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  • गैस सिलेंडर के पीछे: छिपा था 8 फीट लंबा सांप, घर में मचा अफरा-तफरी

    गैस सिलेंडर के पीछे: छिपा था 8 फीट लंबा सांप, घर में मचा अफरा-तफरी

    गैस सिलेंडर के पीछे: छिपा था 8 फीट लंबा सांप, घर में मचा अफरा-तफरी

    मध्य प्रदेश के सागर में सुबह उस वक्त हड़कंप मच गया, जब एक घर की किचन में करीब 8 फीट लंबा सांप घुस आया. सांप किचन में रखी गैस सिलेंडर के पीछे छिपकर बैठा था. परिवार की महिला जब किचन में पहुंची, तो अचानक उसकी नजर इतने बड़े सांप पर पड़ गई. सांप को देखते ही महिला घबरा गई और तुरंत किचन से बाहर निकल आई. उसने परिवार के अन्य सदस्यों को इसकी जानकारी दी, जिसके बाद पूरे घर में अफरा-तफरी मच गई.

    किचन में गैस सिलेंडर के पीछे था सांप- मामला सागर के बहेरिया तिगड्डा के पास स्थित रुसल्ला क्षेत्र का बताया जा रहा है. घर की किचन में विशाल सांप होने की जानकारी मिलते ही परिवार के सभी सदस्य बाहर निकल आए. सांप काफी बड़ा था और गैस सिलेंडर के पीछे ऐसी जगह छिपा हुआ था, जहां उसे पकड़ना आसान नहीं था. परिवार ने खुद सांप को पकड़ने का जोखिम नहीं उठाया और तुरंत स्नेक कैचर को सूचना दी.

    सांप को किया गया रेस्क्यू- इसके बाद स्नेक कैचर बबलू पवार मौके पर पहुंचे. उन्होंने सबसे पहले किचन का निरीक्षण किया और सांप के छिपे होने की जगह को देखा. गैस सिलेंडर के पीछे मौजूद सांप को बाहर निकालने के लिए काफी सावधानी बरतनी पड़ी. सांप के अचानक बाहर आने की आशंका को देखते हुए रेस्क्यू के दौरान परिवार के लोगों को सुरक्षित दूरी पर रखा गया.

    8 फीट का था सांप- काफी मशक्कत के बाद स्नेक कैचर ने सांप को सुरक्षित पकड़ लिया. रेस्क्यू के बाद जब सांप को बाहर निकाला गया, तो उसकी लंबाई देखकर लोग हैरान रह गए. स्नेक कैचर बबलू पवार के मुताबिक, रेस्क्यू किया गया सांप घोड़ा पछाड़ प्रजाति का है और उसकी लंबाई करीब 8 फीट है. सांप को सुरक्षित पकड़ने के बाद उसे जंगल में छोड़ने की तैयारी की गई.

    बताया गया कि बारिश के मौसम में अक्सर सांप और दूसरे जीव-जंतु सुरक्षित जगह की तलाश में अपने ठिकानों से बाहर निकल आते हैं. ऐसे में घरों के आसपास या कभी-कभी घर के अंदर भी सांप पहुंच जाते हैं. माना जा रहा है कि बारिश से बचने के लिए यह सांप भी किसी रास्ते से घर की किचन में पहुंचा होगा और गैस सिलेंडर के पीछे छिप गया.

    सांप के सुरक्षित रेस्क्यू होने के बाद परिवार ने राहत की सांस ली. हालांकि, किचन जैसी जगह पर करीब 8 फीट लंबे सांप के मिलने से आसपास के लोग भी हैरान रह गए.

    स्नेक कैचर की अपील- स्नेक कैचर ने लोगों से अपील की है कि बारिश के मौसम में घर के आसपास साफ-सफाई रखें और ऐसी जगहों पर विशेष ध्यान दें, जहां सांप छिप सकते हैं. अगर घर या आसपास सांप दिखाई दे, तो उसे खुद पकड़ने या मारने की कोशिश बिल्कुल न करें. तुरंत किसी प्रशिक्षित स्नेक कैचर या विशेषज्ञ को सूचना दें. इससे इंसानों के साथ-साथ सांप को भी सुरक्षित बचाया जा सकता है.

  • 7 साल की उम्र में काम शुरू किया, अब मुनक नहर साफ कर रहे विनय, 1600 बच्चे-युवा साथ, 2500+ मूर्तियां निकालीं..

    7 साल की उम्र में काम शुरू किया, अब मुनक नहर साफ कर रहे विनय, 1600 बच्चे-युवा साथ, 2500+ मूर्तियां निकालीं..

    7 साल की उम्र में काम शुरू किया, अब मुनक नहर साफ कर रहे विनय, 1600 बच्चे-युवा साथ, 2500+ मूर्तियां निकालीं..

    विनय दास की इस मुहिम की शुरुआत करीब एक साल पहले हुई थी. शुरुआत में करीब 150 बच्चे उनके साथ जुड़े थे. आज इस अभियान से 1600 से ज्यादा बच्चे और युवा जुड़ चुके हैं. इनमें करीब 350 एक्टिव वॉलंटियर्स हैं.

    दिल्ली की मुनक नहर… एक ऐसी नहर, जो लंबे वक्त से कचरे और गंदगी की वजह से चर्चा में रही है. लेकिन इसी नहर को साफ करने की जिम्मेदारी एक युवक ने अपने हाथों में ली है. इनमें एक नाम है विनय दास का, जो पिछले कई सालों से बच्चों और युवाओं की टीम के साथ मुनक नहर की सफाई में जुटे हैं. कहीं प्लास्टिक का कचरा, कहीं पूजा सामग्री, तो कहीं नहर के किनारे जमा मलबा. इसी गंदगी के बीच पहुंचती है विनय दास की टीम… हाथों में दस्ताने, कंधों पर कचरे से भरे बोरे और मकसद सिर्फ एक…मुनक नहर को साफ करना.

    मूर्तियों के विसर्जन ने किया परेशान विनय बताते हैं कि इस मुहिम की शुरुआत तब हुई, जब उन्होंने बड़ी संख्या में देवी-देवताओं की मूर्तियों को मुनक नहर में विसर्जित होते देखा. यह देखकर उनका मन काफी परेशान हुआ. इसके बाद उन्होंने नहर की सफाई का बीड़ा उठाने का फैसला किया और यहीं से इस मिशन की शुरुआत हुई. सफाई का यह काम सिर्फ किनारे से कचरा उठाने तक सीमित नहीं है. टीम नहर के आसपास जमा प्लास्टिक, पूजा सामग्री, मलबे और दूसरे कचरे को निकालती है.

    एक साल में 1600 से ज्यादा बच्चे-युवा जुड़े विनय दास की इस मुहिम की शुरुआत करीब एक साल पहले हुई थी. शुरुआत में करीब 150 बच्चे उनके साथ जुड़े थे. आज इस अभियान से 1600 से ज्यादा बच्चे और युवा जुड़ चुके हैं. इनमें करीब 350 एक्टिव वॉलंटियर्स हैं. ये वॉलंटियर्स अलग-अलग ग्रुप में काम करते हैं और मुनक नहर के किनारे सफाई अभियान चलाते हैं. अब तक टीम करीब 3 किलोमीटर के हिस्से में सफाई अभियान चला चुकी है. विनय की टीम अब तक मुनक नहर से 2500 से ज्यादा मूर्तियां निकाल चुकी है. हाल ही में गणेश विसर्जन के बाद भी विनय और उनकी टीम ने मुनक नहर से कई मूर्तियां निकालीं.

    कचरे में मिला 30-35 किलो का शिवलिंग मुनक नहर की सफाई के दौरान टीम को कई बार ऐसी चीजें भी मिलीं, जिन्हें देखकर लोग हैरान रह गए. हाल ही के एक अभियान में कचरे के बीच करीब 30 से 35 किलो का शिवलिंग मिला. इसके अलावा सैकड़ों धार्मिक मूर्तियां और पूजा सामग्री भी नहर से निकाली गई. टीम इन चीजों को नहर से बाहर निकालकर आसपास के इलाके की सफाई करती है.

    विनय खुद भी एक बेहद साधारण परिवार से आते हैं. उनके पिता एक प्यून थे. विनय का बचपन जेजे कॉलोनी में बीता है. विनय बताते हैं कि पढ़ाई करने के लिए उन्होंने 7 साल की उम्र से ही काम करना शुरू कर दिया था. इसके बावजूद उन्होंने नहर की सफाई के इस अभियान को अपने जीवन का मिशन बना लिया.

    कांच, सुई और केमिकल के बीच होती है सफाई मुनक नहर की सफाई का काम जितना आसान दिखाई देता है, असल में उतना ही जोखिम भरा है. कचरे के बीच कांच, सुई और दूसरे खतरनाक सामान तक मिल जाते हैं. कई बार सफाई के दौरान विनय और उनकी टीम के सदस्यों को चोटें भी लगी हैं. एक बार कचरे से भरे बोरे से निकले केमिकल की वजह से विनय के हाथों में छाले तक पड़ गए थे. इसके बावजूद विनय की मुहिम रुकी नहीं. वह लगातार बच्चों और युवाओं के साथ मिलकर नहर की सफाई में जुटे हुए हैं.

  • मोरिंगा से बनाएं ये टेस्टी रेसिपी, जो बच्चे नहीं खाते वह भी उंगलियों को चाट कर खाएंगे ये डिश..

    मोरिंगा से बनाएं ये टेस्टी रेसिपी, जो बच्चे नहीं खाते वह भी उंगलियों को चाट कर खाएंगे ये डिश..

    मोरिंगा से बनाएं ये टेस्टी रेसिपी, जो बच्चे नहीं खाते वह भी उंगलियों को चाट कर खाएंगे ये डिश..

    सहजन देखकर नखरे करने वाले बच्चों के लिए रोज की सब्जी से अलग बनाएं यह चटपटी मोरिंगा डिश. यह रेसिपी बच्चे उंगलियां चाटकर खाएंगे ही साथ ही जिन्हें मोरिंगा पसंद नहीं वह भी नखरे नहीं दिखाएंगे.

    मोरिंगा यानी सहजन की सब्जी बच्चों को बिल्कुल पसंद नहीं आती. प्लेट में देखते ही बच्चे इसे खाने से मना करने लगते हैं. इसकी वजह से घर में मोरिंगा बनाना भी कई बार मुश्किल हो जाता है. लेकिन अगर इसे रोज की सब्जी की तरह बनाने के बजाय थोड़ा चटपटा ट्विस्ट दिया जाए, तो इसका स्वाद काफी अलग लग सकता है. अगर आपके घर में भी बच्चे मोरिंगा खाने में नखरे करते हैं, तो इस आसान तरीके से इसे बनाकर देख सकते हैं. इसमें किसी खास चीज की जरूरत नहीं है. घर में आसानी से मिलने वाले कुछ मसालों से ही मोरिंगा को चटपटा बनाया जा सकता है. इसे बच्चे तो पसंद करते ही हैं, बड़े भी स्वाद लेकर खाते हैं.

    सबसे पहले मोरिंगा को करें तैयार रेसिपी शुरू करने के लिए सबसे पहले मोरिंगा लें और उसे अच्छे से धो लें. इसके बाद इसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें. टुकड़े बहुत बड़े न रखें, ताकि आगे इसे तैयार करना आसान रहे. अब एक बर्तन में पानी लें और उसमें अच्छे से नमक डालें. कटे हुए मोरिंगा के टुकड़ों को इसी नमक वाले पानी में डालकर करीब आधे घंटे के लिए छोड़ दें. इससे मोरिंगा आगे पकाने के लिए तैयार हो जाएगा.

    नमक वाले पानी में ही करें बॉयल आधे घंटे बाद मोरिंगा को उसी नमक वाले पानी में करीब 25 मिनट तक बॉयल कर लें. इसे अच्छी तरह उबालना जरूरी है, ताकि मोरिंगा नरम हो जाए और इसमें मसाले आसानी से मिल सकें.

    जब मोरिंगा बॉयल हो जाए, तो इसे पानी से छानकर निकाल लें. अब इसमें चटपटे मसाले डालने की बारी है.

    इन मसालों से आएगा चटपटा स्वाद बॉयल किए हुए मोरिंगा में सबसे पहले काला नमक डालें. इसके बाद चाट मसाला, अमचूर पाउडर और लाल मिर्च डालें. इसमें थोड़ा सा गरम मसाला भी मिला दें. आखिर में स्वाद के हिसाब से सादा नमक डालें. अगर आपको नींबू का खट्टा-चटपटा स्वाद पसंद है, तो इसमें थोड़ा नींबू भी निचोड़ सकते हैं. अब सभी मसालों को मोरिंगा के साथ अच्छे से मिला लें, ताकि मसालों का स्वाद हर टुकड़े में आ जाए. फिर ऊपर थोड़ा धनिया की पत्तियों को बारीक काटकर डालें.

    बस, इतने आसान तरीके से मोरिंगा की यह चटपटी डिश तैयार हो जाएगी. रोज की सब्जी से अलग इसका स्वाद बच्चों को भी पसंद आ सकता है. ऐसे में जो बच्चे मोरिंगा खाने से दूर भागते हैं, वे भी इसे चटपटे अंदाज में उंगली चाटकर खा सकते हैं. बड़े भी इसे मजे से खाएंगे.

  • एक कॉल, एक WhatsApp’ मैसेज और फ्रेंचाइजी का लालच, 3 लोग शिकार

    एक कॉल, एक WhatsApp’ मैसेज और फ्रेंचाइजी का लालच, 3 लोग शिकार

    एक कॉल, एक WhatsApp’ मैसेज और फ्रेंचाइजी का लालच, 3 लोग शिकार

    फिरोजपुर में ऑनलाइन साइबर ठगों द्वारा आम लोगों को अपना शिकार बनाकर लाखों रुपये की ठगी करने के तीन मामले सामने आए हैं। स्टेट साइबर क्राइम पंजाब और स्थानीय पुलिस ने प्राप्त शिकायतों के आधार पर तरसेम सिंह, सुनील कुमार सचदेवा और अनुज शर्मा के साथ हुई लाखों रुपये की धोखाधड़ी के संबंध में अज्ञात तथा एक व्यक्ति के खिलाफ बीएनएस की धाराओं के तहत मामले दर्ज किए हैं। जिला फिरोजपुर में साइबर अपराधियों ने अलग-अलग हथकंडे अपनाकर तीन व्यक्तियों से कुल 20.91 लाख रुपये की ऑनलाइन ठगी की है।थाना लक्खो के बहराम के तहत आते गांव मिर्जा के निवासी तरसेम सिंह पुत्र बलवंत सिंह ने बताया कि उन्हें एक नंबर 18002662 से कॉल आई। कॉल में कहा गया कि यदि आपने भुगतान (पेमेंट) किया है तो 1 दबाएं और यदि नहीं किया तो 9 दबाएं। जैसे ही उन्होंने 9 दबाया, उनके बैंक खाते से 2 लाख रुपये कटने का मैसेज आ गया।

    फिरोजपुर शहर के बाजार दुर्गा दास के रहने वाले सुनील कुमार सचदेवा पुत्र मनोहर लाल सिंह (निवासी मकान नंबर 16, गली कुमारां वाली, बाजार दुर्गा दास, फिरोजपुर शहर) ने बताया कि उन्हें एक व्हाट्सएप कॉल आई कि उनके बेटे का कैलगरी (कनाडा) में एक्सीडेंट हो गया है और वह अस्पताल में भर्ती है। इलाज के लिए पैसों की मांग करने पर उन्होंने घबराहट में आकर अलग-अलग खातों में 11 लाख 50 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए। सुनील कुमार सचदेवा ने बताया कि बाद में बेटे के सुरक्षित होने का पता चलने पर उन्होंने 1930 पर शिकायत दर्ज कराई।

    इसी तरह सहायक थानेदार जसबीर सिंह ने बताया कि अनुज शर्मा पुत्र पवन शर्मा (निवासी मकान नंबर 21, पाम सिटी, धवन कॉलोनी के पास) ने एक वेबसाइट पर फ्रेंचाइजी देने का विज्ञापन देखकर संपर्क किया था। अनुज शर्मा ने बताया कि ठगों ने झांसे में लेकर फॉर्म भरवाया और अलग-अलग किस्तों में कुल 7 लाख 41 हजार 930 रुपये ट्रांसफर करवा लिए। अनुज शर्मा ने बताया कि फ्रेंचाइजी न मिलने पर उन्होंने 1930 पर शिकायत की।पुलिस जांच में कॉल करने वाले मोबाइल नंबर का रिकॉर्ड कोलकाता (पश्चिम बंगाल) के एक व्यक्ति प्राणकृष्णा मोहंती पुत्र शुकादेब मोहंती (निवासी बालेश्वर, धामनगर, भद्रक, ओडिशा / कोलिन लेन, पार्क स्ट्रीट) के नाम पर पाया गया, जिसके बाद कानूनी राय लेकर केस दर्ज कर लिया गया है। इन तीनों मामलों की जांच सहायक थानेदार जसबीर सिंह कर रहे हैं।

  • इंस्टाग्राम रील देखते-देखते’ महिला के खाते से उड़ गए पैसे, एक क्लिक से साइबर ठगों ने लगाया चूना.

    इंस्टाग्राम रील देखते-देखते’ महिला के खाते से उड़ गए पैसे, एक क्लिक से साइबर ठगों ने लगाया चूना.

    इंस्टाग्राम रील देखते-देखते’ महिला के खाते से उड़ गए पैसे, एक क्लिक से साइबर ठगों ने लगाया चूना.

    सोशल मीडिया पर रील्स देखना आजकल लोगों की रोजमर्रा की आदत बन चुका है। लेकिन यही आदत कभी-कभी साइबर ठगों के लिए लोगों तक पहुंचने का आसान रास्ता बन जाती है। राजस्थान के पाली जिले के सादड़ी कस्बे में ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां इंस्टाग्राम पर रील देखते समय एक महिला को लुभावना ऑफर दिखाई दिया। महिला ने जैसे ही विज्ञापन में दिए गए लिंक पर क्लिक किया, उसके बैंक खाते से रकम निकल गई।

    मामले की शिकायत पीड़िता ने सादड़ी थाने में दर्ज कराई है। इसके बाद साइबर ठगी के इस तरीके को लेकर लोगों को सावधान रहने की सलाह दी जा रही है।

    रील में दिखा ऑफर और एक क्लिक ने बढ़ा दिया खतरा

    पीड़िता के मुताबिक वह मोबाइल पर इंस्टाग्राम रील्स देख रही थी। इसी दौरान उसे एक ऐसा विज्ञापन दिखाई दिया, जिसमें आकर्षक ऑफर का दावा किया गया था। ऑफर को देखकर उसने विज्ञापन में दिए गए लिंक पर क्लिक कर दिया।

    आरोप है कि लिंक पर जाने के बाद उसके बैंक खाते से पैसे निकल गए। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाले हर विज्ञापन और ऑफर पर भरोसा करना कितना जोखिम भरा हो सकता है।

    APK फाइल के जरिए ठगी का नया तरीका

    साइबर एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ठग सोशल मीडिया पर लोगों को आकर्षित करने के लिए बेहद सस्ते सामान, इनाम, ऑनलाइन कमाई या दूसरे लुभावने ऑफर का इस्तेमाल कर सकते हैं।

    लिंक पर क्लिक करने के बाद यूजर को किसी दूसरी वेबसाइट पर भेजा जा सकता है या ऐप डाउनलोड करने के लिए कहा जा सकता है। कई मामलों में संदिग्ध APK फाइल डाउनलोड करवाने की कोशिश की जाती है।

    अगर कोई व्यक्ति ऐसी फाइल को इंस्टॉल कर देता है और उसे जरूरत से ज्यादा परमिशन दे देता है, तो फोन में मौजूद निजी जानकारी जोखिम में पड़ सकती है। इसमें मैसेज, कॉन्टैक्ट्स, फोटो और अन्य संवेदनशील डेटा शामिल हो सकते हैं।

    बैंकिंग ऐप और OTP भी हो सकते हैं निशाने पर

    साइबर अपराधी केवल बैंक खाते से पैसे निकालने तक सीमित नहीं रहते। अगर किसी संदिग्ध ऐप को फोन की संवेदनशील परमिशन मिल जाती है, तो वह डिवाइस पर आने वाले मैसेज और दूसरी जानकारी तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है।

    यही वजह है कि केवल किसी अनजान व्यक्ति को OTP बताने से बचना ही पर्याप्त नहीं है। संदिग्ध ऐप इंस्टॉल करना, अनजान लिंक खोलना और किसी वेबसाइट को बिना जांचे बैंकिंग जानकारी देना भी बड़ा जोखिम बन सकता है।

    500 रुपये में 5000 का सामान जैसे ऑफर से रहें सावधान

    रील्स और सोशल मीडिया विज्ञापनों में ठग अक्सर ऐसे ऑफर दिखा सकते हैं जो पहली नजर में बेहद आकर्षक लगते हैं। उदाहरण के लिए महंगा सामान बहुत कम कीमत में देने का दावा, घर बैठे हजारों रुपये कमाने का ऑफर, फर्जी स्क्रैच कार्ड या महंगे इनाम जीतने का लालच दिया जा सकता है।

    ऐसे ऑफर का मकसद यूजर को जल्दी फैसला लेने के लिए मजबूर करना हो सकता है। इसलिए किसी भी ऑफर पर क्लिक करने से पहले उसकी वेबसाइट, कंपनी और भुगतान प्रक्रिया की अच्छी तरह जांच करना जरूरी है।

    साइबर ठगी से बचने के लिए इन बातों का रखें ध्यान

    • सोशल मीडिया रील या विज्ञापन में दिखने वाले अनजान लिंक पर तुरंत क्लिक न करें।
    • किसी भी थर्ड पार्टी वेबसाइट से APK या अन्य संदिग्ध फाइल डाउनलोड न करें।
    • ऐप हमेशा आधिकारिक Google Play Store या Apple App Store से ही डाउनलोड करें।
    • किसी ऐप को जरूरत से ज्यादा परमिशन देने से बचें।
    • बहुत ज्यादा सस्ते ऑफर और असामान्य डिस्काउंट को लेकर सतर्क रहें।
    • बैंकिंग जानकारी, UPI PIN, पासवर्ड या OTP किसी के साथ साझा न करें।
    • फोन में संदिग्ध ऐप दिखाई दे तो उसे तुरंत हटाएं और जरूरी सुरक्षा जांच करें।
    • बैंक खाते में किसी अनजान लेनदेन की जानकारी मिलते ही बैंक से संपर्क करें और साइबर फ्रॉड की शिकायत दर्ज कराएं।

    सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला हर विज्ञापन भरोसेमंद हो, यह जरूरी नहीं है। इसलिए रील देखते समय किसी ऑफर के लालच में जल्दबाजी में क्लिक करने के बजाय पहले उसकी विश्वसनीयता जांचना ही सबसे जरूरी सावधानी है।

  • भीलवाड़ा के खेतों में’ मिलता है सात्विक भोजन, देसी गाय के घी से मिट्टी के बर्तनों में बनता है खाना.

    भीलवाड़ा के खेतों में’ मिलता है सात्विक भोजन, देसी गाय के घी से मिट्टी के बर्तनों में बनता है खाना.

    भीलवाड़ा के खेतों में’ मिलता है सात्विक भोजन, देसी गाय के घी से मिट्टी के बर्तनों में बनता है खाना.

    आज के समय में जब शहरों में खाना ज्यादातर आधुनिक किचन और रेस्टोरेंट के माहौल में तैयार होता है, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा में एक ऐसी जगह है जहां भोजन का अनुभव बिल्कुल अलग है। यहां खेतों के बीच बैठकर मिट्टी के बर्तनों में तैयार किया गया देसी खाना परोसा जाता है।

    खास बात यह है कि इस भोजनालय में इस्तेमाल होने वाली कई सब्जियां और अनाज उसी फार्म पर उगाए जाते हैं। देसी गाय के घी, मिट्टी के बर्तन और पत्तल-दोने में परोसा जाने वाला भोजन इस जगह को पारंपरिक ग्रामीण खान-पान का अनुभव देता है।

    10 एकड़ बंजर जमीन को बनाया जैविक फार्म

    भीलवाड़ा शहर से करीब 20 किलोमीटर दूर ओज्यारा गांव में यह फार्म स्थित है। इसे भीलवाड़ा की पूर्वा जिंदल ने विकसित किया है।

    पूर्वा ने मुंबई से एमबीए की पढ़ाई करने के बाद अपने परिवार के पारंपरिक कारोबार से अलग खेती और एग्रोटूरिज्म की दिशा में काम करने का फैसला किया। करीब 10 एकड़ बंजर और पथरीली जमीन को उन्होंने धीरे-धीरे खेती के लिए तैयार किया।

    साल 2021 से जमीन को उपजाऊ बनाने का काम शुरू किया गया। मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत और नीमास्त्र जैसे प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल किया गया। पानी बचाने के लिए ड्रिप इरिगेशन और मल्चिंग जैसी तकनीकों को भी अपनाया गया।

    आज इसी जमीन पर कई तरह की सब्जियां और फसलें उगाई जाती हैं।

    खेत में ही उगती हैं कई सब्जियां

    फार्म पर मौसम के अनुसार अलग-अलग फसलें तैयार की जाती हैं। इनमें ब्रोकली, गाजर, मूली, फूलगोभी, पत्तागोभी, टमाटर, मटर, तरबूज, भिंडी और स्ट्रॉबेरी जैसी फसलें शामिल हैं।

    इन्हीं खेतों में उगाई गई सामग्री से भोजन तैयार करने की कोशिश की जाती है। इससे खेत और भोजन के बीच सीधा जुड़ाव दिखाई देता है।

    मिट्टी के बर्तनों में तैयार होता है खाना

    पूर्वा ने फार्म हाउस में ही सात्विक भोजन के लिए एक रसोई तैयार करवाई है। यहां खाना पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में पकाया जाता है।

    भोजन को पत्तल में और दाल-सब्जियों को दोने में परोसने की व्यवस्था है। खेतों के बीच प्राकृतिक वातावरण में बैठकर खाना इस अनुभव को और खास बनाता है।

    खाने में देसी गाय के घी का इस्तेमाल किया जाता है। फार्म पर कुछ गिर गाय भी पाली गई हैं, जिनके दूध से घी और छाछ जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

    मेन्यू में क्या-क्या मिलता है?

    यहां का मेन्यू मौसम के हिसाब से बदलता रहता है। उपलब्ध व्यंजनों में मक्के की रोटी, मेथी का पराठा, ब्रोकली-लेटिस सलाद, ताजी पत्तागोभी की सब्जी, हरे टमाटर की सब्जी, मूली का अचार और चुकंदर का हलवा शामिल हैं।

    इसके अलावा ऑर्गेनिक दाल, आलू-मटर की सब्जी और गाय के दूध से तैयार छाछ भी परोसी जाती है। देसी घी से बनाया जाने वाला चुकंदर का हलवा भी यहां के खास व्यंजनों में शामिल है।

    गायों से लेकर खेत तक जुड़ा है पूरा मॉडल

    इस फार्म की एक और खासियत यह है कि यहां खेती और पशुपालन को एक-दूसरे से जोड़ा गया है। फार्म पर पाली गई गायों से मिलने वाले गोबर का इस्तेमाल खाद तैयार करने में किया जाता है, जबकि दूध से छाछ और घी जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

    फार्म पर उगाई जाने वाली सब्जियां भी भीलवाड़ा शहर में ऑर्डर पर भेजी जाती हैं। यानी यहां सिर्फ भोजन परोसने का काम नहीं है, बल्कि खेती से लेकर खाने की थाली तक एक पूरा स्थानीय मॉडल तैयार किया गया है।

    सिर्फ रविवार को मिलता है खेत वाला खाना

    अगर कोई व्यक्ति इस खास माहौल में भोजन करना चाहता है तो उसे पहले से योजना बनानी पड़ती है। यहां भोजन हर दिन उपलब्ध नहीं होता। फार्म पर रविवार को भोजन करवाया जाता है।

    फार्म पर जाने से करीब दो दिन पहले ऑर्डर देना होता है और कितने लोगों के लिए भोजन चाहिए, इसकी जानकारी पहले से देनी होती है। इससे उसी हिसाब से ताजा भोजन तैयार किया जा सके।

    खाना ही नहीं, खेती का अनुभव भी

    यहां आने वाले लोगों के लिए अनुभव सिर्फ खाना खाने तक सीमित नहीं रहता। कई लोग खेतों में घूमते हैं, खेती के काम को करीब से देखते हैं और ग्रामीण जीवन का अनुभव लेते हैं।

    शहर की भागदौड़ से दूर खेतों के बीच बैठकर मिट्टी के बर्तनों में तैयार पारंपरिक भोजन करना उन लोगों के लिए अलग अनुभव हो सकता है, जो प्राकृतिक माहौल और देसी खान-पान को करीब से महसूस करना चाहते हैं।

    भीलवाड़ा का यह फार्म इस बात का उदाहरण है कि खेती को सिर्फ फसल उत्पादन तक सीमित न रखकर उसे भोजन, ग्रामीण अनुभव और एग्रोटूरिज्म से भी जोड़ा जा सकता है। यहां की खासियत खेत में उगी सामग्री, पारंपरिक तरीके से तैयार भोजन और प्रकृति के बीच बैठकर खाने का अनुभव है।

  • दुनिया का अनोखा गांव, जहां होते हैं सभी लोग अंधे, वजह जानकर हो जाएंगे आप भी शॉक्ड!.

    दुनिया का अनोखा गांव, जहां होते हैं सभी लोग अंधे, वजह जानकर हो जाएंगे आप भी शॉक्ड!.

    दुनिया का अनोखा गांव, जहां होते हैं सभी लोग अंधे, वजह जानकर हो जाएंगे आप भी शॉक्ड!.

    दुनिया में कई ऐसी जगहें हैं, जिनसे जुड़ी कहानियां सुनकर लोग हैरान रह जाते हैं। मेक्सिको का टिल्टेपेक गांव भी ऐसी ही जगहों में गिना जाता है। लंबे समय से इस गांव को लेकर यह चर्चा रही है कि यहां रहने वाले लोगों में बड़ी संख्या में अंधेपन की समस्या देखी गई और इसके पीछे एक रहस्यमयी पेड़ को जिम्मेदार माना जाता था।

    कहा जाता था कि गांव में मौजूद एक खास पेड़ को देखने से इंसान की आंखों की रोशनी चली जाती है। हालांकि, बाद में वैज्ञानिक जांच में इस रहस्य के पीछे एक बीमारी की बात सामने आई।

    रहस्यमयी पेड़ को माना जाता था वजह

    स्थानीय मान्यता के मुताबिक, टिल्टेपेक में बाविन या लावलेजा नाम के एक विशेष पेड़ को लेकर डर की कहानी प्रचलित थी। लोगों के बीच यह धारणा थी कि इस पेड़ को देखने से आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है।

    कहानी इतनी प्रचलित हुई कि गांव में होने वाले अंधेपन को भी इसी पेड़ से जोड़कर देखा जाने लगा। लेकिन वैज्ञानिक नजरिए से अंधेपन की वजह कुछ और बताई गई।

    बीमारी ने खोला अंधेपन का राज

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस इलाके में अंधेपन की समस्या का संबंध ओन्कोसिएरसीस नामक परजीवी संक्रमण से हो सकता है। इसे आम भाषा में रिवर ब्लाइंडनेस भी कहा जाता है।

    यह बीमारी Onchocerca volvulus नामक परजीवी के कारण होती है। इसका संक्रमण संक्रमित ब्लैक फ्लाई यानी एक तरह की काली मक्खी के काटने से फैलता है।

    बार-बार संक्रमित मक्खियों के काटने से शरीर में परजीवी का संक्रमण बढ़ सकता है और इसके गंभीर प्रभाव त्वचा तथा आंखों पर पड़ सकते हैं। आंखों को प्रभावित करने की स्थिति में यह बीमारी दृष्टि को नुकसान पहुंचा सकती है।

    पेड़ नहीं, संक्रमण बना वजह

    यानी जिस अंधेपन को कभी गांव के रहस्यमयी पेड़ से जोड़कर देखा जाता था, उसके पीछे वैज्ञानिक जांच में संक्रामक बीमारी को प्रमुख कारण माना गया।

    रिवर ब्लाइंडनेस आमतौर पर उन इलाकों में पाई जाती है जहां संक्रमण फैलाने वाली ब्लैक फ्लाई का प्रकोप होता है। इन मक्खियों का संबंध बहते पानी वाले क्षेत्रों से भी होता है।

    क्या गांव का हर व्यक्ति अंधा है?

    टिल्टेपेक को लेकर इंटरनेट और लोकप्रिय कहानियों में अक्सर इसे ऐसा गांव बताया जाता है जहां सभी लोग अंधे हैं। लेकिन इस तरह का दावा बिना संदर्भ के करना सही नहीं है।

    असल कहानी यह है कि गांव लंबे समय से रिवर ब्लाइंडनेस और उससे जुड़े दृष्टि संबंधी मामलों की चर्चा के कारण जाना जाता रहा है। बीमारी की मौजूदगी को लेकर वैज्ञानिक कारण सामने आने के बाद रहस्यमयी पेड़ वाली कहानी की जगह संक्रमण की वैज्ञानिक व्याख्या ने ले ली।

    यह कहानी एक दिलचस्प उदाहरण है कि किसी बीमारी के कारणों की जानकारी उपलब्ध न होने पर उसके साथ किस तरह लोक-विश्वास और रहस्यमयी कहानियां जुड़ सकती हैं। वैज्ञानिक जांच के बाद उसी घटना की एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आ सकती है।

  • अरे ये क्या चालान’ से बचने के लिए किया गजब का जुगाड़, पुलिसवाला भी रह गया हैरान

    अरे ये क्या चालान’ से बचने के लिए किया गजब का जुगाड़, पुलिसवाला भी रह गया हैरान

    अरे ये क्या! चालान से बचने के लिए किया गजब का जुगाड़, पुलिसवाला भी रह गया हैरान

    ट्रैफिक के बीच बाइक पर तीन लोग जा रहे थे, तभी सामने पुलिसकर्मी नजर आ गया. इसके बाद ऐसा जुगाड़ हुआ कि बाइक पर अचानक सिर्फ दो लोग रह गए. लगा कि चालान से बचने की तरकीब काम कर गई, लेकिन कॉन्स्टेबल की नजरों से ये ‘जादू’ नहीं बच पाया. उसने तुरंत पूरी कहानी समझ ली और फिर जो अंदाज अपनाया, उसे देखकर आप भी मुस्कुरा देंगे.

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    अरे ये क्या! चालान से बचने के लिए किया गजब का जुगाड़, पुलिसवाला भी हुआ हैरान

    सोचिए, सड़क पर ट्रैफिक के बीच आप बाइक पर जा रहे हों और अचानक सामने ट्रैफिक पुलिस वाला नजर आ जाए… दिल की धड़कन तो बढ़ेगी ही! लेकिन इस वीडियो में पुलिसकर्मी को देखते ही एक शख्स ने ऐसा ‘जादू’ किया कि बाइक पर तीन लोग से सीधे दो रह गए. उसे लगा कि शायद पुलिस की नजर से बच जाएगा, लेकिन कॉन्स्टेबल ने उसकी पूरी चाल पकड़ ली. इसके बाद जो हुआ, वो देखने लायक है.

    दरअसल, सड़क पर काफी ट्रैफिक था और इसी बीच ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल की नजर एक बाइक पर पड़ी. बाइक पर तीन लोग सवार थे. कॉन्स्टेबल जैसे ही उनकी तरफ बढ़ा, तभी कुछ ऐसा हुआ कि बाइक पर सवार लोगों की गिनती अचानक बदल गई. आखिर एक शख्स कहां गायब हो गया? यहीं से शुरू होता है पूरा मजेदार खेल.

    ‘तीन से दो कैसे हो गए?’

    पुलिसकर्मी के पास पहुंचते ही बाइक पर बैठा एक व्यक्ति तुरंत नीचे उतर गया और बिना कुछ कहे ऐसे आगे बढ़ने लगा, जैसे उसका बाइक से कोई लेना-देना ही न हो. उसे शायद लगा कि इस तरह पुलिस की नजरों से बच जाएगा. लेकिन कॉन्स्टेबल की नजरें पहले ही उसकी चाल पकड़ चुकी थीं. पुलिसकर्मी ने उसे जाते हुए देखा तो तुरंत रोक लिया. फिर मजेदार अंदाज में पूछा, ‘अरे कहां जा रहे हो… तीन से दो कैसे हो गए?’ इसके बाद वह हंसते हुए कहता है कि अभी तो बाइक पर तीन लोग थे, अचानक दो कैसे रह गए.

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    बस, यही वो पल था जिसने पूरे वीडियो को मजेदार बना दिया. शख्स ने पुलिस को देखते ही खुद को बाइक से अलग करने की कोशिश तो की, लेकिन कॉन्स्टेबल ने उसकी ‘जादू की ट्रिक’ पकड़ ली. इसके बाद मामला सिर्फ चालान तक नहीं पहुंचा. कॉन्स्टेबल ने शख्स को समझाया कि बाइक पर तीन लोगों के बैठने के बजाय वह ऑटो से जाए. यानी पुलिस से बचने के लिए की गई छोटी-सी तरकीब आखिरकार काम नहीं आई.

    चालान नहीं, हेलमेट पहनाकर दिया सेफ्टी का सबक

    लेकिन वीडियो में इसके बाद जो हुआ, उसने लोगों का ध्यान और ज्यादा खींच लिया. कॉन्स्टेबल ने बाइक चालक को सही तरीके से हेलमेट पहनाया और उसे सुरक्षित सफर की अहमियत भी समझाई. यानी मजाक-मजाक में नियम तोड़ने की कोशिश पकड़ने वाला पुलिसकर्मी आखिर में सड़क सुरक्षा का संदेश देता नजर आया. यह वीडियो ट्रैफिक पुलिस कॉन्स्टेबल नितिन के इंस्टाग्राम अकाउंट @thenitinmavi से शेयर किया गया था. उन्होंने वीडियो के साथ कैप्शन में लिखा, ‘जादू हो गया 3 से 2… जादू मत करो सुरक्षित चलो

     

     

  • कॉर्पोरेट लॉयर की नौकरी. छोड़ी, लद्दाख के गांव में रहने लगीं नयनतारा, बोलीं अब समझ आई पानी की असली कीमत.

    कॉर्पोरेट लॉयर की नौकरी. छोड़ी, लद्दाख के गांव में रहने लगीं नयनतारा, बोलीं अब समझ आई पानी की असली कीमत.

    कॉर्पोरेट लॉयर की नौकरी. छोड़ी, लद्दाख के गांव में रहने लगीं नयनतारा, बोलीं अब समझ आई पानी की असली कीमत.

    शहर की तेज रफ्तार जिंदगी से दूर पहाड़ों में कुछ दिन बिताना कई लोगों का सपना होता है। छुट्टियों में लोग पहाड़ों की ठंडी हवा, शांत वातावरण और खूबसूरत नजारों का आनंद लेने पहुंचते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग कुछ दिन बाद वापस अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आते हैं।

    नयनतारा चौहान की कहानी इससे अलग है। कॉर्पोरेट लॉयर की नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने मनाली में आउटडोर शेफ के तौर पर काम करना शुरू किया और अब वह लद्दाख के एक गांव में करीब दो महीने से रह रही हैं। सोशल मीडिया पर साझा किए गए उनके अनुभवों ने लोगों को लद्दाख की जिंदगी का एक ऐसा पहलू दिखाया है, जो आमतौर पर पर्यटकों को नजर नहीं आता।

    ड्राई टॉयलेट का इस्तेमाल कर समझी पानी की कीमत

    नयनतारा के मुताबिक, लद्दाख के गांव में रहना उनके लिए सिर्फ खूबसूरत पहाड़ों के बीच समय बिताना नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की कई ऐसी चीजों से सामना भी है जो शहरों में रहने वालों के लिए सामान्य नहीं हैं।

    उन्होंने बताया कि गांव में ड्राई टॉयलेट का इस्तेमाल किया जाता है। शुरुआत में उन्हें इसे अपनाने में कुछ परेशानी हुई और करीब एक सप्ताह में वह इसकी आदत डाल पाईं।

    यहां सामान्य फ्लश वाले टॉयलेट की तरह बड़ी मात्रा में पानी इस्तेमाल नहीं होता। पानी की जगह पेपर और मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। नयनतारा का कहना है कि इस अनुभव ने उन्हें शहरों में रोजाना इस्तेमाल होने वाले पानी की अहमियत को नए तरीके से समझने का मौका दिया।

    उनके मुताबिक, शहर में एक बार फ्लश करने में कितना पानी खर्च हो जाता है, इसका एहसास लद्दाख जैसे इलाके में रहने के बाद ज्यादा स्पष्ट हुआ।

    नदी पर निर्भर है पानी की सप्लाई

    लद्दाख के साबु गांव में पानी की व्यवस्था भी शहरों जैसी आसान नहीं है। नयनतारा ने बताया कि गांव की पानी की सप्लाई पास से गुजरने वाली नदी के पानी पर निर्भर करती है।

    नदी में पानी का बहाव मौसम और ग्लेशियर से आने वाले पानी के स्तर के साथ बदलता रहता है। जब पानी का बहाव पर्याप्त होता है तो घरों तक पानी पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान रहता है। लेकिन जब नदी का प्रवाह कम हो जाता है, तो ग्रामीण मिलकर पानी को घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था करते हैं।

    इसके लिए पानी का रास्ता तैयार करने के साथ रबड़ की पाइप और मोटर का इस्तेमाल किया जाता है। यह व्यवस्था नयनतारा के लिए शहर की लगातार उपलब्ध पानी की सप्लाई से बिल्कुल अलग अनुभव है।

    शाम की चाय और ताजी सब्जियों में मिलता है सुकून

    नयनतारा के अनुभवों में गांव की छोटी-छोटी चीजें भी खास जगह रखती हैं। उनका कहना है कि शाम के समय ठंडी हवा के बीच बैठकर चाय पीने का अनुभव अलग ही सुकून देता है।

    यहां शहरों की तरह हर समय पिज्जा, बर्गर या दूसरी चीजें आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन ताजी सब्जियां मिल जाती हैं। खानपान साधारण है और जीवनशैली भी अपेक्षाकृत सीधी-सादी है।

    गांव के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं, हालचाल पूछते हैं, साथ बैठकर बातें करते हैं और रोजमर्रा की जिंदगी में एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। नयनतारा को लोगों के बीच यह जुड़ाव खासा पसंद आया।

    खूबसूरत नजारों से आगे की कहानी

    लद्दाख को आमतौर पर ऊंचे पहाड़ों, बर्फीले इलाकों और खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों के लिए जाना जाता है। लेकिन नयनतारा ने अपने सोशल मीडिया वीडियो में पर्यटन से अलग वहां की रोजमर्रा की जिंदगी दिखाने की कोशिश की है।

    उन्होंने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर लद्दाख में रहने के अनुभव से जुड़े करीब 28 वीडियो साझा किए हैं। इनमें गांव का जीवन, पानी की व्यवस्था, रहने की परिस्थितियां, खानपान और स्थानीय लोगों की दिनचर्या जैसे पहलू दिखाई देते हैं।

    उनके वीडियो पर सोशल मीडिया यूजर्स की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। कुछ लोगों ने उनके अनुभव को ऐसी जिंदगी से जोड़ा है, जिसे वे खुद जीना चाहते हैं, जबकि कुछ ने कहा कि किसी जगह को समझने के लिए उसकी खूबसूरती के साथ वहां की चुनौतियों को देखना भी जरूरी है।

    अब शहर लौटने का नहीं कर रहा मन

    करीब दो महीने गांव में रहने के बाद नयनतारा को यहां की सादगी और जीवनशैली पसंद आने लगी है। शहर की सुविधाओं से दूर रहने के बावजूद उन्हें ग्रामीण जीवन का आपसी जुड़ाव और प्रकृति के करीब रहने का अनुभव आकर्षित कर रहा है।

    उनकी कहानी इस बात की ओर भी ध्यान खींचती है कि जिन सुविधाओं को शहरों में हम बिल्कुल सामान्य मानते हैं, उनकी अहमियत उन जगहों पर जाकर समझ आती है जहां पानी और दूसरी बुनियादी चीजों के लिए भी लोगों को प्रकृति और सामूहिक प्रयास पर निर्भर रहना पड़ता है।

    नयनतारा के लिए लद्दाख का यह सफर सिर्फ एक यात्रा नहीं रह गया है। करीब दो महीने यहां बिताने के बाद उनका मन अब वापस शहर लौटने के बजाय इसी सादगी भरी जिंदगी में बसने का करने लगा है।

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  • पार्सल के डिब्बे ज्यादातर’ भूरे रंग के ही क्यों होते हैं, जानिए इसके पीछे की वजह.

    पार्सल के डिब्बे ज्यादातर’ भूरे रंग के ही क्यों होते हैं, जानिए इसके पीछे की वजह.

    पार्सल के डिब्बे ज्यादातर’ भूरे रंग के ही क्यों होते हैं, जानिए इसके पीछे की वजह.

    ऑनलाइन शॉपिंग का दौर है। घर के दरवाजे पर जब भी कोई पार्सल पहुंचता है, तो सबसे पहले नजर अक्सर एक भूरे रंग के डिब्बे पर जाती है। कपड़े हों, जूते, किताबें या कोई इलेक्ट्रॉनिक सामान, सामान्य शिपिंग पैकेजिंग में इस्तेमाल होने वाला बॉक्स अक्सर भूरे रंग का ही दिखाई देता है।

    लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पार्सल के डिब्बे ज्यादातर इसी रंग के क्यों होते हैं? इसके पीछे सिर्फ कोई डिजाइन या परंपरा नहीं, बल्कि पैकेजिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले कागज की प्रकृति और लागत से जुड़ी वजहें हैं।

    क्राफ्ट पेपर से बनते हैं ज्यादातर बॉक्स

    पार्सल बॉक्स बनाने के लिए अक्सर क्राफ्ट पेपर और उससे तैयार किए गए कोरुगेटेड फाइबरबोर्ड का इस्तेमाल किया जाता है। क्राफ्ट पेपर का प्राकृतिक रंग आमतौर पर भूरा या टैन होता है।

    इसे सफेद या दूसरे रंगों में बदलने के लिए अतिरिक्त प्रोसेसिंग और ब्लीचिंग की जरूरत पड़ सकती है। सामान्य शिपिंग बॉक्स में ऐसा करना जरूरी नहीं होता, इसलिए प्राकृतिक भूरे रंग को ही बरकरार रखा जाता है।

    मजबूत होने के साथ किफायती भी

    पार्सल की पैकेजिंग का सबसे जरूरी काम सामान को सुरक्षित रखना है। डिब्बे को रास्ते में लगने वाले झटकों, दबाव और सामान को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के दौरान होने वाली सामान्य टूट-फूट से बचाने में मदद करनी होती है।

    कोरुगेटेड फाइबरबोर्ड की कई परतों से बने बॉक्स इस काम के लिए उपयोगी होते हैं। साथ ही, सामान्य भूरे बॉक्स पर अतिरिक्त रंग या सजावट की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे बड़े पैमाने पर पैकेजिंग की लागत को नियंत्रित रखना आसान होता है।

    ऑनलाइन शॉपिंग में क्यों बढ़ गया इस्तेमाल?

    ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों को हर दिन बड़ी संख्या में सामान पैक करके भेजना पड़ता है। ऐसे में पैकेजिंग की कीमत भी कारोबार की लागत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।

    सादा भूरा बॉक्स इस मामले में व्यावहारिक विकल्प होता है। यह अपेक्षाकृत मजबूत होता है, आसानी से उपलब्ध होता है और उस पर कंपनी का नाम, पता, बारकोड या दूसरी जरूरी जानकारी भी प्रिंट की जा सकती है।

    क्या हर पार्सल बॉक्स भूरा ही होता है?

    नहीं। यह कहना सही नहीं होगा कि दुनिया में हर पार्सल सिर्फ भूरे रंग के डिब्बे में ही आता है।

    कई कंपनियां अपनी ब्रांड पहचान के लिए रंगीन, प्रिंटेड या आकर्षक डिजाइन वाले बॉक्स का इस्तेमाल करती हैं। खासकर प्रीमियम और ब्रांडेड उत्पादों की पैकेजिंग में अलग-अलग रंग और डिजाइन देखने को मिलते हैं।

    फिर भी सामान्य शिपिंग और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली पैकेजिंग में भूरा रंग सबसे आम नजर आता है।

    अगली बार पार्सल आए तो ध्यान दीजिएगा

    अब अगली बार आपके घर कोई ऑनलाइन पार्सल पहुंचे और उसके हाथ में आते ही आपको वही परिचित भूरा डिब्बा दिखाई दे, तो समझ जाइए कि इसका रंग महज संयोग नहीं है। इसके पीछे क्राफ्ट पेपर का प्राकृतिक रंग, पैकेजिंग की मजबूती, लागत और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की सुविधा जैसी कई व्यावहारिक वजहें जुड़ी हैं।