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  • दुनिया में किस उम्र में​​​​​ बच्चे स्कूल जाते हैं? अमेरिका में 5 तो भारत में 6 साल, जानिए पाकिस्तान समेत इन देशों का हाल.

    दुनिया में किस उम्र में​​​​​ बच्चे स्कूल जाते हैं? अमेरिका में 5 तो भारत में 6 साल, जानिए पाकिस्तान समेत इन देशों का हाल.

    दुनिया में किस उम्र में​​​​​ बच्चे स्कूल जाते हैं? अमेरिका में 5 तो भारत में 6 साल, जानिए पाकिस्तान समेत इन देशों का हाल.

    हर देश में बच्चों की पढ़ाई शुरू करने की उम्र एक जैसी नहीं होती। कहीं बच्चे 5 साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू कर देते हैं, तो कुछ देशों में औपचारिक शिक्षा की शुरुआत 7 साल की उम्र के आसपास होती है।

    वर्ल्ड ऑफ स्टैटिक्स के आंकड़ों के अनुसार, भारत में बच्चे औसतन 6 साल की उम्र में औपचारिक स्कूल जाना शुरू करते हैं। वहीं अमेरिका में यह उम्र करीब 5 साल बताई गई है। अलग-अलग देशों की शिक्षा व्यवस्था और नियमों के कारण बच्चों के स्कूल शुरू करने की उम्र में अंतर देखने को मिलता है।

    भारत में 6 साल की उम्र से स्कूल

    आंकड़ों के मुताबिक भारत में बच्चे औसतन 6 साल की उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करते हैं। भारत के अलावा अर्जेंटीना, बांग्लादेश, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, मिस्र, जर्मनी और आइसलैंड जैसे कई देशों में भी स्कूल शुरू करने की औसत उम्र 6 साल बताई गई है।

    हालांकि, इन देशों में प्री-स्कूल या शुरुआती शिक्षा के लिए बच्चे इससे कम उम्र में भी शैक्षणिक संस्थानों में जाना शुरू कर सकते हैं।

    अमेरिका में 5 साल की उम्र में शुरुआत

    अमेरिका में बच्चों के औपचारिक स्कूल शुरू करने की औसत उम्र करीब 5 साल बताई गई है। यहां भी बच्चों की शुरुआती शिक्षा और प्री-स्कूल की व्यवस्था अलग-अलग राज्यों और स्थानीय शिक्षा प्रणालियों के अनुसार बदल सकती है।

    यानी अमेरिका और भारत की तुलना करें तो औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करने की औसत उम्र में करीब एक साल का अंतर नजर आता है।

    पाकिस्तान में कितनी उम्र में स्कूल जाते हैं बच्चे?

    वर्ल्ड ऑफ स्टैटिक्स के अनुसार, पाकिस्तान में बच्चे औसतन 5 साल की उम्र में स्कूल जाना शुरू करते हैं।

    हालांकि, वहां प्री-स्कूल या अर्ली चाइल्डहुड एजुकेशन के लिए बच्चे करीब 3 साल की उम्र से भी शैक्षणिक संस्थानों में जाना शुरू कर सकते हैं।

    पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक स्तर की पढ़ाई आम तौर पर कक्षा 1 से 5 तक होती है। इसके बाद शिक्षा के अलग-अलग चरण आगे बढ़ते हैं।

    इन देशों में 7 साल में शुरू होती है पढ़ाई

    दुनिया के कुछ देशों में बच्चों की औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू करने की औसत उम्र भारत और अमेरिका से अधिक है।

    आंकड़ों के मुताबिक फिनलैंड, हंगरी, पोलैंड, रूस और बुल्गारिया जैसे देशों में बच्चे आमतौर पर करीब 7 साल की उम्र में प्राथमिक स्कूल की शुरुआत करते हैं।

    इसका मतलब यह है कि दुनिया भर में बच्चों की स्कूली शिक्षा शुरू करने की कोई एक तय उम्र नहीं है। अलग-अलग देशों की शिक्षा नीति, बच्चों की शुरुआती शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था के आधार पर इसमें अंतर देखने को मिलता है।

    हर देश की अपनी शिक्षा व्यवस्था

    स्कूल शुरू करने की उम्र भले ही अलग-अलग हो, लेकिन लगभग हर देश में बच्चों के शुरुआती विकास और शिक्षा के लिए अलग-अलग स्तर बनाए गए हैं। कहीं प्री-स्कूल पर ज्यादा जोर दिया जाता है तो कहीं बच्चे सीधे प्राथमिक शिक्षा की शुरुआत करते हैं।

    इसी वजह से किसी देश में 5 साल तो किसी दूसरे देश में 6 या 7 साल की उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा शुरू होना सामान्य बात है।

  • 10 सेंट का सिक्का बना​​​​​ करोड़ों का खजाना! नीलामी में 11.81 करोड़ रुपये में बिका, सिर्फ 9 सिक्के हैं मौजूद.

    10 सेंट का सिक्का बना​​​​​ करोड़ों का खजाना! नीलामी में 11.81 करोड़ रुपये में बिका, सिर्फ 9 सिक्के हैं मौजूद.

    10 सेंट का सिक्का बना​​​​​ करोड़ों का खजाना! नीलामी में 11.81 करोड़ रुपये में बिका, सिर्फ 9 सिक्के हैं मौजूद.

    पुरानी और दुर्लभ चीजों की दुनिया में कभी-कभी कोई छोटी सी वस्तु भी इतनी कीमती हो जाती है कि उसकी कीमत सुनकर हर कोई हैरान रह जाए। अमेरिका में हाल ही में ऐसा ही एक मामला सामने आया, जहां महज 10 सेंट का एक पुराना सिक्का करीब 11.81 करोड़ रुपये में नीलाम हुआ।

    यह कोई सामान्य सिक्का नहीं था। इसे 1894-S डाइम या बारबर डाइम के नाम से जाना जाता है। इसकी दुर्लभता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1894 में इसके सिर्फ 24 सिक्के बनाए गए थे और आज पूरी दुनिया में इनमें से केवल 9 सिक्के बचे होने की जानकारी है।

    10 सेंट का सिक्का पहुंचा करोड़ों की कीमत तक

    एक सितंबर को स्टैक्स बोवर्स गैलरीज की नीलामी में इस दुर्लभ सिक्के को पेश किया गया। नीलामी शुरू होते ही कलेक्टर्स के बीच इसे खरीदने की होड़ लग गई।

    आखिरकार यह सिक्का 1.25 मिलियन डॉलर, यानी करीब 11.81 करोड़ रुपये में बिका। बताया गया कि यह सिक्का चौथी बार किसी नीलामी में पेश किया गया था।

    1894 में बनाए गए थे सिर्फ 24 सिक्के

    इस सिक्के को अमेरिका के तत्कालीन चीफ एन्ग्रेवर चार्ल्स ई. बारबर ने डिजाइन किया था। उनके नाम पर ही इसे बारबर डाइम कहा जाता है।

    साल 1894 में ऐसे सिर्फ 24 डाइम बनाए गए थे। समय के साथ इनमें से ज्यादातर सिक्के गायब हो गए और अब केवल 9 सिक्कों के मौजूद होने की जानकारी है।

    यही दुर्लभता इसे दुनिया के बड़े कॉइन कलेक्टर्स के लिए बेहद खास बनाती है। अमेरिका के 100 महानतम सिक्कों की एक गाइड में भी इसे चौथे स्थान पर रखा गया है।

    आखिर इतने कम सिक्के क्यों बनाए गए?

    इस सिक्के के निर्माण को लेकर इतिहास में अलग-अलग बातें सामने आती रही हैं। इसकी कहानी को 1893 के आर्थिक संकट से भी जोड़ा जाता है, जिसके दौरान अमेरिका में सिक्कों की ढलाई पर असर पड़ा था।

    एक मान्यता के अनुसार, सैन फ्रांसिस्को मिंट में बची हुई चांदी का इस्तेमाल करने के लिए इन सिक्कों को बनाया गया था।

    वहीं कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सैन फ्रांसिस्को मिंट के सुपरिंटेंडेंट ने अपनी बेटी और कुछ बैंक अधिकारियों को उपहार देने के लिए इन सिक्कों को बनवाया था। हालांकि, इन सिक्कों के बनाए जाने की सटीक वजह को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक मत मिलते हैं।

    19 साल के लड़के ने खरीदा था यह सिक्का

    इस दुर्लभ सिक्के के इतिहास में एक दिलचस्प अध्याय डेव बोवर्स से जुड़ा है। साल 1957 में 19 साल की उम्र में डेव बोवर्स ने यह सिक्का 4,750 डॉलर में खरीदा था।

    उस समय इतनी कम उम्र में एक सिक्के के लिए इतनी बड़ी रकम खर्च करना अपने आप में खास बात थी। लेकिन इस खरीद ने उनके कॉइन कलेक्शन के सफर को एक नई दिशा दे दी।

    कुछ साल बाद, 1960 में उन्होंने यही सिक्का 6,000 डॉलर में बेच दिया। इसके बाद यह सिक्का कई बड़े कलेक्टर्स के पास पहुंचा।

    दिलचस्प बात यह है कि जिस स्टैक्स बोवर्स गैलरीज ने अब इस सिक्के को करोड़ों रुपये में नीलाम किया, उसका नाम भी डेव बोवर्स से जुड़ा हुआ है।

    सिक्के पर बनी है लेडी लिबर्टी की तस्वीर

    आज अमेरिका में इस्तेमाल होने वाले 10 सेंट के सिक्के पर पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट की तस्वीर होती है। लेकिन 1894-S बारबर डाइम का डिजाइन इससे बिल्कुल अलग है।

    सिक्के के आगे वाले हिस्से पर लेडी लिबर्टी की तस्वीर बनी है, जबकि पीछे की तरफ फूलों की माला के बीच “ONE DIME” लिखा हुआ है।

    इसका ऐतिहासिक डिजाइन, सीमित संख्या में निर्माण और बेहद कम बचे हुए सिक्कों की वजह से इसकी कीमत लगातार बढ़ती गई।

    छोटी चीज, लेकिन करोड़ों की कीमत

    जिस सिक्के की शुरुआती कीमत कभी सिर्फ 10 सेंट थी, वही आज कॉइन कलेक्टर्स के लिए करोड़ों का खजाना बन चुका है। इसकी कहानी बताती है कि पुरानी चीजों की कीमत सिर्फ उनके धातु या मौद्रिक मूल्य से तय नहीं होती।

    किसी वस्तु की दुर्लभता, इतिहास, डिजाइन और उसके बचे हुए नमूनों की संख्या उसे बेहद मूल्यवान बना सकती है। 1894-S बारबर डाइम इसका एक शानदार उदाहरण है।

  • रहते हैं एक ही घर​​​​​ में, फिर भी नहीं होती दिल से बात? कहीं आपका रिश्ता ‘Roommate Phase’ का शिकार तो नहीं… ये 5 Signs से करें पहचान.?

    रहते हैं एक ही घर​​​​​ में, फिर भी नहीं होती दिल से बात? कहीं आपका रिश्ता ‘Roommate Phase’ का शिकार तो नहीं… ये 5 Signs से करें पहचान.?

    रहते हैं एक ही घर​​​​​ में, फिर भी नहीं होती दिल से बात? कहीं आपका रिश्ता ‘Roommate Phase’ का शिकार तो नहीं… ये 5 Signs से करें पहचान.?

    एक ही घर में रहना इस बात की गारंटी नहीं है कि कपल एक दूसरे के करीब भी हैं. कई बार पति-पत्नी या पार्टनर साथ रहते हुए भी मन से दूर होने लगते हैं. दिन की शुरुआत ऑफिस, घर के काम और दूसरी जिम्मेदारियों से होती है. धीरे-धीरे बातचीत भी सिर्फ जरूरी कामों तक रह जाती है. रिश्तों में इस स्थिति को ‘Roommate Phase’ कहा जाता है.

    इसका मतलब यह नहीं कि रिश्ता खत्म होने वाला है. काम का तनाव, थकान और हर समय व्यस्त रहने की आदत कई बार रिश्ते में दूरी ला देती है. अच्छी बात यह है कि इन संकेतों को समय पर पहचानकर रिश्ते में फिर से प्यार और अपनापन लाया जा सकता है.

    बातचीत सिर्फ जरूरी कामों तक रहना

    ध्यान दें कि क्या अब आप दोनों की बात ज्यादातर ऑफिस, घर के खर्च, खाना या दूसरी जिम्मेदारियों तक ही रहती है. पहले दिनभर की छोटी-छोटी बातें शेयर करने की इच्छा होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. रिश्ते में बातचीत का होना ही नहीं, बल्कि दिल से बातचीत होना भी जरूरी है.

    साथ बैठकर भी मोबाइल में लगे रहना

    एक ही कमरे में बैठना जरूरी नहीं कि साथ समय बिताना भी हो. अगर आप दोनों एक ही सोफे पर बैठकर लगातार अपने-अपने मोबाइल में लगे रहते हैं या साथ खाना खाते समय टीवी में व्यस्त रहते हैं, तो भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है. खासकर तब, जब लंबे समय से बिना किसी काम के बैठकर आप दोनों ने खुलकर बात नहीं की हो.

    पार्टनर की बातों में दिलचस्पी कम होना

    क्या अब आपको पहले की तरह यह जानने की उत्सुकता नहीं रहती कि पार्टनर का दिन कैसा रहा? उनकी खुशी, परेशानी या छोटी-सी बात भी अब खास महसूस नहीं होती? यह भी रिश्ते में कम होते जुड़ाव का संकेत हो सकता है. प्यार सिर्फ बड़े मौकों पर नहीं, बल्कि रोज की छोटी परवाह में दिखाई देता है.

    परेशानी में सबसे पहले किसी और की याद आना

    जब कोई परेशानी होती है और सबसे पहले दोस्त या परिवार के किसी सदस्य से बात करने का मन करता है, लेकिन पार्टनर से शेयर करने का ख्याल नहीं आता, तो यह रिश्ते में दूरी की ओर इशारा कर सकता है. अपने दम पर चीजें संभालना अच्छी बात है, लेकिन पार्टनर का भावनात्मक सहारा भी रिश्ते का जरूरी हिस्सा है.

    रिश्ता फिर से करीब कैसे लाएं?

    सबसे पहले बिना आरोप लगाए अपने पार्टनर से बात करें. “तुम मुझे समय नहीं देते” कहने के बजाय अपनी भावना बताएं. साथ में चाय पीना, खाना खाते समय मोबाइल दूर रखना, थोड़ी देर साथ टहलना या हफ्ते में एक छोटा डेट प्लान करना शुरुआत के लिए काफी हो सकता है.

  • ऑफिस में सिगरेट के धुएं​​​​​ से परेशान महिला ने छोड़ी नौकरी, इस्तीफे का ईमेल इंटरनेट पर वायरल..

    ऑफिस में सिगरेट के धुएं​​​​​ से परेशान महिला ने छोड़ी नौकरी, इस्तीफे का ईमेल इंटरनेट पर वायरल..

    ऑफिस में सिगरेट के धुएं​​​​​ से परेशान महिला ने छोड़ी नौकरी, इस्तीफे का ईमेल इंटरनेट पर वायरल..

    बेंगलुरु की एक महिला ने अपने वर्कप्लेस पर सिगरेट के धुएं की वजह से नौकरी छोड़ने का फैसला किया, जिससे ऑनलाइन चर्चा शुरू हो गई है. जान्हवी चावड़ा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने इस्तीफे वाले ईमेल का स्क्रीनशॉट शेयर किया और इस पोस्ट को अब तक 5.6 मिलियन से ज़्यादा बार देखा जा चुका है. पोस्ट में जान्हवी ने बताया कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी है और अपने इस्तीफे की जानकारी शेयर की. उन्होंने बताया कि ऐसे हालात के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश करने के बावजूद, सिगरेट की गंध बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो गया था.

    ऑफिस एरिया में फैला धुआं

    सोशल मीडिया यूजर्स के सवालों का जवाब देते हुए जान्हवी ने बताया कि कर्मचारी पैंट्री और डाइनिंग एरिया में स्मोकिंग करते थे. उनके मुताबिक कुछ स्मोकर्स बाद में उनके पास आकर बैठ जाते थे, जबकि सिगरेट का धुआं उस लॉबी में फैल जाता था जहां वो म करती थीं.

    जान्हवी कहा कि उन्होंने मास्क पहनने की भी कोशिश की, लेकिन इस परेशानी से निपटने के लिए ये काफी असरदार नहीं रहा. उनके इस्तीफे पर दूसरे यूज़र्स ने भी तुरंत रिएक्ट किया और कहा कि उन्होंने भी अपने ऑफिस में ऐसे ही हालात का सामना किया है. एक यूजर ने बताया कि सिगरेट के धुएं से जुड़ी उनकी दिक्कत तब दूर हुई जब एक मैनेजर ने शिकायत को गंभीरता से लिया और दखल दिया.

    ऑनलाइन यूजर्स ने किया सपोर्ट

    कई सोशल मीडिया यूज़र्स ने ‘पैसिव स्मोकिंग’से जुड़े हेल्थ रिस्क की तरफ इशारा किया और असहज काम के माहौल में रहने के बजाय अपनी सेहत को प्रायोरिटी देने के लिए जान्हवी की तारीफ की. एक और यूजर ने उनके फैसले को हिम्मत भरा बताया और कहा कि कई कर्मचारी कोई कदम उठाने का फैसला करने से पहले लंबे समय तक काम की मुश्किल हालात को बर्दाश्त करते रहते हैं.

  • 20 साल की उम्र में​​​​​ भारत आई जर्मन महिला, यहीं बसाया जीवन; आज 2500 से ज्यादा गायों की करती हैं सेवा.

    20 साल की उम्र में​​​​​ भारत आई जर्मन महिला, यहीं बसाया जीवन; आज 2500 से ज्यादा गायों की करती हैं सेवा.

    20 साल की उम्र में​​​​​ भारत आई जर्मन महिला, यहीं बसाया जीवन; आज 2500 से ज्यादा गायों की करती हैं सेवा.

    किसी दूसरे देश में जाकर वहीं की संस्कृति और आध्यात्मिक परंपराओं को अपनाना आसान नहीं होता। लेकिन जर्मनी की फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग ने भारत आकर अपनी जिंदगी की ऐसी राह चुनी, जो आज हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

    महज 20 साल की उम्र में जर्मनी से भारत आईं फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग ने यहां की आध्यात्मिक परंपराओं और योग से प्रभावित होकर अपना जीवन सेवा के लिए समर्पित कर दिया। बाद में वह राधा कुंड से जुड़ीं और उन्हें सुदेवी माता जी के नाम से जाना जाने लगा।

    20 साल की उम्र में पहुंचीं भारत

    फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग वर्ष 1978 में जर्मनी के बर्लिन से भारत आई थीं। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी। भारत आने के बाद यहां की आध्यात्मिक परंपराओं और योग के प्रति उनकी रुचि लगातार बढ़ती गई।

    इसी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उन्होंने राधा कुंड में दीक्षा ली और धीरे-धीरे भारत को ही अपनी कर्मभूमि बना लिया।

    घायल बछड़े से शुरू हुई गायों की सेवा

    बताया जाता है कि गायों की सेवा का सिलसिला एक घायल बछड़े की देखभाल से शुरू हुआ था। उन्होंने उस बछड़े के इलाज और उसकी देखभाल की जिम्मेदारी उठाई।

    इसके बाद बेसहारा, बीमार और घायल गायों की संख्या बढ़ती गई और यह सेवा धीरे-धीरे एक बड़े अभियान में बदल गई।

    उन्होंने राधा सुरभी गौशाला की स्थापना की, जहां लावारिस और बीमार गायों की देखभाल की जाती है।

    आज 2500 से ज्यादा गायों की देखभाल

    रिपोर्टों के अनुसार, राधा सुरभी गौशाला में अब 2500 से अधिक गायों की देखभाल की जा रही है। इनमें कई ऐसी गायें हैं जो बीमार, घायल या बेसहारा हालत में यहां पहुंचती हैं।

    सुदेवी माता जी ने अपना जीवन इन गायों की सेवा और उनके उपचार के लिए समर्पित कर दिया है। उनकी दिनचर्या का बड़ा हिस्सा गौशाला में रहने वाली गायों की देखभाल में ही गुजरता है।

    भारत सरकार ने पद्म श्री से किया सम्मानित

    गायों और समाज के प्रति उनकी सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2019 में सुदेवी माता जी को पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया था।

    उन्हें यह सम्मान सामाजिक कार्य की श्रेणी में दिया गया। जर्मनी में जन्म लेने के बावजूद भारत को अपनी कर्मभूमि बनाकर सेवा का रास्ता चुनने वाली उनकी कहानी आज भी लोगों का ध्यान खींचती है।

    सेवा को बनाया जीवन का उद्देश्य

    फ्रेडरिक इरीना ब्रूनिंग की कहानी सिर्फ एक विदेशी महिला के भारत आने की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी भी है, जिसमें उन्होंने अपनी जिंदगी को व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से अलग करते हुए सेवा के रास्ते पर आगे बढ़ाया।

    20 साल की उम्र में भारत आने वाली यह महिला आज सुदेवी माता जी के नाम से जानी जाती हैं और हजारों बेसहारा गायों की देखभाल से जुड़ी उनकी यात्रा अपने आप में एक अलग मिसाल बन चुकी है।

  • अमेरिका में कैसी होती है​​​​​ हाउसवाइफ की लाइफ? बाहर से चमकदार, लेकिन घर में दिन ऐसे गुजरता है.

    अमेरिका में कैसी होती है​​​​​ हाउसवाइफ की लाइफ? बाहर से चमकदार, लेकिन घर में दिन ऐसे गुजरता है.

    अमेरिका में कैसी होती है​​​​​ हाउसवाइफ की लाइफ? बाहर से चमकदार, लेकिन घर में दिन ऐसे गुजरता है.

    अमेरिका का नाम सुनते ही अक्सर लोगों के मन में एक बेहतर और आरामदायक जिंदगी की तस्वीर बनने लगती है। भारत में भी जब किसी के बच्चे अमेरिका में रहते हैं तो लोग गर्व से बताते हैं। लेकिन अमेरिका में रहने वाले परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी हमेशा उतनी आसान और खुशहाल हो, यह जरूरी नहीं है।

    खासकर घर पर रहने वाली महिलाओं की दिनचर्या कैसी होती है, क्या वहां पड़ोसियों से आसानी से दोस्ती हो जाती है और खाली समय कैसे गुजरता है—ये सवाल अक्सर लोगों के मन में आते हैं।

    अमेरिका में करीब चार साल से रह रहीं शिप्रा ने अपने अनुभव के आधार पर वहां की जिंदगी के कुछ पहलुओं के बारे में बताया है।

    पार्क में भी आसानी से नहीं बनते दोस्त

    शिप्रा के मुताबिक, अमेरिका के कई पार्कों में शाम के समय भारत जैसी भीड़ नजर नहीं आती। इक्का-दुक्का बच्चे ही खेलने आते हैं और लोग अक्सर अपनी-अपनी गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं।

    भारत में जहां पार्क या पड़ोस में रोज मिलने वाले लोगों से कुछ ही दिनों में दोस्ती हो जाती है, वहीं अमेरिका में नए लोगों से घुलना-मिलना थोड़ा मुश्किल हो सकता है।

    अगर कोई व्यक्ति खुद ज्यादा बातचीत करने वाला नहीं है तो उसके लिए नए दोस्त बनाना और भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में रोज मिलने वाले लोगों से धीरे-धीरे पहचान बढ़ानी पड़ती है।

    पड़ोसी सिर्फ हाय-हैलो तक सीमित रह सकते हैं

    शिप्रा के अनुभव के मुताबिक, अमेरिका में पड़ोसियों के बीच बातचीत कई बार सिर्फ सामान्य अभिवादन तक सीमित रहती है।

    भारतीय परिवारों के बीच दोस्ती आसानी से हो सकती है, लेकिन वहां भी भाषा एक बड़ी चुनौती बन सकती है। अगर दोनों परिवार एक-दूसरे की भाषा अच्छी तरह नहीं समझते हैं तो बातचीत और मेल-जोल बढ़ाना मुश्किल हो सकता है।

    हालांकि, यह अनुभव हर शहर, परिवार या समुदाय में एक जैसा हो, ऐसा जरूरी नहीं है।

    घर के ज्यादातर काम खुद करने पड़ते हैं

    अमेरिका में घर संभालने वाली महिलाओं की दिनचर्या का बड़ा हिस्सा घरेलू कामों में गुजर सकता है। कपड़े धोने से लेकर बर्तन साफ करने, खाना बनाने और घर व्यवस्थित रखने तक कई काम खुद करने पड़ते हैं।

    इसके अलावा बच्चों के स्कूल, उनकी गतिविधियों और परिवार की दूसरी जिम्मेदारियों को संभालना भी दिनचर्या का हिस्सा होता है।

    भारत के संयुक्त परिवारों से अलग अमेरिका में कई परिवार छोटे परिवारों में रहते हैं। ऐसे में आसपास दादा-दादी, भाई-बहन या दूसरे रिश्तेदार मौजूद नहीं होते, जिनसे रोजमर्रा के कामों में मदद मिल सके।

    अकेलापन भी महसूस हो सकता है

    शिप्रा के अनुसार, परिवार से दूर रहने के कारण कुछ भारतीय महिलाओं को अकेलापन महसूस हो सकता है। खासकर अगर पति काम पर चले जाते हैं और बच्चे स्कूल या कॉलेज में रहते हैं, तो दिन का काफी समय अकेले गुजर सकता है।

    ऐसे में महिलाओं के लिए अपने आसपास दोस्त बनाना और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है।

    पुरुषों पर भी होती हैं कई जिम्मेदारियां

    अमेरिका में सिर्फ महिलाओं की दिनचर्या ही अलग नहीं है, बल्कि पुरुषों की जिम्मेदारियां भी काफी होती हैं।

    नौकरी के साथ-साथ घर का सामान लाना, बाजार जाना, कूड़ा बाहर रखना, गाड़ी की देखभाल करना और दूसरे घरेलू कामों में हाथ बंटाना आम बात है।

    भारत के कई हिस्सों में छोटी-मोटी खरीदारी के लिए बाजार घर के आसपास मिल जाते हैं, लेकिन अमेरिका के कई इलाकों में दुकानें काफी दूर हो सकती हैं। ऐसे में कार से सामान लेने जाना रोजमर्रा की जरूरत बन जाता है।

    वीकेंड में मिलती है थोड़ी राहत

    हफ्ते के दिनों में परिवार के सदस्य काम, पढ़ाई और घरेलू जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में घर पर रहने वाली महिला की जिंदगी कई बार एक जैसी दिनचर्या में बंधी हुई महसूस हो सकती है।

    हालांकि, वीकेंड पर परिवार साथ में बाहर घूमने, पार्क जाने, शॉपिंग करने या किसी दूसरी गतिविधि में समय बिताकर कुछ राहत और मनोरंजन तलाश सकता है।

    अमेरिका की जिंदगी हर किसी के लिए एक जैसी नहीं

    अमेरिका में हाउसवाइफ की जिंदगी को सिर्फ बोरिंग या सिर्फ शानदार कहना सही नहीं होगा। हर परिवार की आर्थिक स्थिति, शहर, सामाजिक दायरा, बच्चों की उम्र और व्यक्तिगत पसंद के आधार पर अनुभव अलग हो सकता है।

    शिप्रा का अनुभव अमेरिका में रहने वाली एक भारतीय महिला का व्यक्तिगत अनुभव है, लेकिन यह उन लोगों को वहां की रोजमर्रा की जिंदगी के उस पहलू की झलक जरूर देता है, जो बाहर से दिखाई नहीं देता। चमकदार शहरों और सुविधाओं के पीछे घर संभालने वाली महिलाओं के लिए सामाजिक जुड़ाव और परिवार से दूरी एक अलग चुनौती हो सकती है।

  • ट्रेन के कोच नीले, लाल​​​​​ और हरे रंग के क्यों होते हैं? आखिर क्या होता है इन कलर का मतलब जानिए किस कोच में मिलती है क्या सुविधा?

    ट्रेन के कोच नीले, लाल​​​​​ और हरे रंग के क्यों होते हैं? आखिर क्या होता है इन कलर का मतलब जानिए किस कोच में मिलती है क्या सुविधा?

    ट्रेन के कोच नीले, लाल​​​​​ और हरे रंग के क्यों होते हैं? आखिर क्या होता है इन कलर का मतलब जानिए किस कोच में मिलती है क्या सुविधा?

    अक्सर ट्रेन में सफर करते समय आपने देखा होगा कि सभी कोच एक जैसे रंग के नहीं होते. किसी ट्रेन में नीले रंग के कोच नजर आते हैं तो कहीं लाल या हरे रंग के कोच दिखाई देते हैं. लेकिन सवाल है कि क्या इन रंगों का कोई खास मतलब होता है?

    दरअसल कोच का रंग केवल ट्रेन की खूबसूरती बढ़ाने के लिए नहीं होता, बल्कि इससे कोच के टाइप और उसकी कुछ खासियतों के बारे में भी जानकारी मिल सकती है.

    नीले रंग के कोच का क्या मतलब है?

    भारतीय रेलवे में लंबे समय तक नीले रंग के कोच काफी आम रहे हैं. इन्हें आमतौर पर ICF कोच कहा जाता है. इन कोच में यात्रियों के बैठने और सोने के लिए अलग-अलग कैटेगरी होती हैं. पुराने समय की कई एक्सप्रेस और मेल ट्रेनों में ऐसे नीले कोच देखने को मिलते हैं.

    नीले कोच की पहचान यह भी है कि इनमें कई बार स्लीपर, जनरल और दूसरी यात्री कैटेगरी शामिल होती हैं. हालांकि सिर्फ रंग देखकर कोच की पूरी जानकारी तय नहीं की जा सकती. टिकट और कोच पर लिखी जानकारी देखना ज्यादा सही रहता है.

    लाल रंग के कोच क्यों होते हैं?

    लाल रंग के कोच आजकल कई लेटेस्ट ट्रेनों में दिखाई देते हैं. इनका संबंध अक्सर LHB कोच से होता है. LHB का मतलब Linke Hofmann Busch है. ये कोच पुराने ICF कोच की तुलना में ज्यादा लेटेस्ट माने जाते हैं.

    LHB कोच की बनावट ऐसी होती है कि तेज रफ्तार पर ट्रेन को चलाने में मदद मिलती है. इनकी सेफ्टी भी पुराने कोच की तुलना में बेहतर होती है. यही वजह है कि रेलवे धीरे-धीरे कई ट्रेनों में पुराने कोच की जगह LHB कोच का इस्तेमाल कर रहा है.

    हरे रंग के कोच देखकर क्या समझें?

    कुछ ट्रेनों में हरे या दूसरे रंग के कोच भी नजर आ सकते हैं. कई बार इनका रंग ट्रेन की खास पहचान, रेलवे जोन या किसी खास सेवा से जुड़ा हो सकता है. इसलिए हर हरे कोच का एक ही मतलब मानना सही नहीं होगा.

    क्या कोच का रंग यात्री के लिए जरूरी है?

    कोच का रंग देखकर यात्री को ट्रेन की पूरी जानकारी नहीं मिलती. कोच नंबर, कोच पर लिखा क्लास और टिकट पर दी गई जानकारी ज्यादा जरूरी होती है. स्टेशन पर कोच की स्थिति देखने के लिए डिस्प्ले बोर्ड और कोच नंबर पर ध्यान देना चाहिए.

  • न अमेरिका न रूस, भारत​​​​​ के पड़ोस में रहते हैं सबसे ज्यादा नास्तिक लोग! जानिए कितनी बड़ी आबादी भगवान को नहीं मानती..

    न अमेरिका न रूस, भारत​​​​​ के पड़ोस में रहते हैं सबसे ज्यादा नास्तिक लोग! जानिए कितनी बड़ी आबादी भगवान को नहीं मानती..

    न अमेरिका न रूस, भारत​​​​​ के पड़ोस में रहते हैं सबसे ज्यादा नास्तिक लोग! जानिए कितनी बड़ी आबादी भगवान को नहीं मानती..

    दुनिया में एक या दो नहीं बल्कि कई धर्म हैं और उनको माने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण, ईसाई, इस्लाम और सनातन धर्म है. तीनों ही धर्म को मानने वालों की संख्या कई करोड़ों में है और आज लगभग हर देश में इन धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं. धर्म को लेकर कहा जाता है कि धर्म इंसान को जीना सिखाती है, बेहतर जिंदगी की राह दिखाती है और जिसने सभी को बनाया और संसार को बनाया और जो इसे चला रहा है, उसके बारे में बताती है.

    लेकिन वहीं दूसरी तरफ ऐसे भी लोग हैं, जो इन सब बातों से दूरी बनाते हैं और कहते हैं कि खुदा या भगवान नहीं होता है और वह धर्म पर भी विश्वास नहीं रखते. ऐसे लोगों को नास्तिक कहा जाता है, जो किसी को नहीं मानते. लेकिन क्या आप जानते हैं दुनिया में सबसे ज्यादा नास्तिक लोग कहा रहते हैं? आइए जानते हैं इस सवाल का हैरान कर देने वाला जवाब.

    किस देश में रहते हैं सबसे ज्यादा नास्तिक लोग?

    आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत के पड़ोस में स्थित चीन में सबसे ज्यादा नास्तिक लोग रहते हैं. डब्ल्यूआईएन गैलप इंटरनेशनल जैसे कई अंतरराष्ट्रीय सर्व के मुताबिक चीन की लगभग 91% आबादी नास्तिक या फिर गैर धार्मिक है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन की लगभग 9% के आसपास की आबादी किसी न किसी धर्म से जुड़ी हुई है, जिन्हें में बौद्ध धर्म, ताओ धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम को मानने वाले लोग शामिल हैं. ये आंकड़े भले ही कम लगते हैं, लेकिन चीन दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है, इस लिहाज से आस्तिक यानी धर्मों को मानने वाले लोगों की संख्या बहुत कम नहीं है.

    इस डेटा को भी समझे

    रिपोर्ट्स के अनुसार, भले ही चीन में नास्तिक या गैर धार्मिक लोगों की संख्या 91% है, लेकिन इसे ठीक से समझना जरूरी है. इन आंकड़ों में तकरीबन 67 से 68 प्रतिशत लोग पक्के नास्तिक है, जो सीधे तौर पर धर्म या भगवान की परिभाषा से इनकार करते हैं. बाकी बचे हुए लोग खुद को किसी पारंपरिक धर्म से नहीं जोड़ते. दोनों के बीच फर्क जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि गैर धार्मिक होने का मतलब यह नहीं की कोई व्यक्ति पूरी तरह से आध्यात्मिक या सांस्कृतिक मान्यताओं को नहीं मानता हो. यानी लोग परंपरा या मान्यताओं को फॉलो करते हैं, लेकिन खुद को धर्म से नहीं जोड़ते हैं.

    चीन में नास्तिकों की संख्या कैसे बढ़ गई?

    चीन में नास्तिकता का स्तर ज्यादा होने की एक बड़ी वजह वहां की राजनीतिक व्यवस्था मानी जाती है. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक रूप से नास्तिक विचारधारा का समर्थन करती है और उसके सदस्यों के लिए नास्तिक होना भी जरूरी है. इसके अलावा, चीन की धार्मिक पहचान पर कन्फ्यूशियसवाद और ताओ धर्म जैसी पारंपरिक विचारधाराओं का भी प्रभाव है, जो ईश्वर की पूजा से ज्यादा नैतिक जीवन, पूर्वजों के सम्मान, सामाजिक जिम्मेदारी और प्रकृति के साथ संतुलन पर जोर देते हैं. यही कारण है कि इस देश में धार्मिक लोग कम है.

  • अमेरिका में कार के चारों​​​​​ पहिए चुरा ले गए चोर, जाते-जाते छोड़ दिया ऐसा नोट, पढ़ भारतीय महिला भी रह गई हैरान!

    अमेरिका में कार के चारों​​​​​ पहिए चुरा ले गए चोर, जाते-जाते छोड़ दिया ऐसा नोट, पढ़ भारतीय महिला भी रह गई हैरान!

    अमेरिका में कार के चारों​​​​​ पहिए चुरा ले गए चोर, जाते-जाते छोड़ दिया ऐसा नोट, पढ़ भारतीय महिला भी रह गई हैरान!

    विदेश जाकर अच्छी जिंदगी जीने का सपना बहुत से लोगों का होता है. लेकिन विदेश में भी जिंदगी हमेशा वैसी नहीं होती, जैसी हम फिल्मों या सोशल मीडिया पर देखते हैं. अमेरिका में रह रही एक भारतीय महिला को भी कुछ ऐसा ही रियलिटी चेक मिला, जब उसके भाई की पार्किंग में खड़ी कार के चारों पहिए चोर खोलकर ले गए. हैरानी की बात सिर्फ चोरी नहीं थी, बल्कि चोरों ने जाते-जाते वहां एक ऐसा नोट भी छोड़ दिया, जिसने पूरे मामले को और अजीब बना दिया.

    इस घटना की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर एक यूजर ने शेयर की. पोस्ट के मुताबिक, अमेरिका में क्रिस्टल हाउस की प्रॉपर्टी में एक वीकेंड के दौरान कम से कम तीन कारों के साथ तोड़फोड़ की गई. इनमें से कम से कम तीन कारों के पहिए चोरी होने की बात कही गई. भारतीय महिला ने वीडियो में बताया कि उसका भाई सुबह उठा तो देखा कि पार्किंग में खड़ी उसकी कार के चारों पहिए गायब थे. चोरों ने पहिए निकाल लिए और कार को उसी हालत में छोड़ दिया.

    चोरों ने जाते-जाते छोड़ा नोट
    इस घटना में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात वह नोट है, जो कथित तौर पर मौके पर छोड़ा गया था. नोट में लिखा था कि पिछले वीकेंड क्रिस्टल हाउस की प्रॉपर्टी में कम से कम तीन कारों के साथ तोड़फोड़ हुई और कम से कम तीन कारों के पहिए चोरी हुए. नोट में आगे पार्किंग एरिया में बढ़ती चोरी को लेकर क्रिस्टल हाउस मैनेजमेंट पर गंभीर होने की बात कही गई थी. यानी चोरों ने चोरी करने के बाद भी ऐसा संदेश छोड़ दिया, जैसे वो खुद पार्किंग की सुरक्षा को लेकर शिकायत कर रहे हों.

    सोशल मीडिया पर लोगों ने दिए कई सुझाव
    मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद लोगों ने अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दीं. कुछ यूजर्स ने महिला और उसके भाई के प्रति सहानुभूति जताई, तो कुछ ने कार की सुरक्षा को लेकर सलाह दी. कई लोगों ने कहा कि कार मालिकों को पहियों की सुरक्षा के लिए व्हील लॉक का इस्तेमाल करना चाहिए. वहीं, कुछ यूजर्स ने पार्किंग में सुरक्षा कैमरे लगाने की सलाह भी दी. एक यूजर ने कहा कि अमेरिका में अपराध कई जगहों पर बड़ी समस्या है, हालांकि कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां अपराध बहुत कम होता है. उसके मुताबिक, यह काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति किस जगह रह रहा है.चोरों के नोट पर भी लोगों ने लिए मजे कुछ लोगों ने इस पूरे मामले को मजाकिया अंदाज में भी लिया. एक यूजर ने चोरों के नोट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह सिर्फ चोरी नहीं, बल्कि कार मालिक को सबक सिखाने जैसा लग रहा है. उसने मजाक में यह भी कहा कि चोर अंग्रेजी बोलते हैं और उनके पास प्रिंटर तक है. एक अन्य यूजर ने कार की हालत पर मजेदार टिप्पणी की. उसने कहा कि कम से कम चोरों ने कार को किसी अच्छे टूलबॉक्स जैसी चीज के ऊपर टिकाकर छोड़ा.

    घटना की आधिकारिक पुष्टि नहीं
    हालांकि, सोशल मीडिया पर यह मामला तेजी से चर्चा में है, लेकिन इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है. उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, स्थानीय पुलिस या अधिकारियों की ओर से इस घटना को लेकर कोई आधिकारिक रिपोर्ट या बयान सार्वजनिक नहीं किया गया है. कथित चोरी की सही लोकेशन की जानकारी भी स्पष्ट नहीं है. फिलहाल, यह मामला सोशल मीडिया पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है और कई लोग इसे विदेश में रहने की जिंदगी से जुड़ा एक अलग तरह का अनुभव बता रहे हैं.

  • कागज बनाने में कौन सा​​​​​ देश है नंबर-1? भारत की स्थिति जानकर चौंक जाएंगे आप..

    कागज बनाने में कौन सा​​​​​ देश है नंबर-1? भारत की स्थिति जानकर चौंक जाएंगे आप..

    कागज बनाने में कौन सा​​​​​ देश है नंबर-1? भारत की स्थिति जानकर चौंक जाएंगे आप..

    आज के डिजिटल दौर में भले ही पढ़ाई, दफ्तर और संचार का बड़ा हिस्सा मोबाइल और कंप्यूटर पर आ गया हो, लेकिन कागज की जरूरत अब भी खत्म नहीं हुई है. किताबों और कॉपियों से लेकर पैकेजिंग, कार्टन, टिश्यू और कई औद्योगिक उत्पादों तक कागज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दुनिया में सबसे ज्यादा कागज किस देश में बनाया जाता है और इस मामले में भारत की स्थिति क्या है?

    उपलब्ध 2024 के वैश्विक आंकड़ों के अनुसार चीन दुनिया का सबसे बड़ा कागज और पेपरबोर्ड उत्पादक देश है. वैश्विक उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी करीब 33 फीसदी बताई गई है. यानी दुनिया में तैयार होने वाले कागज और पेपरबोर्ड का लगभग एक-तिहाई हिस्सा चीन से आता है.

    दूसरे स्थान पर है ये देश

    चीन के बाद अमेरिका दूसरे स्थान पर है. 2024 में वैश्विक कागज और पेपरबोर्ड उत्पादन में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 15 फीसदी रही है. इसके बाद भारत का नाम आता है. कुछ 2024 FAO-आधारित आंकड़ों और हालिया रिपोर्टों में भारत को करीब 5 फीसदी हिस्सेदारी के साथ तीसरे स्थान पर बताया गया है.

    भारत के लिए यह आंकड़ा इसलिए भी खास है क्योंकि देश में कागज उद्योग का दायरा लगातार बढ़ रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीय पेपर इंडस्ट्री में लकड़ी, कृषि अवशेष और सबसे बड़ी मात्रा में रिसाइकल किए गए फाइबर यानी वेस्ट पेपर का इस्तेमाल होता है. भारत में पैकेजिंग पेपर और पेपरबोर्ड की मांग भी तेजी से बढ़ रही है.

    हालांकि, यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है. भारत की वैश्विक रैंकिंग अलग-अलग स्रोतों में इस्तेमाल किए गए उत्पादन के दायरे के आधार पर बदल सकती है. भारत सरकार के कुछ औद्योगिक दस्तावेज भारत को पेपर, पेपरबोर्ड और न्यूजप्रिंट के व्यापक वर्ग में लगभग 5 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा उत्पादक बताते है.

    कागज की बढ़ती मांग के पीछे सिर्फ किताबें और स्टेशनरी नहीं हैं. ई-कॉमर्स के विस्तार ने पैकेजिंग बॉक्स और पेपर-बेस्ड पैकेजिंग की जरूरत बढ़ाई है. इसी के साथ रिटेल, खाद्य पैकेजिंग और हाइजीन प्रोडक्ट्स की मांग भी कागज उद्योग को आगे बढ़ा रही है.