Category: Gazab

  • अभी से घर में लगा लें ये 5 पौधे, एयर प्यूरीफायर भी हो जाएगा फेल और प्रदूषित हवा को करेगा साफ.

    अभी से घर में लगा लें ये 5 पौधे, एयर प्यूरीफायर भी हो जाएगा फेल और प्रदूषित हवा को करेगा साफ.

    अभी से घर में लगा लें ये 5 पौधे, एयर प्यूरीफायर भी हो जाएगा फेल और प्रदूषित हवा को करेगा साफ.

    जैसे ही बरसात का मौसम खत्म होता है, वैसे ही वायु की गुणवत्ता फिर से प्रभावित होने लगती है. ऐसे समय में घर के अंदर या आसपास लगे पौधे काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं. ये हवा में मौजूद कुछ दूषित कणों और प्रदूषकों को कम करने में मदद करते हैं, जिससे घर के अंदर साफ हवा का प्रवाह बेहतर हो सकता है. यही वजह है कि ये पौधे सिर्फ घर की खूबसूरती बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हवा को स्वच्छ रखने में भी मजबूत भूमिका निभाते हैं. आप इन्हें घर या अपने कमरे के अंदर भी लगा सकते हैं. इन पौधों को ज्यादा केयर की जरूरत नहीं पड़ती और ये कम रोशनी में भी अच्छे से ग्रो करते हैं.

    1. स्पाइडर प्लांट स्पाइडर प्लांट भले देखने में साधारण लगे, लेकिन इसकी पत्तियां चमत्कार की तरह काम करती हैं. अपने नाम के जैसा ही इस पौधे की पत्तियां हवा में मौजूद प्रदूषकों को खुद में सोख लेती है. न केवल पत्तियां बल्कि इसके जड़ें भी हवा में मौजूद फॉर्मल्डिहाइड जैसे प्रदूषकों को कम करने में मददगार साबित होती हैं और घर के अंदर साफ हवा लाने में मदद करती है.

    2. गोल्डन पोथोस गोल्डन पोथोस देखने में जितना खूबसूरत लगता है, हवा को साफ रखने में भी उतना ही मददगार माना जाता है. इसकी पत्तियां हवा में मौजूद हानिकारक प्रदूषकों को खुद में सोखने में मदद करती हैं. यह फॉर्मल्डिहाइड और बेंजीन जैसे प्रदूषकों को कम करने में मदद करता है और घर के अंदर की हवा को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है.

    3. पीस लिली पीस लिली सिर्फ अपने सफेद फूलों से घर की खूबसूरती नहीं बढ़ाती, बल्कि हवा को साफ रखने में भी मदद करती है. इसकी पत्तियां हवा में मौजूद कुछ VOCs को सोखने में मदद करती हैं. साथ ही यह फॉर्मल्डिहाइड जैसे प्रदूषकों को कम करने में भी मददगार हो सकती है, जिससे घर के अंदर की हवा बेहतर हो सकती है.

    4. एरेका पाम एरेका पाम घर के अंदर हरियाली बढ़ाने के साथ हवा की गुणवत्ता बेहतर करने में भी मदद कर सकता है. इसकी पत्तियां और पौधे की प्राकृतिक प्रक्रियाएं indoor हवा में मौजूद कुछ प्रदूषकों और गैसों के स्तर को कम करने में सहायक होती हैं. यानी यह पौधा घर को खूबसूरत बनाने के साथ हवा को बेहतर रखने में भी अपनी भूमिका निभाता है.

    5. स्नेक प्लांट स्नेक प्लांट देखने में भले ही साधारण लगे, लेकिन घर के अंदर की हवा के लिए यह काफी काम का पौधा है. इसकी पत्तियां हवा में मौजूद कुछ प्रदूषकों को सोखने में मदद करती हैं. यह फॉर्मल्डिहाइड जैसे प्रदूषकों को कम करने में भी सहायक हो सकता है और कमरे की हवा को बेहतर बनाने में मदद करता है.

  • यहां डस्टबिन से बातें करते हैं लोग! आवाज सुनकर समझता है बात, फिर अपने आप खोल देता है ढक्कन.

    यहां डस्टबिन से बातें करते हैं लोग! आवाज सुनकर समझता है बात, फिर अपने आप खोल देता है ढक्कन.

    यहां डस्टबिन से बातें करते हैं लोग! आवाज सुनकर समझता है बात, फिर अपने आप खोल देता है ढक्कन.

    डस्टबिन का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में ऐसी साधारण चीज की तस्वीर आती है, जिसमें कूड़ा डालने के बाद उसे सफाईकर्मी उठा ले जाते हैं। लेकिन तकनीक के इस दौर में अब डस्टबिन भी स्मार्ट हो रहे हैं। चीन से जुड़ी स्मार्ट टेक्नोलॉजी में ऐसे डस्टबिन का कॉन्सेप्ट सामने आया है, जो इंसान की आवाज को समझकर उसके निर्देश के मुताबिक काम कर सकता है।

    यानी अगर कोई व्यक्ति कूड़ा लेकर डस्टबिन के पास पहुंचे और उसे ढक्कन खोलने के लिए कहे, तो सिस्टम आवाज को पहचानकर ढक्कन खोलने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। यही वजह है कि स्मार्ट डस्टबिन का यह कॉन्सेप्ट लोगों के बीच काफी दिलचस्प बना हुआ है।

    आखिर स्मार्ट डस्टबिन में ऐसा क्या लगा होता है?

    स्मार्ट डस्टबिन सामान्य कूड़ेदान से काफी अलग होता है। इसमें कई तरह के इलेक्ट्रॉनिक और तकनीकी उपकरण लगाए जा सकते हैं।

    इनमें माइक्रोफोन, सेंसर, कंट्रोल सिस्टम, मोटर और सॉफ्टवेयर जैसे हिस्से शामिल हो सकते हैं। जब कोई व्यक्ति डस्टबिन के पास बोलता है, तो माइक्रोफोन उसकी आवाज को कैप्चर करता है।

    इसके बाद सिस्टम आवाज में दिए गए निर्देश को समझने की कोशिश करता है। अगर कमांड ढक्कन खोलने की है, तो कंट्रोल यूनिट मोटर को सक्रिय कर सकती है। मोटर ढक्कन को ऊपर उठाती है और कचरा डालने के बाद ढक्कन दोबारा बंद हो सकता है।

    यानी डस्टबिन खुद से इंसानों की तरह नहीं सोचता, बल्कि कई तकनीकी सिस्टम मिलकर उसके निर्देशों को पूरा करते हैं।

    सिर्फ आवाज सुनना ही नहीं, कचरे को पहचानने की भी कोशिश

    स्मार्ट डस्टबिन की खासियत केवल वॉयस कमांड तक सीमित नहीं है। कुछ आधुनिक सिस्टम कचरे को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की दिशा में भी काम कर सकते हैं।

    कचरे को आमतौर पर रिसाइकिल होने वाली चीजों, खाने के कचरे और दूसरे सामान्य कचरे में अलग करना जरूरी होता है। ऐसे में कुछ स्मार्ट डस्टबिन में अलग-अलग कम्पार्टमेंट दिए जा सकते हैं और सेंसर या सॉफ्टवेयर की मदद से सही हिस्से का चुनाव किया जा सकता है।

    हालांकि हर स्मार्ट डस्टबिन में ये सभी सुविधाएं मौजूद हों, यह जरूरी नहीं है। किसी मॉडल में केवल ऑटोमैटिक ढक्कन हो सकता है, जबकि दूसरे में आवाज पहचानने, सेंसर या कचरे की पहचान जैसी अतिरिक्त सुविधाएं मिल सकती हैं।

    चीन में तेजी से बढ़ रहा स्मार्ट सिटी का कॉन्सेप्ट

    चीन में पिछले कुछ वर्षों में स्मार्ट सिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमेशन और रोबोटिक्स से जुड़ी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ा है।

    शहरी इलाकों में स्मार्ट कैमरे, ऑटोमेटेड मशीनें, डिजिटल पेमेंट सिस्टम और AI आधारित सेवाओं का इस्तेमाल देखने को मिलता है। अब इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल कचरा प्रबंधन को बेहतर और ज्यादा ऑटोमेटेड बनाने की दिशा में भी किया जा रहा है।

    रोजमर्रा की चीजें भी बन रही हैं स्मार्ट

    स्मार्ट डस्टबिन का कॉन्सेप्ट यह दिखाता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल सिर्फ मोबाइल फोन, चैटबॉट या कैमरा सिस्टम तक सीमित नहीं है।

    अब रोजमर्रा की बेहद साधारण चीजों में भी सेंसर, सॉफ्टवेयर और ऑटोमेशन जोड़े जा रहे हैं। आने वाले समय में कचरा प्रबंधन जैसे कामों में ऐसी तकनीक का इस्तेमाल और बढ़ सकता है।

    हालांकि किसी खास स्मार्ट डस्टबिन की वास्तविक क्षमता उसके मॉडल और तकनीकी सिस्टम पर निर्भर करती है। सभी स्मार्ट डस्टबिन इंसानी बातचीत को पूरी तरह समझने या हर तरह के कचरे की पहचान करने में सक्षम हों, ऐसा जरूरी नहीं है।

     

     
  • दुनिया का वो फल, जिसे खाने के बाद नींबू भी लगेगा मीठा,

    दुनिया का वो फल, जिसे खाने के बाद नींबू भी लगेगा मीठा,

    दुनिया का वो फल, जिसे खाने के बाद नींबू भी लगेगा मीठा,

    दुनिया में आपने कई तरह के फल खाए होंगे. कुछ मीठे होते हैं, कुछ खट्टे और कुछ स्वाद में बिल्कुल अलग. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे फल के बारे में सुना है, जिसे खाने के बाद खट्टा नींबू भी आपको मीठा लगने लगे? सुनने में यह किसी जादू से कम नहीं लगता, लेकिन प्रकृति ने ऐसा फल सच में बनाया है. इसे खाने के बाद कुछ समय तक खट्टी चीजों का स्वाद भी मीठा महसूस हो सकता है. यही वजह है कि इसे ‘मिरेकल फ्रूट’ (Miracle Fruit) कहा जाता है. इस फल का वैज्ञानिक नाम Synsepalum dulcificum है. यह सपोटेसी फैमिली (Sapotaceae family) का पौधा है और पश्चिम अफ्रीका(West Africa) के घाना समेत कुछ अन्य इलाकों में पाया जाता है. इसके फल छोटे और लाल रंग के होते हैं और देखने में कुछ-कुछ बेरी जैसे लगते हैं. इस फल की सबसे खास बात इसका स्वाद नहीं, बल्कि इसका असर है. इसे खाने के बाद जब कोई व्यक्ति नींबू, सिरका या दूसरी खट्टी चीज भी खाता है तो उसका स्वाद कुछ समय के लिए मीठा लगता है.

    आखिर खट्टी चीज मीठी कैसे लगती है?
    इस फल में मिराकुलिन (Miraculin) नाम का एक ग्लाइकोप्रोटीन पाया जाता है. यही इस पूरे ‘चमत्कार’ के पीछे की वजह है. मिराकुलिन हमारी जीभ पर मौजूद स्वाद रिसेप्टर्स के साथ काम करता है. मिरैकल फ्रूट खाने के बाद जब हम कोई खट्टी चीज खाते हैं, तो उस खट्टी चीज की अम्लीयता(Acidity) मिराकुलिन के काम करने के तरीके को बदल देती है. इसके कारण दिमाग तक पहुंचने वाला स्वाद मीठा महसूस होने लगता है. यानी नींबू वही रहता है, लेकिन उसे खाने पर मिलने वाला स्वाद बदल जाता है.

    करीब एक घंटे तक महसूस हो सकता है असर
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, मिरैकल फ्रूट खाने के बाद इसका असर करीब 30 मिनट से एक घंटे या उससे कुछ ज्यादा समय तक रह सकता है. इस दौरान नींबू, सिरका जैसी खट्टी चीजें सामान्य से काफी मीठी लग सकती हैं. हालांकि इसका असर हर व्यक्ति पर एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है. यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह फल किसी खट्टी चीज की अम्लीयता को खत्म नहीं करता, बल्कि स्वाद महसूस होने के तरीके को बदलता है.

    फल को लंबे समय तक रखना है मुश्किल
    मिरैकल फ्रूट की एक बड़ी परेशानी यह है कि इसे लंबे समय तक ताजा रखना आसान नहीं होता. फल जल्दी खराब हो सकता है, इसलिए इसे एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण है. इसी वजह से मिराकुलिन को दूसरे रूपों में इस्तेमाल करने पर भी रिसर्च और काम किया गया है. मिरैकल फ्रूट से बने उत्पादों का इस्तेमाल कम चीनी वाले खाद्य पदार्थों में मीठा स्वाद महसूस कराने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इसे किसी बीमारी का इलाज या वजन घटाने का आसान तरीका माना जाए.

    कैंसर मरीजों के लिए भी मददगार साबित हो रहा फल
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिन्सेपलम डुलसिफिकम (Synsepalum dulcificum) कैंसर के मरीजों के लिए खाने का अनुभव बेहतर बनाने में मदद कर सकता है. इलाज के दौरान कई मरीजों को खाने का स्वाद अच्छा नहीं लगता. ऐसे में यह छोटा-सा लाल फल उनके लिए काफी दिलचस्प साबित हो रहा है. इसे खाने के बाद करीब 30 से 60 मिनट तक खट्टी और कुछ कड़वी चीजों का स्वाद मीठा महसूस हो सकता है. यानी मिरेकल फ्रूट खाने के बाद नींबू या दूसरे खट्टे फलों का स्वाद भी मीठा और स्वादिष्ट लगने लगता है. इससे मरीजों के लिए खाना कुछ हद तक ज्यादा स्वादिष्ट हो सकता है और खाने में उनकी रुचि बनी रह सकती है. इस तरह जरूरी पोषण लेने में भी मदद मिल सकती है.

    अफ्रीका से अमेरिका तक उगाया जाता है यह फल
    सिन्सेपलम डुलसिफिकम मूल रूप से पश्चिम अफ्रीका का फल है, लेकिन अब इसकी खेती अमेरिका के मियामी में भी की जाती है. इसके फल या जूस का सेवन करने के बाद नींबू जैसी खट्टी चीजों का स्वाद काफी अलग महसूस हो सकता है. यही अनोखी खासियत इसे दूसरे फलों से अलग बनाती है. रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका में कुछ कैंसर अस्पतालों में भी मिरेकल बेरीज मरीजों को उपलब्ध कराई जाती हैं. फल जल्दी खराब हो जाता है, इसलिए इसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए फ्रीज करके भी बेचा जाता है. हालांकि, इसे कैंसर का इलाज नहीं माना जाता, बल्कि इसका इस्तेमाल मरीजों के खाने के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए किया जा सकता है.

     



  • पहली बार डेट पर जा रहे हैं? फर्स्ट डेट पर प्यार से पहले ये 5 चीजें नोटिस करता है सामने वाला, जरा सी गलती हुई तो रिश्ता जुड़ने से पहले ही हो जाएगा खत्म..

    पहली बार डेट पर जा रहे हैं? फर्स्ट डेट पर प्यार से पहले ये 5 चीजें नोटिस करता है सामने वाला, जरा सी गलती हुई तो रिश्ता जुड़ने से पहले ही हो जाएगा खत्म..

    पहली बार डेट पर जा रहे हैं? फर्स्ट डेट पर प्यार से पहले ये 5 चीजें नोटिस करता है सामने वाला, जरा सी गलती हुई तो रिश्ता जुड़ने से पहले ही हो जाएगा खत्म..

    किसी नए इंसान से पहली बार मिलते वक्त हम अक्सर सोचते हैं कि सामने वाला हमारे लुक्स और बातों से प्रभावित होगा या नहीं. लेकिन असल में पहली मुलाकात में कई ऐसी छोटी चीजें भी सामने वाले की नजर में आ जाती हैं, जिन पर हमारा ध्यान नहीं जाता. आपका व्यवहार, बातचीत और छोटी परेशानियों पर रिएक्शन रिश्ते की शुरुआत के बारे में काफी कुछ बता सकता है.

    1. दूसरों के साथ आपका व्यवहार कैसा है आप सिर्फ डेट पर सामने वाले के साथ अच्छा व्यवहार करें, इतना काफी नहीं. वह यह भी देख सकता है कि आप आसपास मौजूद लोगों से कैसे बात करते हैं. किसी वेटर या स्टाफ से रूखा व्यवहार आपके बारे में उतना ही बता सकता है, जितना सामने वाले से की गई मीठी बातें.

    2. क्या आप सामने वाले को बोलने देते हैं? अगर बातचीत में हर बार आप ही अपनी कहानी सुनाते रहें, तो यह आसानी से नोटिस हो जाता है. सामने वाला यह देख सकता है कि आप उसकी बात सुनते हैं या सिर्फ अपनी बारी का इंतजार करते हैं.

    3. खुद को लेकर आपका रवैया क्या है बहुत ज्यादा खुद की तारीफ करना और हर बात में खुद को साबित करना भी ध्यान खींच सकता है. वहीं अपनी कमियों को लेकर सहज रहना और बिना दिखावे के बात करना आत्मविश्वास का संकेत माना जा सकता है. असली कॉन्फिडेंस अक्सर शांत व्यवहार में नजर आता है.

    4. छोटी गड़बड़ी पर आप कैसे रिएक्ट करते हैं डेट के दौरान कोई चीज प्लान के मुताबिक न हो तो आपका असली मूड सामने आ सकता है. खाना देर से आया, रास्ते में परेशानी हुई या कोई छोटी गलती हो गई. ऐसे समय में आप गुस्सा करते हैं, चिढ़ते हैं या आराम से स्थिति संभाल लेते हैं, यह सामने वाला जरूर नोटिस कर सकता है.

    5. क्या आपकी दिलचस्पी सिर्फ डेट में है या इंसान में भी सिर्फ बातचीत चलाने के लिए सवाल पूछना और किसी को सच में जानने की कोशिश करना अलग बात है. सामने वाला यह महसूस कर सकता है कि आप उसकी बातों को याद रख रहे हैं, उसके अनुभवों में दिलचस्पी ले रहे हैं या बस अपनी पसंद-नापसंद बता रहे हैं.

  • 200 साल बाद घर जन्मी बिटिया, रथ पर सवार होकर अस्पताल से घर पहुंची; 5 पीढ़ियों से था इंतजार

    200 साल बाद घर जन्मी बिटिया, रथ पर सवार होकर अस्पताल से घर पहुंची; 5 पीढ़ियों से था इंतजार

    200 साल बाद घर जन्मी बिटिया, रथ पर सवार होकर अस्पताल से घर पहुंची; 5 पीढ़ियों से था इंतजार

    महाराष्ट्र के बीड जिले से एक दिल छू लेने वाली एक अनोखी तस्वीर सामने आई है. जिले के परली के रहने वाले दहीफले परिवार में करीब 200 साल और पांच पीढ़ियों के लंबे इंतजार के बाद एक बेटी का जन्म हुआ है. दो सदियों बाद घर में कन्या पैदा होने की इस खुशी को परिवार ने एक राजकुमारी के स्वागत की तरह मनाया. अस्पताल से छुट्टी के बाद नवजात बच्ची और उसकी मां को फूलों से सजे एक भव्य रथ पर बैठाकर पूरे गाजे-बाजे के साथ घर लाया गया.

    ढोल-ताशे और शाही अंदाज में स्वागत

    सौभाग्यवती कल्पना ऋषिकेश दहीफले ने एक बच्ची को जन्म दिया. बच्ची का नाम परिवार ने गार्गी रखा है. परिवार के मुताबिक, उनके खानदान में पिछली पांच पीढ़ियों से किसी बेटी का जन्म नहीं हुआ था. अस्पताल से जब मां और बच्ची को छुट्टी मिली, तो परिवार ने फूलों का रथ तैयार करवाया. इसके साथ ही ढोल, ताशे बजाते हुए जुलूस निकाला गया.

    क्या बोला परिवार?

    इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, गार्गी के दादा लिंबाजी दहीफले पोती के जन्म की जानकारी मिलने के बाद बेहद भावुक हो गए. उन्होंने कहा, ‘परिवार में बेटी का जन्म होना बड़े सौभाग्य की बात है. इतने वर्षों से हमारे मन में घर में बेटी न होने का जो मलाल था, वह आज दूर हो गया है.’

    वहीं, बच्ची की दादी सुरेखा दहीफले ने खुशी जताते हुए कहा कि हम बेहद खुश हैं कि आज हमारे घर साक्षात लक्ष्मी पधारी हैं.

    गार्गी के पिता ऋषिकेश ने कहा, ‘अक्सर लोग बेटे की चाहत रखते हैं, लेकिन बेटी के पिता बनने का एहसास और उसकी खुशी सबसे अलग होती है. बेटियां अपने पिता से ज्यादा जुड़ी होती हैं. हम अपनी बेटी को एक फूल की तरह नाजों से पालेंगे.’

  • गुरुग्राम में कामवाली बाई निकली मालकिन से ज्यादा अमीर! महीने में कमाती है ₹60,000, बेटी पढ़ रही बड़े स्कूल में;

    गुरुग्राम में कामवाली बाई निकली मालकिन से ज्यादा अमीर! महीने में कमाती है ₹60,000, बेटी पढ़ रही बड़े स्कूल में;

    गुरुग्राम में कामवाली बाई निकली मालकिन से ज्यादा अमीर! महीने में कमाती है ₹60,000, बेटी पढ़ रही बड़े स्कूल में;

    गुरुग्राम से एक ऐसी दिलचस्प कहानी सामने आई है, जिसे पढ़कर बड़े-बड़े ऑफिस वाले भी सोचने पर मजबूर हो गए हैं. यहां एक घर में काम करने वाली महिला हर महीने 60 हजार रुपए कमा रही है. ये खुलासा गुरुग्राम के रहने वाले शिव मित्तल ने किया है. उन्होंने लिंक्डइन पर अपनी पोस्ट में बताया कि उनकी हाउस हेल्प ने उन्हें पैसों का असली मतलब समझा दिया. उनकी पोस्ट अब खूब वायरल हो रही है.

    कैसे करती है इतनी कमाई?

    शिव मित्तल ने बताया कि वो महिला दिन में 5 से 6 घरों में काम करती है. महीने में सिर्फ 3 से 4 दिन की छुट्टी लेती है. इसी मेहनत से वो हर महीने करीब 60 हजार रुपए कमा लेती है.

    पैसे को करती है ऐसे मैनेज

    वायरल पोस्ट के मुताबिक, कामवाली बाई 60 हजार में से 10 हजार रुपए किराए पर देती है. वह अपनी बेटी को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही है. इसके अलावा उसने अपने गांव में 6 लाख की जमीन ली है, जिसकी EMI भी वो इसी कमाई से भर रही है.

    बड़े-बड़े प्रोफेशनल्स फेल!

    शिव मित्तल ने लिखा, हम लोग महंगे फोन, कार और ब्रांडेड कपड़ों के लिए EMI भरते रहते हैं. वहीं इस महिला की कोई फिजूलखर्ची नहीं है. न PF है, न इंश्योरेंस, फिर भी उसे पता है कि पैसा कहां लगाना है. उसका एक ही सपना है, बस बेटी का भविष्य सुरक्षित करना.

    इस पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है. कई लोग बोल रहे हैं कि ये महिला तो हमसे ज्यादा समझदार है, हम दिखावे में पैसा उड़ाते हैं. वहीं कुछ लोग कह रहे हैं कि कॉर्पोरेट नौकरी जैसी मेडिकल सिक्योरिटी इन मेहनतकश लोगों के पास नहीं होती, एक बीमारी इनकी सारी बचत खा जाएगी, इसलिए दोनों की तुलना करना पूरी तरह सही नहीं है.

  • घर में ऐसे लगाएं एलोवेरा का पौधा, हमेशा मिलेगा ताजा जेल, जानें सही देखभाल का तरीका.

    घर में ऐसे लगाएं एलोवेरा का पौधा, हमेशा मिलेगा ताजा जेल, जानें सही देखभाल का तरीका.

    घर में ऐसे लगाएं एलोवेरा का पौधा, हमेशा मिलेगा ताजा जेल, जानें सही देखभाल का तरीका.

    एलोवेरा एक ऐसा पौधा है जिसे घर में आसानी से उगाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल कई तरह के कॉस्मेटिक और घरेलू उत्पादों में किया जाता है। एलोवेरा का पौधा देखने में भी आकर्षक लगता है और इसकी पत्तियों में मौजूद जेल का इस्तेमाल त्वचा और बालों की देखभाल के लिए किया जाता है।

    अगर आप घर पर एलोवेरा का पौधा लगाना चाहते हैं तो इसके लिए बहुत ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती। बस मिट्टी, गमले और पानी की सही व्यवस्था का ध्यान रखना जरूरी है।

    कब लगाएं एलोवेरा का पौधा?

    एलोवेरा गर्म मौसम में अच्छी तरह बढ़ता है। इसे फरवरी से लेकर अक्टूबर-नवंबर तक लगाया जा सकता है। घर में इसे गमले, छत, बालकनी या आंगन में आसानी से उगाया जा सकता है।

    एलोवेरा की कई किस्में होती हैं। बार्बाडेन्सिस किस्म भी काफी लोकप्रिय है और इसकी पत्तियां अपेक्षाकृत बड़ी होती हैं।

    कैसी होनी चाहिए मिट्टी?

    एलोवेरा के लिए ऐसी मिट्टी बेहतर होती है जिसमें पानी ज्यादा देर तक जमा न रहे। इसके लिए सामान्य मिट्टी में थोड़ी रेत या बालू मिलाई जा सकती है।

    गमले में पानी की निकासी अच्छी होनी चाहिए, क्योंकि जड़ों में लगातार पानी जमा रहने से पौधा खराब हो सकता है।

    ऐसे लगाएं एलोवेरा

    सबसे पहले स्वस्थ और हरे रंग का छोटा एलोवेरा पौधा लें। ऐसा गमला चुनें जिसके नीचे पानी निकलने के लिए छेद जरूर हो।

    अब गमले में मिट्टी भरकर बीच में छोटा गड्ढा बनाएं और पौधे को सीधा लगा दें। इसके बाद जड़ों के आसपास मिट्टी डालकर हल्के हाथ से दबा दें। पौधा लगाने के बाद थोड़ी मात्रा में पानी दें।

    एलोवेरा की देखभाल कैसे करें?

    एलोवेरा को रोशनी पसंद है, लेकिन बहुत तेज और लगातार धूप में रखने से इसकी पत्तियां प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए पौधे को ऐसी जगह रखें जहां पर्याप्त रोशनी मिले और जरूरत के मुताबिक धूप भी मिलती रहे।

    इस पौधे को रोज पानी देने की जरूरत

  • भोजपुरी गाने पर रोबोट का देसी डांस, गले में गेंदे की माला और लाल धोती पहनकर लगाए जमकर ठुमके.

    भोजपुरी गाने पर रोबोट का देसी डांस, गले में गेंदे की माला और लाल धोती पहनकर लगाए जमकर ठुमके.

    भोजपुरी गाने पर रोबोट का देसी डांस, गले में गेंदे की माला और लाल धोती पहनकर लगाए जमकर ठुमके.

    सोशल मीडिया पर रोबोट से जुड़े कई अनोखे प्रयोग सामने आते रहते हैं, लेकिन इस बार एक रोबोट अपने खास देसी अंदाज को लेकर चर्चा में है। आधुनिक ह्यूमनॉइड रोबोट ने भोजपुरी गाने की धुन पर ऐसा डांस किया कि समारोह में मौजूद लोग भी हैरान रह गए।

    इस दौरान रोबोट को लाल रंग की धोती पहनाई गई थी और उसके गले में गेंदे के फूलों की बड़ी माला नजर आई। पीछे लगे बैनर पर ‘श्री कृष्ण जन्माष्टमी मेला’ लिखा हुआ था। रोबोट का यह देसी रूप लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच रहा था।

    जैसे ही भोजपुरी गाना बजना शुरू हुआ, रोबोट ने बीट के साथ हाथ-पैर हिलाते हुए डांस करना शुरू कर दिया। उसके डांस स्टेप्स और शरीर की मूवमेंट देखकर वहां मौजूद लोग काफी उत्साहित नजर आए। मंच पर खड़ा एक व्यक्ति भी रोबोट के इस अंदाज को देखकर मुस्कुराता दिखाई दिया।

    सोशल मीडिया पर छाया रोबोट का देसी अंदाज

    रोबोट के इस अनोखे डांस को इंस्टाग्राम पर vivek_vlogs_ind नाम के पेज से शेयर किया गया है। पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।

    कुछ यूजर्स ने मजाकिया अंदाज में कहा कि अब रोबोट पर भी भोजपुरी का रंग चढ़ गया है। वहीं कई लोगों ने इसे आधुनिक तकनीक और भारतीय लोक संस्कृति का मजेदार मेल बताया।

    तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच रोबोट का यह देसी अंदाज लोगों के लिए मनोरंजन का नया जरिया बन गया है।

     

     

     

     

  • 16 साल की उम्र में कमाल का इनोवेशन, लड़की ने सिर्फ ₹1800 में तैयार किया देसी AC.

    गर्मी से राहत पाने के लिए आजकल लोग महंगे एयर कंडीशनर और कूलर का सहारा लेते हैं, लेकिन झांसी की 16 साल की कल्याणी श्रीवास्तव ने बेहद कम खर्च में ठंडक देने वाला एक अनोखा मॉडल तैयार किया है। कल्याणी ने करीब ₹1,800 की लागत से देसी AC तैयार किया है, जिसकी इन दिनों खूब चर्चा हो रही है।

    सिर्फ ₹1800 में तैयार किया अनोखा मॉडल

    कल्याणी ने अपने इस मॉडल को तैयार करने के लिए साधारण और कम लागत वाली चीजों का इस्तेमाल किया है। इसमें थर्माकोल से तैयार किया गया आइस बॉक्स और 12 वोल्ट का DC फैन लगाया गया है।

    फैन की मदद से बॉक्स के अंदर मौजूद ठंडी हवा को एक एल्बो पाइप के जरिए बाहर निकाला जाता है। दावा है कि इस मॉडल के इस्तेमाल से करीब एक घंटे में कमरे के तापमान में लगभग 4 से 5 डिग्री तक की कमी आ सकती है।

    सोलर एनर्जी से भी चल सकता है

    कल्याणी का यह देसी AC मॉडल सौर ऊर्जा यानी सोलर एनर्जी से भी चल सकता है। इससे बिजली की खपत और उससे होने वाले खर्च को कम रखने में मदद मिल सकती है।

    इस मॉडल की एक खास बात यह भी बताई जा रही है कि इसमें पारंपरिक एयर कंडीशनर की तरह CFC आधारित कूलिंग सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसी वजह से इसे पर्यावरण के लिहाज से भी एक अलग तरह का प्रयोग माना जा रहा है।

    IIT दिल्ली की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए चयन

    कल्याणी की प्रतिभा यहीं तक सीमित नहीं है। उनका यह देसी AC मॉडल IIT दिल्ली की नेशनल लेवल मॉडल प्रतियोगिता के लिए भी चुना गया है।

    महज 16 साल की उम्र में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में इस तरह का प्रयोग करने के लिए कल्याणी की काफी तारीफ हो रही है। उनका यह मॉडल कम लागत में कूलिंग की जरूरत पूरी करने की दिशा में एक रचनात्मक प्रयास माना जा रहा है।

    गायन में भी दिखा चुकी हैं प्रतिभा

    कल्याणी श्रीवास्तव पढ़ाई और विज्ञान के साथ-साथ गायन में भी रुचि रखती हैं। वह मशहूर सिंगिंग रियलिटी शो ‘इंडियन आइडल’ के तीसरे दौर तक पहुंच चुकी हैं।

    इसके अलावा कल्याणी ने लखनऊ, आगरा और कानपुर में आयोजित अलग-अलग प्रतियोगिताओं में 50 से ज्यादा ट्रॉफियां भी जीती हैं।

    कम उम्र में विज्ञान, इनोवेशन और संगीत के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा दिखाने वाली कल्याणी की कहानी उन बच्चों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद कुछ नया करने का सपना देखते हैं।

  • डेट से पहले न नहाना क्यों बना Gen-Z का नया ट्रेंड? क्या नेचुरल बॉडी ओडर सच में बढ़ाती है आकर्षण?

    डेट से पहले न नहाना क्यों बना Gen-Z का नया ट्रेंड? क्या नेचुरल बॉडी ओडर सच में बढ़ाती है आकर्षण?

    डेट से पहले न नहाना क्यों बना Gen-Z का नया ट्रेंड? क्या नेचुरल बॉडी ओडर सच में बढ़ाती है आकर्षण?

    आजकल सोशल मीडिया पर Gen-Z का एक नया ट्रेंड चर्चा में है, जिसे ‘फेरोमोन-मैक्सिंग’ कहा जा रहा है। इस ट्रेंड को फॉलो करने वाले कुछ युवा डेट पर जाने से पहले नहाने और डियोडोरेंट लगाने से बच रहे हैं। उनका मानना है कि शरीर की प्राकृतिक गंध दूसरे व्यक्ति को उनकी ओर आकर्षित कर सकती है।

    लेकिन सवाल यह है कि क्या शरीर की नेचुरल स्मेल वास्तव में आकर्षण बढ़ाती है? और क्या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक आधार है?

    क्या है फेरोमोन-मैक्सिंग?

    फेरोमोन-मैक्सिंग का मतलब शरीर की प्राकृतिक गंध को पूरी तरह छिपाने की कोशिश न करना है। इस सोच को मानने वाले लोगों का दावा है कि शरीर से निकलने वाली प्राकृतिक गंध संभावित पार्टनर को आकर्षित करने में भूमिका निभा सकती है।

    इसी वजह से कुछ लोग डेट से पहले परफ्यूम या डियोडोरेंट लगाने से बचते हैं। सोशल मीडिया पर कुछ लोग इसे आगे बढ़ाकर कई घंटों तक न नहाने या पसीने वाले कपड़े पहनने को भी इस ट्रेंड से जोड़ रहे हैं।

    हालांकि, यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर किसी ट्रेंड को फॉलो करना और उसके वैज्ञानिक रूप से सही होने में अंतर है।

    क्या इंसानों में भी फेरोमोन होते हैं?

    फेरोमोन ऐसे रासायनिक संकेत होते हैं, जिनका इस्तेमाल कई जानवर दूसरे जीवों तक व्यवहार या प्रजनन से जुड़े संकेत पहुंचाने के लिए करते हैं। जानवरों में इस तरह के संकेतों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जा चुका है।

    इंसानों के मामले में तस्वीर इतनी स्पष्ट नहीं है। वैज्ञानिकों ने शरीर की गंध और इंसानी व्यवहार के बीच संभावित संबंधों पर कई अध्ययन किए हैं, लेकिन अभी तक इस बात का ठोस प्रमाण नहीं मिला है कि इंसानों में जानवरों की तरह कोई खास फेरोमोन आकर्षण को नियंत्रित करता है।

    क्या न नहाने से बढ़ सकता है आकर्षण?

    इसका सीधा जवाब है—इस बात का मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि न नहाने से कोई व्यक्ति ज्यादा आकर्षक हो जाता है।

    शरीर की प्राकृतिक गंध कई चीजों से प्रभावित होती है। इसमें जेनेटिक्स, हार्मोन, खान-पान, त्वचा पर मौजूद बैक्टीरिया, पसीना और व्यक्तिगत साफ-सफाई जैसी चीजें शामिल हैं।

    कुछ शोधों में प्राकृतिक शरीर की गंध और लोगों की पसंद के बीच संबंध के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नहाना छोड़ देना या शरीर की तेज गंध को बनाए रखना आकर्षण बढ़ाने का वैज्ञानिक तरीका है।

    फिर सोशल मीडिया पर क्यों वायरल है यह ट्रेंड?

    ‘फेरोमोन-मैक्सिंग’ को सोशल मीडिया की मैक्सिंग कल्चर से जोड़कर देखा जा रहा है। इस ऑनलाइन संस्कृति में लोग अपनी पर्सनैलिटी, फिटनेस, लुक्स और डेटिंग लाइफ को बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग तरीके आजमाते हैं।

    ऐसे में प्राकृतिक बॉडी ओडर को लेकर बना यह नया ट्रेंड भी लोगों का ध्यान खींच रहा है। लेकिन सिर्फ ट्रेंड वायरल होने से यह साबित नहीं होता कि उसके पीछे वैज्ञानिक सच्चाई भी है।

    साफ-सफाई फिर भी जरूरी

    किसी डेट पर जाने से पहले नहाना, साफ कपड़े पहनना और व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना सामान्य हाइजीन का हिस्सा है। प्राकृतिक गंध और साफ-सफाई दोनों को एक ही चीज समझना सही नहीं है।

    इसलिए अगर कोई व्यक्ति अपनी प्राकृतिक खुशबू को बनाए रखना चाहता है तो यह व्यक्तिगत पसंद हो सकती है, लेकिन न नहाने को आकर्षण बढ़ाने का वैज्ञानिक फॉर्मूला मानना सही नहीं होगा।