Category: Gazab

  • न धारियां, न आम करैत​​​​​ जैसा रंग! दुधवा में मिला रहस्यमयी सांप, वैज्ञानिक भी हैरान..

    न धारियां, न आम करैत​​​​​ जैसा रंग! दुधवा में मिला रहस्यमयी सांप, वैज्ञानिक भी हैरान..

    न धारियां, न आम करैत​​​​​ जैसा रंग! दुधवा में मिला रहस्यमयी सांप, वैज्ञानिक भी हैरान..

    लखीमपुर खीरी के दुधवा क्षेत्र के सुमेर नगर गांव में एक घर से हाल ही में बचाए गए करैत सांप ने वन्यजीव विशेषज्ञों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. इसकी सबसे खास बात इसका असामान्य रंग है. आमतौर पर करैत सांप के शरीर पर साफ छल्लेदार धारियां दिखाई देती हैं, लेकिन इस सांप के शरीर पर ऐसी धारियां बिल्कुल नहीं हैं. वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सांप के इस अलग रंग और बनावट की सही वजह जानने के लिए इसकी जांच करनी होगी. इसके बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि यह ‘लेसर ब्लैक करैत’ है या ‘कॉमन करैत’ का कोई दुर्लभ रूप है.

    तराई क्षेत्र में नहीं पाया जाता ऐसा सांप

    दुधवा बाघ अभयारण्य (डीटीआर) के क्षेत्र निदेशक डॉ. एच. राजमोहन ने मीडिया को बताया कि बचाया गया यह सांप दुधवा क्षेत्र में दुर्लभ है. उन्होंने आशंका जताई कि यह ‘लेसर ब्लैक करैत’ हो सकता है, जो आमतौर पर दुधवा के तराई क्षेत्र (Terai Region) में नहीं पाया जाता. डॉ. राजमोहन ने कहा कि सांप की पहचान और उसके बारे में अधिक जानकारी जुटाने के लिए जाने-माने सांपों के विशेषज्ञों से संपर्क किया जाएगा.

    16 अगस्त को घर से पकड़ा गया था करैत सांप

    यह सांप 16 अगस्त को संपूर्णानगर वन क्षेत्र के सुमेर नगर गांव में एक घर से स्थानीय सांप बचावकर्मी निशान सिंह ने पकड़ा था. दुधवा के सांप बचावकर्मी निशान ने शुरुआत में इसकी पहचान ‘कॉमन करैत’ के तौर पर की थी. हालांकि, सांप का सामान्य से काफी हल्का रंग और शरीर पर कॉमन करैत में आमतौर पर दिखाई देने वाली छल्लेदार धारियों का न होना के बाद सवाल खड़े होने लगे. इसके बाद बचावकर्मियों ने सांप का रिकॉर्ड तैयार किया और दुधवा के जीव वैज्ञानिकों तथा पशु चिकित्सा विशेषज्ञों से इस बारे में सलाह ली. दुधवा के पशु चिकित्सक डॉ. दया शंकर ने भी सांप की जांच की. उन्होंने इसे असामान्य खोज बताया. डॉ. दया शंकर के मुताबिक, दुधवा में यह पहली बार है जब उन्होंने इतने हल्के रंग और बिना छल्लेदार धारियों वाला करैत सांप देखा है.

    उम्र के साथ बदल सकता है करैत का रंग और पैटर्न

    वहीं, देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ जीवविज्ञानी विपुल मौर्य ने मीडिया से कहा कि दुधवा समेत पूरा तराई क्षेत्र सांपों की बहुत सारी वैरायटी के लिए जाना जाता है, इसलिए इस तरह के मामले की जांच करना महत्वपूर्ण है. विपुल मौर्य ने बताया कि करैत सांप में धारियों का हल्का पड़ना या उनका पूरी तरह गायब हो जाना उम्र बढ़ने के साथ रंग और शरीर में होने वाले बदलाव से जुड़ा हो सकता है. इस प्रक्रिया को ‘ओन्टोजेनेटिक कलर पैटर्न शिफ्ट’ कहा जाता है.

    हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में केवल बाहरी रंग-रूप के आधार पर सांप की पहचान करना सही नहीं होगा. इसकी शारीरिक बनावट की पूरी जांच करना जरूरी है. इससे पता चल सकेगा कि यह वास्तव में ‘कॉमन करैत’ है या ‘लेसर ब्लैक करैत’ और इसका असामान्य रंग कुदरती बदलाव का परिणाम है या रंग में किसी अन्य तरह का अंतर है.

  • बाइक से भी पतली है​​​​​ ये अनोखी कार, कबाड़ से बना डाला गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड;

    बाइक से भी पतली है​​​​​ ये अनोखी कार, कबाड़ से बना डाला गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड;

    बाइक से भी पतली है​​​​​ ये अनोखी कार, कबाड़ से बना डाला गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड;

    क्या आपने कभी ऐसी कार देखी है जो बाइक से भी पतली हो? इटली के एक जुगाड़ू मैकेनिक ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है कि देखने वाले दंग रह गए हैं. इस बंदे ने 1993 की पुरानी फिएट पांडा कार को बीच से ऐसा काटा-छांटा कि उसे दुनिया की सबसे पतली कार बना डाला. इस अजीबोगरीब कार का वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है और लोग इसे देखकर पूरी तरह हैरान हैं.

    गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

    उत्तरी इटली के रहने वाले मैकेनिक एंड्रिया माराजी ने अपनी इस पुरानी कार की चौड़ाई घटाकर सिर्फ एक तिहाई कर दी है. मजेदार बात यह है कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स ने भी इसे दुनिया की सबसे संकरी कार मान लिया है. इस अजीबोगरीब कार की चौड़ाई महज 50.20 सेंटीमीटर है, जबकि लंबाई 3.40 मीटर और ऊंचाई 1.45 मीटर है. एंड्रिया को इसे तैयार करने में पूरे 12 महीने लगे, जिसमें उन्होंने जीतोड़ कटिंग और वेल्डिंग की है.

    यह पूरा प्रोजेक्ट एंड्रिया के परिवार के ऑटो रीसाइक्लिंग बिजनेस यानी कबाड़खाने में तैयार किया गया है. सबसे बढ़िया बात ये है कि इस कार का 99% हिस्सा पुरानी फिएट पांडा के ओरिजिनल पार्ट्स से ही बना है.

    एक नजर में दुनिया की सबसे पतली कार

    अब बात करें अंदर के स्पेस और स्पीड की, तो इसमें सिर्फ एक ही आदमी के बैठने की जगह है. गाड़ी में छोटा सा स्टीयरिंग व्हील, चार पहिए, एक इलेक्ट्रिक मोटर, एक हेडलाइट और दो रियर लाइटें दी गई हैं. इस अनोखे वाहन का वजन सिर्फ 264 किलो है और इसकी टॉप स्पीड 15 किलोमीटर प्रति घंटा है. ये कार पूरी तरह से फंक्शनल है, लेकिन सेफ्टी की वजह से अभी इसे सड़कों पर चलाने की कानूनी इजाजत नहीं मिली है.

  • ना मच्छर, ना भनभनाहट… दुनिया​​​​​ का वो देश जहां एक भी मच्छर नहीं! वजह बेहद हैरान करने वाली..

    ना मच्छर, ना भनभनाहट… दुनिया​​​​​ का वो देश जहां एक भी मच्छर नहीं! वजह बेहद हैरान करने वाली..

    ना मच्छर, ना भनभनाहट… दुनिया​​​​​ का वो देश जहां एक भी मच्छर नहीं! वजह बेहद हैरान करने वाली..

    Mosquito Free Country: दुनिया में एक ऐसा देश भी है जहां आज तक एक भी मच्छर नहीं पाया गया। यहां की अनोखी जलवायु और प्राकृतिक परिस्थितियां मच्छरों के लिए अनुकूल नहीं हैं। जानिए आखिर क्यों इस देश में मच्छर, सांप और कई अन्य जीव नहीं पाए जाते और इसके पीछे की दिलचस्प वजह क्या है।

    Mosquito Free Country: गर्मी हो या बारिश, मच्छरों से परेशान लोग अक्सर सोचते हैं कि काश कोई ऐसी जगह होती जहां इनसे छुटकारा मिल जाता। लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश मौजूद है जहां आज तक एक भी मच्छर नहीं पाया गया है।

    इस देश में ना सिर्फ मच्छरों की संख्या शून्य है, बल्कि कई ऐसे जीव-जंतु भी नहीं मिलते जो आमतौर पर दूसरे देशों में आसानी से दिखाई देते हैं। यही वजह है कि वैज्ञानिकों के लिए भी आइसलैंड का यह रहस्य काफी दिलचस्प बना हुआ है।उत्तरी अटलांटिक महासागर में खूबसूरत वादियों, बर्फीले पहाड़ों और अनोखी प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच बसे ‘आइसलैंड’ में करीब 1300 से ज्यादा तरह के जीव पाए जाते हैं, लेकिन मच्छर का नाम तक नहीं है।

    आखिर क्यों नहीं पनपते आइसलैंड में मच्छर?

    मच्छरों को बढ़ने के लिए सबसे पहले ठहरे हुए पानी की जरूरत होती है। इसी पानी में मच्छर अंडे देते हैं और फिर उनका जीवन चक्र पूरा होता है।जानकारों के मुताबिक, आइसलैंड की जलवायु मच्छरों के लिए अनुकूल नहीं है। यहां मौसम तेजी से बदलता रहता है और पानी लंबे समय तक एक जगह जमा नहीं रह पाता। ऐसे में मच्छरों के अंडे और लार्वा विकसित होने के लिए जरूरी परिस्थितियां नहीं बन पातीं।

    ठंड भी है बड़ी वजह

    आइसलैंड में बेहद कम तापमान भी मच्छरों के लिए बड़ी परेशानी है। सर्दियों में यहां तापमान कई बार बेहद नीचे चला जाता है और पानी जल्दी जम जाता है।वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां की मिट्टी, पानी और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना भी ऐसी है, जो मच्छरों को लंबे समय तक जीवित रहने का मौका नहीं देती।

    पड़ोसी देशों में हैं मच्छर, लेकिन आइसलैंड में नहीं

    हैरानी की बात यह है कि आइसलैंड के आसपास मौजूद कई देशों जैसे ग्रीनलैंड, स्कॉटलैंड और डेनमार्क में मच्छर पाए जाते हैं। लेकिन आइसलैंड की अलग प्राकृतिक परिस्थितियां इसे बाकी देशों से अलग बनाती हैं।

    सांप और कई कीड़े भी नहीं मिलते

    मच्छरों के अलावा आइसलैंड में सांप और कई तरह के रेंगने वाले जीव भी नहीं पाए जाते। यहां का ठंडा मौसम ऐसे जीवों के लिए अनुकूल नहीं है।हालांकि, यहां मिज (Midges) नाम के छोटे कीड़े जरूर पाए जाते हैं, जो देखने में मच्छरों जैसे लगते हैं। ये काट भी सकते हैं, लेकिन आम मच्छरों की तरह ज्यादा परेशानी पैदा नहीं करते।यही कारण है कि आइसलैंड को दुनिया के उन चुनिंदा देशों में गिना जाता है, जहां लोग मच्छरों के आतंक से पूरी तरह आजाद हैं।

  • YouTube को टक्कर देने के​​​​​ लिए चीन का दांव, ग्लोबली लॉन्च हुआ Bilibili ऐप..

    YouTube को टक्कर देने के​​​​​ लिए चीन का दांव, ग्लोबली लॉन्च हुआ Bilibili ऐप..

    YouTube को टक्कर देने के​​​​​ लिए चीन का दांव, ग्लोबली लॉन्च हुआ Bilibili ऐप..

    Bilibili APP Launch 2026: चीन की वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनी Bilibili ने ग्लोबल मार्केट में कदम बढ़ाते हुए अपने इंटरनेशनल ऐप को लॉन्च कर दिया है। कंपनी का यह प्लेटफॉर्म सीधे तौर पर YouTube जैसे वीडियो-शेयरिंग प्लेटफॉर्म को चुनौती देने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल Bilibili का ग्लोबल वर्जन Android यूजर्स के लिए Google Play Store पर उपलब्ध कराया गया है। कंपनी के मुताबिक, जल्द ही इसे iOS यूजर्स के लिए भी लॉन्च किया जाएगा।

    Gen-Z और युवाओं पर फोकस

    Bilibili को खास तौर पर Gen-Z और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। YouTube की तरह इस प्लेटफॉर्म पर यूजर्स वीडियो अपलोड करने के साथ-साथ लाइव स्ट्रीमिंग भी कर सकते हैं। कंपनी का लक्ष्य ग्लोबल क्रिएटर्स और दर्शकों को एक ऐसे प्लेटफॉर्म से जोड़ना है, जहां अलग-अलग देशों का कंटेंट आसानी से उपलब्ध हो सके।

    कंपनी ने अपने आधिकारिक X पोस्ट के जरिए ग्लोबल लॉन्च की जानकारी दी है। इंटरनेशनल वर्जन का मकसद ग्लोबल कंटेंट का बेहतर डिस्ट्रीब्यूशन, लोकलाइजेशन और आसान साइन-अप उपलब्ध कराना है। कंपनी आने वाले समय में लोकलाइज्ड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन से जुड़े फीचर्स भी जोड़ने की तैयारी में है। इंटरनेशनल वर्जन की पहचान ऐप के ऊपरी हिस्से में दिखाई देने वाले ग्लोबल सिंबल से की जा सकती है।

    पहले कंटेंट से कमाई का मौका

    Bilibili की सबसे बड़ी खासियत इसका क्रिएटर मॉनिटाइजेशन मॉडल हो सकता है। कंपनी क्रिएटर्स को कंटेंट अपलोड करने के शुरुआती चरण से ही कमाई का मौका देने का दावा करती है। इसके लिए YouTube जैसी लंबी मॉनिटाइजेशन एलिजिबिलिटी प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना पड़ता।

    यही वजह है कि Bilibili ग्लोबल क्रिएटर्स को आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंपनी ने MrBeast जैसे बड़े इंटरनेशनल क्रिएटर्स को भी अपने प्लेटफॉर्म की ओर आकर्षित किया है। हालांकि, प्लेटफॉर्म पर कमाई से जुड़े नियम और उपलब्ध सुविधाएं समय के साथ बदल सकती हैं।

    आसान साइन-अप से बढ़ेगी पहुंच

    ग्लोबल वर्जन में Bilibili ने साइन-अप प्रक्रिया को भी आसान रखा है। कंपनी का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा इंटरनेशनल क्रिएटर्स को बिना जटिल प्रक्रिया के प्लेटफॉर्म से जोड़ना है। रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती स्तर पर आइडेंटिटी वेरिफिकेशन की बाध्यता नहीं रखी गई है, जिससे नए यूजर्स के लिए प्लेटफॉर्म पर शुरुआत करना आसान हो सकता है।

    रेगुलेटरी चुनौतियां बन सकती हैं बड़ी बाधा

    हालांकि, ग्लोबल विस्तार Bilibili के लिए आसान नहीं होगा। कंपनी ने लॉस एंजल्स, लंदन, मैक्सिको सिटी, साओ पाओलो, इस्तांबुल और टोक्यो जैसे शहरों में नौकरियों के लिए पोस्टिंग की है, जो उसके इंटरनेशनल विस्तार की योजना का संकेत देती है।

    लेकिन अलग-अलग देशों में कंटेंट मॉडरेशन, डेटा स्टोरेज और प्राइवेसी से जुड़े नियम कंपनी के सामने बड़ी चुनौती बन सकते हैं। इसके अलावा, Bilibili को पहले से मजबूत वैश्विक पहचान रखने वाले YouTube से भी कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी होगी। फिर भी, आसान क्रिएटर एंट्री, शुरुआती कमाई और युवा दर्शकों पर फोकस Bilibili को ग्लोबल वीडियो मार्केट में अपनी जगह बनाने का मौका दे सकता है। चीन की वीडियो स्ट्रीमिंग कंपनी Bilibili ने ग्लोबल मार्केट में कदम बढ़ाते हुए अपने इंटरनेशनल ऐप को लॉन्च कर दिया है।

  • फाउंडर ने डिग्री और एक्सपीरियंस​​​​​ नहीं, हुनर पर किया भरोसा, टैक्सी ड्राइवर 10 साल में बना बड़ा अधिकारी

    फाउंडर ने डिग्री और एक्सपीरियंस​​​​​ नहीं, हुनर पर किया भरोसा, टैक्सी ड्राइवर 10 साल में बना बड़ा अधिकारी

    फाउंडर ने डिग्री और एक्सपीरियंस​​​​​ नहीं, हुनर पर किया भरोसा, टैक्सी ड्राइवर 10 साल में बना बड़ा अधिकारी

    किसी कंपनी में नौकरी पाने के लिए आमतौर पर अच्छी डिग्री, कॉर्पोरेट एक्सपीरियंस और एक मजबूत रिज्यूमे को काफी जरूरी माना जाता है, लेकिन हैदराबाद के एक स्टार्टअप फाउंडर ने करीब 10 साल पहले इन क्लासिक तरीकों से अलग जाकर एक ऐसा फैसला लिया, जिस पर उस समय कई लोगों ने सवाल उठाए थे. उन्होंने एक टैक्सी ड्राइवर को अपनी कंपनी का पहला कर्मचारी बनाया. आज एक दशक बाद वही व्यक्ति कंपनी में देशभर के प्रोक्योरमेंट यानी खरीदारी से जुड़े काम की जिम्मेदारी संभाल रहा है.

    यह कहानी Adonmo के को-फाउंडर Sravanth Gajula ने LinkedIn पर शेयर की. उन्होंने बताया कि जब वह कंपनी को शुरुआती दौर में खड़ा कर रहे थे, तब उन्होंने कर्मचारी चुनते समय सिर्फ डिग्री और अनुभव को आधार नहीं बनाया. उन्हें एक ऐसे व्यक्ति में क्षमता नजर आई, जिसे शायद कोई क्लासिक रिक्रूटर पहली नजर में नौकरी के लिए जरूरी नहीं मानते थे. गजुला के मुताबिक, उस व्यक्ति के पास कॉर्पोरेट सेक्टर का कोई अनुभव नहीं था. उसे अंग्रेजी भी नहीं आती थी और उसका रिज्यूमे भी ऐसा नहीं था, जिसे देखकर किसी बड़ी कंपनी का HR तुरंत प्रभावित हो जाए. लेकिन उसमें कुछ ऐसी खूबियां थीं, जो गजुला को ज्यादा महत्वपूर्ण लगीं. वह सीखने के लिए तैयार था, ईमानदार था और किसी समस्या का रास्ता निकालने की कोशिश करता था.

    क्यों खास है नौकरी की ये कहानी?

    यही वजह थी कि गजुला ने यह देखने के बजाय कि उम्मीदवार में क्या कमी है, इस बात पर भरोसा किया कि वह आगे क्या कर सकता है. जब वह कर्मचारी कंपनी से जुड़ा, तब Adonmo अपने शुरुआती चरण में थी. कंपनी ने भी उसे सिर्फ नौकरी देकर छोड़ नहीं दिया, बल्कि उसके विकास में निवेश किया. उसे spoken English की क्लास में भेजा गया, ताकि वह धीरे-धीरे अपने कम्युनिकेशन स्किल्स को बेहतर कर सके. इसके साथ ही उसे छोटे-मोटे या सिर्फ रूटीन कामों तक सीमित नहीं रखा गया. उसे जिम्मेदारियां दी गईं और यह भरोसा जताया गया कि वह समय के साथ बड़ी भूमिका निभा सकता है. यानी कंपनी ने उसकी मौजूदा कमियों को उसकी पूरी पहचान नहीं माना. इस फैसले का नतीजा 10 साल बाद सामने आया. कभी टैक्सी चलाने वाला वह कर्मचारी आज Adonmo में हेड ऑफ प्रोक्योरमेंट बन चुका है और पूरे भारत में कंपनी की खरीदारी से जुड़े काम संभालता है. गजुला ने उसे संगठन के सबसे भरोसेमंद लोगों में से एक बताया.

    इस कहानी के जरिए गजुला ने भर्ती और वर्कप्लेस कल्चर को लेकर भी एक अहम बात कही. उनके मुताबिक, कंपनियां अक्सर खुद को people-first बताती हैं, लेकिन असली फर्क तब दिखता है जब वे ऐसे लोगों को मौका देती हैं जिन्हें बाकी लोग नजरअंदाज कर चुके हों. उनका मानना है कि किसी व्यक्ति को पूरी तरह उसके रिज्यूमे से आंकना हमेशा सही नहीं होता. कई बार क्षमता कागज पर दिखाई नहीं देती. किसी को सीखने का मौका, सही ट्रेनिंग और जिम्मेदारी दी जाए तो वह अपनी उम्मीद से कहीं आगे जाकर प्रदर्शन कर सकता है.

    गजुला की यह कहानी इसी बात की मिसाल है कि सही अवसर और भरोसा मिलने पर इंसान अपनी पहचान और करियर दोनों बदल सकता है. उनके मुताबिक, नेताओं को सिर्फ यह नहीं देखना चाहिए कि कोई व्यक्ति आज क्या कर सकता है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि सही मौके मिलने पर वह कल क्या बन सकता है.


    Sravanth Gajula

    Co-Founder @ AdOnMo | ISB | MIT | Microsoft1mo

    LinkedIn

    10 years ago, I hired a taxi driver as our first employee. Class 9 pass. No English. No corporate experience. No resume that would make any traditional hiring manager look twice. Everyone wondered why I did that. But something about his hunger, his honesty, his willingness to just figure it out, felt exactly like what we wanted to build in our company. So we bet on him. We enrolled him in spoken English classes. We gave him real, contributing, and impactful work. We treated him like someone who was going to grow, because we genuinely believed he would. He didn’t just grow. He flew. 10 years later, he now heads our Procurement at AdOnMo. Pan-India responsibility. One of the most trusted people in our organisation. People talk a lot about culture. About values. About people-first companies. But in practice, It looks like hiring someone the world would have overlooked. It looks like investing in them before they’re “ready.” It looks like giving them a seat at the table, and then watching them own the room. That’s it. That was our only job. If you’re a founder or a leader reading this, your team will become who you believe them to be. Believe bigger.

  • वोट मांगने का अनोखा अंदाज,​​​​​ मतदाता के घर पहुंचकर निर्दलीय उम्मीदवार ने धोए बर्तन.

    वोट मांगने का अनोखा अंदाज,​​​​​ मतदाता के घर पहुंचकर निर्दलीय उम्मीदवार ने धोए बर्तन.

    वोट मांगने का अनोखा अंदाज,​​​​​ मतदाता के घर पहुंचकर निर्दलीय उम्मीदवार ने धोए बर्तन.

    राजस्थान के कोटा में नगर निगम चुनाव के दौरान एक निर्दलीय उम्मीदवार का प्रचार करने का अनोखा तरीका लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। आमतौर पर चुनावी मौसम में उम्मीदवार रैलियों, जनसभाओं और घर-घर जाकर मतदाताओं से समर्थन मांगते नजर आते हैं, लेकिन इस उम्मीदवार ने प्रचार के दौरान कुछ अलग करने की कोशिश की। वोट मांगने के लिए वह एक मतदाता के घर पहुंचा और वहां परिवार के सदस्यों के साथ बातचीत करने के बाद बर्तन धोने लगा।

    उम्मीदवार ने लोगों से अपने पक्ष में मतदान करने की अपील करते हुए कहा कि वह आम जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं को समझना चाहता है। उसका कहना था कि जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय लोगों के घरों तक सीमित न रहें, बल्कि आम दिनों में भी जनता के सुख-दुख में शामिल हों। इसी संदेश को लोगों तक पहुंचाने के लिए उसने घर के काम में हाथ बंटाया और बर्तन धोकर मतदाताओं का ध्यान आकर्षित किया।

    उम्मीदवार के इस अंदाज को देखकर घर में मौजूद लोग भी हैरान रह गए। कुछ लोगों ने इसे सादगी और आम जनता से जुड़ने की कोशिश बताया, जबकि कुछ लोगों ने इसे चुनावी प्रचार का अलग तरीका माना। मौके पर मौजूद लोगों ने उम्मीदवार से बातचीत की और स्थानीय समस्याओं के बारे में भी जानकारी दी। इस दौरान उम्मीदवार ने क्षेत्र में सफाई, सड़क, पानी और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं को प्राथमिकता देने का भरोसा दिलाया।

    कोटा में इन दिनों नगर निकाय चुनाव को लेकर प्रचार अभियान तेज हो गया है। अलग-अलग उम्मीदवार मतदाताओं तक पहुंचने के लिए अपने-अपने तरीके अपना रहे हैं। कोई पदयात्रा कर रहा है, तो कोई छोटी सभाओं और जनसंपर्क अभियानों के जरिए लोगों से समर्थन मांग रहा है। ऐसे माहौल में निर्दलीय उम्मीदवार का मतदाता के घर पहुंचकर बर्तन धोना लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

    उम्मीदवार का कहना है कि चुनाव जीतने के बाद भी वह जनता से इसी तरह जुड़ा रहेगा और क्षेत्र की समस्याओं को दूर करने के लिए काम करेगा। हालांकि, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उसका यह अनोखा प्रचार अभियान मतदाताओं को कितना प्रभावित करता है और चुनाव में उसे इसका कितना लाभ मिलता है। फिलहाल, बर्तन धोकर वोट मांगने का यह अंदाज स्थानीय स्तर पर लोगों का ध्यान जरूर खींच रहा है।

  • AI की सलाह पर पहाड़​​​​​ चढ़ना पड़ा भारी, कम खाना-पानी लेकर निकले युवक रातभर घाटी में फंसे.

    AI की सलाह पर पहाड़​​​​​ चढ़ना पड़ा भारी, कम खाना-पानी लेकर निकले युवक रातभर घाटी में फंसे.

    AI की सलाह पर पहाड़​​​​​ चढ़ना पड़ा भारी, कम खाना-पानी लेकर निकले युवक रातभर घाटी में फंसे.

    आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI आज लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। पढ़ाई, काम से लेकर यात्रा की योजना बनाने तक लोग AI की मदद लेते हैं। लेकिन अमेरिका के कैलिफोर्निया में तीन पर्वतारोहियों को AI की सलाह पर भरोसा करना भारी पड़ गया।

    रिपोर्ट के मुताबिक, रोजविल, कैलिफोर्निया के तीन अनुभवहीन पर्वतारोही माउंट शास्ता की चढ़ाई के लिए निकले थे। यात्रा की तैयारी के दौरान उन्होंने गूगल के Gemini AI से कई तरह की जानकारी ली थी। उन्हें उम्मीद थी कि इससे उनकी यात्रा सुरक्षित और आसान हो जाएगी।

    AI की सलाह से कम रखा खाना-पानी

    अधिकारियों के मुताबिक, पर्वतारोहियों ने चढ़ाई के लिए जरूरी सामान के साथ खाने और पानी की मात्रा तय करने में भी Gemini की सलाह ली थी। AI की सिफारिश के आधार पर उन्होंने जरूरत से काफी कम खाना और पानी अपने साथ रखा।

    पहाड़ों पर मौसम और रास्ते की परिस्थितियां तेजी से बदल सकती हैं। ऐसे में पर्याप्त भोजन, पानी और जरूरी सुरक्षा सामान रखना बेहद जरूरी होता है।

    रात 3 बजे शुरू की चढ़ाई

    तीनों पर्वतारोहियों ने करीब 8,400 फीट की ऊंचाई पर अपना कैंप बनाया था। इसके बाद रविवार सुबह करीब 3 बजे उन्होंने माउंट शास्ता की चोटी की ओर बढ़ना शुरू किया।

    उन्हें दोपहर तक वापस लौटने की सलाह दी गई थी, लेकिन वे शाम करीब 7 बजे तक आगे बढ़ते रहे। जब उन्हें लगा कि चोटी तक पहुंचना संभव नहीं है, तो उन्होंने वापस लौटने का फैसला किया।

    अंधेरे में रास्ता भटके

    वापसी के दौरान अंधेरा हो जाने के कारण तीनों रास्ता भटक गए। पहाड़ी इलाके में रात के समय रास्ता ढूंढना उनके लिए मुश्किल हो गया। इसके बाद वे घाटी में फंस गए और रातभर वहीं रहने को मजबूर हुए।

    अगली सुबह राहत एवं बचाव दल ने तीनों पर्वतारोहियों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि पहाड़ों जैसे जोखिम भरे इलाकों में सिर्फ AI की जानकारी के भरोसे तैयारी करना कितना खतरनाक हो सकता है।

    AI जानकारी जुटाने में मददगार हो सकता है, लेकिन पर्वतारोहण जैसे जोखिम वाले अभियानों में स्थानीय विशेषज्ञों, मौसम संबंधी आधिकारिक जानकारी और अनुभवी गाइड की सलाह को प्राथमिकता देना जरूरी है।

  • चीन में ‘ऑफिस एजिंग’ का​​​​​ डर, दफ्तर में छाता और सनस्क्रीन का ट्रेंड वायरल.

    चीन में ‘ऑफिस एजिंग’ का​​​​​ डर, दफ्तर में छाता और सनस्क्रीन का ट्रेंड वायरल.

    चीन में ‘ऑफिस एजिंग’ का​​​​​ डर, दफ्तर में छाता और सनस्क्रीन का ट्रेंड वायरल.

    Office Aging Fear in China: आमतौर पर लोग सनस्क्रीन और छतरी का इस्तेमाल तेज धूप या बारिश से बचने के लिए करते हैं, लेकिन चीन के कॉरपोरेट कल्चर में इन दिनों एक अलग तरह का ट्रेंड देखने को मिल रहा है।

    Office Aging Fear in China: आमतौर पर लोग सनस्क्रीन और छतरी का इस्तेमाल तेज धूप या बारिश से बचने के लिए करते हैं, लेकिन चीन के कॉरपोरेट कल्चर में इन दिनों एक अलग तरह का ट्रेंड देखने को मिल रहा है। यहां कुछ ऑफिस कर्मचारी धूप या बारिश न होने के बावजूद अपने वर्कप्लेस पर सनस्क्रीन, टोपी, ग्लव्स और यहां तक कि छाते का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके पीछे वजह है त्वचा की देखभाल और कथित तौर पर ‘ऑफिस एजिंग’ से बचने की चिंता।

    सोशल मीडिया पर वायरल हुआ ‘ऑफिस एजिंग’ ट्रेंड

    चीन के स्थानीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Xiaohongshu पर एक कर्मचारी ने ऑफिस के माहौल को लेकर अपना अनुभव साझा किया। इसके बाद कई अन्य कर्मचारियों ने भी अपनी परेशानियां और अनुभव बताए। कुछ लोगों का दावा है कि ऑफिस में काम शुरू करने के कुछ ही समय बाद उनकी त्वचा पहले की तुलना में फीकी नजर आने लगी और आंखों में थकान महसूस होने लगी।

    एक महिला ने यह भी बताया कि घर पर ज्यादा समय बिताने के दौरान उसे अपनी त्वचा में सुधार महसूस हुआ। इन अनुभवों के बाद कर्मचारियों के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि ऑफिस का वातावरण त्वचा और शरीर पर नकारात्मक असर डाल सकता है।

    डेस्क पर छाता, चेहरे पर सनस्क्रीन

    त्वचा को कथित नुकसान से बचाने के लिए कुछ कर्मचारियों ने अपने वर्कस्टेशन को ही ‘सेफ जोन’ बना लिया है। कोई डेस्क पर छोटा छाता लगाकर बैठ रहा है तो कोई टोपी और ग्लव्स पहनकर काम कर रहा है। कई कर्मचारी नियमित रूप से सनस्क्रीन का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस ट्रेंड को लेकर एक कर्मचारी की टिप्पणी भी चर्चा में है कि कंपनी उसे काम करने के पैसे देती है, लेकिन उसकी त्वचा की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?

    क्या कंप्यूटर और ऑफिस लाइट से सच में बढ़ती है उम्र?

    हालांकि, ‘ऑफिस एजिंग’ को वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य मानना सही नहीं होगा। अभी तक ऐसा ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि सामान्य ऑफिस लाइट, कंप्यूटर स्क्रीन या एयर कंडीशनर के कारण इंसान की उम्र तेजी से बढ़ने लगती है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, सूखापन और असहजता जरूर हो सकती है। इसी तरह लगातार बैठे रहने, कम शारीरिक गतिविधि, तनाव और पर्याप्त नींद न लेने से शरीर में थकान नजर आ सकती है, जिसका असर चेहरे पर भी दिखाई दे सकता है।

    असली चिंता शायद लाइफस्टाइल की है

    दरअसल, ऑफिस एजिंग की चर्चा को केवल कंप्यूटर स्क्रीन या नीली रोशनी से जोड़ना अधूरा हो सकता है। लंबे समय तक काम करना, तनाव, नींद की कमी, कम एक्सरसाइज और खराब लाइफस्टाइल त्वचा और शरीर की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए ऑफिस में छाता लगाने का यह ट्रेंड भले ही सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा हो, लेकिन त्वचा की देखभाल के लिए संतुलित लाइफस्टाइल, पर्याप्त नींद, हाइड्रेशन और जरूरत के अनुसार सनस्क्रीन का इस्तेमाल ज्यादा महत्वपूर्ण है।

  • क्या समंदर से निकले एलियंस?​​​​​ ब्रिटेन के समुद्री तटों पर बहकर आए सैकड़ों नीले रहस्यमयी जीव..

    क्या समंदर से निकले एलियंस?​​​​​ ब्रिटेन के समुद्री तटों पर बहकर आए सैकड़ों नीले रहस्यमयी जीव..

    क्या समंदर से निकले एलियंस?​​​​​ ब्रिटेन के समुद्री तटों पर बहकर आए सैकड़ों नीले रहस्यमयी जीव..

    अगर आप समंदर किनारे घूम रहे हों और अचानक रेत पर नीले रंग के सैकड़ों अजीब से जीव बिखरे दिखें, तो एक पल को तो लगेगा ही कि शायद कोई एलियन उतर आया है. कुछ ऐसा ही नजारा आजकल ब्रिटेन के खूबसूरत समुद्र तटों पर देखने को मिल रहा है. कम्ब्रिया के सेंट बीज बीच और वेल्स के तटों पर अचानक से सैकड़ों चमकीले नीले जीव पानी के साथ बहकर किनारे पर आ गए हैं. पहली नजर में लोग इन्हें जेलीफिश समझ रहे थे, लेकिन जब असलियत सामने आई तो हर कोई हैरान रह गया.

    जेलीफिश नहीं, तो फिर क्या हैं ये?

    वैज्ञानिक भाषा में इन्हें ‘वेलेला वेलेला’ (Velella Velella) और आम भाषा में ‘बाय-द-विंड सेलर्स’ (By The Wind Sailors) कहा जाता है. देखने में यह भले ही एक अकेला जीव लगे, लेकिन असल में यह छोटे-छोटे कई जीवों का एक समूह होता है, जो मिलकर एक साथ काम करते हैं.

    इनका आकार लगभग 2 इंच होता है. इनके शरीर के ऊपर एक छोटा सा पारदर्शी पाल (Sail) बना होता है. हवा जब इस पाल से टकराती है, तो ये किसी छोटी नाव की तरह पानी की सतह पर तैरते रहते हैं. चूंकि ये हवा के सहारे तैरते हैं, इसलिए तेज हवाएं इन्हें किनारे की तरफ धकेल देती हैं.

    अचानक समुद्र किनारे क्यों आ रहे हैं ये जीव?

    विशेषज्ञों का कहना है कि यह नजारा एक दशक से भी ज्यादा समय बाद इतने बड़े पैमाने पर देखा गया है. इसके पीछे दो मुख्य वजहें हैं. पहला है तेज पश्चिमी हवाएं. समंदर में उठे तूफानों के बाद बहने वाली हवाएं इन्हें खींचकर किनारे ले आईं. दूसरा ब्रिटेन में भीषण गर्मी. ब्रिटेन में इन दिनों कई इलाकों में तापमान 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है. असामान्य रूप से गर्म मौसम के कारण इन जीवों की संख्या बढ़ी है.

    खूबसूरत हैं, लेकिन छूने की गलती न करें!

    रेत पर बिखरी इन नीली सुंदर आकृतियों को देखकर लोग तस्वीरें लेने से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं. स्थानीय पर्यटक लुईस निकोलसन ने बताया, वहां सैकड़ों नीले जीव बिखरे थे, जो बेहद खूबसूरत लग रहे थे. इतनी धूप भरे दिन में यह एक अद्भुत नजारा था.

  • 80s AI Photo Trend: Instagram​​​​​ पर छाया 80s का रेट्रो अंदाज, ऐसे बनाएं अपनी तस्वीर.

    80s AI Photo Trend: Instagram​​​​​ पर छाया 80s का रेट्रो अंदाज, ऐसे बनाएं अपनी तस्वीर.

    80s AI Photo Trend: Instagram​​​​​ पर छाया 80s का रेट्रो अंदाज, ऐसे बनाएं अपनी तस्वीर.

    सोशल मीडिया पर इन दिनों 1980 के दशक का रेट्रो अंदाज एक बार फिर चर्चा में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार पुराने फोटो नहीं, बल्कि AI इस ट्रेंड को वायरल बना रहा है। लोग अपनी सामान्य तस्वीरों को AI की मदद से ऐसा लुक दे रहे हैं, जैसे वह 1980 के दशक के किसी फिल्मी स्टूडियो, मैगजीन शूट या पुराने फोटो एल्बम में खींची गई हो।

    Instagram पर ऐसी तस्वीरें तेजी से देखने को मिल रही हैं, जिनमें लोग 80s के हेयरस्टाइल, फैशन, ज्वेलरी और पुराने कैमरे जैसी तस्वीरों के अंदाज में नजर आ रहे हैं।

    क्या है 80s AI Photo Trend?

    इस ट्रेंड में लोग अपनी सामान्य फोटो को AI की मदद से 1980 के दशक के रेट्रो पोर्ट्रेट में बदल रहे हैं। इसके लिए ChatGPT में अपनी तस्वीर अपलोड करके उसे 80s स्टाइल में बदलने के लिए कहा जाता है।

    AI तस्वीर में चेहरे की पहचान और प्राकृतिक स्किन टोन को बरकरार रखते हुए बड़े और घने बाल, पुराने जमाने के कपड़े, स्टाइलिश ज्वेलरी, गर्म रोशनी और हल्का फिल्म ग्रेन जैसा इफेक्ट जोड़ सकता है।

    आप चाहें तो तस्वीर के बैकग्राउंड को पुराने फिल्मी स्टूडियो, डिस्को, मैगजीन शूट या पुराने फोटो एल्बम जैसा भी रख सकते हैं।

    क्यों पसंद आ रहा है यह ट्रेंड?

    इस ट्रेंड की सबसे बड़ी खासियत इसका नॉस्टैल्जिक लुक है। 80s का फैशन, पुराने बॉलीवुड फिल्मों जैसा अंदाज और पुराने कैमरे से खींची गई तस्वीरों जैसा टेक्सचर लोगों को आकर्षित कर रहा है।

    AI की मदद से कुछ ही समय में अपनी मौजूदा तस्वीर को बिल्कुल अलग दौर का लुक दिया जा सकता है। यही वजह है कि लोग अपनी बनाई हुई तस्वीरों को सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं और यह ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

    ऐसे बनाएं अपनी 80s वाली तस्वीर

    इसके लिए ChatGPT में नया चैट खोलें और अपनी साफ तस्वीर अपलोड करें। कोशिश करें कि फोटो में चेहरा स्पष्ट हो और रोशनी अच्छी हो।

    इसके बाद AI को बताएं कि आप किस तरह का 80s लुक चाहते हैं। उदाहरण के लिए कपड़े, हेयरस्टाइल, बैकग्राउंड, लाइटिंग और फोटो का मूड पहले से स्पष्ट कर सकते हैं।

    प्रॉम्प्ट में यह भी लिखें कि चेहरे की पहचान और प्राकृतिक स्किन टोन को बदला न जाए। इससे तस्वीर को ज्यादा नैचुरल रखने में मदद मिल सकती है।

    अगर पहली तस्वीर आपकी पसंद के मुताबिक नहीं आती है तो दोबारा पूरी प्रक्रिया शुरू करने की जरूरत नहीं है। उसी तस्वीर में छोटे बदलाव बताकर हेयरस्टाइल, कपड़े, बैकग्राउंड या लाइटिंग को बदला जा सकता है।

    यह Prompt कर सकते हैं ट्राई

    “Reimagine this image as a glamorous 1980s Indian film portrait. Retain the subject’s recognisable facial features and natural skin tone. Add voluminous, softly curled hair, a bold and colourful outfit, statement jewellery, warm studio-style lighting, rich cinematic tones and a subtle vintage film grain. Ensure the final image looks realistic, polished and elegant.”

    तस्वीर को और खास कैसे बनाएं?

    सिर्फ “इसे 80s जैसा बना दो” लिखने के बजाय आप अपनी पसंद का पूरा स्टाइल बता सकते हैं।

    जैसे—

    • 80s बॉलीवुड स्टूडियो पोर्ट्रेट
    • पुराना फैमिली एल्बम
    • रेट्रो डिस्को लुक
    • विंटेज वेडिंग फोटो
    • पुराने मैगजीन कवर जैसा अंदाज

    इसके अलावा साड़ी, बौफैंट हेयरस्टाइल, फ्लेयर्ड पैंट, प्रिंटेड शर्ट, बड़ी ज्वेलरी, पुराने स्टूडियो बैकग्राउंड और विंटेज कैमरा इफेक्ट जैसी डिटेल भी जोड़ी जा सकती हैं।

    जितनी स्पष्ट जानकारी आप प्रॉम्प्ट में देंगे, तस्वीर का लुक उतना ही आपकी पसंद के मुताबिक तैयार किया जा सकता है।