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  • श्मशान घाट के पास से गुजरते समय किन बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है जानिए धार्मिक मान्यताएं..

    श्मशान घाट के पास से गुजरते समय किन बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है जानिए धार्मिक मान्यताएं..

    श्मशान घाट के पास से गुजरते समय किन बातों का ध्यान रखने की सलाह दी जाती है जानिए धार्मिक मान्यताएं..

    हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसका अंतिम संस्कार सामान्यतः श्मशान घाट में किया जाता है। श्मशान को जीवन और मृत्यु के बीच के अंतिम संस्कार का स्थान माना जाता है और इससे जुड़ी अनेक धार्मिक तथा लोक मान्यताएं प्रचलित हैं।

    कई परंपराओं में माना जाता है कि श्मशान घाट के पास बिना आवश्यकता के नहीं जाना चाहिए और यदि किसी कारण वहां जाना पड़े तो कुछ बातों का ध्यान रखना उचित माना जाता है।

    रात के समय जाने से बचने की सलाह

    कुछ धार्मिक और लोक मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले बिना जरूरी कारण श्मशान घाट जाने से बचना चाहिए। यह एक पारंपरिक मान्यता है जिसे कई लोग आज भी मानते हैं।

    अंतिम संस्कार में सम्मान बनाए रखें

    यदि किसी अंतिम संस्कार के समय वहां से गुजरना पड़े तो शांत रहें और दिवंगत व्यक्ति तथा उसके परिवार के प्रति सम्मान का भाव रखें। अनावश्यक शोर या हंसी मजाक से बचना उचित माना जाता है।

    धार्मिक मान्यताएं

    कुछ परंपराओं में श्मशान को भगवान शिव और माता काली से जुड़ा पवित्र स्थान माना गया है। यह एक धार्मिक विश्वास है और अलग अलग क्षेत्रों में इससे जुड़ी मान्यताएं भिन्न हो सकती हैं।

    महिलाओं के श्मशान जाने की परंपरा

    कुछ समुदायों में महिलाओं के श्मशान घाट जाने पर पारंपरिक प्रतिबंध रहे हैं। इसके पीछे अलग अलग सामाजिक और सांस्कृतिक कारण बताए जाते हैं। हालांकि आज के समय में भारत के अनेक परिवारों और समुदायों में महिलाएं भी अंतिम संस्कार में शामिल होती हैं। यह पूरी तरह परिवार की परंपरा और व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करता है।

    श्मशान से लौटने के बाद

    कई परिवारों में घर लौटकर स्नान करना और साफ कपड़े पहनना धार्मिक तथा स्वच्छता दोनों दृष्टि से उचित माना जाता है। यह परंपरा आज भी व्यापक रूप से निभाई जाती है।

    महत्वपूर्ण सूचना

    इस लेख में दी गई बातें धार्मिक और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके समर्थन में वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। विभिन्न क्षेत्रों, परिवारों और परंपराओं में इन मान्यताओं और रीति रिवाजों में अंतर हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आस्था, परिवार की परंपरा और स्थानीय रीति रिवाजों का सम्मान करते हुए निर्णय लेना चाहिए।

  • क्या Humidifier सच में AC का विकल्प है जानिए यह कैसे काम करता है इसकी कीमत और इस्तेमाल की जरूरी बातें..

    क्या Humidifier सच में AC का विकल्प है जानिए यह कैसे काम करता है इसकी कीमत और इस्तेमाल की जरूरी बातें..

    क्या Humidifier सच में AC का विकल्प है जानिए यह कैसे काम करता है इसकी कीमत और इस्तेमाल की जरूरी बातें..

    भीषण गर्मी बढ़ता तापमान और उमस के कारण लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है

    कई बार एयर कंडीशनर चलाने के बाद भी पूरी राहत नहीं मिलती और इसी बीच Humidifier नाम का एक गैजेट तेजी से चर्चा में है

    हालांकि बहुत से लोग इसे AC का विकल्प मान रहे हैं लेकिन वास्तव में इसका काम अलग होता है

    Humidifier क्या होता है

    Humidifier एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जो कमरे की हवा में नमी बढ़ाने का काम करता है

    जब वातावरण बहुत ज्यादा सूखा हो जाता है तब यह हवा में नमी मिलाकर उसे अधिक आरामदायक बनाने में मदद करता है

    इसका उपयोग सूखी त्वचा गले में सूखापन फटे होंठ नाक की जलन और कुछ लोगों में साइनस से जुड़ी असहजता को कम करने के लिए किया जाता है

    Humidifier कितने प्रकार के होते हैं

    बाजार में कई तरह के Humidifier उपलब्ध हैं

    सेंट्रल Humidifier पूरे घर के एयर कंडीशनिंग सिस्टम से जुड़े होते हैं

    इवैपोरेटिव Humidifier

    स्टीम वेपोराइजर

    अल्ट्रासोनिक Humidifier

    अल्ट्रासोनिक Humidifier सबसे लोकप्रिय मॉडलों में से एक माना जाता है क्योंकि यह कम आवाज करता है और सामान्य घरेलू उपयोग के लिए सुविधाजनक होता है

    Humidifier का उपयोग कब किया जाता है

    इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सूखे वातावरण में किया जाता है

    यदि एयर कंडीशनर की वजह से कमरे की हवा बहुत सूखी हो जाती है तो Humidifier नमी बढ़ाने में मदद कर सकता है

    कुछ लोगों को इससे सूखी खांसी गले में खराश नाक के सूखेपन और त्वचा की ड्राइनेस जैसी समस्याओं में राहत महसूस हो सकती है

    यह ध्यान रखना जरूरी है कि Humidifier कमरे का तापमान कम नहीं करता इसलिए इसे एयर कंडीशनर या कूलर का विकल्प नहीं माना जा सकता

    Humidifier की कीमत कितनी होती है

    छोटे पोर्टेबल Humidifier की कीमत आमतौर पर लगभग 800 रुपये से 2500 रुपये के बीच होती है

    बड़े और अधिक फीचर वाले मॉडल लगभग 5000 रुपये से 15000 रुपये या उससे अधिक कीमत में उपलब्ध हो सकते हैं

    कीमत ब्रांड क्षमता और फीचर्स के अनुसार अलग अलग हो सकती है

    इस्तेमाल करते समय किन बातों का ध्यान रखें

    Humidifier का जरूरत से ज्यादा उपयोग न करें क्योंकि कमरे में अत्यधिक नमी होने पर बैक्टीरिया और फंगस बढ़ने का खतरा हो सकता है

    मशीन की नियमित सफाई करना जरूरी है ताकि उसमें फफूंदी या बैक्टीरिया न पनपें

    यदि संभव हो तो साफ या निर्माता द्वारा सुझाए गए प्रकार का पानी इस्तेमाल करें

    स्टीम वाले मॉडल बच्चों की पहुंच से दूर रखें क्योंकि उनसे जलने का खतरा हो सकता है

    निष्कर्ष

    Humidifier हवा में नमी बढ़ाने वाला उपकरण है जो सूखे वातावरण में आराम देने में मदद कर सकता है लेकिन यह कमरे को ठंडा नहीं करता और एयर कंडीशनर का विकल्प नहीं है

    यदि आपके कमरे की हवा बहुत सूखी रहती है तो सही तरीके से और नियमित सफाई के साथ इसका उपयोग लाभदायक हो सकता है

  • दुनिया का सबसे लंबे नाम वाला रेलवे स्टेशन, 58 अक्षरों का नाम पढ़ना आसान नहीं; लोग शॉर्ट फॉर्म से बुलाते हैं..

    दुनिया का सबसे लंबे नाम वाला रेलवे स्टेशन, 58 अक्षरों का नाम पढ़ना आसान नहीं; लोग शॉर्ट फॉर्म से बुलाते हैं..

    दुनिया का सबसे लंबे नाम वाला रेलवे स्टेशन, 58 अक्षरों का नाम पढ़ना आसान नहीं; लोग शॉर्ट फॉर्म से बुलाते हैं..

    नई दिल्ली: दुनिया में कई रेलवे स्टेशन अपने इतिहास और वास्तुकला के लिए मशहूर हैं, लेकिन एक स्टेशन ऐसा भी है जो अपने बेहद लंबे नाम की वजह से पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस स्टेशन का आधिकारिक नाम इतना लंबा है कि अधिकांश लोग इसे एक बार में पढ़ भी नहीं पाते।

    58 अक्षरों का है स्टेशन का नाम

    दुनिया के सबसे लंबे नाम वाले रेलवे स्टेशन का नाम है Llanfair­pwllgwyngyllgogerychwyrndrobwllllantysiliogogogoch। यह नाम 58 अक्षरों से मिलकर बना है और इसी वजह से इसे दुनिया के सबसे लंबे आधिकारिक रेलवे स्टेशन नामों में गिना जाता है।

    कहां स्थित है यह स्टेशन?

    यह अनोखा रेलवे स्टेशन यूनाइटेड किंगडम (UK) के वेल्स (Wales) क्षेत्र के एंगलसी (Anglesey) द्वीप पर स्थित है। यह स्टेशन पर्यटकों के बीच भी काफी लोकप्रिय है, जहां लोग इसके लंबे नाम वाले साइनबोर्ड के साथ तस्वीरें खिंचवाने पहुंचते हैं।

    लोग कैसे पुकारते हैं इसका नाम?

    इतना लंबा नाम रोजमर्रा की बातचीत में बोलना आसान नहीं है। इसलिए स्थानीय लोग और यात्री इसे संक्षेप में Llanfairpwll या Llanfair PG कहकर पुकारते हैं। यही नाम आम बोलचाल और यात्रा संबंधी जानकारी में भी अधिक इस्तेमाल किया जाता है।

    इतना लंबा नाम क्यों रखा गया?

    बताया जाता है कि 19वीं सदी में इस स्थान का लंबा नाम प्रचार और पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लोकप्रिय बनाया गया था। वेल्श भाषा में इस नाम का अर्थ उस स्थान के भौगोलिक और धार्मिक इतिहास से जुड़ा है।

    भारत में कौन सा स्टेशन है सबसे लंबे नाम वाला?

    भारत में सबसे लंबे नाम वाले रेलवे स्टेशन का रिकॉर्ड पुरट्चि तलैवर डॉ. एम.जी. रामचंद्रन सेंट्रल रेलवे स्टेशन (चेन्नई सेंट्रल) के नाम है। इसके आधिकारिक नाम में 57 अक्षर हैं, जिसके कारण इसे दुनिया के सबसे लंबे रेलवे स्टेशन नामों में शामिल किया जाता है।

    दुनिया के इस अनोखे रेलवे स्टेशन का लंबा नाम आज भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और हर साल हजारों पर्यटक केवल इसे देखने और इसके साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए वेल्स पहुंचते हैं।

  • 15 नहीं, 30 किलो तक होता है इस अनोखे नारियल का वजन! दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक बीज देखने आते हैं पर्यटक

    15 नहीं, 30 किलो तक होता है इस अनोखे नारियल का वजन! दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक बीज देखने आते हैं पर्यटक

    15 नहीं, 30 किलो तक होता है इस अनोखे नारियल का वजन! दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक बीज देखने आते हैं पर्यटक

    नई दिल्ली: आमतौर पर बाजार में मिलने वाले नारियल का वजन 1 से 2 किलो के बीच होता है, लेकिन दुनिया में एक ऐसा भी नारियल है जिसका वजन 15 से 30 किलो तक पहुंच सकता है। अपने विशाल आकार और वजन के कारण यह पूरी दुनिया में बेहद खास माना जाता है। यही वजह है कि इसे दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक बीज भी कहा जाता है।

    इस अनोखे नारियल का नाम कोको डे मेर (Coco de Mer) है। यह सामान्य नारियल से न केवल आकार में कई गुना बड़ा होता है, बल्कि इसका बीज भी दुनिया के किसी भी अन्य पौधे के बीज से बड़ा माना जाता है।

    कहां पाया जाता है यह दुर्लभ नारियल?

    कोको डे मेर प्राकृतिक रूप से केवल सेशेल्स (Seychelles) के कुछ चुनिंदा द्वीपों पर पाया जाता है। यह दुर्लभ पाम प्रजाति दुनिया के सबसे अनोखे पेड़ों में गिनी जाती है और इसकी सुरक्षा के लिए वहां की सरकार ने विशेष नियम लागू किए हैं।

    फल पकने में लग जाते हैं 6 से 7 साल

    इस पेड़ की सबसे खास बात यह है कि इसे विकसित होने में कई वर्ष लगते हैं। वहीं, एक फल को पूरी तरह पकने में भी करीब 6 से 7 साल का समय लग सकता है। इसी कारण इसे दुनिया के सबसे धीमी गति से विकसित होने वाले बीजों में भी शामिल किया जाता है।

    दुनिया का सबसे बड़ा प्राकृतिक बीज

    वनस्पति वैज्ञानिकों के अनुसार, कोको डे मेर का बीज पृथ्वी पर पाया जाने वाला सबसे बड़ा प्राकृतिक बीज है। इसका वजन कई बार एक छोटे बच्चे के वजन के बराबर यानी 30 किलोग्राम तक पहुंच जाता है।

    सरकार ने बनाए हैं सख्त नियम

    कोको डे मेर की दुर्लभता को देखते हुए सेशेल्स सरकार ने इसके संरक्षण के लिए कड़े नियम बनाए हैं। बिना अनुमति इसके फल या बीज को देश से बाहर ले जाना प्रतिबंधित है। इसके अवैध व्यापार पर भी सख्त निगरानी रखी जाती है।

    अपनी अनोखी बनावट और विशाल आकार के कारण यह नारियल दुनिया भर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। हर साल हजारों लोग सेशेल्स पहुंचकर इस दुर्लभ पेड़ और इसके विशाल फलों को देखने आते हैं।

  • राख के ढेर में मिला 2,000 साल पुराना अनोखा खजाना, घास से बनी चप्पलों ने वैज्ञानिकों को चौंकाया..

    राख के ढेर में मिला 2,000 साल पुराना अनोखा खजाना, घास से बनी चप्पलों ने वैज्ञानिकों को चौंकाया..

    राख के ढेर में मिला 2,000 साल पुराना अनोखा खजाना, घास से बनी चप्पलों ने वैज्ञानिकों को चौंकाया..

    स्पेन में पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान एक ऐसी खोज मिली है, जिसने प्राचीन इतिहास की कई परतें खोल दी हैं। शोधकर्ताओं को 2,000 वर्ष से अधिक पुरानी घास से बनी चप्पलें एक प्राचीन खदान के पास राख और कचरे के ढेर में मिली हैं। आश्चर्य की बात यह है कि सदियों तक राख में दबे रहने के बावजूद ये चप्पलें काफी हद तक सुरक्षित मिलीं।

    यह खोज स्पेन के उरियम (Urium) क्षेत्र में हुई, जो सेविल से करीब 55 मील दूर स्थित एक प्राचीन खनन स्थल है। पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान आठ चप्पलों के अवशेष मिले, जिन्हें एस्पार्टो (Esparto) घास से तैयार किया गया था। माना जाता है कि इनका इस्तेमाल रोमन साम्राज्य के आने से पहले आयरन एज के मजदूर किया करते थे।

    इस खोज पर आधारित अध्ययन वैज्ञानिक पत्रिका Pyrenae में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार, चप्पलें पहली शताब्दी ईसा पूर्व (BCE) की एक धातु कार्यशाला के पास स्थित राख के ढेर में मिलीं। उसी क्षेत्र में कई भट्टियां, कार्यस्थल और अन्य संरचनाएं भी मिली हैं, जिससे संकेत मिलता है कि यह स्थान उस समय औद्योगिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।

    शोध में सामने आया कि ये चप्पलें कार्यशाला के अंदर नहीं, बल्कि पास के उस स्थान पर मिलीं जहां भट्टियों की राख और अन्य बेकार सामग्री फेंकी जाती थी। चप्पलों पर अधिक इस्तेमाल के स्पष्ट निशान मिले हैं, जिससे माना जा रहा है कि टूट-फूट जाने के बाद इन्हें कचरे के साथ फेंक दिया गया था।

    रेडियोकार्बन डेटिंग से चप्पलों की अलग-अलग आयु का भी पता चला। एक चप्पल का समय 28 से 124 ईस्वी (CE) के बीच का पाया गया, जबकि दूसरी 360 से 205 ईसा पूर्व (BCE) और तीसरी 175 से 56 ईसा पूर्व (BCE) की बताई गई। इससे संकेत मिलता है कि इस खनन क्षेत्र में कई सदियों तक लगातार काम होता रहा।

    पुरातत्वविदों का मानना है कि यह खोज आयरन एज के लोगों के दैनिक जीवन, उनके पहनावे, कार्य संस्कृति और उस समय इस्तेमाल होने वाली पारंपरिक सामग्रियों को समझने में महत्वपूर्ण साबित होगी। राख की परतों ने इन जैविक वस्तुओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा, जिससे शोधकर्ताओं को प्राचीन मानव जीवन का एक दुर्लभ प्रमाण मिला है।

  • फटा हुआ दूध फेंकें नहीं, इससे बन सकती हैं 20 स्वादिष्ट मिठाइयाँ, जानिए एक आसान रेसिपी..

    फटा हुआ दूध फेंकें नहीं, इससे बन सकती हैं 20 स्वादिष्ट मिठाइयाँ, जानिए एक आसान रेसिपी..

    फटा हुआ दूध फेंकें नहीं, इससे बन सकती हैं 20 स्वादिष्ट मिठाइयाँ, जानिए एक आसान रेसिपी..

    घर में दूध फट जाए तो उसे बेकार समझकर फेंकने की जरूरत नहीं है। यदि दूध केवल गर्मी, नींबू या सिरके की वजह से फटा है और उसमें किसी तरह की खराब गंध नहीं है, तो उससे कई तरह की स्वादिष्ट मिठाइयाँ बनाई जा सकती हैं।

    फटे हुए दूध को छानने के बाद जो नरम हिस्सा बचता है, उसे छेना कहा जाता है। यही छेना कई लोकप्रिय भारतीय मिठाइयों का मुख्य आधार होता है।

    फटे हुए दूध से बनने वाली 20 लोकप्रिय मिठाइयाँ

    रसगुल्ला

    रसमलाई

    संदेश

    छेना मुरकी

    छेना की खीर

    छेना टोस्ट

    छेना बर्फी

    कलाकंद

    छेना लड्डू

    छेना मालपुआ

    छेना जलेबी

    राजभोग

    कमलाभोग

    छेना पोड़ा

    छेना गाजा

    छेना रोल

    छेना पेड़ा

    छेना हलवा

    मैंगो छेना मिठाई

    चॉकलेट छेना बाइट्स

    घर पर बनाएं स्वादिष्ट कलाकंद

    आवश्यक सामग्री

    फटे हुए दूध से तैयार छेना

    500 मिली फुल क्रीम दूध

    आधा कप चीनी

    आधा छोटा चम्मच इलायची पाउडर

    2 से 3 बड़े चम्मच दूध पाउडर (इच्छानुसार)

    कटे हुए बादाम और पिस्ता

    कुछ केसर के रेशे (इच्छानुसार)

    थोड़ा सा घी

    बनाने की विधि

    सबसे पहले फटे हुए दूध को सूती कपड़े में छान लें।

    छेने को एक बार साफ पानी से धो लें ताकि नींबू या सिरके का स्वाद निकल जाए।

    हल्का निचोड़ें लेकिन पूरी तरह सूखा न करें। छेने में थोड़ी नमी रहने दें।

    अब एक भारी तले की कड़ाही में फुल क्रीम दूध डालकर मध्यम आंच पर पकाएं।

    दूध लगभग आधा रह जाए तो उसमें तैयार छेना मिला दें।

    धीरे-धीरे चलाते रहें ताकि मिश्रण अच्छी तरह मिल जाए, लेकिन छेना पूरी तरह पेस्ट न बने। हल्का दानेदार टेक्सचर ही कलाकंद की खास पहचान है।

    अब इसमें चीनी डालें और लगातार चलाते रहें।

    जब मिश्रण दोबारा गाढ़ा होने लगे, तब इलायची पाउडर और चाहें तो दूध पाउडर मिला दें।

    एक प्लेट या ट्रे में हल्का घी लगाकर तैयार मिश्रण फैला दें।

    ऊपर से बादाम, पिस्ता और केसर डालकर हल्के हाथ से दबा दें।

    इसे कमरे के तापमान पर 2 से 3 घंटे या फ्रिज में लगभग 1 घंटे के लिए सेट होने दें।

    इसके बाद मनचाहे आकार में काटकर परोसें।

    स्वाद बढ़ाने के आसान टिप्स

    अंत में एक छोटा चम्मच देसी घी मिलाने से स्वाद और खुशबू बढ़ जाती है।

    यदि दानेदार कलाकंद पसंद है, तो छेने को ज्यादा न मसलें।

    केसर मिलाने से रंग और स्वाद दोनों बेहतर हो जाते हैं।

    कम मीठा पसंद हो तो चीनी की मात्रा अपनी पसंद के अनुसार कम रख सकते हैं।

    ध्यान रखें

    यदि दूध से बदबू आ रही हो या वह खराब हो चुका हो, तो उससे कोई भी मिठाई न बनाएं। केवल ताजा फटा हुआ दूध ही मिठाई बनाने के लिए इस्तेमाल करें।

    निष्कर्ष

    अगली बार यदि घर में दूध फट जाए तो उसे फेंकने की बजाय स्वादिष्ट मिठाइयों में बदलें। थोड़ी सी मेहनत और सही विधि अपनाकर आप घर पर ही बाजार जैसी लाजवाब मिठाइयाँ तैयार कर सकते हैं।

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  • बारिश में लोहे के तवे और कड़ाही पर लग जाती है जंग? अपनाएं ये 4 आसान किचन हैक्स,,

    बारिश में लोहे के तवे और कड़ाही पर लग जाती है जंग? अपनाएं ये 4 आसान किचन हैक्स,,

    बारिश में लोहे के तवे और कड़ाही पर लग जाती है जंग? अपनाएं ये 4 आसान किचन हैक्स,,

    बरसात के मौसम में किचन की सबसे आम समस्याओं में से एक है लोहे के तवे और कड़ाही पर जंग लग जाना। कई बार बर्तन धोने के कुछ ही घंटों बाद उन पर लाल-भूरे रंग की परत दिखाई देने लगती है। इससे न केवल बर्तन की उम्र कम होती है, बल्कि उसमें खाना बनाना भी सुरक्षित और सुविधाजनक नहीं रहता।

    अगर आप भी इस समस्या से परेशान हैं, तो ये आसान घरेलू उपाय आपके लोहे के बर्तनों को लंबे समय तक जंग से बचाने में मदद कर सकते हैं।

    लोहे के बर्तनों पर जंग क्यों लगती है?

    जब लोहे के बर्तन लंबे समय तक नमी और हवा के संपर्क में रहते हैं, तो उनकी सतह पर आयरन ऑक्साइड बनने लगता है। यही परत जंग कहलाती है।

    बरसात के मौसम में हवा में नमी अधिक होने के कारण यह प्रक्रिया तेजी से होती है। यदि बर्तन धोने के बाद ठीक से न सुखाए जाएं, तो जंग और जल्दी लग सकती है।

    पहला उपाय

    बर्तन धोने के बाद उन्हें केवल सुखाने के लिए न छोड़ें।

    पहले साफ और सूखे कपड़े से अच्छी तरह पोंछें।

    इसके बाद 1 से 2 मिनट तक हल्की आंच पर गर्म करें ताकि अंदर बची हुई नमी भी पूरी तरह खत्म हो जाए।

    दूसरा उपाय

    बर्तन पूरी तरह सूख जाने के बाद उस पर खाने वाले किसी भी तेल की बहुत हल्की परत लगा दें।

    सरसों का तेल, रिफाइंड ऑयल या कोई भी कुकिंग ऑयल इस्तेमाल किया जा सकता है।

    यह पतली परत नमी और लोहे के बीच सुरक्षा कवच का काम करती है और जंग लगने की संभावना कम कर देती है।

    तीसरा उपाय

    लोहे के बर्तनों को कभी भी गीले सिंक में लंबे समय तक न छोड़ें।

    उन्हें हमेशा सूखी और हवादार जगह पर रखें।

    नम वातावरण में रखने से जंग तेजी से फैल सकती है।

    चौथा उपाय

    समय-समय पर लोहे के तवे और कड़ाही की सीजनिंग करें।

    इसके लिए बर्तन को अच्छी तरह साफ करके हल्का तेल लगाएं और कुछ मिनट तक गर्म करें।

    यह प्रक्रिया बर्तन की सतह पर प्राकृतिक सुरक्षा परत बना देती है, जिससे जंग लगने का खतरा कम होता है और खाना भी कम चिपकता है।

    यदि जंग लग जाए तो क्या करें?

    यदि बर्तन पर हल्की जंग दिखाई दे, तो उसे नमक और नींबू या बेकिंग सोडा की मदद से अच्छी तरह साफ करें।

    इसके बाद बर्तन को धोकर पूरी तरह सुखाएं, हल्का तेल लगाएं और दोबारा सीजनिंग करें।

    बहुत अधिक जंग लगे या सतह खराब हो चुके बर्तनों का उपयोग करने से बचें।

    कुछ जरूरी बातें

    लोहे के बर्तन धोने के बाद तुरंत सुखाएं।

    लंबे समय तक पानी में भिगोकर न रखें।

    बारिश के मौसम में नियमित रूप से तेल की हल्की परत लगाते रहें।

    समय-समय पर सीजनिंग करना न भूलें।

    निष्कर्ष

    बरसात के मौसम में थोड़ी सी सावधानी अपनाकर आप अपने लोहे के तवे और कड़ाही को लंबे समय तक जंग से सुरक्षित रख सकते हैं। सही तरीके से सुखाना, तेल लगाना, सूखी जगह पर रखना और नियमित सीजनिंग करना इन बर्तनों की उम्र बढ़ाने के सबसे आसान और प्रभावी उपाय हैं।

  • पसीने की गंध से आकर्षित होकर बिस्तर तक पहुंच सकता है यह सांप! ‘साइलेंट किलर’ के नाम से है बदनाम..

    पसीने की गंध से आकर्षित होकर बिस्तर तक पहुंच सकता है यह सांप! ‘साइलेंट किलर’ के नाम से है बदनाम..

    पसीने की गंध से आकर्षित होकर बिस्तर तक पहुंच सकता है यह सांप! ‘साइलेंट किलर’ के नाम से है बदनाम..

    Silent Killer Snake: बारिश का मौसम शुरू होते ही सांपों के निकलने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। ऐसे समय में विशेषज्ञ सबसे अधिक सावधानी कॉमन करैत (Common Krait) से बरतने की सलाह देते हैं। यह भारत के सबसे विषैले सांपों में गिना जाता है और अपनी खामोश लेकिन घातक प्रकृति के कारण इसे ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है।

    रात में सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है

    स्नेक कैचर रवि मीणा के अनुसार कॉमन करैत दिन के मुकाबले रात में अधिक सक्रिय होता है। अंधेरा होते ही यह भोजन की तलाश में अपने बिल से बाहर निकलता है और कई बार इंसानी बस्तियों तक भी पहुंच जाता है।

    पसीने की गंध से हो सकता है आकर्षित

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह सांप इंसान के शरीर से आने वाली पसीने की गंध की ओर आकर्षित हो सकता है। इसी वजह से कई बार यह रात में घरों के भीतर और यहां तक कि बिस्तर के पास भी पहुंच जाता है। यदि सोते समय अनजाने में व्यक्ति का हाथ या पैर इस पर पड़ जाए, तो यह तुरंत काट सकता है।

    काटने का पता भी नहीं चलता

    कॉमन करैत के दांत बेहद छोटे होते हैं। इसके काटने पर अक्सर न ज्यादा दर्द होता है और न ही स्पष्ट घाव दिखाई देता है। कई लोग इसे मामूली कीड़े का काटना समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन जब तक शरीर में जहर का असर दिखाई देने लगता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

    तंत्रिका तंत्र पर करता है हमला

    रवि मीणा के मुताबिक कॉमन करैत का जहर बेहद शक्तिशाली होता है और इसका सीधा असर शरीर के नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) पर पड़ता है। समय पर इलाज न मिलने पर शरीर की मांसपेशियां काम करना बंद कर सकती हैं, जिससे सांस लेने में गंभीर दिक्कत हो सकती है और मरीज की जान भी जा सकती है।

    ध्यान दें: यह दावा कि “कॉमन करैत का जहर कोबरा से कई गुना ज्यादा खतरनाक है” या “एक बार में 8–10 लोगों की जान ले सकता है” अलग-अलग स्रोतों में अलग तरह से बताया जाता है। इसलिए ऐसे दावों को निश्चित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

    बारिश में रखें ये सावधानियां

    • रात में फर्श पर सोने से बचें।
    • सोने से पहले बिस्तर, चादर और कमरे के कोनों की अच्छी तरह जांच करें।
    • घर के आसपास झाड़ियां, लकड़ी और कबाड़ जमा न होने दें।
    • यदि सांप दिखाई दे तो उससे दूरी बनाए रखें और प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम को बुलाएं।

    सांप काटने पर क्या करें?

    यदि किसी व्यक्ति को सांप काट ले तो घबराएं नहीं। झाड़-फूंक, तांत्रिक उपचार या घरेलू नुस्खों में समय बर्बाद करने के बजाय उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचाएं। समय पर एंटी-स्नेक वेनम (ASV) और उचित चिकित्सकीय उपचार मिलने से मरीज की जान बचाई जा सकती है।

  • क्या भारत में थी दुनिया की पहली सभ्यता? इतिहासकार के दावे से छिड़ी नई बहस, लोथल बंदरगाह को बताया सबसे बड़ा सबूत..

    क्या भारत में थी दुनिया की पहली सभ्यता? इतिहासकार के दावे से छिड़ी नई बहस, लोथल बंदरगाह को बताया सबसे बड़ा सबूत..

    क्या भारत में थी दुनिया की पहली सभ्यता? इतिहासकार के दावे से छिड़ी नई बहस, लोथल बंदरगाह को बताया सबसे बड़ा सबूत..

    Civilisation in India: प्राचीन सभ्यताओं की उत्पत्ति को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। समुद्री इतिहासकार निक कॉलिंस ने दावा किया है कि दुनिया की पहली विकसित सभ्यता मेसोपोटामिया नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में विकसित हुई थी। उन्होंने गुजरात के लोथल को इस दावे का अहम प्रमाण बताते हुए कहा कि यहां दुनिया के सबसे प्राचीन ज्ञात डॉकयार्ड (बंदरगाह) में से एक मौजूद था।

    क्या है इतिहासकार का दावा?

    निक कॉलिंस का कहना है कि लंबे समय तक पश्चिमी इतिहास लेखन में मेसोपोटामिया (वर्तमान इराक) को सभ्यता का जन्मस्थल बताया जाता रहा, जबकि उपलब्ध पुरातात्विक और समुद्री व्यापार से जुड़े साक्ष्य भारतीय उपमहाद्वीप की उन्नत सभ्यता की ओर संकेत करते हैं।

    उनके अनुसार सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नगरों में सुनियोजित सड़कें, जल निकासी व्यवस्था, मानकीकृत ईंटें, व्यापारिक नेटवर्क और विकसित शहरी व्यवस्था मौजूद थी, जो उस समय के लिए अत्यंत उन्नत मानी जाती है।

    लोथल को बताया सबसे बड़ा प्रमाण

    कॉलिंस ने गुजरात के लोथल में मिले विशाल ईंट-निर्मित ढांचे को प्राचीन डॉकयार्ड बताया। उनका कहना है कि यह समुद्री व्यापार के लिए विकसित बंदरगाह था, जहां से जहाजों का संचालन होता था।

    भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अनुसार भी लोथल सिंधु सभ्यता का एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था और यहां समुद्री गतिविधियों के प्रमाण मिले हैं। हालांकि, इस संरचना को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत भी रहे हैं और इसके स्वरूप पर शोध जारी है।

    यूरोप से पहले विकसित समुद्री व्यापार?

    इतिहासकार का दावा है कि लोथल जैसी उन्नत समुद्री संरचना उस समय यूरोप में मौजूद नहीं थी। उनके अनुसार भारतीय उपमहाद्वीप से पश्चिम एशिया तक व्यापारिक संपर्क स्थापित थे और मोतियों, आभूषणों समेत कई वस्तुओं का निर्यात किया जाता था।

    आर्य आक्रमण सिद्धांत पर भी उठाए सवाल

    निक कॉलिंस ने अपने लेख में आर्य आक्रमण सिद्धांत पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि भारतीय सभ्यता के विकास को लंबे समय तक पश्चिमी नजरिए से देखा गया। हालांकि, इस विषय पर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों के बीच आज भी विभिन्न मत मौजूद हैं और यह शोध का विषय बना हुआ है।

    इतिहासकारों की क्या राय है?

    प्राचीन सभ्यताओं की उत्पत्ति और विकास को लेकर अकादमिक जगत में कई सिद्धांत प्रचलित हैं। अधिकांश मुख्यधारा के इतिहासकार मेसोपोटामिया, मिस्र, सिंधु घाटी और चीन को दुनिया की प्रारंभिक प्रमुख सभ्यताओं में शामिल मानते हैं। इनमें से किसे “पहली सभ्यता” कहा जाए, इस पर अब भी शोध और बहस जारी है।

    नोट: निक कॉलिंस के विचार उनके व्यक्तिगत ऐतिहासिक विश्लेषण पर आधारित हैं। इन्हें इतिहासकारों के बीच सर्वसम्मत निष्कर्ष नहीं माना जाता। सभ्यताओं की उत्पत्ति, आर्य सिद्धांत और लोथल के स्वरूप जैसे विषयों पर अकादमिक जगत में विभिन्न मत मौजूद हैं।

  • धरती का अनोखा जानवर! गुस्सा आते ही सामने वाले पर थूक देता है, जानें इसके पीछे की वजह..

    धरती का अनोखा जानवर! गुस्सा आते ही सामने वाले पर थूक देता है, जानें इसके पीछे की वजह..

    धरती का अनोखा जानवर! गुस्सा आते ही सामने वाले पर थूक देता है, जानें इसके पीछे की वजह..

    दुनिया में लाखों जीव-जंतु पाए जाते हैं और हर प्रजाति की अपनी अलग पहचान होती है। कोई अपनी रफ्तार के लिए मशहूर है तो कोई अपनी ताकत या शिकार करने के तरीके के लिए। लेकिन एक ऐसा जानवर भी है, जो अपने अनोखे बचाव के तरीके के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। यह है लामा (Llama), जो खतरा महसूस होने या गुस्सा आने पर सामने वाले पर थूक देता है।

    क्यों थूकता है लामा?

    लामा के लिए थूकना सिर्फ एक अजीब आदत नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और चेतावनी देने का प्राकृतिक तरीका है। जब उसे लगता है कि कोई उसकी सीमा में दखल दे रहा है, उसे परेशान कर रहा है या उससे खतरा है, तो वह सामने वाले पर थूककर उसे दूर रहने का संकेत देता है।

    सिर्फ लार नहीं, पेट का पदार्थ भी फेंक सकता है

    यदि लामा हल्का नाराज होता है तो वह केवल लार फेंकता है। लेकिन जब वह बेहद गुस्से में होता है, तो उसके थूक में आधा पचा हुआ भोजन और पेट का तरल पदार्थ भी शामिल हो सकता है। इसकी गंध काफी तेज होती है, जिससे सामने वाला तुरंत दूर हटने की कोशिश करता है।

    किन परिस्थितियों में थूकते हैं लामा?

    विशेषज्ञों के अनुसार, लामा इन स्थितियों में सबसे ज्यादा थूकते हैं—

    • अपना वर्चस्व दिखाने के लिए
    • खाने को लेकर प्रतिस्पर्धा होने पर
    • खुद को खतरे में महसूस करने पर
    • तनाव या असहज स्थिति में
    • बार-बार परेशान किए जाने पर
    • गलत तरीके से पकड़ने या संभालने पर

    कई बार इंसान भी उनके निशाने पर आ सकते हैं, यदि वे उन्हें ज्यादा परेशान करें।

    थूकने से पहले देते हैं संकेत

    लामा आमतौर पर बिना वजह किसी पर थूकते नहीं हैं। इससे पहले वे कई तरह के संकेत देते हैं, जैसे—

    • कान पीछे की ओर कर लेना
    • सिर ऊंचा उठाना
    • गुनगुनाहट जैसी आवाज निकालना
    • बेचैन या तनावग्रस्त दिखाई देना

    यदि इन संकेतों के बाद भी खतरा दूर नहीं होता, तब वे थूककर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं।

    हर बार थूक एक जैसा नहीं होता

    लामा का थूक उनके गुस्से के स्तर पर निर्भर करता है। हल्की नाराजगी में वे केवल थोड़ा-सा थूक फेंकते हैं, जबकि अधिक आक्रामक होने पर वे पेट से निकला आधा पचा भोजन भी तेज़ी से सामने वाले की ओर उछाल सकते हैं।

    बेहद प्रभावी है यह बचाव का तरीका

    वन्यजीव विशेषज्ञों के मुताबिक, लामा का यह व्यवहार हिंसक हमला करने के बजाय संघर्ष से बचने की रणनीति है। उनके थूक की तेज बदबू और अचानक होने वाली प्रतिक्रिया से अधिकांश शिकारी या अन्य जानवर पीछे हट जाते हैं। इस तरह बिना लड़ाई किए ही लामा खुद को सुरक्षित रखने में सफल हो जाते हैं।