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  • तारे या गैलेक्सी… दोनों में फर्क कैसे पहचानें? डिफ्रैक्शन स्पाइक्स से दूर होगी उलझन.

    तारे या गैलेक्सी… दोनों में फर्क कैसे पहचानें? डिफ्रैक्शन स्पाइक्स से दूर होगी उलझन.

    तारे या गैलेक्सी... दोनों में फर्क कैसे पहचानें? डिफ्रैक्शन स्पाइक्स से दूर होगी उलझन

    अंतरिक्ष की गहराइयों में तारे और गैलेक्सी को देखकर अक्सर भ्रम हो जाता है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने सोशल मीडिया पर एक खास तस्वीर पोस्ट करते हुए इस उलझन का समाधान बताया है। नासा के हबल टेलीस्कोप ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “तारे या गैलेक्सी?”। हबल स्पेस टेलीस्कोप द्वारा ली गई इस तस्वीर में गैलेक्सियों के एक पूरे समूह को दिखाया गया है,

    लेकिन इसमें कुछ तारे भी नजर आ रहे हैं। इन दोनों को अलग-अलग पहचानने के आसान तरीके, यानी ‘डिफ्रैक्शन स्पाइक्स’, के बारे में भी नासा ने जानकारी दी। पोस्ट की गई तस्वीर एमएसीएस जे1141.6-1905 नामक गैलेक्सी क्लस्टर को दिखाती है। इसमें दिखाई देने वाला लगभग हर चमकीला बिंदु एक पूरी गैलेक्सी है, जिसमें लाखों या अरबों तारे मौजूद हैं। हालांकि, कुछ चमकते बिंदु हमारी आकाशगंगा के अपेक्षाकृत पास मौजूद तारे हैं।

    ऐसे में यह भ्रम होना स्वाभाविक है कि कौन-सा बिंदु तारा है और कौन-सी गैलेक्सी।नासा के अनुसार, जब किसी तारे या अन्य प्रकाश स्रोत की रोशनी हबल टेलीस्कोप के सेकेंडरी मिरर को सहारा देने वाले ढांचों के किनारों से गुजरती है, तो वह डिफ्रैक्ट होकर चारों ओर नुकीली किरणों या ‘स्पाइक्स’ का रूप ले लेती है।

    ये डिफ्रैक्शन स्पाइक्स किसी तारे की पहचान का प्रमुख संकेत होते हैं। गैलेक्सी में इतनी स्पष्ट और नुकीली किरणें दिखाई नहीं देतीं।तस्वीर के निचले दाहिने हिस्से में एक तारा साफ तौर पर डिफ्रैक्शन स्पाइक्स के साथ चमकता दिखाई दे रहा है। वहीं, बाईं ओर अलग-अलग आकार की सर्पिल और अंडाकार गैलेक्सियां फैली हुई हैं।एमएसीएस जे1141.6-1905 गैलेक्सी समूह ‘क्रेटर’ तारामंडल में स्थित है और पृथ्वी से लगभग 4 अरब प्रकाश वर्ष दूर है।

    हबल ने इसे दृश्य और इन्फ्रारेड, दोनों तरह की रोशनी में कैद किया है। वैज्ञानिकों ने इस क्लस्टर का अध्ययन गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग और एक्स-किरणों में चमकने वाली गैलेक्सिज को समझने के लिए किया है।हबल स्पेस टेलीस्कोप का आर्काइव आज 1.7 मिलियन से अधिक ऑब्जर्वेशन्स का खजाना बन चुका है। यह डेटा भविष्य के खगोलविदों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो रहा है। नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी ईएसए के सहयोग से तैयार की गई इस तस्वीर को हवाई विश्वविद्यालय के एच एबलिंग और नासा के जी कोबर ने प्रोसेस किया है।

  • विल्लुण्डी तीर्थम: समंदर के पास मीठे पानी का रहस्यमयी कुआं, मां सीता से जुड़ा है कनेक्शन.

    विल्लुण्डी तीर्थम: समंदर के पास मीठे पानी का रहस्यमयी कुआं, मां सीता से जुड़ा है कनेक्शन.

    विल्लुण्डी तीर्थम: समंदर के पास मीठे पानी का रहस्यमयी कुआं, मां सीता से जुड़ा है कनेक्शन

    धर्म और आस्था के केंद्र हमारे देश में कई प्राचीन, सिद्धपीठ और महाशक्ति पीठ मंदिर हैं, जहां भक्त अपनी श्रद्धानुसार जाते हैं। देश में मंदिर के साथ ही कुछ रहस्यमी चमत्कारी कुएं भी मौजूद हैं।

    कुछ कुओं को लेकर मान्यता है कि वे बड़ी से बड़ी बीमारी को ठीक करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन तमिलनाडु के रामेश्वरम में ऐसा कुआं मौजूद है, जहां आज भी माता सीता के होने के प्रमाण मिलते हैं। तमिलनाडु के रामेश्वरम में विल्लुण्डी तीर्थम नाम का स्थल है, जहां भगवान श्रीराम और माता सीता का आगमन हुआ था।

    माना जाता है कि भगवान श्रीराम जब माता सीता को रावण की कैद से मुक्त करके वापस अयोध्या आ रहे थे, तब इसी स्थान पर माता सीता को प्यास लगी थी और भगवान श्रीराम ने बाण के प्रहार से पानी का झरना बनाया था। खास बात ये है कि ये स्त्रोत मीठे पानी का है और इसके पास खारे पानी का समंदर है।

    कोई नहीं जानता है कि समंदर के पास कुएं में मीठा पानी कहां से आया। भक्तों का मानना है कि ये भगवान श्रीराम का चमत्कार है और इस मीठे जल से शारीरिक रोगों का नाश होता है। भक्त कुएं का जल अपने साथ भी लेकर जाते हैं।इस स्थान को विल्लुण्डी तीर्थम इसलिए कहा गया क्योंकि तमिल भाषा में ‘बाण से बने छेद’ को ‘विल्लुण्डी’ कहते हैं और तीर्थम का अर्थ है ‘पवित्र स्थान’।

    ये कुआं इसलिए भी खास है क्योंकि ये रामेश्वरम के 64 पवित्र कुओं में से एक है। कुएं से पहले भगवान शिव का प्राचीन मंदिर त्रयम्बकेश्वर भी है। भगवान शिव छोटे से मंदिर में शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। कुएं के दर्शन करने से पहले भक्त भगवान शिव की अराधना करते हैं।माना जाता है कि त्रयम्बकेश्वर मंदिर की स्थापना भी माता सीता और भगवान श्रीराम ने मिलकर की थी।

    भक्त जोड़े में त्रयम्बकेश्वर महादेव की पूजा करने के लिए आते हैं।विल्लुंडी तीर्थम के पास कई और तीर्थ स्थल मौजूद हैं, जिनके दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर से कुछ किलोमीटर दूर ही पंचमुखी हनुमानजी, अग्नि तीर्थम, धनुषकोडी और अरुलमिगु रामनाथस्वामी मंदिर भी मौजूद हैं। ये सभी मंदिर रामेश्वरम के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक हैं।

  • घर के ईशान कोण में रखी 4 चीजें बना सकती हैं आपको अमीर, भाग्य का भी मिलता है साथ

    घर के ईशान कोण में रखी 4 चीजें बना सकती हैं आपको अमीर, भाग्य का भी मिलता है साथ

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    वास्तु शास्त्र की मानें तो घर का हर कोना हमारे जीवन पर प्रभाव डालता है। इसलिए वास्तु के नियमों का पालन करके हम अगर सही दिशा में सही वस्तुएं रखते हैं तो जीवन में सकारात्मकता बनी रहती है। ऐसे में आज हम आपको बताने वाले हैं कि ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में क्या चीजें रखने से आपके घर में सुख-शांति आती है, आर्थिक लाभ मिलता है और भाग्य का भी आपको साथ मिलने लगता है।

    ईशान कोण में रखें ये चीजें

    • ईशान कोण के देवता भगवान शिव हैं वहीं देवगुरु बृहस्पति को इस दिशा का स्वामी ग्रह माना जाता है। ऐसे में अगर आप ईशान कोण में गुरु यंत्र या फिर भगवान शिव की प्रतिमा रखते हैं तो घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। ऐसा करने से आपको करियर और आर्थिक पक्ष में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते है। गुरु ग्रह को संपन्नता का कारक माना जाता है ऐसे में अगर आप गुरु यंत्र ईशान कोण में स्थापित करते हैं तो आपकी तिजोरी पैसों से भर सकती है।
    • ईशान कोण में शंख रखना भी अच्छा माना गया है। भगवान विष्णु के प्रतीक शंख को अगर आप ईशान कोण में रखते हैं तो आपको सुख-समृद्धि की प्राप्ति हो सकती है। हालांकि इस दिशा में रखे शंख की आपको पूजा करनी चाहिए और इसे घर के लोगों के अलावा किसी और को नहीं छूने देने चाहिए। इस शंख का इस्तेमाल बजाने के लिए आपको नहीं करना चाहिए।
    • कलश को भी आप घर के ईशान कोण में रख सकते हैं। कलश को दैवीय शक्तियों का आह्वान करने का स्रोत माना जाता है। ऐसे में अगर आप घर के ईशान कोण में कलश रखते हैं तो देवी-देवताओं की कृपा आप पर बनी रहती है। इसके साथ ही वास्तु से संबंधित दोष भी दूर होते हैं। ईशान कोण में कलश रखने से आरोग्य की आपको प्राप्ति होती है और साथ ही आर्थिक रूप से भी आप संपन्न होते हैं।
    • घर के ईशान कोण में आपको श्रीफल रखने से भी बेहद शुभ फल मिल सकते हैं। श्रीफल को माता लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है ऐसे में अगर आप ईशान कोण में श्रीफल रखते हैं तो धन-धान्य की आपके जीवन में कोई कमी नहीं रहती। श्रीफल के प्रभाव से घर में मौजूद नकारात्मकता भी दूर होने लगती है। श्रीफल रखने से घर का वातावरण भी पवित्र और सात्विक बना रहता है। अगर आप विस्तार से जानना चाहते हैं कि ईशान कोण को शुभ क्यों माना जाता है और इस दिशा में पूजा करना लाभकारी क्यों है तो हमारी वेबसाइट पर विस्तार से पढ़ सकते हैं।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • भारत का अनोखा गांव: न बिजली, न मोबाइल, साबुन भी नहीं करते इस्तेमाल; ब्रह्म मुहूर्त में जागता है पूरा ग्राम.

    भारत का अनोखा गांव: न बिजली, न मोबाइल, साबुन भी नहीं करते इस्तेमाल; ब्रह्म मुहूर्त में जागता है पूरा ग्राम.

    श्रीकाकुलम: आज के दौर में मोबाइल फोन, इंटरनेट और बिजली के बिना जीवन की कल्पना करना भी मुश्किल लगता है। लेकिन आंध्र प्रदेश में एक ऐसा गांव होने का दावा किया जाता है, जहां लोग आधुनिक सुविधाओं से दूरी बनाकर बेहद पारंपरिक तरीके से जीवन जीते हैं। इस गांव का नाम कुर्मा ग्रामम बताया जाता है, जो श्रीकाकुलम जिले की एंथकापल्ली पहाड़ियों के बीच स्थित है।

    सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट और वीडियो के मुताबिक, यहां रहने वाले लोग प्रकृति के करीब रहना पसंद करते हैं और आधुनिक जीवनशैली से दूरी बनाए हुए हैं। गांव की जीवनशैली इन दिनों सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रही है।

    सिर्फ 17 परिवारों का गांव

    वायरल जानकारी के अनुसार, कुर्मा ग्रामम करीब 60 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और यहां सिर्फ 17 परिवार रहते हैं। गांव देखने में भले ही सामान्य ग्रामीण इलाके जैसा लगे, लेकिन यहां की जीवनशैली इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है।

    दावे के मुताबिक, गांव में न बिजली की सुविधा है और न ही लोग स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं। शाम के समय रोशनी के लिए पारंपरिक दीयों का इस्तेमाल किया जाता है।

    मिट्टी और लकड़ी से बने हैं घर

    इस गांव में घरों का निर्माण भी पारंपरिक तरीके से किए जाने की बात कही गई है। वायरल पोस्ट के मुताबिक, यहां मकान सीमेंट और लोहे के ढांचे के बजाय मिट्टी, चूना, लकड़ी और पत्थरों से बनाए जाते हैं।

    घरों के फर्श पर गोबर से लिपाई करने की परंपरा भी बताई गई है। खाना पकाने के लिए गैस सिलेंडर के बजाय लकड़ी से जलने वाले मिट्टी के चूल्हों का इस्तेमाल किया जाता है।

    साबुन की जगह रीठा और प्राकृतिक चीजें

    कुर्मा ग्रामम की सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात को लेकर हो रही है, वह है यहां साबुन का इस्तेमाल न करना। सोशल मीडिया पर साझा जानकारी के अनुसार, ग्रामीण साबुन की जगह रीठा और दूसरी प्राकृतिक वस्तुओं का इस्तेमाल करते हैं।

    यह जीवनशैली आधुनिक सुविधाओं से दूर और प्रकृति आधारित जीवन को दर्शाने के तौर पर पेश की जा रही है।

    सुबह साढ़े तीन बजे जागता है पूरा गांव

    वायरल पोस्ट में गांव की दिनचर्या का भी जिक्र है। इसके मुताबिक, सुबह करीब 3:30 बजे गांव के लोग जाग जाते हैं। इसके बाद ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके सभी लोग एक स्थान पर एकत्र होते हैं।

    दीयों की हल्की रोशनी के बीच भजन और ध्यान किया जाता है। बताया जाता है कि गांव में बच्चों की पढ़ाई भी पारंपरिक तरीके से होती है।

    बच्चों को गुरुकुल में पढ़ाने का दावा

    सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, गांव में आधुनिक कॉन्वेंट स्कूल की जगह बच्चों को गुरुकुल पद्धति से शिक्षा दी जाती है। यहां वेद, रामायण और भगवद्गीता के साथ-साथ अंग्रेजी और गणित की बुनियादी शिक्षा दिए जाने का दावा किया गया है।

    वायरल जानकारी में यह भी कहा गया है कि इस पहल की शुरुआत 2018 में हुई थी। इसका उद्देश्य लोगों को प्रकृति के करीब रखते हुए अपेक्षाकृत शांत और तनावमुक्त जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना बताया गया है।

    आधुनिक दौर में पारंपरिक जीवन चर्चा में

    मोबाइल और इंटरनेट के दौर में कुर्मा ग्रामम की यह कथित जीवनशैली लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन गई है। हालांकि, गांव से जुड़ी कई जानकारियां सोशल मीडिया पोस्ट और वायरल वीडियो के जरिए सामने आई हैं, इसलिए इनके हर दावे की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

    फिर भी, प्रकृति के करीब रहने, पारंपरिक घरों में रहने और गुरुकुल आधारित शिक्षा जैसे पहलुओं ने इस गांव को सोशल मीडिया पर खासा चर्चा में ला दिया है।

     

     

     

     

     

  • जापान में 1,800 लोगों ने रस्सियों से खींचकर 360 टन का किला फिर अपनी जगह पहुंचाया.

    जापान में 1,800 लोगों ने रस्सियों से खींचकर 360 टन का किला फिर अपनी जगह पहुंचाया.

    जापान में 1,800 लोगों ने रस्सियों से खींचकर 360 टन का किला फिर अपनी जगह पहुंचाया

    टोक्यो । जापान में 400 साल पुराने ऐतिहासिक हिरोसाकी कैसल (किले) को उसकी पुरानी जगह पर वापस पहुंचाने के लिए करीब 1,800 लोगों ने रस्सियों के सहारे 360 टन वजनी किले के मुख्य टावर को खींचा। यह अनोखी कवायद देश के आओमोरी प्रांत में सप्ताहांत के दौरान हुई और इसमें पारंपरिक जापानी तकनीक का इस्तेमाल किया गया। प्रतिभागियों ने 30 मीटर लंबी रस्सियों को खींचते हुए किले के टावर को रेल जैसी पटरी पर आगे बढ़ाया। शनिवार को टावर को 1.13 मीटर और रविवार को 1.09 मीटर, यानी कुल 2.22 मीटर आगे खिसकाया गया।

    लोगों की टीमें बारी-बारी से रस्सियां खींचती रहीं और पूरे अभियान के दौरान उत्साह बढ़ाने के लिए जापानी नारे लगाए गए। जापानी न्यूज एजेंसी क्योडो के अनुसार, इस अभियान के लिए लोगों में जबरदस्त उत्साह देखा गया। आयोजकों को 1,800 स्थानों के लिए करीब 8,000 आवेदन मिले, यानी उपलब्ध अवसरों से लगभग चार गुना ज्यादा। प्रतिभागी सिर्फ हिरोसाकी शहर से ही नहीं, बल्कि जापान के दूसरे हिस्सों और विदेशों से भी पहुंचे।किले को खींचने के लिए ‘हिकिया’ नाम की पारंपरिक तकनीक अपनाई गई।

    इसमें किसी ऐतिहासिक इमारत को तोड़ने के बजाय उसे रोलर्स और रेल की मदद से धीरे-धीरे दूसरी जगह ले जाया जाता है। हिरोसाकी कैसल के अधिकारियों के मुताबिक, यह तकनीक प्राचीन जापान में इस्तेमाल होती रही है और करीब एक सदी बाद पहली बार किसी किले को इस तरह स्थानांतरित करने में इसका इस्तेमाल किया गया।

    हिरोसाकी कैसल की पत्थर की दीवार को भूकंप से नुकसान पहुंचा था। इसकी मरम्मत के लिए 2015 में करीब 360 टन वजनी मुख्य टावर को उसकी मूल जगह से हटाकर लगभग 80 मीटर दूर ले जाया गया था। दीवार की मरम्मत दिसंबर 2024 में पूरी हुई और उसके 2,185 पत्थरों को उनकी मूल स्थिति में दोबारा लगाया गया।अब टावर को वापस लाने का काम चल रहा है। अगस्त के अंत तक करीब 4,100 लोगों की मदद से इसे हाथों से कुल पांच मीटर तक खींचने की योजना है।

    इसके बाद बाकी करीब 73 मीटर की दूरी मशीनों की मदद से तय की जाएगी और पूरे साल के अंत तक टावर को उसकी मूल जगह पर वापस पहुंचाने का लक्ष्य है।हिरोसाकी कैसल का निर्माण 1611 में हुआ था। मौजूदा मुख्य टावर 1810 में बनाया गया था। यह जापान में बचे केवल 12 ऐतिहासिक किला-टावरों में शामिल है और उत्तर-पूर्वी तोहोकू क्षेत्र में ऐसा एकमात्र टावर है।मरम्मत पूरी होने के बाद भी पर्यटकों को इसे देखने के लिए इंतजार करना होगा। संरक्षण कार्य के कारण किले के मुख्य टावर को 2033 तक पर्यटकों के लिए फिर से खोलने की उम्मीद है।

  • जगन्नाथ पुरी मंदिर के चार द्वार, जिसमें छिपा है मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का रहस्य.

    जगन्नाथ पुरी मंदिर के चार द्वार, जिसमें छिपा है मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का रहस्य.

    जगन्नाथ पुरी मंदिर के चार द्वार, जिसमें छिपा है मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का रहस्य

    पुरी, । ओडिशा का जगन्नाथ पुरी मंदिर भक्ति और भव्यता की एक अनोखी मिसाल है। जगन्नाथ जी को कलियुग का भगवान कहा जाता है और उनके मंदिर से जुड़ी बहुत सी रहस्यमयी और अद्भुत बातें हैं जो हर किसी को हैरान कर देती हैं।

    मंदिर के चारों द्वारों को लेकर भी कुछ अनोखी मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जगन्नाथ पुरी मंदिर के चारों द्वार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलियुग को दर्शाते हैं। सबसे पहले बात करते हैं पूर्व दिशा के द्वार की, जिसे सिंह द्वार कहा जाता है।

    यह मंदिर का मुख्य द्वार है और इसे मोक्ष का प्रतीक माना गया है। जब कोई भक्त इस द्वार से मंदिर में प्रवेश करता है, तो ऐसा कहा जाता है कि उसकी आत्मा पवित्र हो जाती है। इसी द्वार के सामने प्रसिद्ध अरुण स्तंभ स्थित है, जिस पर भगवान सूर्य के सारथी अरुण देव की मूर्ति है। मान्यता है कि इस स्तंभ को देखने मात्र से ही शुभ फल प्राप्त होते हैं।

    अब आते हैं दक्षिण दिशा के द्वार पर, जिसे अश्व द्वार या विजय द्वार कहा जाता है। प्राचीन काल में जब राजा या योद्धा युद्ध के लिए जाते थे, तो वे इसी द्वार से होकर मंदिर में प्रवेश करते थे और भगवान जगन्नाथ से विजय की कामना करते थे। इसीलिए इसे विजय का प्रतीक माना गया है। यह द्वार शक्ति, साहस और सफलता का प्रतीक है।

    तीसरा द्वार है पश्चिम दिशा में स्थित हस्ति द्वार, यानी हाथी द्वार। यह द्वार समृद्धि और सुख का प्रतीक है। इस द्वार पर भगवान गणेश की मूर्ति विराजमान है, जो विघ्नहर्ता और समृद्धि के देवता माने जाते हैं। भक्त मानते हैं कि इस द्वार से प्रवेश करने पर जीवन में धन, ज्ञान और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।अंत में आता है उत्तर दिशा का व्याघ्र द्वार, जिसे बाघ द्वार भी कहा जाता है।

    यह द्वार धर्म और संरक्षण का प्रतीक है। इसे भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित माना जाता है, जो अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक हैं। यह द्वार हमें सिखाता है कि धर्म की रक्षा करना ही सच्चे जीवन का उद्देश्य है।इन चारों द्वारों के माध्यम से जगन्नाथ मंदिर जीवन के चार सिद्धांतों मोक्ष, विजय, समृद्धि और धर्म का संदेश भी देता है। यही कारण है कि जगन्नाथ मंदिर केवल एक तीर्थस्थान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन का प्रतीक माना जाता है।

  • 2000 फीट नीचे मिला सदियों पुराना जहाज, अंदर का नजारा देखकर वैज्ञानिक भी हैरान..

    2000 फीट नीचे मिला सदियों पुराना जहाज, अंदर का नजारा देखकर वैज्ञानिक भी हैरान..

    2000 फीट नीचे मिला सदियों पुराना जहाज, अंदर का नजारा देखकर वैज्ञानिक भी हैरान

    समंदर की गहराई में छिपा इतिहास का एक बड़ा राज अब सामने आया है. नॉर्वे के पास समंदर में करीब 2000 फीट नीचे 275 साल पुराना एक जहाज मिला है. इतने लंबे समय तक पानी के अंदर रहने के बाद भी जहाज के अंदर रखा सामान काफी हद तक सुरक्षित है. इस खोज ने वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को हैरान कर दिया है. दरअसल इस जहाज को एक रोबोट वाली छोटी पनडुब्बी की मदद से खोजा गया. इस पनडुब्बी को समंदर की गहराई में भेजकर जहाज की तस्वीरें और वीडियो लिए गए. जब शोधकर्ताओं ने इन तस्वीरों को देखा तो उन्हें यकीन नहीं हुआ कि इतने पुराने जहाज में सामान अभी भी अपनी जगह पर रखा हुआ है.

    जहाज के अंदर मिली कीमती चीजें

    जहाज के अंदर बड़ी संख्या में चीनी मिट्टी के बर्तन मिले हैं. ये बर्तन उस समय की याद दिलाते हैं जब ऐसे सामान को बहुत कीमती माना जाता था. इसके अलावा जहाज में सजावट से जुड़ी चीजें, कांच के गिलास, बोतलें और अनाज रखने वाले बैरल भी मिले हैं. तस्वीरों में कई प्लेटें और बर्तन ऐसे दिखाई दे रहे हैं जैसे वे जहाज के डूबने के समय ही रखे गए थे. शोधकर्ताओं को जहाज में कुछ ऐसे बंद डिब्बे भी मिले हैं, जिन्हें अभी तक खोला नहीं गया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इन डिब्बों में कपड़े, चाय, जड़ी-बूटियां या उस समय इस्तेमाल होने वाली दूसरी चीजें हो सकती हैं. इन डिब्बों की जांच के बाद उस दौर के लोगों की जिंदगी और व्यापार के बारे में नई जानकारी मिल सकती है.

    पता नहीं कहां खत्म हुआ जहाज का आखिरी सफर

    अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि यह जहाज कहां से चला था और इसका आखिरी सफर कहां खत्म हुआ. हालांकि जहाज पर मिले कुछ संकेतों से पता चलता है कि इसका संबंध यूरोप के पुराने व्यापारिक रास्तों से हो सकता है. जानकारों के मुताबिक 18वीं सदी में चीनी मिट्टी के बर्तन यूरोप में काफी लोकप्रिय थे और इन्हें दूर-दूर तक पहुंचाया जाता था. यही वजह है कि यह जहाज उस समय के व्यापार और समुद्री यात्रा की एक खास तस्वीर दिखा सकता है. अधिकारियों का कहना है कि इस जहाज की असली कीमत इसमें मिले सामान से ज्यादा इसके इतिहास में है. यह खोज आने वाले समय में समुद्र के अंदर छिपे पुराने राजों को समझने में मदद कर सकती है.

  • घर में अपनाएं ये उपाय, बढ़ेगी सेहत और सुख-समृद्धि, जानिए वास्तु शास्त्र के 6 आसान नियम..

    घर में अपनाएं ये उपाय, बढ़ेगी सेहत और सुख-समृद्धि, जानिए वास्तु शास्त्र के 6 आसान नियम..

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    वास्तु शास्त्र का सीधा संबंध सिर्फ घर की बनावट से ही नहीं, बल्कि परिवार की सेहत, मानसिक शांति और जीवन में सुख-समृद्धि से भी माना जाता है। अगर घर में वास्तु नियमों का सही तरीके से पालन किया जाए, तो नकारात्मक ऊर्जा कम होती है और सकारात्मक माहौल बढ़ता है, जिससे स्वास्थ्य और खुशहाली पर अच्छा असर पड़ता है।

    उत्तर-पूर्व दिशा:

    वास्तु शास्त्र के अनुसार घर की उत्तर-पूर्व दिशा को हमेशा हल्का और स्वच्छ रखना चाहिए। यहां भारी सामान या गंदगी नहीं होनी चाहिए। इस दिशा में जल से जुड़ी चीजें जैसे कलश या एक्वेरियम रखना शुभ माना जाता है, जिससे मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।

    औषधीय पौधे:

    तुलसी, एलोवेरा, मनी प्लांट और स्नेक प्लांट जैसे पौधे घर में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाते हैं। तुलसी का पौधा विशेष रूप से उत्तर-पूर्व दिशा में लगाना सबसे शुभ माना जाता है और यह वातावरण को भी शुद्ध करता है।

    इस दिशा में हो रसोई:

    स्वास्थ्य और ऊर्जा के लिए किचन का सही स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। वास्तु में रसोई को दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना श्रेष्ठ माना गया है। खाना बनाते समय गैस चूल्हे का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहता है।

    सोने की सही दिशा:

    अच्छी नींद और बेहतर स्वास्थ्य के लिए सोने की दिशा का ध्यान रखना जरूरी है। सिर को दक्षिण या पूर्व दिशा में रखकर सोना शुभ माना जाता है, जबकि उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोने से बचना चाहिए क्योंकि इससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ सकता है।

    बाथरूम की दिशा:

    वास्तु के अनुसार बाथरूम के लिए दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा बेहतर मानी जाती है। गलत दिशा में बना शौचालय नकारात्मक ऊर्जा बढ़ा सकता है। ऐसे में नमक और कपूर जैसे उपायों से दोष को कम करने की सलाह दी जाती है।

    दक्षिण-पश्चिम कोना:

    घर का दक्षिण-पश्चिम कोना स्थिरता का प्रतीक होता है। इस स्थान पर भारी फर्नीचर या अलमारी रखना शुभ माना जाता है, जिससे परिवार की स्थिरता और स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ता है।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • इंसानों का पेशाब भी पिघला रहा ग्लेशियर! हर साल हजारों लीटर से बढ़ रहा असर, वैज्ञानिकों की स्टडी में बड़ा खुलासा.

    इंसानों का पेशाब भी पिघला रहा ग्लेशियर! हर साल हजारों लीटर से बढ़ रहा असर, वैज्ञानिकों की स्टडी में बड़ा खुलासा.

    ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया भर में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। इसी बीच नेपाल और अमेरिका के वैज्ञानिकों की एक स्टडी ने माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर को लेकर एक ऐसा पहलू सामने रखा है, जिसने लोगों का ध्यान खींच लिया है। शोधकर्ताओं ने पाया कि एवरेस्ट के बेस कैंप पर पर्वतारोहियों की बड़ी संख्या और वहां होने वाली मानवीय गतिविधियों का ग्लेशियर पर असर पड़ रहा है।

    यह अध्ययन Regional Environmental Change Journal में प्रकाशित हुआ है। इसमें एवरेस्ट के खुम्बु ग्लेशियर और उसके आसपास बढ़ती गर्मी के अलग-अलग स्रोतों का अध्ययन किया गया है।

    एवरेस्ट बेस कैंप पर हर दिन हजारों लीटर पेशाब

    माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान ऊंचाई और ठंड के कारण पर्वतारोहियों की जीवनशैली काफी अलग होती है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2023 के क्लाइंबिंग सीजन में बेस कैंप क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 6,766 लीटर पेशाब जमा होने का अनुमान लगाया गया।

    एवरेस्ट बेस कैंप खुम्बु ग्लेशियर के ऊपर स्थित है। यहां चढ़ाई के मौसम में बड़ी संख्या में पर्वतारोही और स्टाफ मौजूद रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान करीब 1,600 टेंट लगाए जाते हैं, जिनमें किचन, शॉवर, जनरेटर और अन्य सुविधाएं भी होती हैं।

    क्या सच में पेशाब की गर्मी से पिघल रही है बर्फ?

    इस दावे को समझना जरूरी है। इंसानी शरीर से निकलने वाले पेशाब का तापमान करीब 37 डिग्री सेल्सियस हो सकता है, लेकिन बाहर निकलने के बाद वह तेजी से ठंडा होने लगता है। इसलिए ऐसा नहीं है कि पेशाब की गर्मी सीधे भारी मात्रा में ग्लेशियर को पिघला रही है।

    शोधकर्ताओं ने यह आकलन किया कि इस गर्मी का कितना हिस्सा वास्तव में बर्फ तक पहुंचता है। अध्ययन के मुताबिक, गर्मी का बहुत छोटा हिस्सा ही ग्लेशियर की बर्फ को प्रभावित करता है, जबकि काफी ऊर्जा आसपास की हवा और चट्टानों में चली जाती है।

    शोध में यह भी अनुमान लगाया गया कि एक क्लाइंबिंग सीजन के दौरान करीब 154 टन बर्फ पिघलने की स्थिति बन सकती है। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार इंसानी पेशाब ग्लेशियर के पिघलने की सबसे बड़ी वजह नहीं है।

    असली चिंता बढ़ता तापमान

    वैज्ञानिकों की चिंता का मुख्य कारण हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ता तापमान है। अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 2000 के बाद हिमालय में बर्फ पिघलने की रफ्तार पहले की तुलना में काफी बढ़ी है।

    बेस कैंप की सतह का तापमान खुम्बु ग्लेशियर के अन्य हिस्सों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। शोध के अनुसार, यहां तापमान में करीब 0.28 डिग्री सेल्सियस प्रति वर्ष की वृद्धि दर्ज की जा रही है।

    ग्लेशियरों के लिए बढ़ता मानवीय दबाव भी चिंता का विषय

    एवरेस्ट पर हर साल बड़ी संख्या में पर्वतारोही पहुंचते हैं। उनके लिए बनाए गए कैंप, खाना पकाने की व्यवस्था, जनरेटर और अन्य गतिविधियों से निकलने वाली गर्मी स्थानीय वातावरण को प्रभावित करती है।

    ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के साथ-साथ स्थानीय मानवीय गतिविधियों के प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि, ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के पीछे व्यापक स्तर पर बढ़ता तापमान और जलवायु परिवर्तन कहीं अधिक महत्वपूर्ण कारक हैं।

    इस अध्ययन ने यह जरूर दिखाया है कि दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर बढ़ती मानवीय मौजूदगी का असर सिर्फ कचरे या प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां के बेहद संवेदनशील हिमनद पर्यावरण पर भी पड़ सकता है।

  • अफसरों को सीक्रेट पार्टियों में बुलाता था, फिर शुरू होता था ब्लैकमेल का खेल; भारतीय मूल के फाइनेंसर पर 954 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप.

    अफसरों को सीक्रेट पार्टियों में बुलाता था, फिर शुरू होता था ब्लैकमेल का खेल; भारतीय मूल के फाइनेंसर पर 954 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी का आरोप.

    अमेरिका में भारतीय मूल के एक फाइनेंसर पर करोड़ों डॉलर की बैंक धोखाधड़ी, ब्लैकमेलिंग और धमकाने के गंभीर आरोप लगे थे। आरोप था कि उसने बैंक से जुड़े लोगों को अपने प्रभाव में लेने के लिए सीक्रेट पार्टियों का आयोजन किया था और बाद में उन्हीं पार्टियों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया था।

    मामला उस समय सामने आया था, जब करीब 100 मिलियन डॉलर यानी लगभग 954 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले की जांच शुरू हुई थी। जांच के दौरान कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों, शेल कंपनियों और संपत्तियों से जुड़े रिकॉर्ड में हेरफेर की परतें खुलती चली गई थीं।

    लोन के नाम पर तैयार किया गया था पूरा जाल

    मामले के मुताबिक, फाइनेंसर की कंपनी को रियल एस्टेट से जुड़े लोन खरीदने और उन्हें जारी करने के लिए बैंक की ओर से बड़ी रकम उपलब्ध कराई गई थी। इस रकम को लोन से होने वाली कमाई के जरिए वापस किया जाना था।

    आरोप था कि इस पूरी व्यवस्था के तहत फर्जी कंपनियों का नेटवर्क तैयार किया गया था। संपत्तियों से जुड़े टाइटल इंश्योरेंस रिकॉर्ड में कथित तौर पर हेरफेर किया गया था, ताकि ऐसा लगे कि संबंधित संपत्तियों पर उसकी कंपनी का पहला अधिकार था।

    इसके बाद ये दस्तावेज बैंक तक पहुंचाए गए थे। जांच एजेंसियों के मुताबिक, बैंक अधिकारियों के साथ बातचीत के दौरान भी कथित तौर पर गलत जानकारियां दी जाती रही थीं।

    सीक्रेट पार्टियों में बुलाए जाते थे लोग

    इस मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू कथित ब्लैकमेलिंग का तरीका था। अदालत से जुड़े दस्तावेजों में आरोप लगाया गया था कि फाइनेंसर निजी पार्टियों का आयोजन करता था, जहां ड्रग्स और सेक्स वर्कर्स भी मौजूद रहते थे।

    आरोप था कि इन पार्टियों में बैंक से जुड़े कुछ कर्मचारी भी शामिल हुए थे। बाद में पार्टी में हुई गतिविधियों से जुड़ी जानकारी का इस्तेमाल उन्हें दबाव में रखने और अपने पक्ष में काम कराने के लिए किया जाता था।

    यानी जिस पार्टी को मौज-मस्ती का जरिया समझा जाता था, आरोपों के मुताबिक वही बाद में ब्लैकमेल का हथियार बन जाती थी।

    कर्मचारियों को भी दी जाती थीं धमकियां

    जांच में फाइनेंसर के काम करने के तरीके को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए थे। बताया गया था कि विरोध करने वाले कर्मचारियों और कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों को डराने के लिए धमकियों का सहारा लिया जाता था।

    आरोपों के मुताबिक, कर्मचारियों को जान से मारने और उनके परिवार को बर्बाद करने तक की धमकियां दी गई थीं। इतना ही नहीं, कुछ संपत्तियों पर कब्जे के लिए हथियारबंद लोगों का इस्तेमाल किए जाने का भी आरोप लगा था।

    कारोबारी विवाद में भी आया था नाम

    मामले के दौरान एक बड़े रियल एस्टेट विवाद में भी उसका नाम सामने आया था। एक मध्यस्थ ने कारोबारी विवाद में उसे भारी आर्थिक नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया था। इस विवाद में नुकसान की रकम करीब 1.3 बिलियन डॉलर यानी 12 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई थी।

    आरोपों के मुताबिक, कारोबारी प्रतिद्वंद्वियों पर दबदबा बनाने के लिए डराने-धमकाने और हिंसा का सहारा लिया जाता था।

    आलीशान घर से हुई थी गिरफ्तारी

    मामले की जांच आगे बढ़ने के बाद भारतीय मूल के इस फाइनेंसर को अमेरिका में उसके आलीशान घर से गिरफ्तार किया गया था। वह अमेरिका में ग्रीन कार्ड पर रह रहा था।

    जांच एजेंसियों का आरोप था कि उसने निजी फायदे के लिए वित्तीय दस्तावेजों में कथित हेरफेर किया था और बैंकिंग व्यवस्था का गलत इस्तेमाल किया था। उस पर लगाए गए आरोप बेहद गंभीर थे और दोष सिद्ध होने पर उसे लंबी जेल की सजा का सामना करना पड़ सकता था।

    पूरे मामले ने इसलिए भी लोगों का ध्यान खींचा था, क्योंकि इसमें कथित बैंक धोखाधड़ी के साथ-साथ ब्लैकमेलिंग, निजी पार्टियों और धमकियों का ऐसा नेटवर्क सामने आया था, जिसने पूरे वित्तीय घोटाले को और सनसनीखेज बना दिया था।