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  • भारत का अनोखा गांव: न बिजली, न मोबाइल, साबुन भी नहीं करते इस्तेमाल; ब्रह्म मुहूर्त में जागता है पूरा ग्राम.

    भारत का अनोखा गांव: न बिजली, न मोबाइल, साबुन भी नहीं करते इस्तेमाल; ब्रह्म मुहूर्त में जागता है पूरा ग्राम.

    श्रीकाकुलम: आज के दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट और बिजली के बिना जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है। लेकिन आंध्र प्रदेश में एक ऐसा गांव होने का दावा किया जाता है, जहां लोग आधुनिक सुविधाओं से दूरी बनाकर बेहद पारंपरिक तरीके से जीवन जीते हैं। इस गांव का नाम कुर्मा ग्रामम बताया जाता है, जो श्रीकाकुलम जिले की एंथकापल्ली पहाड़ियों के बीच स्थित है।

    सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट और वीडियो के मुताबिक, यहां रहने वाले लोग प्रकृति के करीब रहना पसंद करते हैं और आधुनिक जीवनशैली से दूरी बनाए हुए हैं। गांव की जीवनशैली इन दिनों सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रही है।

    सिर्फ 17 परिवारों का गांव

    वायरल जानकारी के अनुसार, कुर्मा ग्रामम करीब 60 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और यहां सिर्फ 17 परिवार रहते हैं। गांव देखने में भले ही सामान्य ग्रामीण इलाके जैसा लगे, लेकिन यहां की जीवनशैली इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है।

    दावे के मुताबिक, गांव में न बिजली की सुविधा है और न ही लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। शाम के समय रोशनी के लिए पारंपरिक दीयों का इस्तेमाल किया जाता है।

    मिट्टी और लकड़ी से बने हैं घर

    इस गांव में घरों का निर्माण भी पारंपरिक तरीके से किए जाने की बात कही गई है। वायरल पोस्ट के मुताबिक, यहां मकान सीमेंट और लोहे के ढांचे के बजाय मिट्टी, चूना, लकड़ी और पत्थरों से बनाए जाते हैं।

    घरों के फर्श पर गोबर से लिपाई करने की परंपरा भी बताई गई है। खाना पकाने के लिए गैस सिलेंडर के बजाय लकड़ी से जलने वाले मिट्टी के चूल्हों का इस्तेमाल किया जाता है।

    साबुन की जगह रीठा और प्राकृतिक चीजें

    कुर्मा ग्रामम की सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात को लेकर हो रही है, वह है यहां साबुन का इस्तेमाल न करना। सोशल मीडिया पर साझा जानकारी के अनुसार, ग्रामीण साबुन की जगह रीठा और दूसरी प्राकृतिक वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं।

    यह जीवनशैली आधुनिक सुविधाओं से दूर और प्रकृति आधारित जीवन को दर्शाने के तौर पर पेश की जा रही है।

    सुबह साढ़े तीन बजे जागता है पूरा गांव

    वायरल पोस्ट में गांव की दिनचर्या का भी जिक्र है। इसके मुताबिक, सुबह करीब 3:30 बजे गांव के लोग जाग जाते हैं। इसके बाद ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके सभी लोग एक स्थान पर एकत्र होते हैं।

    दीयों की हल्की रोशनी के बीच भजन और ध्यान किया जाता है। बताया जाता है कि गांव में बच्चों की पढ़ाई भी पारंपरिक तरीके से होती है।

    बच्चों को गुरुकुल में पढ़ाने का दावा

    सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांव में आधुनिक कॉन्वेंट स्कूल की जगह बच्चों को गुरुकुल पद्धति से शिक्षा दी जाती है। यहां वेद, रामायण और भगवद्गीता के साथ-साथ अंग्रेजी और गणित की बुनियादी शिक्षा दिए जाने का दावा किया गया है।

    वायरल जानकारी में यह भी कहा गया है कि इस पहल की शुरुआत 2018 में हुई थी। इसका उद्देश्य लोगों को प्रकृति के करीब रखते हुए अपेक्षाकृत शांत और तनावमुक्त जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना बताया गया है।

    आधुनिक दौर में पारंपरिक जीवन चर्चा में

    मोबाइल और इंटरनेट के दौर में कुर्मा ग्रामम की यह कथित जीवनशैली लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गई है। हालांकि, गांव से जुड़ी कई जानकारियां सोशल मीडिया पोस्ट और वायरल वीडियो के जरिए सामने आई हैं, इसलिए इनके हर दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

    फिर भी, प्रकृति के करीब रहने, पारंपरिक घरों में रहने और गुरुकुल आधारित शिक्षा जैसे पहलुओं ने इस गांव को सोशल मीडिया पर खासा चर्चा में ला दिया है।

     

     

     

     

     

  • जापान में 1,800 लोगों ने रस्सियों से खींचकर 360 टन का किला फिर अपनी जगह पहुंचाया.

    जापान में 1,800 लोगों ने रस्सियों से खींचकर 360 टन का किला फिर अपनी जगह पहुंचाया.

    जापान में 1,800 लोगों ने रस्सियों से खींचकर 360 टन का किला फिर अपनी जगह पहुंचाया

    टोक्यो । जापान में 400 साल पुराने ऐतिहासिक हिरोसाकी कैसल (किले) को उसकी पुरानी जगह पर वापस पहुंचाने के लिए करीब 1,800 लोगों ने रस्सियों के सहारे 360 टन वजनी किले के मुख्य टावर को खींचा। यह अनोखी कवायद देश के आओमोरी प्रांत में सप्ताहांत के दौरान हुई और इसमें पारंपरिक जापानी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। प्रतिभागियों ने 30 मीटर लंबी रस्सियों को खींचते हुए किले के टावर को रेल जैसी पटरी पर आगे बढ़ाया। शनिवार को टावर को 1.13 मीटर और रविवार को 1.09 मीटर, यानी कुल 2.22 मीटर आगे खिसकाया गया।

    लोगों की टीमें बारी-बारी से रस्सियां खींचती रहीं और पूरे अभियान के दौरान उत्साह बढ़ाने के लिए जापानी नारे लगाए गए। जापानी न्यूज एजेंसी क्योडो के अनुसार, इस अभियान के लिए लोगों में जबरदस्त उत्साह देखा गया। आयोजकों को 1,800 स्थानों के लिए करीब 8,000 आवेदन मिले, यानी उपलब्ध अवसरों से लगभग चार गुना ज्यादा। प्रतिभागी सिर्फ हिरोसाकी शहर से ही नहीं, बल्कि जापान के दूसरे हिस्सों और विदेशों से भी पहुंचे।किले को खींचने के लिए ‘हिकिया’ नाम की पारंपरिक तकनीक अपनाई गई।

    इसमें किसी ऐतिहासिक इमारत को तोड़ने के बजाय उसे रोलर्स और रेल की मदद से धीरे-धीरे दूसरी जगह ले जाया जाता है। हिरोसाकी कैसल के अधिकारियों के मुताबिक, यह तकनीक प्राचीन जापान में इस्तेमाल होती रही है और करीब एक सदी बाद पहली बार किसी किले को इस तरह स्थानांतरित करने में इसका इस्तेमाल किया गया।

    हिरोसाकी कैसल की पत्थर की दीवार को भूकंप से नुकसान पहुंचा था। इसकी मरम्मत के लिए 2015 में करीब 360 टन वजनी मुख्य टावर को उसकी मूल जगह से हटाकर लगभग 80 मीटर दूर ले जाया गया था। दीवार की मरम्मत दिसंबर 2024 में पूरी हुई और उसके 2,185 पत्थरों को उनकी मूल स्थिति में दोबारा लगाया गया।अब टावर को वापस लाने का काम चल रहा है। अगस्त के अंत तक करीब 4,100 लोगों की मदद से इसे हाथों से कुल पांच मीटर तक खींचने की योजना है।

    इसके बाद बाकी करीब 73 मीटर की दूरी मशीनों की मदद से तय की जाएगी और पूरे साल के अंत तक टावर को उसकी मूल जगह पर वापस पहुंचाने का लक्ष्य है।हिरोसाकी कैसल का निर्माण 1611 में हुआ था। मौजूदा मुख्य टावर 1810 में बनाया गया था। यह जापान में बचे केवल 12 ऐतिहासिक किला-टावरों में शामिल है और उत्तर-पूर्वी तोहोकू क्षेत्र में ऐसा एकमात्र टावर है।मरम्मत पूरी होने के बाद भी पर्यटकों को इसे देखने के लिए इंतजार करना होगा। संरक्षण कार्य के कारण किले के मुख्य टावर को 2033 तक पर्यटकों के लिए फिर से खोलने की उम्मीद है।

  • जगन्नाथ पुरी मंदिर के चार द्वार, जिसमें छिपा है मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का रहस्य.

    जगन्नाथ पुरी मंदिर के चार द्वार, जिसमें छिपा है मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का रहस्य.

    जगन्नाथ पुरी मंदिर के चार द्वार, जिसमें छिपा है मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का रहस्य

    पुरी, । ओडिशा का जगन्नाथ पुरी मंदिर भक्ति और भव्यता की एक अनोखी मिसाल है। जगन्नाथ जी को कलियुग का भगवान कहा जाता है और उनके मंदिर से जुड़ी बहुत सी रहस्यमयी और अद्भुत बातें हैं जो हर किसी को हैरान कर देती हैं।

    मंदिर के चारों द्वारों को लेकर भी कुछ अनोखी मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जगन्नाथ पुरी मंदिर के चारों द्वार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग को दर्शाते हैं। सबसे पहले बात करते हैं पूर्व दिशा के द्वार की, जिसे सिंह द्वार कहा जाता है।

    यह मंदिर का मुख्य द्वार है और इसे मोक्ष का प्रतीक माना गया है। जब कोई भक्त इस द्वार से मंदिर में प्रवेश करता है, तो ऐसा कहा जाता है कि उसकी आत्मा पवित्र हो जाती है। इसी द्वार के सामने प्रसिद्ध अरुण स्तंभ स्थित है, जिस पर भगवान सूर्य के सारथी अरुण देव की मूर्ति है। मान्यता है कि इस स्तंभ को देखने मात्र से ही शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    अब आते हैं दक्षिण दिशा के द्वार पर, जिसे अश्व द्वार या विजय द्वार कहा जाता है। प्राचीन काल में जब राजा या योद्धा युद्ध के लिए जाते थे, तो वे इसी द्वार से होकर मंदिर में प्रवेश करते थे और भगवान जगन्नाथ से विजय की कामना करते थे। इसीलिए इसे विजय का प्रतीक माना गया है। यह द्वार शक्ति, साहस और सफलता का प्रतीक है।

    तीसरा द्वार है पश्चिम दिशा में स्थित हस्ति द्वार, यानी हाथी द्वार। यह द्वार समृद्धि और सुख का प्रतीक है। इस द्वार पर भगवान गणेश की मूर्ति विराजमान है, जो विघ्नहर्ता और समृद्धि के देवता माने जाते हैं। भक्त मानते हैं कि इस द्वार से प्रवेश करने पर जीवन में धन, ज्ञान और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।अंत में आता है उत्तर दिशा का व्याघ्र द्वार, जिसे बाघ द्वार भी कहा जाता है।

    यह द्वार धर्म और संरक्षण का प्रतीक है। इसे भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित माना जाता है, जो अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक हैं। यह द्वार हमें सिखाता है कि धर्म की रक्षा करना ही सच्चे जीवन का उद्देश्य है।इन चारों द्वारों के माध्यम से जगन्नाथ मंदिर जीवन के चार सिद्धांतों मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का संदेश भी देता है। यही कारण है कि जगन्नाथ मंदिर केवल एक तीर्थस्थान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का प्रतीक माना जाता है।

  • 2000 फीट नीचे मिला सदियों पुराना जहाज, अंदर का नजारा देखकर वैज्ञानिक भी हैरान..

    2000 फीट नीचे मिला सदियों पुराना जहाज, अंदर का नजारा देखकर वैज्ञानिक भी हैरान..

    2000 फीट नीचे मिला सदियों पुराना जहाज, अंदर का नजारा देखकर वैज्ञानिक भी हैरान

    समंदर की गहराई में छिपा इतिहास का एक बड़ा राज अब सामने आया है. नॉर्वे के पास समंदर में करीब 2000 फीट नीचे 275 साल पुराना एक जहाज मिला है. इतने लंबे समय तक पानी के अंदर रहने के बाद भी जहाज के अंदर रखा सामान काफी हद तक सुरक्षित है. इस खोज ने वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को हैरान कर दिया है. दरअसल इस जहाज को एक रोबोट वाली छोटी पनडुब्बी की मदद से खोजा गया. इस पनडुब्बी को समंदर की गहराई में भेजकर जहाज की तस्वीरें और वीडियो लिए गए. जब शोधकर्ताओं ने इन तस्वीरों को देखा तो उन्हें यकीन नहीं हुआ कि इतने पुराने जहाज में सामान अभी भी अपनी जगह पर रखा हुआ है.

    जहाज के अंदर मिली कीमती चीजें

    जहाज के अंदर बड़ी संख्या में चीनी मिट्टी के बर्तन मिले हैं. ये बर्तन उस समय की याद दिलाते हैं जब ऐसे सामान को बहुत कीमती माना जाता था. इसके अलावा जहाज में सजावट से जुड़ी चीजें, कांच के गिलास, बोतलें और अनाज रखने वाले बैरल भी मिले हैं. तस्वीरों में कई प्लेटें और बर्तन ऐसे दिखाई दे रहे हैं जैसे वे जहाज के डूबने के समय ही रखे गए थे. शोधकर्ताओं को जहाज में कुछ ऐसे बंद डिब्बे भी मिले हैं, जिन्हें अभी तक खोला नहीं गया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन डिब्बों में कपड़े, चाय, जड़ी-बूटियां या उस समय इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजें हो सकती हैं. इन डिब्बों की जांच के बाद उस दौर के लोगों की जिंदगी और व्यापार के बारे में नई जानकारी मिल सकती है.

    पता नहीं कहां खत्म हुआ जहाज का आखिरी सफर

    अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि यह जहाज कहां से चला था और इसका आखिरी सफर कहां खत्म हुआ. हालांकि जहाज पर मिले कुछ संकेतों से पता चलता है कि इसका संबंध यूरोप के पुराने व्यापारिक रास्तों से हो सकता है. जानकारों के मुताबिक 18वीं सदी में चीनी मिट्टी के बर्तन यूरोप में काफी लोकप्रिय थे और इन्हें दूर-दूर तक पहुंचाया जाता था. यही वजह है कि यह जहाज उस समय के व्यापार और समुद्री यात्रा की एक खास तस्वीर दिखा सकता है. अधिकारियों का कहना है कि इस जहाज की असली कीमत इसमें मिले सामान से ज्यादा इसके इतिहास में है. यह खोज आने वाले समय में समुद्र के अंदर छिपे पुराने राजों को समझने में मदद कर सकती है.

  • इंसानों का पेशाब भी पिघला रहा ग्लेशियर! हर साल हजारों लीटर से बढ़ रहा असर, वैज्ञानिकों की स्टडी में बड़ा खुलासा.

    इंसानों का पेशाब भी पिघला रहा ग्लेशियर! हर साल हजारों लीटर से बढ़ रहा असर, वैज्ञानिकों की स्टडी में बड़ा खुलासा.

    ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। इसी बीच नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों की एक स्टडी ने माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर को लेकर एक ऐसा पहलू सामने रखा है, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि एवरेस्ट के बेस कैंप पर पर्वतारोहियों की बड़ी संख्या और वहां होने वाली मानवीय गतिविधियों का ग्लेशियर पर असर पड़ रहा है।

    यह अध्ययन Regional Environmental Change Journal में प्रकाशित हुआ है। इसमें एवरेस्ट के खुम्बु ग्लेशियर और उसके आसपास बढ़ती गर्मी के अलग-अलग स्रोतों का अध्ययन किया गया है।

    एवरेस्ट बेस कैंप पर हर दिन हजारों लीटर पेशाब

    माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान ऊंचाई और ठंड के कारण पर्वतारोहियों की जीवनशैली काफी अलग होती है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2023 के क्लाइंबिंग सीजन में बेस कैंप क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 6,766 लीटर पेशाब जमा होने का अनुमान लगाया गया।

    एवरेस्ट बेस कैंप खुम्बु ग्लेशियर के ऊपर स्थित है। यहां चढ़ाई के मौसम में बड़ी संख्या में पर्वतारोही और स्टाफ मौजूद रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान करीब 1,600 टेंट लगाए जाते हैं, जिनमें किचन, शॉवर, जनरेटर और अन्य सुविधाएं भी होती हैं।

    क्या सच में पेशाब की गर्मी से पिघल रही है बर्फ?

    इस दावे को समझना जरूरी है। इंसानी शरीर से निकलने वाले पेशाब का तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस हो सकता है, लेकिन बाहर निकलने के बाद वह तेजी से ठंडा होने लगता है। इसलिए ऐसा नहीं है कि पेशाब की गर्मी सीधे भारी मात्रा में ग्लेशियर को पिघला रही है।

    शोधकर्ताओं ने यह आकलन किया कि इस गर्मी का कितना हिस्सा वास्तव में बर्फ तक पहुंचता है। अध्ययन के मुताबिक, गर्मी का बहुत छोटा हिस्सा ही ग्लेशियर की बर्फ को प्रभावित करता है, जबकि काफी ऊर्जा आसपास की हवा और चट्टानों में चली जाती है।

    शोध में यह भी अनुमान लगाया गया कि एक क्लाइंबिंग सीजन के दौरान करीब 154 टन बर्फ पिघलने की स्थिति बन सकती है। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार इंसानी पेशाब ग्लेशियर के पिघलने की सबसे बड़ी वजह नहीं है।

    असली चिंता बढ़ता तापमान

    वैज्ञानिकों की चिंता का मुख्य कारण हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ता तापमान है। अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 2000 के बाद हिमालय में बर्फ पिघलने की रफ्तार पहले की तुलना में काफी बढ़ी है।

    बेस कैंप की सतह का तापमान खुम्बु ग्लेशियर के अन्य हिस्सों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। शोध के अनुसार, यहां तापमान में करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की वृद्धि दर्ज की जा रही है।

    ग्लेशियरों के लिए बढ़ता मानवीय दबाव भी चिंता का विषय

    एवरेस्ट पर हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही पहुंचते हैं। उनके लिए बनाए गए कैंप, खाना पकाने की व्यवस्था, जनरेटर और अन्य गतिविधियों से निकलने वाली गर्मी स्थानीय वातावरण को प्रभावित करती है।

    ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ स्थानीय मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के पीछे व्यापक स्तर पर बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक हैं।

    इस अध्ययन ने यह जरूर दिखाया है कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर बढ़ती मानवीय मौजूदगी का असर सिर्फ कचरे या प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां के बेहद संवेदनशील हिमनद पर्यावरण पर भी पड़ सकता है।

  • दिमाग को हमेशा रखना है जवान, तो पहेलियों से करो दोस्ती, इन टिप्स को आजमाएं..?

    दिमाग को हमेशा रखना है जवान, तो पहेलियों से करो दोस्ती, इन टिप्स को आजमाएं..?

    दिमाग को हमेशा रखना है जवान, तो पहेलियों से करो दोस्ती, इन टिप्स को आजमाएं

    बुढ़ापे में भी अगर दिमाग को चुस्त-दुरुस्त रखना है, तो उसे खाली मत छोड़िए। उसे काम में लगाए रखिए। ऐसा हमारा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार का कहना है। मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर कहा कि अपने मस्तिष्क को व्यस्त रखना बहुत जरूरी है।

    मंत्रालय ने लिखा, “अपने मस्तिष्क को व्यस्त रखें। मानसिक प्रेरणा (उद्दीपन) से स्मृति और संज्ञानात्मक स्वास्थ्य बेहतर होता है। पहेलियां हल करें, दिमागी खेल खेलें और जिज्ञासु बने रहें।” मंत्रालय का कहना है कि जैसे शरीर को फिट रखने के लिए कसरत जरूरी है, वैसे ही दिमाग को फिट रखने के लिए उसकी भी कसरत जरूरी है।

    दिमाग की कसरत का सबसे आसान तरीका पहेलियां, दिमागी खेल और नई-नई चीजों के बारे में जानने की इच्छा है।अक्सर देखा जाता है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ लोग चीजें भूलने लगते हैं। रखा हुआ सामान याद नहीं रहता, किसी का नाम याद करने में वक्त लगता है। ये सब संज्ञानात्मक स्वास्थ्य कमजोर होने की निशानी है।

    अगर आप पहले से ही अपने दिमाग को एक्टिव रखेंगे, तो इस परेशानी से काफी हद तक बचा जा सकता है।सुबह अखबार में जो सुडोकू या क्रॉसवर्ड आता है, वो सिर्फ टाइमपास नहीं है। वो आपके दिमाग के लिए जिम जैसा है। जब आप कोई पहेली हल करते हैं, तो आपके दिमाग की नसें ज्यादा तेजी से काम करती हैं। इससे आपकी याददाश्त तेज होती है और सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है।इसी तरह शतरंज, कैरम, लूडो जैसे दिमागी खेल भी बहुत फायदेमंद हैं। ये खेल आपको रणनीति बनाना सिखाते हैं और आपके फोकस को बढ़ाते हैं। घर में दादा-दादी, नाना-नानी के साथ बच्चे अगर ये खेल खेलें, तो दोनों को फायदा होगा।

    इसके साथ ही जिज्ञासु बने रहना भी बहुत जरूरी है। सीखना कभी बंद नहीं करना चाहिए। नई किताबें पढ़िए, नई जगहों के बारे में जानिए, लोगों से बातचीत कीजिए, कुछ नया करने की कोशिश कीजिए। जब आप जिज्ञासु रहते हैं, तो आपका दिमाग नई चीजों को सीखने के लिए हमेशा तैयार रहता है। इससे बुढ़ापे में भी आपका दिमाग जवान बना रहता है।

  • इतनी खास क्यों है 4500 साल पुरानी ‘डांसिंग गर्ल’ की मूर्ति, यूं ही नहीं मचा है बवाल..

    इतनी खास क्यों है 4500 साल पुरानी ‘डांसिंग गर्ल’ की मूर्ति, यूं ही नहीं मचा है बवाल..

    इतनी खास क्यों है 4500 साल पुरानी ‘डांसिंग गर्ल’ की मूर्ति, यूं ही नहीं मचा है बवाल

    दिलचस्प बात यह है कि जिस मूर्ति पर आज पूरा देश बहस कर रहा है, उसकी ऊंचाई महज 10.5 सेंटीमीटर है. कमर पर हाथ रखे खड़ी यह आकृति किसी साधारण कलाकृति की तरह नहीं दिखती.

    सोशल मीडिया पर इन दिनों 4500 साल पुरानी एक छोटी-सी मूर्ति को लेकर बड़ी बहस छिड़ी हुई है. ये वही मशहूर ‘डांसिंग गर्ल’ है, जिसे सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे पहचान योग्य धरोहरों में गिना जाता है. हाल ही में एक किताब में इसकी तस्वीर को अलग तरीके से प्रकाशित किए जाने के बाद लोगों के बीच चर्चा तेज हो गई. कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि ऐतिहासिक विरासत को उसके मूल स्वरूप में ही दिखाया जाना चाहिए या नहीं. दिलचस्प बात यह है कि जिस मूर्ति पर आज पूरा देश बहस कर रहा है, उसकी ऊंचाई महज 10.5 सेंटीमीटर है. आकार में छोटी होने के बावजूद यह भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास की सबसे प्रभावशाली कलाकृतियों में शामिल है.

    अपने आप में बेहद खास है ये मूर्ति

    एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मूर्ति करीब 2500 ईसा पूर्व की है और उस दौर की तकनीकी समझ तथा कलात्मक कौशल का शानदार उदाहरण पेश करती है. इस मूर्ति की सबसे बड़ी खासियत इसकी आत्मविश्वास से भरी मुद्रा है. कमर पर हाथ रखे खड़ी यह आकृति किसी साधारण कलाकृति की तरह नहीं दिखती. यही वजह है कि दशकों से इतिहासकार, कलाकार और शोधकर्ता इसके अर्थ और पहचान को लेकर अलग-अलग राय रखते आए हैं.

    क्या मानते हैं एक्सपर्ट्स

    कुछ इसे डांसिंग गर्ल मानते हैं, जबकि कुछ एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह किसी प्रभावशाली महिला या धार्मिक परंपरा का प्रतीक भी हो सकती है. सोशल मीडिया पर चल रही बहस का एक बड़ा कारण यह भी है कि यह मूर्ति केवल धातु से बनी एक पुरानी वस्तु नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की पहचान मानी जाती है. लोगों का मानना है कि ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें आने वाली पीढ़ियों को अतीत से जोड़ने का काम करती हैं. इसलिए इनके स्वरूप या प्रस्तुति में किसी भी बदलाव को लेकर संवेदनशीलता स्वाभाविक है.

  • समंदर ने 300 साल तक संभालकर रखा 2 लाख करोड़ का खजाना, अब दुनिया ने देखी पहली झलक>?

    समंदर ने 300 साल तक संभालकर रखा 2 लाख करोड़ का खजाना, अब दुनिया ने देखी पहली झलक>?

    समंदर ने 300 साल तक संभालकर रखा 2 लाख करोड़ का खजाना, अब दुनिया ने देखी पहली झलक

    समंदर की गहराई में 300 साल से छिपे एक बड़े राज से अब पर्दा उठना शुरू हो गया है. कैरेबियन सागर में डूबे एक पुराने जहाज सैन होजे (San Jose) से पहली बार कुछ कीमती चीजें बाहर निकाली गई हैं. इस जहाज को दुनिया के सबसे बड़े डूबे हुए खजानों में से एक माना जाता है. माना जा रहा है कि इसमें करीब 20 अरब डॉलर यानी लगभग 2 लाख करोड़ रुपये का खजाना हो सकता है. ये जहाज साल 1708 में डूब गया था. उस समय यह स्पेन के राजा के लिए सोना, चांदी और कीमती पत्थर लेकर जा रहा था. लेकिन सफर के दौरान ब्रिटिश जहाजों के हमले में यह समुद्र में समा गया. इसके साथ ही इसमें रखा अरबों रुपये का खजाना भी पानी की गहराई में चला गया.

    300 साल बाद दिखी खजाने की झलक

    करीब 300 साल बाद इस जहाज से पहली बार कुछ चीजें बाहर निकाली गई हैं. इनमें कांसे की एक तोप, चीनी मिट्टी का एक कप, सोने के तीन पुराने सिक्के और मिट्टी के बर्तनों के कुछ टुकड़े शामिल हैं. इन चीजों को देखकर वैज्ञानिक और इतिहासकार काफी उत्साहित हैं. इस जहाज को समुद्र की करीब 2000 फीट गहराई में खोजा गया था. इतनी गहराई में जाकर चीजों को बाहर निकालना आसान काम नहीं था. इसके लिए खास रोबोट मशीनों और आधुनिक तकनीक की मदद ली गई. वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी पूरा खजाना बाहर नहीं निकाला गया है. समुद्र की तह में अब भी बड़ी संख्या में सोना, चांदी और दूसरी कीमती चीजें मौजूद हो सकती हैं.

    ऐतिहासिक चीजें मिलने की उम्मीद

    खोजकर्ताओं का अनुमान है कि आगे की खोज में और भी कई ऐतिहासिक चीजें मिलने की उम्मीद है. मालूम हो कि जहाज सिर्फ खजाने की वजह से खास नहीं है, बल्कि यह 300 साल पुराने इतिहास को समझने का एक बड़ा जरिया भी है. इससे उस समय के व्यापार, समुद्री यात्राओं और लोगों की जिंदगी के बारे में नई जानकारी मिल सकती है. इस खजाने को लेकर अलग-अलग देशों के बीच अधिकार को लेकर विवाद भी चल रहा है. कई पक्ष इस जहाज और इसमें मौजूद चीजों पर अपना दावा करते हैं. फिलहाल बरामद की गई चीजों को सुरक्षित रखा गया है और उनकी जांच की जा रही है. समंदर ने सदियों तक इस जहाज के राज को अपने अंदर छिपाकर रखा था. अब धीरे-धीरे दुनिया के सामने इसकी कहानी और इसमें छिपे खजाने की झलक सामने आ रही है.

  • कार का बोनट खोला तो उड़ गए होश, अंदर कुंडली मारकर बैठा था 7 फीट लंबा अजगर; रेस्क्यू का वीडियो वायरल..

    कार का बोनट खोला तो उड़ गए होश, अंदर कुंडली मारकर बैठा था 7 फीट लंबा अजगर; रेस्क्यू का वीडियो वायरल..

    मुंबई: बारिश के मौसम में सांप और दूसरे जीव सुरक्षित और सूखी जगह की तलाश में अक्सर इंसानी बस्तियों तक पहुंच जाते हैं। लेकिन मुंबई के दहिसर इलाके में एक कार के बोनट के अंदर जो नजारा देखने को मिला, उसने वहां मौजूद लोगों को हैरान कर दिया।

    दहिसर के कांदरपाड़ा स्थित बापू बागवे रोड पर एक रिहायशी परिसर में खड़ी कार के बोनट के अंदर करीब 7 फीट लंबा अजगर घुस गया। अजगर को कार के भीतर जाते देख आसपास मौजूद लोगों में हड़कंप मच गया। देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जमा हो गई।

    कार के बोनट में कैसे पहुंचा अजगर?

    बताया गया कि शनिवार दोपहर कार को परिसर में पार्क किया गया था। इसी दौरान कुछ लोगों की नजर एक विशाल अजगर पर पड़ी, जो धीरे-धीरे कार के निचले हिस्से की तरफ बढ़ रहा था। देखते ही देखते वह कार के बोनट के अंदर चला गया।

    जब लोगों को इसका पता चला तो उन्होंने तुरंत कार मालिक को जानकारी दी। इसके बाद सांप पकड़ने वाले विशेषज्ञ को बुलाया गया।

    इंजन के पुर्जों के बीच फंसा था अजगर

    रेस्क्यू एक्सपर्ट समीर गुप्ता मौके पर पहुंचे और कार का बोनट खोला। अंदर का नजारा देखकर हर कोई हैरान रह गया। विशालकाय अजगर इंजन के पुर्जों के बीच मजबूती से कुंडली मारकर बैठा हुआ था।

    रेस्क्यू टीम ने काफी सावधानी से अजगर को बाहर निकाला। वायरल हो रहे वीडियो में विशेषज्ञ को अजगर को कार के इंजन से सुरक्षित तरीके से निकालते हुए देखा जा सकता है।

    सुरक्षित जगह पर छोड़ा गया अजगर

    कड़ी मशक्कत के बाद अजगर को कार से बाहर निकाल लिया गया। इसके बाद उसे सुरक्षित तरीके से संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ दिया गया।

    इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में कार के बोनट से निकलता विशाल अजगर देखकर लोग हैरानी जता रहे हैं। बारिश के मौसम में सांपों के सुरक्षित जगहों की तलाश में घरों और वाहनों तक पहुंचने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।

  • धरती का ‘सर्वाइवल एक्सपर्ट’ है बिच्छू! महीनों बिना खाना और कई दिनों तक पानी में रह सकता है जिंदा.

    धरती का ‘सर्वाइवल एक्सपर्ट’ है बिच्छू! महीनों बिना खाना और कई दिनों तक पानी में रह सकता है जिंदा.

    Viral News : धरती का ‘सर्वाइवल एक्सपर्ट’ है बिच्छू! महीनों बिना खाना और कई दिनों तक पानी में रह सकता है जिंदा

    धरती पर कई ऐसे जीव पाए जाते हैं, जिनकी क्षमताएं इंसानों को हैरान कर देती हैं। इन्हीं में से एक है बिच्छू। दिखने में खतरनाक यह जीव सिर्फ अपने जहरीले डंक के लिए ही मशहूर नहीं है, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में लंबे समय तक जिंदा रहने की अपनी क्षमता के कारण भी बेहद खास माना जाता है। बिच्छू की सबसे हैरान करने वाली खूबियों में से एक है उसका लंबे समय तक बिना भोजन के रहना।

    जब उसे खाने की कमी का सामना करना पड़ता है, तो उसका मेटाबॉलिज्म काफी धीमा हो जाता है। इससे शरीर की ऊर्जा की खपत कम हो जाती है और वह लंबे समय तक उपलब्ध ऊर्जा के सहारे जीवित रह सकता है। इसी वजह से बिच्छू कई महीनों तक भोजन के बिना भी जिंदा रह सकता है। पानी में भी दिखाता है जबरदस्त सहनशक्तिबिच्छू के शरीर में सांस लेने से जुड़े विशेष अंग होते हैं, जिनकी मदद से वह कठिन परिस्थितियों में अपनी श्वसन गतिविधियों को बेहद कम कर सकता है।

    इसी कारण उसके अंदर कुछ समय तक पानी के भीतर भी जीवित रहने की क्षमता देखी गई है। हालांकि, पानी में कितने समय तक कोई बिच्छू जीवित रह सकता है, यह उसकी प्रजाति और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए छह दिनों तक बिना सांस लिए जिंदा रहने का दावा हर बिच्छू पर लागू नहीं किया जा सकता।

    यूवी लाइट में चमकने लगता है शरीरबिच्छू की एक और दिलचस्प विशेषता है कि कई प्रजातियां अल्ट्रावायलेट (UV) रोशनी में चमकती हुई दिखाई देती हैं। अंधेरे में जब उन पर UV लाइट डाली जाती है, तो उनका शरीर नीले-हरे रंग की चमक जैसा दिखाई दे सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह चमक बिच्छू के बाहरी शरीर की परत में मौजूद कुछ रासायनिक यौगिकों के कारण होती है।करोड़ों साल से धरती पर मौजूद है यह जीव.बिच्छुओं का विकासवादी इतिहास भी काफी पुराना है। इनके पूर्वजों के जीवाश्म करोड़ों साल पुराने हैं। बदलते पर्यावरण और कठिन परिस्थितियों के बीच इनके जीवित रहने की क्षमता इन्हें प्रकृति के बेहद सफल सर्वाइवर्स में शामिल करती है।

    हालांकि, बिच्छू को लेकर सोशल मीडिया पर कई बार ऐसे दावे भी वायरल होते रहते हैं जिनमें उसकी क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। मसलन, हर बिच्छू का एक बार भोजन करके ठीक एक साल तक जीवित रहना या हर प्रजाति का छह दिन तक पानी के भीतर बिना सांस लिए रहना वैज्ञानिक रूप से सार्वभौमिक तथ्य नहीं माना जा सकता।फिर भी, बिच्छू की कम ऊर्जा में लंबे समय तक जीवित रहने की क्षमता, कठिन परिस्थितियों को सहने की ताकत और UV रोशनी में चमकने वाला शरीर उसे दुनिया के सबसे दिलचस्प जीवों में जरूर शामिल करता है। यही खूबियां बताती हैं कि प्रकृति ने अलग-अलग जीवों को परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की कितनी अद्भुत क्षमता दी है।