचते हैं और अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं।
नवमी पर कीलों वाले झूले की परंपरा
कुंवारी माता वैष्णवी की साधना में नवमी का दिन भी विशेष बताया जाता है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, नवरात्रि के अंतिम दिन वह कीलों से बने झूले पर बैठकर या खड़े होकर झूलती हैं। इस परंपरा को देखने के लिए भी लोग एकत्र होते हैं।
कुछ श्रद्धालुओं को सोशल मीडिया के माध्यम से वैष्णवी की साधना के बारे में जानकारी मिली, जिसके बाद वे दूसरे राज्यों से भी यहां पहुंचे। भक्त इस अनुष्ठान को आस्था से जोड़कर देखते हैं, जबकि इसकी कठिन प्रकृति को देखते हुए सुरक्षा और सावधानी का ध्यान रखना भी जरूरी है।
गले में बलगम जमा होना, बार-बार गला साफ करने की जरूरत महसूस होना या सुबह उठते ही कफ की परेशानी होना कई लोगों के लिए असहज स्थिति बन जाती है। सर्दी-जुकाम, एलर्जी, साइनस की समस्या और सांस से जुड़ी कुछ बीमारियों के कारण शरीर में म्यूकस यानी बलगम की मात्रा बढ़ सकती है। ऐसे में लोग अक्सर अपनी डाइट में बदलाव करने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या सच में कुछ खास खाद्य पदार्थ बलगम बढ़ाते हैं?
आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा के विशेषज्ञ डॉ. सलीम जैदी ने खानपान और बलगम से जुड़ी कुछ बातों पर चर्चा की है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि हर व्यक्ति में किसी खाद्य पदार्थ का असर एक जैसा नहीं होता। वैज्ञानिक प्रमाण भी इस बात का समर्थन नहीं करते कि दूध या चीनी जैसे सभी खाद्य पदार्थ सीधे तौर पर हर व्यक्ति में बलगम का उत्पादन बढ़ा देते हैं।
शरीर में बलगम क्यों बनता है?
बलगम यानी म्यूकस शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। यह नाक, गले और सांस की नलियों की अंदरूनी सतह को नम रखने के साथ धूल, छोटे कणों और रोगाणुओं को रोकने में मदद करता है।
सामान्य परिस्थितियों में बनने वाला म्यूकस अक्सर महसूस भी नहीं होता। लेकिन सर्दी-जुकाम, फ्लू, एलर्जी या साइनस में सूजन होने पर इसका उत्पादन बढ़ सकता है। कभी-कभी नाक से निकलने वाला म्यूकस गले के पीछे की ओर बहता है, जिसे पोस्ट-नेजल ड्रिप कहा जाता है। इससे बार-बार गला साफ करने, खांसी और गले में कुछ जमा होने जैसा एहसास हो सकता है।
अगर बलगम लंबे समय तक बना रहता है, तो केवल खानपान को इसका कारण मानना सही नहीं है। इसके पीछे एलर्जी, संक्रमण, अस्थमा, धूम्रपान या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं।
1. दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स
दूध, दही, पनीर और चीज जैसे डेयरी उत्पादों को अक्सर बलगम बढ़ाने वाला माना जाता है। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण यह साबित नहीं करते कि दूध पीने से सभी लोगों में शरीर अधिक बलगम बनाने लगता है।
कुछ लोगों को दूध पीने के बाद मुंह या गले में चिकनाहट और गाढ़ेपन का एहसास हो सकता है। यह एहसास अपने आप में बलगम का उत्पादन बढ़ने का प्रमाण नहीं है।
अगर आपको लगता है कि किसी खास डेयरी उत्पाद के सेवन के बाद परेशानी बढ़ती है, तो कुछ समय तक अपने लक्षणों पर नजर रखें और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या डायटीशियन से सलाह लें। बिना किसी स्पष्ट कारण के सभी डेयरी उत्पाद बंद करने से पोषण पर असर पड़ सकता है।
2. ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड
मिठाइयां, मीठे पेय, बिस्कुट और दूसरे अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन संतुलित आहार की जगह लेने पर सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए इनका सेवन सीमित रखना बेहतर है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि चीनी खाने से हर व्यक्ति में सीधे बलगम बढ़ने लगता है। गले में कफ की परेशानी और ज्यादा चीनी के सेवन के बीच सीधा संबंध साबित करने वाले पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
अगर आपको लगातार बलगम या खांसी की समस्या है, तो केवल चीनी छोड़ने पर निर्भर न रहें। इसके साथ यह भी देखें कि कहीं एलर्जी, संक्रमण या कोई दूसरी स्वास्थ्य समस्या तो नहीं है।
3. रेड मीट और ज्यादा तले-भुने खाद्य पदार्थ
बीफ, पोर्क और लैम्ब जैसे रेड मीट तथा समोसे, पकौड़े और अन्य डीप फ्राइड खाद्य पदार्थों में वसा की मात्रा अधिक हो सकती है। इन्हें नियमित रूप से ज्यादा मात्रा में खाने के बजाय संतुलित डाइट का हिस्सा बनाना चाहिए।
हालांकि, इन खाद्य पदार्थों को सीधे बलगम बढ़ाने वाला मानने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। कुछ लोगों में भारी या अधिक वसा वाला भोजन एसिड रिफ्लक्स की समस्या को बढ़ा सकता है। एसिड रिफ्लक्स में पेट का एसिड ऊपर गले की ओर आने से खांसी, गले में जलन या बार-बार गला साफ करने जैसी परेशानी हो सकती है।
यदि आपको भोजन के बाद खांसी या गले में जलन महसूस होती है, तो भोजन की मात्रा कम रखना और खाने के तुरंत बाद न लेटना मददगार हो सकता है।
4. चाय, कॉफी और अल्कोहल का सेवन
चाय और कॉफी में कैफीन होता है, जबकि अल्कोहल शरीर पर अलग-अलग तरह से असर डाल सकता है। सामान्य मात्रा में चाय या कॉफी पीने से हर व्यक्ति में डिहाइड्रेशन होने या बलगम गाढ़ा हो जाने की बात सही नहीं है।
फिर भी, अगर कैफीन वाले पेय या अल्कोहल लेने के बाद आपकी खांसी, गले में जलन या एसिड रिफ्लक्स बढ़ता है, तो इनकी मात्रा कम करना उपयोगी हो सकता है। अल्कोहल का सेवन सीमित रखना या उससे बचना स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर है।
बलगम को सामान्य रूप से पतला रखने के लिए पर्याप्त पानी पीना महत्वपूर्ण है। पानी की जरूरत उम्र, मौसम, शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
बलगम से राहत पाने के लिए क्या करें?
पर्याप्त पानी पिएं
दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर में पानी की कमी से बचने और म्यूकस को बाहर निकालने में मदद मिल सकती है। गले में खराश या जुकाम होने पर कुछ लोगों को गुनगुने पानी से आराम महसूस होता है।
गर्म पेय का सहारा लें
गुनगुना पानी या बिना ज्यादा चीनी वाली गर्म चाय गले को आराम दे सकती है। अदरक या पुदीने से बने पेय भी कुछ लोगों को अच्छा महसूस करा सकते हैं, लेकिन इन्हें बलगम का प्रमाणित इलाज नहीं समझना चाहिए।
भाप लेते समय सावधानी बरतें
नाक बंद होने पर नम हवा या गर्म शॉवर से कुछ लोगों को अस्थायी राहत मिल सकती है। लेकिन उबलते पानी के बर्तन से सीधे भाप लेना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे चेहरे और सांस की नलियों में जलने का जोखिम रहता है। भाप में एसेंशियल ऑयल मिलाना भी जरूरी नहीं है और कुछ लोगों में इससे जलन या एलर्जी बढ़ सकती है।
धुएं और धूल से बचें
सिगरेट का धुआं, प्रदूषण, धूल और दूसरे उत्तेजक पदार्थ सांस की नलियों में जलन पैदा कर सकते हैं। अगर आपको बार-बार बलगम बनता है, तो धूम्रपान से बचें और धूल या एलर्जी पैदा करने वाले कारकों से संपर्क कम करने की कोशिश करें।
घरेलू उपायों पर पूरी तरह निर्भर न रहें
शहद गले की खराश और खांसी में कुछ राहत दे सकता है, लेकिन यह बलगम बनने के मूल कारण का इलाज नहीं करता। एक साल से कम उम्र के बच्चों को शहद नहीं देना चाहिए। हल्दी, तुलसी या दूसरे घरेलू नुस्खों को भी डॉक्टर द्वारा बताए गए इलाज का विकल्प न बनाएं।
कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?
अगर बलगम लंबे समय तक बना रहता है, बार-बार लौटता है या उसके साथ लगातार खांसी, बुखार अथवा सीने में परेशानी होती है, तो डॉक्टर से संपर्क करें।
बलगम में खून आने, सीने में तेज दर्द या सांस लेने में गंभीर कठिनाई होने पर तत्काल चिकित्सा सहायता लें। सांस की गंभीर परेशानी को घरेलू नुस्खों से ठीक करने की कोशिश न करें।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। दूध, चीनी, डेयरी उत्पादों या अन्य खाद्य पदार्थों का असर हर व्यक्ति में अलग हो सकता है और इनके सीधे तौर पर बलगम बढ़ाने के प्रमाण सीमित हैं। लंबे समय तक बलगम, खांसी या सांस संबंधी परेशानी रहने पर डॉक्टर से सलाह लें। यह लेख चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।
गुवाहाटी: असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर में माता के दर्शन करने के लिए हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं, शक्ति उपासना और प्राचीन परंपराओं के लिए जाना जाता है। मंदिर परिसर से जुड़ा कछुआ कुंड भी भक्तों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र है। मान्यता है कि यहां कछुओं के दर्शन करने और सच्चे मन से प्रार्थना करने से भक्तों को मानसिक शांति मिलती है और उनकी मनोकामनाएं पूरी होने का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
धार्मिक आस्था का केंद्र है कछुआ कुंड
कामाख्या मंदिर को देश के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल किया जाता है। यहां देवी की पूजा-अर्चना के साथ कई प्राचीन धार्मिक परंपराएं भी प्रचलित हैं। कछुआ कुंड को इसी आस्था और परंपरा से जुड़ा एक विशेष स्थान माना जाता है।
श्रद्धालु इस कुंड में रहने वाले कछुओं को धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। यहां आने वाले भक्त कछुओं के दर्शन करते हैं और देवी से सुख, समृद्धि, परिवार की खुशहाली तथा जीवन की परेशानियों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। हालांकि, मनोकामनाएं पूरी होने से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं और लोगों की आस्था पर आधारित हैं।
200 से 300 साल पुराने बताए जाते हैं कछुए
कछुआ कुंड को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा यहां रहने वाले कछुओं की उम्र को लेकर होती है। कुछ मान्यताओं में इन कछुओं को 200 से 300 वर्ष पुराना बताया जाता है। उनकी उम्र और लंबे समय से इस स्थान पर मौजूद रहने की कहानियां श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल पैदा करती हैं।
हालांकि, इन कछुओं की बताई जाने वाली उम्र की स्वतंत्र वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध जानकारी से स्पष्ट नहीं होती। इसलिए इस दावे को प्रमाणित तथ्य के बजाय प्रचलित मान्यता के रूप में देखना उचित है।
भगवान विष्णु के कूर्म अवतार से जुड़ा है धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में कछुए का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के समय भगवान विष्णु ने कूर्म यानी कछुए का अवतार धारण किया था। उन्होंने अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को आधार दिया, जिससे समुद्र मंथन की प्रक्रिया आगे बढ़ सकी।
इसी कथा के कारण कछुए को धैर्य, स्थिरता और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। कामाख्या मंदिर के कछुआ कुंड से जुड़ी धार्मिक आस्था को भी कई श्रद्धालु इसी पौराणिक परंपरा से जोड़कर देखते हैं।
मनोकामनाएं पूरी होने की क्या है मान्यता?
कछुआ कुंड को लेकर स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में कई तरह की मनोकामनाओं का उल्लेख मिलता है। कुछ श्रद्धालु संतान सुख, विवाह में आने वाली बाधाओं से मुक्ति, आर्थिक परेशानियों में राहत और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं।
भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना उन्हें सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक संबल देती है। हालांकि, इन धार्मिक मान्यताओं को किसी इच्छा की पूर्ति की गारंटी या प्रमाणित चमत्कार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कछुआ कुंड के दर्शन करते समय किन बातों का रखें ध्यान?
कामाख्या मंदिर जाने वाले श्रद्धालु कछुआ कुंड के दर्शन के दौरान मंदिर के नियमों और स्थानीय निर्देशों का पालन करें। यदि वहां कछुओं को भोजन देने की अनुमति हो, तो केवल मंदिर प्रशासन द्वारा स्वीकृत भोजन ही दें। कछुओं को बिना अनुमति चावल, दाल या अन्य खाद्य पदार्थ खिलाने से बचें, क्योंकि गलत भोजन उनके स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकता है।
इसी तरह, कुंड के पानी को पीने या शरीर पर लगाने से पहले स्थानीय नियमों की जानकारी लेना बेहतर है। धार्मिक स्थलों की स्वच्छता बनाए रखना और वहां रहने वाले जीवों को परेशान न करना भी हर श्रद्धालु की जिम्मेदारी है।
आस्था और परंपरा का अनोखा संगम
कामाख्या मंदिर का कछुआ कुंड श्रद्धालुओं के लिए केवल एक जलकुंड नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था,
उत्तर प्रदेश के पीलीभीत जिले के अमरिया कस्बे में रामलीला मेला कमेटी की बैठक के दौरान हुआ विवाद खूनी संघर्ष में बदल गया। सोमवार रात कमेटी के आय-व्यय का हिसाब और नई कार्यकारिणी के गठन को लेकर शुरू हुई कहासुनी के बीच गोलीबारी हो गई। इस घटना में अंकित गुप्ता, उनके भाई मोहित गुप्ता और कुणाल की मौत हो गई, जबकि दो अन्य लोग घायल हुए। गंभीर रूप से घायल रोहित गुप्ता का बरेली में उपचार कराया जा रहा है। पुलिस के अनुसार, मामले में मुख्य आरोपी कौशल गुप्ता समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
आय-व्यय के हिसाब और नई कमेटी को लेकर विवाद
अमरिया कस्बे में हर साल रामलीला का आयोजन किया जाता है। इसी आयोजन से जुड़ी मेला कमेटी की बैठक सोमवार रात मेला स्थल पर बुलाई गई थी। बैठक में पिछली कमेटी के आय-व्यय का हिसाब प्रस्तुत करने और नई कमेटी के गठन को लेकर चर्चा हो रही थी।
बताया गया कि अंकित गुप्ता पिछले वर्ष मेला कमेटी के पदाधिकारी रहे थे। इस बार कौशल गुप्ता भी कमेटी में पदाधिकारी बनने की दावेदारी कर रहे थे। बैठक के दौरान कौशल ने कथित तौर पर खर्चों के हिसाब पर सवाल उठाए, जिसके बाद दोनों पक्षों के बीच बहस शुरू हो गई।
मौके पर मौजूद लोगों के मुताबिक, अंकित गुप्ता, उनके भाई मोहित गुप्ता और उनके साथियों ने आपत्ति जताते हुए शांतिपूर्वक बातचीत करने को कहा। इसी बात को लेकर विवाद बढ़ता चला गया।
आरोप है कि विवाद के बीच चलाई गईं गोलियां
पुलिस के प्रारंभिक विवरण के अनुसार, विवाद के दौरान कौशल गुप्ता और उसके साथियों पर गोलीबारी करने का आरोप है। फायरिंग में अंकित गुप्ता और कुणाल के सीने में गोलियां लगीं। दोनों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई।
गोलीबारी के दौरान मोहित गुप्ता और रोहित गुप्ता भी घायल हो गए। अचानक गोलियां चलने और चीख-पुकार से मौके पर अफरा-तफरी मच गई। आसपास मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। आरोप है कि फायरिंग के बाद हमलावर घटनास्थल से फरार हो गए।
घायलों को उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। बाद में बरेली में इलाज के दौरान मोहित गुप्ता ने भी दम तोड़ दिया। रोहित गुप्ता का उपचार जारी है।
तीन लोगों की मौत से इलाके में हड़कंप
एक ही घटना में तीन लोगों की मौत से अमरिया कस्बे में शोक और तनाव का माहौल बन गया। मृतकों में अंकित गुप्ता, उनके भाई मोहित गुप्ता और कुणाल शामिल हैं। बताया गया कि अंकित मेला कमेटी से जुड़े हुए थे।
घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंचे। पुलिस ने घटनास्थल की परिस्थितियों का जायजा लिया और मामले से जुड़े तथ्यों की पड़ताल शुरू की।
कौशल गुप्ता समेत दो आरोपी गिरफ्तार
घटनास्थल पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक सुकीर्ति माधव ने बताया कि कौशल गुप्ता और उसके साथियों पर हत्या का आरोप लगाया गया है। पुलिस उस समय पीड़ित पक्ष की शिकायत का इंतजार कर रही थी, जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज किए जाने की बात कही गई।
समाचार रिपोर्ट के अनुसार, देर रात पुलिस ने मुख्य आरोपी कौशल गुप्ता समेत दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस अब गोलीबारी में इस्तेमाल हथियारों, घटना में शामिल अन्य लोगों और विवाद के पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है।
फिलहाल, पुलिस की जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों और दर्ज शिकायत के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और पुलिस के प्रारंभिक बयान पर आधारित है। आरोपों की पुष्टि और घटना की पूरी परिस्थितियों का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद होगा।
देश में कैब चलाने वाले, फूड डिलीवरी करने वाले और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों के लिए EPFO 3.0 से जुड़ी एक अहम अपडेट सामने आई है। इस परियोजना के लागू होने में देरी हो सकती है, जिससे सामाजिक सुरक्षा और पेंशन जैसी सुविधाओं से जुड़ने की उम्मीद लगाए बैठे कामगारों को अभी और इंतजार करना पड़ सकता है।
उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, EPFO 3.0 परियोजना को अक्टूबर 2025 में मंजूरी मिली थी। हालांकि, इसे लागू करने के लिए तकनीकी साझेदार चुनने और टेंडर की प्रक्रिया अभी पूरी की जानी है। इन प्रक्रियाओं के बाद भी सिस्टम को तैयार करने में समय लग सकता है। रिपोर्ट में इसके क्रियान्वयन में करीब एक साल अतिरिक्त लगने की संभावना जताई गई है।
क्या है EPFO 3.0 और क्यों हो रही है इसकी चर्चा?
EPFO यानी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन देश में पात्र कर्मचारियों के भविष्य निधि और पेंशन से जुड़े मामलों को संभालता है। EPFO 3.0 को संगठन की तकनीकी व्यवस्था को आधुनिक बनाने वाली परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। इसका उद्देश्य सेवाओं को अधिक डिजिटल, सुविधाजनक और कुशल बनाना है।
इस परियोजना को लेकर गिग वर्कर्स और असंगठित क्षेत्र के कामगारों के संदर्भ में भी चर्चा हो रही है। इनमें ऐप के जरिए कैब चलाने वाले ड्राइवर, ऑनलाइन ऑर्डर पहुंचाने वाले डिलीवरी पार्टनर्स और निर्माण क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर शामिल हैं।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि EPFO 3.0 के तकनीकी अपग्रेड और गिग वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा या पेंशन के दायरे में लाने की व्यवस्था को एक ही बात नहीं मानना चाहिए। इन कामगारों को कौन-सी सुविधा, किस पात्रता और किस प्रक्रिया के तहत मिलेगी, यह संबंधित आधिकारिक नियमों और योजनाओं पर निर्भर करेगा।
EPFO 3.0 लागू होने में देरी क्यों हो रही है?
रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना के लिए तकनीकी साझेदार चुनने की प्रक्रिया अभी आगे बढ़ाई जा रही है। इसके लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल यानी RFP तैयार किया जा रहा है। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया पूरी करनी होगी और तकनीकी व्यवस्था को लागू करने का काम आगे बढ़ेगा।
ऐसी परियोजनाओं में केवल मंजूरी मिलना पर्याप्त नहीं होता। सॉफ्टवेयर और डिजिटल सिस्टम तैयार करने, डेटा को व्यवस्थित करने, सुरक्षा जांच करने और नई व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए भी समय चाहिए।
इसी वजह से EPFO 3.0 के लागू होने में देरी की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, इसकी अंतिम समयसीमा और वास्तविक शुरुआत की तारीख की पुष्टि आधिकारिक घोषणा से ही होगी।
अक्टूबर 2025 में मिली थी मंजूरी
उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, EPFO 3.0 परियोजना को अक्टूबर 2025 में मंजूरी दी गई थी। उस समय इसे अगले चरण में लागू करने की तैयारी थी, लेकिन तकनीकी साझेदार के चयन और टेंडर से जुड़ी प्रक्रियाओं के कारण काम आगे बढ़ने में समय लग रहा है।
इस देरी का असर उन लोगों की उम्मीदों पर पड़ सकता है, जो नई व्यवस्था के जरिए भविष्य निधि, पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं से जुड़ने की संभावना देख रहे हैं। हालांकि, किसी भी लाभ की वास्तविक उपलब्धता परियोजना के लागू होने और उससे संबंधित पात्रता नियमों पर निर्भर करेगी।
किन कामगारों को मिल सकता है फायदा?
EPFO 3.0 और इससे जुड़ी सामाजिक सुरक्षा की चर्चाओं में कई तरह के कामगार शामिल हैं।
1. कैब ड्राइवर: ऐप आधारित टैक्सी सेवाओं से जुड़े ड्राइवरों के लिए भविष्य की बचत और सामाजिक सुरक्षा महत्वपूर्ण विषय हैं। नई व्यवस्थाओं से उन्हें जोड़ने की योजना लागू होती है, तो पात्र कामगारों को लाभ मिल सकता है।
2. डिलीवरी पार्टनर्स: फूड डिलीवरी और ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए सामान पहुंचाने वाले लोग अक्सर काम के आधार पर कमाई करते हैं। सामाजिक सुरक्षा की बेहतर व्यवस्था उनके भविष्य के लिए उपयोगी हो सकती है।
3. निर्माण क्षेत्र के मजदूर: कंस्ट्रक्शन सेक्टर में काम करने वाले कई मजदूरों के लिए नियमित बचत और पेंशन जैसी सुविधाओं तक पहुंच चुनौतीपूर्ण होती है। संबंधित योजनाओं के तहत पात्रता होने पर उन्हें सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिल सकता है।
4. असंगठित क्षेत्र के अन्य कामगार: ऐसे लोगों के लिए भी सामाजिक सुरक्षा जरूरी है, जिनके पास नियमित वेतन वाली नौकरी या पारंपरिक कर्मचारी लाभ उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि, सभी असंगठित कामगार स्वतः EPFO के सदस्य या किसी पेंशन योजना के पात्र नहीं हो जाते।
क्या अभी कैब ड्राइवर और डिलीवरी पार्टनर्स को पेंशन नहीं मिलेगी?
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि EPFO 3.0 के लागू होने में संभावित देरी का अर्थ यह नहीं है कि हर कैब ड्राइवर या डिलीवरी पार्टनर को फिलहाल किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग श्रेणियों के कामगारों के लिए मौजूदा सरकारी योजनाएं और पात्रता के नियम अलग हो सकते हैं।
इसी तरह, EPFO 3.0 लागू होते ही सभी गिग वर्कर्स को स्वतः पेंशन मिलने लगेगी, ऐसा मानना भी सही नहीं होगा। इसके लिए संबंधित योजना के नियम, पंजीकरण की प्रक्रिया, योगदान की शर्तें और पात्रता की जानकारी देखना जरूरी होगा।
कामगारों के लिए इसका क्या मतलब है?
अगर EPFO 3.0 से जुड़ी नई व्यवस्था लागू होने में अतिरिक्त समय लगता है, तो इससे भविष्य में सामाजिक सुरक्षा से जुड़ने की उम्मीद कर रहे लोगों को इंतजार करना पड़ सकता है। लेकिन फिलहाल किसी कामगार को अपनी पात्रता या उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी लेने के लिए परियोजना के पूरी तरह लागू होने तक इंतजार करना जरूरी नहीं है।
कामगारों को अपनी मौजूदा पात्रता के अनुसार उपलब्ध सरकारी योजनाओं की जानकारी लेनी चाहिए और किसी
खाना खाने के तुरंत बाद पेट फूलना, भारीपन महसूस होना या गैस बनने की समस्या कई लोगों को परेशान करती है। खासकर जब आप जरूरत से ज्यादा खाना खा लेते हैं या भोजन में तली-भुनी और ज्यादा वसा वाली चीजें शामिल होती हैं, तो पेट में असहजता महसूस हो सकती है। कभी-कभार ऐसा होना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर पेट फूलने की समस्या बार-बार होने लगे और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
बेंगलुरु के साइटकेयर हॉस्पिटल्स में जीआई एवं एचपीबी सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. आदित्य वी. नरगुंड के अनुसार, जरूरत से ज्यादा भोजन करने पर पेट फैल सकता है और भोजन को पाचन तंत्र से आगे बढ़ने में अधिक समय लग सकता है। इससे पेट में भारीपन, दबाव और असहजता महसूस हो सकती है। इसके अलावा, पाचन के दौरान आंतों में बनने वाली गैस भी ब्लोटिंग की परेशानी बढ़ा सकती है।
आखिर खाना खाने के बाद पेट क्यों फूलता है?
पेट फूलने यानी ब्लोटिंग के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें एक बार में ज्यादा खाना, जल्दी-जल्दी भोजन करना, कार्बोनेटेड ड्रिंक्स पीना और कुछ खाद्य पदार्थों को ठीक से पचा न पाना शामिल हैं।
ज्यादा वसा वाला भोजन पेट से खाना आगे बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा कर सकता है। वहीं, जल्दी खाने के दौरान हवा निगलने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे डकार और पेट में गैस की परेशानी हो सकती है।
कुछ लोगों को दूध या दूध से बने उत्पादों, दालों, कुछ सब्जियों और दूसरे विशेष खाद्य पदार्थों से भी गैस बन सकती है। इसके अलावा कब्ज, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम (IBS) और पाचन से जुड़ी अन्य समस्याएं भी लगातार ब्लोटिंग का कारण हो सकती हैं।
हालांकि, हर बार पेट फूलने का मतलब यह नहीं है कि पाचन तंत्र में कोई गंभीर बीमारी है। समस्या कितनी बार होती है और उसके साथ कौन-से लक्षण दिखाई देते हैं, इस पर ध्यान देना जरूरी है।
पेट फूलने और गैस से बचने के लिए अपनाएं ये 4 तरीके
1. भोजन से पहले फाइबर युक्त चीजें सीमित मात्रा में खाएं
अगर आप भारी भोजन करने वाले हैं, तो उससे पहले थोड़ी मात्रा में सब्जियां, सलाद या हल्का सूप लेना मददगार हो सकता है। इससे भोजन में विविधता आती है और कुछ लोगों को जरूरत से ज्यादा खाने से बचने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, फाइबर हर व्यक्ति के पाचन पर एक जैसा असर नहीं डालता। कुछ लोगों को कच्ची सब्जियों या अचानक बहुत ज्यादा फाइबर खाने से गैस और पेट फूलने की परेशानी बढ़ सकती है। इसलिए अपनी सहनशीलता के अनुसार फाइबर की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाएं।
2. धीरे-धीरे खाएं और भोजन अच्छी तरह चबाएं
जल्दी-जल्दी खाना खाने से आप जरूरत से ज्यादा भोजन कर सकते हैं और खाते समय अधिक हवा भी निगल सकते हैं। इससे डकार और पेट में असहजता बढ़ सकती है।
इससे बचने के लिए भोजन आराम से खाएं, हर निवाले को अच्छी तरह चबाएं और खाने के बीच थोड़ा समय लें। पेट भरने का एहसास होने पर खाना रोक दें। इससे एक बार में बहुत ज्यादा खाने की आदत को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
3. खाने के साथ सोडा और कार्बोनेटेड ड्रिंक्स लेने से बचें
सोडा, स्पार्कलिंग ड्रिंक्स और दूसरे कार्बोनेटेड पेय पदार्थों में घुली गैस पेट में पहुंचकर डकार और पेट फूलने की परेशानी बढ़ा सकती है। अगर आपको खाना खाने के बाद अक्सर ब्लोटिंग होती है, तो इन पेय पदार्थों का सेवन कम करके देखें।
भोजन के दौरान अपनी प्यास के अनुसार पानी पिएं। सामान्य रूप से पानी पीने से बचने की जरूरत नहीं है। अगर एक बार में बहुत ज्यादा पानी पीने से आपको भारीपन महसूस होता है, तो थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पानी पी सकते हैं।
4. खाना खाने के बाद 10 से 15 मिनट हल्की सैर करें
भारी भोजन के बाद तुरंत लेटने के बजाय थोड़ी देर हल्की सैर करना उपयोगी हो सकता है। भोजन के बाद 10 से 15 मिनट आरामदायक गति से चलने से पाचन तंत्र की सामान्य गतिविधियों को सहारा मिल सकता है।
इसके लिए तेज व्यायाम करने या खुद को थकाने की जरूरत नहीं है। हल्की सैर को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं और भोजन के तुरंत बाद लंबे समय तक एक ही जगह बैठे रहने से बचें।
किन खाद्य पदार्थों से बढ़ सकती है ब्लोटिंग की समस्या?
कुछ लोगों में विशेष खाद्य पदार्थ पेट फूलने की परेशानी बढ़ा सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
तली-भुनी और अधिक वसा वाली चीजें।
सोडा और दूसरे कार्बोनेटेड पेय।
दूध या दूध से बने उत्पाद, खासकर लैक्टोज असहिष्णुता होने पर।
कुछ दालें, बीन्स और गैस बनाने वाली सब्जियां।
बहुत ज्यादा मात्रा में एक साथ खाया गया भोजन।
कुछ लोगों में चीनी के विकल्प वाले उत्पाद, जैसे सोर्बिटोल युक्त खाद्य पदार्थ।
हर व्यक्ति के लिए समस्या पैदा करने वाले खाद्य पदार्थ अलग हो सकते हैं। इसलिए बिना कारण सभी खाद्य पदार्थों को अपनी डाइट से हटाने के बजाय यह ध्यान दें कि किस चीज को खाने के बाद परेशानी बढ़ती है।
कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है?
अगर पेट फूलने की समस्या बार-बार हो रही है, लंबे समय तक बनी रहती है या खानपान में बदलाव के बावजूद ठीक नहीं होती, तो डॉक्टर से सलाह लें। इसके पीछे कब्ज, खाद्य असहिष्णुता या पाचन तंत्र से जुड़ी दूसरी समस्या हो सकती है।
पेट में तेज या लगातार दर्द, बार-बार उल्टी, मल में खून, बिना कोशिश वजन कम होना या लगातार भूख कम लगने जैसे लक्षण होने पर चिकित्सकीय जांच कराएं। अगर पेट बहुत ज्यादा फूल रहा हो और साथ में मल या गैस बिल्कुल नहीं निकल रही हो, खासकर दर्द या उल्टी के साथ, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लें।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और उपलब्ध विशेषज्ञ सलाह पर आधारित है। पेट फूलने के कारण हर व्यक्ति में अलग हो सकते हैं। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर डॉक्टर से परामर्श लें। यह लेख चिकित्सकीय जांच, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है।
वाराणसी: काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। यहां के प्राचीन मंदिर अपनी अनूठी बनावट, धार्मिक परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में एक है केदार घाट के पास स्थित गौरी केदारेश्वर मंदिर। यहां स्थापित शिवलिंग का स्वरूप दूसरे शिव मंदिरों से अलग बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, यह शिवलिंग दो भागों में विभाजित है और इसमें भगवान शिव-माता पार्वती के साथ भगवान विष्णु-माता लक्ष्मी के स्वरूप की भी प्रतीकात्मक उपस्थिति मानी जाती है।
इस मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता भक्तों का ध्यान खींचती है। कहा जाता है कि भगवान शिव यहां अर्पित किया गया भोग स्वयं ग्रहण करने आते हैं। यही वजह है कि काशी आने वाले अनेक श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन और पूजा करने पहुंचते हैं।
दो भागों में दिखाई देता है शिवलिंग का स्वरूप
गौरी केदारेश्वर मंदिर का शिवलिंग अपने विशेष आकार के लिए जाना जाता है। धार्मिक मान्यता में इसके एक भाग को भगवान शिव और माता पार्वती से, जबकि दूसरे भाग को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी से जोड़ा जाता है। इसी कारण इसे हरि और हर यानी भगवान विष्णु तथा भगवान शिव के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक भी माना जाता है।
मंदिर की परंपरा में देवी-देवताओं के विभिन्न स्वरूपों की एकता का भाव दिखाई देता है। भक्त मानते हैं कि यहां दर्शन करने से भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और मां अन्नपूर्णा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। ये धार्मिक मान्यताएं श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा हैं।
काशी विश्वनाथ मंदिर से भी प्राचीन माना जाता है
केदार घाट के निकट स्थित इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यह काशी विश्वनाथ मंदिर से भी प्राचीन है। मंदिर की प्राचीनता से जुड़ी परंपराएं इसे काशी के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में स्थान देती हैं।
कहा जाता है कि काशी की यात्रा के दौरान इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने भी यहां दर्शन किए थे और मंदिर की व्यवस्था को बेहतर बनाने में योगदान दिया था। अहिल्याबाई होल्कर ने देश के कई प्रमुख तीर्थस्थलों और मंदिरों के संरक्षण तथा निर्माण कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
ऋषि मांधाता की तपस्या से जुड़ी है पौराणिक कथा
गौरी केदारेश्वर मंदिर के बारे में प्रचलित पौराणिक कथा ऋषि मांधाता की तपस्या से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार, ऋषि मांधाता ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया था। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इसी स्थान पर अपने स्वरूप में विराजमान होने की बात कही।
कथा के अनुसार, भगवान शिव ने यह भी बताया था कि अलग-अलग युगों में इस शिवलिंग का स्वरूप अलग होगा। सतयुग में इसे नवरत्नों से बना, त्रेतायुग में स्वर्णमय, द्वापरयुग में रजतमय और कलियुग में पत्थर के स्वरूप में माना गया। धार्मिक परंपरा में इस शिवलिंग को भक्तों की शुभ मनोकामनाएं पूरी करने वाला बताया जाता है।
शिवलिंग में मां अन्नपूर्णा के निवास की मान्यता
मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता मां अन्नपूर्णा से संबंधित है। कहा जाता है कि शिवलिंग का संबंध अन्न और अन्नपूर्णा की कृपा से भी है। मान्यता के अनुसार, यहां श्रद्धापूर्वक दर्शन-पूजन करने वाले भक्तों के घर में अन्न की कमी नहीं रहती और परिवार पर मां अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
काशी में मां अन्नपूर्णा को भोजन और पोषण की देवी माना जाता है। इस वजह से मंदिर की परंपरा में अन्न और भोग का विशेष महत्व बताया जाता है।
यहां चार पहर की आरती और खिचड़ी के भोग की परंपरा
गौरी केदारेश्वर मंदिर की पूजा-विधि भी इसकी खास पहचान मानी जाती है। प्रचलित जानकारी के अनुसार, यहां पुजारी बिना सिले हुए वस्त्र पहनकर चार पहर की आरती करते हैं। भगवान को बेलपत्र, दूध और गंगाजल अर्पित किया जाता है। इसके साथ ही खिचड़ी का भोग लगाने की परंपरा भी बताई जाती है।
भक्तों की मान्यता है कि भगवान शिव इस मंदिर में भोग ग्रहण करने स्वयं आते हैं। यह विश्वास मंदिर की स्थानीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। सावन के महीने में भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व होने के कारण इस तरह के प्राचीन मंदिरों में श्रद्धालुओं की आस्था और बढ़ जाती है।
सावन में क्यों खास है गौरी केदारेश्वर मंदिर?
सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करके सुख-समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। काशी के गौरी केदारेश्वर मंदिर में भी भक्त विशेष श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर का अनोखा शिवलिंग, ऋषि मांधाता से जुड़ी कथा और अन्नपूर्णा की कृपा से संबंधित मान्यताएं इसे काशी के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं। यहां की परंपराएं इस बात को दर्शाती हैं कि काशी में मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही आस्था और संस्कृति के केंद्र भी हैं।
डिस्क्लेमर: इस लेख में वर्णित पौराणिक कथाएं और भोग ग्रहण करने से जुड़ी बातें धार्मिक मान्यताओं एवं स्थानीय परंपराओं पर आधारित हैं। इन्हें ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के बजाय आस्था और परंपरा के संदर्भ में समझना चाहिए।
बिहार के गोपालगंज में एक ऐसी घटना सामने आई, जिसने परिवार और आसपास के लोगों को स्तब्ध कर दिया। जिस बुजुर्ग महिला ने अपने नाती को परिवार का हिस्सा मानकर अपने पास जगह दी थी, उसी पर उसकी हत्या करने का आरोप लगा। रात में सभी लोग एक ही कमरे में सो रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद घर में चीख-पुकार मच जाएगी और एक परिवार की जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाएगी।
घटना कटेया थाना क्षेत्र के बनरहां गांव की बताई गई है। मृतका की पहचान 85 वर्षीय कोईलासी खातून के रूप में हुई। हत्या का आरोप उनके 21 वर्षीय नाती साहेब हुसैन पर लगा। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, इतनी गंभीर वारदात के पीछे की असली वजह का तत्काल खुलासा नहीं हो सका था।
तबीयत खराब होने पर मामा के घर आया था युवक
पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक, आरोपी मूल रूप से भोरे थाना क्षेत्र के ईमिलिया गांव का रहने वाला था। वह बचपन से ही अपने मामा के घर बनरहां गांव में रहता आया था। हालांकि, पिछले कुछ दिनों से वह अपने गांव में रह रहा था।
बताया गया कि इसी दौरान उसकी तबीयत खराब हो गई। इसके बाद वह शुक्रवार को दोबारा मामा के घर पहुंचा। परिवार को शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि वहां बिताई जा रही रात इतनी दर्दनाक घटना की गवाह बन जाएगी।
खाना खाकर सोया परिवार, रात करीब दो बजे मची अफरातफरी
रविवार की रात परिवार ने सामान्य तरीके से खाना खाया। इसके बाद आरोपी अपनी नानी और ममेरे भाई के साथ एक ही कमरे में सो गया। रात करीब दो बजे अचानक ऐसी घटना हुई, जिसने पूरे घर को दहला दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी अचानक उठा और चाकू से अपनी नानी पर लगातार हमला कर दिया। महिला के सिर पर भी कई वार किए जाने की बात सामने आई। बताया गया कि उन पर करीब 24 बार चाकू से वार किया गया था। गंभीर चोटों के कारण बुजुर्ग महिला की मौके पर ही मौत हो गई।
कमरे में मौजूद ममेरे भाई ने जब यह सब देखा तो वह घबरा गया। वह शोर मचाते हुए कमरे से बाहर भागा और आसपास के लोगों को जगाया। आवाज सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक महिला की जान जा चुकी थी।
गांव में जुटे लोग, पुलिस ने आरोपी को पकड़ा
घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची। वारदात की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने जांच शुरू की और काफी मशक्कत के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
महिला के शव को पोस्टमार्टम के लिए गोपालगंज सदर अस्पताल भेजा गया। सोमवार को फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की टीम ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और जरूरी साक्ष्य जुटाए। पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल किए गए चाकू समेत अन्य सामान बरामद किए जाने की जानकारी दी।
आखिर नानी की हत्या क्यों की? पुलिस तलाश रही जवाब
इस घटना में सबसे बड़ा सवाल यही था कि युवक ने अपनी 85 वर्षीय नानी पर हमला क्यों किया। उपलब्ध रिपोर्ट में हत्या की स्पष्ट वजह सामने नहीं आई थी। पुलिस आरोपी से पूछताछ कर रही थी और घटना से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही थी।
फिलहाल, परिवार के भीतर हुई इस वारदात ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। एक बुजुर्ग महिला की जान चली गई और घटना का प्रत्यक्षदर्शी रहा परिवार का सदस्य भी गहरे सदमे में पहुंच गया। हत्या के पीछे की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
डिस्क्लेमर: यह कहानी उपलब्ध समाचार रिपोर्टों में दी गई जानकारी के आधार पर लिखी गई है। हत्या के पीछे की वजह की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में अंतिम निष्कर्ष पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
हिसार: हरियाणा के हिसार जिले के सातरोड खास गांव में 42 वर्षीय महेश की मौत के मामले में पुलिस ने उसकी पत्नी सीमा को गिरफ्तार किया है। मृतक के भाई ने आरोप लगाया था कि पति-पत्नी के बीच रात में विवाद हुआ था और इसी दौरान महेश को चोटें पहुंचाने के बाद उसका गला दबाया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण गला दबाना बताया गया है। पुलिस अब आरोपी महिला से पूछताछ कर मामले की परिस्थितियों और घटनाक्रम का पता लगाने में जुटी है।
पति-पत्नी के बीच अक्सर होता था विवाद
पुलिस के अनुसार, महेश अपनी पत्नी सीमा और बच्चों के साथ सातरोड खास गांव में किराये के मकान में रहता था। मृतक के भाई सुरेश ने पुलिस को बताया कि दोनों के बीच अक्सर घरेलू मामलों को लेकर झगड़े होते रहते थे।
सुरेश के मुताबिक, महेश की मौत की सूचना मिलने पर वह मौके पर पहुंचा तो उसका भाई फोल्डिंग पर मृत अवस्था में पड़ा हुआ था। इसके बाद उसने पुलिस को शिकायत दी और संदेह जताया कि रात में पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि इसी दौरान सीमा ने महेश को चोटें पहुंचाईं और गला दबाकर उसकी हत्या कर दी।
पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामले में कार्रवाई करते हुए सीमा को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि, घटना के पीछे की वास्तविक परिस्थितियों और आरोपी की भूमिका से जुड़े सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।
पोस्टमार्टम में गला दबाने से मौत की पुष्टि
महेश के शव को पोस्टमार्टम के लिए हिसार के नागरिक अस्पताल ले जाया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, रविवार शाम शव अस्पताल पहुंचने के बाद पोस्टमार्टम नहीं हो सका। सोमवार दोपहर तक प्रक्रिया शुरू नहीं होने पर परिजनों ने अस्पताल के प्रधान चिकित्सा अधिकारी (पीएमओ) से शिकायत की।
परिजनों को बताया गया कि संबंधित डॉक्टर किसी मामले के सिलसिले में अदालत गए हुए थे। इसके बाद डॉक्टर से संपर्क किया गया और शव को दूसरे स्थान पर भेजने की बात भी सामने आई। पुलिसकर्मियों ने भी चिकित्सा अधिकारियों से बातचीत की। अंततः सोमवार दोपहर करीब एक बजे डॉक्टरों के बोर्ड ने पोस्टमार्टम की प्रक्रिया शुरू की।
पोस्टमार्टम में महेश की मौत का कारण गला दबाना सामने आया। उसकी गर्दन पर नाखूनों जैसे निशान भी मिले। इसके अलावा शरीर के अन्य हिस्सों पर चोटों के निशान होने की जानकारी दी गई है।
पुलिस रिमांड पर लेकर करेगी पूछताछ
पुलिस ने सुरेश के बयान के आधार पर मामला दर्ज कर सीमा को गिरफ्तार किया है। अब उससे पूछताछ कर यह पता लगाने का प्रयास किया जाएगा कि घटना से पहले पति-पत्नी के बीच क्या हुआ था और महेश को लगी चोटों की परिस्थितियां क्या थीं।
पुलिस मामले से जुड़े साक्ष्यों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर आगे की जांच कर रही है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के अनुसार आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
डिस्क्लेमर: यह रिपोर्ट उपलब्ध समाचार जानकारी और शिकायत में लगाए गए आरोपों पर आधारित है। मामले की जांच जारी है। आरोपी की दोषसिद्धि का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।