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  • पुराने मोबाइल फोन से’ बने थे टोक्यो ओलंपिक के करीब 5000 मेडल, जापान ने अपनाया था अनोखा तरीका.

    पुराने मोबाइल फोन से’ बने थे टोक्यो ओलंपिक के करीब 5000 मेडल, जापान ने अपनाया था अनोखा तरीका.

    पुराने मोबाइल फोन से’ बने थे टोक्यो ओलंपिक के करीब 5000 मेडल, जापान ने अपनाया था अनोखा तरीका.

    आमतौर पर पुराना मोबाइल फोन खराब होने के बाद कबाड़ समझ लिया जाता है, लेकिन जापान ने इसी इलेक्ट्रॉनिक कचरे का ऐसा इस्तेमाल किया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। टोक्यो 2020 ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के लिए जापान ने पुराने मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से धातुएं निकालकर करीब 5,000 मेडल तैयार किए थे।

    इसके लिए जापान में वर्ष 2017 से 2019 के बीच एक विशेष अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत लोगों से अपने पुराने मोबाइल फोन और छोटी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जमा करने की अपील की गई, ताकि उनमें मौजूद उपयोगी धातुओं को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।

    लाखों पुराने मोबाइल फोन किए गए जमा

    अभियान के दौरान जापान में करीब 62.1 लाख पुराने मोबाइल फोन जमा किए गए। इसके अलावा लगभग 79 हजार छोटी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भी एकत्र की गईं। इस अभियान को सफल बनाने में स्थानीय सरकारों, नगरपालिकाओं और कई कंपनियों ने भी सहयोग किया।

    पुराने फोन और इलेक्ट्रॉनिक सामान को सीधे पिघलाकर मेडल नहीं बनाए गए। पहले इन उपकरणों को प्रोसेस किया गया और उनमें मौजूद अलग-अलग धातुओं को निकाला गया। इसके बाद इन धातुओं को रिफाइन किया गया, ताकि उनका इस्तेमाल मेडल बनाने के लिए किया जा सके।

    निकाली गई सोना, चांदी और दूसरी धातुएं

    इस प्रक्रिया से करीब 32 किलोग्राम सोना और 3,500 किलोग्राम चांदी हासिल की गई। इसके अलावा ब्रॉन्ज मेडल के लिए जरूरी धातु भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से प्राप्त की गई। इन संसाधनों का इस्तेमाल टोक्यो ओलंपिक और पैरालंपिक के लिए करीब 5,000 मेडल तैयार करने में किया गया।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि हर मेडल पूरी तरह पुराने मोबाइल फोन से निकली धातु से बना था। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से धातुओं को निकालने और शुद्ध करने के बाद उन्हें मेडल निर्माण की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया।

    सोने का मेडल भी पूरी तरह सोने का नहीं होता

    टोक्यो 2020 के मेडल्स को लेकर एक और दिलचस्प बात यह है कि गोल्ड मेडल पूरी तरह सोने से नहीं बना था। इसकी मुख्य बॉडी चांदी की थी और उसके ऊपर 6 ग्राम से अधिक सोने की परत इस्तेमाल की गई थी।

    वहीं सिल्वर मेडल चांदी से तैयार किया गया था, जबकि ब्रॉन्ज मेडल के लिए कॉपर-रिच एलॉय का इस्तेमाल किया गया था।

    कबाड़ से ओलंपिक तक का सफर

    जापान के इस अभियान की खासियत केवल हजारों मेडल तैयार करना नहीं थी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जिन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, उनमें मौजूद कीमती संसाधनों को दोबारा इस्तेमाल किया गया।

    मोबाइल फोन और दूसरी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में सोना, चांदी, तांबा जैसी कई उपयोगी धातुएं मौजूद होती हैं। इन्हें उचित तकनीक से अलग करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

    टोक्यो ओलंपिक के लिए चलाया गया यह अभियान रीसाइक्लिंग और संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल का एक अनोखा उदाहरण बन गया। इस पहल ने यह भी दिखाया कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे को केवल समस्या मानने के बजाय उसमें मौजूद संसाधनों को दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।

  • गोरे लोगों ने बसाया था या अंग्रेजों की छावनी से जुड़ा है नाम, छतरपुर के गोरगांव की कहानी आज भी रहस्य.

    गोरे लोगों ने बसाया था या अंग्रेजों की छावनी से जुड़ा है नाम, छतरपुर के गोरगांव की कहानी आज भी रहस्य.

    गोरे लोगों ने बसाया था या अंग्रेजों की छावनी से जुड़ा है नाम, छतरपुर के गोरगांव की कहानी आज भी रहस्य.

    मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक ऐसा गांव है, जिसका नाम सुनते ही लोगों के मन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं। गांव का नाम है गोरगांव। कुछ लोग इसे गोरेगांव कहते हैं तो कुछ गोर गांव। अंग्रेजी में इसका नाम GAURGAON लिखा जाता है।

    नाम को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज भी गांव के नाम की शुरुआत और इसके पीछे की असली कहानी को लेकर कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं है। गांव में रहने वाले लोग अपने बुजुर्गों से सुनी अलग-अलग बातें बताते हैं। किसी का मानना है कि कभी यहां अंग्रेज रहते थे, तो कुछ लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने ही इस गांव को बसाया था।

    हालांकि, इन दावों की पुष्टि करने वाला कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं बताया जाता।

    पहले गोरेगांव कहा जाता था?

    गांव के स्थानीय निवासी मगनलाल अहिरवार के मुताबिक, गांव का पुराना नाम गोरेगांव बताया जाता है। बाद में सरकारी रिकॉर्ड में इसका नाम गोरगांव कर दिया गया।

    नाम को लेकर आज भी गांव में अलग-अलग उच्चारण सुनने को मिलते हैं। कुछ लोग गोरगांव कहते हैं, कुछ गोरेगांव और कुछ लोग इसे गोर गांव के नाम से जानते हैं। अंग्रेजी में लिखे जाने वाले GAURGAON नाम की वजह से भी कभी-कभी बाहरी लोग इसे अलग तरीके से पढ़ लेते हैं।

    क्या अंग्रेजों ने बसाया था गांव?

    गांव के बुजुर्गों से जुड़ी एक स्थानीय कहानी अंग्रेजों के दौर से भी जुड़ी हुई है।

    स्थानीय निवासी मथुरा प्रसाद बताते हैं कि गोरगांव के आसपास छतरपुर के अलावा नौगांव भी महत्वपूर्ण स्थान है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, अंग्रेजों के समय नौगांव में ब्रिटिश छावनी थी।

    पुराने लोगों से चली आ रही एक मान्यता यह है कि अंग्रेजों ने अपनी जरूरत के लिए इस इलाके में गांव बसाया होगा। बताया जाता है कि छावनी के आसपास रहने वाले लोगों की जरूरत पड़ने पर मदद ली जा सके, इसलिए गांव को नजदीक बसाया गया होगा।

    इसी कहानी को कुछ लोग गांव के नाम ‘गोरेगांव’ से जोड़ते हैं। हालांकि, यह बात स्थानीय लोगों द्वारा बताई गई पुरानी मान्यता है और इसकी स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि स्पष्ट नहीं है।

    गांव के बुजुर्ग भी नहीं बता पाए पूरी कहानी

    स्थानीय निवासी छग्गूलाल का कहना है कि गांव के नाम का असली इतिहास शायद उनके पुरखे ही बेहतर तरीके से बता सकते थे। वर्तमान पीढ़ी ने तो बचपन से यही नाम सुना है।

    वहीं मातादीन बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों से गांव का नाम गोरेगांव ही सुना था। आज भी गांव के कुछ लोग इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं।

    उनके मुताबिक, गांव का नाम सुनकर बाहर के लोग अक्सर सवाल पूछते हैं कि क्या यहां कभी गोरे लोग रहते थे या फिर गांव को अंग्रेजों ने बसाया था।

    आखिर गोरगांव नाम कैसे पड़ा?

    यही इस गांव की सबसे दिलचस्प बात है। गांव के नाम को लेकर कई कहानियां और स्थानीय धारणाएं मौजूद हैं, लेकिन इनमें से किसी एक को प्रमाणित इतिहास के रूप में बताना मुश्किल है।

    कुछ लोग इसे अंग्रेजों से जोड़ते हैं, कुछ पुराने नाम गोरेगांव से और कुछ लोग अलग-अलग स्थानीय उच्चारणों के आधार पर इसकी व्याख्या करते हैं।

    फिलहाल गोरगांव की नामकरण कहानी गांव के बुजुर्गों की यादों और पीढ़ियों से चली आ रही बातों में ही ज्यादा सुनाई देती है। यही वजह है कि छतरपुर का यह गांव अपने नाम को लेकर आज भी लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

  • LPG Cylinder: सरकार​​​​​​​ देने जा रही अब 6 फ्री गैस सिलेंडर, जाने कौन से लोग होंगे इसके लिए पात्र

    LPG Cylinder: सरकार​​​​​​​ देने जा रही अब 6 फ्री गैस सिलेंडर, जाने कौन से लोग होंगे इसके लिए पात्र

    LPG Cylinder: सरकार​​​​​​​ देने जा रही अब 6 फ्री गैस सिलेंडर, जाने कौन से लोग होंगे इसके लिए पात्र

    आपने देखा होगा की केंद्र सरकार से लेकर प्रदेश की सरकारें आम लोगों के लिए कई काम करती रहती है। ऐसे में कुछ सरकारे एलपीजी के बढ़ते दामों के बीच भी लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए कई योजनाओं पर काम करती है। ऐसे में यह खबर आपके लिए काम की हो सकती है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने गरीब परिवारों को बड़ी राहत देने के लिए साल में 6 मुफ्त एलपीजी सिलेंडर देने की योजना को मंजूरी दी है।

    इस फैसले की जानकारी 24 सितंबर को विधानसभा में दी गई है, हालांकि इस योजना का फायदा सभी गैस उपभोक्ताओं को नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए खास कैटेगरी के राशन कार्ड धारकों को ही दिया जाएगा। उमर अब्दुल्ला सरकार के इस फैसले का खास मकसद आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के रसोई गैस खर्च को कम करना है। ऐसे में अगर आप भी जानना चाहते हैं कि 6 मुफ्त सिलेंडर का फायदा किसे मिलेगा, पैसा कैसे मिलेगा और सरकार की इस योजना में क्या शर्तें हैं, तो आइए जानते हैं इस बारे में।

    कौन हैं पात्र दरअसल, जम्मू-कश्मीर सरकार ने एएवाई के तहत आने वाले परिवारों को साल में 6 फ्री एलपीजी सिलेंडर की लागत देने का फैसला किया है। इस योजना का फायदा जम्मू-कश्मीर के उन परिवारों को मिलेगा, जिनके पास अंत्योदय अन्न योजना का राशन कार्ड है। यह राशन कार्ड आर्थिक रूप से सबसे कमजोर परिवारों के लिए जारी किया जाता है।

    कैसे मिलेगा 6 फ्री एलपीजी सिलेंडर? सरकार की ओर से बताई गई जानकारी के मुताबिक, इस योजना के लिए डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके तहत लाभार्थी को पहले सामान्य तरीके से सिलेंडर खरीदना होगा। इसके बाद निर्धारित रकम सब्सिडी के तौर पर आधार से जुड़े बैंक खाते में ट्रांसफर की जाएगी।

  • इस साल के​​​​​​​ आखिर तक सोना 1.80 लाख और 3 लाख रुपए तक पहुंच सकती है चांदी, ये है आज का भाव

    इस साल के​​​​​​​ आखिर तक सोना 1.80 लाख और 3 लाख रुपए तक पहुंच सकती है चांदी, ये है आज का भाव

    इस साल के​​​​​​​ आखिर तक सोना 1.80 लाख और 3 लाख रुपए तक पहुंच सकती है चांदी, ये है आज का भाव

    सोने-चांदी की कीमतों में आज भी तेजी आई है। आज दस ग्राम 24 कैरेट सोना 351 रुपए महंगा हो गया है। वहीं एक किलो चांदी कीमत में 1,070 रुपए की तेजी आई है। विशेषज्ञों क अनुसार, सोना इस साल के आखिर तक 1 लाख 80 हजार और चांदी भी 3 लाख रुपए किलो तक जा सकती है।

    खबरों के अनुसार, आज दस ग्राम 24 कैरेट सोने के दाम में 351 रुपए का इजाफा हुआ है। इससे सोने की कीमत बढ़कर 1.51 लाख रुपए हो गई है। एक किलो चांदी 1,070 रुपए महंगी होकर 2.29 लाख रुपए पर पहुंच गई है।

    विशेषज्ञों के अनुसार, चीन और भारत सहित दुनियाभर के कई देशों के बैंक सोना खरीदने और फेस्टिवल सीजन की बजह से सोना इस साल के आखिर तक 1.80 लाख और चांदी भी 3 लाख रुपए किलो तक जा सकती है।इस साल अब तक सोना 19 हजार रुपए महंगा हो चुका है। वहीं चांदी की कीमत में नौ हजार रुपए का इजाफा हुआ है।

  • ईरान के आसमान​​​​​​​ में फिर: रहस्यमयी रोशनी, UFO का दावा; 1976 की घटना से जुड़ी पुरानी कहानी भी चर्चा में.

    ईरान के आसमान​​​​​​​ में फिर: रहस्यमयी रोशनी, UFO का दावा; 1976 की घटना से जुड़ी पुरानी कहानी भी चर्चा में.

    ईरान के आसमान​​​​​​​ में फिर: रहस्यमयी रोशनी, UFO का दावा; 1976 की घटना से जुड़ी पुरानी कहानी भी चर्चा में.

    ईरान की राजधानी तेहरान के आसमान में एक रहस्यमयी चमकदार वस्तु दिखाई देने का दावा सोशल मीडिया पर चर्चा में है। सामने आई तस्वीरों और क्लिप में आसमान में लाल, हरे और नीले रंग की रोशनी नजर आने की बात कही जा रही है। कुछ सोशल मीडिया यूजर्स इसे UFO यानी अज्ञात उड़न वस्तु बता रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे ड्रोन, सैन्य उपकरण या रोशनी वाले गुब्बारे से जोड़कर देख रहे हैं।

    हालांकि, अभी तक ईरानी अधिकारियों की ओर से इस वस्तु की पहचान को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। इसलिए इसे UFO बताने का दावा फिलहाल सिर्फ अटकलों तक सीमित है।

    20 सितंबर की रात दिखी रहस्यमयी रोशनी

    दावों के मुताबिक, 20 सितंबर 2026 की रात तेहरान के आजादेगान एक्सप्रेसवे के आसपास आसमान में यह रहस्यमयी वस्तु दिखाई दी। सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री में आसमान में एक चमकदार वस्तु और अलग-अलग रंगों की रोशनी दिखाई देने की बात कही जा रही है।

    वस्तु की वास्तविक ऊंचाई, आकार और रफ्तार कितनी थी, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसी वजह से यह स्पष्ट नहीं है कि आसमान में दिखाई देने वाली वस्तु वास्तव में क्या थी।

    कुछ लोगों ने इसे ड्रोन या सैन्य गतिविधि से जोड़ा है, जबकि अन्य लोगों ने एलईडी लाइट वाले गुब्बारे जैसी संभावनाएं भी जताई हैं।

    1976 में भी तेहरान के आसमान में दिखी थी ऐसी वस्तु

    मौजूदा घटना की चर्चा के साथ करीब 50 साल पुरानी एक घटना भी फिर सुर्खियों में आ गई है। 19 सितंबर 1976 को तेहरान के आसमान में एक अज्ञात चमकदार वस्तु दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई थी।

    उस समय ईरानी वायुसेना ने कथित वस्तु की जांच के लिए दो F-4 Phantom लड़ाकू विमान भेजे थे। उस घटना से जुड़े दस्तावेजों और पायलटों के बयानों के मुताबिक, पहले विमान के पायलट ने वस्तु के करीब पहुंचने के दौरान अपने कुछ उपकरणों में खराबी की सूचना दी थी। बताया गया कि विमान के वापस मुड़ने के बाद सिस्टम सामान्य हो गए।

    इसके बाद दूसरे विमान ने भी उस वस्तु का पीछा किया। रिपोर्टों के मुताबिक, पायलट ने रडार पर वस्तु को ट्रैक करने की कोशिश की। उस समय वस्तु से अलग-अलग रंगों की तेज रोशनी दिखाई देने की बात भी सामने आई थी।

    मिसाइल सिस्टम को लेकर भी किया गया था दावा

    1976 की घटना के संबंध में उपलब्ध रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि जब पायलट ने वस्तु पर हथियार इस्तेमाल करने की कोशिश की तो हथियार नियंत्रण प्रणाली में समस्या आई। हालांकि, उस समय वास्तव में क्या हुआ था और वस्तु की प्रकृति क्या थी, इसे लेकर आज भी अलग-अलग व्याख्याएं मौजूद हैं।

    इस घटना से जुड़े दस्तावेज अमेरिकी एजेंसियों के रिकॉर्ड में भी मौजूद रहे हैं और इसे लंबे समय से चर्चित UFO मामलों में गिना जाता है। लेकिन इन दस्तावेजों का होना अपने आप में इस बात का प्रमाण नहीं है कि वह वस्तु एलियन या किसी बाहरी ग्रह से आई थी।

    नई घटना को लेकर अभी कई सवाल बाकी

    2026 में सामने आए नए दावे में भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि तेहरान के आसमान में दिखाई देने वाली वस्तु आखिर क्या थी। अभी इसकी ऊंचाई, गति, आकार और स्रोत की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    विशेषज्ञों और सोशल मीडिया यूजर्स की ओर से ड्रोन, गुब्बारे और अन्य तकनीकी उपकरणों जैसी अलग-अलग संभावनाएं बताई जा रही हैं। दूसरी ओर, UFO का दावा भी सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में है।

    फिलहाल किसी आधिकारिक जांच या पुष्टि के बिना इस रहस्यमयी वस्तु को UFO या किसी अलौकिक घटना के रूप में निश्चित रूप से बताना सही नहीं होगा। आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही इसकी वास्तविक पहचान को लेकर तस्वीर साफ हो सकेगी।

  • मुजफ्फरनगर में सास:​​​​​​​ ने बहू के लिए लिया ऐसा फैसला, बन गई मिसाल

    मुजफ्फरनगर में सास:​​​​​​​ ने बहू के लिए लिया ऐसा फैसला, बन गई मिसाल

    मुजफ्फरनगर में सास:​​​​​​​ ने बहू के लिए लिया ऐसा फैसला, बन गई मिसाल

    मुजफ्फरनगर में एक परिवार ने विधवा बहू को लेकर ऐसा फैसला लिया, जिसकी चर्चा पूरे इलाके में हो रही है। खतौली कस्बे के दयालपुरम निवासी परिवार में बेटे रोहित की मौत के करीब एक महीने बाद उसकी पत्नी मीनाक्षी की दूसरी शादी करा दी गई। परिवार की ओर से बताया गया कि यह फैसला मीनाक्षी की सहमति से लिया गया। सास सुनीता ने बहू को परिवार की जिम्मेदारी मानने के बजाय उसे बेटी की तरह आगे की जिंदगी शुरू करने का मौका देने का फैसला किया। इस शादी में परिवार के सदस्यों ने उसका साथ दिया और पूरे रीति-रिवाज के साथ उसे नए जीवन के लिए विदा किया।

    एक दिन के अंतर से हुई पति और ससुर की मौत

    बताया गया कि रोहित और मीनाक्षी की शादी करीब 10 साल पहले हुई थी। दोनों की दो बेटियां भी हैं, जिनमें एक सात साल और दूसरी करीब डेढ़ साल की है। परिवार पर उस समय बड़ा संकट आया जब 14 अगस्त को रोहित के पिता ओमपाल का निधन हो गया। वह कैंसर से जूझ रहे थे और राजमिस्त्री का काम करते थे। परिवार के मुताबिक, पिता की मौत का सदमा रोहित भी नहीं सह सका और अगले ही दिन 15 अगस्त को उसकी भी मौत हो गई। पति और ससुर को खोने के बाद मीनाक्षी अपनी दोनों छोटी बेटियों के साथ रह गई। इसके बाद सास सुनीता ने बहू और उसकी बेटियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसकी दूसरी शादी कराने का फैसला किया।

    मीनाक्षी की रजामंदी से योगेश से तय हुआ रिश्ता

    परिवार ने मीनाक्षी की सहमति से राजस्थान के नारायणपुर में चाट की दुकान चलाने वाले योगेश के साथ उसका रिश्ता तय किया। इसके बाद बुधवार को आर्य समाज मंदिर में दोनों की शादी कराई गई। इस विवाह की सबसे खास बात यह रही कि मीनाक्षी के देवर मोहित ने अपनी भाभी का देवर बनकर नहीं, बल्कि भाई की भूमिका निभाते हुए कन्यादान किया। सास सुनीता ने भी मीनाक्षी को बेटी की तरह विदा किया। शादी के बाद परिवार ने कहा कि मीनाक्षी उनके लिए हमेशा परिवार का हिस्सा रहेगी और त्योहारों तथा अन्य पारिवारिक अवसरों पर उसे बेटी की तरह बुलाया जाता रहेगा। जरूरत पड़ने पर परिवार उसके साथ खड़ा रहेगा।

    शादी के बाद मीनाक्षी ने कहा कि उन्होंने यह विवाह अपनी इच्छा से किया है और उन पर किसी तरह का दबाव नहीं था। उन्होंने अपने ससुराल वालों के फैसले पर खुशी जताते हुए कहा कि उनकी सास ने उन्हें बेटी की तरह समझा और नए जीवन की शुरुआत में साथ दिया। वहीं देवर मोहित ने बताया कि भाभी की आगे पूरी जिंदगी बाकी है और उनकी दो बेटियों का भविष्य भी जुड़ा है।

    इसलिए परिवार ने उनकी सहमति से यह फैसला लिया। मोहित ने कहा कि आगे भी मीनाक्षी के साथ पारिवारिक रिश्ता बना रहेगा और किसी परेशानी में परिवार उसकी मदद करेगा। इस परिवार का कहना है कि उनका उद्देश्य समाज में यह संदेश देना है कि मुश्किल परिस्थितियों में किसी महिला को नई जिंदगी शुरू करने का अवसर और परिवार का सहयोग मिलना चाहिए।

  • चारपाई पर आराम​​​​​​​ कर रहा: था तेंदुआ, दुकानदार की पड़ी नजर तो मच गई अफरा-तफरी

    चारपाई पर आराम​​​​​​​ कर रहा: था तेंदुआ, दुकानदार की पड़ी नजर तो मच गई अफरा-तफरी

    चारपाई पर आराम​​​​​​​ कर रहा: था तेंदुआ, दुकानदार की पड़ी नजर तो मच गई अफरा-तफरी

    उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में तेंदुओं की बढ़ती गतिविधियों ने ग्रामीणों और दुकानदारों की चिंता बढ़ा दी है। मोतीपुर रेंज के दरोगापुरवा इलाके में बुधवार शाम एक तेंदुआ अचानक सड़क किनारे बनी झोपड़ी में घुस गया। हैरानी की बात यह रही कि तेंदुआ झोपड़ी के अंदर रखी चारपाई पर काफी देर तक बैठा रहा।

    पास में चक्की चलाने वाले दुकानदार यूसुफ की नजर जब झोपड़ी के अंदर गई तो वहां तेंदुए को देखकर उसके होश उड़ गए। कुछ पल के लिए वह घबरा गया, लेकिन फिर खुद को संभालते हुए वहां से सुरक्षित हट गया। इसके बाद उसने तेंदुए की तस्वीर अपने मोबाइल में कैद की और आसपास के लोगों को इसकी जानकारी दी।

    शोर मचते ही झोपड़ी से बाहर निकला तेंदुआ

    झोपड़ी में तेंदुआ होने की जानकारी मिलते ही आसपास के लोगों में दहशत फैल गई। कुछ देर बाद लोगों ने शोर मचाना शुरू किया तो तेंदुआ झोपड़ी से बाहर निकला और वहां से भाग गया।

    जिस स्थान पर यह झोपड़ी बनी है, वहां से ग्रामीणों और दुकानदारों की आवाजाही होती रहती है। ऐसे में दिन के समय आबादी के नजदीक तेंदुए के पहुंचने से लोगों की चिंता और बढ़ गई है।

    स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि अब उन्हें हर समय इस बात का डर रहता है कि कहीं तेंदुआ अचानक किसी व्यक्ति के सामने न आ जाए। लोगों ने वन विभाग से इलाके में गश्त बढ़ाने और तेंदुए की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने की मांग की है।

    सब्जी तोड़ने गई महिला पर तेंदुए का हमला, मौत

    बहराइच में तेंदुए की मौजूदगी को लेकर चिंता की एक और बड़ी वजह सामने आई है। कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य से जुड़े सुजौली थाना क्षेत्र के गड़ेरियनपुरवा गांव में करीब 35 वर्षीय ममता देवी पर तेंदुए के हमले की घटना सामने आई।

    बताया गया कि महिला घर के पास खेत में सब्जी तोड़ने गई थीं। इसी दौरान गन्ने के खेत के आसपास छिपे तेंदुए ने अचानक उन पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले के कारण महिला को संभलने का मौका नहीं मिला।

    घटना की जानकारी मिलते ही परिवार के लोग और ग्रामीण मौके पर पहुंचे, लेकिन तब तक महिला की मौत हो चुकी थी। ममता देवी के तीन बच्चे हैं। इस घटना के बाद परिवार में मातम पसरा हुआ है।

    तेंदुए की दहशत से समय से पहले दुकानें बंद कर रहे लोग

    महिला की मौत और आबादी के नजदीक तेंदुए के लगातार दिखाई देने की घटनाओं से इलाके में दहशत का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि तेंदुए के डर से कई दुकानदार अब शाम होने से पहले ही अपनी दुकानें बंद करके घर लौटने लगे हैं।

    ग्रामीणों ने वन विभाग से क्षेत्र में नियमित गश्त बढ़ाने, तेंदुए की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर पिंजरा लगाने की मांग की है।

    फिलहाल लोगों को सावधानी बरतने और सुनसान या खेतों वाले इलाकों में अकेले जाने से बचने की सलाह दी जा रही है। वन विभाग की कार्रवाई के बाद ही स्पष्ट होगा कि तेंदुए को पकड़ने के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

  • प्रसाद के साथ​​​​​​​ बैल ने” निगल लिया 3 तोले का मंगलसूत्र, फिर…

    प्रसाद के साथ​​​​​​​ बैल ने” निगल लिया 3 तोले का मंगलसूत्र, फिर…

    प्रसाद के साथ​​​​​​​ बैल ने” निगल लिया 3 तोले का मंगलसूत्र, फिर…

    महाराष्ट्र के मालेगांव इलाके से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया। बैलपोला त्योहार के मौके पर किसान शिवाजी बोरसे अपने बैलों की पूजा कर उन्हें प्रसाद खिला रहे थे। इसी दौरान एक बैल ने प्रसाद के साथ थाली में रखा करीब तीन तोले का सोने का मंगलसूत्र भी निगल लिया। शुरुआत में किसान को पता ही नहीं चला कि आखिर चेन किस बैल के पेट में गई है। शिवाजी बोरसे के पास दो बैल थे और दोनों को ही प्रसाद खिलाया गया था। जब मंगलसूत्र गायब मिला तो किसान के सामने सबसे बड़ी परेशानी यह थी कि किस बैल ने उसे निगला है।

    दोनों बैलों को लेकर पहुंचे अस्पताल

    मामले की जानकारी मिलने के बाद किसान दोनों बैलों को चालीसगांव के पशु चिकित्सालय लेकर पहुंचे। डॉक्टरों के सामने भी पहले यह स्पष्ट नहीं था कि सोने की चेन किस जानवर के पेट में है। ऐसे में बिना पुष्टि के किसी एक बैल की सर्जरी करना उचित नहीं था। पशु चिकित्सकों ने आधुनिक एक्स-रे जांच की मदद ली। जांच के जरिए दोनों बैलों के पाचन तंत्र की स्थिति देखी गई और यह पता लगाने की कोशिश की गई कि धातु की वस्तु कहां मौजूद है। जांच के बाद डॉक्टरों को उस बैल की पहचान हो गई, जिसके पेट में मंगलसूत्र फंसा हुआ था। इसके बाद ऑपरेशन की तैयारी की गई।

    सर्जरी कर पेट से निकाला गया सोने का मंगलसूत्र

    एक्स-रे से सही जगह की जानकारी मिलने के बाद पशु चिकित्सकों ने सावधानीपूर्वक सर्जरी की। डॉक्टरों ने बैल के पेट से करीब तीन तोले का पूरा सोने का मंगलसूत्र निकाल लिया। किसान के लिए यह बड़ी राहत की बात थी, क्योंकि कीमती चेन सुरक्षित वापस मिल गई। ऑपरेशन के बाद बैल की हालत स्थिर बताई गई। इस घटना ने यह भी दिखाया कि त्योहारों के दौरान पशुओं को खाना खिलाते समय आसपास रखी छोटी और कीमती चीजों को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरतना जरूरी है। अगर समय रहते चेन का पता नहीं चलता तो बैल की सेहत पर भी गंभीर असर पड़ सकता था।

    सर्जरी के दौरान डॉक्टरों को बैल के पेट से कुछ ऐसी चीजें भी मिलीं, जिन्हें देखकर वे भी चौंक गए। जानकारी के मुताबिक, मंगलसूत्र के अलावा पेट के अंदर प्लास्टिक की करीब दो गेंदें, नायलॉन का तार और दो एक रुपये के सिक्के भी मौजूद थे। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बैल ने पहले भी जमीन या आसपास पड़ी कई ऐसी चीजें निगली होंगी, जो उसके लिए भोजन नहीं थीं।

    फिलहाल सर्जरी के बाद बैल की हालत ठीक और स्थिर बताई गई है। इस घटना के बाद पशु चिकित्सकों ने भी लोगों से अपील की है कि पशुओं को खाना या प्रसाद देते समय प्लास्टिक, धातु, धागे और दूसरी गैर-खाद्य चीजें उनके आसपास न रहने दें। छोटी सी लापरवाही पशु के लिए गंभीर परेशानी पैदा कर सकती है।

  • 60 साल के​​​​​​​ दूल्हे ने 23 साल की युवती से रचाई शादी, 37 साल का उम्र का फासला बना चर्चा का विषय.

    60 साल के​​​​​​​ दूल्हे ने 23 साल की युवती से रचाई शादी, 37 साल का उम्र का फासला बना चर्चा का विषय.

    60 साल के​​​​​​​ दूल्हे ने 23 साल की युवती से रचाई शादी, 37 साल का उम्र का फासला बना चर्चा का विषय.

    लखीसराय: बिहार के लखीसराय जिले में एक शादी इन दिनों चर्चा में है। अभयपुर थाना क्षेत्र के पीरीबाजार के रामपुर गांव निवासी 60 वर्षीय पिंकू सिंह ने 23 वर्षीय वर्षा रानी के साथ शादी की है। दोनों के बीच उम्र का करीब 37 साल का अंतर है।

    शादी की तस्वीरें और समारोह से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद यह मामला सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। शादी पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ हुई, जिसमें दोनों ने एक-दूसरे के साथ जीवन बिताने का फैसला किया।

    दोनों की पहले भी हो चुकी है शादी

    बताया जा रहा है कि पिंकू सिंह पेशे से किसान और मजदूर हैं। उनकी पहली पत्नी करीब 10 साल पहले उनसे अलग हो गई थीं। इसके बाद वह अकेले रह रहे थे।

    वहीं, वर्षा रानी की भी यह दूसरी शादी बताई जा रही है। उनकी पहली शादी मुंगेर जिले के कल्याणपुर में हुई थी। उस रिश्ते से उनकी एक बेटी भी है।

    हादसे के बाद टूट गया था पहला रिश्ता

    रिपोर्ट के मुताबिक, वर्षा रानी के पहले ससुराल में आग लगने की घटना हुई थी, जिसमें वह गंभीर रूप से झुलस गई थीं। इसके बाद उनके पहले पति ने उन्हें अपने साथ रखने से इनकार कर दिया था। बाद में दोनों अलग हो गए।

    वर्षा फिलहाल ग्रेजुएशन पार्ट-1 की पढ़ाई कर रही हैं। उन्होंने मीडिया से बातचीत में कथित तौर पर कहा कि उन्होंने पिंकू सिंह से शादी अपनी इच्छा से की है और किसी तरह के दबाव में यह फैसला नहीं लिया।

    शादी के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा

    60 वर्षीय पिंकू सिंह और 23 वर्षीय वर्षा रानी की शादी की खबर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग इस रिश्ते को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा दोनों के बीच 37 साल के उम्र के अंतर को लेकर हो रही है।

    वहीं, वर्षा रानी की उम्र 23 साल होने की पुष्टि सीएसडब्ल्यू सुप्रिया कुमारी की ओर से किए जाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।

    दोनों ने शादी के बाद साथ रहने और अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू करने का फैसला किया है। अब यह शादी लखीसराय में चर्चा का विषय बनी हुई है।

  • इंडियन आर्मी के​​​​​​​ कॉम्बैट डॉग: का पहली बार हैरतअंगेज स्टंट, प्लेन से हैंडलर और पैराट्रूपर के साथ किया जंप

    इंडियन आर्मी के​​​​​​​ कॉम्बैट डॉग: का पहली बार हैरतअंगेज स्टंट, प्लेन से हैंडलर और पैराट्रूपर के साथ किया जंप

    इंडियन आर्मी के​​​​​​​ कॉम्बैट डॉग: का पहली बार हैरतअंगेज स्टंट, प्लेन से हैंडलर और पैराट्रूपर के साथ किया जंप

     एक अहम एयरबोर्न ट्रेनिंग एक्सरसाइज में इंडियन आर्मी के एक कॉम्बैट डॉग ने अपने हैंडलर और एक पैराट्रूपर के साथ मिलकर टैंडम पैराशूट जंप में हिस्सा लिया. ये एक्सरसाइज सेंट्रल इंडिया में बेहात ड्रॉप जोन में की गई और इससे सेना की मिलिट्री डॉग्स के ऑपरेशनल यूज को बढ़ाने की कोशिशों का पता चलता है.

    एयरबोर्न एक्सरसाइज में डॉग शामिल

    भारतीय सेना की सूर्या कमांड ने ‘एक्स’ पर इस एक्सरसाइज की जानकारी शेयर की. उन्होंने इसे डॉग हैंडलर और मिलिट्री डॉग के साथ किए गए शुरुआती टैंडम पैराशूट जंप में से एक बताया. नीचे उतरते समय पैराट्रूपर, डॉग हैंडलर और कॉम्बैट डॉग ने पूरा कॉम्बैट लोड ले रखा था. सेना ने कहा कि इस एक्सरसाइज से सैनिकों और उनके डॉग के बीच जरूरी तालमेल, भरोसे और टीमवर्क का पता चला.

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    ये जंप कॉम्बैट डॉग के साथ पहले की गई फ्री-फॉल ट्रेनिंग पर बेस्ड है. ऐसी एक्सरसाइज से ट्रेंड डॉग्स को उन मिशन के लिए तैयार करने में मदद मिल सकती है, जहां सैनिकों को एयरबोर्न ऑपरेशन के जरिए मुश्किल या दुश्मन वाले इलाकों में जाना पड़ता है.

    मिलिट्री डॉग्स का रोल

    मिलिट्री डॉग्स लंबे समय से भारतीय सुरक्षा बलों की मदद कर रहे हैं, जैसे कि आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशन, तलाशी और ट्रैकिंग में. उनकी सूंघने की जबरदस्त क्षमता उन्हें विस्फोटक, हथियार और लोगों का पता लगाने में मदद करती है, साथ ही वे सैनिकों को इमारतों और संदिग्ध ठिकानों की तलाशी लेने में भी मदद करते हैं.

    सेना के कॉम्बैट डॉग्स ने जम्मू-कश्मीर में भी ऑपरेशन में हिस्सा लिया है. फरवरी में, 2 पैरा स्पेशल फोर्सेज के असॉल्ट डॉग टायसन को किश्तवाड़ में आतंकवाद-विरोधी ऑपरेशन के दौरान चोट लग गई थी, लेकिन वो संदिग्ध ठिकाने की तरफ आगे बढ़ता रहा. बाद में उसे ‘मेंशन-इन-डिस्पैचेस’ से सम्मानित किया गया. जूम, फैंटम और एक्सल जैसे अन्य मिलिट्री डॉग्स भी आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन में शामिल रहे हैं.

    एयरबोर्न क्षमताओं का विस्तार

    नई एक्सरसाइज में 2 खास क्षमताओं, पैराट्रूपर्स और मिलिट्री डॉग्स को मिलाया गया है. एयरबोर्न सैनिकों के साथ जाने वाला ट्रेंड डॉग मुश्किल इलाकों में उतरने के बाद चीजों का पता लगाने और ट्रैकिंग में मदद कर सकता है. दूसरे देशों की सेनाओं ने भी एयरबोर्न और स्पेशल ऑपरेशन के लिए डॉग्स को ट्रेन किया है. ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पैराशूट से तैनाती के लिए भी डॉग्स को ट्रेन किया गया था. इसलिए इंडियन आर्मी की ये लेटेस्ट एक्सरसाइज ये पता लगाने की दिशा में एक और कदम है कि कैसे कॉम्बैट डॉग्स कंवेंशनल ग्राउंड मिशन से हटकर सैनिकों की मदद कर सकते हैं.