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  • बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, किस उम्र में कितनी एक्सरसाइज है जरूरी?

    फिट रहने के लिए रोज कितनी एक्सरसाइज करनी चाहिए?

    आज के समय में फिट और हेल्दी रहने के लिए लोग वॉकिंग, रनिंग, योग, जिम और दूसरी तरह की एक्सरसाइज करते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हर उम्र के व्यक्ति को कितनी देर तक फिजिकल एक्टिविटी करनी चाहिए? क्या रोज 10 हजार कदम चलना ही पर्याप्त है या इससे ज्यादा भी जरूरी है?

    विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ कदम गिनना ही जरूरी नहीं है, बल्कि पूरे सप्ताह की कुल शारीरिक गतिविधि ज्यादा मायने रखती है। हर उम्र के लोगों के लिए एक्सरसाइज की जरूरत अलग-अलग होती है।

    क्या रोज 10 हजार कदम चलना जरूरी है?

    WHO के अनुसार, 10 हजार कदम चलना कोई अनिवार्य नियम नहीं है। यह एक सामान्य लक्ष्य हो सकता है, लेकिन हर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और जीवनशैली के अनुसार फिजिकल एक्टिविटी की जरूरत अलग होती है। इसलिए केवल स्टेप काउंट पर ध्यान देने के बजाय नियमित रूप से सक्रिय रहना अधिक महत्वपूर्ण है।

    सिर्फ कदम नहीं, एक्टिव लाइफस्टाइल भी जरूरी

    फिट रहने के लिए केवल वॉक करना ही काफी नहीं है। पूरे दिन में की जाने वाली कई गतिविधियां भी फिजिकल एक्टिविटी का हिस्सा होती हैं, जैसे—

    • तेज चलना
    • साइकिल चलाना
    • दौड़ना
    • तैराकी
    • खेलकूद
    • योग
    • घर के काम
    • सीढ़ियां चढ़ना

    जितना अधिक शरीर सक्रिय रहेगा, उतना ही स्वास्थ्य को लाभ मिलेगा।

    5 से 17 साल के बच्चों और किशोरों के लिए

    WHO की गाइडलाइन के अनुसार 5 से 17 वर्ष के बच्चों और किशोरों को हर दिन कम से कम 60 मिनट मध्यम से तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए।

    इसमें शामिल हो सकते हैं—

    • आउटडोर गेम्स
    • दौड़ना
    • साइकिल चलाना
    • तैराकी
    • डांस
    • अन्य खेल गतिविधियां

    सप्ताह में कम से कम 3 दिन ऐसी गतिविधियां भी करनी चाहिए जो हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाएं।

    18 से 64 साल के वयस्कों के लिए

    18 से 64 वर्ष की उम्र के लोगों के लिए WHO की सलाह है कि वे सप्ताहभर में—

    • कम से कम 150 से 300 मिनट मध्यम तीव्रता वाली एक्सरसाइज करें।
    • या 75 से 150 मिनट तेज तीव्रता वाली एक्सरसाइज करें।
    • बेहतर स्वास्थ्य लाभ के लिए सप्ताह में दो या उससे अधिक दिन मांसपेशियों को मजबूत करने वाली एक्सरसाइज भी करें।

    65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए

    65 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों को भी सप्ताह में कम से कम 150 मिनट शारीरिक गतिविधि करने की सलाह दी जाती है।

    इसके अलावा उन्हें ऐसी एक्सरसाइज भी करनी चाहिए जो—

    • संतुलन (Balance) बेहतर बनाए,
    • गिरने के जोखिम को कम करे,
    • मांसपेशियों को मजबूत रखे,
    • शरीर की लचीलापन बनाए रखे।

    लंबे समय तक बैठे रहना भी नुकसानदायक

    WHO का कहना है कि केवल एक्सरसाइज करना ही काफी नहीं है। लंबे समय तक लगातार बैठे रहना भी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए काम के दौरान बीच-बीच में उठकर थोड़ा चलना, स्ट्रेचिंग करना और शरीर को सक्रिय रखना जरूरी है।

    निष्कर्ष

    स्वस्थ रहने के लिए किसी एक तय संख्या में कदम चलना जरूरी नहीं है। असली लक्ष्य नियमित रूप से सक्रिय रहना और उम्र के अनुसार पर्याप्त फिजिकल एक्टिविटी करना है। चाहे बच्चे हों, युवा हों या बुजुर्ग—हर किसी को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार नियमित व्यायाम करना चाहिए। यदि पहले से कोई गंभीर बीमारी या स्वास्थ्य समस्या है, तो नई एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी प्रकार की एक्सरसाइज शुरू करने या अपनी दिनचर्या में बदलाव करने से पहले योग्य चिकित्सक या फिटनेस विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह उठते ही खाली पेट चाय पीते हैं? जानिए सेहत पर पड़ने वाले 6 बड़े असर, आज ही बदलें ये आदत…

    सुबह की शुरुआत चाय से करना पड़ सकता है भारी

    भारत में लाखों लोगों की सुबह की शुरुआत एक कप गर्म चाय से होती है। कई लोगों का मानना है कि बिना चाय के उनकी नींद ही नहीं खुलती। लेकिन अगर आप रोजाना खाली पेट चाय पीते हैं, तो यह आदत धीरे-धीरे आपकी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है। खासतौर पर जिन लोगों को पहले से गैस, एसिडिटी या पाचन संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें इस आदत से बचने की सलाह दी जाती है।

    1. बढ़ सकती है एसिडिटी और पेट में जलन

    खाली पेट चाय पीने से पेट में एसिड का स्तर बढ़ सकता है। इससे सीने में जलन, खट्टी डकारें और एसिडिटी जैसी समस्याएं होने की संभावना रहती है। जिन लोगों को पहले से एसिड रिफ्लक्स की शिकायत है, उनके लिए यह आदत परेशानी बढ़ा सकती है।

    2. पाचन तंत्र पर पड़ सकता है असर

    चाय में मौजूद कैफीन और अन्य प्राकृतिक तत्व कुछ लोगों के पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। इसके कारण पेट में भारीपन, गैस, अपच या असहजता महसूस हो सकती है।

    3. बेचैनी और घबराहट महसूस हो सकती है

    सुबह खाली पेट कैफीन लेने से कुछ लोगों में घबराहट, बेचैनी, हाथ कांपना या दिल की धड़कन तेज होने जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। यह असर व्यक्ति की कैफीन सहन करने की क्षमता पर भी निर्भर करता है।

    4. इन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें

    अगर सुबह चाय पीने के बाद बार-बार पेट दर्द, मितली, उल्टी, जलन या गैस की समस्या होने लगे, तो इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें। ऐसी स्थिति में डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है ताकि सही कारण का पता लगाया जा सके।

    5. दिन की शुरुआत पानी से करना बेहतर

    विशेषज्ञों के अनुसार, सुबह उठने के बाद शरीर को सबसे पहले पानी की जरूरत होती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से शरीर हाइड्रेट होता है और पाचन तंत्र भी बेहतर तरीके से काम करता है। इसके बाद हल्का नाश्ता करके चाय पीना अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माना जाता है।

    6. किन लोगों को खास सावधानी बरतनी चाहिए?

    • जिन लोगों को एसिडिटी या गैस की समस्या रहती है।
    • जिन्हें पेट का अल्सर या एसिड रिफ्लक्स है।
    • जिन्हें कैफीन से घबराहट या धड़कन बढ़ने की शिकायत होती है।
    • गर्भवती महिलाओं और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही चाय का सेवन करना चाहिए।

    निष्कर्ष

    सुबह खाली पेट चाय पीना हर व्यक्ति के लिए नुकसानदायक हो, ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन अगर इससे आपको पेट में जलन, गैस, बेचैनी या अन्य समस्याएं होती हैं, तो इस आदत में बदलाव करना बेहतर रहेगा। दिन की शुरुआत पहले पानी और फिर पौष्टिक नाश्ते से करें। यदि कोई परेशानी लगातार बनी रहती है, तो चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।

    अस्वीकरण: यह लेख सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। यह किसी भी प्रकार की चिकित्सीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य संबंधी समस्या या आहार में बदलाव से पहले योग्य डॉक्टर या स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

  • बरसात में ही क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क? शुरुआती लक्षण को ना करें नजरअंदाज..?

    बरसात में ही क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क? शुरुआती लक्षण को ना करें नजरअंदाज..?

    बरसात में ही क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क? शुरुआती लक्षण को ना करें नजरअंदाज..?

    बारिश के मौसम में सर्दी-जुकाम, खांसी और फेफड़ों से जुड़ी समस्या का रिस्क काफी बढ़ जाता है. इस मौसम में सबसे ज्यादा असर बच्चे, कमजोर इम्यूनिटी और बुजुर्गों पर पड़ता है. दरअसल बरसात के मौसम में तापमान में उतार-चढ़ाव, नमी और घरों में सीलन की वजह से इंफेक्शन का रिस्क बढ़ जाता है.

    SWORD स्टडी के अनुसार मानसून के दौरान रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इंफेक्शन के मामले लगभग 13 प्रतिशत तक बढ़ जाती है. इंडियन जर्नल ऑफ चेस्ट डिजीज एंड अलाइड साइंस 2014 में पब्लिश स्टडी के अनुसार बरसात के दिनों में गीले रहने की वजह से निमोनिया का रिस्क बढ़ सकता है.

    क्या है निमोनिया?

    निमोनिया फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारी है. निमोनिया होने पर फेफड़ों में सूजन और पानी भरने की समस्या हो सकती है. निमोनिया होने पर सांस लेने में दिक्कत आती है. क्योंकि शरीर में ऑक्सीजन सही पहुंच नहीं पाता है. लंबे समय तक सर्दी, खांसी, फ्लू की समस्या निमोनिया में बदल सकता है.

    बरसात के मौसम में क्यों बढ़ जाता है निमोनिया का रिस्क

    बारिश के दिनों में नमी की वजह से वायरस और बैक्टीरिया तेजी से पनपते हैं. बरसात के मौसम में घर में सीलन और गंदगी भी बढ़ जाती है. बारिश में बार-बार गीले होने की वजह से भी निमोनिया का रिस्क बढ़ जाता है.

    इन लोगों में निमोनिया होने का रिस्क अधिक

    कुछ लोगों में निमोनिया का रिस्क अन्य लोगों की तुलना में अधिक होता है. 
    अस्थमा मरीज में निमोनिया का रिस्क सबसे अधिक है
    डायबिटीज मरीज में भी निमोनिया का जोखिम अन्य लोगों से अधिक है. 
    हार्ट पेशेंट में भी निमोनिया होने का रिस्क होता है 
    5 साल के छोटे बच्चे और 60 साल से अधिक उम्र के लोगों में भी निमोनिया का रिस्क अधिक होता है.

    निमोनिया के शुरुआती लक्षण

    निमोनिया होने पर सर्दी-खांसी जैसे नॉर्मल लक्षण नजर आते हैं.
    निमोनिया होने पर तेज बुखार आता है. 
    लगातारी खांसी आना भी निमोनिया का लक्षण हो सकता है. 
    बलगम आना भी निमोनिया का संकेत हो सकता है. 
    सांस फूलने की समस्या भी निमोनिया का लक्षण हो सकता है. 
    सीने में दर्द होना निमोनिया का संकेत हो सकता है. 
    थकान, कमजोरी और ठंड लगने की समस्या भी निमोनिया का लक्षण हो सकता है.

    सर्दी खांसी और निमोनिया में फर्क

    सर्दी-खांसी में हल्का बुखार होता है वहीं निमोनिया में तेज बुखार, सांस लेने में दिक्कत, सीने में दर्द और कमजोरी होती है. कई दिनों तक सांस फूलने की समस्या निमोनिया का लक्षण हो सकता है.

    बच्चों में निमोनिया के लक्षण

    बच्चों में निमोनिया के लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बच्चें अक्सर अपनी समस्या को सही से बता नहीं पाते हैं ऐसे में आप उनके इन लक्षणों को नजरअंदाज ना करें. 
    बहुत तेज सांस चलना 
    बच्चे का सुस्त पड़ जाना 
    पसलियों का अंदर धंसना 
    होंठ का नीला पड़ना 
    खाना ना खाना 
    लगातार तेज बुखार 
    बार-बार उल्टी होना 
    हिहाइड्रेशन होना

  • पार्टनर को खोने का रहता है डर? कहीं आप रिलेशनशिप एंग्जायटी का शिकार तो नहीं…

    पार्टनर को खोने का रहता है डर? कहीं आप रिलेशनशिप एंग्जायटी का शिकार तो नहीं…

    पार्टनर को खोने का रहता है डर? कहीं आप रिलेशनशिप एंग्जायटी का शिकार तो नहीं…

    रिलेशनशिप में कई बार लोगों के मन में ख्याल आता है उसने मेरा मैसेज देख लिया, लेकिन रिप्लाई नहीं किया, कहीं वो मुझसे बोर हो गया है? कल रात उसने की बात में प्यार का लहजा नहीं था. कहीं उसका चक्कर तो नहीं चला रहा? वो मुझे छोड़ तो नहीं देगा. कुछ लोगों का रिश्ता बहुत अच्छा होता है लेकिन किसी एक मन में ख्याल रहता है कि कहीं रिश्ता खत्म ना हो जाए. इस कंडीशन को रिलेशनशिप एंग्यायटी कहते हैं.

    ओवरथिंकिंग

    ओवरथिंकिंग की वजह से रिश्ते पर ज्यादा असर पड़ता है. दरअसल ओवरथिंकिंग की वजह से पार्टनर के हर छोटे एक्शन और बात का काफी गहरा मतलब निकाल लेते हैं. जैसे गुड नाइट के साथ हार्ट इमोजी नहीं भेजा, मेरे प्यार भरे मैसेज में हार्ट का इमोजी क्यों नहीं भेजा. इसका मतलब है कि कुछ गड़बड़ है.

    बार-बार पूछना

    अपने पार्टनर से बार-बार सवाल करना या पूछना कि तुम मुझसे प्यार करते हो या नहीं? तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे? बार पर इस तरह के सवाल आने की वजह से भी रिश्ता कमजोर होने लगता है.

    पार्टनर के मूड से खुद का मूड तय करना

    अगर आपके पार्टनर का दिन खराब रहा है वो शांत है तो आप अगर मान लेते है को वह अपने नाराज है. फिर आप अपना मूड भी खराब कर लेते हैं. इससे आपका रिश्ता मजबूत नहीं बल्कि और ज्यादा खराब हो जाएगा.

    लड़ाई-झगड़े से डरना

    रिश्ते में छोटी-मोटी बहस होना बेहद आम है. लेकिन रिलेशनशिप एंग्जायटी से परेशान लोग छोटी सी बहसको ब्रेकअप मान लेते हैं. उनको लगता है कि ये छोटी सी लड़ाई ब्रेकअप बन सकती है.

    रिलेशनशिप एंग्जायटी के नुकसान

    रिलेशनशिप एंग्जायटी ना केवल आपने मेंटल हेल्थ बल्कि पार्टनर के मेंटल हेल्थ के लिए भी खराब है. इससे आपका पार्टनर भी मानसिक रूप से थक जाता है. जिससे रिश्ते की नींव कमजोर होने लगती है.

    रिलेशनशिप एंग्जायटी से छुटकारा कैसे मिलेगा

    आपके मन में जो भी चल रहा है, जो भी अजीब सा डर है उसे लकर पार्टनर के साथ खुलकर बात करनी चाहिए. ताकि पार्टनर को आपके बारे में पता चल पाए. 
    खुद को बिजी रखना चाहिए. जिम जाना चाहिए, दोस्तों से मिलना-जुलना चाहिए.

  • मार्केट में मिलने वाली केमिकल मेहंदी नहीं है पसंद, घर पर बनाएं..

    मार्केट में मिलने वाली केमिकल मेहंदी नहीं है पसंद, घर पर बनाएं..

    मार्केट में मिलने वाली केमिकल मेहंदी नहीं है पसंद, घर पर बनाएं..

    आज के समय में मार्केट में मिलने वाली मेहंदी का रंग बहुत ही आसानी से चढ़ जाता है. मेहंदी में केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है. केमिकल वाली मेहंदी लगाने से 2 दिन बाद मेहंदी पपड़ी की तरह हाथ से उतरने लगती है. जिसकी वजह से हाथ रफ हो जाते हैं. इस तरह उतरती हुई मेहंदी बेहद खराब लगती है. ऐसे में आप घर पर मेहंदी बना सकते हैं.

    घर पर बनी मेहंदी का रंग नहीं चढ़ता है लेकिन इन चीजों को मिलाने से मेहंदी का रंग गहरा आएगा. होममेड मेहंदी को लगाने से हाथ पर चढ़ा रंग कई दिनों पर हल्का होता है. आइए जानते हैं घर पर कैसे बनाएं मेहंदी.

    घर पर बनाएं मेहंदी कोन

    तीन छोटे चम्मच चीनी
    तीनी छोटे चम्मच चाय की पत्ती 
    2 छोटे चम्मच कॉफी 
    लौंग 
    मेहंदी का पाउडर 
    पानी

    इस तरह बनाएं मेहंदी

    एक बर्तन लें, इसमें पानी डालकर पानी को गर्म कर लें. इसके बाद इसमें चीनी, चाय की पत्ती, लौंग और कॉफी डाल दें.

    अब इस पानी को अच्छे से उबाल लें, जैसे ही पानी डार्क ब्राउन हो जाए तो गैस बंद कर दें.

    अब इस पानी को मेहंदी पाउडर में मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें. मेहंदी का घोल ना ज्यादा पतला और ना ही ज्यादा गाढ़ा होना चाहिए.

    अब तैयार करें मेहंदी का कोन

    मेहंदी का पेस्ट बनकर तैयार है. इसके बाद मेहंदी को कुछ घंटों के लिए ढककर रख दें. इसके बाद प्लास्टिक की शीट लें. इस को कोन की शेप दें. इस कोन में मेहंदी भर दें. लीजिए आपकी होममेड मेहंदी कोन बनकर तैयार है.

    होममेड मेहंदी लगाने के फायदे

    चाय की पत्ती और लौंग का पानी मिलाने से मेहंदी का रंग गाढ़ा आता है. कॉफी मिलाने से भी मेहंदी का रंग हाथों पर बेहद खूबसूरत आता है.

    चीनी मिलाने से मेहंदी लगाने के बाद जल्दी सूखकर हटती नहीं है.

    होममेड मेहंदी लगाने के बाद इसे जल्दी नहीं धोना चाहिए.

    मेहंदी सूखने के बाद हल्के हाथों से मेहंदी हटाना चाहिए

    पानी में तुरंत हाथ नहीं धोना चाहिए

    मेहंदी हटाने के बाद हाथों पर तेल लगा सकते हैं.

  • किडनी डायलिसिस को लेकर डर खत्म! क्या एक बार शुरू होने पर यह कभी बंद नहीं होती?

    किडनी डायलिसिस को लेकर डर खत्म! क्या एक बार शुरू होने पर यह कभी बंद नहीं होती?

    किडनी डायलिसिस को लेकर डर खत्म! क्या एक बार शुरू होने पर यह कभी बंद नहीं होती?

    किडनी डायलिसिस को लेकर लोगों में एक आम डर बैठा है कि एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो गई तो जिंदगीभर चलती रहेगी। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? शरीर के खून को साफ करने और टॉक्सिन्स बाहर निकालने का काम किडनी ही करती है। गलत खान-पान, लाइफस्टाइल और बीमारियों से किडनी खराब होने लगती है। शुरू में हल्की लगने वाली यह समस्या एंड स्टेज तक पहुंच जाती है, जहां डायलिसिस जरूरी हो जाता है। सवाल वही है- क्या इससे वापसी संभव है?​​

    डायलिसिस की अवधि

    सफदरजंग अस्पताल के नेफ्रोलॉजी विभाग प्रमुख डॉ. हिमांशु वर्मा से हुई विशेष बातचीत में यह साफ हो गया कि डायलिसिस की अवधि मरीज की स्थिति पर निर्भर करती है। “कुछ मामलों में यह थोड़े समय के लिए होती है, तो कई में लाइफलॉन्ग या ट्रांसप्लांट तक चलती है,” डॉ. वर्मा ने कहा। एक्यूट किडनी इंजरी (AKI) में, जैसे डेंगू, मलेरिया या डिहाइड्रेशन से अचानक किडनी फेल हो जाए, तो डायलिसिस अस्थायी होती है। किडनी रिकवर होते ही, यानी 10-15% फंक्शन लौटते ही, इसे बंद किया जा सकता है। 10-15% मामलों में पूर्ण रिकवरी हो जाती है।​

    डायलिसिस के प्रकार और प्रक्रिया

    डायलिसिस दो मुख्य प्रकार की होती है- हीमोडायलिसिस और पेरिटोनियल डायलिसिस। हीमोडायलिसिस में मशीन ब्लड को फिल्टर करती है। हफ्ते में 3 बार, 3-4 घंटे का सेशन अस्पताल में होता है। पेरिटोनियल में पेट की झिल्ली फिल्टर का काम करती है, घर पर ही किया जा सकता है।

    क्रॉनिक किडनी डिजीज (CKD) में, जो डायबिटीज, हाई BP या सालों की नेग्लिजेंस से होती है, किडनी परमानेंट डैमेज हो जाती है। यहां डायलिसिस सपोर्ट सिस्टम बन जाता है, जो जिंदगी 5-25 साल बढ़ा सकता है। बंद करने का रास्ता सिर्फ किडनी ट्रांसप्लांट है।

    एक्सपर्ट्स की राय

    डॉ. जितेंद्र कुमार जैसे एक्सपर्ट्स स्पष्ट कहते हैं कि डायलिसिस न किडनी ठीक करती है, न खराब। यह सिर्फ किडनी का आर्टिफिशियल काम करती है। एक्यूट केस में हफ्तों बाद बंद हो जाती है, लेकिन CKD स्टेज-5 में लाइफलॉन्ग।​​

    किडनी खराब होने के कारण और बचाव

    किडनी डैमेज के प्रमुख कारण- ज्यादा नमक, स्मोकिंग, शराब, कम पानी पीना। डॉ. हिमांशु ने सलाह दी, “डाइट में नमक कम करें, रोज व्यायाम करें, 3-4 लीटर पानी पिएं।” प्रिवेंशन ही बेस्ट ट्रीटमेंट है।​

    शुरुआती लक्षण नजरअंदाज न करें

    • पैरों में सूजन।
    • बार-बार पेशाब या रंग बदलना।
    • स्किन में खुजली।
    • थकान, उल्टी।​

    लोगों में मिथक है कि डायलिसिस ‘डरावनी’ है, लेकिन सही समय पर इलाज से लाखों जिंदगियां बच रही हैं। नेफ्रोलॉजिस्ट से नियमित चेकअप करवाएं। किडनी हेल्थ के लिए जागरूकता जरूरी है।

  • रोज की ये गलतियां आपका Cholesterol Level बढ़ा देती है..?

    रोज की ये गलतियां आपका Cholesterol Level बढ़ा देती है..?

    रोज की ये गलतियां आपका Cholesterol Level बढ़ा देती है..?

    नारी डेस्क: आजकल हाई कोलेस्ट्रॉल की समस्या तेजी से बढ़ रही है। पहले इसे बढ़ती उम्र से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब कम उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि हाई कोलेस्ट्रॉल अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ता रहता है, इसलिए इसे ‘साइलेंट किलर’ भी कहा जाता है। अगर समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह हार्ट अटैक, स्ट्रोक और दिल से जुड़ी अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, हाई कोलेस्ट्रॉल किसी एक दिन में नहीं बढ़ता, बल्कि हमारी रोजमर्रा की कुछ गलत आदतें धीरे-धीरे इसकी वजह बनती हैं।

    हाई कोलेस्ट्रॉल क्यों बढ़ता है

    खराब खानपान और असंतुलित जीवनशैली हाई कोलेस्ट्रॉल के सबसे बड़े कारणों में शामिल हैं। अगर लंबे समय तक शरीर को जरूरत से ज्यादा अनहेल्दी फैट और कम शारीरिक गतिविधि मिलती है, तो शरीर में एलडीएल (LDL) यानी खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ने लगता है।

    तला-भुना और जंक फूड बढ़ा सकता है खतरा

    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में फास्ट फूड और प्रोसेस्ड फूड का सेवन काफी बढ़ गया है। तला-भुना खाना, पिज्जा, बर्गर, पैकेज्ड स्नैक्स, मैदे से बनी चीजें, ट्रांस फैट वाले खाद्य पदार्थ और ज्यादा मीठे पेय पदार्थ शरीर में खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाने का काम कर सकते हैं। इन चीजों का नियमित सेवन करने से शरीर में फैट जमा होने लगता है, जिससे हृदय रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है।

    शारीरिक गतिविधि की कमी भी है बड़ी वजह

    अगर आप पूरे दिन एक ही जगह बैठकर काम करते हैं और नियमित व्यायाम नहीं करते, तो यह भी हाई कोलेस्ट्रॉल का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रोजाना कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को बढ़ाने और खराब कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखने में मदद करती है।

    ये भी पढ़ें: शैंपू से भी नहीं रुक रहा हेयर फॉल? डाइट में शामिल करें ये 5 फूड्स

    बढ़ता वजन और गलत लाइफस्टाइल

    मोटापा भी हाई कोलेस्ट्रॉल का एक प्रमुख कारण है। इसके अलावा धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन, देर रात तक जागना और पर्याप्त नींद न लेना भी शरीर के मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करता है, जिससे कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। इसलिए केवल खानपान ही नहीं, बल्कि पूरी जीवनशैली को संतुलित रखना जरूरी है।

    कुछ बीमारियां भी बढ़ा सकती हैं कोलेस्ट्रॉल

    हर बार हाई कोलेस्ट्रॉल की वजह सिर्फ खानपान नहीं होती। कुछ स्वास्थ्य समस्याएं भी इसके पीछे जिम्मेदार हो सकती हैं। डायबिटीज, थायरॉयड की बीमारी, किडनी से जुड़ी समस्याएं और आनुवंशिक (जेनेटिक) कारणों की वजह से भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है। जिन लोगों के परिवार में पहले से हाई कोलेस्ट्रॉल या हृदय रोग का इतिहास है, उन्हें विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

    शुरुआती लक्षण अक्सर नहीं दिखते

    हाई कोलेस्ट्रॉल की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआत में इसके कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोगों को तब तक इसकी जानकारी नहीं होती, जब तक किसी नियमित जांच में इसका पता नहीं चलता या फिर इससे जुड़ी कोई गंभीर समस्या सामने नहीं आ जाती। इसी वजह से 30 वर्ष की उम्र के बाद या जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर लिपिड प्रोफाइल जैसी जांच कराने की सलाह दी जाती है।

    कोलेस्ट्रॉल को कैसे रखें नियंत्रण में

    हाई कोलेस्ट्रॉल से बचाव के लिए सबसे पहले अपने खानपान में सुधार करना जरूरी है। ताजे फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ और हेल्दी फैट को अपनी डाइट में शामिल करें। इसके साथ ही रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें, वजन नियंत्रित रखें, धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं तथा पर्याप्त नींद लें। अगर डॉक्टर ने दवाएं लिखी हैं, तो उन्हें नियमित रूप से लेना भी जरूरी है।

    नियमित जांच है सबसे जरूरी

    क्योंकि हाई कोलेस्ट्रॉल अक्सर बिना किसी संकेत के बढ़ता है, इसलिए केवल लक्षणों का इंतजार करना सही नहीं है। समय-समय पर स्वास्थ्य जांच, संतुलित जीवनशैली और डॉक्टर की सलाह का पालन करके इसे काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है। सही समय पर उठाया गया छोटा-सा कदम भविष्य में दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकता है।

  • क्या कलाई के एक बिंदु को दबाने से जल्दी नींद आ सकती है? जानें एक्यूप्रेशर, सही दिनचर्या और जरूरी सावधानियां

    क्या कलाई के एक बिंदु को दबाने से जल्दी नींद आ सकती है? जानें एक्यूप्रेशर, सही दिनचर्या और जरूरी सावधानियां

    क्या कलाई के एक बिंदु को दबाने से जल्दी नींद आ सकती है? जानें एक्यूप्रेशर, सही दिनचर्या और जरूरी सावधानियां

    आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अनिद्रा (Insomnia) एक आम समस्या बन चुकी है। कई लोग रातभर करवटें बदलते रहते हैं, जिससे अगले दिन थकान, चिड़चिड़ापन और काम में ध्यान न लगने जैसी परेशानियां होने लगती हैं।

    कुछ लोग बेहतर नींद के लिए एक्यूप्रेशर का सहारा लेते हैं। माना जाता है कि कलाई के अंदरूनी हिस्से पर मौजूद एक विशेष बिंदु पर हल्का दबाव देने से शरीर को आराम महसूस हो सकता है और तनाव कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस तरीके की प्रभावशीलता को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण सीमित हैं, इसलिए इसे इलाज का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

    अनिद्रा क्या है?

    जब व्यक्ति को रात में सोने में कठिनाई हो, बार-बार नींद टूट जाए या पर्याप्त समय तक सोने के बावजूद शरीर तरोताजा महसूस न करे, तो इसे अनिद्रा कहा जाता है।

    अनिद्रा के सामान्य कारण

    • अधिक तनाव और चिंता
    • अवसाद या अन्य मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं
    • देर रात तक मोबाइल, टीवी या लैपटॉप का इस्तेमाल
    • चाय, कॉफी और अन्य कैफीनयुक्त पेयों का अधिक सेवन
    • धूम्रपान और शराब
    • अनियमित दिनचर्या
    • भारी या मसालेदार भोजन
    • कुछ दवाइयों के दुष्प्रभाव

    अनिद्रा के लक्षण

    • देर तक नींद न आना
    • रात में बार-बार जागना
    • सुबह जल्दी नींद खुल जाना
    • दिनभर थकान और सुस्ती
    • ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई
    • चिड़चिड़ापन और तनाव

    क्या कलाई के एक्यूप्रेशर पॉइंट से मदद मिल सकती है?

    एक्यूप्रेशर विशेषज्ञों के अनुसार, कलाई के अंदरूनी हिस्से पर छोटी उंगली की दिशा में मौजूद एक बिंदु पर 2–3 मिनट तक हल्का दबाव देने से कुछ लोगों को आराम महसूस हो सकता है। इसी तरह दोनों भौंहों के बीच वाले बिंदु पर हल्की मालिश भी तनाव कम करने में सहायक मानी जाती है।

    ध्यान रखें कि यह तरीका सभी लोगों पर समान रूप से प्रभावी हो, इसका पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। यदि आपकी नींद की समस्या लंबे समय से बनी हुई है, तो डॉक्टर से सलाह लेना सबसे बेहतर विकल्प है।

    अच्छी नींद के लिए अपनाएं ये आदतें

    • रोजाना एक ही समय पर सोएं और जागें।
    • सोने से 1–2 घंटे पहले मोबाइल और टीवी का इस्तेमाल कम करें।
    • शाम के बाद चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक से बचें।
    • हल्का और संतुलित भोजन करें।
    • नियमित व्यायाम करें, लेकिन सोने से ठीक पहले नहीं।
    • गहरी सांस लेने, ध्यान (Meditation) या रिलैक्सेशन तकनीकों का अभ्यास करें।
    • बेडरूम को शांत, अंधेरा और आरामदायक रखें।

    कब डॉक्टर से संपर्क करें?

    यदि 3 सप्ताह या उससे अधिक समय तक लगातार नींद की समस्या बनी रहे, खर्राटों के साथ सांस रुकने जैसी परेशानी हो, या अनिद्रा के कारण दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा हो, तो किसी योग्य चिकित्सक या नींद विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।

    निष्कर्ष

    एक्यूप्रेशर तनाव कम करने और रिलैक्स महसूस कराने में कुछ लोगों के लिए सहायक हो सकता है, लेकिन इसे अनिद्रा का पक्का इलाज नहीं माना जा सकता। अच्छी नींद के लिए नियमित दिनचर्या, स्वस्थ जीवनशैली और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह सबसे प्रभावी उपाय हैं।

  • बार-बार होती है एसिडिटी? जानें इसके प्रमुख कारण, लक्षण और राहत पाने के आसान उपाय

    बार-बार होती है एसिडिटी? जानें इसके प्रमुख कारण, लक्षण और राहत पाने के आसान उपाय

    बार-बार होती है एसिडिटी? जानें इसके प्रमुख कारण, लक्षण और राहत पाने के आसान उपाय

    अगर आपको अक्सर सीने में जलन, खट्टी डकारें, गले में जलन या पेट में भारीपन महसूस होता है, तो इसे सामान्य गैस समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बार-बार होने वाली एसिडिटी या एसिड रिफ्लक्स कई बार किसी अंदरूनी समस्या का संकेत भी हो सकती है। समय रहते इसके कारणों को समझकर जीवनशैली में बदलाव करने से काफी हद तक राहत मिल सकती है।

    एसिडिटी बार-बार क्यों होती है?

    विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार एसिडिटी होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें सबसे प्रमुख कारण हैं:

    • H. pylori बैक्टीरिया का संक्रमण: यह बैक्टीरिया पेट की परत को प्रभावित कर सकता है और पाचन संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है।
    • लोअर इसोफेगल स्फिंक्टर (LES) का कमजोर होना: यह वाल्व भोजन और पेट के बीच होता है। इसके कमजोर होने पर पेट का एसिड ऊपर भोजन नली में पहुंच सकता है।
    • बढ़ा हुआ वजन: पेट के आसपास अतिरिक्त चर्बी होने से पेट के अंदर दबाव बढ़ता है, जिससे एसिड रिफ्लक्स की संभावना बढ़ सकती है।
    • धूम्रपान और शराब का सेवन: ये आदतें पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं और एसिडिटी की समस्या बढ़ा सकती हैं।
    • अस्वस्थ खानपान: तला-भुना, अत्यधिक मसालेदार भोजन, ज्यादा चाय-कॉफी और अनियमित समय पर खाना भी एसिडिटी का कारण बन सकता है।
    • तनाव और खराब दिनचर्या: लगातार तनाव और पर्याप्त नींद की कमी भी पाचन तंत्र पर असर डाल सकती है।

    किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें?

    यदि आपको बार-बार ये समस्याएं हो रही हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो सकता है:

    • सीने में जलन (हार्टबर्न)
    • खट्टी डकारें या मुंह में खट्टा स्वाद आना
    • गले में जलन या खराश
    • सांस की बदबू
    • बार-बार खांसी या गला साफ करने की जरूरत महसूस होना
    • लंबे समय तक रहने पर दांतों की ऊपरी परत (एनामेल) को नुकसान

    एसिडिटी से बचने के लिए क्या करें?

    जीवनशैली में कुछ आसान बदलाव अपनाकर एसिडिटी की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है:

    • संतुलित और हल्का भोजन करें।
    • एक बार में ज्यादा खाने की बजाय थोड़ी-थोड़ी मात्रा में भोजन लें।
    • तला-भुना, अत्यधिक मसालेदार और बहुत अधिक चाय-कॉफी का सेवन सीमित करें।
    • धूम्रपान और शराब से दूरी बनाए रखें।
    • स्वस्थ वजन बनाए रखें और नियमित व्यायाम करें।
    • भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचें।
    • तनाव कम करने के लिए योग, मेडिटेशन या नियमित शारीरिक गतिविधि अपनाएं।
    • बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक एसिडिटी की दवाएं लेने से बचें।

    कब डॉक्टर से मिलना चाहिए?

    यदि एसिडिटी सप्ताह में कई बार हो रही है, दवाओं से भी राहत नहीं मिल रही, निगलने में परेशानी हो रही है, वजन तेजी से घट रहा है या उल्टी में खून जैसा दिखाई दे, तो तुरंत गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या योग्य चिकित्सक से संपर्क करें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर H. pylori संक्रमण या अन्य कारणों की जांच की सलाह दे सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से लिखा गया है। इसे चिकित्सीय सलाह का विकल्प न मानें। यदि आपकी समस्या लगातार बनी हुई है या गंभीर लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो योग्य डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।

  • बार-बार सांस फूलती है? अस्थमा और ब्रोंकाइटिस (COPD) के इन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें

    बार-बार सांस फूलती है? अस्थमा और ब्रोंकाइटिस (COPD) के इन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें

    बार-बार सांस फूलती है? अस्थमा और ब्रोंकाइटिस (COPD) के इन संकेतों को भूलकर भी नजरअंदाज न करें

    अस्थमा (Asthma) और ब्रोंकाइटिस (Bronchitis/COPD) श्वसन तंत्र से जुड़ी सामान्य लेकिन गंभीर बीमारियां हैं। इनकी वजह से सांस लेने में कठिनाई, खांसी, सीने में जकड़न और बार-बार संक्रमण जैसी समस्याएं हो सकती हैं। समय पर इलाज और सही जीवनशैली अपनाकर इन बीमारियों को काफी हद तक नियंत्रित रखा जा सकता है।

    अस्थमा और ब्रोंकाइटिस क्या हैं?

    अस्थमा में श्वास नलियां संवेदनशील हो जाती हैं और उनमें सूजन व संकुचन होने से सांस लेने में परेशानी होती है।

    ब्रोंकाइटिस में श्वास नलियों में सूजन आ जाती है, जिससे लगातार खांसी, बलगम और सांस फूलने की समस्या हो सकती है। यदि यह लंबे समय तक बनी रहे, तो यह COPD का रूप ले सकती है।

    इन बीमारियों के प्रमुख कारण

    • धूम्रपान और परोक्ष धूम्रपान
    • धूल, धुआं और वायु प्रदूषण
    • एलर्जी
    • वायरल या बैक्टीरियल संक्रमण
    • बार-बार सर्दी-जुकाम
    • रासायनिक धुएं या औद्योगिक प्रदूषण के संपर्क में रहना
    • पारिवारिक इतिहास और कुछ मामलों में आनुवंशिक कारण

    सामान्य लक्षण

    • सांस फूलना
    • सीने में जकड़न
    • बार-बार खांसी
    • बलगम आना
    • सांस लेते समय सीटी जैसी आवाज आना
    • थोड़ी मेहनत में भी सांस चढ़ना
    • रात या सुबह के समय लक्षण बढ़ जाना

    राहत के लिए क्या करें?

    • डॉक्टर द्वारा दी गई इनहेलर या दवाओं का नियमित उपयोग करें।
    • धूम्रपान पूरी तरह छोड़ दें।
    • धूल, धुएं और प्रदूषण से बचें।
    • घर को साफ और हवादार रखें।
    • नियमित रूप से हल्का व्यायाम और डॉक्टर की सलाह अनुसार श्वास संबंधी एक्सरसाइज करें।
    • पर्याप्त पानी पिएं और संतुलित आहार लें।
    • संक्रमण से बचाव के लिए हाथों की सफाई और आवश्यक टीकाकरण करवाएं।

    क्या घरेलू उपाय मदद कर सकते हैं?

    गुनगुना पानी पीना, भाप लेना और अदरक, तुलसी या शहद जैसी चीजें कुछ लोगों में गले की जलन या खांसी से अस्थायी राहत दे सकती हैं। लेकिन ये अस्थमा या COPD का इलाज नहीं हैं। यदि सांस लेने में तकलीफ बढ़ रही हो, तो केवल घरेलू नुस्खों पर निर्भर न रहें।

    कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?

    • सांस लेने में बहुत अधिक परेशानी हो।
    • होंठ या उंगलियां नीली पड़ने लगें।
    • इनहेलर लेने के बाद भी आराम न मिले।
    • तेज बुखार के साथ खांसी और सांस फूलने लगे।
    • बार-बार अस्थमा का दौरा पड़ रहा हो।

    निष्कर्ष

    अस्थमा और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां पूरी तरह नजरअंदाज करने की नहीं हैं। सही इलाज, नियमित दवाएं, धूम्रपान से दूरी, स्वच्छ वातावरण और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर अधिकांश मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। किसी भी घरेलू उपाय को डॉक्टर की सलाह का विकल्प न मानें और लक्षण बढ़ने पर तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करें।