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  •  रूस की जमीन से खुदाई में मिला अनमोल खजाना, 350 सिक्के ऐसे जो पहले किसी ने नहीं देखे.

     रूस की जमीन से खुदाई में मिला अनमोल खजाना, 350 सिक्के ऐसे जो पहले किसी ने नहीं देखे.

     रूस की जमीन से खुदाई में मिला अनमोल खजाना, 350 सिक्के ऐसे जो पहले किसी ने नहीं देखे.

    रूस में एक ऐसी खोज हुई है जिसने इतिहासकारों को भी हैरान कर दिया है. मॉस्को से तकरीबन 114 किलोमीटर दूर कोलोम्ना नाम के शहर में खुदाई चल रही थी, तभी जमीन के अंदर से एक मिट्टी का मटका निकला. इस मटके के अंदर था चांदी के 2600 सिक्कों का खजाना, जिसे देखकर ऐसा लगता है कि इसे किसी ने बड़ी ही सावधानी के साथ जमीन में छुपाया था.

    रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेज के आर्कियोलॉजी इंस्टीट्यूट का कहना है कि यह खजाना 14वीं-15वीं सदी का है और सबसे दिलचस्प बात ये कि इसमें 350 से ज्यादा सिक्के तो ऐसे हैं जिनका डिजाइन पहले कभी दुनिया के सामने आया ही नहीं.

    क्या है इस सिक्के की कहानी?

    उस जमाने में कोलोम्ना कोई मामूली शहर नहीं था, बल्कि आसपास के इलाके का दूसरा सबसे रईस और ताकतवर शहर हुआ करता था. एक्सपर्ट्स का अंदाजा है कि इतनी बड़ी दौलत किसी बहुत बड़े व्यापारी की या फिर किसी बड़े सरकारी अफसर की रही होगी.

    शायद उसे किसी खतरे का अंदेशा हुआ और उसने अपना सारा पैसा जमीन में छुपा दिया. खजाने में ज्यादातर सिक्के ‘देंगा’ नाम की पुरानी मुद्रा के हैं. ये सिक्के मॉस्को की राजशाही ने 14वीं सदी के अंत में ढालने शुरू किए थे. हिसाब कुछ ऐसा था दो देंगा से एक कोपेक बनता था, और सौ कोपेक मिलकर एक रूबल. रिसर्चर्स बताते हैं कि इस खजाने के ज्यादातर सिक्के कोलोम्ना में ही ढाले गए थे.

    ये सिक्के ग्रैंड प्रिंस वासिली प्रथम (1389-1425) और वासिली द्वितीय (1425-1462) के राज के हैं. उस दौर में मॉस्को और उसके आसपास का पूरा क्षेत्र एक तरह से खुदमुख्तार रियासत की तरह चलता था. इस पूरे खजाने में एक सिक्का सबसे ज्यादा ध्यान खींच रहा है – इस पर उड़ते हुए एक पक्षी की तस्वीर बनी है, और यह वासिली प्रथम के शासन के आखिरी दिनों का बताया जा रहा है.

    600 साल बाद खुला राज

    इसके अलावा जो 350 से ज्यादा सिक्के मिले हैं, वो इतने अनोखे हैं कि इनका जिक्र आज तक किसी पुराने रिकॉर्ड में नहीं मिलता. अभी एक्सपर्ट्स की टीम इन सिक्कों की धातु और बनावट को बारीकी से परख रही है, क्योंकि ये सिक्के 600 साल पुरानी रूसी अर्थव्यवस्था और व्यापार के कई राज खोल सकते हैं. इतिहासकारों के सामने सबसे बड़ी उलझन यही थी कि आखिर इतनी बड़ी दौलत को कोई जमीन में गाड़कर भूल कैसे सकता है. जवाब सिक्कों की तारीखों में ही छुपा मिला.

    मटके में मिले सबसे नए सिक्के 1420 के दशक के आखिरी सालों के हैं और इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि 1424 से 1427 के बीच रूस की रियासतों में एक भयानक प्लेग फैला था. जाहिर है, खजाने के मालिक ने महामारी से डरकर अपनी सारी दौलत सुरक्षित रखने के लिए जमीन में गाड़ी होगी. लेकिन बदकिस्मती से वह खुद उसी महामारी की चपेट में आ गया, और उसका यह राज 600 साल तक चुपचाप जमीन के अंदर ही दबा रहा.

  • सिर्फ 30 सेकंड में पूरा बरीटो चट कर गई ये महिला, हैरान कर देने वाला वीडियो वायरल.

    सिर्फ 30 सेकंड में पूरा बरीटो चट कर गई ये महिला, हैरान कर देने वाला वीडियो वायरल.

    सिर्फ 30 सेकंड में पूरा बरीटो चट कर गई ये महिला, हैरान कर देने वाला वीडियो वायरल.

    जब खाने की बात आती है, तो हम में से कई लोग शौकीन होते हैं, लेकिन ब्रिटेन की लिया शटकीवर (Leah Shutkever) ने जो कर दिखाया है, उस पर यकीन करना मुश्किल है. इस महिला ने अपनी तूफानी स्पीड से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. सोशल मीडिया पर इन दिनों उनका एक नया वीडियो आग की तरह फैल रहा है, जिसमें वह महज कुछ ही पलों में खाने की एक बड़ी प्लेट साफ करती नजर आ रही हैं.

    सिर्फ 30.75 सेकंड में खत्म किया पूरा बरीटो

    स्पीड ईटिंग की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुकी लिया ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (Guinness World Records) के मुताबिक, उन्होंने मात्र 30.75 सेकंड में एक पूरा बरीटो खाकर (Fastest Time To Eat A Burrito) नया वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है. वीडियो में देखा जा सकता है कि जैसे ही टाइमर शुरू होता है, लिया बिना एक पल गंवाए बरीटो पर टूट पड़ती हैं और देखते ही देखते उसे पूरी तरह से खत्म कर देती हैं. उनका यह कारनामा देखकर वहां मौजूद जज भी दंग रह गए.

    लीया शटकीवर के नाम हैं कई अनोखे रिकॉर्ड

    फूड लवर्स के बीच लिया कोई नया नाम नहीं है. वह अपनी गजब की स्पीड ईटिंग स्किल्स के दम पर पहले भी कई अजीबोगरीब रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी हैं. उनकी इस अद्भुत क्षमता और खाने की रफ्तार की वजह से सोशल मीडिया पर उनकी फैन फॉलोइंग काफी तगड़ी है. इस नए रिकॉर्ड के बाद गिनीज की तरफ से उन्हें आधिकारिक सर्टिफिकेट भी सौंपा गया है, जिसकी तस्वीरें इंटरनेट पर छाई हुई हैं.

    इंटरनेट पर वीडियो देख चकराए लोगों के सिर

    यह वायरल वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स तरह-तरह के मजेदार रिएक्शन दे रहे हैं. कोई उनकी इस सुपरफास्ट स्पीड की तारीफ कर रहा है, तो कोई हैरानी जताते हुए लिख रहा है, इतनी जल्दी में तो हम ढंग से पानी भी नहीं पी पाते, इन्होंने पूरा बरीटो कैसे गटक लिया? यही वजह है कि यह वीडियो इंटरनेट पर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है.

  • ‘मथुरा के कोतवाल’ का अद्भुत मंदिर, जहां बाल कृष्ण के दर्शन को कैलाश से आए थे महादेव, दर्शन से मिटता है कष्ट.

    ‘मथुरा के कोतवाल’ का अद्भुत मंदिर, जहां बाल कृष्ण के दर्शन को कैलाश से आए थे महादेव, दर्शन से मिटता है कष्ट.

    ‘मथुरा के कोतवाल’ का अद्भुत मंदिर, जहां बाल कृष्ण के दर्शन को कैलाश से आए थे महादेव, दर्शन से मिटता है कष्ट.

    श्रीकृष्ण व देवाधिदेव महादेव के बीच प्रगाढ़ प्रेम को दर्शाते देश-विदेश में कई देवालय हैं। इन मंदिरों में भक्ति के साथ शक्ति के अद्भुत मिलन के साथ ही भक्ति का बेहद सरल स्वरूप भी देखने को मिलता है। ऐसा ही दिव्य मंदिर उत्तर प्रदेश के श्रीकृष्ण नगरी मथुरा में है, जहां महादेव शहर के कोतवाल या रक्षक के रूप में विराजमान हैं।

    उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग मंदिर के बारे में जानकारी देने के साथ ही वहां के महत्व से भी अवगत कराता है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा केवल कृष्ण भक्ति का केंद्र नहीं है, बल्कि महादेव की अनन्य भक्ति का भी पावन साक्षी है। यहां स्थित प्राचीन श्री भूतेश्वर महादेव मंदिर सदियों पुरानी आस्था और अटूट विश्वास का प्रतीक है। पर्यटन विभाग इस शिवालय को मथुरा की यात्रा का अनिवार्य हिस्सा बताता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव मथुरा के क्षेत्रपाल (रक्षक) के रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण बाल स्वरूप में अवतरित हुए तो महादेव स्वयं कैलाश पर्वत से मथुरा पधारे थे। वे कृष्ण के बाल लीला के दर्शन करना चाहते थे।

    इसी कारण मथुरा की कोई भी यात्रा भूतेश्वर महादेव के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जिसे केदारनाथ का उपलिंग भी माना जाता है। मथुरा की जन्मभूमि से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर शहर को बुरी शक्तियों से बचाने वाला माना जाता है।

    शिवालय के बारे में प्रचलित मान्यता है कि भूतेश्वर महादेव यहां रहकर मथुरा और उसके निवासियों की रक्षा करते हैं, इसलिए इनका नाम भूतेश्वर या भूतों के स्वामी पड़ा। मंदिर की एक और रोचक कथा मथुरा की स्थापना से जुड़ी है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने मधु नामक राक्षस का वध किया और उसके बाद मथुरा शहर की स्थापना की। इसी ऐतिहासिक और पावन भूमि पर भूतेश्वर महादेव मंदिर हजारों वर्षों से मौजूद है। यह मथुरा का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है।

    स्थानीय लोग मानते हैं कि भूतेश्वर महादेव मंदिर शहर को नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर से बचाता है। यहां महादेव का जागृत स्वरूप और मनमोहक श्रृंगार भक्तों को असीम शांति और आत्मिक शक्ति प्रदान करता है। भक्तों का विश्वास है कि भूतेश्वर महादेव के दर्शन से मन की सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।भूतेश्वर महादेव मंदिर में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। मंदिर प्रतिदिन शाम 4 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है।

    मंदिर गर्रावकेंद्र के पास स्थित है। निकटतम बस स्टॉप शांति नगर स्थित मथुरा बस स्टॉप है, जो मंदिर से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर है। बस स्टॉप से मंदिर पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता है। ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है। वहीं, रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है, जो मंदिर से मात्र 3 किलोमीटर दूर है। दिल्ली, आगरा, जयपुर, लखनऊ आदि शहरों से मथुरा जंक्शन पर ट्रेनें उपलब्ध हैं।

  • 4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’, 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल..

    4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’, 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल..

    4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’, 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल..

    प्रकृति अपने अनोखे और दुर्लभ चमत्कारों से समय-समय पर लोगों को हैरान करती रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक बेहद दुर्लभ और विशालकाय फूल लोगों का ध्यान खींच रहा है। अपनी अनोखी बनावट और दुर्लभता के कारण इसे लोग ‘हिमालयी हीरा’ या ‘डायमंड फ्लावर’ कह रहे हैं।

    क्या है ‘हिमालयी हीरा’? सोशल मीडिया पर जिस पौधे को ‘डायमंड फ्लावर’ कहा जा रहा है, उसका वैज्ञानिक नाम रियम नोबाइल (Rheum nobile) है। स्थानीय क्षेत्रों में इसे पदमचाल या केन्जो के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पारदर्शी और चमकदार संरचना इसे अन्य पौधों से बिल्कुल अलग बनाती है, यही वजह है कि इसे ‘हिमालयी हीरा’ की उपाधि मिली है।जीवन में सिर्फ एक बार खिलता है फूलइस पौधे की सबसे अनोखी विशेषता इसका जीवन चक्र है। जहां अधिकांश पौधे हर साल फूल देते हैं, वहीं रियम नोबाइल अपने पूरे जीवन में केवल एक बार ही फूल देता है। इस प्रक्रिया में करीब 7 से 15 साल का समय लग सकता है। फूल खिलने के बाद धीरे-धीरे पौधे का जीवन चक्र समाप्त होने लगता है।ऊंचाई में इंसान को भी दे सकता है टक्करयह दुर्लभ पौधा अपनी लंबाई के लिए भी जाना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 3.2 फीट से 6.5 फीट तक पहुंच सकती है। वायरल वीडियो में यह पौधा पहाड़ों के बीच इंसानों के बराबर या उनसे भी ऊंचा दिखाई देता है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है।

    13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर होता है विकसितरियम नोबाइल सामान्य स्थानों पर नहीं उगता। यह हिमालय के दुर्गम और ठंडे इलाकों में समुद्र तल से लगभग 4,000 मीटर (करीब 13,000 फीट) या उससे अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है। कम ऑक्सीजन और बेहद कम तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में भी इसका विकसित होना प्रकृति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।वीडियो के बाद संरक्षण की उठी मांगसोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग इस दुर्लभ पौधे को छूते और तोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सोशल मीडिया यूजर्स ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतने दुर्लभ पौधों को नुकसान पहुंचाने के बजाय उनका संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी प्रकृति के इस अनमोल उपहार को देख सकें।

  • धरती पर नहीं, समुद्र के नीचे मिली नई दुनिया! वैज्ञानिकों की खोज से बढ़ा रोमांच.

    धरती पर नहीं, समुद्र के नीचे मिली नई दुनिया! वैज्ञानिकों की खोज से बढ़ा रोमांच.

    धरती पर नहीं, समुद्र के नीचे मिली नई दुनिया! वैज्ञानिकों की खोज से बढ़ा रोमांच.

    वैज्ञानिकों ने बताया कि इस क्षेत्र में जेलीफिश, ऑक्टोपस, केकड़े, मछलियां और कई अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए गए. वैज्ञानिकों ने यहां दुर्लभ ‘जायंट फैंटम जेलीफिश’ को भी देखा, जिसे दुनिया की सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश प्रजातियों में गिना जाता है.

    समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने ऐसी अद्भुत दुनिया खोजी है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है. हाल ही में दक्षिण अटलांटिक महासागर में एक रिसर्च अभियान के दौरान शोधकर्ताओं ने एक विशाल कोरल रीफ (मूंगा चट्टान) की खोज की है. यह रीफ लगभग वैटिकन सिटी के आकार जितना बड़ा बताया जा रहा है और समुद्री जीवों से भरा हुआ है. बताया गया कि वैज्ञानिक समुद्र के भीतर मौजूद ‘कोल्ड सीप्स’ यानी ऐसे स्थानों की तलाश कर रहे थे, जहां समुद्र की गहराई से गैस और खनिज निकलते हैं. लेकिन खोज के दौरान उन्हें विशाल और जीवंत कोरल साम्राज्य मिल गया. यह रीफ दुर्लभ प्रजाति के कोरल बैथेलिया कैंडिडा से बना है और इसे इस प्रजाति का अब तक का सबसे बड़ा रीफ माना जा रहा है.

    समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने क्या-क्या खोजा

    वैज्ञानिकों ने बताया कि इस क्षेत्र में जेलीफिश, ऑक्टोपस, केकड़े, मछलियां और कई अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए गए. वैज्ञानिकों ने यहां दुर्लभ ‘जायंट फैंटम जेलीफिश’ को भी देखा, जिसे दुनिया की सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश प्रजातियों में गिना जाता है. समुद्र की गहराई में रिकॉर्ड किए गए वीडियो में रंग-बिरंगे कोरल, समुद्री जीवों की हलचल और जीवन से भरा पूरा पारिस्थितिकी तंत्र साफ नजर आया. सबसे दिलचस्प बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इस अभियान के दौरान 28 ऐसी प्रजातियां भी इकट्ठा की हैं, जिन्हें विज्ञान की दुनिया के लिए नई प्रजातियां माना जा रहा है. अगर आगे की जांच में इसकी पुष्टि होती है, तो यह समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि होगी.

    क्या बोलो एक्सपर्ट्स

    मामले में एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसी खोजें समुद्री जीवों की विविधता समझने में मदद करती हैं. इससे यह भी पता चलता है कि समुद्र की गहराइयों में अभी भी बहुत कुछ ऐसा छिपा है, जिसके बारे में इंसानों को जानकारी नहीं है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये खोज एक बार फिर साबित करती है कि पृथ्वी पर अभी भी कई रहस्य बाकी हैं और समुद्र की गहराइयों में ऐसी अनदेखी दुनियाएं मौजूद हैं, जो हर नई खोज के साथ हमें चौंका रही हैं.

  • बुध ग्रह के रहस्य से उठेगा पर्दा, बेपीकोलंबो मिशन पहुंचा अहम पड़ाव; जानिए क्यों खास है यह अभियान.

    बुध ग्रह के रहस्य से उठेगा पर्दा, बेपीकोलंबो मिशन पहुंचा अहम पड़ाव; जानिए क्यों खास है यह अभियान.

    बुध ग्रह के रहस्य से उठेगा पर्दा, बेपीकोलंबो मिशन पहुंचा अहम पड़ाव; जानिए क्यों खास है यह अभियान.

    सूर्य के सबसे करीब स्थित और सौरमंडल के सबसे छोटे ग्रह बुध (Mercury) को लेकर वैज्ञानिकों के सामने आज भी कई बड़े सवाल हैं। इस रहस्यमयी ग्रह को करीब से समझने के लिए यूरोप और जापान का संयुक्त अंतरिक्ष मिशन बेपीकोलंबो (BepiColombo) अब अपनी लंबी यात्रा के बेहद महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गया है।

    करीब एक दशक से चल रही इस अंतरिक्ष यात्रा के बाद मिशन का अंतरिक्ष यान बुध के और करीब पहुंच रहा है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस अभियान के जरिए ग्रह की सतह, आंतरिक संरचना, चुंबकीय क्षेत्र और वहां होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों के बारे में कई अहम जानकारियां मिल सकती हैं।

    अंतिम चरण में पहुंचा बेपीकोलंबो मिशन

    बेपीकोलंबो मिशन के दो अंतरिक्ष यान अपने क्रूजर से अलग होकर बुध की कक्षा में प्रवेश की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। इस प्रक्रिया की पुष्टि अंतरिक्ष यान से आने वाले रेडियो संकेतों के जरिए की गई।

    मिशन की निगरानी यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के नियंत्रण केंद्र से की जा रही है। वैज्ञानिकों और मिशन टीम के लिए यह चरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब अंतरिक्ष यान अपने अंतिम लक्ष्य यानी बुध की कक्षा में पहुंचने की तैयारी कर रहा है।

    योजना के मुताबिक, बेपीकोलंबो को नवंबर में बुध की कक्षा में प्रवेश करना है। इसके बाद दिसंबर में दोनों अंतरिक्ष यान अलग-अलग हो जाएंगे और अलग-अलग कक्षाओं से बुध का अध्ययन शुरू करेंगे।

    2018 में हुई थी मिशन की शुरुआत

    बेपीकोलंबो को वर्ष 2018 में लॉन्च किया गया था। इसका नाम इतालवी गणितज्ञ और वैज्ञानिक ज्यूसेपे ‘बेपी’ कोलंबो के सम्मान में रखा गया है। उन्होंने बुध के अध्ययन से जुड़े नासा के मेरिनर-10 मिशन की योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

    बुध की खोज आसान नहीं है। सूर्य के बेहद करीब होने के कारण किसी अंतरिक्ष यान के लिए वहां पहुंचना और फिर उसकी कक्षा में स्थिर होना बेहद चुनौतीपूर्ण काम है। इसी वजह से बेपीकोलंबो को सीधे बुध की ओर भेजने के बजाय कई ग्रहों के पास से फ्लाईबाई कराकर उसकी गति और ऊर्जा को नियंत्रित किया गया।

    मिशन को बुध की कक्षा तक पहुंचने के लिए कुल नौ फ्लाईबाई करनी पड़ीं। जनवरी 2025 में इसकी आखिरी फ्लाईबाई हुई थी। इस दौरान बुध की सतह की कई शानदार तस्वीरें भी सामने आई थीं।

    आखिर बुध ग्रह वैज्ञानिकों के लिए इतना बड़ा रहस्य क्यों है?

    बुध आकार में छोटा है, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए इससे जुड़े सवाल बेहद बड़े हैं। यह सूर्य के सबसे करीब स्थित ग्रह है और इसकी सतह पर विशाल प्रभाव गड्ढे, ज्वालामुखीय मैदान तथा दूसरी अनोखी संरचनाएं मौजूद हैं।

    वैज्ञानिक यह समझना चाहते हैं कि बुध का निर्माण किस तरह हुआ और सूर्य के इतने करीब होने के बावजूद इसकी वर्तमान संरचना कैसे बनी।

    इसके अलावा ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र और इसके अंदर मौजूद भारी धात्विक कोर को लेकर भी कई सवाल हैं।

    बुध की सतह पर मौजूद हैं रहस्यमयी ‘हॉलोज’

    बेपीकोलंबो मिशन बुध की सतह पर मौजूद ‘हॉलोज’ नाम की गड्ढेनुमा संरचनाओं का भी अध्ययन करेगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इन संरचनाओं के निर्माण और उनके धीरे-धीरे बदलने के पीछे सतह से कुछ खनिजों के वाष्पीकृत होने जैसी प्रक्रियाएं जिम्मेदार हो सकती हैं।

    मिशन से मिलने वाला नया डेटा यह समझने में मदद कर सकता है कि बुध की सतह समय के साथ किस तरह बदल रही है।

    एक ही ग्रह पर आग जैसी गर्मी और जमा देने वाली ठंड

    बुध की सबसे हैरान करने वाली विशेषताओं में से एक यहां का तापमान है। ग्रह के कुछ हिस्सों में तापमान करीब 427 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। वहीं, इसके ध्रुवीय क्षेत्रों में ऐसी गहरी क्रेटर संरचनाएं हैं जहां सूर्य की रोशनी कभी नहीं पहुंचती।

    इन स्थायी रूप से छायादार इलाकों में बर्फ मौजूद होने के प्रमाण मिले हैं। यानी एक तरफ बुध की सतह बेहद गर्म है, जबकि दूसरी तरफ उसी ग्रह के कुछ हिस्सों में पानी की बर्फ लंबे समय से जमी हो सकती है।

    मिशन में क्या-क्या होगा अध्ययन?

    बेपीकोलंबो के अलग-अलग वैज्ञानिक उपकरण बुध के कई पहलुओं का अध्ययन करेंगे। इनमें मुख्य रूप से—

    • बुध के चुंबकीय क्षेत्र की जांच
    • ग्रह के घने और भारी आंतरिक भाग का अध्ययन
    • सतह की संरचना और खनिजों का विश्लेषण
    • ग्रह पर होने वाली भूगर्भीय गतिविधियों की जांच
    • सतह पर मौजूद रहस्यमयी संरचनाओं का अध्ययन
    • बुध के निर्माण और विकास से जुड़े सवालों के जवाब तलाशना

    शामिल हैं।

    सूर्य के बेहद करीब होने के कारण इस मिशन के अंतरिक्ष यान को अत्यधिक गर्मी का सामना करना पड़ेगा। मिशन को तैयार करने वाले इंजीनियरों के लिए यह सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रही है।

    वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि बेपीकोलंबो से मिलने वाला डेटा बुध के साथ-साथ शुरुआती सौरमंडल के निर्माण को समझने में भी मदद करेगा। अगर मिशन सफल रहता है, तो यह सूर्य के सबसे करीब स्थित इस छोटे लेकिन रहस्यमयी ग्रह के कई अनसुलझे सवालों के जवाब खोजने में अहम भूमिका निभा सकता है।

  • राजस्थान में भगवान देव नारायण की आस्था से जुड़ा अनोखा गांव, जहां नहीं लगते घरों में ताले..

    राजस्थान में भगवान देव नारायण की आस्था से जुड़ा अनोखा गांव, जहां नहीं लगते घरों में ताले..

    राजस्थान में भगवान देव नारायण की आस्था से जुड़ा अनोखा गांव, जहां नहीं लगते घरों में ताले

    देश-दुनिया के कोने-कोने में कई खूबसूरत और आस्था को प्रगाढ़ करते देवालय हैं, जिनके शिखर मात्र से भक्तों का मन प्रसन्न हो जाता है। मात्र देवालय या शिखर ही नहीं बल्कि मंदिर के आस पास की जगह भी बेहद खूबसूरत और उससे जुड़ी कथा हैरत में डालती है।

    ऐसा ही नारायण को समर्पित राजस्थान में एक खूबसूरत गांव है, जो नारायण को समर्पित है। खास बात है कि नारायण के इस गांव में मिट्टी के कच्चे घरों में कभी ताले नहीं लगते और साल 2024 में बेस्ट टूरिज्म विलेज का खिताब भी मिल चुका है। राजस्थान की अरावली पर्वत शृंखला की गोद में बसा एक अनोखा गांव आज पूरे देश और दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। नाम है देवमाली।

    अजमेर जिले के ब्यावर क्षेत्र का यह छोटा सा गांव न केवल अपनी प्राचीन मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं ने इसे भारत का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव बना दिया है।साल 2024 में केंद्र सरकार के पर्यटन विभाग ने विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर देवमाली गांव को बेस्ट टूरिज्म विलेज का प्रतिष्ठित खिताब प्रदान किया था।

    यह पुरस्कार ब्यावर के तत्कालीन कलेक्टर और गांव की सरपंच ने ग्रहण किया था। राजस्थान पर्यटन विभाग भी इस गांव को विशेष रूप से प्रचारित कर रहा है।देवमाली गांव भगवान देव नारायण को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि लगभग एक हजार वर्ष पहले जब देव नारायण भगवान यहां पधारे थे, तो गांव के सभी पत्थर और चट्टानें उन्हें नमन करने के लिए झुक गई थीं। आज भी गांव के चारों ओर झुकी हुई चट्टानें इस पौराणिक कथा की गवाही देती हैं।

    देवमाली की सबसे बड़ी खासियत यहां के घर हैं। पूरे गांव में कोई भी पक्का मकान नहीं बनाया जाता। घर केवल पीली मिट्टी और गाय के गोबर से बनाए जाते हैं। हर दो-तीन महीने में इनकी लिपाई-पुताई होती है, जिसे शुद्धिकरण माना जाता है। गांववासी मानते हैं कि भगवान देव नारायण ने वचन दिया था, “मेरा मंदिर पक्का रखो, तुम्हारे घर कच्चे रखो”। इस परंपरा को आज भी सख्ती से निभाया जाता है।

    सबसे अनोखी बात यहां के घरों में कभी ताले नहीं लगते।गांववासी गर्व से कहते हैं कि सदियों से यहां न चोरी होती है और न कोई विवाद। चाहे कोई करोड़पति हो या साधारण किसान, सब एक समान कच्चे घरों में रहते हैं। व्यसनों पर भी पूर्ण प्रतिबंध है, न शराब, न मांस का उपयोग होता है।

    शनिवार को दूध नहीं बेचा जाता, उसे खीर बनाकर या पड़ोसियों में बांट दिया जाता है।देवमाली पर्यटकों को पारंपरिक ग्रामीण जीवन का शानदार अनुभव कराता है। राष्ट्रीय राजमार्ग से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव अरावली की हरी-भरी वादियों से घिरा हुआ है। यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन देव नारायण मंदिर के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि मंदिर में दर्शन करने व मत्था टेकने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।

  • 40 साल तक दराज में पड़ा रहा ‘पत्थर’, जांच हुई तो निकला करोड़ों साल पुराना डायनासोर का जीवाश्म.

    40 साल तक दराज में पड़ा रहा ‘पत्थर’, जांच हुई तो निकला करोड़ों साल पुराना डायनासोर का जीवाश्म.

    दुनिया में कई बार ऐसी चीजें सामने आती हैं, जिनकी असली पहचान सामने आने में दशकों लग जाते हैं। अंटार्कटिका से जुड़ी एक ऐसी ही हैरान करने वाली खोज इन दिनों चर्चा में है। करीब 40 साल तक एक दराज में सामान्य पत्थर की तरह पड़ा एक नमूना जब वैज्ञानिकों की नजर में आया और उसकी गहराई से जांच की गई, तो उसकी असली पहचान ने सभी को चौंका दिया।

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिसे इतने वर्षों तक मामूली पत्थर समझकर रखा गया था, वह दरअसल एक दुर्लभ डायनासोर की पूंछ की हड्डी का जीवाश्म निकला।

    1985 में अंटार्कटिका से मिला था नमूना

    इस जीवाश्म की कहानी करीब चार दशक पुरानी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1985 में अंटार्कटिका में एक वैज्ञानिक अभियान के दौरान यह नमूना मिला था। खोज के बाद इसे ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के कैम्ब्रिज स्थित भूवैज्ञानिक संग्रह में सुरक्षित रख दिया गया।

    नमूना वहां लंबे समय तक पड़ा रहा, लेकिन इसकी विस्तृत वैज्ञानिक जांच नहीं हो सकी। हाल के वर्षों में जब विशेषज्ञों ने पुराने जीवाश्मों और भूवैज्ञानिक नमूनों की दोबारा जांच शुरू की, तब यह नमूना भी उनके सामने आया।

    इसके बाद इसकी बारीकी से जांच की गई और पता चला कि यह कोई साधारण चट्टान नहीं है।

    जांच में सामने आई डायनासोर की कहानी

    वैज्ञानिकों की जांच में संकेत मिला कि यह टाइटेनोसॉर नाम के विशाल शाकाहारी डायनासोर की पूंछ की हड्डी का हिस्सा है।

    टाइटेनोसॉर विशाल आकार वाले शाकाहारी डायनासोरों का एक समूह था। इनके जीवाश्म दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मिले हैं। लेकिन अंटार्कटिका से डायनासोर के जीवाश्मों का मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है।

    यही वजह है कि करीब 40 साल तक संग्रह में रखे इस नमूने की पहचान सामने आने के बाद वैज्ञानिकों की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है।

    आज बर्फ से ढका अंटार्कटिका कभी था हरा-भरा

    आज अंटार्कटिका का नाम सुनते ही बर्फ से ढका विशाल इलाका आंखों के सामने आता है। लेकिन करोड़ों साल पहले इस महाद्वीप का वातावरण बिल्कुल अलग था।

    वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी के प्राचीन इतिहास के अलग-अलग दौर में अंटार्कटिका का मौसम आज की तुलना में काफी गर्म रहा होगा। यहां वनस्पतियां और जंगल मौजूद थे और विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु भी रहते थे।

    डायनासोर का यह जीवाश्म उसी प्राचीन दुनिया की झलक देता है। इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि उस समय अंटार्कटिका का पर्यावरण कैसा था और वहां रहने वाले जीव किस तरह के थे।

    पुराने संग्रहों में छिपे हैं कई और राज

    इस खोज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दुनिया के संग्रहालयों और शोध संस्थानों में दशकों पुराने हजारों जीवाश्म और भूवैज्ञानिक नमूने सुरक्षित रखे हुए हैं। इनमें से कई की पहचान या वैज्ञानिक महत्व अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।

    नई तकनीकों और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों के जरिए अब पुराने नमूनों की दोबारा जांच की जा रही है। ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में वैज्ञानिकों को पुराने संग्रहों से ही कई और महत्वपूर्ण जीवाश्म मिलें।

    40 साल बाद बदली एक ‘पत्थर’ की पहचान

    करीब चार दशक तक दराज में पड़े इस नमूने की कहानी यह बताती है कि वैज्ञानिक खोज हमेशा नई जगह पर खुदाई करने से ही नहीं होती। कई बार किसी संग्रह में वर्षों से रखी चीज भी बड़े वैज्ञानिक रहस्य का जवाब अपने अंदर छिपाए होती है।

    जिस नमूने को कभी साधारण पत्थर समझकर रख दिया गया था, वही अब अंटार्कटिका के प्राचीन इतिहास और डायनासोरों की दुनिया को समझने में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण सुराग बन गया है।

  • डार्क मैटर की खोज में वैज्ञानिकों को मिला रहस्यमयी संकेत, वैज्ञानिकों ने कहा- अभी और सबूत जरूरी..

    डार्क मैटर की खोज में वैज्ञानिकों को मिला रहस्यमयी संकेत, वैज्ञानिकों ने कहा- अभी और सबूत जरूरी..

    नई दिल्ली। ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों में शामिल डार्क मैटर को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक दिलचस्प संकेत मिला है। अमेरिका में जमीन के करीब एक मील नीचे स्थापित एक बेहद संवेदनशील डिटेक्टर ने एक ऐसी घटना रिकॉर्ड की है, जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इसे डार्क मैटर की सीधी खोज कहना अभी जल्दबाजी होगी।

    LZ डिटेक्टर ने दर्ज किया खास संकेत

    यह संकेत LUX-ZEPLIN (LZ) नाम के डिटेक्टर से मिला है। इसे दुनिया के सबसे संवेदनशील डार्क मैटर डिटेक्टरों में माना जाता है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसके जरिए ऐसे कणों की तलाश कर रहे हैं, जो डार्क मैटर के रहस्य को समझने में मदद कर सकें।

    करीब 250 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम ने लगभग दो साल तक डिटेक्टर से मिले डेटा का विश्लेषण किया। इस टीम में छह देशों के 39 संस्थानों से जुड़े शोधकर्ता शामिल हैं।

    विश्लेषण के दौरान वैज्ञानिकों को एक ऐसी घटना दिखाई दी, जिसमें किसी कण के एक परमाणु से टकराने के संकेत मिले। यही घटना अब वैज्ञानिकों के लिए खास दिलचस्पी का विषय बनी हुई है।

    क्या यह WIMP कण हो सकता है?

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस घटना के पीछे WIMP यानी Weakly Interacting Massive Particle की भूमिका हो सकती है। WIMP को डार्क मैटर के संभावित कणों में से एक माना जाता है।

    वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर डार्क मैटर का कोई कण सामान्य पदार्थ के परमाणु से टकराता है, तो उससे बेहद कमजोर संकेत पैदा हो सकता है। LZ जैसे डिटेक्टरों को इसी तरह के बेहद सूक्ष्म संकेतों को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है।

    हालांकि, सिर्फ एक घटना के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वैज्ञानिकों ने वास्तव में डार्क मैटर का कण पकड़ लिया है।

    2.6 सिग्मा का संकेत कितना महत्वपूर्ण?

    इस घटना को वैज्ञानिकों की ओर से 2.6 सिग्मा का महत्व दिया गया है। विज्ञान में सिग्मा का इस्तेमाल किसी परिणाम की सांख्यिकीय मजबूती को समझने के लिए किया जाता है।

    आमतौर पर किसी नई वैज्ञानिक खोज को बेहद मजबूत प्रमाण मानने के लिए करीब 5 सिग्मा का स्तर महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में 2.6 सिग्मा का परिणाम दिलचस्प तो है, लेकिन इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिक गैटस्कैल ने भी स्पष्ट किया है कि टीम यह दावा नहीं कर रही कि उसने डार्क मैटर की खोज कर ली है। उनके मुताबिक, वैज्ञानिकों ने जरूर कुछ असामान्य और दिलचस्प देखा है, लेकिन इसकी सही व्याख्या के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।

    आखिर क्या है डार्क मैटर?

    डार्क मैटर ब्रह्मांड के उन रहस्यमयी घटकों में से है, जिन्हें सीधे देखा नहीं जा सकता। यह सामान्य पदार्थ की तरह प्रकाश को उत्सर्जित या परावर्तित नहीं करता, इसलिए इसे सीधे पहचानना बेहद मुश्किल है।

    फिर भी वैज्ञानिकों को इसके अस्तित्व के मजबूत संकेत मिलते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण इसका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव है, जो आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड में मौजूद दूसरी वस्तुओं की गति को प्रभावित करता है।

    वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, ब्रह्मांड के कुल पदार्थ का लगभग 85 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर हो सकता है। यही वजह है कि इसके वास्तविक स्वरूप और कणों की पहचान करना आधुनिक भौतिकी के सबसे बड़े सवालों में से एक बना हुआ है।

    LZ डिटेक्टर से मिला नया संकेत इस रहस्य को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुराग जरूर हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों को इसे पुख्ता खोज मानने के लिए अभी और डेटा तथा स्वतंत्र प्रमाणों की जरूरत होगी।

  • ग्रह आखिर गोल ही क्यों होते हैं? चौकोर या पिरामिड जैसे क्यों नहीं, जानिए गुरुत्वाकर्षण का पूरा खेल.

    ग्रह आखिर गोल ही क्यों होते हैं? चौकोर या पिरामिड जैसे क्यों नहीं, जानिए गुरुत्वाकर्षण का पूरा खेल.

    रात के आसमान में चमकते ग्रहों को देखकर शायद ही कभी किसी के मन में यह सवाल आया हो कि आखिर ग्रहों का आकार गोल क्यों होता है? क्या वे चौकोर, त्रिकोण या पिरामिड जैसे भी हो सकते थे? इसका जवाब सीधे तौर पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) से जुड़ा है।

    सौरमंडल के सभी ग्रह आकार और संरचना में एक-दूसरे से काफी अलग हैं। कोई चट्टानी है तो कोई गैसों से बना विशाल ग्रह। इसके बावजूद इन सभी में एक समानता है—ये सभी लगभग गोलाकार हैं। इसके पीछे ग्रह का अपना गुरुत्वाकर्षण सबसे बड़ी भूमिका निभाता है।

    कैसे बनते हैं ग्रह?

    ग्रहों के बनने की प्रक्रिया में अंतरिक्ष में मौजूद धूल, गैस और छोटे-छोटे चट्टानी टुकड़े धीरे-धीरे एक-दूसरे से टकराकर जुड़ते हैं। समय के साथ जब इन पदार्थों की मात्रा बढ़ती जाती है, तो उनका गुरुत्वाकर्षण भी मजबूत होने लगता है।

    एक समय ऐसा आता है जब यह गुरुत्वाकर्षण आसपास मौजूद दूसरे पदार्थों को अपनी ओर खींचने लगता है। इस तरह ग्रह का आकार लगातार बढ़ता जाता है और वह अपने आसपास के क्षेत्र में मौजूद काफी मात्रा में पदार्थ को भी आकर्षित कर लेता है।

    गुरुत्वाकर्षण ग्रह को गोल कैसे बनाता है?

    किसी बड़े खगोलीय पिंड में गुरुत्वाकर्षण उसके केंद्र से हर दिशा में पदार्थ को अपनी ओर खींचता है। जब किसी ग्रह का आकार काफी बड़ा हो जाता है, तो यह खिंचाव उसकी सतह को अधिक समान रूप में ढालने लगता है।

    मान लीजिए ग्रह की सतह पर कहीं कोई हिस्सा बहुत ज्यादा बाहर निकला हुआ है। गुरुत्वाकर्षण उस अतिरिक्त पदार्थ को धीरे-धीरे अंदर की ओर खींचने की कोशिश करेगा। इसी तरह ग्रह के अलग-अलग हिस्सों पर गुरुत्वाकर्षण का असर पड़ता रहता है।

    लंबे समय तक चलने वाली इस प्रक्रिया का परिणाम एक ऐसा आकार होता है जो लगभग गोल दिखाई देता है।

    यही कारण है कि किसी बड़े ग्रह का लंबे समय तक क्यूब या पिरामिड जैसे कोणीय आकार में बने रहना स्वाभाविक नहीं है। गुरुत्वाकर्षण ऐसे उभरे हुए कोनों और किनारों को समतल करने की दिशा में काम करता है।

    क्या सभी ग्रह बिल्कुल गोल होते हैं?

    यह कहना सही नहीं होगा कि हर ग्रह पूरी तरह परफेक्ट गेंद की तरह गोल है। वास्तव में ज्यादातर ग्रह लगभग गोलाकार होते हैं, लेकिन उनके घूमने की गति के कारण उनमें थोड़ा बदलाव आ जाता है।

    बुध और शुक्र अपेक्षाकृत ज्यादा गोलाकार ग्रह हैं। वहीं बृहस्पति और शनि जैसे तेजी से घूमने वाले ग्रह अपने ध्रुवों के पास कुछ चपटे दिखाई देते हैं।

    इसका कारण उनकी तेज घूर्णन गति है।

    तेजी से घूमने पर ग्रह क्यों चपटा हो जाता है?

    जब कोई ग्रह अपनी धुरी पर घूमता है, तो उसकी भूमध्य रेखा के आसपास का हिस्सा बाहर की ओर उभरने लगता है। इसे इक्वेटोरियल बल्ज यानी भूमध्यरेखीय उभार कहा जाता है।

    सरल शब्दों में समझें तो ग्रह का गुरुत्वाकर्षण पदार्थ को केंद्र की ओर खींचता है, जबकि घूर्णन के कारण भूमध्य रेखा के आसपास बाहर की ओर प्रभाव पैदा होता है। दोनों के बीच संतुलन बनने से ग्रह पूरी तरह गोल न रहकर थोड़ा चपटा हो जाता है।

    शनि सबसे ज्यादा चपटा ग्रहों में से एक

    सौरमंडल में शनि का भूमध्यरेखीय उभार काफी ज्यादा है। इसकी भूमध्यरेखीय चौड़ाई ध्रुवों के बीच की चौड़ाई से लगभग 10.7 फीसदी अधिक है।

    बृहस्पति में यह अंतर करीब 6.9 फीसदी है। इसलिए दोनों ग्रहों को पूरी तरह गोल गेंद की बजाय थोड़ा चपटे आकार के रूप में समझना ज्यादा सही होगा।

    दूसरी ओर पृथ्वी और मंगल अपेक्षाकृत छोटे और धीमी गति से घूमने वाले ग्रह हैं, इसलिए उनमें यह प्रभाव काफी कम दिखाई देता है। पृथ्वी की भूमध्यरेखीय चौड़ाई ध्रुवीय चौड़ाई से करीब 0.3 फीसदी ज्यादा है, जबकि मंगल में यह अंतर लगभग 0.6 फीसदी है।

    यूरेनस और नेपच्यून में भी घूर्णन के कारण कुछ चपटापन मौजूद है।

    आखिर चौकोर ग्रह क्यों नहीं बनते?

    किसी ग्रह का चौकोर या पिरामिड जैसा आकार बनाए रखने के लिए उसके कोनों और किनारों को लंबे समय तक अपनी जगह पर टिके रहना होगा। लेकिन बड़े खगोलीय पिंडों में गुरुत्वाकर्षण लगातार पदार्थ को उनके केंद्र की ओर खींचता रहता है।

    इसलिए जैसे-जैसे ग्रह पर्याप्त बड़ा और भारी होता जाता है, गुरुत्वाकर्षण उसके अनियमित हिस्सों को कम करता जाता है और आकार लगभग गोल हो जाता है।

    यानी ग्रहों के गोल होने की वजह यह नहीं है कि अंतरिक्ष में हर चीज स्वाभाविक रूप से गेंद जैसी होती है, बल्कि ग्रह के विशाल आकार और उसके गुरुत्वाकर्षण का लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव इसका मुख्य कारण है।

    छोटे अंतरिक्ष पिंड, जैसे कई क्षुद्रग्रह, इस नियम का अलग रूप दिखाते हैं। उनका गुरुत्वाकर्षण इतना मजबूत नहीं होता कि वे अपनी पूरी सतह को गोलाकार बना सकें। इसलिए वे अक्सर टेढ़े-मेढ़े और अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।