सिंगापुर सरकार ने प्रधानमंत्री, मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों की सैलरी बढ़ाने का फैसला किया है. इस फैसले के बाद प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग की सालाना कमाई में बड़ा इजाफा होने जा रहा है. नई व्यवस्था लागू होने के बाद उनका सालाना पैकेज करीब 36 लाख सिंगापुर डॉलर यानी लगभग 27 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.
फिलहाल वोंग को करीब 22 लाख सिंगापुर डॉलर, यानी लगभग 16 करोड़ रुपये सालाना मिलते हैं. प्रस्तावित बढ़ोतरी के बाद उनकी कमाई में 60 फीसदी से ज्यादा का इजाफा होगा. इससे सिंगापुर के प्रधानमंत्री दुनिया में सबसे ज्यादा वेतन पाने वाले राजनीतिक नेताओं में और ऊपर पहुंच जाएंगे.
मंत्रियों की सैलरी भी बढ़ेगी
सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि सिंगापुर के मंत्रियों के वेतन में भी बढ़ोतरी की गई है. अभी एक मंत्री को करीब 11 लाख सिंगापुर डॉलर यानी लगभग 8.20 करोड़ रुपये सालाना मिलते हैं. नई व्यवस्था में यह राशि करीब 12 लाख सिंगापुर डॉलर यानी लगभग 8.95 करोड़ रुपये हो जाएगी.
प्रधानमंत्री वोंग के मुताबिक, मौजूदा सरकार का कार्यकाल पूरा होने तक ज्यादातर मंत्रियों की सालाना कमाई करीब 13.5 लाख सिंगापुर डॉलर यानी लगभग 10 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती है. खास बात यह है कि वेतन का कुछ हिस्सा सरकार के प्रदर्शन से भी जुड़ा रहेगा. यानी रोजगार बढ़ाने, लोगों की आय में सुधार और GDP ग्रोथ जैसे तय लक्ष्यों को हासिल करने पर मंत्रियों को कई लाभ मिल सकते है.
भ्रष्टाचार रोकने में मददगार है ज्यादा सैलरी
सिंगापुर सरकार लंबे समय से अपने नेताओं को ऊंची सैलरी देने की नीति का समर्थन करती रही है. सरकार का तर्क है कि अगर मंत्रियों को अच्छा वेतन दिया जाए, तो राजनीति में प्रतिभाशाली और योग्य लोग आने के लिए आकर्षित होंगे. साथ ही इससे भ्रष्टाचार से दूरी बनाए रखने में भी मदद मिल सकती है. सिंगापुर को दुनिया के कम भ्रष्ट देशों में गिना जाता है और सरकार अपनी वेतन व्यवस्था को इसके पीछे के महत्वपूर्ण कारणों में से एक मानती है.
आम लोगों के बीच उठे सवाल
हालांकि, इतनी बड़ी सैलरी बढ़ोतरी को लेकर देश में बहस भी शुरू हो गई है. आम नागरिकों की आय नेताओं के मुकाबले काफी कम है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सिंगापुर में औसत सालाना आय करीब 5,775 सिंगापुर डॉलर यानी लगभग 4.30 लाख रुपये बताई गई है.
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि महंगाई, रोजगार और युवाओं की नौकरी जैसी समस्याओं पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. वहीं, कुछ लोग इस फैसले के समर्थन में भी हैं. उनका मानना है कि देश की जिम्मेदारी संभालने वाले लोगों को उनकी क्षमता और जिम्मेदारी के अनुरूप वेतन मिलना जरूरी है. हालाकि, यह खबर भी सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी पर आधारित है
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नहाने के सबसे पहले लोग तौलिया का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि तौलिया सूखा और साफ जरूर हो. लेकिन कई बार समय की कमी के चलते लोग इसे साफ नहीं कर पाते. तो ऐसे में जान लें कि आपको इसे हफ्ते में कितनी बार साफ करना जरूरी है.
नहाने के बाद तौलिये से बॉडी को सुखाना हमारी रोज की आदत है. साथ ही हमारी चाह होती है तौलिया साफ सुथरी भी हो. लेकिन कई लोगों में आदत होती है कि वह कई दिनों तक एक ही तौलिये को इस्तेमाल करते हैं और फिर उसे हफ्ते में एक बार धोते हैं. लेकिन क्या यह सही तरीका है?
तौलिये को लंबे समय तक बिना धोए इस्तेमाल करना ठीक नहीं है. तौलिये में नमी, पसीना, स्किन की गंदगी और कई तरह के कीटाणु जमा हो सकते हैं. तो ऐसे में सवाल है कि क्या हमें तौलिये को रोज धोना चाहिए?
कितने दिन के गैप पर धोएं तौलिया?
आम तौर पर नहाने वाले तौलिये को 3 से 4 बार इस्तेमाल करने के बाद धोना चाहिए. अगर तौलिया हर बार इस्तेमाल के बाद पूरी तरह सूख जाता है, तो इसे कुछ और बार इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन हफ्ते में कम से कम एक बार तौलिया धोना जरूरी माना जाता है. यानी रोज नहाने वाले व्यक्ति को सप्ताह में एक या दो बार तौलिया बदलना चाहिए.
क्यों गीला तौलिया नहीं है बॉडी के लिए ठीक
तौलिये को इस्तेमाल करने के बाद उसे अच्छी तरह सुखाना बहुत जरूरी है. गीला तौलिया लंबे समय तक पड़ा रहने पर उसमें बैक्टीरिया और फंगस तेजी से बढ़ सकते हैं. इसलिए तौलिये को मोड़कर या गंदे कपड़ों के ढेर में रखने के बजाय उसे पूरी तरह फैलाकर सुखाएं. तौलिया को बार पर फैलाकर रखना बेहतर रहता है. इससे वह दोनों तरफ से आसानी से सूख जाता है.
जल्दी-जल्दी बदलें हाथ और जिम वाला तौलिया
हाथ पोंछने वाले तौलिये को नहाने वाले तौलिये की तुलना में जल्दी बदलना चाहिए. इसका इस्तेमाल बार-बार होता है और कई लोग इसे छूते हैं. ऐसे में इसमें कीटाणु जमा होने के चांस ज्यादा होते हैं. जिम में इस्तेमाल होने वाले तौलिये को भी ज्यादा समय तक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, खासकर जब उसमें पसीना लगा हो.
बीमारी में रोज बदलें तौलिया
अगर किसी व्यक्ति को स्किन इंफेक्शन, सर्दी-जुकाम या कोई दूसरी बीमारी है, तो तौलिया ज्यादा बार बदलना चाहिए. शरीर पर घाव, कट या स्किन से जुड़ी परेशानी होने पर भी साफ तौलिये का इस्तेमाल करना बेहतर है. ऐसे मामलों में तौलिया किसी दूसरे व्यक्ति के साथ शेयर नहीं करना चाहिए.
तौलिया धोते समय किन बातों का रखें ध्यान
तौलिया को केवल धोना काफी नहीं है. उसके लिए जितना जरूरी धोना है, उससे ज्यादा जरूरी ड्राय करना है. साथ ही धोते समय जरूरत से ज्यादा डिटर्जेंट या फैब्रिक सॉफ्टनर का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे तौलिये की पानी सोखने की शक्ति कम हो सकती है. अगर तौलिये से बार-बार बदबू आती है, तो उसे अच्छी तरह धोने के साथ समय पर बदलना भी जरूरी है.
फिरोजाबाद में आशिकी ऐसी चढ़ी कि युवक एकतरफा प्यार ने युवती को बार-बार कॉल करता था. जिससे परेशान लड़की ने उसका नंबर ब्लॉक कर दिया. जिसके बाद आशिकी बदली गुस्से में और युवक ने चल दी गोली.
फिरोजाबाद के टूंडला थाना क्षेत्र के गांव उसायनी में मंगलवार दोपहर सनसनीखेज वारदात सामने आई. आरोप है कि एकतरफा प्यार में ग्राम प्रधान प्रतिनिधि ने घर में घुसकर एक युवती पर गोली चला दी गई. जानकारी के मुताबिक, आरोपी युवती को लगातार फोन कर परेशान करता था. जिससे परेशान होकर युवती ने उस नंबर को ब्लॉक लिस्ट में डाल दिया. लेकिन युवती की ये बात एकतरफे आशिक का नागवार गुजरी. इसी बात से नाराज होकर आरोपी कथित तौर पर अवैध पिस्टल लेकर युवती के घर पहुंच गया.
गुस्से में किए कर दी फायरिंग
वारदात के दिन गुस्साया आरोपी उस मकान की दूसरी मंजिल पर पहुंचा, जहां युवती बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी. आरोपी ने सिर गुस्सा इस कदर सवार था कि उसने युवती से बात सुलझाना भी ठीक नहीं समझा और उसने युवती को निशाना बनाकर लगातार तीन फायर किए. इनमें से एक गोली युवती के बाएं कंधे को चीरते हुए निकल गई, जबकि दो गोलियां कमरे के सोफे और दीवार में जा लगीं. गोली चलने की आवाज से घर में चीख-पुकार मच गई. वारदात के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया.
युवती का भाई है दरोगा, हो रही फरार आरोपी की दबिश
घायल युवती को तत्काल सरकारी ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहां उसका उपचार चल रहा है. बताया गया है कि घायल युवती का भाई उत्तर प्रदेश पुलिस में दरोगा है और वर्तमान में कन्नौज जनपद में तैनात है. घटना की सूचना मिलते ही सीओ टूंडला अरुण कुमार चौरसिया और थाना प्रभारी बैजनाथ सिंह पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे.
पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण कर मामले की जांच शुरू कर दी है. परिजनों की तहरीर के आधार पर आरोपी के खिलाफ जानलेवा हमले समेत संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज करने की कार्रवाई की जा रही है. आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की कई टीमें संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं.
हाथों पर सजने वाली मेहंदी सिर्फ खूबसूरती बढ़ाने का काम नहीं करती, यह कमाई भी करा सकती है. अमेरिका में रहने वाली एक भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने इस हुनर को पार्ट टाइम काम बनाया और अब एक घंटे की मेहंदी के बदले मिलने वाली रकम जानकर लोग हैरान हैं.
कई बार कोई ऐसा हुनर, जिसे हम अपने आसपास बहुत हल्के में लेते हैं, विदेश में कमाई का शानदार जरिया बन जाता है. भारत में मेहंदी लगाना हमेशा से शादी-ब्याह और त्योहारों तक सीमित काम माना जाता है. लेकिन अमेरिका में रहने वाली एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने दिखाया है कि अगर हुनर में निपुणता हो, तो उससे अच्छी-खासी कमाई की जा सकती है. खास बात यह है कि वह दिन में सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी करती हैं और खाली समय में प्रोफेशनल मेहंदी आर्टिस्ट के तौर पर काम करती हैं. दरअसल, इस महिला का नाम प्रियंका जैन है. उन्होंने अपने इंस्टाग्राम @priyancka.jaiin पर अपनी साइड इनकम के बारे में बताया, जिसे सुनकर कई लोग हैरान रह गए. उन्होंने बताया कि अमेरिका में मेहंदी डिजाइन बनाने के लिए वह करीब 100 डॉलर प्रति घंटे चार्ज करती हैं. भारतीय रुपये में यह रकम लगभग 9,000 से 10,000 रुपये प्रति घंटे बैठती है.
सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी, साथ में मेहंदी का काम
प्रियंका जैन अमेरिका में फुल-टाइम सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम करती हैं. उनकी मुख्य नौकरी से हर महीने के खर्च पूरे होते हैं, लेकिन मेहंदी का हुनर उनके लिए अतिरिक्त कमाई का जरिया बन गया है. उन्होंने एक इंस्टाग्राम पोस्ट में बताया कि वह पार्ट-टाइम प्रोफेशनल मेहंदी आर्टिस्ट के रूप में काम करती हैं. यानी एक तरफ वह कंप्यूटर पर कोडिंग करती हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने हाथों से खूबसूरत मेहंदी डिजाइन बनाकर कमाई करती हैं. उनकी कहानी की खास बात यही है कि उन्होंने अपने शौक को सिर्फ शौक तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने अपनी क्रिएटिविटी को एक ऐसे काम में बदल दिया, जिससे उन्हें अच्छी एक्स्ट्रा इनकम हो रही है.
1 घंटे की कमाई करीब 10 हजार रुपये
प्रियंका के मुताबिक, वह मेहंदी डिजाइनिंग के लिए करीब 100 डॉलर प्रति घंटे चार्ज करती हैं. भारतीय रुपये में यह रकम लगभग 9 से 10 हजार रुपये प्रति घंटे होती है. यानी अगर वह किसी ग्राहक के लिए सिर्फ दो घंटे काम करती हैं, तो उनकी कमाई करीब 18 से 20 हजार रुपये तक पहुंच सकती है. इसके अलावा ग्राहकों की तरफ से उन्हें टिप भी मिलती है. उन्होंने बताया कि कई बार ग्राहक बिल के ऊपर 20 फीसदी तक टिप भी दे देते हैं. इस तरह उनकी वास्तविक कमाई सिर्फ तय किए गए प्रति घंटे के रेट तक सीमित नहीं रहती.
ब्राइडल मेहंदी से एक दिन में करीब 1 लाख रुपये
मेंहंदी की कमाई तब और ज्यादा बढ़ जाती है, जब उन्हें किसी शादी या ब्राइडल बुकिंग का काम मिलता है. शादी के लिए दुल्हन की मेहंदी में काफी बारीक और डिटेल डिजाइन बनाए जाते हैं और इसमें कई घंटे लग सकते हैं. प्रियंका ने बताया कि एक डिटेल्ड 10 घंटे की वेडिंग असाइनमेंट से उन्हें करीब 1 लाख रुपये तक की कमाई हो सकती है. उन्होंने इसकी रकम 1,200 डॉलर से ज्यादा बताई. यानी एक ही दिन में मेहंदी का काम उन्हें इतनी कमाई दे सकता है, जो कई लोगों के लिए काफी बड़ी रकम है. प्रियंका ने सिर्फ अपनी कमाई के बारे में ही बात नहीं की, बल्कि भारत और अमेरिका में कलाकारों को मिलने वाले सम्मान को लेकर भी अपना अनुभव भी शेयर किया. उन्होंने कहा कि अमेरिका आने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि यहां कलाकारों को काफी महत्व और सम्मान दिया जाता है. उनके मुताबिक, भारत में कई बार मेहंदी आर्टिस्ट को एक अच्छा या प्रतिष्ठित पेशा नहीं माना जाता, जबकि अमेरिका में उन्हें एक कलाकार के तौर पर देखा और सम्मान दिया जाता है. उन्होंने अपने वीडियो में हिंदी में कहा- “मुझे कभी ऐसा महसूस नहीं होता कि मैं कोई छोटा काम कर रही हूं, क्योंकि यहां कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता. काम, काम होता है.” उनकी यह बात सोशल मीडिया पर भी लोगों को काफी पसंद आई.
वायरल हुआ वीडियो, करीब 1 करोड़ लोगों ने देखा
यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया. खबर लिखे जाने तक इसे वीडियो को करीब 1 करोड़ से ज्यादा लोगों ने देख लिया है. इसके बाद बड़ी संख्या में लोगों ने कमेंट करके अपनी प्रतिक्रिया दी. कई लोगों ने कहा कि अमेरिका में अलग-अलग पेशों और हुनर को जिस तरह सम्मान दिया जाता है, वह काफी अच्छी बात है. वहीं कुछ लोगों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अगर उन्हें भी अपने हुनर की ऐसी कीमत मिलती, तो आज वह करोड़पति होते. एक यूजर ने लिखा- “अमेरिका में हर प्रोफेशन और कलाकार को सम्मान मिलता है.” वहीं एक अन्य यूजर ने कहा- ” अगर भारत में भी मेहंदी आर्टिस्ट को इतनी कमाई मिलती, तो वह अब तक करोड़पति बन चुके होते.” एक यूजर ने भारतीय समाज में नौकरी और पेशे को लेकर सोच पर भी सवाल उठाया. उसने लिखा कि समाज में अक्सर सरकारी नौकरी को ही अच्छा करियर माना जाता है, भले ही उसकी सैलरी सिर्फ 10 हजार रुपये क्यों न हो. वहीं कुछ लोगों ने उनकी सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की नौकरी को लेकर भी सवाल पूछे. एक यूजर ने जानना चाहा कि वह सॉफ्टवेयर के किस क्षेत्र में काम करती हैं, उनके पास कितने साल का अनुभव है और वह किस कंपनी के जरिए अमेरिका गईं. साथ ही उनसे यह भी पूछा गया कि इस क्षेत्र में काम करने के लिए किन स्किल्स की जरूरत होती है.
खर्च भी अमेरिका में कम नहीं
हालांकि, प्रियंका ने अपनी मेहंदी से होने वाली कमाई को लेकर अच्छी तस्वीर दिखाई, लेकिन उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका में रहने का खर्च काफी ज्यादा है. यानी 1 घंटे में करीब 9 से 10 हजार रुपये की कमाई सुनने में भले ही बहुत बड़ी लगे, लेकिन वहां घर का किराया, खाना, ट्रांसपोर्ट और दूसरी जरूरतों पर भी काफी पैसा खर्च होता है. फिर भी उनकी कहानी यह जरूर बताती है कि अगर किसी के पास कोई खास हुनर है और वह उसे सही तरीके से पेश करना जानता है, तो वह नौकरी के साथ-साथ अपनी अतिरिक्त कमाई का रास्ता भी बना सकता है.
अहमदाबाद: दूसरी शादी के लिए मैट्रिमोनियल साइट पर पार्टनर तलाश रहे अहमदाबाद के एक व्यापारी के साथ करोड़ों रुपये की साइबर ठगी का मामला सामने आया है। आरोप है कि मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म के जरिए संपर्क में आई कनाडा की युवती ने पहले व्यापारी का भरोसा जीता और फिर फार्मास्युटिकल कच्चे माल में निवेश कर भारी मुनाफा कमाने का लालच दिया।
व्यापारी युवती के बताए लोगों और बैंक खातों पर भरोसा करता चला गया और करीब 1.10 करोड़ रुपये अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिए। रकम मिलने के बाद जब युवती से संपर्क नहीं हो पाया तो व्यापारी को अपने साथ हुई ठगी का एहसास हुआ। इसके बाद उसने साइबर क्राइम में शिकायत दर्ज कराई।
पत्नी की मौत के बाद बनाया था मैट्रिमोनियल प्रोफाइल
मामला अहमदाबाद के चांदखेड़ा इलाके का बताया जा रहा है। यहां रहने वाले 51 वर्षीय व्यापारी मशीनरी एक्सपोर्ट का कारोबार करते हैं। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। इसके बाद उन्होंने दूसरी शादी के लिए करीब आठ महीने पहले एक गुजराती मैट्रिमोनियल साइट पर अपना प्रोफाइल बनाया था।
इसी दौरान उनकी बातचीत एक ऐसी महिला से शुरू हुई, जिसने खुद को कनाडा में रहने वाली बताया। धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत बढ़ी और महिला ने शादी के लिए अपनी सहमति भी जताई।
खुद को कनाडा में काम करने वाली बताया
शिकायत के मुताबिक, महिला ने व्यापारी को बताया कि वह मूल रूप से दिल्ली की रहने वाली है और फिलहाल टोरंटो में एक कंपनी में चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर काम करती है।
बातचीत के दौरान महिला ने व्यापारी के सामने निवेश से अच्छी कमाई का प्रस्ताव रखा। उसने दावा किया कि उसकी कंपनी को दवा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल की जरूरत है और भारत से कम कीमत पर यह माल खरीदकर कनाडा में ज्यादा कीमत पर बेचा जा सकता है।
पहले छोटे निवेश से बनाया भरोसा
आरोप है कि व्यापारी को भरोसा दिलाने के लिए शुरुआत में एक छोटे सौदे का लालच दिया गया। उसे बताया गया कि करीब 2.50 लाख रुपये में फार्मास्युटिकल कच्चे माल का सैंपल खरीदा जाएगा और कनाडा की कंपनी को इसे करीब 4.50 लाख रुपये में बेचकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है।
छोटे सौदे में बड़े मुनाफे का भरोसा दिलाने के बाद व्यापारी को बड़े ऑर्डर की जानकारी दी गई। इसके लिए उससे लगातार बड़ी रकम निवेश करने को कहा गया।
महिला ने व्यापारी की पहचान एक कथित सप्लायर से भी कराई, जिसे भारती फार्मा से जुड़ा मेहराब बताया गया। इसके बाद व्यापारी को अलग-अलग खातों में रकम भेजने के लिए कहा गया।
दोस्तों और परिचितों से पैसे जुटाकर भेजे 1.10 करोड़
व्यापारी आरोपियों के झांसे में इस कदर आ गया कि उसने अपने दोस्तों और परिचितों से पैसे जुटाए। इसके बाद कुल करीब 1.10 करोड़ रुपये 24 अलग-अलग ट्रांजैक्शन के जरिए चार बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए।
व्यापारी को उम्मीद थी कि निवेश के बाद उसे बड़ा मुनाफा मिलेगा। लेकिन रकम ट्रांसफर होने के बाद परिस्थितियां बदलने लगीं।
कुछ समय बाद जिस युवती से लगातार बातचीत होती थी, उसका फोन बंद आने लगा। संपर्क करने की कई कोशिशों के बावजूद उससे बात नहीं हो सकी। इसके बाद व्यापारी को समझ आया कि वह किसी बड़े साइबर फ्रॉड का शिकार हो चुका है।
साइबर क्राइम में शिकायत, जांच शुरू
ठगी का पता चलने के बाद व्यापारी ने साइबर क्राइम हेल्पलाइन से संपर्क किया और पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
शिकायत के आधार पर साइबर क्राइम ब्रांच ने स्मिता शेट्टी, मेहराब और फ्रेड ब्रैंडन समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
पुलिस अब उन बैंक खातों की जांच कर रही है, जिनमें व्यापारी ने रकम ट्रांसफर की थी। इसके साथ ही मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस और अन्य डिजिटल जानकारी के जरिए आरोपियों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है।
पुलिस को आशंका है कि इस मामले में एक से ज्यादा लोग शामिल हो सकते हैं और मैट्रिमोनियल साइट के जरिए भरोसा जीतकर निवेश के नाम पर ठगी करने वाला पूरा नेटवर्क काम कर रहा हो सकता है।
फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और ठगी की रकम के लेन-देन से जुड़े बैंक खातों और डिजिटल सबूतों की पड़ताल की जा रही है।
नई दिल्ली । रात के समय आसमान में हरा, बैंगनी, गुलाबी, लाल और नीले रंगों की रोशनी को देखकर मन में जिज्ञासा होना लाजमी है। इस कमाल के जादू को ऑरोरा लाइट्स कहते हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ऑरोरा लाइट्स के बारे में विस्तार से जानकारी देती है। ऑरोरा लाइट्स को उत्तरी इलाकों में नॉर्दर्न लाइट्स या ऑरोरा बोरेलिस और दक्षिणी इलाकों में सदर्न लाइट्स या ऑरोरा ऑस्ट्रेलिस कहते हैं।
यह प्रकृति का सबसे खूबसूरत नजारा है, जो चार्ज्ड पार्टिकल्स से बनता है। वैज्ञानिक इसे स्पेस वातावरण का बेहतरीन उदाहरण मानते हैं। सूरज से लगातार चार्ज्ड कणों से प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन का एक प्रवाह निकलता है, जिसे सोलर विंड कहते हैं। जब यह सोलर विंड पृथ्वी के पास आती है, तो पृथ्वी का चुंबकीय ढाल यानी मैग्नेटोस्फीयर इससे टकरा जाता है। इस टक्कर से ऊर्जा जमा होती है। जब यह ऊर्जा अचानक निकलती है, तो कण वायुमंडल में घुस जाते हैं और ऑक्सीजन, नाइट्रोजन जैसी गैसों से टकराते हैं। इन टक्करों से गैसें एक्टिव हो जाती हैं और रंगीन रोशनी छोड़ती हैं, यही ऑरोरा है।
अब सवाल उठता है कि इनके रंग अलग-अलग क्यों होते हैं? यह इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सी गैस टकराई और वह कितनी ऊंचाई पर थी। हरा रंग सबसे ज्यादा दिखता है, जो 100-200 किमी ऊंचाई पर ऑक्सीजन से बनता है। लाल रंग ज्यादा ऊंचाई यानी 200 किमी से अधिक पर ऑक्सीजन से आता है। वहीं, नीला और बैंगनी नाइट्रोजन गैस से बनते हैं, खासकर 100-200 किमी ऊंचाई पर। गुलाबी या लाल-बैंगनी तब दिखता है जब नाइट्रोजन कम ऊंचाई या 100 किमी से नीचे पर उत्तेजित होता है।
कभी-कभी ये रंग मिलकर सफेद, बैंगनी या गुलाबी चमक भी बनाते हैं, जिससे आसमान में रंगों का जादू साफ दिखता है। जब सूरज बहुत सक्रिय होता है, जैसे सोलर फ्लेयर या बड़े विस्फोट से तो जियोमैग्नेटिक स्टॉर्म यानी चुंबकीय तूफान आते हैं। इन तूफानों में ज्यादा ऊर्जा वायुमंडल में गिरती है, जिससे बहुत दूर के इलाकों में भी शानदार ऑरोरा दिखाई देता है।
वैज्ञानिक ऑरोरा का अध्ययन जमीन पर लगे उपकरणों से करते हैं, जो मैग्नेटोमीटर चुंबकीय बदलाव मापते हैं, रडार ऊपरी वायुमंडल को देखते हैं और स्पेशल कैमरे रीयल-टाइम तस्वीरें लेते हैं। दुनिया भर की कई एजेंसियां मिलकर इसकी रिसर्च करती हैं।
आमतौर पर जब कोई व्यक्ति जमीन खरीदता है तो उसके मन में घर, खेत या किसी तरह का कारोबार शुरू करने का ख्याल होता है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया की एनी शोएनबर्गर ने जमीन खरीदी तो उनका मकसद इन सबसे बिल्कुल अलग था. उन्होंने ऐसी जगह पर जंगल बसाने का सपना देखा, जहां कभी गन्ने की फसल हुआ करती थी. साल 2014 में एनी ने क्वींसलैंड में गन्ने की कटाई के बाद खाली पड़े करीब 18 एकड़ जमीन के एक बड़े हिस्से को खरीदा. उस वक्त शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आने वाले कुछ सालों में यह जमीन अपना पूरा रूप बदल लेगी. जहां दूर-दूर तक खाली जमीन नजर आती थी, वहां एक दिन घना वर्षावन(Rain Forest) खड़ा होगा और हजारों जीवों को अपना घर मिलेगा.
खाली खेत पर शुरू हुई जंगल उगाने की मुहिम एनी ने जमीन खरीदने के बाद वहां कोई इमारत खड़ी नहीं की, बल्कि पेड़ लगाने का काम शुरू कर दिया. साल 2015 से जमीन को दोबारा हरा-भरा करने की कोशिश शुरू हुई. इसके लिए नाइटविंग्स रेनफॉरेस्ट सेंटर की मदद ली गई और धीरे-धीरे बड़ी संख्या में लोग इस मुहिम से जुड़ते चले गए. यह काम किसी एक दिन या एक मौसम में पूरा होने वाला नहीं था. पौधे लगाने के साथ उनकी देखभाल करना, जमीन को दोबारा जंगल के अनुकूल बनाना और लंबे समय तक इस काम को जारी रखना भी जरूरी था. एनी को इस सफर में सैकड़ों वालंटियर्स का साथ मिला.
एक साल में ही लगा दिए हजारों पौधे इस जंगल को तैयार करने में लोगों की भागीदारी कितनी बड़ी थी, इसका अंदाजा साल 2023 के आंकड़े से लगाया जा सकता है. उस साल 140 से ज्यादा वालंटियर्स ने मिलकर करीब 3,300 पेड़ लगाए थे. ऐसे ही लगातार कई वर्षों तक पौधे लगाए जाते रहे. धीरे-धीरे खाली पड़ी जमीन पर हरियाली बढ़ती गई और छोटे-छोटे पौधे पेड़ों में बदलने लगे. एक दशक की मेहनत के बाद यहां पेड़ों की संख्या बढ़कर 1,19,000 से ज्यादा हो गई. यानी जिस जमीन को कभी गन्ने की कटाई के बाद खाली छोड़ दिया गया था, वह अब एक घने वर्षावन का रूप ले चुकी है.
अब सिर्फ पेड़ नहीं, पूरा इकोसिस्टम बदल गया इस कहानी की सबसे खास बात सिर्फ 1,19,000 पेड़ उगाना नहीं है. असली बदलाव तो उस वक्त दिखाई दिया, जब इस इलाके में दोबारा जीव-जंतुओं की मौजूदगी बढ़ने लगी. आज यह जंगल कई तरह के जीवों का घर बन चुका है. यहां फ्लाइंग फॉक्स प्रजाति के खास चमगादड़ के साथ 75 से ज्यादा अन्य जीवों की प्रजातियां भी पाई जाती हैं. इनमें कुछ दुर्लभ प्रजातियां भी शामिल हैं. एक समय जिस जमीन का इस्तेमाल गन्ने की खेती के लिए किया जाता था, वही अब वन्यजीवों के लिए आश्रय बन चुकी है. पेड़ों के बढ़ने के साथ पक्षियों, चमगादड़ों और दूसरे जीवों के लिए भी रहने और भोजन का प्राकृतिक वातावरण तैयार हुआ. एनी और वालंटियर्स की सालों की मेहनत ने इस जगह को सिर्फ हरा-भरा ही नहीं बनाया, बल्कि इसका प्राकृतिक महत्व भी बढ़ा दिया. क्वींसलैंड सरकार ने इस क्षेत्र को हाई नेचर कंजर्वेशन वैल्यू का दर्जा दिया है. एनी शोएनबर्गर की कहानी इस बात की एक दिलचस्प मिसाल है कि किसी जमीन की कीमत सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि वहां क्या बनाया जा सकता है. कभी-कभी किसी खाली जमीन पर कुछ न बनाकर पेड़ लगाना ही उसे सबसे कीमती बना देता है. आज वहां खड़े 1,19,000 से ज्यादा पेड़ सिर्फ हरियाली नहीं हैं, बल्कि करीब एक दशक की मेहनत, धैर्य और प्रकृति को वापस उसका घर देने की कोशिश की कहानी भी हैं.
बस वो एक आवाज… और फिर हुआ दो बिछड़े भाइयों का मिलन. 35 साल से एक-दूसरे से दूर रह रहे दो भाइयों ने शायद सोचा भी नहीं होगा कि उनकी मुलाकात इतनी अचानक और इस तरह होगी. लेकिन हरियाणा के जींद में SIR के दौरान वोटर लिस्ट सत्यापन के बीच एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने 35 साल पुरानी दूरी को पलभर में खत्म कर दिया. फोन पर जैसे ही एक भाई ने दूसरे की आवाज सुनी, उसने तुरंत पहचान लिया. इसके बाद जो हुआ, वहां मौजूद हर शख्स भावुक हो गया.
दरअसल, जींद के रहने वाले सीताराम करीब 35 साल पहले अपना परिवार छोड़कर पंजाब चले गए थे. वक्त गुजरता गया और परिवार से उनका संपर्क भी धीरे-धीरे खत्म हो गया. 35 साल का लंबा वक्त बीत गया, लेकिन दोनों भाइयों की मुलाकात नहीं हो पाई. हाल ही में सीताराम अपने गांव पहुंचे थे. उन्हें कुछ पुराने दस्तावेज लेने के लिए गांव के स्कूल जाना था. इसी दौरान वहां SIR यानी वोटर लिस्ट के सत्यापन का काम चल रहा था. स्कूल में उनकी मुलाकात BLO से हुई.
बातचीत के दौरान BLO ने सीताराम से उनके परिवार के बारे में पूछा. इसी बीच उनके भाई का जिक्र हुआ. BLO ने जब उनके भाई से फोन पर संपर्क किया, तो शायद किसी को अंदाजा नहीं था कि यह फोन कॉल पुरानी कहानी का अगला अध्याय लिखने वाली है. फोन पर दूसरी तरफ मौजूद भाई ने जैसे ही सीताराम की आवाज सुनी, वह उन्हें पहचान गया. इतने साल बीत जाने के बाद भी भाई की आवाज की पहचान दिल में कहीं बाकी थी.
इसके बाद दोनों भाइयों की मुलाकात हुई. जब दोनों आमने-सामने आए तो भावनाएं संभालना मुश्किल हो गया. दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया. इतने लंबे समय की दूरी जैसे उस एक पल में खत्म हो गई. एक तरफ 35 साल की जुदाई थी तो दूसरी तरफ भाई के वापस मिल जाने की खुशी. दोनों की आंखों में आंसू थे और चेहरे पर अपनेपन की वही पहचान, जो वक्त और दूरी भी मिटा नहीं सकी. फूट-फूट कर दोनों रोने लगे. एक-दूसरे के आंसू पोंछते फिर दोनों एक दूसरे को देखते. यहां देखें वीडियो…
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे खास बात यह रही कि दोनों भाइयों को मिलाने का जरिया कोई रिश्तेदार या पुराना परिचित नहीं, बल्कि SIR के दौरान चल रही वोटर लिस्ट सत्यापन प्रक्रिया बनी. सीताराम अगर उस दिन पुराने दस्तावेज लेने गांव नहीं पहुंचते, BLO उनसे परिवार के बारे में सवाल नहीं पूछते और फिर फोन पर भाई से संपर्क नहीं होता, तो शायद यह मिलन अभी और दूर होता.
लेकिन कभी-कभी रिश्तों को फिर से जोड़ने के लिए सालों की कोशिश नहीं, सिर्फ एक छोटी-सी वजह काफी होती है. जींद में भी ऐसा ही हुआ. एक सवाल पूछा गया, एक फोन कॉल हुआ और फिर एक आवाज ने 35 साल से बिछड़े दो भाइयों को हमेशा के लिए फिर से मिला दिया.
ड्राई फार्मिंग पानी की समस्या का कोई जादुई समाधान नहीं है. बहुत रेतीली या कम गहराई वाली मिट्टी, जिसमें पानी रोकने की क्षमता कम हो, वहां यह तरीका मुश्किल हो सकता है.
अमेरिका के ओरेगन के एक किसान ने खेती का ऐसा तरीका अपनाया, जिसमें फसलों को नियमित रूप से पानी देने की जरूरत ही नहीं पड़ी. किसान ने करीब 40 साल तक बिना सिंचाई के खेती करके दिखाया कि अगर मिट्टी में मौजूद पानी को सही तरीके से बचाया जाए तो उससे पूरे सीजन फसल उगाई जा सकती है. इस तकनीक को ड्राई फार्मिंग (Dry Farming) कहा जाता है. ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की 2014 की एक रिपोर्ट में किसान के करीब चार दशक के अनुभव को दर्ज किया गया था.
क्या होती है ड्राई फार्मिंग? ड्राई फार्मिंग का मतलब यह नहीं है कि खेत में पानी देना पूरी तरह बंद कर दिया जाए और पौधों को अपने हाल पर छोड़ दिया जाए. इसमें असली काम मिट्टी की नमी को संभालने का होता है. सर्दियों और वसंत में मिट्टी में जमा होने वाले पानी को इस तरह सुरक्षित रखा जाता है कि गर्म और सूखे मौसम में पौधों की जड़ों को वह नमी मिलती रहे.
किसान ने कैलिफोर्निया में इस तरीके से खेती शुरू की थी. बाद में 2007 में वह ओरेगन के वेनेटा के पास 9.6 एकड़ जमीन पर आ गया. इस जमीन पर उसके पास पानी का अधिकार नहीं था. इसके बावजूद उसने अपने परिवार के लिए खेती की और यूजीन की छोटी किराना दुकानों में अपनी उपज बेची. यहां उसने ऑर्गेनिक टमाटर, आलू, विंटर स्क्वैश, लहसुन और अलग-अलग तरह की बीन्स उगाईं.
मिट्टी तैयार करना था सबसे बड़ा काम इस खेती में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मिट्टी की थी. किसान वसंत में बारिश के बाद आने वाले पहले अच्छे सूखे दौर का इंतजार करता था. जब मिट्टी इतनी नम होती कि दबाने पर एक साथ रहे, लेकिन इतनी सूखी भी हो कि आसानी से टूट जाए, तब वह उसकी जुताई करता था. इसके बाद खेत को दो-तीन हफ्तों के लिए छोड़ दिया जाता और फिर दोबारा मिट्टी तैयार की जाती. इस प्रक्रिया से ऐसी मिट्टी तैयार होती थी, जो पौधों की जड़ों के आसपास नमी को लंबे समय तक रोक सके. उसके खेत की मिट्टी मुख्य रूप से वेनेटा लोम थी, जबकि नीचे मौजूद चिकनी मिट्टी की परत पानी को रोकने में मदद करती थी. किसान ने मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए भेड़, हंस और लेग्यूम कवर क्रॉप्स का भी इस्तेमाल किया.
पौधों के बीच ज्यादा दूरी, कम पानी की बर्बादी बीज बोने के बाद भी किसान नमी बचाने पर पूरा ध्यान देता था. बीजों को मिट्टी में डालकर उनके ऊपर पैर रखने से मिट्टी और बीज का संपर्क मजबूत होता था. पौधों के आसपास करीब 4 से 6 इंच तक मिट्टी को ढीला रखा जाता था, जिससे जड़ों को फैलने की जगह मिले और पानी जमीन के अंदर बना रहे. पौधों के बीच पर्याप्त दूरी भी रखी जाती थी, ताकि सीमित पानी और पोषक तत्वों के लिए पौधों में ज्यादा प्रतिस्पर्धा न हो. दिलचस्प बात यह थी कि दूरी इतनी रखी जाती थी कि किसान अपने ट्रैक्टर से आसानी से खेत में काम कर सके और ज्यादातर काम अकेले संभाल सके.
हर जगह काम नहीं करेगी यह तकनीक ड्राई फार्मिंग पानी की समस्या का कोई जादुई समाधान नहीं है. बहुत रेतीली या कम गहराई वाली मिट्टी, जिसमें पानी रोकने की क्षमता कम हो, वहां यह तरीका मुश्किल हो सकता है. कुछ फसलें भी बिना सिंचाई के अच्छी तरह नहीं उग पातीं. फिर भी पानी की कमी, महंगी सिंचाई और पानी के अधिकार से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे किसानों के लिए यह तरीका एक विकल्प हो सकता है. ओरेगन के किसान के 40 साल के प्रयोग ने दिखाया कि सही मिट्टी, सही फसल, उचित दूरी और नमी के बेहतर प्रबंधन से बिना नियमित सिंचाई के भी खेती मुमकिन है.
भारतीय परंपरा में ‘सोलह श्रृंगार’ केवल रूप-सौंदर्य तक सीमित नहीं है. धार्मिक व ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, सिर से पैर तक धारण किए जाने वाले ये आभूषण ग्रहों को मजबूती प्रदान करते हैं, सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाते हैं और सेहत को संतुलित रखते हैं.
हर महिला की एक ख्वाहिश होती है कि वह सुंदर और आकर्षक नजर आए. अपने रूप को निखारने के लिए वह कई तरह के श्रृंगार करती है, लेकिन भारतीय संस्कृति में श्रृंगार का मतलब सिर्फ सुंदर दिखना नहीं है. महिला और श्रृंगार का रिश्ता शारीरिक सुंदरता तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसका संबंध भारतीय संस्कृति, परंपरा और स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है. ज्योतिष के जानकारों की मानें तो महिलाओं के श्रृंगार का उनकी किस्मत से भी सीधा संबंध माना जाता है. कहा जाता है कि श्रृंगार करने से ग्रहों को मजबूती मिलती है और जीवन में खुशियों का संचार होता है.
इसी वजह से सनातन परंपरा में सोलह श्रृंगार को सुहागिन महिलाओं के लिए खास माना गया है. मान्यता है कि इन सोलह श्रृंगारों से न सिर्फ रूप-सौंदर्य में निखार आता है, बल्कि सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और नकारात्मक ऊर्जा से भी रक्षा होती है. तो आइए जानते हैं सोलह श्रृंगार में शामिल उन खास चीजों के बारे में, जिन्हें लेकर मान्यताएं प्रचलित है.
सुहागिनों का खास आभूषण है सोलह श्रृंगार भारतीय संस्कृति में सोलह श्रृंगार को विवाहित स्त्री के सुहाग और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है. सोलह तरह की ये श्रृंगार सामग्री अलग-अलग आभूषणों और वस्तुओं के रूप में होती है, जिन्हें सौभाग्यवती महिलाएं धारण करती हैं. मान्यता है कि सिर से लेकर पैर तक किए जाने वाले इन श्रृंगारों का संबंध महिला के रूप-सौंदर्य के साथ-साथ शरीर के संतुलन से भी है. इसी वजह से सोलह श्रृंगार को केवल सजने-संवरने की चीज नहीं माना गया है.
सिंदूर पति के प्रेम और समर्पण का प्रतीक सोलह श्रृंगार में सिंदूर का अपना खास स्थान माना जाता है. इसे पति के प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. मान्यता है कि सिंदूर मस्तिष्क को शांत रखने में भी मदद करता है. सुहागिन महिलाओं के लिए सिंदूर को उनके वैवाहिक जीवन और सुहाग से जोड़कर देखा जाता है.
बिंदी आज्ञा चक्र से जुड़ी मान्यता माथे के बीचों-बीच लगाई जाने वाली बिंदी भी सोलह श्रृंगार का अहम हिस्सा है. इसे दोनों भौहों के बीच लगाया जाता है. मान्यता है कि भौहों के बीच का यह स्थान आज्ञा चक्र से जुड़ा होता है और बिंदी इसे जागृत करने में सहायक मानी जाती है.
मांग टीका मन को एकाग्र करने वाला श्रृंगार मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला मांग टीका भी महिलाओं के श्रृंगार को पूरा करता है. इसे सिर्फ खूबसूरती बढ़ाने वाला आभूषण नहीं माना जाता. मान्यता के अनुसार, मांग टीका मन को नियंत्रित करने और एकाग्रता बढ़ाने से जुड़ा है.
काजल से बढ़ता है आंखों का सौंदर्य आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए काजल लगाया जाता है. इससे आंखों का आकर्षण और बढ़ जाता है. मान्यता है कि काजल महिलाओं को बुरी नजर से भी बचाता है. यही वजह है कि इसे भी पारंपरिक श्रृंगार का खास हिस्सा माना गया है.
नथ चेहरे की खूबसूरती में लगाती है चार चांद नाक में पहनी जाने वाली नथ महिला के चेहरे की सुंदरता को और बढ़ाती है. इसे खासतौर पर सुहागिनों के पारंपरिक श्रृंगार से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता के अनुसार, नथ पहनने से पीड़ा में राहत मिलती है. इसके साथ ही यह चेहरे के रूप-सौंदर्य को भी निखारती है.
झुमके सुंदरता के साथ एक्यूप्रेशर से जुड़े कानों में पहने जाने वाले झुमके चेहरे की सुंदरता बढ़ाने वाले आभूषणों में शामिल हैं. पारंपरिक रूप से यह महिलाओं के श्रृंगार का अहम हिस्सा रहे हैं. मान्यता है कि झुमके एक्यूप्रेशर के माध्यम से भी लाभ पहुंचाते हैं. इसी वजह से इन्हें सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि श्रृंगार की खास सामग्री माना जाता है.
मंगलसूत्र पति-पत्नी के अटूट रिश्ते का प्रतीक मंगलसूत्र को पति-पत्नी के अटूट बंधन का प्रतीक माना जाता है. विवाहित महिलाओं के लिए इसका धार्मिक और पारंपरिक महत्व खास है. मान्यता है कि मंगलसूत्र सकारात्मक ऊर्जा से भरा होता है. इसे वैवाहिक जीवन और पति के साथ रिश्ते मजबूत होते हैं.
बाजूबंद रक्त संचार से जुड़ा है भुजाओं में पहना जाने वाला बाजूबंद भी सोलह श्रृंगार में शामिल माना जाता है. यह महिलाओं की पारंपरिक पोशाक और श्रृंगार को और आकर्षक बनाता है. मान्यता के अनुसार, बाजूबंद रक्त संचार को नियमित रखने में सहायक होता है.
मेहंदी सौभाग्य और प्रेम का प्रतीक हाथों और पैरों में रचाई जाने वाली मेहंदी महिलाओं के श्रृंगार को खास बना देती है. इसे सौभाग्य और प्रेम का प्रतीक माना जाता है. मेहंदी की ठंडक को तनाव दूर करने में सहायक माना जाता है. यही कारण है कि त्योहारों और खास मौकों पर महिलाओं के श्रृंगार में मेहंदी की खास जगह होती है.
चूड़ियां खुशहाली और ऊर्जा का प्रतीक हाथों में खनकती चूड़ियां महिलाओं के श्रृंगार की पहचान मानी जाती हैं. इन्हें खुशहाली, सौभाग्य और ऊर्जा के संचार से जोड़कर देखा जाता है. मान्यता है कि चूड़ियां रक्त संचार को बेहतर बनाने में भी सहायक होती हैं.
अंगूठी प्रेम और विश्वास का बंधन उंगली में पहनी जाने वाली अंगूठी प्रेम और विश्वास के बंधन को दर्शाती है. सोलह श्रृंगार में इसका भी खास महत्व बताया गया है. मान्यता के अनुसार, तर्जनी या अनामिका उंगली में पहनी जाने वाली अंगूठी रक्त संचार को सुधारने में सहायक होती है.
कमरबंद शरीर की ऊर्जा को संतुलित करता है कमर में पहना जाने वाला कमरबंद भी महिलाओं के पारंपरिक श्रृंगार का हिस्सा है. यह आभूषण सुंदरता बढ़ाने के साथ शरीर के पोस्चर से भी जुड़ा माना जाता है. मान्यता है कि कमरबंद शरीर का पोस्चर सही रखने और शरीर में ऊर्जा को संतुलित करने में मदद करता है.
पायल की मधुर आवाज भी है खास पैरों में पहनी जाने वाली चांदी की पायल चलने पर मधुर ध्वनि पैदा करती है. यही ध्वनि इसे महिलाओं के श्रृंगार में अलग पहचान देती है. मान्यता है कि चांदी शरीर की गर्मी को सोखती है और रक्त प्रवाह को संतुलित रखने में सहायक होती है.
बिछिया हार्मोनल संतुलन से जुड़ी मान्यता पैरों की उंगलियों में पहनी जाने वाली बिछिया भी सोलह श्रृंगार का हिस्सा मानी जाती है. खासतौर पर विवाहित महिलाओं के पारंपरिक श्रृंगार में इसका महत्व बताया गया है. मान्यता के अनुसार, बिछिया महिलाओं में हार्मोनल संतुलन बनाए रखने और मासिक चक्र को नियमित रखने में सहायक होती है.
गजरा देता है खुशबू और ताजगी बालों में लगाया जाने वाला गजरा प्राकृतिक सुगंध और ताजगी प्रदान करता है. फूलों से बनी इसकी खुशबू पूरे श्रृंगार को और आकर्षक बना देती है. मान्यता है कि गजरे की प्राकृतिक सुगंध स्नायु तंत्र को शांत करती है. इससे मन प्रसन्न और ऊर्जावान बना रहता है.
शुभ रंगों के वस्त्र भी हैं श्रृंगार का हिस्सा सोलह श्रृंगार को पूरा करने के लिए विशेष परिधान भी पहने जाते हैं. महिलाएं लाल, गुलाबी या पीले रंग के शुभ वस्त्र पहन सकती हैं. इन रंगों के वस्त्रों को भी पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता है और महिला के पूरे श्रृंगार में इनका खास स्थान बताया गया है.
सोलह श्रृंगार से जुड़ी हैं कई मान्यताएं इस तरह सोलह श्रृंगार में शामिल हर सामग्री के साथ अपनी-अपनी मान्यताएं जुड़ी हुई हैं. कहीं इसे पति के प्रेम और वैवाहिक रिश्ते का प्रतीक माना जाता है तो कहीं स्वास्थ्य, सकारात्मक ऊर्जा, सौभाग्य और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है. ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक, महिलाओं का श्रृंगार उनकी किस्मत को संवारने में भी भूमिका निभा सकता है. मान्यता है कि इससे ग्रहों को मजबूती मिलती है और जीवन में खुशियों का संचार होता है.