पुरी,। पुरी का जगन्नाथ मंदिर अपनी भव्यता और आस्था के लिए विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन इससे जुड़े कई रहस्य और परंपराएं भी हैं जो आपको हैरान कर देंगी। इसी में से एक है इस मंदिर का झंडा जो हवा की दिशा के विपरीत लहराता है। आम तौर पर झंडा हवा के साथ उड़ता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं होता।
यही बात इस मंदिर को रहस्यमयी और अद्भुत बनाती है। आज तक कोई पता नहीं लगा पाया है कि मंदिर का झंडा हवा के विपरीत दिशा में क्यों लहराता है। स्थानीय लोग इसे भगवान जगन्नाथ की दैवीय शक्ति का संकेत मानते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के ऊपर लहराता झंडा नकारात्मक ऊर्जाओं को खत्म करता है और पूरे वातावरण में सकारात्मकता फैलाता है।
इस झंडे को हर दिन बदला जाता है, लेकिन यह काम कोई साधारण नहीं है, बल्कि भगवान के प्रति भक्ति और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। हर शाम, लगभग सूर्यास्त के समय, पुराना झंडा उतारकर नया त्रिकोणीय झंडा लगाया जाता है। सर्दियों में यह काम करीब 5 बजे और गर्मियों में 6 बजे के आसपास किया जाता है। ऐसा भी है कि अगर किसी दिन झंडा नहीं बदला गया, तो मंदिर 18 सालों तक बंद हो सकता है। इसलिए चाहे बारिश हो या तूफान, यह परंपरा एक दिन के लिए भी नहीं रुकती।झंडा बदलने का यह कार्य एक विशेष परिवार, जिसे चुनरा सेवक या चोला परिवार कहा जाता है, के हाथों से ही होता है। इस परिवार के लोग लगभग पिछले 800 सालों से यह पवित्र जिम्मेदारी निभा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि वे बिना किसी सुरक्षा उपकरण के 214 फुट ऊंचे मंदिर के शिखर पर चढ़ते हैं और वहां झंडा बदलते हैं। कहा जाता है कि आज तक इस परिवार के किसी भी सदस्य को इस काम के दौरान कोई चोट नहीं लगी।
पुराने झंडे को नकारात्मक ऊर्जा को सोखने वाला माना जाता है, इसलिए हर दिन नया झंडा लगाकर भगवान जगन्नाथ के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है। यह झंडा केवल एक कपड़ा नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और सुरक्षा का प्रतीक है। जगन्नाथ मंदिर का यह रहस्य भले ही विज्ञान से परे हो, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए यह भगवान की शक्ति और कृपा का जीवंत प्रमाण है।
आज के दौर में जहां अच्छी सैलरी को सफलता का पैमाना माना जाता है, वहीं एक 28 साल के युवक की कहानी ने सोशल मीडिया पर सनसनी मचा दी है. Reddit पर वायरल हुई इस पोस्ट ने उन लाखों कॉर्पोरेट कर्मचारियों के दर्द को बयां किया है जो भारी-भरकम सैलरी पाने के बाद भी महीने के आखिर में खुद को कंगाल पाते हैं. महज कुछ साल पहले 25,000 रुपए महीने कमाने वाले इस युवक की आज सैलरी 1.2 लाख रुपए है, लेकिन हालात ऐसे हैं कि महीने के अंत में उसके पास केवल 5 से 8 हजार रुपए ही बच पाते हैं.
किराया, SIP और अचानक आए खर्चे
युवक ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि जैसे-जैसे आमदनी बढ़ी, वैसे-वैसे खर्चे भी कई गुना बढ़ गए. आज उसकी सैलरी का बड़ा हिस्सा महंगे किराए, परिवार की जिम्मेदारियों, म्यूचुअल फंड एसआईपी और रोजमर्रा की भागदौड़ में खर्च हो जाता है. जो थोड़ी बहुत रकम बचती है, वह अचानक आने वाले मेडिकल या अन्य खर्चों की भेंट चढ़ जाती है. युवक यह दर्द साफ दिखाता है कि कैसे लाइफस्टाइल से जुड़ी महंगाई लोगों की जेब चुपचाप खाली कर रही है.
सोशल मीडिया पर यूजर्स की तीखी प्रतिक्रियाएं
यह पोस्ट सामने आते ही रेडिट पर बहस छिड़ गई. इंटरनेट यूजर्स ने इस समस्या पर खुलकर अपने विचार रखे और इसे मैनेज करने के कुछ तरीके भी सुझाए. एक यूजर ने सलाह दी कि लोग अक्सर बाहर खाने और छोटी-छोटी चीजों पर बिना सोचे-समझे हजारों रुपए उड़ा देते हैं. तीन महीने तक अपने हर एक खर्चे को ट्रैक करें, असली तस्वीर खुद-ब-खुद सामने आ जाएगी.
एक अन्य यूजर ने लिखा कि जब आपकी सैलरी अचानक बढ़े, तो कम से कम एक साल तक ऐसे जिएं जैसे आप पुरानी सैलरी पर ही जी रहे हैं. इससे खर्चों की आदतें नियंत्रण में रहती हैं. कई लोगों ने याद दिलाया कि एसआईपी (SIP) बचत का हिस्सा है, न कि खर्चा. इसलिए इसे अपनी कटौती में शामिल न करें.
महाराष्ट्र अपने पर्यटक स्थलों के कारण दुनिया में बहुत ही प्रसिद्ध है। अगर आप भी आगामी समय में कही पर घूमने का प्लान बना रहे हैं तो यहां पर जा सकते हैं। आज हम आपको यहां की एलीफेंटा गुफाओं के बारे में जानकारी देने जा रहे है, जो मुंबई शहर से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर घारपुरी द्वीप पर स्थित हैं। इन्हें यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में भी जगह मिल चुकी है।
इनमें आपको मध्ययुगीन काल से रॉक-कट कला और वास्तुकला का दीदार भी करने का मौका मिलेगा। इन्हें मूल रूप से घारपुरिची लेनि के नाम से भी जाना जाता हैं। इस गुफा मंदिर का अधिकांश भाग भगवान शंकर को समर्पित हैं। आप इन गुफाओं को देखकर हैरान रह जाएंगे।
मुंबई के गेटवे ऑफ इण्डिया से नौका यात्रा के माध्यम से आप एलीफेंटा की गुफा तक पहुंच सकते हैं। आपको आज ही यहां पर घूमने का प्लान बना लेना चाहिए। यहां का टूर आपके लिए यादगार साबित होगा।
गृह मंत्रालय की साइबर विंग द्वारा जारी एडवाइजरी के बीच मोबाइल फोन पर फर्जी ऐप्स, फिशिंग लिंक्स और थर्ड-पार्टी एपीके फाइलों के माध्यम से बढ़ते साइबर फ्रॉड और वित्तीय धोखाधड़ी पर विशेषज्ञों ने डिजिटल सुरक्षा से जुड़े नियमों व सावधानियों की जानकारी दी है.
विशेषज्ञों के अनुसार, सोशल मीडिया विज्ञापनों, फर्जी ट्रैफिक चालान या गैस पाइपलाइन बिल के नाम पर भेजे जाने वाले अनजान लिंक्स से फोन हैक कर कैमरा, माइक्रोफोन, एसएमएस और कॉल्स का एक्सेस ले लिया जाता है. इसके बाद
वेरिफिकेशन के नाम पर आधार, पैन कार्ड और यूपीआई पिन जैसी गोपनीय जानकारी हासिल कर बैंक खातों से धोखाधड़ी की जाती है. इसके साथ ही फर्जी लोन ऐप्स और डेटा ब्रीच से जुड़े खतरों से बचने के लिए अज्ञात स्रोतों से ऐप डाउनलोड न करने, ऐप परमिशन सीमित रखने, रेटिंग व रिव्यू जांचने और सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं.
समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुर में सड़क हादसे के बाद ऐसा मामला सामने आया, जिसने वहां मौजूद लोगों को हैरान कर दिया। एक कार सड़क किनारे गड्ढे में पलट गई। हादसे के बाद जब लोगों को पता चला कि कार के अंदर शराब के टेट्रा पैक भरे हुए हैं, तो मौके पर बड़ी संख्या में भीड़ जुट गई।
पुलिस के पहुंचने से पहले ही कई लोग कार से शराब के पैक निकालकर अपने साथ ले गए। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो कार तो वहां मिली, लेकिन उसके अंदर शराब का कोई पैक नहीं बचा था।
तेज बारिश में अनियंत्रित होकर गड्ढे में पलटी कार
मामला समस्तीपुर के दलसिंहसराय थाना क्षेत्र में एनएच-28 पर पगड़ा गांव के पास का बताया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक, एक कार समस्तीपुर की ओर से बरौनी की तरफ जा रही थी।
इसी दौरान तेज बारिश के कारण सड़क पर फिसलन थी। पगड़ा चौक के पास चालक ने कार से नियंत्रण खो दिया और वाहन अनियंत्रित होकर सड़क किनारे बने गड्ढे में जा गिरा।
हादसे के बाद कार में सवार चालक और अन्य लोग वाहन को मौके पर छोड़कर वहां से निकल गए।
कार के अंदर शराब देखकर जुटने लगी भीड़
हादसे के बाद आसपास के लोग कार को देखने के लिए मौके पर पहुंचने लगे। इसी दौरान पता चला कि कार के अंदर शराब के टेट्रा पैक रखे हुए हैं।
यह जानकारी फैलते ही मौके पर लोगों की भीड़ बढ़ने लगी। इसके बाद कई लोग गड्ढे में उतरकर कार के अंदर से शराब के पैक निकालने लगे।
कुछ लोग एक-दो पैक लेकर वहां से निकल गए, जबकि कुछ लोग दोनों हाथों में कई पैक भरकर ले जाते नजर आए। देखते ही देखते कार के आसपास शराब लेने वालों की भीड़ जमा हो गई।
पुलिस पहुंची तो कार खाली मिली
घटना की सूचना मिलने के बाद दलसिंहसराय पुलिस मौके पर पहुंची। लेकिन तब तक कार से शराब के अधिकांश टेट्रा पैक निकाले जा चुके थे।
पुलिस को मौके पर कार मिली, लेकिन उसके अंदर शराब की एक भी बोतल या टेट्रा पैक नहीं मिला। इसके बाद कार को गड्ढे से बाहर निकालने के लिए क्रेन बुलाई गई।
काफी मशक्कत के बाद कार को बाहर निकाला गया और पुलिस ने मामले की जांच शुरू की।
पुलिस ने लोगों से शराब लौटाने को कहा
दलसिंहसराय के अपर थानाध्यक्ष मनीष कुमार के मुताबिक, पुलिस को पगड़ा चौक के पास कार पलटने की सूचना मिली थी। टीम जब मौके पर पहुंची तो कार गड्ढे में पड़ी हुई थी।
पुलिस के अनुसार, वाहन को बाहर निकालने के दौरान उसमें शराब नहीं मिली। पुलिस के पहुंचने से पहले ही आसपास मौजूद लोग शराब के पैक लेकर जा चुके थे।
पुलिस ने लोगों से शराब वापस करने की अपील की है और चेतावनी दी है कि शराब अपने पास रखने या उसे वापस नहीं करने की स्थिति में कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
फिलहाल पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि कार में शराब कहां से लाई जा रही थी और इसे कहां पहुंचाया जाना था। मामले में कार मालिक, चालक और शराब की खेप से जुड़े अन्य लोगों की जानकारी जुटाई जा रही है।
शादी-ब्याह की तैयारियों में कपड़ों की फिटिंग और सिलाई का काम समय पर पूरा होना बेहद जरूरी होता है। लेकिन गुजरात के अहमदाबाद में एक महिला के साथ ऐसा मामला सामने आया, जहां उसने शादी में पहनने के लिए ब्लाउज सिलने को दिया, एडवांस रकम भी चुकाई, लेकिन तय समय तक उसे ब्लाउज नहीं मिल सका। मामला इतना बढ़ा कि महिला को उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद दर्जी की सेवा में कमी मानते हुए महिला को उसकी दी गई रकम ब्याज समेत लौटाने और मानसिक परेशानी व मुकदमे के खर्च के लिए अतिरिक्त रकम देने का आदेश दिया।
शादी के लिए दिया था ब्लाउज सिलने का ऑर्डर
यह मामला 24 दिसंबर 2024 के आसपास का बताया जाता है। महिला ने अपने एक रिश्तेदार की शादी में पहनने के लिए ब्लाउज सिलवाने का ऑर्डर दिया था। इसके लिए उसने दर्जी को 4,395 रुपये एडवांस के तौर पर दे दिए।
महिला ने अपनी पसंद और डिजाइन के मुताबिक ब्लाउज तैयार करने के लिए कहा था। लेकिन जब वह तय समय पर ब्लाउज लेने पहुंची तो उसकी परेशानी बढ़ गई। ब्लाउज उसकी बताई गई डिजाइन के अनुसार तैयार नहीं हुआ था।
गलती सुधारने का दिया भरोसा, लेकिन समय भी निकल गया
बताया जाता है कि ब्लाउज में कमी सामने आने के बाद दर्जी ने उसे ठीक करके देने का भरोसा दिया। महिला को उम्मीद थी कि शादी से पहले उसकी ड्रेस तैयार हो जाएगी।
लेकिन तय समय बीतता गया और ब्लाउज तैयार नहीं हुआ। शादी का दिन नजदीक आने के कारण महिला की परेशानी भी बढ़ती गई। आखिरकार उसे अपनी पसंद का ब्लाउज समय पर नहीं मिल सका।
महिला का कहना था कि दर्जी की लापरवाही के कारण उसे शादी के कार्यक्रम में असुविधा और शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।
मामला पहुंचा उपभोक्ता अदालत
जब समस्या का समाधान नहीं हुआ तो महिला ने अहमदाबाद की अतिरिक्त उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उसने अपनी एडवांस रकम वापस करने के साथ मानसिक परेशानी और मुकदमे में हुए खर्च की भरपाई की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान दर्जी अदालत में पेश नहीं हुआ। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आयोग ने माना कि ग्राहक से पैसे लेने के बाद तय समय और अपेक्षित तरीके से सेवा उपलब्ध नहीं कराना सेवा में कमी के दायरे में आता है।
अदालत ने दिया रकम लौटाने का आदेश
उपभोक्ता आयोग ने दर्जी को महिला से ली गई 4,395 रुपये की मूल रकम 7 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया।
इसके अलावा महिला को हुई मानसिक परेशानी के लिए 2,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 500 रुपये अतिरिक्त देने को कहा गया।
इस तरह दर्जी को मूल रकम के अलावा ब्याज और अतिरिक्त मुआवजा भी देना पड़ा।
छोटी सी लापरवाही पड़ गई भारी
यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि किसी सेवा के लिए ग्राहक से एडवांस रकम लेने के बाद तय समय पर काम पूरा करना कितना जरूरी है। शादी जैसे महत्वपूर्ण मौके पर कपड़े समय पर तैयार न होने से ग्राहक को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
इस मामले में ब्लाउज की सिलाई भले ही एक छोटा काम लग रहा हो, लेकिन समय पर सेवा नहीं मिलने की वजह से विवाद उपभोक्ता अदालत तक पहुंच गया। अदालत के फैसले के बाद यह मामला उन लोगों के लिए भी सबक माना जा रहा है, जो ग्राहकों से एडवांस लेकर काम को समय पर पूरा नहीं करते।
सोशल मीडिया पर जानवरों से जुड़े कई वीडियो अक्सर लोगों का ध्यान खींचते हैं, लेकिन कुछ वीडियो ऐसे होते हैं जो अपनी मासूमियत और अनोखे अंदाज की वजह से देखते ही देखते वायरल हो जाते हैं। इन दिनों एक कुत्ते का ऐसा ही वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में कुत्ता हनुमान जी के भजन की धुन सुनते ही मंदिर में पहुंचता है और मूर्ति के सामने खड़े होकर झूमने लगता है।
भजन बजा तो मंदिर में पहुंच गया कुत्ता
वायरल हो रहे वीडियो में देखा जा सकता है कि मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति स्थापित है। इसी दौरान वहां भजन बज रहा होता है। भजन की आवाज सुनते ही एक कुत्ता मंदिर के अंदर पहुंच जाता है और सीधे हनुमान जी की मूर्ति के सामने जाकर खड़ा हो जाता है।
इसके बाद कुत्ता अपने शरीर को लय के साथ हिलाने लगता है। उसका अंदाज देखकर ऐसा लगता है जैसे वह भजन की धुन पर झूम रहा हो। कुछ देर तक कुत्ता इसी तरह मूर्ति के सामने खड़ा होकर अपनी हरकतों से वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचता रहता है।
मंदिर में मौजूद लोगों ने इस अनोखे पल को अपने कैमरे में रिकॉर्ड कर लिया। इसके बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, जहां इसे देखने वाले लोग भी कुत्ते के अंदाज को देखकर हैरान रह गए।
लोगों को पसंद आई कुत्ते की मासूमियत
वीडियो सोशल मीडिया पर पहुंचते ही लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई यूजर्स ने कुत्ते की मासूमियत और उसके अनोखे अंदाज की तारीफ की। कुछ लोगों ने इसे बेहद प्यारा पल बताया, जबकि कई यूजर्स ने कहा कि कुत्ते का इस तरह भजन की धुन पर झूमना देखने में काफी दिलचस्प है।
हालांकि, किसी जानवर के व्यवहार को सीधे उसकी धार्मिक भावना से जोड़कर निश्चित निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। संभव है कि कुत्ता भजन की आवाज, संगीत की लय या मंदिर के माहौल पर प्रतिक्रिया दे रहा हो। इसके बावजूद कैमरे में कैद उसका यह अंदाज लोगों को खूब पसंद आ रहा है।
Instagram पर शेयर किया गया वीडियो
बताया जा रहा है कि यह वीडियो Instagram के @itz_royal_pandit अकाउंट से शेयर किया गया था। वीडियो में कुत्ते को हनुमान जी की मूर्ति के सामने झूमते हुए देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर शेयर होने के बाद यह वीडियो तेजी से लोगों का ध्यान खींच रहा है और यूजर्स इसे जमकर पसंद कर रहे हैं।
कहा जाता है कि इंसान प्रकृति को बहुत कुछ सिखाती है बशर्ते प्रकृति की भाषा को समझना आना चाहिए. धरती पर मौजूद पेड़-पौधे, नदी, पहाड़ से लेकर जानवर और इंसान तक सब प्रकृति की ही देन है. इंसानों के लिए इन सभी का अपना महत्व और खासियत है. आज ऐसे ही एक छोटे से जंतु की बात करने जा रहे हैं. यह दिखने में तो छोटा है लेकिन, ये जहां लग गया समझो उसे चट कर गया.
आशीष कुमार/पश्चिम चम्पारण:
बिहार के इकलौते टाइगर रिजर्व ‘वाल्मीकि’ में दीमकों के टीलों की भरमार है. रेतीली लाल मिट्टी से बने इन टीलों की लंबाई एक फीट से लेकर 12 फीट तक देखी गई है. आश्चर्य की बात यह है कि हर टीलों में लाखों दीमक रहते हैं, जो समय समय पर अपने आस पास मौजूद पेड़ पौधों या लकड़ियों में मौजूद सेल्यूलोज को खाते हैं. वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स का मानना है कि दीमक प्रकृति के एक शानदार इंजीनियर हैं, जिनकी कारीगरी का लोहा वैज्ञानिकों ने भी माना है.
12 फीट तक लंबे टीले
विशेषज्ञों के अनुसार, दीमको के ये टीले प्राकृतिक इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण हैं, जिन्हें वे अपनी लार, मल और मिट्टी के मिश्रण से तैयार करते हैं. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के मंगुराहा रेंज में कार्यरत नेचर गाइड सूरज बताते हैं कि रिजर्व के लगभग हर रेंज में इन टीलों की बड़ी संख्या देखने को मिलती है. इनकी ऊंचाई एक फीट से लेकर 12 फीट तक होती है और उनमें लाखों दीमक रहते हैं. एक बांबी को तैयार करने में 2 से 6 साल तक का समय लग जाता है.
गर्मी में भी ठंड का एहसास
वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ अभिषेक के मुताबिक, ये टीले बेहद मजबूत और टिकाऊ होते हैं. तेज बारिश, आंधी-तूफान या भीषण गर्मी का इन पर खास असर नहीं पड़ता. हैरानी की बात यह है कि बाहर का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद बांबी के अंदर का तापमान लगभग 24-25 डिग्री बना रहता है, जो प्राकृतिक एयर कंडीशनिंग का बेहतरीन उदाहरण है.
अनोखी संरचना
इनकी संरचना भी बेहद खास होती है. जितनी ऊंचाई जमीन के ऊपर होती है, उतनी ही गहराई जमीन के अंदर भी होती है. इस तरह की बनावट के कारण अंदर हवा का संतुलित प्रवाह बना रहता है, जिससे हर मौसम में अनुकूल वातावरण तैयार होता है.
प्रकृति के इंजीनियर
दीमक कॉलोनी में रहते हैं, जहां रानी, राजा, सैनिक और श्रमिक की स्पष्ट भूमिका होती है. रानी दीमक एक दिन में 25 से 30 हजार तक अंडे दे सकती है. हालांकि, ये कीट घरों में नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन जंगल में इन्हें ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ माना जाता है. भालू और पैंगोलिन जैसे जीव इनका शिकार भी करते हैं. सालों की मेहनत से तैयार ये टीले न केवल वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय हैं, बल्कि जंगल सफारी पर आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई हैं.
झांसी: उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई। इसके बाद उसका पति शव को स्ट्रेचर पर रखकर मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में बैठा रहा। उसके पास शव को घर ले जाने के लिए पैसे नहीं थे।
बारिश के बीच पति काफी देर तक मदद का इंतजार करता रहा। वहीं उसकी करीब 8 साल की बेटी अपनी मां के शव के पास बैठकर रोती रही। परिवार की हालत देखकर मेडिकल कॉलेज के एक पुलिसकर्मी ने पहल की और एंबुलेंस की व्यवस्था कराकर महिला का शव उसके घर भिजवाया।
इलाज के लिए ओरछा से झांसी आया था परिवार
जानकारी के मुताबिक, मध्य प्रदेश के ओरछा निवासी राहुल आदिवासी अपनी पत्नी रामवती का इलाज कराने अस्पताल पहुंचे थे। रामवती की तबीयत गंभीर होने के बाद उन्हें झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।
राहुल के मुताबिक, परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। इसके बावजूद डॉक्टर ने पैसे देकर टैक्सी की व्यवस्था कराई, जिसके बाद वह अपनी पत्नी और करीब 8 साल की बेटी नंदनी के साथ झांसी पहुंचे।
मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों ने महिला को मृत घोषित किया
मेडिकल कॉलेज पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने रामवती को मृत घोषित कर दिया। पत्नी की मौत के बाद राहुल के सामने अब शव को वापस घर ले जाने की बड़ी समस्या खड़ी हो गई।
उसके पास शव को ले जाने के लिए वाहन का इंतजाम करने के पैसे नहीं थे। ऐसे में उसने पत्नी के शव को स्ट्रेचर पर रखा और मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में बैठकर मदद का इंतजार करने लगा।
बारिश में शव के पास बैठा रहा पति
राहुल काफी देर तक मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में स्ट्रेचर के पास बैठा रहा। एक तरफ पत्नी का शव था और दूसरी तरफ उसकी छोटी बेटी मां की मौत से बेहद परेशान थी।
नंदनी अपनी मां के शव के पास बैठकर रोती रही। परिवार के पास न तो शव को घर ले जाने के लिए पर्याप्त पैसे थे और न ही कोई निजी वाहन।
बताया गया कि बारिश के कारण हालात और भी मुश्किल हो गए थे। परिवार को उम्मीद थी कि किसी तरह मदद मिल जाएगी और वे महिला के शव को अपने घर ले जा सकेंगे।
पुलिसकर्मी की नजर पड़ी तो हुई एंबुलेंस की व्यवस्था
कुछ देर बाद मेडिकल कॉलेज चौकी में तैनात सिपाही अजय की नजर पार्किंग में बैठे परिवार पर पड़ी। उसने स्थिति को समझने के बाद तत्काल मदद की कोशिश शुरू की।
सिपाही ने एंबुलेंस की व्यवस्था कराई। इसके बाद रामवती के शव को एंबुलेंस के जरिए उनके घर भेजा गया।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने जांच की बात कही
इस मामले को लेकर मेडिकल कॉलेज के सीएमएस सचिन माहौर ने बताया कि किसी मरीज की मौत के बाद परिजन शव वाहन की मांग करते हैं तो मेडिकल कॉलेज की ओर से वाहन उपलब्ध कराया जाता है।
उन्होंने संभावना जताई कि डॉक्टरों ने शव परिजनों को सौंप दिया हो, लेकिन परिवार की ओर से शव वाहन की जरूरत के बारे में जानकारी नहीं दी गई हो। हालांकि, उन्होंने इस पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है।
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए किसी अपने की मौत के बाद अंतिम संस्कार तक शव पहुंचाना भी कई बार बड़ी चुनौती बन जाता है।
सऊदी अरब: दुनिया के सबसे शुष्क देशों में शामिल सऊदी अरब में पानी की जरूरत पूरी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। देश का बड़ा हिस्सा रेगिस्तान है, बारिश बेहद कम होती है और प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत भी सीमित हैं। इसके बावजूद यहां करोड़ों लोग रहते हैं और उनके घरों तक रोजाना पीने का पानी पहुंचता है।
आखिर ऐसा कैसे संभव है? इसके पीछे समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की आधुनिक तकनीक, विशाल डिसेलिनेशन प्लांट और सैकड़ों किलोमीटर लंबा पाइपलाइन नेटवर्क काम करता है।
रेगिस्तान में पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती
सऊदी अरब का अधिकांश हिस्सा बेहद सूखा और रेगिस्तानी है। देश के कई इलाकों में गर्मियों के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, जबकि बारिश भी बहुत कम होती है।
देश की बड़ी आबादी लाल सागर और फारस की खाड़ी के आसपास रहती है। वहीं अंदरूनी हिस्सों में कई इलाके बेहद शुष्क और कम आबादी वाले हैं। ऐसे में समुद्र के किनारे तैयार किए गए पानी को दूर बसे शहरों तक पहुंचाने के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया है।
समुद्र का खारा पानी बनता है पीने लायक
सऊदी अरब के लिए समुद्र पानी का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है, लेकिन समुद्री पानी सीधे पीने योग्य नहीं होता। इसमें बड़ी मात्रा में नमक और अन्य अशुद्धियां मौजूद होती हैं।
इसी वजह से देश में बड़े-बड़े डिसेलिनेशन प्लांट लगाए गए हैं। इन प्लांट में समुद्र से पानी खींचकर उसे कई चरणों में साफ किया जाता है और उसमें मौजूद नमक तथा दूसरी अशुद्धियों को अलग किया जाता है।
समुद्र से पानी प्लांट तक पहुंचाने के लिए तट के पास बड़े इनटेक पाइप लगाए जाते हैं। पानी के साथ समुद्री जीव और बड़े कण सिस्टम में न आएं, इसके लिए शुरुआती स्तर पर विशेष स्क्रीन का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके बाद पानी को अलग-अलग फिल्टर से गुजारा जाता है। पहले बड़े कण और अशुद्धियां हटाई जाती हैं, फिर सैंड फिल्टर और अन्य फिल्ट्रेशन सिस्टम के जरिए पानी को और साफ किया जाता है। इसके बाद बारीक कार्ट्रिज फिल्टर छोटे कणों को भी अलग करने में मदद करते हैं।
रिवर्स ऑस्मोसिस है सबसे अहम चरण
समुद्री पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया में रिवर्स ऑस्मोसिस बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें हाई-प्रेशर पंप समुद्री पानी को विशेष मेम्ब्रेन से गुजारते हैं।
इस मेम्ब्रेन से पानी के अणु आगे निकल जाते हैं, जबकि नमक और कई दूसरी अशुद्धियां पीछे रह जाती हैं। इस प्रक्रिया के बाद पानी काफी हद तक शुद्ध हो जाता है।
हालांकि, रिवर्स ऑस्मोसिस के बाद पानी में जरूरी मिनरल की मात्रा भी कम हो सकती है। इसलिए इसे पीने योग्य बनाने के लिए कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी मिनरल दोबारा मिलाए जाते हैं। साथ ही पानी का pH स्तर भी नियंत्रित किया जाता है।
सैकड़ों किलोमीटर तक जाती हैं पानी की पाइपलाइन
पानी को समुद्र के किनारे तैयार करने के बाद असली चुनौती उसे रेगिस्तान के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचाने की होती है। इसके लिए सऊदी अरब ने विशाल पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया है।
इन पाइपलाइनों के जरिए डिसेलिनेशन प्लांट से तैयार पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर शहरों और दूसरे इलाकों तक पहुंचाया जाता है। इसे रेगिस्तान के बीच बनी एक कृत्रिम नदी की तरह समझा जा सकता है।
इतनी गर्मी में कैसे टिकती हैं पाइपलाइन?
रेगिस्तान में पाइपलाइन बिछाना आसान काम नहीं है। तेज गर्मी, रेत के खिसकने और जमीन के दबाव जैसी कई चुनौतियां सामने आती हैं।
इसके लिए मजबूत सामग्री से पाइप तैयार किए जाते हैं। बड़े पैमाने पर कार्बन स्टील का इस्तेमाल किया जाता है। पाइप तैयार होने के बाद उनकी अल्ट्रासोनिक टेस्टिंग की जाती है और जंग से बचाने के लिए विशेष कोटिंग भी की जाती है।
पाइपलाइन बिछाने से पहले सर्वे टीमें इलाके का निरीक्षण करती हैं। GPS और आधुनिक सर्वे उपकरणों की मदद से पाइपलाइन का रास्ता तय किया जाता है। ऐसे क्षेत्रों से बचने की कोशिश की जाती है जहां रेत के टीले लगातार खिसकते रहते हैं या जमीन पाइपलाइन के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
इस पूरे सिस्टम पर खर्च होता है भारी पैसा
सऊदी अरब के लिए समुद्री पानी को पीने योग्य बनाना और फिर उसे दूर-दराज के शहरों तक पहुंचाना बेहद महंगा काम है।
बड़े डिसेलिनेशन प्लांट बनाने और चलाने के अलावा पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंचाने के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क की जरूरत होती है। इसके निर्माण, रखरखाव और पानी की पंपिंग पर भी भारी खर्च आता है।
दरअसल, सऊदी अरब में पानी की पूरी व्यवस्था उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों की मजबूरी भी है। जहां नदियां और बारिश बेहद सीमित हैं, वहां आधुनिक तकनीक ने समुद्र को ही मीठे पानी के बड़े स्रोत में बदल दिया है।
यही वजह है कि डिसेलिनेशन प्लांट और विशाल पाइपलाइन नेटवर्क सऊदी अरब के लिए सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने वाला बेहद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा बन चुका है।
Saudi Arabia has no rivers… yet billions of litres of freshwater are produced every day.
So how does a desert country turn the ocean into drinking water?