लुधियाना, पंजाब: सोने-चांदी के कारोबार में कम समय में बड़ा मुनाफा कमाने का भरोसा देकर एक महिला डॉक्टर से कथित तौर पर 75 लाख रुपये की ठगी किए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि एक व्यक्ति ने डॉक्टर से 40 लाख रुपये नकद और बैंक खातों के जरिए लिए, जबकि करीब 35 लाख रुपये मूल्य का सोना भी हासिल किया। पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है।
कारोबार में निवेश के नाम पर बढ़ाया भरोसा
शिकायत के मुताबिक, आरोपी वरुण वर्मा ने पहले महिला डॉक्टर से मेलजोल बढ़ाया और खुद को सोने-चांदी के कारोबार से जुड़ा हुआ बताया। इसके बाद उसने कथित तौर पर डॉक्टर को कारोबार में पैसा लगाने पर कम समय में अच्छा मुनाफा मिलने का भरोसा दिलाया।
आरोप है कि आरोपी की बातों पर विश्वास करके डॉक्टर ने अलग-अलग किस्तों में कुल 40 लाख रुपये नकद और बैंक खातों के माध्यम से उसे दे दिए।
35 लाख रुपये का सोना भी लेने का आरोप
शिकायत के अनुसार, पैसों के अलावा आरोपी ने सोने के कारोबार के नाम पर डॉक्टर से करीब 35 लाख रुपये मूल्य का सोना भी ले लिया। इस तरह शिकायतकर्ता के मुताबिक कुल 75 लाख रुपये की रकम और संपत्ति आरोपी के पास पहुंच गई।
काफी समय बीतने के बाद जब कथित तौर पर न तो मुनाफे की रकम मिली और न ही निवेश का हिसाब दिया गया, तो डॉक्टर ने अपने पैसे और सोना वापस मांगना शुरू किया।
पैसे और सोना लौटाने से किया इनकार
शिकायतकर्ता का आरोप है कि शुरुआत में आरोपी टालमटोल करता रहा और बाद में रकम तथा सोना वापस करने से कथित तौर पर इनकार कर दिया। इसके बाद महिला डॉक्टर ने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष शिकायत दी।
पुलिस की जांच में बैंक लेन-देन और संबंधित लोगों के बयानों समेत अन्य तथ्यों की पड़ताल की गई। इसके बाद थाना डिविजन नंबर 8 में आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी से संबंधित मामला दर्ज किया गया।
आरोपी की तलाश में जुटी पुलिस
पुलिस अब आरोपी के बैंक खातों और लेन-देन की जानकारी खंगाल रही है। साथ ही उसके संभावित ठिकानों पर दबिश देने की कार्रवाई की जा रही है। पुलिस का कहना है कि आरोपी की गिरफ्तारी के बाद कथित तौर पर ठगी गई रकम और सोने की बरामदगी के प्रयास किए जाएंगे।
मामले की जांच जारी है और पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित ठगी में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं।
नोट: मामले में लगाए गए आरोप शिकायत और पुलिस जांच पर आधारित हैं। आरोपी की दोषसिद्धि अदालत के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी।
नई दिल्ली: अंतरिक्ष को दूर से देखने पर यह बेहद खूबसूरत और रहस्यमयी नजर आता है, लेकिन इंसान के लिए वहां का वातावरण बेहद खतरनाक है। अगर कोई व्यक्ति बिना स्पेस सूट के सीधे अंतरिक्ष के निर्वात में पहुंच जाए, तो क्या उसका शरीर तुरंत फट जाएगा? क्या वह कुछ ही सेकंड में जम जाएगा? हकीकत फिल्मों में दिखाई जाने वाली तस्वीर से काफी अलग है।
कुछ ही सेकंड में होश खो सकता है इंसान
अंतरिक्ष में सांस लेने के लिए हवा नहीं होती और बाहरी वायुमंडलीय दबाव भी लगभग शून्य होता है। ऐसे वातावरण में पहुंचते ही शरीर तेजी से ऑक्सीजन की कमी का सामना करने लगता है।
दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचने के कारण व्यक्ति करीब 10 से 15 सेकंड के भीतर बेहोश हो सकता है। अगर उसे तुरंत सुरक्षित वातावरण और ऑक्सीजन उपलब्ध न कराई जाए तो कुछ ही समय में स्थिति जानलेवा हो जाती है।
सांस रोकना बन सकता है खतरनाक
अगर कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में अपनी सांस रोकने की कोशिश करे तो यह बेहद नुकसानदायक हो सकता है। कम दबाव वाले वातावरण में फेफड़ों के अंदर मौजूद हवा फैल सकती है और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।
इसी वजह से अंतरिक्ष के निर्वात के संपर्क में आने पर सांस रोकने के बजाय फेफड़ों से हवा बाहर निकलने देना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है।
शरीर फूल सकता है, लेकिन फटेगा नहीं
अंतरिक्ष के बेहद कम दबाव के कारण शरीर के कुछ तरल पदार्थों में बदलाव आने लगता है। कम दबाव की वजह से शरीर के सतही हिस्सों में मौजूद नमी वाष्प बनने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इससे शरीर में सूजन आ सकती है। इस स्थिति को वैज्ञानिक तौर पर इबुलिज्म से जोड़ा जाता है।
हालांकि, इंसान का शरीर गुब्बारे की तरह फट नहीं जाता। त्वचा और शरीर के ऊतक कुछ हद तक आंतरिक दबाव को संभाल सकते हैं।
क्या इंसान तुरंत जम जाएगा?
यह भी फिल्मों में दिखाई जाने वाली आम गलतफहमी है कि अंतरिक्ष में जाते ही शरीर बर्फ में बदल जाएगा। वास्तव में ऐसा तुरंत नहीं होता।
अंतरिक्ष में तापमान की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि शरीर सीधे सूर्य के प्रकाश में है या छाया में। शरीर की गर्मी के बाहर निकलने की प्रक्रिया भी पृथ्वी के वातावरण जैसी नहीं होती। इसलिए व्यक्ति कुछ ही सेकंड में बर्फ की तरह नहीं जमता।
सूर्य की किरणें भी बन सकती हैं खतरा
अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसा वातावरण और ओजोन परत मौजूद नहीं होती, जो सूर्य की कुछ हानिकारक विकिरणों को रोकती है। सीधे सूर्य के संपर्क में आने पर त्वचा को तेज पराबैंगनी विकिरण का नुकसान हो सकता है।
लेकिन तत्काल सबसे बड़ा खतरा यूवी किरणें नहीं, बल्कि ऑक्सीजन की कमी और बेहद कम दबाव होता है।
बचने के लिए कितना समय मिलेगा?
बिना सुरक्षा के अंतरिक्ष के निर्वात में इंसान के पास बेहद कम समय होता है। कुछ सेकंड में चेतना जा सकती है और लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी रहने पर शरीर के महत्वपूर्ण अंग गंभीर रूप से प्रभावित होने लगते हैं।
अगर व्यक्ति को बहुत जल्दी दबाव वाले वातावरण में वापस लाया जाए और ऑक्सीजन उपलब्ध कराई जाए, तो बचने की संभावना हो सकती है। इसलिए यह कहना कि हर स्थिति में 1-2 मिनट में निश्चित रूप से मौत हो जाएगी, बहुत ज्यादा निश्चित दावा होगा।
फिल्मों जैसा नहीं होता शरीर का हाल
साइंस फिक्शन फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि अंतरिक्ष में पहुंचते ही इंसान का शरीर धमाके के साथ फट जाता है या वह तुरंत बर्फ की मूर्ति बन जाता है। वास्तविकता इससे अलग है।
बिना स्पेस सूट के अंतरिक्ष में जाना निश्चित रूप से जानलेवा स्थिति है, लेकिन शरीर तुरंत टुकड़ों में नहीं बिखरता। असली खतरा वैक्यूम, ऑक्सीजन की कमी और शरीर पर पड़ने वाले कम दबाव के प्रभाव से पैदा होता है।
लुधियाना में नशा तस्करों और असामाजिक तत्वों के खिलाफ चलाए जा रहे कॉरडन एंड सर्च ऑपरेशन (CASO) के बीच चोरी के दोपहिया वाहनों से जुड़ा मामला सामने आया है। जसपाल बांगर इलाके की जय श्री राम कॉलोनी में एक युवक को घर के बाहर संदिग्ध मोटरसाइकिल के कलपुर्जे अलग करते हुए स्थानीय लोगों ने पकड़ लिया। लोगों ने युवक से पूछताछ की और पूरे मामले की सूचना पुलिस को दी।
घटना उस समय सामने आई, जब जसपाल बांगर इलाके में पुलिस की ओर से बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा था। मुख्य रास्तों से लेकर संकरी गलियों तक पुलिस की टीमें चैकिंग कर रही थीं। इसी दौरान जय श्री राम कॉलोनी में एक युवक मोटरसाइकिल को खोलकर उसके अलग-अलग पार्ट्स निकाल रहा था।
युवक की गतिविधियां संदिग्ध लगने पर आसपास के लोग वहां पहुंच गए। उन्होंने उससे मोटरसाइकिल के बारे में जानकारी मांगी और वाहन के दस्तावेज दिखाने को कहा। स्थानीय लोगों के मुताबिक, युवक के पास बाइक से संबंधित वैध कागजात नहीं थे। लोगों ने मौके की पूरी घटना को कैमरे में रिकॉर्ड किया, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर भी चर्चा में आ गया।
हंगामे के दौरान युवक के पिता मनोज उपाध्याय से भी मोटरसाइकिल के बारे में सवाल किए गए। उन्होंने दावा किया कि मोटरसाइकिल खरीदी गई है। हालांकि, जब उनसे बाइक की आरसी या खरीद से संबंधित दस्तावेज दिखाने को कहा गया तो वह मौके पर कोई वैध कागजात पेश नहीं कर सके।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि युवक चोरी की बाइकों को सस्ते में खरीदकर उन्हें काटता है और बाद में उनके स्पेयर पार्ट्स अलग-अलग बेच देता है। पूछताछ के दौरान युवक ने कथित तौर पर बताया कि वह मोटरसाइकिल को सस्ते में लेकर आया था और उसके पार्ट्स अलग करके बेचने की तैयारी में था। हालांकि, इन दावों की पुलिस स्तर पर जांच की जा रही है।
मामले की सूचना मिलते ही स्थानीय लोगों ने 112 पुलिस कंट्रोल रूम पर फोन किया। सूचना मिलने के बाद पीसीआर टीम मौके पर पहुंची। पीसीआर मुलाजिम मलकीत सिंह और उनकी टीम ने वहां मौजूद लोगों से प्राथमिक पूछताछ की और संदिग्ध मोटरसाइकिल को अपने कब्जे में ले लिया।
पुलिस ने मोटरसाइकिल को आगे की जांच के लिए संबंधित पुलिस चौकी कंगनवाल को सौंप दिया है। अब पुलिस वाहन के इंजन और चेसिस नंबर की जांच कर रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि मोटरसाइकिल चोरी की है या नहीं और इसका असली मालिक कौन है।
स्थानीय लोगों ने यह भी दावा किया कि संबंधित युवक पहले भी चोरी के मामलों में संदिग्ध रहा है। हालांकि, पुलिस ने फिलहाल उसके किसी पुराने आपराधिक रिकॉर्ड की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। इसलिए इस पहलू की भी जांच की जा रही है।
पुलिस चौकी कंगनवाल की ओर से वाहन के रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच की जा रही है। यदि जांच में मोटरसाइकिल चोरी की पाई जाती है तो वाहन चोरी और चोरी की संपत्ति को खरीदने या उससे जुड़े अन्य आरोपों के तहत कार्रवाई की जा सकती है। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश करेगी कि अगर बाइक चोरी की है तो इसे कहां से हासिल किया गया था और इसके पीछे किसी बड़े वाहन चोरी या अवैध स्क्रैप नेटवर्क की भूमिका है या नहीं।
खास बात यह है कि जिस समय जसपाल बांगर इलाके में पुलिस का व्यापक सर्च ऑपरेशन चल रहा था, उसी दौरान रिहायशी कॉलोनी में बाइक के पार्ट्स अलग किए जाने का मामला सामने आया। अब पुलिस की जांच से ही स्पष्ट होगा कि बरामद मोटरसाइकिल चोरी की थी या नहीं और इस मामले में युवक की वास्तविक भूमिका क्या है। फिलहाल संदिग्ध मोटरसाइकिल पुलिस के कब्जे में है और मामले की जांच जारी है।
नई दिल्ली: इंसानी दिमाग को दुनिया की सबसे जटिल जैविक संरचनाओं में से एक माना जाता है। हमारे दिमाग में करीब 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं और ये अरबों-खरबों कनेक्शनों के जरिए एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसके बावजूद अगर बात तेज गणितीय गणना या बड़ी मात्रा में डेटा को कुछ ही पलों में प्रोसेस करने की हो, तो आधुनिक कंप्यूटर इंसानी दिमाग से कहीं आगे निकल जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है?
कंप्यूटर की सिग्नल स्पीड बहुत ज्यादा होती है
कंप्यूटर प्रोसेसर इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल के जरिए काम करते हैं और आधुनिक प्रोसेसर की क्लॉक स्पीड गीगाहर्ट्ज तक पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्रोसेसर एक सेकंड में अरबों चक्र पूरे कर सकता है।
इसके मुकाबले दिमाग के न्यूरॉन्स इलेक्ट्रोकेमिकल सिग्नल के जरिए एक-दूसरे से संवाद करते हैं। इन सिग्नल की गति इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसर की तुलना में काफी कम होती है। कुछ तेज नर्व फाइबर में सिग्नल की गति करीब 100 से 120 मीटर प्रति सेकंड तक हो सकती है।
इसलिए केवल सिग्नल की रफ्तार के आधार पर देखें तो कंप्यूटर स्पष्ट रूप से ज्यादा तेज है। लेकिन दिमाग की ताकत सिर्फ उसकी स्पीड में नहीं है।
दिमाग एक साथ कई काम कर सकता है
इंसानी दिमाग बड़े पैमाने पर पैरेलल प्रोसेसिंग करता है। यानी एक ही समय में अलग-अलग तरह की सूचनाओं पर काम किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति सड़क पार करता है, तो उसका दिमाग एक साथ आसपास की गाड़ियों को देखता है, आवाजों को पहचानता है, दूरी और गति का अंदाजा लगाता है, शरीर का संतुलन बनाए रखता है और पिछले अनुभवों के आधार पर फैसला करता है।
ये सभी प्रक्रियाएं एक ही क्रम में नहीं होतीं, बल्कि दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं। यही वजह है कि न्यूरॉन्स की व्यक्तिगत सिग्नल स्पीड धीमी होने के बावजूद दिमाग जटिल परिस्थितियों में बेहद प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया कर सकता है।
सिर्फ न्यूरॉन्स की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं
दिमाग की क्षमता को समझने के लिए केवल 86 अरब न्यूरॉन्स की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। इन न्यूरॉन्स के बीच मौजूद कनेक्शन भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
एक न्यूरॉन कई दूसरे न्यूरॉन्स के साथ सिनेप्स के जरिए जुड़ सकता है। दिमाग में इन कनेक्शनों की संख्या बहुत विशाल है। यही नेटवर्क सीखने, याद रखने, चीजों को पहचानने और नए विचार बनाने जैसी क्षमताओं का आधार बनता है।
कंप्यूटर में जानकारी आमतौर पर तय किए गए निर्देशों और एल्गोरिदम के आधार पर प्रोसेस होती है, जबकि दिमाग अनुभव और सीखने के साथ अपने न्यूरल कनेक्शनों में बदलाव कर सकता है।
दिमाग बेहद कम ऊर्जा में काम करता है
दिमाग की एक बड़ी खासियत उसकी ऊर्जा दक्षता भी है। इंसानी दिमाग सामान्य तौर पर करीब 20 वॉट के आसपास ऊर्जा का इस्तेमाल करता है, फिर भी वह लगातार शरीर को नियंत्रित करने, इंद्रियों से मिलने वाली जानकारी को समझने और जटिल निर्णय लेने का काम करता रहता है।
इसके विपरीत बड़े हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम को चलाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है। बड़े सुपरकंप्यूटर कई मेगावॉट तक बिजली का इस्तेमाल कर सकते हैं।
तो क्या कंप्यूटर दिमाग से ज्यादा स्मार्ट है?
ऐसा सीधे तौर पर कहना सही नहीं होगा। कंप्यूटर बेहद तेज गणना, डेटा प्रोसेसिंग और दोहराए जाने वाले कार्यों में इंसानी दिमाग से बहुत आगे हैं। लेकिन इंसानी दिमाग सीखने, संदर्भ समझने, भावनाओं को पहचानने, अनुभव से निर्णय लेने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने में बेहद सक्षम है।
यानी कंप्यूटर की ताकत उसकी रफ्तार और गणना क्षमता है, जबकि दिमाग की ताकत उसकी जटिलता, समानांतर काम करने की क्षमता, सीखने की क्षमता और ऊर्जा दक्षता में छिपी है।
महोबा जिले के कबरई क्षेत्र में साढ़े 3 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म का गंभीर मामला सामने आया है। घटना उस समय हुई, जब बच्ची अपने माता-पिता के साथ खेत पर गई थी। माता-पिता पास के खेत में काम कर रहे थे, जबकि बच्ची झोपड़ी में अकेली थी। इसी दौरान गांव का रहने वाला एक युवक कथित तौर पर झोपड़ी में घुस गया और बच्ची को अपना शिकार बनाया।
जानकारी के मुताबिक, घटना बीती देर शाम कबरई क्षेत्र के एक गांव में हुई। बच्ची के माता-पिता खेत में काम कर रहे थे और बच्ची पास की झोपड़ी में मौजूद थी। आरोप है कि इसी दौरान करीब 25 साल का युवक वहां पहुंचा और बच्ची के साथ जबरदस्ती की।
बताया गया कि आरोपी ने बच्ची का मुंह हाथ से दबा दिया था। घटना के दौरान बच्ची दर्द से परेशान होकर चीखने लगी। उसकी आवाज सुनकर बच्ची के माता-पिता के साथ आसपास के खेतों में काम कर रहे किसान भी झोपड़ी की तरफ दौड़े। लोगों को अपनी ओर आता देख आरोपी बच्ची को छोड़कर वहां से भाग निकला।
जब परिजन और आसपास के लोग झोपड़ी में पहुंचे तो बच्ची गंभीर हालत में पड़ी मिली। बच्ची के शरीर पर चोट के निशान थे और वह लहूलुहान थी। परिजन तत्काल उसे इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उसका उपचार कराया गया।
घटना की सूचना पुलिस को भी दी गई। पीआरबी के जरिए जानकारी मिलने के बाद पुलिस टीम तत्काल मौके पर पहुंची और घटनास्थल का जायजा लिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया।
पुलिस ने घटना के बाद आरोपी की तलाश शुरू कर दी। पुलिस के मुताबिक, आरोपी गांव का ही रहने वाला है और वह वारदात के बाद फरार होने की कोशिश कर रहा था। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उसे फरार होने से पहले गिरफ्तार कर लिया।
पुलिस अब आरोपी से पूछताछ कर घटना से जुड़े अन्य तथ्यों की जानकारी जुटा रही है। वहीं, बच्ची को आवश्यक चिकित्सकीय उपचार दिलाया जा रहा है। मामले में पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया शुरू कर दी है और जांच आगे बढ़ाई जा रही है।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले में नियमानुसार विधिक कार्रवाई की जा रही है। बच्ची की स्थिति और मेडिकल जांच से जुड़े तथ्यों को भी जांच का हिस्सा बनाया गया है। घटना के बाद गांव में भी लोगों में आक्रोश है।
नई दिल्ली: भारत को भाषाई विविधता वाला देश कहा जाता है, जहां अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। आमतौर पर कई लोगों को लगता है कि हिंदी के बाद भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा उर्दू है, लेकिन 2011 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़े कुछ और तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक हिंदी के बाद बंगाली भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, जबकि उर्दू इस सूची में सातवें स्थान पर आती है।
हिंदी सबसे आगे
2011 की जनगणना के अनुसार हिंदी देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। करीब 52.83 करोड़ लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था। यह कुल आबादी का लगभग 43.63 प्रतिशत है।
जनगणना में हिंदी की श्रेणी के तहत कई बोलियों और भाषाई रूपों को भी शामिल किया गया है। इनमें भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी और हिमाचली समेत कई अन्य भाषाएं और बोलियां शामिल हैं।
दूसरे नंबर पर बंगाली
बंगाली भारत में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। करीब 9.72 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा बताते हैं, जो उस समय की आबादी का लगभग 8.03 प्रतिशत है।
पश्चिम बंगाल बंगाली भाषा का प्रमुख केंद्र है। इसके अलावा त्रिपुरा, असम की बराक घाटी और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भी बड़ी संख्या में लोग बंगाली बोलते हैं।
मराठी तीसरे और तेलुगु चौथे नंबर पर
भाषाओं की सूची में मराठी तीसरे स्थान पर है। करीब 8.30 करोड़ लोग मराठी बोलते हैं। यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गोवा में बोली जाती है।
इसके बाद तेलुगु का नंबर आता है। करीब 8.11 करोड़ लोग तेलुगु बोलते हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। तेलुगु द्रविड़ भाषा परिवार की प्रमुख भाषाओं में शामिल है।
तमिल पांचवें स्थान पर
तमिल भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में पांचवें नंबर पर है। करीब 6.90 करोड़ लोग तमिल बोलते हैं। यह मुख्य रूप से तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है।
उर्दू सातवें नंबर पर
उर्दू को लेकर अक्सर यह धारणा रहती है कि हिंदी के बाद यही भारत में सबसे ज्यादा बोली जाती है, लेकिन जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उर्दू सातवें स्थान पर है।
करीब 5.07 करोड़ लोग उर्दू बोलते हैं। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना समेत देश के कई हिस्सों में बोली जाती है।
भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली टॉप-10 भाषाएं
हिंदी – करीब 52.83 करोड़ वक्ता
बंगाली – करीब 9.72 करोड़ वक्ता
मराठी – करीब 8.30 करोड़ वक्ता
तेलुगु – करीब 8.11 करोड़ वक्ता
तमिल – करीब 6.90 करोड़ वक्ता
गुजराती – करीब 5.54 करोड़ वक्ता
उर्दू – करीब 5.07 करोड़ वक्ता
कन्नड़ – करीब 4.37 करोड़ वक्ता
ओड़िया – करीब 3.75 करोड़ वक्ता
मलयालम – करीब 3.48 करोड़ वक्ता
देश की भाषाई विविधता की तस्वीर
2011 की जनगणना के आंकड़े भारत की विशाल भाषाई विविधता को दिखाते हैं। देश की बड़ी आबादी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 अनुसूचित भाषाओं में से किसी न किसी भाषा को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलती है।
इन आंकड़ों से साफ है कि हिंदी के बाद बंगाली भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इसके बाद मराठी, तेलुगु, तमिल, गुजराती और अन्य भाषाओं का स्थान आता है। करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली ये भाषाएं भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को दर्शाती हैं।
उन्नाव, उत्तर प्रदेश: बांगरमऊ कोतवाली क्षेत्र में कपड़े धोने को लेकर शुरू हुआ पारिवारिक विवाद कथित तौर पर खूनी संघर्ष में बदल गया। आरोप है कि परिवार के ही लोगों ने दिलशाद उर्फ पप्पू पर कुल्हाड़ी, तलवार और लाठी-डंडों से हमला कर दिया। गंभीर रूप से घायल दिलशाद को अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
वाशिंग मशीन में कपड़े धोने को लेकर हुआ विवाद
घटना बांगरमऊ के गंज मुरादाबाद स्थित मोचियाना मोहल्ले की बताई जा रही है। मृतक की पत्नी सूफिया बानो के मुताबिक, वह सुबह घर में वाशिंग मशीन से कपड़े धो रही थी। इसी दौरान उसके ससुर मुर्तजा ने कपड़े धोने को लेकर आपत्ति जताई।
बात बढ़ने पर परिवार के अन्य सदस्य भी कथित तौर पर विवाद में शामिल हो गए। महिला ने आरोप लगाया कि इसी दौरान उसके साथ मारपीट की गई, जिससे उसके हाथ में चोट आई। उसका दावा है कि उसने पुलिस से शिकायत भी की थी।
घर में घुसकर दिलशाद पर हमला करने का आरोप
महिला के अनुसार, विवाद के कुछ समय बाद आरोपियों ने कथित तौर पर दिलशाद पर हमला कर दिया। आरोप है कि हमलावरों के पास कुल्हाड़ी और तलवार जैसे धारदार हथियार थे।
हमले में दिलशाद गंभीर रूप से घायल होकर जमीन पर गिर गया। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस और डायल 112 की टीम मौके पर पहुंची और उसे तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बांगरमऊ ले जाया गया। डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।
पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में लिया
पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। सीओ बांगरमऊ के मुताबिक, सुबह करीब 9:30 बजे पारिवारिक विवाद में मारपीट की सूचना मिली थी। परिजनों की शिकायत के आधार पर संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है।
पुलिस ने मामले में कई मुख्य आरोपियों और संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है। घटना से जुड़े उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि जांच के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
नोट: मामले में लगाए गए आरोप पुलिस जांच और शिकायत पर आधारित हैं। आरोपियों की दोषसिद्धि अदालत के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी।
नई दिल्ली: आजकल खराब खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, बढ़ता वजन और हाई कोलेस्ट्रॉल दिल की सेहत के लिए बड़ी चिंता बन चुके हैं। ऐसे में डाइट में कौन-सी चीजें शामिल की जाएं, इसे लेकर लगातार रिसर्च सामने आती रहती हैं। एक नई स्टडी में एवोकाडो को लेकर दिलचस्प जानकारी सामने आई है।
रिसर्च के मुताबिक, पेट के आसपास मोटापे की समस्या से जूझ रहे लोगों ने करीब 6 महीने तक रोजाना एक एवोकाडो खाया तो उनके LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल से जुड़े कुछ कणों के स्तर में कमी देखी गई। शोधकर्ताओं ने इस बदलाव के आधार पर हृदय रोग के जोखिम में करीब 4% की संभावित कमी का अनुमान लगाया।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रोज एक एवोकाडो खाने से हार्ट अटैक या स्ट्रोक से बचाव की गारंटी मिल जाती है। अध्ययन में वास्तविक हार्ट अटैक या स्ट्रोक की घटनाओं को कम होते हुए सीधे नहीं मापा गया था।
786 लोगों पर की गई स्टडी
इस रिसर्च में 25 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 786 वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों में पेट के आसपास मोटापे की समस्या थी।
अध्ययन में पुरुषों की कमर का आकार करीब 40 इंच या उससे अधिक और महिलाओं की कमर करीब 35 इंच या उससे अधिक थी। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह ने अपनी सामान्य डाइट जारी रखी, जबकि दूसरे समूह को 6 महीने तक रोजाना एक एवोकाडो खाने के लिए कहा गया।
अध्ययन के अंत में एवोकाडो खाने वाले समूह में LDL से जुड़े कुछ कणों के स्तर में कमी देखी गई। वहीं, शरीर के वजन और कमर की चौड़ाई में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया।
LDL के कणों में बदलाव क्यों है महत्वपूर्ण?
LDL को आमतौर पर बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। खून में LDL का अधिक स्तर धमनियों में प्लाक बनने से जुड़ा हुआ है, जिससे समय के साथ हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
रिसर्च में एवोकाडो खाने वाले लोगों में LDL से जुड़े कणों में कमी देखी गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के बदलाव हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि LDL कणों में बदलाव और वास्तविक हार्ट अटैक या स्ट्रोक में कमी एक ही बात नहीं है। इसके लिए लंबे समय तक बड़े स्तर पर और ऐसे अध्ययन जरूरी हैं जिनमें वास्तविक हृदय संबंधी घटनाओं को देखा जाए।
एवोकाडो में क्या खास होता है?
एवोकाडो में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनमें मोनोअनसैचुरेटेड फैट, फाइबर, फाइटोस्टेरॉल्स, विटामिन ई और विभिन्न पौधों से मिलने वाले एंटीऑक्सीडेंट यौगिक शामिल हैं।
इसमें मौजूद फाइबर और हेल्दी फैट संतुलित डाइट का हिस्सा बनने पर हृदय और मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकते हैं। फाइटोस्टेरॉल्स भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल के अवशोषण को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, किसी एक पोषक तत्व या फल को हृदय रोग से बचाव का अकेला उपाय नहीं माना जा सकता।
एवोकाडो को डाइट में कैसे शामिल करें?
अगर आप एवोकाडो खाना चाहते हैं तो इसे ऐसी चीजों की जगह इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर हो सकता है जिनमें संतृप्त वसा या ज्यादा कैलोरी होती है।
मक्खन की जगह होल ग्रेन टोस्ट पर मैश किया हुआ एवोकाडो लें।
सैंडविच में मेयोनीज की जगह एवोकाडो इस्तेमाल कर सकते हैं।
सलाद या ग्रेन बाउल में इसे शामिल करें।
क्रीमी ड्रेसिंग की जगह सीमित मात्रा में एवोकाडो इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसे सब्जियों और साबुत अनाज के साथ संतुलित भोजन का हिस्सा बनाएं।
ध्यान रखें कि एवोकाडो में हेल्दी फैट जरूर होता है, लेकिन यह कैलोरी से भरपूर फल भी है। इसलिए जरूरत से ज्यादा खाना वजन नियंत्रण के लिहाज से फायदेमंद नहीं होगा।
क्या रोज एक एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी खत्म हो जाएगी?
नहीं। एवोकाडो को स्वस्थ डाइट का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन यह हृदय रोग से बचाव की कोई गारंटी या इलाज नहीं है।
दिल को स्वस्थ रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, स्वस्थ वजन, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना तथा धूम्रपान से दूरी बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
इस रिसर्च की एक बड़ी सीमा यह भी है कि इसमें मुख्य रूप से पेट के आसपास मोटापे वाले लोगों को शामिल किया गया था। इसलिए इसके नतीजों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
सबसे जरूरी बात: 4% की कमी का आंकड़ा LDL से जुड़े बदलावों के आधार पर लगाया गया अनुमान है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति में हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा वास्तव में 4% कम हो जाएगा।
डिस्क्लेमर: यह लेख वैज्ञानिक शोध में सामने आए निष्कर्षों पर आधारित है। एवोकाडो किसी दवा या डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का विकल्प नहीं है। अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है, हृदय रोग है या आप पहले से कोई दवा लेते हैं, तो अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या रजिस्टर्ड डायटीशियन से सलाह लें।
बिजनौर, उत्तर प्रदेश: स्योहारा क्षेत्र में दोस्ती के रिश्ते को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। पुलिस जांच के मुताबिक, शराब पीने के दौरान तीन दोस्तों ने कथित तौर पर अनीस की हत्या कर दी। आरोपियों को शक था कि अनीस के पास काफी पैसे हैं, लेकिन वारदात के बाद उसकी जेब से सिर्फ 80 रुपये मिले।
शराब पीने के दौरान बिगड़ी बात
पुलिस के अनुसार घटना 23 सितंबर की रात की है। अनीस अपने साथियों हिमांशु, राजा और जसविन्दर उर्फ हर्ष उर्फ अंगा के साथ स्योहारा क्षेत्र में बैठकर शराब पी रहा था।
इसी दौरान किसी बात को लेकर कहासुनी और गाली-गलौज शुरू हो गई। पुलिस की जांच में सामने आया कि आरोपियों को कथित तौर पर लगा कि अनीस के पास काफी रकम है। इसके बाद उस पर हमला करने की योजना बनाई गई।
हाथ-पैर पकड़े और गला दबाने का आरोप
पुलिस के मुताबिक, हिमांशु और राजा ने कथित तौर पर अनीस के हाथ-पैर पकड़ लिए। इसके बाद जसविन्दर पर बेल्ट से उसका गला दबाने और पगड़ी में इस्तेमाल होने वाली नुकीली सलाई से उसकी गर्दन पर वार करने का आरोप है।
पुलिस का कहना है कि गंभीर चोट और दम घुटने के कारण अनीस की मौत हो गई।
जेब से निकले सिर्फ 80 रुपये
वारदात के बाद आरोपियों ने अनीस की जेब तलाशी तो कथित तौर पर उसमें सिर्फ 80 रुपये मिले। इसके बाद शव को कुम्हारपुरा गांव के पास राजवाह के किनारे गन्ने के खेत में छिपाने का आरोप है।
जांच के मुताबिक, आरोपियों ने कथित तौर पर घटना के दौरान पहने खून लगे कपड़े भी अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए और अनीस की स्प्लेंडर मोटरसाइकिल लेकर वहां से चले गए।
गुमशुदगी के बाद पुलिस ने शुरू की जांच
अनीस के घर नहीं लौटने पर उसके भाई जमील ने 27 सितंबर को स्योहारा थाने में गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने सर्विलांस और स्थानीय स्तर पर जानकारी जुटाकर जांच आगे बढ़ाई।
जांच के दौरान पुलिस का शक अनीस के करीबी दोस्तों पर गया। पुलिस के अनुसार, पूछताछ के बाद हिमांशु और राजा को पहले गिरफ्तार किया गया था। अब तीसरे आरोपी जसविन्दर को भी गिरफ्तार कर लिया गया है।
नई दिल्ली: चाय पीने वालों की संख्या भारत में काफी ज्यादा है। कई लोग समय बचाने या सुविधा के लिए दूध की जगह डेयरी व्हाइटनर का इस्तेमाल करते हैं। चाय में इसे मिलाने से स्वाद और रंग दूध जैसा हो जाता है, लेकिन डेयरी व्हाइटनर को सीधे दूध समझना सही नहीं है। यह एक प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट होता है और इसमें अलग-अलग तरह के एडिटिव्स शामिल हो सकते हैं।
हाल ही में एक डेयरी व्हाइटनर के सैंपल को लेकर खाद्य सुरक्षा से जुड़ी जांच सामने आई है। इसके बाद रोजाना डेयरी व्हाइटनर इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चर्चा बढ़ गई है। खासतौर पर फॉस्फेट एडिटिव्स के सेवन और किडनी की सेहत को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।
डेयरी व्हाइटनर क्या होता है?
डेयरी व्हाइटनर दूध नहीं होता। इसे इस तरह तैयार किया जाता है कि चाय या कॉफी में मिलाने पर दूध जैसा रंग, स्वाद और टेक्सचर मिल सके। अलग-अलग ब्रांड के उत्पादों में इनके ingredients अलग हो सकते हैं, इसलिए पैकेट पर दी गई पूरी सामग्री सूची पढ़ना जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति दिन में कई कप चाय पीता है और हर बार उसमें व्हाइटनर इस्तेमाल करता है, तो उसे यह देखना चाहिए कि उस प्रोडक्ट के जरिए उसकी डाइट में कौन-कौन से अतिरिक्त ingredients और food additives शामिल हो रहे हैं।
फॉस्फेट एडिटिव्स को लेकर क्यों होती है चिंता?
फॉस्फोरस शरीर के लिए जरूरी खनिज है। यह दूध, दाल, मांस, नट्स और कई अन्य खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। लेकिन प्राकृतिक रूप से मौजूद फॉस्फोरस और खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले फॉस्फेट एडिटिव्स का शरीर में अवशोषण अलग-अलग हो सकता है।
कुछ फॉस्फेट एडिटिव्स शरीर में अपेक्षाकृत आसानी से अवशोषित हो सकते हैं। इसलिए यदि किसी व्यक्ति के आहार में ऐसे एडिटिव्स वाले कई प्रोसेस्ड फूड नियमित रूप से शामिल हैं, तो कुल फॉस्फोरस सेवन बढ़ सकता है।
एक-दो कप चाय में थोड़ी मात्रा में व्हाइटनर इस्तेमाल करना अपने आप में बड़ी मात्रा नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि कोई व्यक्ति रोजाना तीन-चार या उससे ज्यादा कप चाय में इसका इस्तेमाल करता है और साथ ही अन्य प्रोसेस्ड फूड भी खाता है, तो कुल सेवन पर ध्यान देना उचित है।
किडनी की बीमारी वाले लोगों को क्यों रहना चाहिए सावधान?
स्वस्थ किडनी शरीर में फॉस्फोरस का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन जब किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है, तो शरीर से अतिरिक्त फॉस्फोरस बाहर निकालने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
क्रॉनिक किडनी डिजीज वाले लोगों में लंबे समय तक फॉस्फोरस का बढ़ा हुआ स्तर हड्डियों और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ हृदय संबंधी जोखिम से भी जुड़ा पाया गया है। इसलिए किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों को प्रोसेस्ड फूड और फॉस्फेट एडिटिव्स के सेवन को लेकर अपने डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह माननी चाहिए।
हालांकि, सामान्य स्वस्थ लोगों में केवल फॉस्फेट एडिटिव्स के सेवन से गंभीर बीमारी होने का सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित करने वाले प्रमाण सीमित हैं। इसलिए इसे लेकर अनावश्यक डरने के बजाय संतुलित आहार और लेबल पढ़ने की आदत ज्यादा महत्वपूर्ण है।
डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर वालों को भी ध्यान देना चाहिए
जिन लोगों को डायबिटीज, किडनी की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हैं, उन्हें प्रोसेस्ड फूड का चुनाव करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे लोगों के लिए कुल डाइट, सोडियम, शुगर, फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्वों का संतुलन महत्वपूर्ण हो सकता है।
इसलिए केवल चाय में इस्तेमाल होने वाले व्हाइटनर पर ध्यान देने के बजाय पूरे दिन के खान-पान को देखना ज्यादा जरूरी है।
जिस प्रोडक्ट की जांच हुई, उसके बारे में क्या सामने आया?
रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली के द ललित होटल से लिए गए एक लो-फैट डेयरी व्हाइटनर के सैंपल को लेकर खाद्य सुरक्षा से जुड़ी जांच में सवाल उठे। खाद्य विश्लेषक की रिपोर्ट में सैंपल को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं बताया गया।
वहीं, संबंधित कंपनी की ओर से यह कहा गया है कि उसका उत्पाद निर्धारित मानकों के अनुसार है और जांच में कुल फॉस्फोरस की मात्रा मापी गई हो सकती है, जिसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद फॉस्फोरस भी शामिल हो सकता है। इस तकनीकी मुद्दे पर अंतिम स्थिति संबंधित नियामक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।
डेयरी व्हाइटनर खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
पैकेट पर दी गई इंग्रीडिएंट लिस्ट जरूर पढ़ें।
फॉस्फेट या अन्य food additives की मौजूदगी देखें।
INS 338 से 343 और 450 से 452 जैसे नंबर दिखाई दें तो उनके बारे में जानकारी जरूर लें।
यदि संभव हो तो रोजाना इस्तेमाल के लिए ताजा दूध जैसे कम प्रोसेस्ड विकल्पों को प्राथमिकता दें।
डायबिटीज, किडनी की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर होने पर अपने डॉक्टर/डाइटिशियन से डाइट संबंधी सलाह लें।
दिन में कई बार चाय पीते हैं तो उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के साथ-साथ पूरी डाइट पर भी ध्यान दें।
ध्यान रखें: किसी एक खाद्य पदार्थ को अपने आप में हार्ट या किडनी की बीमारी का कारण मानना सही नहीं है। स्वास्थ्य पर असर व्यक्ति की पूरी डाइट, मात्रा, उम्र, मौजूदा बीमारियों और जीवनशैली पर निर्भर करता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। यदि आपको किडनी, हार्ट, डायबिटीज या अन्य कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले योग्य डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लें।