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  • दुनिया का सबसे चर्चित लकी चार्म बना Charging Bull, जानिए इसका खास हिस्सा क्यों छूते हैं लोग!

    दुनिया का सबसे चर्चित लकी चार्म बना Charging Bull, जानिए इसका खास हिस्सा क्यों छूते हैं लोग!

    दुनिया का सबसे चर्चित लकी चार्म बना Charging Bull, जानिए इसका खास हिस्सा क्यों छूते हैं लोग!

    Charging Bull: न्यूयॉर्क शहर के वित्तीय (financial) जिले में स्थित है चार्जिंग बुल (Charging Bull) केवल एक कांस्य की मूर्ति भर नहीं है, बल्कि यह दुनियाभर में आर्थिक शक्ति, समृद्धि और उम्मीद का प्रतीक बन चुकी है.

    New York के वॉल स्ट्रीट के पास स्थापित यह विशालकाय मूर्ति रोजाना सैकड़ों पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है. खास बात यह है कि, इस मूर्ति से जुड़ी एक अजीबोगरीब परंपरा भी समय के साथ विकसित हो गई है, जिसने इसे और ज्यादा चर्चा का विषय बना दिया है.

    इसका स्थान और भव्यता इसकी लोकप्रियता बढ़ाती है।

    साल 1989 में इटालियन मूर्तिकार आर्टुरो डि मोडिका ने इसे एक गुरिल्ला आर्ट इंस्टॉलेशन के रूप में न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज के सामने स्थापित किया था. शुरुआत में इसे अवैध मानकर हटा दिया गया, लेकिन स्थानीय लोगों ने इस बात का विरोध किया जिसके बाद इसे पास ही एक स्थायी स्थान पर स्थापित कर दिया गया. तब से लेकर आज तक चार्जिंग बुल की यह मूर्ति पूरी दुनिया के लिए एक अलग पहचान बन चुकी है.

    Charging Bull शेयर मार्केट और मजबूती का प्रतीक

    चार्जिंग बुल को अक्सर वॉल स्ट्रीट और शेयर मार्केट की मजबूती और तेजी से जोड़कर देखा जाता है. दुनियाभर से आने वाले पर्यटक इसे पैसा, ताकत और वित्तीय सफलता से जोड़ते हैं. हालांकि मूर्तिकार की सोच इससे थोड़ी अलग थी.

    उनके मुताबिक, यह मूर्ति अमेरिका की मेहनत, हिम्मत और आगे बढ़ने की भावना को दर्शाती है. एक ऐसा संदेश जो हर व्यक्ति को प्रेरित करना का काम करता है कि वह कठिनाइयों को पार कर सफलता हासिल कर सकते हैं.

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    Testicles छूने के पीछे लोकप्रिय मान्यता

    बीतते समय के साथ इस मूर्ति के साथ एक लोकप्रिय मान्यता जुड़ती चली गई कि, इसे छूने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है. कई पर्यटक इस विश्वास के साथ मूर्ति के testicles को छूते हैं, ताकि उनका पोर्टफोलियो सही हो जाए और आर्थिक संपन्नता बरकरार रहे. यही वजह है कि, बड़ी संख्या में लोग इसे हिस्से को छूकर अपनी तस्वीरें खिंचवाते हैं.

    हालांकि इस विश्वास का कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन इसे शक्ति, ऊर्जा और ऊर्वरता के रूप में देखा जाता है. कई पर्यटक इसे आर्थिक संपन्नता और सफलता से जोड़कर देखते हैं, जबकि कुछ के लिए यह केवल एक अनोखा और यादगार अनुभव होता है.

    चार्जिंग बुल की लोकप्रियता का बड़ा कारण?

    इस तरह की मान्यताएं कोई नई बात नहीं है, बल्कि दुनिया भर में कई ऐतिहासिक मूर्तियों और स्मारकों के साथ भी ऐसी ही परंपराएं जुड़ी हुई हैं, जहां लोग किसी खास हिस्से को छूकर सौभाग्य और खुशहाली की कामना करते हैं. इस तरह की परंपराएं मानव स्वभाव का हिस्सा है, कि हम खास प्रतीकों को छूते हैं, तो हमारी नकारात्मक ऊर्जा पॉजिटिव एनर्जी में बदल जाती है.

    चार्जिंग बुल की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उसका स्थान भी है. वॉल स्ट्रीट के पास होने के कारण यह आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में खड़ा है, जो इसे और भी ज्यादा प्रासंगिक बनाते हैं. इसके साथ ही इसकी सभ्यता भव्यता और कलात्मक भी लोगों को अपनी और खींचती है.

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    Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि Satyareport.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

  • कपल ने पुरानी बैंक बिल्डिंग को बना डाला घर, आज बनी 1.3 मिलियन डॉलर की प्रॉपर्टी, जानें कैसे बदली किस्मत.

    कपल ने पुरानी बैंक बिल्डिंग को बना डाला घर, आज बनी 1.3 मिलियन डॉलर की प्रॉपर्टी, जानें कैसे बदली किस्मत.

    कपल ने पुरानी बैंक बिल्डिंग को बना डाला घर, आज बनी 1.3 मिलियन डॉलर की प्रॉपर्टी, जानें कैसे बदली किस्मत.

    साल 2013 की बात है. लिन सैविनो और उनके पति माइकल के मन में एक अजीब लेकिन दिलचस्प सपना पल रहा था – मिशिगन के डेट्रॉइट शहर में खड़ी एक पुरानी, वीरान बैंक बिल्डिंग को अपना घर बनाने का. ये कोई आसान फैसला नहीं था, क्योंकि बिल्डिंग पूरी तरह बैंकिंग जरूरतों के हिसाब से डिजाइन की गई थी. न बेडरूम की जगह तय थी, न बाथरूम की, न खिड़कियों का कोई ठिकाना. फिर भी दोनों ने हिम्मत नहीं हारी और इसे खरीदने का फैसला कर लिया.

    इस डील के लिए उन्हें 66,000 डॉलर चुकाने पड़े, और इतने में ही बगल की एक प्रॉपर्टी भी मिल गई जो पहले बार के तौर पर चलती थी. मजेदार बात यह है कि इस खरीदारी के लिए कपल को अपना पुराना घर तक बेचना पड़ा. पीपुल्स स्टेट बैंक की यह बिल्डिंग करीब दस साल से बंद पड़ी थी, और इससे पहले कुछ समय के लिए इसे एक क्लब के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था.

    बैंक को बना डाला खूबसूरत घर

    बिल्डिंग की हालत उस वक्त काफी खराब थी, लेकिन कपल का इरादा पक्का था. मई 2014 में वे यहां रहने भी आ गए, हालांकि तब न किचन बना था और न ही लॉन्ड्री की कोई व्यवस्था थी. सैविनो ने तो अपना बिस्तर सीधे निर्माण कार्य के बीचोंबीच लगा लिया था और बाकी हिस्सों पर काम चलता रहता. उनके मुताबिक यह रेनोवेशन इतना बड़ा था कि एक पूरा महीना उन्होंने बिना नहाए गुजारा. अगले पांच महीनों तक किचन नहीं था, तो दोस्तों के घर जाकर नहाना-धोना और कपड़े धोना पड़ता था.

    सैविनो को इस जगह की बनावट, यहां आने वाली रोशनी और खासतौर पर आधे गोल आकार की खिड़कियां बेहद पसंद आईं. उन्हें यकीन था कि इन खिड़कियों से छनकर आती धूप घर को अलग ही रौनक देगी. चूंकि माइकल पेशे से सीमेंट कॉन्ट्रेक्टर थे, इसलिए ज्यादातर निर्माण कार्य दोनों ने मिलकर खुद ही निपटाया. बाहरी बनावट को लगभग वैसा ही रखा गया, बस छत बदली गई. बिल्डिंग में एक वॉल्ट मेन फ्लोर पर था और दूसरा बेसमेंट में, जिसे बाद में वाइन रखने की जगह बना दिया गया.

    केलर विलियम्स लिगेसी की रियल एस्टेट एजेंट एंड्रिना हलीली माल्कोव्स्की इस बिल्डिंग को बेहद अनोखा बताती हैं. आज इस घर में दो बेडरूम और दो बाथरूम हैं, और यह करीब 3000 स्क्वायर फीट में फैला हुआ है, डेट्रॉइट के एक पुराने इलाके में. 1925 में बनी इस बैंक बिल्डिंग की एक चीज आज भी वैसी ही है – इसकी कॉपर से बनी दहलीज, जिसकी कीमत सैविनो के अनुसार करीब 30,000 डॉलर आंकी जाती है. इसके अलावा खिड़कियों के नीचे लगा पुराना मार्बल भी सुरक्षित है.

    दिलचस्प बात यह भी है कि जब यहां क्लब चलता था, तब पार्टी में आए लोगों के दस्तखत आज भी दीवारों पर मौजूद हैं. आज इस घर की कीमत करीब 1.3 मिलियन डॉलर (लगभग 13 करोड़ रुपये) है. जहां इस इलाके की बाकी प्रॉपर्टी की औसत कीमत 110 डॉलर प्रति स्क्वायर फीट है, वहीं सैविनो का यह अनोखा घर 433 डॉलर प्रति स्क्वायर फीट तक पहुंच चुका है.

  • दो बल्ब.. एक पंखा! जब रहते थे तो आता था ₹100, बंद घर का आया 2 लाख बिजली का बिल.

    दो बल्ब.. एक पंखा! जब रहते थे तो आता था ₹100, बंद घर का आया 2 लाख बिजली का बिल.

    दो बल्ब.. एक पंखा! जब रहते थे तो आता था ₹100, बंद घर का आया 2 लाख बिजली का बिल.

    ईंट गारे को उठाने तो कभी बोझा उठा कर मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार का पालन पोषण करने वाले गरीब के घर का बिजली बिल लाखों में आने की वजह से उसकी नींद उड़ गई है. और अब वह सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटता हुआ फिर रहा है ताकि बिल में सुधार हो जाए, भगवानदास अहिरवार बिजली का बिल लाखों में आने से इतना दुखी है कि वह अपना दर्द बताते हुए रो पड़े और उन्हें दूसरे लोगों ने संभाल कर ढांढ़स बंधाया, भगवानदास चाहते हैं कि पहले उनका बिल ₹100 आता था उसी हिसाब से बिल लिया जाए क्योंकि 2 साल से मकान में ताला डाला हुआ है वह कभी कभार ही त्योहार के समय अपने घर वापस लौटते हैं. लेकिन इस बार बिजली बिल के चक्कर में वह मजदूरी करने भी नहीं जा पा रहे हैं इधर उतना कम मिलता नहीं हैं कि खर्च चल सके.

    भगवान दास अहिरवार बताते हैं कि उनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं बच्चों की तबीयत ठीक नहीं रहती ऐसे में उनका इलाज बेहतर ढंग से हो सके इसके लिए वह 2 साल पहले मजदूरी करने के लिए परिवार के साथ दिल्ली चले गए थे. बीच-बीच में त्यौहार पर उनका आना-जाना होता रहता है. हालत इतनी खराब है कि घर में मोबाइल भी नहीं है लेकिन इसके बावजूद उनका बिजली बिल 241450 आ गया है. बिजली बिल देखने के बाद से ही कुछ समझ में नहीं आ रहा है क्या करना है क्या नहीं करना? बिजली ऑफिस भी गया था लेकिन उनका कहना है कि लाइट जलाई है इसलिए बिल तो भरना पड़ेगा. हमारे घर में दो एलईडी बल्ब और एक पंखा है और वह भी कभी-कभी उपयोग हुआ तो फिर 600-700 यूनिट बिल कैसे आता रहा? पहले कोई जानकारी नहीं दी गई, अचानक से 2 लाख 41450 का बिल थमा दिया गया है.

    बिजली विभाग वाले कर रहे प्रताड़ित
    हम इतने सक्षम नहीं है कि बिजली बिल लाखों रुपए भर सकें. पहले यही बिजली बिल ₹100 महीने आता था. अभी रक्षाबंधन के त्योहार पर हम लोग दिल्ली से वापस लौटे, तो बिजली कर्मचारियों के द्वारा अत्याचार किए जा रहे हैं. वह कभी भी किसी भी समय मनमर्जी से घर में घुस आते हैं चेकिंग करते हैं तलाशी लेते हैं लेकिन कुछ नहीं मिलता है. बार-बार ऐसा कर रहे हैं. हम लोगों को प्रताड़ित कर रहे हैं. कहते हैं जब तक बिजली बिल नहीं भरोगे ऐसा ही होता रहेगा. हमारी एक बच्चे को मिर्गी आई है जिसका इलाज चल रहा है. दूसरा बच्चा भी ठीक नहीं है जो कमाई करते हैं सारा पैसा इलाज में और घर खर्चे में ही चला जाता है, अब इतना बिजली का बिल कहां से भरूंगा.

  • किस्मत ने चली ऐसी चाल फ्लैट देखने पहुंची लड़की को मिली नौकरी, फाउंडर्स से हुई बातचीत और मिल गया जॉब ऑफर.

    किस्मत ने चली ऐसी चाल फ्लैट देखने पहुंची लड़की को मिली नौकरी, फाउंडर्स से हुई बातचीत और मिल गया जॉब ऑफर.

    घर ढूंढना वैसे ही किसी सिरदर्द से कम नहीं है. ऊपर से अगर शहर बेंगलुरु जैसा हो, जहां किराया, लोकेशन और मकानमालिक के नियम अपनी-अपनी परीक्षा लेते हैं, तो घर की तलाश और भी मुश्किल हो जाती है. कभी बजट में सही फ्लैट नहीं मिलता, तो कभी ऑफिस से इतनी दूर लोकेशन मिलती है कि आने-जाने का हिसाब ही बिगड़ जाए. सिक्योरिटी डिपॉजिट और अलग-अलग शर्तें तो अपनी जगह हैं. लेकिन बेंगलुरु में घर ढूंढते-ढूंढते अगर आपको नौकरी भी मिल जाए, तो इसे क्या कहेंगे?

    सोशल मीडिया पर ऐसा ही एक दिलचस्प किस्सा चर्चा में है. Reddit पर Neembu_paani31 नाम के यूजर ने अपनी कहानी शेयर करते हुए इसे ‘पीक बेंगलुरु मोमेंट’ बताया. पोस्ट के मुताबिक, वह एक दिन पहले फ्लैट देखने निकली थीं. जिस फ्लैट को देखने जाना था, वहां संबंधित व्यक्ति मौजूद नहीं था. ऐसे में उन्होंने उसी बिल्डिंग में मौजूद एक दूसरे फ्लैट को देखने का फैसला किया, ताकि कम से कम वहां का इंटीरियर और बाकी चीजें देख सकें, लेकिन उन्हें शायद अंदाजा भी नहीं था कि इस छोटे से फैसले के बाद पूरा मामला ही बदल जाएगा.

    किराए के घर के साथ मिली नौकरी

    जिस फ्लैट में वह पहुंचीं, वहां एक AI स्टार्टअप के फाउंडर्स मौजूद थे. बातचीत शुरू हुई तो धीरे-धीरे बात काफी आगे बढ़ गई. उन्होंने फाउंडर्स से कंपनी, काम और स्टार्टअप को लेकर कई सवाल पूछे. बातचीत इतनी अच्छी चली कि सामने बैठे फाउंडर्स भी उनसे काफी प्रभावित हो गए. फिर जो हुआ, वो शायद घर देखने गई किसी भी शख्स की कल्पना से बाहर होगा. फ्लैट पसंद आया या नहीं, ये तो पता नहीं, लेकिन वहां से उन्हें नौकरी का ऑफर जरूर मिल गया. यानी जिस दिन का प्लान घर ढूंढने का था, उसी दिन करियर से जुड़ा एक नया मौका सामने आ गया.

    मामला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि पोस्ट के मुताबिक यह कोई छोटी-मोटी कंपनी नहीं है. स्टार्टअप के ऑफिस बेंगलुरु और चेन्नई में हैं और आने वाले समय में दुबई और मलेशिया में भी ऑफिस खोलने की तैयारी बताई गई है. ऐसे में यूजर के लिए यह घर की तलाश से कहीं ज्यादा बड़ा सरप्राइज साबित हुआ. हालांकि, पोस्ट वायरल हुई तो लोगों की नजर नौकरी के ऑफर से ज्यादा एक छोटी सी गलती पर चली गई. पोस्ट में Malaysia की स्पेलिंग गलत लिखी गई थी. इसके बाद कई यूजर्स ने इसी गलती को पकड़ लिया और कमेंट्स में मजेदार अंदाज में इसका जिक्र करने लगे.

    कुछ लोगों को पूरा किस्सा काफी मजेदार और भरोसे के लायक लगा, जबकि कुछ ने स्पेलिंग की गलती को लेकर सवाल भी उठाए. फिर भी कहानी ने लोगों का ध्यान खींच लिया है. आखिर बेंगलुरु में घर ढूंढने निकले और बदले में नौकरी मिल जाए, तो इसे ‘पीक बेंगलुरु मोमेंट’ कहने में शायद कोई बुराई नहीं है.

  • चीन में अब इमोशन बना बिजनेस Pet के अंतिम संस्कार से हो रही है करोड़ों की कमाई, बूम पर है इंडस्ट्री

    चीन में अब इमोशन बना बिजनेस Pet के अंतिम संस्कार से हो रही है करोड़ों की कमाई, बूम पर है इंडस्ट्री

    चीन में अब इमोशन बना बिजनेस Pet के अंतिम संस्कार से हो रही है करोड़ों की कमाई, बूम पर है इंडस्ट्री

    चीन में अब कुत्ता-बिल्ली सिर्फ जानवर नहीं, परिवार बन चुके हैं. और जब परिवार का कोई सदस्य जाता है तो उसे कचरे की तरह तो नहीं फेंका जा सकता. इसी सोच ने वहां एक नया बिजनेस खड़ा कर दिया है – पालतू जानवरों का अंतिम संस्कार. ये इंडस्ट्री इस वक्त चीन में बहुत तेजी से भाग रही है, लेकिन दिक्कत ये है कि इस पर सरकार का कोई पक्का नियम-कानून अभी तक बना ही नहीं है.

    रिपोर्ट के अनुसार, मई के महीने में डालियान शहर में एक कपल अपनी बिल्ली को आखिरी बार अलविदा कहने आया. वो बिल्ली 8 साल से उनके साथ थी. दिल की बीमारी से उसकी मौत हो गई. दोनों पति-पत्नी आखिरी बार उसके बाल संवार रहे थे, उसे सहला रहे थे, आंखों में आंसू थे. उनके लिए वो सिर्फ बिल्ली नहीं, घर का हिस्सा थी. इसके बाद उसके शव को अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया और ये कहानी अब अकेली नहीं है. चीन के बड़े शहरों में ऐसी तस्वीरें आम होती जा रही हैं.

    इमोशनल कनेक्शन के कारण बड़ा हुआ बिजनेस

    पहले होता ये था कि जानवर मरा और उसे कहीं दफना दिया. अब सीन बिल्कुल बदल गया है. कंपनियां सिर्फ जलाने की सर्विस नहीं दे रही हैं. पूरा का पूरा सेटअप मिलता है. फूलों से सजी जगह, आखिरी बार अपने पेट को देखने के लिए अलग सा प्राइवेट रूम, उसकी फोटो, उसके पंजे का निशान याद के तौर पर फ्रेम करके देना… और तो और कुछ जगह तो लोग अपने पेट के लिए छोटी सी प्रार्थना सभा भी रखते हैं और इसके लिए लोग पैसा भी दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं. कुछ कंपनियों के हाई-एंड पैकेज की कीमत लगभग 1500 डॉलर है, मतलब इंडिया के करीब 1.25 लाख रुपये.

    इस पैकेज में लिमोजिन गाड़ी में शव को ले जाना और चार यूनिफॉर्म पहने लोगों का उसकी अंतिम यात्रा में शामिल होना जैसी चीजें भी शामिल हैं. सबसे बड़ी वजह है इमोशनल कनेक्शन. शहरों में अकेले रहने वाले बहुत से लोगों के लिए उनका कुत्ता या बिल्ली ही उनका सबसे करीबी साथी है.

    2026 में आई एक रिसर्च में 504 शहरी पेट-ओनर्स पर स्टडी की गई. उसमें साफ निकला कि जिसका अपने जानवर से जितना ज्यादा लगाव है, वो उसकी आखिरी विदाई को उतना ही खास बनाना चाहता है. लोगों के लिए अब ये सिर्फ बॉडी को ठिकाने लगाने का काम नहीं है, ये इज्जत देने का तरीका है. जहां इमोशन है, वहां पैसे का खेल भी है और यहीं पर सबसे बड़ी गड़बड़ है. इस इंडस्ट्री के लिए कोई एक जैसा सरकारी नियम नहीं है. हर शहर में लाइसेंस के, कचरा निपटाने के, पर्यावरण के नियम अलग-अलग हैं.

    इस वजह से ग्राहक के मन में डर बना रहता है. कंपनी बोल तो रही है कि आपके पेट का अलग से अंतिम संस्कार करेंगे, पर क्या सच में वही कर रही है? जो राख लौटाई जा रही है, क्या वो उसी के पेट की है? जो भट्टी इस्तेमाल हो रही है, क्या वो पर्यावरण के हिसाब से सेफ है? कई रिपोर्ट्स में तो ये भी सामने आया है कि बहुत सी दुकानें बिना किसी लाइसेंस के ही चल रही हैं. रेट का कोई हिसाब नहीं है, जो मुंह में आया मांग लिया और पर्यावरण का तो कोई ध्यान ही नहीं रख रहा…देखा जाए तो ये बिजनेस इस बात का प्रूफ है कि समाज बदल रहा है, लोग जानवरों को ज्यादा प्यार और इज्जत दे रहे हैं. ये अच्छी बात है.

  • दिखती है ग्लैमरस लाइफ, पर छीन लेती है चैन…एयर होस्टेस की नौकरी का वो सच जो कोई नहीं बताता!

    दिखती है ग्लैमरस लाइफ, पर छीन लेती है चैन…एयर होस्टेस की नौकरी का वो सच जो कोई नहीं बताता!

    दिखती है ग्लैमरस लाइफ, पर छीन लेती है चैन…एयर होस्टेस की नौकरी का वो सच जो कोई नहीं बताता!

    दूर से देखने पर एयर होस्टेस की जिंदगी बेहद चमक-धमक और रोमांच से भरी लगती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों फीट की ऊंचाई पर बादलों के बीच काम करने वाली इन लड़कियों की असल जिंदगी कैसी होती है? यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस की पूर्व फ्लाइट अटेंडेंट ने इस ग्लैमरस नौकरी का वह सच बयान किया है, जिसे जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी.

    हर दिन अजनबियों के साथ काम करने का चैलेंज

    यात्री अक्सर फ्लाइट में क्रू मेंबर्स को आपस में हंसते-बोलते देखकर सोचते हैं कि ये सभी पुराने दोस्त हैं, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट होती है. बिजनेस इनसाइडर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन इंटरनेशनल एयरलाइंस में लगभग 10 साल काम कर चुकी एक पूर्व एयर होस्टेस ने बताया कि प्लेन में कदम रखने के बाद पता चलता है कि पायलट से लेकर बाकी सभी क्रू मेंबर बिल्कुल नए हैं, जिन्हें वो पहले कभी जानती तक नहीं थीं. शुरुआत में यह बात काफी परेशान करती थी, लेकिन धीरे-धीरे 35,000 फीट की ऊंचाई पर कुछ ही मिनटों में इन अजनबियों को एक परफेक्ट टीम में बदलना उनकी सुपरपावर बन गया.

    पार्टी नहीं, जेट लैग और थकान से होता है मुकाबला

    आम लोगों को लगता है कि फ्लाइट अटेंडेंट विदेशी शहरों में घूमती हैं और रोज पार्टियां करती हैं. असलियत यह है कि वे लगातार भयानक जेट लैग और थकान से जूझती रहती हैं. कई बार लंबी फ्लाइट के बाद होटल पहुंचते ही उनके पास सिर्फ खाना खाने, नहाने और थोड़ा सा सोने का ही वक्त होता है, ताकि वे अगली उड़ान के लिए तैयार हो सकें.

    सख्त ब्यूटी स्टैंडर्ड्स का मानसिक तनाव अलग

    हर उड़ान से पहले एक अघोषित ग्रूमिंग और लुक टेस्ट होता है, जिसमें एयरलाइन के सख्त नियमों के मुताबिक बाल, मेकअप और ड्रेस की जांच की जाती है. परफेक्ट स्किन, मैनीक्योर किए हुए नाखून और एक ही स्टाइल का जूड़ा रखना हर समय मानसिक दबाव पैदा करता है. इस स्ट्रेस से तंग आकर ही इस पूर्व एयर होस्टेस ने अपने लंबे बालों को बॉब कट में कटवा लिया था, ताकि उन्हें बार-बार स्टाइल न करना पड़े.

  • दुनिया का सबसे सस्ता देश, हजार रुपए वाला इंडियन भी बन जाता है लखपति!

    दुनिया का सबसे सस्ता देश, हजार रुपए वाला इंडियन भी बन जाता है लखपति!

    दुनिया का सबसे सस्ता देश, हजार रुपए वाला इंडियन भी बन जाता है लखपति!

    उज्बेकिस्तान आजकल सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है. लोग इसे दुनिया का सबसे सस्ता देश बता रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि अगर कोई भारतीय अपनी जेब में सिर्फ एक हजार रुपये लेकर उज्बेकिस्तान पहुंच जाए, तो वह वहां सीधे लखपति बन जाता है. यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, लेकिन मनी एक्सचेंज रेट और वहां की जीवनशैली को समझने के बाद यह दावा काफी हद तक सही साबित होता है.

    उज्बेकिस्तान मध्य एशिया का एक खूबसूरत देश है. ताशकंद, समरकंद, बुखारा और खीवा जैसे शहरों में ऐतिहासिक इमारतें, मस्जिदें, मदरसे और बाजार पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. लेकिन सिर्फ खूबसूरती ही नहीं, यहां की अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा की जिंदगी भी भारतीय पर्यटकों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रही है.

    एक्सचेंज रेट है जबरदस्त
    उज्बेकिस्तानी मुद्रा को सोम कहा जाता है. भारतीय रुपये और सोम के बीच विनिमय दर ऐसी है कि एक हजार रुपये से काफी बड़ी रकम सोम में मिल जाती है. जब पर्यटक स्थानीय बाजार में जाते हैं तो खाने-पीने, रहने और घूमने का खर्च बहुत कम पड़ता है. होटल, टैक्सी, स्थानीय खाना और स्मृति चिन्ह इतने सस्ते होते हैं कि भारतीय पर्यटक को लगता है जैसे उसकी क्रय शक्ति कई गुना बढ़ गई हो. इसी वजह से सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि हजार रुपये वाला भारतीय यहां लखपति जैसा महसूस करता है. जीवनशैली की बात करें तो उज्बेकिस्तान में रोजमर्रा की वस्तुएं भारतीय शहरों की तुलना में काफी सस्ती है. सब्जियां, फल, मांस, ब्रेड और स्थानीय व्यंजन बहुत कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं. सार्वजनिक परिवहन भी सस्ता है. टैक्सी किराया और मेट्रो दोनों ही किफायती है. पर्यटक अगर बजट होटल या गेस्ट हाउस में रुकें तो एक रात का खर्च बहुत कम आता है.

    सोने का है भंडार
    उज्बेकिस्तान सिर्फ सस्ता देश ही नहीं है, बल्कि यहां प्राकृतिक संसाधन भी प्रचुर मात्रा में मौजूद है. देश की जमीन में सोने का विशाल भंडार छिपा हुआ है. उज्बेकिस्तान दुनिया के प्रमुख सोना उत्पादक देशों में शामिल है. मुरांटाऊ सोने की खदान दुनिया की सबसे बड़ी खुली खदानों में से एक मानी जाती है. इसके अलावा कई अन्य खदानें भी सक्रिय हैं जहां से सोना निकाला जाता है. यह प्राकृतिक संपदा देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती है. पर्यटन की दृष्टि से उज्बेकिस्तान एक आकर्षक डेस्टिनेशन है समरकंद का रेगिस्तान, बुखारा का पुराना शहर, ताशकंद के आधुनिक और ऐतिहासिक स्थल पर्यटकों को लुभाते हैं. सिल्क रोड के ऐतिहासिक मार्ग पर स्थित ये शहर दुनिया भर के यात्रियों को आकर्षित करते हैं. भारतीय पर्यटकों के लिए यहां वीजा प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत आसान है और उड़ानें भी उपलब्ध हैं. यही वजह है कि धीरे-धीरे ये देश भारतीयों की लिस्ट में ऊपर आता जा रहा है.

  • कॉर्पोरेट टॉर्चर की हद! टारगेट पूरा न होने पर महिला को दी 200 उठक-बैठक की सजा, हो गई जानलेवा बीमारी.

    कॉर्पोरेट टॉर्चर की हद! टारगेट पूरा न होने पर महिला को दी 200 उठक-बैठक की सजा, हो गई जानलेवा बीमारी.

    कॉर्पोरेट टॉर्चर की हद! टारगेट पूरा न होने पर महिला को दी 200 उठक-बैठक की सजा, हो गई जानलेवा बीमारी.

    आजकल कंपनियों में काम का दबाव इस हद तक बढ़ गया है कि इंसान की जान और उसकी गरिमा की कोई कीमत ही नहीं बची है. चीन के हांगझोऊ शहर से एक बेहद डरावनी खबर सामने आई है, जो यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि क्या कॉर्पोरेट दफ्तर अब काम की जगह हैं या टॉर्चर कैंप?

    पहली नौकरी और उम्मीदें

    यांग नाम की एक लड़की ने जून में हांगझोऊ की एक कंपनी में टेली-सेल्स का काम शुरू किया था. नई नौकरी को लेकर वह बहुत खुश और उत्साहित थी, लेकिन उसे जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह नौकरी उसकी जिंदगी का सबसे बुरा सपना बन जाएगी.

    200 स्क्वैट्स या जुर्माना!

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अपना डेली टारगेट पूरा नहीं कर पाई. इसके बाद उसके मैनेजर ने उसे एक ऐसा फरमान सुनाया, जिसे सुनकर किसी का भी खून खौल उठे. मैनेजर ने कहा कि टारगेट पूरा न होने पर या तो 50 युआन का जुर्माना भरो या फिर 200 उठक-बैठक करो. यांग आर्थिक रूप से कमजोर थी और उसके पास जुर्माना भरने के पैसे नहीं थे. मजबूरी में उसने ऑफिस में ही रोते-बिलखते हुए 200 स्क्वैट्स किए और सबूत के तौर पर मैनेजर को वीडियो भेजा.

    जानलेवा बीमारी की चपेट में

    इतनी भारी कसरत के बाद यांग के पैरों की हालत खराब हो गई और वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी. उसने 5 दिन तक चुपचाप दर्द सहा, लेकिन जब उसके पेशाब का रंग काला-भूरा होने लगा, तो वह डरकर अस्पताल भागी.

    डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि वह रैबडोमायोलिसिस (Rhabdomyolysis) नाम की खतरनाक बीमारी की शिकार हो चुकी है. ज्यादा दबाव की वजह से उसकी मांसपेशियां अंदर से टूटने लगी थीं और उनका जहरीला कचरा खून में मिल गया था. गनीमत रही कि समय पर इलाज मिलने से उसकी जान बच गई, वरना उसकी किडनी फेल भी हो सकती थी.

    कंपनी की बेशर्मी

    तबीयत बिगड़ने के बाद यांग ने 30 जुलाई को नौकरी छोड़ दी. इलाज का खर्च और मुआवजे के तौर पर जब उसने कंपनी से 15,000 युआन मांगे, तो मैनेजर ने पैसे देने से साफ इनकार कर दिया और उल्टा कोर्ट जाने की धमकी दी. अब यांग ने हिम्मत जुटाकर श्रम विभाग और मीडिया का दरवाजा खटखटाया है. चीन के कानून के मुताबिक कर्मचारियों को शारीरिक सजा देना गैर-कानूनी है

  •  ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में खर्च हो गए 6 लाख, आखिर क्या है माजरा.? वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

     ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में खर्च हो गए 6 लाख, आखिर क्या है माजरा.? वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

     ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने में खर्च हो गए 6 लाख, आखिर क्या है माजरा.? वायरल पोस्ट पर छिड़ी बहस

    भारत में तो दो-चार चक्कर गाड़ी आगे-पीछे करके आसानी से ड्राइविंग लाइसेंस (Driving Licence) मिल जाता है, लेकिन विदेश में यह किसी टेढ़ी खीर से कम नहीं है. नॉर्वे में रहने वाले एक भारतीय शख्स विनोद को वहां लाइसेंस पाने के लिए पूरे दो साल तक पापड़ बेलने पड़े और जेब से करीब 6 लाख रुपए (आज के समय में जिसकी वैल्यू 10 लाख से ज्यादा है) खर्च करने पड़ गए. सोशल मीडिया पर उनका यह किस्सा वायरल हो रहा है, जिस पर लोग तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं.

    बर्फ और पहाड़ों के बीच ड्राइविंग की कड़ी चुनौती

    साल 2011 में नॉर्वे शिफ्ट हुए विनोद को जल्द ही समझ आ गया कि वहां की कड़ाके की ठंड, बर्फबारी और खतरनाक पहाड़ी रास्तों पर जिंदा रहना है तो ड्राइविंग आनी ही चाहिए. उन्होंने गाड़ी चलाना सीख भी लिया, लेकिन नॉर्वे का सिस्टम इतना आसान नहीं है. वहां लाइसेंस के लिए केवल गाड़ी चलाना आना काफी नहीं होता, बल्कि कई अनिवार्य कोर्स, थ्योरी टेस्ट, कड़ा सुरक्षा प्रशिक्षण और बर्फीली सड़कों व सुरंगों में लंबा अभ्यास करना पड़ता है.

    पहली बार फेल, फिर दो महीने की एक्सट्रा मेहनत

    वहां के ड्राइविंग स्कूल एक-एक घंटे की ट्रेनिंग का मोटा पैसा वसूलते हैं, जिससे खर्च काफी बढ़ जाता है. कड़ी ट्रेनिंग लेने के बाद भी जब विनोद फाइनल टेस्ट में बैठे, तो वे पहली बार फेल हो गए. लेकिन हार न मानते हुए उन्होंने दो महीने और पसीना बहाया और तब जाकर दूसरी कोशिश में उन्हें कामयाबी हासिल हुई. इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें दो साल लग गए.

    सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

    विनोद की यह आपबीती अब सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रही है. लोग भारत और नॉर्वे के नियमों की तुलना कर रहे हैं. भारत में बिना किसी खास ट्रेनिंग के आसानी से मिलने वाले लाइसेंस और देश में लगातार बढ़ते सड़क हादसों को लेकर इंटरनेट पर तीखी बहस छिड़ गई है. नॉर्वे की इस सख्त व्यवस्था का मुख्य मकसद सिर्फ आपकी ड्राइविंग स्किल परखना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आप सड़क पर चलने वाले बाकी लोगों की जान के प्रति पूरी तरह जिम्मेदार हैं या नहीं.

  • मृत समझकर दिया तुलसी-गंगाजल, अस्पताल में डॉक्टर बोले..

    मृत समझकर दिया तुलसी-गंगाजल, अस्पताल में डॉक्टर बोले..

    मृत समझकर दिया तुलसी-गंगाजल, अस्पताल में डॉक्टर बोले..

    बलिया. यूपी के बलिया जिले के शिवपुर दियरी नंबरी गांव में चौंकाने वाला मामला सामने आया है. जिस बुजुर्ग व्यक्ति को परिजनों ने मृत मान लिया था, वही अस्पताल ले जाने पर जिंदा निकले. 65 वर्षीय विश्वनाथ पाल बेहोशी के हाथ-पैर बिल्कुल काम नहीं कर रहे थे. शरीर में हरकत ना होने पर परिजनों ने उनको तुलसी-गंगाजल भी दे दिया. परिजनों ने सोचा कि उनकी सांसें थम चुकी हैं. तुलसी-गंगाजल देने की खबर पूरे गांव में फैल गई. ग्रामीण रविंद्र बागड़ ने पूरे मामले की जानकारी दी.

    ग्रामीणों की भीड़ लग गई. इसी बीच कुछ लोगों ने बुजुर्ग विश्वनाथ पाल को एक बार अस्पताल ले जाने की सलाह दी. जैसे ही परिजन विश्वनाथ को अस्पताल लेकर पहुंचे, डॉक्टर ने जो कहा उसे सुनकर परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई. डॉक्टर ने कहा कि ‘बाबा तो अभी जिंदा हैं.’ जिस घर में मातम की तैयारी हो रही थी, वहां अचानक खुशी लौट आई. बेटा भी लगभग उम्मीद छोड़ चुका था लेकिन पिता की सांसें चलती देख उसकी आंखों से खुशी के आंसू आ गए. अब बेटा जिला अस्पताल में अपने पिता का इलाज करा रहा है.

    ‘इलाज के दौरान पिता जिंदा निकले’

    विश्वनाथ पाल के बेटे दयाशंकर पाल ने बताया, ‘मैं घर से बाहर था. अचानक सूचना मिली कि पिताजी का बोलचाल बंद हो गया था. हाथ-पैर भी काम करना बंद कर दिए हैं. घर आकर देखा कि भीड़ लगी है. परिजन रो रहे थे. यह सब देखकर मन दुखित हो गया. धीरे-धीरे विश्वास हो गया था कि उनके पिताजी इस दुनिया को छोड़कर चले गए हैं. फिर सोचा गया कि हॉस्पिटल चला जाए. प्राथमिक इलाज के दौरान पिता जिंदा निकले तो खुशी की लहर दौड़ गई.’

    ‘मुंह से शब्द नहीं निकले’

    दयाशंकर ने कहा, ‘हॉस्पिटल आने के बाद जो खुशी मिली है, उसे शब्दों में बयां नहीं जा सकता है. केवल अनुभव किया जा सकता है. जब डॉक्टर ने अचानक बोला कि यह तो अभी जिंदा है. उस समय कुछ देर तक मेरे मुंह से शब्द नहीं निकले. केवल आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे.’