Vastu Upay:
कई बार कड़ी मेहनत के बावजूद मनचाही सफलता नहीं मिलती या घर में तनाव और आर्थिक समस्याएं बनी रहती हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार इसके पीछे घर में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा और वास्तु दोष भी एक कारण हो सकते हैं। मान्यता है कि कुछ सरल उपाय अपनाकर इन दोषों के प्रभाव को कम किया जा सकता है और सुख-समृद्धि के रास्ते खोले जा सकते हैं। यहां जानिए कुछ ऐसे ही आसान और असरदार उपायों के बारे में।
मुख्य द्वार पर गणेश जी
वास्तु शास्त्र में मुख्य द्वार को ऊर्जा का प्रवेश द्वार माना गया है। मान्यता है कि मुख्य दरवाजे पर भगवान गणेश की प्रतिमा लगाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और बाधाएं दूर होती हैं। इससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।
बीम के नीचे न बैठें
वास्तु शास्त्र के अनुसार बीम के ठीक नीचे बेड, सोफा या कार्यस्थल रखना उचित नहीं माना जाता। ऐसा करने से मानसिक तनाव और असहजता महसूस हो सकती है। यदि स्थान बदलना संभव न हो तो वास्तु उपायों की मदद ली जा सकती है।
घर के कोने रखें साफ
घर के कोनों में धूल, गंदगी या मकड़ी के जाले जमा होना शुभ नहीं माना जाता। इसलिए मुख्य द्वार, ब्रह्म स्थान और अन्य कोनों की नियमित सफाई करते रहें। घर की छत और सीढ़ियों को भी साफ-सुथरा रखें। टूटे-फूटे सामान, कबाड़ या सूखे पौधे नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकते हैं। वहीं, साफ और व्यवस्थित स्थान सकारात्मक वातावरण बनाने में सहायक होता है।
लीकेज और सीलन करें दूर
वास्तु शास्त्र में पानी को समृद्धि का प्रतीक माना गया है। घर में पानी का रिसाव या दीवारों में सीलन होना वास्तु की दृष्टि से शुभ नहीं माना जाता। मान्यता है कि इससे आर्थिक परेशानियां बढ़ सकती हैं। इसलिए घर में कहीं भी लीकेज दिखाई दे तो उसे जल्द ठीक कराना बेहतर माना जाता है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
Pithori Amavasya 2026 (कब है पिठोरी अमावस्या 2026):
हिंदू धर्म में हर मास में पड़ने वाली अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। ऐसे ही भाद्रपद मास में पड़ने वाली अमावस्या को पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान करने के साथ दान करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने से शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है। पितर प्रसन्न होकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते सकते हैं। इस साल भादो अमावस्या तिथि दो दिन होने के कारण असमंसज की स्थिति बनी हुआ है कि किस दिन पिठोरी अमावस्या का व्रत रखें। इसे पिठोरी अमावस्या, भादो अमावस्या के अलावा कुशाग्रहणी और कुशोत्पाटिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। बता दें कि इस साल पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर को मनाई जा रही है। जानिए पिठोरी अमावस्या की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व…
पिठोरी अमावस्या 2026 की तिथि और मुहूर्त (Pithori Amavasya 2026 Muhurat)
द्रिक पंचांग के अनुसार, इस साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 10 सितंबर को सुबह 10:33 बजे से आरंभ हो रही है, जो 11 सितंबर को सुबह 8:56 बजे को समाप्त होगी। ऐसे में पिठोरी अमावस्या 10 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।
पिठोरी अमावस्या पर पूजा का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त-
सुबह 06.07 बजे से लेकर सुबह 09.18 बजे तक पितरों के तर्पण और पिंडदान का समय-
10 सितंबर दोपहर 11.45 बजे से लेकर दोपहर 01.30 बजे तक
पिठोरी व्रत प्रदोष मुहूर्त –
06:32 पी एम से 08:51 पी एम
पिठोरी अमावस्या 2026 महत्व (Pithori Amavasya 2026 Significance)
हिंदू धर्म में पिठोरी अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत, तप और जप करने से संतान को सुख-समृद्धि, लंबी आयु के साथ परिवार में खुशहाली बनी रहती हैं। अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान करने के साथ भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करना शुभ माना जाता है। इस दिन आटे से64 योगिनियों/देवी-स्वरूपों की मूर्ति बनाकर पूजा करने का विधान है। इसी के कारण इसे पिठोरी अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा इस दिन पितरों का तर्पण,स्मरण करने के साथ-साथ दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति हो सकती है।
पिठोरी अमावस्या पर 64 देवियों की पूजा
पिठोरी अमावस्या की एक विशेष लोक-परंपरा प्रचलित है। इस दिन 64 योगिनियों/देवी-स्वरूपों का पूजन किया जाता है। इसका मुख्य भाव संतान की रक्षा, संतान-सुख, परिवार की समृद्धि और मातृशक्ति का आशीर्वाद प्राप्त करना है। इस दिन आटे से इन्हें देवी स्वरूपों को बनाया जाता है और विधिवत पूजा की जाती है।
पिठोरी अमावस्या 2026 मंत्र
सामान्य पितृ मंत्र:
इस मंत्र का पिठोरी अमावस्या के दिन 108 बार जाप करें- ॐ पितृ देवतायै नमः पितृ गायत्री मंत्र
: ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्। तर्पण एवं स्वधा मंत्र:
ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वाहा या ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः।
डिसक्लेमर- इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
वास्तु शास्त्र में घर की हर दिशा और उसमें बने कमरों का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि घर में रसोई की सही दिशा परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति से जुड़ी होती है। अगर आपका घर पश्चिम मुखी (West Facing) है, तो रसोई बनवाते समय कुछ वास्तु नियमों का ध्यान रखना जरूरी माना जाता है। आइए जानते हैं पश्चिम मुखी घर में किचन की सही दिशा और गलत स्थान पर रसोई होने से जुड़ी मान्यताएं।
पश्चिम मुखी घर में कहां बनाएं रसोई?
वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में रसोई की सही दिशा का चुनाव महत्वपूर्ण होता है। मान्यता है कि सही स्थान पर बनी रसोई घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने में सहायक होती है
। पश्चिम मुखी घर में रसोई के लिए दक्षिण-पूर्व दिशा सबसे सही मानी जाती है। इसे आग्नेय कोण कहा जाता है और यह दिशा अग्नि तत्व से जुड़ी मानी गई है। मान्यता है कि इस दिशा में रसोई होने से घर में पॉजिटिविटी बनी रहती है और परिवार की सुख-समृद्धि बढ़ती है।
इसके अलावा पश्चिम मुखी घर में उत्तर-पश्चिम दिशा यानी वायव्य कोण में भी रसोई बनाई जा सकती है। वास्तु में इस दिशा को भी किचन के लिए उपयुक्त माना गया है। मान्यता है कि चंद्रमा से जुड़ी इस दिशा में रसोई होने से स्वास्थ्य संबंधी लाभ मिल सकते हैं।
आर्थिक परेशानियां
वास्तु मान्यताओं के अनुसार अगर रसोई सही दिशा में न हो तो इसका असर घर की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है
। ऐसी स्थिति में धन से जुड़ी परेशानियां बढ़ने की बात कही जाती है। नौकरी और व्यापार में भी रुकावट आने की मान्यता है।
सेहत पर असर
वास्तु के अनुसार रसोई की गलत दिशा का प्रभाव परिवार के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। मान्यता है कि ऐसी स्थिति में घर के सदस्यों को बार-बार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
पारिवारिक तनाव का कारण
रसोई को परिवार की ऊर्जा से जोड़कर भी देखा जाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार गलत दिशा में बनी रसोई घर में तनाव और मतभेद का कारण बन सकती है। कई बार परिवार के सदस्यों के बीच दूरी बढ़ने की बात भी कही जाती है।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
Vishwakarma Jayanti 2026: हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को देवताओं के शिल्पकार, वास्तुकार और निर्माण कला के जनक के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए भव्य महलों, अस्त्र-शस्त्रों और दिव्य नगरों का निर्माण किया था। इसलिए विश्वकर्मा पूजा के दिन विशेष रूप से कारखानों, मशीनों, औजारों, दुकानों और कार्यस्थलों में पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व कारीगरों, इंजीनियरों, शिल्पकारों, तकनीकी क्षेत्र से जुड़े लोगों और व्यवसायियों के लिए विशेष महत्व रखता है। हर वर्ष कन्या संक्रांति के अवसर पर विश्वकर्मा पूजा मनाई जाती है। आइए जानते हैं इस साल कब है विश्वकर्मा पूजा और शुभ मुहूर्त…
विश्वकर्मा पूजा 2026 तारीख और शुभ मुहूर्त
फ्यूचर पंचांग के अनुसार विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। पूजा के लिए शुभ समय सुबह 7:58 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक रहेगा। वहीं अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:51 बजे से दोपहर 12:40 बजे तक रहेगा, जिसे पूजा के लिए विशेष शुभ माना जाता है।
विश्वाकर्मा पूजा- विधि
पूजा स्थल की सफाई करें और चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। कलश स्थापना करें और भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करते हुए पूजा का संकल्प लें। भगवान को जल, अक्षत, रोली, चंदन, फूल और माला अर्पित करें। धूप और दीपक जलाएं तथा भगवान विश्वकर्मा को फल, मिठाई और अन्य नैवेद्य अर्पित करें। भगवान विश्वकर्मा की पूजा के साथ औजारों, मशीनों, वाहन और काम में आने वाले उपकरणों की भी पूजा करें। विश्वकर्मा भगवान की कथा सुनें या पढ़ें और उनके मंत्रों का जाप करें। अंत में भगवान विश्वकर्मा की आरती करें और परिवार के सदस्यों या कर्मचारियों के साथ प्रसाद बांटें।
विश्वकर्मा पूजा का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा सृजन, निर्माण और तकनीकी कौशल के प्रतीक हैं। कहा जाता है कि उन्होंने इंद्रपुरी, द्वारका और लंका जैसे दिव्य नगरों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से भगवान विश्वकर्मा की पूजा करने से कार्यक्षेत्र में सफलता, उन्नति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। मशीनों और उपकरणों की पूजा करने से काम में आने वाली बाधाएं दूर होने और व्यवसाय में तरक्की होने की भी धार्मिक मान्यता है।मेष राशि का वर्षफल 2026वृष राशि का वर्षफल 2026मिथुन राशि का वर्षफल 2026कर्क राशि का वर्षफल 2026सिंह राशि का वर्षफल 2026कन्या राशि का वर्षफल 2026तुला राशि का वर्षफल 2026वृश्चिक राशि का वर्षफल 2026धनु राशि का वर्षफल 2026मकर राशि का वर्षफल 2026कुंभ राशि का वर्षफल 2026मीन राशि का वर्षफल 2026
डिसक्लेमर- इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
राधा अष्टमी का पर्व राधारानी को समर्पित है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह पावन पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन बरसाना में राधारानी का प्राकट्य हुआ था। राधा अष्टमी के दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं, राधा-कृष्ण की पूजा करते हैं और राधारानी से सुख, प्रेम, समृद्धि तथा भक्ति का आशीर्वाद मांगते हैं। इस साल राधा अष्टमी का त्योहार 19 सितंबर को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं तिथि और पूजा का शुभ मुहूर्त…
कब है राधा अष्टमी 2026 (Kab Hai Radha Ashtami 2026)
फ्यूचर पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर, शुक्रवार को दोपहर 1 बजकर 2 मिनट पर होगी। वहीं, अगले दिन यानी 19 सितंबर, शनिवार के दिन दोपहर के 3 बजकर 28 मिनट तक अष्टमी तिथि व्याप्त रहेगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 19 सितंबर को राधा अष्टमी मनाई जाएगी और इसी दिन व्रत करना भी शास्त्र सम्मत होगा।
राधा अष्टमी शुभ मुहूर्त
शुभ चौघड़िया : सुबह 7 बजकर 39 मिनट से 9 बजकर 11 मिनट तक
लाभ चौघड़िया : दोपहर में 1 बजकर 46 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक
अमृत चौघड़िया : दोपहर में 3 बजकर 18 मिनट से 4 बजकर 50 मिनट तक
लाभ चौघड़िया : शाम को 6 बजकर 22 मिनट से 7 बजकर 50 मिनट तक
राधा अष्टमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं में राधारानी को प्रेम, करुणा और भक्ति का स्वरूप माना गया है। कहा जाता है कि राधा नाम का स्मरण करने और श्रद्धापूर्वक राधारानी की पूजा करने से भक्त को भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है। राधा अष्टमी पर राधा-कृष्ण का पूजन, राधारानी का अभिषेक, श्रृंगार और भजन-कीर्तन करने की विशेष परंपरा है।
मान्यता है कि इस दिन राधारानी की आराधना करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और वैवाहिक जीवन में प्रेम बढ़ता है। भक्त राधारानी से अपने जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की प्रार्थना करते हैं। विशेष रूप से बरसाना और वृंदावन में राधा अष्टमी का पर्व बड़े उत्साह और भक्ति भाव के साथ मनाया जाता है।मेष राशि का वर्षफल 2026वृष राशि का वर्षफल 2026मिथुन राशि का वर्षफल 2026कर्क राशि का वर्षफल 2026सिंह राशि का वर्षफल 2026कन्या राशि का वर्षफल 2026तुला राशि का वर्षफल 2026वृश्चिक राशि का वर्षफल 2026धनु राशि का वर्षफल 2026मकर राशि का वर्षफल 2026कुंभ राशि का वर्षफल 2026मीन राशि का वर्षफल 2026
डिसक्लेमर- इस लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सटीकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
Budh Uday 2026:
ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, तर्क, गणना, व्यापार और करियर का कारक माना जाता है। कुंडली में बुध की मजबूत स्थिति व्यक्ति को शिक्षा, कारोबार और नौकरी के क्षेत्र में बेहतर परिणाम दिला सकती है। सितंबर 2026 में बुध ग्रह से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय परिवर्तन होने जा रहा है। पंचांग अनुसार 14 सितंबर 2026 को बुध देव अपनी उच्च राशि कन्या में उदय होंगे। बुध का उदय होना कई राशियों के लिए शुभ परिणाम लेकर आ सकता है।
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, बुध के उदय होने से उनकी सकारात्मक ऊर्जा अधिक प्रभावी हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से नौकरी, व्यापार, आर्थिक फैसलों, संचार और नई योजनाओं पर देखने को मिल सकता है। आइए जानते हैं वे कौन-सी 4 राशियां हैं, जिन्हें बुध उदय से करियर और कारोबार में तरक्की के योग बन सकते हैं।
14 सितंबर को कन्या राशि में उदय होंगे बुध
फ्यूचर पंचांग के अनुसार 14 सितंबर 2026 को बुध ग्रह रात 2 बजकर 52 मिनट पर कन्या राशि में उदय होंगे। कन्या राशि बुध की स्वराशि होने के साथ-साथ उनकी उच्च राशि भी मानी जाती है। ऐसे में कन्या राशि में बुध का उदय ज्योतिष की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
9 अक्टूबर को शनि करेंगे अपने स्वनक्षत्र उत्तराभाद्रपद में प्रवेश, कुंभ, तुला, वृष और मकर राशि वालों को आर्थिक उन्नति के योग
कन्या राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Virgo Zodiac)
कन्या राशि के जातकों के लिए बुध का उदय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। करियर में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं और कार्यक्षेत्र में आपकी समझदारी व निर्णय लेने की क्षमता की सराहना हो सकती है। नौकरीपेशा लोगों को तरक्की या बेहतर अवसर मिलने के योग बन सकते हैं। कारोबार से जुड़े जातकों को नए सौदे और लाभ के अवसर मिल सकते हैं।
मकर राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Capricorn Zodiac)
मकर राशि वालों के लिए बुध उदय आर्थिक और पेशेवर मोर्चे पर सकारात्मक बदलाव ला सकता है। लंबे समय से अटके काम गति पकड़ सकते हैं। नौकरी में प्रमोशन या नई जिम्मेदारी मिलने की संभावना बन सकती है। कारोबारियों को नए संपर्कों का लाभ मिल सकता है और व्यापार विस्तार की योजना आगे बढ़ सकती है।
सिंह राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Leo Zodiac)
सिंह राशि के जातकों के लिए बुध का उदय करियर में प्रगति के नए रास्ते खोल सकता है। आपकी बातचीत और नेतृत्व क्षमता का फायदा कार्यक्षेत्र में मिल सकता है। नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को अच्छी खबर मिल सकती है। व्यापार करने वालों को नए क्लाइंट या लाभदायक डील मिल सकती है।
वृश्चिक राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Scorpio Zodiac)
वृश्चिक राशि वालों के लिए भी बुध का उदय शुभ परिणाम देने वाला रह सकता है। कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत रंग ला सकती है और वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिल सकता है। कारोबार में नई रणनीति बनाने और उसे लागू करने का अच्छा समय मिल सकता है। आर्थिक स्थिति में भी धीरे-धीरे सुधार के संकेत बन सकते हैं।
क्यों खास है बुध का कन्या राशि में उदय?
ज्योतिष में बुध को कन्या राशि में उच्च का माना जाता है। ऐसे में कन्या राशि में बुध का उदय ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। बुध की मजबूत स्थिति का संबंध बुद्धि, विश्लेषण क्षमता, व्यापारिक समझ, वाणी और निर्णय क्षमता से जोड़ा जाता है। हालांकि किसी व्यक्ति के जीवन में इसका वास्तविक प्रभाव उसकी जन्मकुंडली में बुध की स्थिति और अन्य ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करता है।मेष राशि का वर्षफल 2026वृष राशि का वर्षफल 2026मिथुन राशि का वर्षफल 2026कर्क राशि का वर्षफल 2026सिंह राशि का वर्षफल 2026कन्या राशि का वर्षफल 2026तुला राशि का वर्षफल 2026वृश्चिक राशि का वर्षफल 2026धनु राशि का वर्षफल 2026मकर राशि का वर्षफल 2026कुंभ राशि का वर्षफल 2026मीन राशि का वर्षफल 2026
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी ज्योतिषीय गणनाओं और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी तरह के निर्णय पर पहुंचने से पहले संबंधित विषय के विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।एक राशि के नाम के करोड़ों जातक होते हैं। ऐसे में किसी भी तरह के परिणाम में पहुंचने से पहले अपनी कुंडली की जांच किसी शास्त्र के ज्ञाता, ज्योतिषी, पंडित को अवश्य दिखाएं।
श्रीकृष्ण व देवाधिदेव महादेव के बीच प्रगाढ़ प्रेम को दर्शाते देश-विदेश में कई देवालय हैं। इन मंदिरों में भक्ति के साथ शक्ति के अद्भुत मिलन के साथ ही भक्ति का बेहद सरल स्वरूप भी देखने को मिलता है। ऐसा ही दिव्य मंदिर उत्तर प्रदेश के श्रीकृष्ण नगरी मथुरा में है, जहां महादेव शहर के कोतवाल या रक्षक के रूप में विराजमान हैं।
उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग मंदिर के बारे में जानकारी देने के साथ ही वहां के महत्व से भी अवगत कराता है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा केवल कृष्ण भक्ति का केंद्र नहीं है, बल्कि महादेव की अनन्य भक्ति का भी पावन साक्षी है। यहां स्थित प्राचीन श्री भूतेश्वर महादेव मंदिर सदियों पुरानी आस्था और अटूट विश्वास का प्रतीक है। पर्यटन विभाग इस शिवालय को मथुरा की यात्रा का अनिवार्य हिस्सा बताता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव मथुरा के क्षेत्रपाल (रक्षक) के रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण बाल स्वरूप में अवतरित हुए तो महादेव स्वयं कैलाश पर्वत से मथुरा पधारे थे। वे कृष्ण के बाल लीला के दर्शन करना चाहते थे।
इसी कारण मथुरा की कोई भी यात्रा भूतेश्वर महादेव के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जिसे केदारनाथ का उपलिंग भी माना जाता है। मथुरा की जन्मभूमि से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर शहर को बुरी शक्तियों से बचाने वाला माना जाता है।
शिवालय के बारे में प्रचलित मान्यता है कि भूतेश्वर महादेव यहां रहकर मथुरा और उसके निवासियों की रक्षा करते हैं, इसलिए इनका नाम भूतेश्वर या भूतों के स्वामी पड़ा। मंदिर की एक और रोचक कथा मथुरा की स्थापना से जुड़ी है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने मधु नामक राक्षस का वध किया और उसके बाद मथुरा शहर की स्थापना की। इसी ऐतिहासिक और पावन भूमि पर भूतेश्वर महादेव मंदिर हजारों वर्षों से मौजूद है। यह मथुरा का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है।
स्थानीय लोग मानते हैं कि भूतेश्वर महादेव मंदिर शहर को नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर से बचाता है। यहां महादेव का जागृत स्वरूप और मनमोहक श्रृंगार भक्तों को असीम शांति और आत्मिक शक्ति प्रदान करता है। भक्तों का विश्वास है कि भूतेश्वर महादेव के दर्शन से मन की सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।भूतेश्वर महादेव मंदिर में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। मंदिर प्रतिदिन शाम 4 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है।
मंदिर गर्रावकेंद्र के पास स्थित है। निकटतम बस स्टॉप शांति नगर स्थित मथुरा बस स्टॉप है, जो मंदिर से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर है। बस स्टॉप से मंदिर पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता है। ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है। वहीं, रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है, जो मंदिर से मात्र 3 किलोमीटर दूर है। दिल्ली, आगरा, जयपुर, लखनऊ आदि शहरों से मथुरा जंक्शन पर ट्रेनें उपलब्ध हैं।
माना जाता है कि रसोई और यहां रखी चीजों से जुड़े हर छोटे-बड़े नियमों का पालन सही से किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे ही तवे को लेकर भी कुछ नियम बताए गए हैं। आपने अक्सर अपनी मम्मी या दादी-नानी से सुना होगा कि तवे को कभी उल्टा नहीं रखना चाहिए। कहते हैं कि तवे को उल्टा रखना शुभ नहीं होता और इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है। तो चलिए जानते हैं इस पर क्या कहता है वास्तु शास्त्र
राहु ग्रह से है तवे का संबंध
रोटी, परांठा, चीला, डोसा आदि बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला तवा केवल खाना बनाने का एक बर्तन नहीं। इसे वास्तु में विशेष महत्व दिया गया है। तवे का संबंध राहु ग्रह से माना जाता है। इसलिए इसे रखने का तरीका बहुत मायने रखता है। मान्यता है कि तवे को उल्टा रखने से घर की सुख-समृद्धि और माहौल पर बुरा असर पड़ सकता है।
क्यों नहीं रखना चाहिए उल्टा तवा?
वास्तु शास्त्र के अनुसार, तवे को कभी भी उल्टा करके नहीं रखना चाहिए। खासतौर पर रात में खाना बनाने के बाद इसे तुंरत साफ करके सीधा रखने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि आपकी इस एक छोटी सी आदत से घर में हमेशा पॉजिटिविटी बनी रहती है और नकारात्मक प्रभावों से बचाव होता है।
आर्थिक परेशानी का संकेत
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तवे को उल्टा रखने से घर की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। इससे अनावश्यक खर्च बढ़ने और धन संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही परिवार की सुख-शांति पर भी असर पड़ने की बात कही जाती है।
राहु दोष और तनाव
वास्तु मान्यताओं के अनुसार, उल्टा तवा रखने से राहु दोष बढ़ सकता है। इसकी वजह से घर में विवाद, मानसिक तनाव और आपसी मतभेद बढ़ने की आशंका रहती है। कुछ जगहों पर इसे परिवार के मुखिया के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालने से भी जोड़ा जाता है।
तवे से जुड़े वास्तु नियम
तवे का उपयोग करने के बाद उसे अच्छी तरह साफ करके सुखा लें और हमेशा सीधा रखें। इसके अलावा तवे को ऐसी जगह रखने की सलाह दी जाती है, जहां बाहर से आने वाले व्यक्ति की सीधी नजर तवे पर न पड़े।
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
देश-दुनिया के कोने-कोने में कई खूबसूरत और आस्था को प्रगाढ़ करते देवालय हैं, जिनके शिखर मात्र से भक्तों का मन प्रसन्न हो जाता है। मात्र देवालय या शिखर ही नहीं बल्कि मंदिर के आस पास की जगह भी बेहद खूबसूरत और उससे जुड़ी कथा हैरत में डालती है।
ऐसा ही नारायण को समर्पित राजस्थान में एक खूबसूरत गांव है, जो नारायण को समर्पित है। खास बात है कि नारायण के इस गांव में मिट्टी के कच्चे घरों में कभी ताले नहीं लगते और साल 2024 में बेस्ट टूरिज्म विलेज का खिताब भी मिल चुका है। राजस्थान की अरावली पर्वत शृंखला की गोद में बसा एक अनोखा गांव आज पूरे देश और दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। नाम है देवमाली।
अजमेर जिले के ब्यावर क्षेत्र का यह छोटा सा गांव न केवल अपनी प्राचीन मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं ने इसे भारत का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव बना दिया है।साल 2024 में केंद्र सरकार के पर्यटन विभाग ने विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर देवमाली गांव को बेस्ट टूरिज्म विलेज का प्रतिष्ठित खिताब प्रदान किया था।
यह पुरस्कार ब्यावर के तत्कालीन कलेक्टर और गांव की सरपंच ने ग्रहण किया था। राजस्थान पर्यटन विभाग भी इस गांव को विशेष रूप से प्रचारित कर रहा है।देवमाली गांव भगवान देव नारायण को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि लगभग एक हजार वर्ष पहले जब देव नारायण भगवान यहां पधारे थे, तो गांव के सभी पत्थर और चट्टानें उन्हें नमन करने के लिए झुक गई थीं। आज भी गांव के चारों ओर झुकी हुई चट्टानें इस पौराणिक कथा की गवाही देती हैं।
देवमाली की सबसे बड़ी खासियत यहां के घर हैं। पूरे गांव में कोई भी पक्का मकान नहीं बनाया जाता। घर केवल पीली मिट्टी और गाय के गोबर से बनाए जाते हैं। हर दो-तीन महीने में इनकी लिपाई-पुताई होती है, जिसे शुद्धिकरण माना जाता है। गांववासी मानते हैं कि भगवान देव नारायण ने वचन दिया था, “मेरा मंदिर पक्का रखो, तुम्हारे घर कच्चे रखो”। इस परंपरा को आज भी सख्ती से निभाया जाता है।
सबसे अनोखी बात यहां के घरों में कभी ताले नहीं लगते।गांववासी गर्व से कहते हैं कि सदियों से यहां न चोरी होती है और न कोई विवाद। चाहे कोई करोड़पति हो या साधारण किसान, सब एक समान कच्चे घरों में रहते हैं। व्यसनों पर भी पूर्ण प्रतिबंध है, न शराब, न मांस का उपयोग होता है।
शनिवार को दूध नहीं बेचा जाता, उसे खीर बनाकर या पड़ोसियों में बांट दिया जाता है।देवमाली पर्यटकों को पारंपरिक ग्रामीण जीवन का शानदार अनुभव कराता है। राष्ट्रीय राजमार्ग से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव अरावली की हरी-भरी वादियों से घिरा हुआ है। यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन देव नारायण मंदिर के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि मंदिर में दर्शन करने व मत्था टेकने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
एक मध्यवर्गीय परिवार का सबसे बड़ा सपना होता है कि कब उसके पास अपना घर होगा। एक घर को लेने के लिए आम आदमी अपने पूरे जीवन की जमापूंजी लगा देता है। इतना ही नहीं वो अपने आने वालों सालो की कमाई को भी एक घर को खरीदने में लगा देता है। लोग अपनी मेहनत की कमाई से नया आशियाना तलाशते हैं ताकि परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। लेकिन कई बार हम वास्तु के नियमों को अनदेखा कर देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर की गलत दिशा आपके फ्लैट में वास्तु दोष उत्पन्न कर सकता है। इसके साथ ही आपके घर में नकारात्मकता भी फैला सकता है। तो चलिए जानते हैं कि नया फ्लैट खरीदते समय किन महत्वपूर्ण वास्तु नियमों का ध्यान रखना जरूरी होता है।
मुख्य प्रवेश द्वार
वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का मुख्य द्वार उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व दिशा में होना सबसे अधिक शुभ माना जाता है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित मुख्य द्वार को सामान्यतः कम शुभ माना जाता है। वहीं ध्यान रखें कि दरवाजे के सामने सीढ़ियां, बंद दीवार या संकरी गैलरी न हो।
रसोई की दिशा
रसोई की दिशा हमेशा दक्षिण-पूर्व दिशा में होना सबसे शुभ माना जाता है। दक्षिण-पूर्व दिशा अग्नि तत्व की दिशा मानी जाती है। इसके अलावा उत्तर-पश्चिम दिशा भी रसोई यानी किचन के लिए उत्तम होता है।
मास्टर बेडरूम की दिशा
फ्लैट का मास्टर बेडरूप की दिशा का भी ध्यान रखें। मास्टर बेडरूम दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना अच्छा माना जाता है। इस दिशा में मास्टर बेडरूम होने से आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता मजबूत होता है।
टॉयलेट की दिशा
फ्लैट खरीदते समय टॉयलेट की दिशा का जरूर ध्यान रखें। टॉयलेट कभी भी उत्तर-पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए। वास्तु के अनुसार यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। शौचालय का स्थान पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में होना बेहतर माना जाता है।
बालकनी और खिड़कियों की दिशा
उत्तर और पूर्व दिशा में खुलने वाली बालकनी या बड़ी खिड़कियां घर में प्राकृतिक प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा लाने में सहायक मानी जाती हैं।
फ्लैट का आकार
वास्तु शास्त्र के अनुसार, फ्लैट का आकार वर्गाकार या आयताकार होना चाहिए। ऐसे फ्लैट सबसे अच्छे माने जाते हैं। वहीं फ्लैट का उत्तर-पूर्व दिशा खुला होना चाहिए तभी सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ेगा। वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) को सबसे पवित्र दिशा माना गया है
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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।