पीएम मोदी के स्कूली दोस्त असगर अली वोरा को बड़ी राहत मिली है. भायंदर में उनकी 2810 स्क्वायर मीटर जमीन पर कब्जा करने के आरोपों के बाद, बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता की कंपनी ने जमीन से कब्जा छोड़ने और वोरा के खिलाफ दर्ज शिकायत वापस लेने का फैसला किया है. आपको मालूम हो कि असगर अली वोरा ने इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई कर चुके असगर अली वोरा की पीएम संग हुई एक मुलाकात ने सालों पुराने जमीन विवाद का रुख पूरी तरह बदल दिया. मीरा रोड के रहने वाले 81 वर्षीय असगर अली वोरा को अपनी भायंदर स्थित जमीन पर कब्जा वापस मिल गया है. बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता की कंस्ट्रक्शन कंपनी ‘सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन्स’ ने विवादित प्लॉट से अपना कब्जा छोड़ने और कंस्ट्रक्शन परमिशन वापस लेने का औपचारिक ऐलान कर दिया है.
जमीन पर अवैध कब्जा का लगाया था आरोप गुजरात के वडनगर स्थित बीएन स्कूल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पढ़ाई कर चुके असगर अली वोरा बीते 8 सितंबर को पीएम से मिलने पहुंचे थे. उन्होंने पीएम मोदी को बताया था कि 1989 में उन्होंने भायंदर (ईस्ट) के नवघर इलाके में करीब 2810 स्क्वायर मीटर जमीन खरीदी थी. आरोप था कि 2011 में ‘स्वयं बिल्डर्स’ और बीजेपी विधायक नरेंद्र मेहता की ‘सेवन इलेवन कंस्ट्रक्शन्स’ ने उनकी जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया. वोरा पिछले 15 सालों से प्रशासनिक दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे. पीएम मोदी ने मुलाकात के दौरान उन्हें जल्द न्याय का भरोसा दिया था.
पीएम से मिला था पॉजिटिव जवाब वोरा ने कहा कि वह पिछले 15 सालों से अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के साथ इस मामले को आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने यह भी बताया कि मीटिंग के दौरान उन्हें प्रधानमंत्री से पॉजिटिव जवाब मिला. इस मीटिंग के बाद, सरकारी अधिकारियों ने इस मामले को उठाया. मंगलवार को मुख्यमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्रीकर परदेशी ने मंत्रालय में एक मीटिंग की. मीटिंग में वोरा, मेहता, मीरा-भायंदर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन कमिश्नर राधा विनोद शर्मा और टाउन प्लानर पुरुषोत्तम शिंदे शामिल हुए.
और शिकायत ले ली वापस मीटिंग के दौरान, मेहता ने टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट को एक लेटर दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि वह विवादित जमीन का कब्जा छोड़ रहे हैं और उन्हें दी गई कंस्ट्रक्शन की परमिशन भी वापस कर रहे हैं. मेहता ने लेटर में यह भी कहा कि जमीन 2019 में मर्विन फर्नांडिस से खरीदी गई थी. पुलिस कमिश्नर को लिखे एक अलग लेटर में, विधायक ने कहा कि वे वोरा के खिलाफ अपनी पिछली शिकायत वापस ले रहे हैं क्योंकि दोनों पार्टियों के बीच समझौता हो गया है.
वृंदावन भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है. यहां हर दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु बांके बिहारी मंदिर, प्रेम मंदिर, इस्कॉन मंदिर समेत कई धार्मिक स्थलों पर दर्शन करने पहुंचते हैं. वीकेंड और त्योहारों के दौरान यहां भीड़ कई गुना बढ़ जाती है. ऐसे में अगर आप भी वृंदावन जाने की तैयारी कर रहे हैं तो कुछ जरूरी सावधानियां बरतना बेहद जरूरी है. छोटी सी लापरवाही आपकी यात्रा का मजा खराब कर सकती है. आइए जानते हैं वृंदावन जाते समय किन 8 गलतियों से बचना चाहिए.बंदरों के सामने सामान न दिखाएं वृंदावन की गलियों और मंदिरों के आसपास बंदर बड़ी संख्या में नजर आते हैं. उनके सामने मोबाइल, चश्मा, प्रसाद या खाने की चीजें दिखाने से बचें.
बंदर सामान छीनने की कोशिश कर सकते हैं. उन्हें छेड़ें नहीं और न ही उनके पास जाकर खाना खिलाएं.कीमती सामान लेकर न घूमें भीड़भाड़ वाली जगहों पर मोबाइल, पर्स और दूसरे कीमती सामान को संभालकर रखें. जरूरत से ज्यादा कैश लेकर जाने से बचें. जरूरी सामान को बैग में रखें और उसकी चेन बंद रखें. मोबाइल को भी हाथ में लेकर चलते रहने के बजाय सुरक्षित जगह पर रखें.मंदिरों के नियमों को नजरअंदाज न करें हर मंदिर के अपने अलग नियम हो सकते हैं. कहीं फोटोग्राफी की अनुमति नहीं होती तो कहीं मोबाइल ले जाने पर रोक रहती है. मंदिर प्रशासन के निर्देशों का पालन करें. पूजा के दौरान तेज आवाज में बात करने या अनुशासन बिगाड़ने से बचें.
मंदिर में धक्का-मुक्की न करें वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में दर्शन के लिए काफी भीड़ रहती है. लाइन तोड़कर आगे बढ़ने या धक्का-मुक्की करने से बचें. इससे आपको या दूसरे श्रद्धालुओं को चोट लग सकती है. मंदिर की लाइन में ही खड़े रहें और सुरक्षाकर्मियों के निर्देशों का पालन करें. बच्चों और बुजुर्गों का खास ध्यान रखें.खुले में रखा खाना खाने से बचें वृंदावन में कई जगह स्ट्रीट फूड और प्रसाद की दुकानें मिलती हैं. कुछ भी खाने से पहले साफ-सफाई जरूर देखें. काफी देर से खुले में रखा खाना खाने से बचें. यात्रा के दौरान साफ पानी पिएं और संभव हो तो अपनी पानी की बोतल साथ रखें.बच्चों को भीड़ में अकेला न छोड़ें वीकेंड और त्योहारों पर भीड़ काफी बढ़ जाती है. ऐसे में बच्चों का हाथ पकड़कर रखें और उन्हें अकेले कहीं न जाने दें. परिवार के सभी सदस्यों के साथ पहले से एक मिलने की जगह तय कर लें. जरूरी संपर्क नंबर मोबाइल में सेव रखें.संकरी गलियों में सावधानी से चलें वृंदावन की कई गलियां काफी संकरी हैं, जहां पैदल लोगों के साथ ऑटो और ई-रिक्शा भी चलते हैं. सड़क या गली पार करते समय जल्दबाजी न करें. वाहनों से दूरी बनाकर चलें और भीड़ में अपने आसपास नजर रखें.
जल्दी दर्शन के नाम पर किसी पर भरोसा न करें वृंदावन में कुछ लोग जल्दी दर्शन, पूजा या दूसरी धार्मिक सेवाएं कराने के नाम पर श्रद्धालुओं से संपर्क कर सकते हैं. ऐसे लोगों पर तुरंत भरोसा करके पैसे न दें. किसी भी सेवा के लिए भुगतान करने से पहले शुल्क और व्यवस्था की पूरी जानकारी लें.
AI को लेकर अक्सर कहा जाता है कि इससे लोगों का काम आसान हो जाएगा और समय की बचत होगी, लेकिन हर किसी का एक्सपीरियंस ऐसा नहीं है. एक सॉफ्टवेयर डेवलपर ने सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती शेयर करते हुए बताया कि AI ने उसका काम कम करने के बजाय उल्टा और बढ़ा दिया है. उसका कहना है कि अब कंपनियां पहले से कहीं ज्यादा काम की उम्मीद करने लगी हैं, जबकि सैलरी में कोई खास चेंज नहीं आया है.
इस डेवलपर ने Reddit के r/developersIndia फोरम पर Anyone else feel we’re having to work more due to AI? टाइटल से अपनी बात लिखी. देखते ही देखते उसकी पोस्ट वायरल हो गई. डेवलपर ने बताया कि 2021 से 2024 के बीच सॉफ्टवेयर प्रोजेक्ट्स की रफ्तार काफी अलग थी. उस समय किसी साधारण CRUD API को तैयार करना भी कई चरणों से होकर गुजरता था. पहले जरूरतों को समझा जाता, फिर टेक्निकल स्पेसिफिकेशन तैयार होते, उनका रिव्यू होता था, उसके बाद कोडिंग शुरू होती. फिर टेस्टिंग, पुल रिक्वेस्ट रिव्यू और आखिर में प्रोडक्शन पर डिप्लॉयमेंट किया जाता.
क्यों आसान से मुश्किल हो गया है AI?
इन सभी स्टेज में कई दिन निकल जाते थे और यही नॉर्मल प्रोसेस मानी जाती थी. उसने ये भी बताया कि उस दौरान वह चार इंटर्न की टीम संभालता था. जिसमें उनको गाइड करना, उनकी गलतियां सुधारना और उन्हें समझाना ही उसके समय का बड़ा हिस्सा ले लेता था. इसी वजह से उसे खुद ज्यादा कोड लिखने का मौका नहीं मिलता था, लेकिन उस समय किसी को इससे परेशानी नहीं होती थी क्योंकि पूरे प्रोजेक्ट की टाइमलाइन उसी हिसाब से बनाई जाती थी. डेवलपर का कहना है कि 2025 के बाद हालात तेजी से बदल गए.
AI टूल्स के आने के बाद पहले जिन कामों में कई दिन लगते थे, अब वही एक या दो दिन में पूरे करने की उम्मीद की जाती है. कंपनियों का मानना है कि जब AI उपलब्ध है तो डेवलपर्स को पहले से कहीं ज्यादा तेजी से काम करना चाहिए. उसने लिखा कि अब जूनियर डेवलपर्स और इंटर्न भी AI की मदद से बहुत तेजी से कोड तैयार कर लेते हैं. सुनने में यह अच्छी बात लगती है, लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है. पहले जहां जूनियर डेवलपर्स को काम पूरा करने में समय लगता था, अब वे जल्दी-जल्दी कोड जमा कर देते हैं. ऐसे में सीनियर डेवलपर्स को उनके काम की समीक्षा करने में पहले से कहीं ज्यादा समय देना पड़ता है. यानी अब जिम्मेदारियां कम होने के बजाय बढ़ गई हैं. एक तरफ टीम के बाकी सदस्यों के काम की जांच करनी होती है और दूसरी तरफ खुद भी पहले से कहीं ज्यादा कोड लिखना पड़ता है. कुल मिलाकर काम का दबाव बढ़ गया है, लेकिन इसके बदले मिलने वाला वेतन लगभग वही है.
डेवलपर ने मजाकिया अंदाज में लिखा कि AI ने टेक इंडस्ट्री की उन आरामदायक धीमी प्रोसेस को खत्म कर दिया है, जो पहले काम को थोड़ा सहज बना देती थीं. अब हर चीज इतनी तेज हो गई है कि ऐसा लगता है जैसे हर समय किसी दौड़ में शामिल हों. उसकी यह बात कई लोगों को अपनी कहानी जैसी लगी. पोस्ट पर कमेंट करने वाले कई डेवलपर्स ने कहा कि उन्होंने भी पिछले कुछ समय में यही बदलाव महसूस किया है. उनके मुताबिक AI ने काम को आसान जरूर बनाया है, लेकिन कंपनियों ने उसी अनुपात में डेडलाइन भी छोटी कर दी है.
कुछ लोगों ने कहा कि AI कोड लिखने में मदद जरूर करता है, लेकिन उस कोड की क्वालिटी, सेफ्टी और भरोसेमंद होने की जिम्मेदारी आखिरकार इंसानों पर ही रहती है. अगर AI से तैयार किए गए कोड में कोई गलती रह जाए तो उसका असर पूरे प्रोजेक्ट पर पड़ सकता है. इसलिए हर लाइन की जांच करना अभी भी जरूरी है. कई डेवलपर्स ने यह भी कहा कि अब काम का माहौल पहले से ज्यादा थकाने वाला हो गया है. एक प्रोजेक्ट खत्म होते ही दूसरा सामने आ जाता है. ऐसा महसूस होता है कि बिना रुके लगातार काम करना पड़ रहा है और आराम करने का मौका लगभग नहीं मिलता.
इस पूरी चर्चा ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या AI सच में कर्मचारियों की जिंदगी आसान बना रहा है, या फिर इससे सिर्फ काम की रफ्तार बढ़ी है और अपेक्षाएं भी कई गुना बढ़ गई हैं? फिलहाल टेक इंडस्ट्री में काम करने वाले कई लोगों का एक्सपीरियंस यही बताता है कि AI ने सिर्फ काम करने का तरीका नहीं बदला, बल्कि काम का दबाव भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा दिया है.
सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसे वीडियो सामने आते हैं, जिन्हें देखकर लोगों को अपनी आंखों पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। मध्य प्रदेश के बनखेड़ी से सामने आया एक वीडियो भी इन दिनों चर्चा में है। इसमें एक शख्स सांप को अपने बेहद करीब लाकर उससे खुद को कटवाता हुआ नजर आ रहा है। इस खतरनाक नजारे को देखकर सोशल मीडिया यूजर्स हैरान हैं।
सांप के साथ दिखा खतरनाक अंदाज
वायरल वीडियो में एक व्यक्ति सांप को पकड़कर उसके बेहद करीब दिखाई देता है। वीडियो में वह सांप को अपने शरीर के पास ले जाता है और कथित तौर पर उससे खुद को कटवाता नजर आता है।
इस दौरान आसपास मौजूद लोग भी वहां दिखाई दे रहे हैं। शख्स के इस अंदाज को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं। वीडियो रिकॉर्ड किए जाने के बाद इसे सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, जहां यह तेजी से लोगों का ध्यान खींचने लगा।
इंस्टाग्राम पर यह वीडियो dev_amole_ji नाम के पेज से शेयर किया गया है। वीडियो पर कई यूजर्स ने प्रतिक्रिया देते हुए इस तरह की हरकत को बेहद जोखिम भरा बताया है।
ऐसी हरकत पड़ सकती है भारी
सांप चाहे जहरीला हो या न हो, उसके साथ इस तरह का व्यवहार करना बेहद खतरनाक हो सकता है। सांप के काटने से गंभीर चोट या विषैले सांप की स्थिति में जान का खतरा भी हो सकता है। इसके अलावा किसी वन्यजीव को पकड़ना या उसके साथ छेड़छाड़ करना उसके लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।
इसलिए वायरल वीडियो देखकर ऐसी किसी हरकत को दोहराने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सांप नजर आने पर उससे दूरी बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर वन विभाग या प्रशिक्षित वन्यजीव बचाव दल की मदद लेना ही सुरक्षित तरीका है।
फिलहाल यह वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग शख्स की इस खतरनाक हरकत पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
हैदराबाद.
शहर की भागदौड़ और आधुनिकता के बीच पुराने हैदराबाद की सड़कों पर एक शख्स पिछले 22 सालों से इतिहास को सहेजने का काम कर रहा है. यह कोई बड़ा म्यूजियम नहीं है बल्कि सड़क किनारे सजी पुरानी मुद्राओं यानी सिक्कों की एक छोटी सी, लेकिन बेहद अनूठी दुनिया है. इस व्यक्ति के पास 1818 की ईस्ट इंडिया कंपनी के सिक्कों से लेकर हैदराबाद के निज़ाम के दौर तक की दुर्लभ मुद्राएं मौजूद हैं.
सिक्कों के इस अनोखे संग्रह में कई ऐसी चीजें हैं जो आज के समय में आसानी से देखने को नहीं मिलती. उनके पास ईस्ट इंडिया कंपनी का 1818 का एक खास टोकन कॉइन है. इसके अलावा उनके संग्रह का मुख्य आकर्षण पुराने दौर के हाथ से बने सिक्के हैं जिन्हें उस समय मुद्दा पैसा कहा जाता था.
सिक्कों का कलेक्शन दुनिया की सबसे बेहतरीन हॉबी
इतिहास की दिलचस्प जानकारी देते हुए वे बताते हैं कि निज़ाम और पुराने दौर में अगर यह हाथ से बना सिक्का सोने का होता था, तो उसे अशर्फी कहा जाता था. वहीं, अगर यह चांदी का होता था, तो उसे रुपया कहा जाता था. उनके पास जो मुद्दा पैसा मौजूद है वह तांबे का है. इन ऐतिहासिक सिक्कों के साथ-साथ उनके कलेक्शन में ब्रिटिश काल, आजादी के बाद के ब्रिटिश इंडिया का हाफ पैसा और यहां तक कि कई विदेशी सिक्के भी शामिल हैं. लगभग साल 2005 से इस काम में जुटे इस शख्स का मानना है कि सिक्कों का कलेक्शन दुनिया की सबसे बेहतरीन हॉबी है. वे इसे सिर्फ एक शौक नहीं, बल्कि बिना घाटे का एक सुरक्षित निवेश भी मानते हैं, उनके अनुसार इस हॉबी में कभी नुकसान नहीं होता. आप सिक्कों को जमा करते हैं उन्हें संभाल कर रखते हैं और भविष्य में जब चाहें उन्हें बेचकर अपनी जरूरत भी पूरी कर सकते हैं.
आज के समय में जब युवा गलत रास्तों पर जा रहे हैं, ऐसे में यह व्यक्ति नई पीढ़ी के लिए एक बड़ा संदेश देता है. उनका कहना है कि आजकल के बच्चों ने सिगरेट पीने जैसी नुकसानदायक और फालतू बातों को अपना शौक बना लिया है. इसके उलट, पुराने सिक्कों को जमा करना एक बेहद एजुकेशनल हॉबी है. जब आप पुराने सिक्के जमा करते हैं तो आप सिर्फ एक सिक्का नहीं रखते, बल्कि आप उस दौर के इतिहास को करीब से पढ़ते और सीखते हैं. यह सिर्फ पुराने सिक्कों को जमा करने की कहानी नहीं है बल्कि अपनी ऐतिहासिक विरासत से जुड़े रहने और आज की युवा पीढ़ी को एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देने की भी कहानी है.
टाइप-2 डायबिटीज अचानक नहीं होती, बल्कि इसकी शुरुआत सालों पहले ‘इंसुलिन रेजिस्टेंस’ से हो जाती है। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो पैंक्रियाज से बनता है और भोजन से मिलने वाले ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है,ताकि उसका इस्तेमाल ऊर्जा के लिए किया जा सके। जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन हार्मोन पर सही तरीके से प्रतिक्रिया देना बंद कर देती हैं, तो ब्लड शुगर का स्तर धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। Insulin Resistance के शुरुआती चरण में शरीर इसकी भरपाई करने के लिए पैंक्रियाज से ज्यादा इंसुलिन बनवा सकता है। इस वजह से कुछ समय तक ब्लड शुगर सामान्य सीमा में रह सकती है और व्यक्ति को कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। यही कारण है कि Insulin Resistance कई सालों तक बिना स्पष्ट लक्षणों के रह सकती है। बाद में जब शरीर अतिरिक्त इंसुलिन बनाकर भी ब्लड शुगर को सामान्य रखने में कामयाब नहीं रहता, तब ब्लड शुगर बढ़ने लगती है और व्यक्ति प्री-डायबिटीज की स्थिति में पहुंच सकता है।
National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases(NIH) के मुताबिक इंसुलिन रेजिस्टेंस एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर की मांसपेशियों, लिवर और फैट की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति ठीक से प्रतिक्रिया नहीं करतीं। इंसुलिन का काम ब्लड में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाना है, लेकिन इंसुलिन रेजिस्टेंस में कोशिकाएं इंसुलिन के संकेत को कम प्रभावी ढंग से स्वीकार करती हैं। इसकी भरपाई के लिए पैंक्रियाज अधिक इंसुलिन बनाने लगता है जिससे शुरुआत में ब्लड शुगर नॉर्मल रह सकता है और लम्बे समय तक बॉडी में इसके कोई लक्षण नहीं दिखते।
इंसुलिन रेजिस्टेंस के शुरुआती लक्षण
इंसुलिन रेजिस्टेंस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत में इसके कोई स्पष्ट या खास लक्षण नहीं होते। कई लोगों में यह स्थिति तब तक पता नहीं चलती, जब तक ब्लड शुगर बढ़कर प्री-डायबिटीज या डायबिटीज की स्थिति तक नहीं पहुंच जाती। फिर भी शरीर में कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
गर्दन या बगल की स्किन का काला और मोटा होना
इंसुलिन रेजिस्टेंस का एक महत्वपूर्ण दिखाई देने वाला संकेत Acanthosis Nigricans है। इसमें गर्दन के पीछे, बगल, जांघों के बीच या शरीर की दूसरी फोल्ड वाली जगहों पर स्किन काली, मोटी और मखमली जैसी दिखाई दे सकती है। कई लोग इसे गंदगी या टैनिंग समझते हैं, लेकिन यह केवल रगड़ने या साफ करने से दूर नहीं होती।
शरीर पर छोटे-छोटे मांस के उभार होना
गर्दन, बगल, पलकों या स्तनों के नीचे छोटे-छोटे नरम उभार यानी skin tags आम होते हैं और उनके कोई नुकसान भी नहीं होते। लेकिन अगर शरीर पर अचानक कई skin tags होने लगें, खासकर उनके साथ गर्दन या बगल की त्वचा काली और मोटी भी हो रही हो, तो डॉक्टर से ब्लड शुगर की जांच के बारे में बात की जा सकती है। सिर्फ एक-दो skin tags को इंसुलिन रेजिस्टेंस का लक्षण नहीं माना जा सकता। अगर शरीर पर अचानक बहुत सारे ऐसे उभार निकलने लगें, खासकर गर्दन की त्वचा काली और मोटी होने के साथ, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
पेट के आसपास चर्बी बढ़ना
कमर या पेट के आसपास लगातार फैट बढ़ना इंसुलिन रेजिस्टेंस से जुड़ा हो सकता है। खासतौर पर visceral fat, यानी पेट के अंदर अंगों के आसपास जमा फैट, मेटाबॉलिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए केवल वजन देखना पर्याप्त नहीं है; कमर का साइज भी मायने रखता है।
खाना खाने के बाद ज्यादा थकान या नींद आना
खाने के बाद थोड़ी नींद या सुस्ती सामान्य हो सकती है, खासकर भारी भोजन करने के बाद। इसलिए सिर्फ खाना खाने के बाद नींद आना इंसुलिन रेजिस्टेंस का प्रमाण नहीं है, लेकिन अगर इसके साथ लगातार और बिना किसी स्पष्ट कारण के थकान रहती है और इसके साथ ज्यादा प्यास, बार-बार पेशाब आना या धुंधला दिखाई देने जैसे लक्षण भी हों, तो ब्लड शुगर की जांच कराना जरूरी है।
बार-बार भूख लगना और मीठा खाने की इच्छा
कुछ लोगों में बार-बार भूख लगना या खासकर मीठे और कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थों की craving देखने को मिल सकती है। अगर डाइट से जुड़े इस बदलाव के साथ ही थकान और बाकी लक्षण भी बॉडी में दिखें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
महिलाओं में पीरियड्स का अनियमित होना
महिलाओं में इंसुलिन रेजिस्टेंस का संबंध PCOS (Polycystic Ovary Syndrome) से हो सकता है। PCOS में पीरियड्स अनियमित या मिस हो सकते हैं और चेहरे या शरीर पर ज्यादा बाल, मुंहासे तथा वजन बढ़ने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं। अगर बॉडी में इस तरह के कुछ बदलाव दिखें तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। हालांकि, अनियमित पीरियड्स के कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं, इसलिए इसे अकेले इंसुलिन रेजिस्टेंस का लक्षण नहीं माना जा सकता।
बढ़ी हुई प्यास और बार-बार पेशाब आना
बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, खासकर रात में, धुंधला दिखाई देना, बिना वजह थकान और घाव का देर से भरना आमतौर पर बढ़े हुए ब्लड शुगर से जुड़े संकेत हैं। ये शुरुआती इंसुलिन रेजिस्टेंस के बजाय तब दिखाई दे सकते हैं जब स्थिति प्री-डायबिटीज या डायबिटीज की ओर बढ़ चुकी हो।
ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल में बदलाव
इंसुलिन रेजिस्टेंस अक्सर अकेले नहीं होती। इसके साथ पेट की चर्बी बढ़ना, हाई ब्लड प्रेशर, हाई ट्राइग्लिसराइड्स और HDL यानी ‘अच्छे’ कोलेस्ट्रॉल का कम होना जैसे मेटाबॉलिक बदलाव भी देखे जा सकते हैं। इसलिए केवल ब्लड शुगर नहीं, बल्कि ब्लड प्रेशर और लिपिड प्रोफाइल पर भी ध्यान देना जरूरी है।
किन टेस्ट की मदद से होती है इंसुलिन रेजिस्टेंस की पुष्टि?
सबसे जरूरी बात यह है कि सिर्फ लक्षण देखकर इंसुलिन रेजिस्टेंस की पुष्टि नहीं की जा सकती। डॉक्टर व्यक्ति की उम्र, वजन, कमर के साइज, फैमिली हिस्ट्री और दूसरे जोखिम कारकों को देखते हुए ब्लड टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। कुछ टेस्ट जैसे
Fasting Blood Glucose,
HbA1c
जरूरत पड़ने पर Oral Glucose Tolerance Test (OGTT) की मदद से प्री-डायबिटीज या डायबिटीज का पता किया जाता है।
कुछ मामलों में डॉक्टर fasting insulin और HOMA-IR जैसे टेस्ट कराने का भी विचार करते हैं।
कब लेना चाहिए डॉक्टर से सलाह ?
अगर गर्दन या बगल में अचानक काली-मोटी त्वचा दिखाई दे, शरीर पर बहुत सारे skin tags विकसित हो रहे हों, कमर तेजी से बढ़ रही हो या परिवार में डायबिटीज का इतिहास हो, तो डॉक्टर से blood sugar screening के बारे में बात करना उचित है। वहीं बहुत ज्यादा प्यास, बार-बार पेशाब, धुंधला दिखना, अत्यधिक कमजोरी या बिना वजह वजन कम होने जैसे लक्षण हों तो जांच में देरी नहीं करनी चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से है। इंसुलिन रेजिस्टेंस के बताए गए संकेत हर व्यक्ति में दिखाई दें, यह जरूरी नहीं है और ये लक्षण अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी हो सकते हैं। केवल लक्षणों के आधार पर इंसुलिन रेजिस्टेंस, प्री-डायबिटीज या डायबिटीज का निदान नहीं किया जा सकता। सही जांच और स्थिति के आकलन के लिए डॉक्टर से परामर्श लें।
जैसलमेर में गणेश चतुर्थी के मौके पर एक अनोखा नजारा देखने को मिला. शहर से करीब 12 किलोमीटर दूर स्थित 1500 साल पुराने चूंधी गणेश मंदिर में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे. मंदिर बरसाती नदी के तेज बहाव वाले क्षेत्र के बीच बना है. इसके बावजूद मान्यता है कि तेज पानी भी गणेश जी की प्रतिमा को आज तक अपनी जगह से नहीं हिला सका. यही वजह है कि इस मंदिर को चमत्कारी माना जाता है.
सुबह 5 बजे से मंदिर की ओर बढ़ने लगा श्रद्धालुओं का रेला गणेश चतुर्थी के दिन सोमवार सुबह करीब 5 बजे से ही जैसलमेर शहर और आसपास के इलाकों से श्रद्धालु पैदल मंदिर की ओर निकल पड़े. करीब 12 किलोमीटर के रास्ते पर जगह-जगह भक्तों की भीड़ नजर आई. बड़ी संख्या में लोग अपने वाहनों से भी मंदिर पहुंचे. दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी रहीं. मंदिर परिसर को आकर्षक लाइटिंग और फूलों से सजाया गया था. गणेश जी का विशेष श्रृंगार किया गया, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा. मेले में बच्चों के मनोरंजन के लिए झूले और अलग-अलग खेलों की भी व्यवस्था की गई.51
हजार लड्डुओं का लगाया गया भोग चूंधी गणेश मेला कमेटी के विमल गोपा के मुताबिक, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए हनुमान चौराहे से मंदिर तक निशुल्क बसों की व्यवस्था की गई. मेले में अलग-अलग देवी-देवताओं की झांकियां भी आकर्षण का केंद्र रहीं. गणेश जी को 51 हजार लड्डुओं का भोग लगाया गया. शाम 7 बजे महाआरती के बाद भजन संध्या का आयोजन किया गया. इसके अलावा सुंदरकांड का पाठ भी हुआ.नदी में पत्थरों से घर बनाते हैं भक्त इस मंदिर को ‘घर देने वाले गणेश जी’ के नाम से भी जाना जाता है.
श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां गणेश जी से अपना घर मांगने पर मनोकामना पूरी होती है. इसी आस्था के चलते मंदिर के पास नदी में लोग पत्थरों से छोटे-छोटे घर बनाते हैं. गणेश चतुर्थी पर भी नदी में ऐसे घरों के मॉडल बनाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही.बारिश में होता है गणेश जी का जलाभिषेक मान्यता है कि बारिश के मौसम में बरसाती नदी का पानी मंदिर परिसर से होकर गुजरता है और गणेश जी की प्रतिमा को छूकर निकलता है. भक्त इसे गणेश जी का प्राकृतिक जलाभिषेक मानते हैं. तेज बहाव के बावजूद प्रतिमा के अपनी जगह से नहीं हिलने को लेकर भी यहां लोगों की गहरी आस्था है.
तमिलनाडु के नागौर से धार्मिक सौहार्द की ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने लोगों का ध्यान खींचा है. यहां एक हिंदू परिवार ने अपनी शादी की रस्म नागौर दरगाह में पूरी की. शादी में परिवार और रिश्तेदारों के साथ दरगाह प्रशासन से जुड़े मुस्लिम बुजुर्ग भी शामिल हुए और नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दिया.
इस पूरे समारोह का वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.नागौर दरगाह में हुआ शादी का समारोह दरअसल, शादी 13 सितंबर 2026 को नागपट्टिनम जिले के नागौर में स्थित विश्व प्रसिद्ध नागौर अंडावर दरगाह में हुई. शुभ मुहूर्त में आयोजित इस समारोह में दूल्हा-दुल्हन के परिवार, रिश्तेदार और दोस्त मौजूद रहे. खास बात यह रही कि दरगाह प्रशासन के मुस्लिम बुजुर्ग भी इस खुशी में शामिल हुए.
नागौर दरगाह के प्रशासनिक अध्यक्ष और वंशानुगत ट्रस्टी मोहम्मद खलीफा साहिब समेत अन्य लोगों ने नवविवाहित जोड़े को बधाई दी. समारोह के दौरान दूल्हा-दुल्हन पर अक्षत बरसाए जाने का वीडियो भी सामने आया है.मुस्लिम बुजुर्गों ने दिया आशीर्वाद दरगाह के वंशानुगत ट्रस्टी और सलाहकार समिति के अध्यक्ष खलीफा साहिब ने इस मौके पर धार्मिक सौहार्द को लेकर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि नागपट्टिनम जिला धार्मिक एकता के लिए जाना जाता है और नागौर दरगाह की अपनी खास पहचान है.
उन्होंने कहा कि एक हिंदू भाई की शादी मुस्लिम बुजुर्गों की मौजूदगी में परिवार और दोस्तों के बीच हुई. उनके मुताबिक, नागौर दरगाह में इस तरह के आयोजन कोई नई बात नहीं हैं.सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरें खलीफा साहिब ने कहा कि मौजूदा माहौल में ऐसी घटनाओं को वीडियो के जरिए सामने लाना जरूरी हो गया है, ताकि आने वाली पीढ़ी भी इस भाईचारे और एकता को समझ सके.
शादी की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर होने के बाद लोग इसे नागौर की पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बता रहे हैं. लोगों का कहना है कि अलग-अलग धर्मों के बावजूद इंसानियत और आपसी भाईचारा सबसे ऊपर है. नागौर दरगाह में हुआ यह विवाह इसी संदेश को मजबूत करता नजर आया कि धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत एक है.
अमेरिका के 48 साल के टेक अरबपति ब्रायन जॉनसन (Bryan Johnson) का नया दावा इंटरनेट पर तहलका मचा रहा है. बुढ़ापे को हराने और अमर होने के अपने जुनून के लिए चर्चित ब्रायन ने कहा है कि उन्होंने लैब में अपना खुद का एक ‘बेबी क्लोन’ (Baby Clone) तैयार कर लिया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर उन्होंने बताया कि यह नन्हा क्लोन यानी ‘बेबी-ब्रायन’ (Baby Bryan) अभी एक पेट्री डिश में बढ़ रहा है. आइए समझते हैं कि आखिर यह पूरा माजरा क्या है.
पेट्री डिश में ‘बेबी-ब्रायन’: क्या है यह प्रयोग?
ब्रायन जॉनसन के मुताबिक, उन्होंने अपने शरीर से खून की कोशिकाओं को निकाला. फिर साइंस की आधुनिक तकनीक से उन्हें एक भ्रूण जैसी शुरुआती अवस्था में बदल दिया. उनका मानना है कि इस क्लोन की मदद से वे अपने लिए नए अंग उगा सकेंगे, नई दवाओं का टेस्ट कर सकेंगे और जवान सेल्स को अपने शरीर में डाल सकेंगे. आसान शब्दों में कहें तो, ब्रायन खुद को जवान रखने के लिए अपने ही क्लोन का इस्तेमाल करना चाहते हैं.
दुर्लभ बीमारी से बचाने का नया तरीका?
हाल ही में ब्रायन को ‘ऑटोइम्यून गैस्ट्राइटिस’ (Autoimmune Gastritis-AIG) नाम की बीमारी का पता चला था. इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से पेट की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाने लगता है. इसका कोई पक्का इलाज नहीं है. ब्रायन का दावा है कि यह प्रयोग न सिर्फ उनकी बीमारी ठीक करेगा, बल्कि बुढ़ापा रोकने में भी मदद करेगा.
मेडिकल क्रांति या सिर्फ पब्लिसिटी स्टंट?
आपको जानकर हैरानी होगी कि ब्रायन जॉनसन हर साल एंटी एजिंग और हेल्थ प्रोग्राम पर करीब 20 लाख डॉलर (यानी लगभग 20 करोड़ रुपए) खर्च करते हैं. उनके इस नए दावे के बाद दो गुट बन गए हैं. सपोर्टर्स इसे मेडिकल साइंस का बड़ा चमत्कार मान रहे हैं. वहीं, आलोचक इसे एक डरावना प्रयोग और पब्लिसिटी पाने का तरीका बता रहे हैं. अब यह तो वक्त ही बताएगा कि यह प्रयोग इंसान को अमर बनाएगा या सिर्फ एक पब्लिसिटी स्टंट बनकर रह जाएगा.
क्या सच में कभी किसी इंसान का क्लोन बना है?
27 दिसंबर 2002 को ब्रिगेट बॉइसेलिअर (Brigitte Boisselier) नाम की एक वैज्ञानिक ने ‘इव’ नाम की एक बच्ची का क्लोन बनाने का दावा करके बड़ा हंगामा मचाया गया था, लेकिन जब सबूत मांगे गए तो बात पूरी तरह झूठी निकली. बाद में ताइवान के वैज्ञानिकों ने भी ऐसे दावे किए, लेकिन उनकी बातें भी हवा-हवाई निकलीं. असलियत यही है कि आज तक दुनिया में किसी भी जीवित इंसान का क्लोन नहीं बना है.
आखिर इंसान का क्लोन क्यों नहीं बनता?
इसके पीछे दो बड़ी वजहें हैं, सख्त कानून और नैतिक खतरे. किसी इंसान का हूबहू रूप तैयार करना इंसानी गरिमा के खिलाफ माना जाता है. इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र (UN) और फ्रांस, जर्मनी, रूस सहित दुनिया के 30 से ज्यादा देशों में इस पर सख्त बैन है.
तो क्या इस पर कोई रिसर्च भी नहीं हो रही?
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस दिशा में रिसर्च तो हो रही है, लेकिन मकसद अलग है. क्लोनिंग दो तरह की होती है. रिप्रोडक्टिव क्लोनिंग (Reproductive Cloning) यानी पूरा इंसान तैयार करना. इस पर पूरी दुनिया में बैन है. थेराप्यूटिक क्लोनिंग (Therapeutic Cloning) यानी बीमारियों के इलाज के लिए शरीर की कोशिकाएं बनाना. यूके और जापान जैसे देश कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज ढूंढने के लिए सख्त नियमों के तहत इसकी इजाज़त देते हैं।
अमेरिका में इसे लेकर कोई एक केंद्रीय कानून नहीं है, वहां अलग-अलग राज्यों के अपने नियम हैं. कुल मिलाकर कहें तो, एक जीता-जागता इंसानी क्लोन बनाना आज भी गैरकानूनी और नामुमकिन है.
पर्यटन स्थलों पर घूमने जाने वाले लोग अक्सर वहां की खास गतिविधियों का आनंद लेना पसंद करते हैं। रेगिस्तानी इलाकों में ऊंट की सवारी भी पर्यटकों के बीच काफी लोकप्रिय है। लेकिन कभी-कभी रोमांच के लिए शुरू की गई सवारी अचानक ऐसा अनुभव दे जाती है, जिसे भुलाना मुश्किल हो जाता है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में एक कपल के साथ कुछ ऐसा ही होता दिखाई दे रहा है।
ऊंट के उठते ही बिगड़ा संतुलन
वायरल वीडियो में एक कपल सजाए गए ऊंट पर बैठकर सवारी के लिए तैयार दिखाई देता है। दोनों आराम से बैठे होते हैं और इस पल का आनंद लेते नजर आते हैं। लेकिन जैसे ही ऊंट खड़ा होने के लिए आगे बढ़ता है, स्थिति अचानक बदल जाती है।
ऊंट के शरीर के पिछले हिस्से के उठने के साथ ही कपल का संतुलन बिगड़ जाता है। बताया जा रहा है कि पहले पुरुष सवार का पैर फिसला और वह रेत पर जा गिरा। इसके बाद पीछे बैठी महिला भी अपना संतुलन खो देती है और ऊंट से नीचे गिर जाती है।
अचानक हुए इस घटनाक्रम से आसपास मौजूद लोग भी सक्रिय हो जाते हैं और कपल की मदद के लिए आगे आते हैं। राहत की बात यह रही कि नीचे रेत होने के कारण किसी को गंभीर चोट लगने की जानकारी सामने नहीं आई।
सवारी बनी यादगार अनुभव
ऊंट की सवारी का यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इसे इंस्टाग्राम पर rajasthani_ravi5 नाम के पेज से शेयर किया गया है। वीडियो देखने के बाद यूजर्स कपल के साथ हुए इस अचानक घटनाक्रम पर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं।
कुछ लोगों ने मजाकिया अंदाज में कहा कि ऊंट का उस समय सवारी कराने का मूड ही नहीं था। वहीं कुछ यूजर्स ने इसे ‘फ्री रोलर कोस्टर’ जैसा अनुभव बताया।
हालांकि वीडियो मनोरंजक जरूर नजर आता है, लेकिन ऊंट की सवारी करते समय सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। ऊंट के अचानक उठने या बैठने पर सवार का संतुलन बिगड़ सकता है। इसलिए गाइड के निर्देशों का पालन करना और सवारी के दौरान ठीक से बैठना जरूरी है।