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  • बच्चे के हाथ में खिलौना नहीं, था सांप! नागदेवता संग खेलते बेटे को देखकर मां के उड़ गए होश..

    बच्चे के हाथ में खिलौना नहीं, था सांप! नागदेवता संग खेलते बेटे को देखकर मां के उड़ गए होश..

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    सोशल मीडिया पर रोजाना कई तरह के वीडियो वायरल होते हैं. कुछ मनोरंजक होते हैं तो कुछ दिल दहला देने वाले. हाल ही में एक ऐसा ही वीडियो सामने आया है जिसे देखकर किसी भी माता-पिता की रूह कांप जाए. वीडियो में एक छोटा बच्चा दिख रहा है जो हजारों रुपये के खिलौनों से खेल रहा है. मां पास में बैठी हैं और फोन में व्यस्त हो जाती है. इतने में मासूम की नजर पास में रेंगते एक सांप पर पड़ती है. बच्चा बिना किसी डर के सांप के पास चला जाता है और उससे खेलने लगता है.

    हाथ में सांप उठाए बच्चे को देखकर मां की चीख निकल जाती है. यह दृश्य इतना चौंकाने वाला है कि देखने वाले भी सदमे में चले जाएं. बच्चा सांप को खिलौना समझकर उसके साथ खेलने लगा. नागदेवता कहकर लोग सांपों का सम्मान करते हैं लेकिन जंगली या घर में घुसा सांप जानलेवा हो सकता है. भारत में सांप के काटने से हर साल हजारों लोग प्रभावित होते हैं. बच्चों के मामले में जोखिम और बढ़ जाता है क्योंकि वे खतरे को समझ नहीं पाते.

    निडर होकर सांप संग खेला
    वीडियो में साफ दिखता है कि बच्चा पहले रंग-बिरंगे खिलौनों से व्यस्त था. मां भी वहीं बैठी थी लेकिन थोड़ी देर के लिए अपना फोन देखने लगती है. इतने में सांप कमरे में या पास के इलाके से रेंगता हुआ आ जाता है. बच्चा जिज्ञासावश उसके पास पहुंच जाता है. सांप भी शांत बैठा रहता है या धीरे-धीरे हिलता है. मां जब नजर उठाती हैं तो उनका दिल बैठ जाता है. वे चीखती हुई बच्चे की तरफ दौड़ती है. आगे का हिस्सा कई वर्जन में अलग-अलग दिखाया गया है लेकिन मुख्य संदेश एक ही है—लापरवाही कितनी महंगी पड़ सकती है.

    हो सकती थी बड़ी दुर्घटना
    इस तरह की घटनाएं याद दिलाती हैं कि बच्चों की निरंतर निगरानी कितनी जरूरी है. छोटे बच्चे हर चीज को खेल समझते हैं. चमकदार वस्तु, हिलती-डुलती चीज या नया जीव उन्हें आकर्षित करता है. सांप की त्वचा चमकदार होती है और उसकी हरकत बच्चों को खिलौने जैसी लगती है. वे डरना नहीं जानते. इसलिए माता-पिता को हर पल सतर्क रहना पड़ता है. भारत में सांप कई इलाकों में आम है. ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों के पास या घरों में छिपकर रह जाते हैं. शहरों में भी निर्माण कार्यों या हरियाली वाले इलाकों में सांप दिख सकते हैं. बरसात के मौसम में उनका आना बढ़ जाता है. घर में सांप घुसने के कई कारण होते हैं- अंतराल, खुले नाले, अनाज का भंडारण या अंधेरे कोने. नियमित सफाई और दरारों को बंद रखना जरूरी है. अगर कभी सांप दिखे तो घबराएं नहीं. बच्चे को तुरंत सुरक्षित दूरी पर ले जाएं. सांप को खुद पकड़ने या मारने की कोशिश ना करें. विशेषज्ञ या वन विभाग की टीम को बुलाएं.

     

  • गर्मी से राहत का देसी उपाय! ये 7 पेड़ घर और आसपास का तापमान रखने में कर सकते हैं मदद..

    गर्मी से राहत का देसी उपाय! ये 7 पेड़ घर और आसपास का तापमान रखने में कर सकते हैं मदद..

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    गर्मी से राहत देने वाले पेड़। (फोटोः एआई)

    गर्मी से राहत पाने के लिए पेड़ एक प्राकृतिक, प्रभावी और टिकाऊ उपाय हैं। वे छाया देने के साथ ही हवा को ठंडा करने, सतहों का तापमान कम करने और ऊर्जा की खपत घटाने में भी सहायक होते हैं। हालिया शोध और रिपोर्टों से पता चलता है कि कुछ विशेष वृक्ष और रणनीतियां शहरी और ग्रामीण दोनों वातावरण में गर्मी को काफी हद तक कम कर सकती हैं।

    सबसे पहले, पेड़ों की ठंडक देने की क्षमता का वैज्ञानिक आधार समझना जरूरी है। पेड़ दो मुख्य तरीकों से तापमान घटाते हैं- छाया और वाष्पोत्सर्जन (evapotranspiration)। छाया सीधे सूर्य की किरणों को रोकती है, जिससे भूमि और आसपास की सतहें गर्म नहीं होतीं। वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से पेड़ पत्तों से जलवाष्प छोड़ते हैं, जो हवा को ठंडा करता है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि पेड़ की छाया सतह का तापमान 20 °C से अधिक तक कम कर सकती है, और आसपास की हवा का तापमान 2–3 °C तक घट सकता है।

    लेकिन केवल पेड़ लगाने से ही काम नहीं चलता। एक अध्ययन में पाया गया कि बहुत घनी हरियाली, विशेषकर नम और बंद वातावरण में, वाष्पोत्सर्जन से बढ़ी नमी गर्मी की अनुभूति (Heat Index) को 2 °C तक बढ़ा सकती है। इसलिए, पेड़ों के साथ झाड़ियां, ग्राउंड कवर और ग्रीन रूफ जैसी विविध हरियाली का संयोजन आवश्यक है।

    गर्मी से बचाने में प्रभावी पेड़

    नीम: यह भारत का एक प्रसिद्ध और गर्मी सहिष्णु वृक्ष है। इसकी घनी छाया और उच्च वाष्पोत्सर्जन क्षमता इसे गर्मी में अत्यंत उपयोगी बनाती है।

    आम: बड़े पत्तों वाला यह वृक्ष व्यापक छाया देता है और गर्मी से राहत में सहायक होता है। कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि इसे घर के पश्चिमी हिस्से में लगाने से अंदर का तापमान 3–5 °C तक कम हो सकता है।

    पीपल: विशाल छत्र वाला यह वृक्ष गहरी छाया प्रदान करता है और लंबे समय तक ठंडक बनाए रखता है।

    सहजन (मोरिंगा): तेजी से बढ़ने वाला यह वृक्ष हल्की लेकिन प्रभावी छाया देता है और लगभग किसी भी मिट्टी में उग जाता है।

    बरसाती वृक्ष, इंडियन कॉर्क, कदम्ब: ये बड़े और घने वृक्ष हैं, जो गहरी छाया और ठंडक प्रदान करते हैं, विशेषकर बड़े प्लॉटों में।

    जामुन, अशोक, गुलमोहर: ये पेड़ शहरी परिस्थितियों में छाया, प्रदूषण सहनशीलता और सौंदर्य, तीनों प्रदान करते हैं।

    चीकू: एक वास्तुशिल्प उदाहरण में देखा गया कि चीकू के पेड़ ने घर के आसपास की जगह को इतना ठंडा बना दिया कि लोग तुरंत राहत महसूस कर सके।

    तालिका से समझिएः

    पेड़ का नामठंडक देने का तरीकाविशेषता / उपयोगितानीमघनी छाया, वाष्पोत्सर्जनगर्मी सहिष्णु, कम देखभाल में बढ़ताआमव्यापक छायाघर के पश्चिमी हिस्से को ठंडा करता हैपीपलगहरी छायालंबे समय तक ठंडक बनाए रखता हैसहजन (मोरिंगा)तेज विकास, हल्की छायाकिसी भी मिट्टी में उगता हैबरसाती वृक्ष, कॉर्क, कदम्बगहरी छाया, बड़े आकारबड़े प्लॉटों में उपयुक्तजामुन, अशोक, गुलमोहरछाया + सौंदर्यशहरी वातावरण में उपयुक्तचीकूछाया + ठंडक अनुभववास्तुशिल्प में ठंडक का प्रतीक

    लेकिन केवल पेड़ लगाने से ही काम नहीं चलता। शहरों में पेड़ों को फैलाव में और लोगों के रास्तों, बाजारों, स्कूलों के आसपास लगाना चाहिए, ताकि छाया और ठंडक सीधे लोगों तक पहुंचे। साथ ही, पेड़ों की देखभाल, रोग-नियंत्रण और समय पर प्रतिस्थापन की व्यवस्था भी होनी चाहिए।

    शहरी योजनाओं में पेड़ों के साथ हल्के शेड, परावर्तक सतहें और ब्लू-ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर (जैसे पानी और हरियाली का संयोजन) भी शामिल होना चाहिए। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इन उपायों से सतह का तापमान 22 °C तक कम हो सकता है और आसपास की हवा भी ठंडी होती है।

    इस बात का रखें ध्यान

    यह समझना आवश्यक है कि पेड़ गर्मी से बचाने में एक प्राकृतिक और प्रभावी उपाय हैं, लेकिन उन्हें सही स्थान, सही संयोजन और देखभाल के साथ लगाना ही उन्हें प्रभावी बनाता है। नीम, आम, पीपल, सहजन जैसे पेड़ घर और शहर दोनों में ठंडक और आराम ला सकते हैं। यदि आप अपने घर, स्कूल या मोहल्ले में ठंडक बढ़ाना चाहते हैं, तो इन पेड़ों को उचित स्थान पर लगाना और उनकी देखभाल करना पहला कदम हो सकता है।

    आगे का कदम: अपने आसपास की जगह का आकलन करें, कहां अधिक धूप पड़ती है, किस दिशा से हवा आती है, कितनी जगह उपलब्ध है और उसी अनुसार उपयुक्त पेड़ चुनें। साथ ही, स्थानीय कृषि विभाग या वन विभाग से सलाह लेकर पौधों की देखभाल और जल प्रबंधन सुनिश्चित करें।

  • जिस जिम में बना रहा था मस्कुलर बॉडी, वहीं जिंदगी ने छोड़ा साथ! पोज देते-देते आया हार्ट अटैक

    जिस जिम में बना रहा था मस्कुलर बॉडी, वहीं जिंदगी ने छोड़ा साथ! पोज देते-देते आया हार्ट अटैक

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    मसल्स दिखाने के दौरान आ गया हार्ट अटैक (इमेज- सोशल मीडिया)

    इन दिनों जिम में अचानक हार्ट अटैक आने के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे कई सीसीटीवी और मोबाइल फुटेज वायरल हो रहे हैं जिनमें युवा वर्कआउट के दौरान या उसके तुरंत बाद बेहोश होकर गिरते दिखते हैं. इसी कड़ी में एक और चौंकाने वाला मामला सामने आया है. एक युवक जिम में अपने बाइसेप्स बनाकर पोज दे रहा था. वह अपनी मसल्स को फ्लेक्स करके कैमरे के सामने दिखा रहा था. अचानक उसे हार्ट अटैक आ गया और वह जिम के फर्श पर निढाल होकर गिर पड़ा।

    आसपास मौजूद लोग कुछ समझ पाते उससे पहले ही उसकी हालत गंभीर हो चुकी थी. इस घटना ने लोगों को हैरान कर दिया है. वायरल हो रहे वीडियो में साफ दिखता है कि युवक अपनी बॉडी को फ्लेक्स कर रहा है. वह दोनों हाथों से बाइसेप्स को टाइट करके पोज दे रहा है. उसके चेहरे पर मेहनत और गर्व की भावना साफ झलक रही है. लेकिन कुछ ही सेकंड में उसका शरीर कांपने लगता है. वह संतुलन खो देता है और सीधे फर्श पर गिर जाता है.

    आ गया हार्ट अटैक
    वीडियो में देख सकते हैं कि मोमेंट को रिकॉर्ड कर रहा शख्स तुरंत उसके पास पहुंचता है. लेकिन बताया जा रहा है कि उसकी हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि तुरंत मेडिकल मदद की जरूरत पड़ गई. इस वीडियो को देखकर लोग हैरान रह गए हैं. कई लोगों ने कमेंट कर लिखा कि जिम अब सिर्फ फिटनेस की जगह नहीं रह गई बल्कि जानलेवा साबित हो रही है. विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे हादसों की संख्या इसलिए बढ़ रही है क्योंकि युवा भारी वर्कआउट के तुरंत बाद रील बनाने या फोटो खिंचवाने के लिए सांस रोककर लंबे समय तक मसल्स फ्लेक्स करते हैं. जब व्यक्ति भारी वजन उठाता है तो शरीर में ऑक्सीजन की मांग बढ़ जाती है. वर्कआउट के दौरान दिल तेज धड़कता है और ब्लड प्रेशर बढ़ता है. ऐसे में अगर व्यक्ति सांस रोककर पोज लेने लगे तो शरीर और दिल पर अत्यधिक दबाव पड़ता है. इसे वाल्सल्वा मैन्यूवर कहा जाता है. इसमें सांस रोकने से ब्लड फ्लो प्रभावित होता है और दिल पर अचानक बोझ पड़ जाता है. कई युवा बिना वार्म-अप के या ओवरट्रेनिंग करके भी यही गलती करते हैं. फिटनेस जरूरी है लेकिन दिखावे और सोशल मीडिया के दबाव में शरीर की सीमाओं को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है.

     

     

    बदल रहा है फिटनेस वर्ल्ड


    आजकल इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर लाखों फॉलोअर्स वाले फिटनेस इंफ्लुएंसर अपनी परफेक्ट बॉडी दिखाते हैं. युवा उन्हें देखकर जल्दी रिजल्ट पाने की होड़ में लग जाते हैं. कई लोग सप्लीमेंट्स का अंधाधुंध इस्तेमाल करते हैं. कुछ स्टेरॉयड जैसी चीजों का सहारा लेते हैं जो दिल के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं. डिहाइड्रेशन, कम नींद, अनियमित खानपान और तनाव भी हार्ट अटैक के जोखिम को बढ़ा देते हैं. जिम में एसी की ठंडक में पसीना नहीं आने पर कई लोग पानी कम पीते हैं जिससे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी हो जाती है. डॉक्टरों का कहना है कि 20 से 35 साल की उम्र के युवाओं में हार्ट अटैक के मामले पहले कम होते थे लेकिन अब ये तेजी से बढ़ रहे हैं. एक अध्ययन के अनुसार जिम में होने वाले कई कार्डियक इवेंट्स में ओवरएक्सर्शन और गलत तकनीक मुख्य वजह होती है. जब व्यक्ति भारी वजन उठाकर तुरंत पोज लेता है तो कोरोनरी आर्टरीज पर दबाव बढ़ता है. अगर किसी को पहले से हाई ब्लड प्रेशर, हाई कोलेस्ट्रॉल या फैमिली हिस्ट्री ऑफ हार्ट डिजीज है तो जोखिम और बढ़ जाता है. कई युवा नियमित चेकअप नहीं कराते. वे सोचते हैं कि जिम जाने से वे पूरी तरह स्वस्थ हैं. लेकिन जिम जाना स्वस्थ होने की गारंटी नहीं है.

  • जिसे बेटी की तरह पाला, उसकी मौत पर किया 13वीं का भोज! 600 लोगों को बुलाकर किसान ने रचा अनोखा उदाहरण..

    जिसे बेटी की तरह पाला, उसकी मौत पर किया 13वीं का भोज! 600 लोगों को बुलाकर किसान ने रचा अनोखा उदाहरण..

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    मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज क्षेत्र से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने इंसानियत और बेजुबान जानवरों के प्रति अटूट प्रेम की एक अनूठी और भावुक मिसाल कायम कर दी है. अमूमन शोक सभाएं और तेहरवीं के आयोजन अपनों और परिजनों के जाने पर किए जाते हैं, लेकिन यहां एक किसान ने अपनी 20 साल पुरानी पालतू बकरी के लिए वो सब किया जो अमूमन सगे परिजनों के देहांत पर किया जाता है.

    सिरोंज के भवानी नगर निवासी किसान नवल सिंह मालवीय की पालतू बकरी, जिसे पूरा परिवार और गांव प्यार से ‘कटोरी’ उर्फ ‘चमेली’ कहता था, 3 अगस्त को इस दुनिया को अलविदा कह गई. किसान नवल सिंह मालवीय के लिए ‘कटोरी’ महज एक मवेशी या जानवर नहीं थी, बल्कि परिवार की एक सदस्य और औलाद जैसी थी. कटोरी बीते 20 सालों से नवल सिंह के घर का अहम हिस्सा बनी हुई थी.

    घर की रानी: वह आम मवेशियों की तरह खूंटे से नहीं बांधी जाती थी, बल्कि बाकायदा घर के अंदर पलंग पर सोती थी और पूरे परिवार के सुख-दुख की साझीदार थी. जब 3 अगस्त को उसकी सांसे थमीं, तो पूरा मालवीय परिवार गमगीन हो गया और घर में चूल्हा तक नहीं जला.

    प्रशासन से अनुमति लेकर अंतिम संस्कार, पवित्र गंगा में अस्थि विसर्जन

    नवल सिंह ने अपनी ‘कटोरी’ को अंतिम विदाई देने में कोई कमी नहीं छोड़ी. स्थानीय प्रशासन से बाकायदा अनुमति लेकर कटोरी का पूरे हिंदू रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार किया गया. अंतिम संस्कार के बाद नवल सिंह खुद कटोरी की अस्थियां संचित कर पवित्र गंगा नदी पहुंचे और पूरे विधि-विधान के साथ अस्थि विसर्जन का कर्मकांड पूरा किया. रिश्तेदारों, परिचितों और ग्रामीणों को तेहरवीं में आमंत्रित करने के लिए बाकायदा शोक संदेश के कार्ड छपवाकर बांटे गए.

    तेहरवीं पर 600 लोगों का महाभोज, उमड़ा पूरा गांव

    13 दिनों के शोक के बाद 15 अगस्त को गंगाजली खोलने के साथ तेहरवीं का आयोजन किया गया. नवल सिंह ने अपनी प्यारी कटोरी की आत्मशांति और याद में एक विशाल भोज का आयोजन किया. इस तेहरवीं में रिश्तेदार, दोस्त और गांव के लगभग 600 लोग शामिल हुए. कार्यक्रम में पहुंचे हर एक व्यक्ति की आंखें इस दृश्य को देखकर नम हो गईं और सबने एक बेजुबान के प्रति नवल सिंह के इस असीम समर्पण और प्यार की जमकर तारीफ की.

    संवेदना की मिसाल बना नवल का यह कदम

    आज के आधुनिक दौर में जहां इंसान के पास इंसानों के लिए समय और संवेदनाएं कम पड़ती जा रही हैं, वहीं नवल सिंह मालवीय का यह कदम समाज के लिए एक आईना है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि नवल सिंह का यह प्रयास दिखाता है कि जब प्यार सच्चा हो, तो बेजुबान और इंसान का रिश्ता रूहानी बन जाता है.

  • इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद..

    इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद..

    बालाघाट. प्रकृति में कई ऐसे सवाल है, जिसका जवाब मिलना मुश्किल ही हो जाता है. ऐसे में हम उसे चमत्कार कहते हैं. एक ऐसा ही चमत्कार बालाघाट जिले के गढ़दा गांव की पहाड़ी पर देखने को मिलता है, जहां पर करीब चार किलोमीटर की चढ़ाई करने के बाद मां अन्नपूर्णा का धाम आता है. वहीं पर मां अन्नपूर्णा चट्टानों के बीज विराजित है. उसी विशाल चट्टान पर एक पेड़ है, जो काफी बड़ा है. ऐसे में उस पेड़ को देख लोग हैरान हो जाते हैं. वहीं, उस पेड़ की प्रजाति का है इसकी जानकारी बहुत नहीं थी. अब इस पेड़ को लेकर कई दावे किए जाते हैं.

    अब से कुछ साल पहले तक इस पेड़ की पहचान नहीं हो सकी थी. लेकिन काशी से कुछ लोग आए थे. ऐसे में उन्होंने बताया कि यह पेड़ की पहचान कल्पवृक्ष के रूप में किए थे. हालांकि, मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. यह वृक्ष भी काफी विशाल है.

    दुर्लभ प्रजाति का है ये पेड़
    बालाघाट जिला एक वना आधारित जिला है. यहां पर कई प्रकार और कई प्रजाति की वनस्पति है. ऐसे में ज्यादातर पेड़ों या वृक्षों की पहचान हो चुकी है. लेकिन कई ऐसे पेड़ है, जिसे स्थानीय लोग भी नहीं पहचान पाते हैं. ऐसे में इसे दुर्लभ माना जाता है. यह वृक्ष इतना विशाल है कि इसका अंदाजा लगाना कठिन है कि वह कितना बड़ा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस वृक्ष का क्षेत्रफल करीब 100 वर्ग फीट से भी ज्यादा है.

    जड़ नहीं दिखती पत्तियों में स्वाद नहीं
    मां अन्नापूर्णा धाम के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ को देख हैरानी होती है. दरअसल, यह विशाल वृक्ष सिर्फ चट्टान तक ही दिखता है. इसकी जड़ें भूमि में मिलती हुई प्रतीत नहीं होती है. ऐसे में यह एक रहस्य है, जहां कि दुर्लभ प्रजाति के पेड़ को पोषण कैसे मिलता है. जहां एक ओर जंगल के सारे पेड़ हमेशा से गर्मी में सुख जाते हैं. लेकिन यह वृक्ष साल भर हरा भरा रहता है. ऐसे में इस बात से भी लोग हैरान हो जाते हैं.

    इच्छा पूरी करने वाला है पेड़!
    मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह वृक्ष मनोकामनाएं पूरी करने वाला है. मां अन्नपूर्णा के गढ़दा धाम में प्रकट दिवस, नवरात्रि (शारदेय और चैत्र) में भक्तों की भारी भीड़ रहती है. ऐसे में आने वाले भक्त हमेशा अपनी मन्नत पूरी करने के लिए इस पेड़ मन्नत बांधते हैं. वहीं, मन्नत पूरी होने पर वह चुनरी भी छोड़ देते हैं. ऐसे में यहां नौकरी लगने से लेकर संतान प्राप्ति का कामना लेकर कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं और इस इच्छा पूरी करने वाले कल्प वृक्ष की अर्चना भी करते हैं.

    सेहत के लिए भी है फायदेमंद
    गढ़दा मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सहदेव अड़मे बताते हैं कि इसकी पत्तियों की सेवन से गैस की समस्या से राहत मिलती है. वहीं, मंदिर के पुजारी ने दावा किया कि इस वृक्ष की पत्तियों का चूर्ण बनाकर शहद के साथ सेवन करने से लकवा जैसी गंभीर बीमारी से राहत मिलती है. वहीं, इसकी पत्तियों के सेवन से ब्लड पेशर, गैस और पेट की बीमारियों से राहत मिल सकती है. लेकिन, लोकल 18 इन दावों की पुष्टि नहीं करता है.

    हालांकि, यह वृक्ष काफी विशाल है और दुर्लभ प्रजाति का जरूर है. ऐसे में चट्टान के ऊपर होना और जड़ का नजर न आना प्रकृति प्रेमियों में रोमांच उत्पन्न करता है.

  • परिवार से बगावत कर दो लड़कियों ने रचाई शादी, बिहार में मचा बवाल! कोर्ट ने दिया ये आदेश..

    परिवार से बगावत कर दो लड़कियों ने रचाई शादी, बिहार में मचा बवाल! कोर्ट ने दिया ये आदेश..

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    बिहार की राजधानी पटना से प्यार, बगावत और सामाजिक मान्यताओं को तोड़ने वाली एक अनोखी खबर सामने आई है. यहाँ अदालतगंज इलाके की रहने वाली दो स्कूली छात्राओं ने आपस में शादी कर ली. दोनों के बीच प्यार इस कदर गहरा था कि उन्होंने न सिर्फ सामाजिक और पारिवारिक बंदिशों को दरकिनार किया, बल्कि धर्म के बंधनों को भी तोड़ दिया.

    अलग-अलग धर्मों से ताल्लुक रखने वाली ये दोनों लड़कियां पिछले तीन सालों से एक-दूसरे से प्यार करती थीं और अंततः घर से भागकर एक मंदिर में शादी के बंधन में बंध गईं. पुलिस जांच में सामने आया है कि दोनों लड़कियां पड़ोसी हैं और आपस में गहरी सहेलियां थीं. इनमें से एक लड़की 10वीं कक्षा में पढ़ती है, जबकि दूसरी 12वीं की छात्रा है. 10वीं की छात्रा के पिता सीआईडी (CID) में कार्यरत बताए जा रहे हैं.

    छात्राओं ने अपने रिश्ते को हमेशा के लिए शादी का रूप देने का फैसला किया और 7 अगस्त को बिना किसी को बताए घर से निकल गईं. उनके पास उस वक्त सिर्फ 3,500 रुपये थे. पटना से निकलकर दोनों सीधे खगड़िया पहुंचीं, जहाँ उन्होंने एक स्थानीय मंदिर में शादी की और उसके बाद एक होटल में ठहरीं.

    परिजनों ने दर्ज कराई गुमशुदगी, पुलिस ने खगड़िया से किया बरामद

    दोनों लड़कियों के एक साथ अचानक गायब होने से परिजनों में हड़कंप मच गया. 7 अगस्त को परिजनों ने पटना के कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोतवाली थाने की महिला पुलिस पदाधिकारी पूनम कुमारी के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन किया गया. पुलिस ने सर्विलांस की मदद से दोनों को खगड़िया स्टेशन के पास से सकुशल बरामद कर लिया और पटना ले आई.

    “साथ रहेंगे, अलग नहीं होंगे…” थाने में अड़ गईं दोनों

    पटना महिला थाने और कोतवाली थाने लाने के बाद भी दोनों लड़कियों का रुख नहीं बदला. दोनों ने पुलिस और परिजनों के सामने साफ कह दिया कि वे एक-दूसरे से बेहद प्यार करती हैं और अब कभी अलग नहीं होंगी. दोनों में से कोई भी अपने-अपने परिजनों के साथ घर जाने को तैयार नहीं हुई.

    नाबालिग रिमांड होम भेजी गई, बालिग को मिली आजादी

    कोतवाली थाना प्रभारी अजय कुमार ने बताया कि जांच में एक लड़की के बालिग (18 वर्ष या उससे अधिक) और दूसरी के नाबालिग होने की पुष्टि हुई है. पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया. अदालत के आदेश पर नाबालिग लड़की को सुरक्षा और देखरेख के लिए रिमांड होम (बाल गृह) भेज दिया गया है. कोर्ट ने बालिग लड़की को अपनी मर्जी से कहीं भी रहने और जाने की पूरी आजादी दी है.

  • बुजुर्गों की मदद के लिए साल में 200 से ज्यादा यात्राएं! इस शख्स की कहानी जीत लेगी आपका दिल

    बुजुर्गों की मदद के लिए साल में 200 से ज्यादा यात्राएं! इस शख्स की कहानी जीत लेगी आपका दिल

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    Viral Post : चीन के हुबेई प्रांत में रहने वाले 39 वर्षीय टियान रुई इन दिनों अपनी अनोखी पहल की वजह से सोशल मीडिया पर लोगों का दिल जीत रहे हैं. कभी कूरियर डिलीवरी का काम करने वाले टियान अब उन बुजुर्गों के लिए परिवार की तरह बन चुके हैं, जिनके बच्चे नौकरी या बेहतर भविष्य की तलाश में उनसे हजारों किलोमीटर दूर रहते हैं.

    टियान पहाड़ी इलाकों में रहने वाले बुजुर्गों से मिलने के लिए साल में 200 से ज्यादा बार सफर करते हैं. वह उनके लिए दवाइयां, राशन और जरूरत का सामान लेकर जाते हैं. लेकिन टियान का काम केवल सामान पहुंचाने तक सीमित नहीं है. कई बुजुर्गों के लिए उनकी सबसे बड़ी जरूरत किसी अपने से बातचीत करना और कुछ पल साथ बिताना है.

    बुजुर्गों को सामान से ज्यादा चाहिए साथ

    टियान बताते हैं कि पहाड़ों में रहने वाले बुजुर्गों से मिलने पर उन्हें अक्सर एक ही बात महसूस होती है. उन्हें सिर्फ दवा या खाने-पीने का सामान नहीं चाहिए, बल्कि किसी ऐसे इंसान की जरूरत है जो बैठकर उनकी बातें सुने. एक करीब 80 वर्षीय महिला तो हर मुलाकात के बाद टियान से पूछती हैं कि वह अगली बार कब आएंगे. उनके लिए टियान की यात्रा सिर्फ एक डिलीवरी नहीं, बल्कि अपनों के आने जैसा इंतजार बन चुकी है.

    इसी तरह बोलीविया में करीब 17 हजार किलोमीटर दूर रहने वाला एक बेटा भी अपने माता-पिता तक दवाइयां और दूसरी जरूरी चीजें पहुंचाने के लिए टियान की मदद लेता है.

    टियान जब भी पहाड़ों में जाते हैं, वहां रहने वाले बुजुर्गों से मुलाकात के छोटे-छोटे वीडियो रिकॉर्ड करते हैं. बाद में उन्हें एडिट करके विदेश या दूसरे शहरों में रहने वाले परिवार के सदस्यों तक पहुंचाते हैं.

    उनके बनाए वीडियो कभी-कभी परिवार के लिए बेहद भावुक याद बन जाते हैं. टियान ने एक 70 वर्षीय बुजुर्ग का वीडियो रिकॉर्ड किया था, जिनकी करीब चार महीने बाद मौत हो गई. बाद में वही वीडियो उनके परिवार के लिए पिता की आखिरी यादों में से एक बन गया.

    बिना मुनाफे के निभा रहे हैं जिम्मेदारी

    चीन में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की संख्या बड़ी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2020 तक करीब 11.8 करोड़ बुजुर्ग अकेले रह रहे थे, जिन्हें वहां ‘एम्प्टी नेस्ट’ बुजुर्ग कहा जाता है. टियान इस काम से कोई मुनाफा नहीं कमाते. वह मुख्य रूप से पेट्रोल का खर्च लेते हैं और बाकी काम अपनी इच्छा से करते हैं. उनके लिए यह सिर्फ सामान पहुंचाने का काम नहीं, बल्कि उन परिवारों के बीच दूरी कम करने की कोशिश है, जहां बच्चे दूर हैं और माता-पिता पहाड़ों में अकेले हैं.

  • दफन10 हजार साल से शांत था ज्वालामुखी, अचानक मचा ऐसा तांडव कि पूरा इलाका राख में दब गया

    दफन10 हजार साल से शांत था ज्वालामुखी, अचानक मचा ऐसा तांडव कि पूरा इलाका राख में दब गया

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    प्रकृति जब अपने रौद्र रूप में आती है, तो इंसानी सभ्यता और बड़े से बड़े शहर पल भर में तिनके की तरह बिखर जाते हैं. ऐसा ही एक खौफनाक नजारा 2 मई 2008 की सुबह दक्षिण अमेरिकी देश चिली में देखने को मिला. चिली के चैतेन (Chaiten) शहर से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ज्वालामुखी लगभग 10,000 सालों की गहरी नींद के बाद अचानक भड़क उठा. इस भयंकर विस्फोट से आसमान में 17 किलोमीटर ऊपर तक राख का विशाल गुबार उठने लगा, जिसने देखते ही देखते पूरे शहर को अपनी गिरफ्त में ले लिया. उस समय शहर में करीब 4,000 लोग रहते थे, जिन्हें आनन-फानन में सुरक्षित बाहर निकाला गया. ज्वालामुखी का यह तांडव अगले कई दिनों तक जारी रहा और राख का गुबार 30 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गया. राख की यह मोटी परत चिली, अर्जेंटीना से होती हुई अटलांटिक महासागर तक फैल गई.

    शुरुआत में शहर को सीधा नुकसान नहीं पहुंचा था, लेकिन इसके बाद हुई मूसलाधार बारिश ने तबाही की पूरी पटकथा लिख दी. बारिश का पानी ज्वालामुखी के मुहाने पर जमा राख और कीचड़ को बहाकर चैतेन नदी में ले आया. कीचड़ के जमाव (लाहार) के कारण नदी का जलस्तर भर गया और 12 मई को नदी के तटबंध टूट गए. तटबंध टूटते ही उफनती नदी ने अपना पुराना रास्ता छोड़कर सीधे शहर के बीचों-बीच नया रास्ता बना लिया. कीचड़, राख और पानी का यह सैलाब अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को निगलता चला गया. देखते ही देखते पूरा शहर कीचड़ के मलबे में समा गया, इमारतें ढह गईं, सड़कें धंस गईं और गाड़ियां ताश के पत्तों की तरह बह गईं. राहत की बात यह रही कि पूरे शहर को पहले ही खाली करा लिया गया था, जिसकी वजह से किसी भी व्यक्ति की जान नहीं गई.

    आपदा के सालों बाद भी चैतेन शहर का एक हिस्सा कीचड़ की मोटी परत के नीचे दबा हुआ है. हालांकि, इस तबाही के बाद एक बेहद हैरान करने वाला नजारा देखने को मिला. आपदा में बचे हुए हिस्से में रहने वाले लोगों ने इस बर्बाद और छोड़ दिए गए हिस्से को ही अपनी कमाई का जरिया बना लिया. आज दुनिया भर से पर्यटक इस ‘दफन हुए शहर’ का नजारा देखने आते हैं, जिससे यहां का पर्यटन उद्योग फल-फूल रहा है. सरकार ने शुरुआत में इस शहर को किसी दूसरी जगह बसाने का प्लान बनाया था, लेकिन स्थानीय लोगों ने अपनी जगह छोड़ने से इनकार कर दिया. आज नया चैतेन शहर उत्तर दिशा की ओर बढ़ रहा है, लेकिन खतरा अभी भी टला नहीं है. नया बसाया जा रहा हिस्सा असल में ज्वालामुखी के और ज्यादा करीब है. फरवरी 2009 और साल 2011 में इस ज्वालामुखी में दोबारा छोटे-बड़े विस्फोट हुए थे, जो आज भी हल्के झटकों के साथ लोगों को आने वाले खतरे की चेतावनी दे रहे हैं.

  • बिहार के 4 कलाकार जिन्होंने बॉलीवुड में बनाई खास पहचान..

    बिहार के 4 कलाकार जिन्होंने बॉलीवुड में बनाई खास पहचान..

    बिहार को प्रतिभाओं की धरती कहा जाता है। कला, सिनेमा और मनोरंजन के क्षेत्र में भी बिहार से कई ऐसे कलाकार निकले हैं, जिन्होंने अपनी मेहनत और शानदार अभिनय के दम पर देशभर में पहचान बनाई। इनमें से कुछ कलाकारों ने बॉलीवुड में अपनी अलग छाप छोड़ी है।

    आइए जानते हैं बिहार से जुड़े उन 4 कलाकारों के बारे में, जिन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में खास मुकाम हासिल किया।

    1. प्रकाश झा

    बिहार के चंपारण क्षेत्र से जुड़े प्रकाश झा भारतीय सिनेमा के चर्चित फिल्म निर्देशक, निर्माता और अभिनेता हैं। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर आधारित फिल्मों के लिए उन्हें खास पहचान मिली। गंगाजल, अपहरण, राजनीति, आरक्षण और सत्याग्रह जैसी फिल्मों ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।

    2. सोनाक्षी सिन्हा

    सोनाक्षी सिन्हा का जन्म पटना, बिहार में हुआ था। उन्होंने दबंग से बॉलीवुड में शानदार शुरुआत की और इसके बाद राउडी राठौर, अकीरा, फोर्स 2 और इत्तेफाक जैसी फिल्मों में काम किया। अपने अलग अंदाज और अभिनय के कारण उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में मजबूत पहचान बनाई।

    3. मनोज बाजपेयी

    बिहार के पश्चिम चंपारण जिले से आने वाले मनोज बाजपेयी हिंदी सिनेमा के बेहतरीन अभिनेताओं में गिने जाते हैं। सत्या, गैंग्स ऑफ वासेपुर, अलीगढ़, स्पेशल 26 और सत्याग्रह जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को काफी सराहा गया। वे अपनी दमदार और सहज अदाकारी के लिए जाने जाते हैं।

    4. नेहा शर्मा

    भागलपुर, बिहार में जन्मी नेहा शर्मा ने हिंदी फिल्मों के साथ-साथ अन्य मनोरंजन परियोजनाओं में भी काम किया है। क्रुक, तेरी मेरी कहानी, जयंता भाई की लव स्टोरी और यमला पगला दीवाना 2 जैसी फिल्मों में नजर आ चुकी नेहा शर्मा ने बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई है।

    बिहार की प्रतिभा की अलग पहचान

    बिहार से आने वाले कलाकारों ने हिंदी सिनेमा में अपनी मेहनत, अभिनय और रचनात्मकता के दम पर जगह बनाई है। इन कलाकारों की सफलता यह दिखाती है कि छोटे शहर और साधारण पृष्ठभूमि से आने वाली प्रतिभाएं भी बड़े मंच पर अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।

  • बारिश में अचानक क्यों निकल आते हैं सांप? सावन से जुड़ी इस वजह से 90% लोग हैं अनजान

    बारिश में अचानक क्यों निकल आते हैं सांप? सावन से जुड़ी इस वजह से 90% लोग हैं अनजान

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    सावन का महीना शुरू होते ही खेतों, सड़कों और कई बार घरों के आसपास भी सांप दिखाई देने की घटनाएं बढ़ जाती हैं. सोशल मीडिया पर भी इस मौसम में सांपों के वीडियो और तस्वीरें खूब वायरल होती हैं. ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या सावन में सचमुच सांप ज्यादा निकलते हैं और क्या इसका संबंध नाग पंचमी से है? तो चलिए आपको बताते हैं इसका सही जवाब…

    बारिश के कारण बिलों से बाहर आते हैं सांप
    सांप आमतौर पर जमीन के अंदर बने बिलों, दरारों, झाड़ियों और घास के बीच छिपकर रहते हैं. सावन के दौरान तेज बारिश होने से इनके बिलों में पानी भर जाता है. ऐसे में सांप सुरक्षित जगह की तलाश में बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं. यही वजह है कि इस मौसम में खेतों, सड़कों और रिहायशी इलाकों में इनके दिखने की घटनाएं बढ़ जाती हैं.

    तापमान और नमी बनाते हैं अनुकूल माहौल
    सांप ठंडे खून वाले जीव होते हैं. उनके शरीर का तापमान वातावरण के अनुसार बदलता रहता है. गर्मियों में तेज गर्मी और डिहाइड्रेशन के खतरे की वजह से वे कम सक्रिय रहते हैं. वहीं बरसात के मौसम में तापमान कम और नमी अधिक होने से उनके लिए बाहर निकलना आसान हो जाता है. इसलिए सावन में उनकी गतिविधियां सामान्य दिनों की तुलना में ज्यादा दिखाई देती हैं.

    भोजन की तलाश भी है बड़ी वजह
    मानसून में मेंढक, चूहे और कीड़े-मकोड़े तेजी से बढ़ते हैं. यही जीव सांपों का मुख्य भोजन हैं. जब भोजन आसानी से मिलने लगता है तो सांप भी ज्यादा सक्रिय होकर शिकार की तलाश में बाहर निकलते हैं. इसलिए बारिश के मौसम में उनका दिखना स्वाभाविक माना जाता है.

    प्रजनन काल का भी पड़ता है असर
    जानकारों के मुताबिक कई प्रजातियों के सांपों का प्रजनन काल भी मानसून के दौरान होता है. इस समय वे साथी की तलाश में अधिक दूरी तय करते हैं. इससे भी लोगों को सांप पहले की तुलना में ज्यादा नजर आते हैं.

    नाग पंचमी और धार्मिक मान्यता
    सावन में ही नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है, जो नाग देवता और भगवान शिव को समर्पित है. इस दिन नाग देवता की पूजा करने की परंपरा है. मान्यता है कि इससे सर्पदंश के भय से रक्षा होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है. हालांकि, इसी समय सांप प्राकृतिक कारणों से ज्यादा दिखाई देते हैं, इसलिए लोगों को लगता है कि उनका संबंध सीधे नाग पंचमी से है.