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  • 14 सिंतबर को बुद्धि के दाता बुध होंगे उदय; कन्या, मकर, सिंह और वृश्चिक राशि वालों को करियर और कारोबार में तरक्की के योग.

    14 सिंतबर को बुद्धि के दाता बुध होंगे उदय; कन्या, मकर, सिंह और वृश्चिक राशि वालों को करियर और कारोबार में तरक्की के योग.

    14 सिंतबर को बुद्धि के दाता बुध होंगे उदय; कन्या, मकर, सिंह और वृश्चिक राशि वालों को करियर और कारोबार में तरक्की के योग.

    Budh Uday 2026: ज्योतिष शास्त्र में बुध ग्रह को बुद्धि, वाणी, तर्क, गणना, व्यापार और करियर का कारक माना जाता है। कुंडली में बुध की मजबूत स्थिति व्यक्ति को शिक्षा, कारोबार और नौकरी के क्षेत्र में बेहतर परिणाम दिला सकती है। सितंबर 2026 में बुध ग्रह से जुड़ा एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय परिवर्तन होने जा रहा है। पंचांग अनुसार 14 सितंबर 2026 को बुध देव अपनी उच्च राशि कन्या में उदय होंगे। बुध का उदय होना कई राशियों के लिए शुभ परिणाम लेकर आ सकता है।

    ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, बुध के उदय होने से उनकी सकारात्मक ऊर्जा अधिक प्रभावी हो सकती है। इसका असर विशेष रूप से नौकरी, व्यापार, आर्थिक फैसलों, संचार और नई योजनाओं पर देखने को मिल सकता है। आइए जानते हैं वे कौन-सी 4 राशियां हैं, जिन्हें बुध उदय से करियर और कारोबार में तरक्की के योग बन सकते हैं।

    14 सितंबर को कन्या राशि में उदय होंगे बुध

    फ्यूचर पंचांग के अनुसार 14 सितंबर 2026 को बुध ग्रह रात 2 बजकर 52 मिनट पर कन्या राशि में उदय होंगे। कन्या राशि बुध की स्वराशि होने के साथ-साथ उनकी उच्च राशि भी मानी जाती है। ऐसे में कन्या राशि में बुध का उदय ज्योतिष की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

    9 अक्टूबर को शनि करेंगे अपने स्वनक्षत्र उत्तराभाद्रपद में प्रवेश, कुंभ, तुला, वृष और मकर राशि वालों को आर्थिक उन्नति के योग

    कन्या राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Virgo Zodiac)

    कन्या राशि के जातकों के लिए बुध का उदय विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। करियर में नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं और कार्यक्षेत्र में आपकी समझदारी व निर्णय लेने की क्षमता की सराहना हो सकती है। नौकरीपेशा लोगों को तरक्की या बेहतर अवसर मिलने के योग बन सकते हैं। कारोबार से जुड़े जातकों को नए सौदे और लाभ के अवसर मिल सकते हैं।

    मकर राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Capricorn Zodiac)

    मकर राशि वालों के लिए बुध उदय आर्थिक और पेशेवर मोर्चे पर सकारात्मक बदलाव ला सकता है। लंबे समय से अटके काम गति पकड़ सकते हैं। नौकरी में प्रमोशन या नई जिम्मेदारी मिलने की संभावना बन सकती है। कारोबारियों को नए संपर्कों का लाभ मिल सकता है और व्यापार विस्तार की योजना आगे बढ़ सकती है।

    सिंह राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Leo Zodiac)

    सिंह राशि के जातकों के लिए बुध का उदय करियर में प्रगति के नए रास्ते खोल सकता है। आपकी बातचीत और नेतृत्व क्षमता का फायदा कार्यक्षेत्र में मिल सकता है। नई नौकरी की तलाश कर रहे लोगों को अच्छी खबर मिल सकती है। व्यापार करने वालों को नए क्लाइंट या लाभदायक डील मिल सकती है।

    वृश्चिक राशि पर बुध उदय का प्रभाव (Scorpio Zodiac)

    वृश्चिक राशि वालों के लिए भी बुध का उदय शुभ परिणाम देने वाला रह सकता है। कार्यक्षेत्र में आपकी मेहनत रंग ला सकती है और वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिल सकता है। कारोबार में नई रणनीति बनाने और उसे लागू करने का अच्छा समय मिल सकता है। आर्थिक स्थिति में भी धीरे-धीरे सुधार के संकेत बन सकते हैं।

    क्यों खास है बुध का कन्या राशि में उदय?

    ज्योतिष में बुध को कन्या राशि में उच्च का माना जाता है। ऐसे में कन्या राशि में बुध का उदय ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। बुध की मजबूत स्थिति का संबंध बुद्धि, विश्लेषण क्षमता, व्यापारिक समझ, वाणी और निर्णय क्षमता से जोड़ा जाता है। हालांकि किसी व्यक्ति के जीवन में इसका वास्तविक प्रभाव उसकी जन्मकुंडली में बुध की स्थिति और अन्य ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करता है।मेष राशि का वर्षफल 2026वृष राशि का वर्षफल 2026मिथुन राशि का वर्षफल 2026कर्क राशि का वर्षफल 2026सिंह राशि का वर्षफल 2026कन्या राशि का वर्षफल 2026तुला राशि का वर्षफल 2026वृश्चिक राशि का वर्षफल 2026धनु राशि का वर्षफल 2026मकर राशि का वर्षफल 2026कुंभ राशि का वर्षफल 2026मीन राशि का वर्षफल 2026

    डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी ज्योतिषीय गणनाओं और सामान्य मान्यताओं पर आधारित है। जनसत्ता इसकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी तरह के निर्णय पर पहुंचने से पहले संबंधित विषय के विशेषज्ञ से सलाह अवश्य लें।  एक राशि के नाम के करोड़ों जातक होते हैं। ऐसे में किसी भी तरह के परिणाम में पहुंचने से पहले अपनी कुंडली की जांच किसी शास्त्र के ज्ञाता, ज्योतिषी, पंडित को अवश्य दिखाएं।

  • सिर्फ 30 सेकंड में पूरा बरीटो चट कर गई ये महिला, हैरान कर देने वाला वीडियो वायरल.

    सिर्फ 30 सेकंड में पूरा बरीटो चट कर गई ये महिला, हैरान कर देने वाला वीडियो वायरल.

    सिर्फ 30 सेकंड में पूरा बरीटो चट कर गई ये महिला, हैरान कर देने वाला वीडियो वायरल.

    जब खाने की बात आती है, तो हम में से कई लोग शौकीन होते हैं, लेकिन ब्रिटेन की लिया शटकीवर (Leah Shutkever) ने जो कर दिखाया है, उस पर यकीन करना मुश्किल है. इस महिला ने अपनी तूफानी स्पीड से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है. सोशल मीडिया पर इन दिनों उनका एक नया वीडियो आग की तरह फैल रहा है, जिसमें वह महज कुछ ही पलों में खाने की एक बड़ी प्लेट साफ करती नजर आ रही हैं.

    सिर्फ 30.75 सेकंड में खत्म किया पूरा बरीटो

    स्पीड ईटिंग की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुकी लिया ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (Guinness World Records) के मुताबिक, उन्होंने मात्र 30.75 सेकंड में एक पूरा बरीटो खाकर (Fastest Time To Eat A Burrito) नया वर्ल्ड रिकॉर्ड अपने नाम कर लिया है. वीडियो में देखा जा सकता है कि जैसे ही टाइमर शुरू होता है, लिया बिना एक पल गंवाए बरीटो पर टूट पड़ती हैं और देखते ही देखते उसे पूरी तरह से खत्म कर देती हैं. उनका यह कारनामा देखकर वहां मौजूद जज भी दंग रह गए.

    लीया शटकीवर के नाम हैं कई अनोखे रिकॉर्ड

    फूड लवर्स के बीच लिया कोई नया नाम नहीं है. वह अपनी गजब की स्पीड ईटिंग स्किल्स के दम पर पहले भी कई अजीबोगरीब रिकॉर्ड अपने नाम कर चुकी हैं. उनकी इस अद्भुत क्षमता और खाने की रफ्तार की वजह से सोशल मीडिया पर उनकी फैन फॉलोइंग काफी तगड़ी है. इस नए रिकॉर्ड के बाद गिनीज की तरफ से उन्हें आधिकारिक सर्टिफिकेट भी सौंपा गया है, जिसकी तस्वीरें इंटरनेट पर छाई हुई हैं.

    इंटरनेट पर वीडियो देख चकराए लोगों के सिर

    यह वायरल वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स तरह-तरह के मजेदार रिएक्शन दे रहे हैं. कोई उनकी इस सुपरफास्ट स्पीड की तारीफ कर रहा है, तो कोई हैरानी जताते हुए लिख रहा है, इतनी जल्दी में तो हम ढंग से पानी भी नहीं पी पाते, इन्होंने पूरा बरीटो कैसे गटक लिया? यही वजह है कि यह वीडियो इंटरनेट पर सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बना हुआ है.

  • ‘मथुरा के कोतवाल’ का अद्भुत मंदिर, जहां बाल कृष्ण के दर्शन को कैलाश से आए थे महादेव, दर्शन से मिटता है कष्ट.

    ‘मथुरा के कोतवाल’ का अद्भुत मंदिर, जहां बाल कृष्ण के दर्शन को कैलाश से आए थे महादेव, दर्शन से मिटता है कष्ट.

    ‘मथुरा के कोतवाल’ का अद्भुत मंदिर, जहां बाल कृष्ण के दर्शन को कैलाश से आए थे महादेव, दर्शन से मिटता है कष्ट.

    श्रीकृष्ण व देवाधिदेव महादेव के बीच प्रगाढ़ प्रेम को दर्शाते देश-विदेश में कई देवालय हैं। इन मंदिरों में भक्ति के साथ शक्ति के अद्भुत मिलन के साथ ही भक्ति का बेहद सरल स्वरूप भी देखने को मिलता है। ऐसा ही दिव्य मंदिर उत्तर प्रदेश के श्रीकृष्ण नगरी मथुरा में है, जहां महादेव शहर के कोतवाल या रक्षक के रूप में विराजमान हैं।

    उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग मंदिर के बारे में जानकारी देने के साथ ही वहां के महत्व से भी अवगत कराता है। भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा केवल कृष्ण भक्ति का केंद्र नहीं है, बल्कि महादेव की अनन्य भक्ति का भी पावन साक्षी है। यहां स्थित प्राचीन श्री भूतेश्वर महादेव मंदिर सदियों पुरानी आस्था और अटूट विश्वास का प्रतीक है। पर्यटन विभाग इस शिवालय को मथुरा की यात्रा का अनिवार्य हिस्सा बताता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव मथुरा के क्षेत्रपाल (रक्षक) के रूप में विराजमान हैं। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीकृष्ण बाल स्वरूप में अवतरित हुए तो महादेव स्वयं कैलाश पर्वत से मथुरा पधारे थे। वे कृष्ण के बाल लीला के दर्शन करना चाहते थे।

    इसी कारण मथुरा की कोई भी यात्रा भूतेश्वर महादेव के दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है। मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जिसे केदारनाथ का उपलिंग भी माना जाता है। मथुरा की जन्मभूमि से मात्र 500 मीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर शहर को बुरी शक्तियों से बचाने वाला माना जाता है।

    शिवालय के बारे में प्रचलित मान्यता है कि भूतेश्वर महादेव यहां रहकर मथुरा और उसके निवासियों की रक्षा करते हैं, इसलिए इनका नाम भूतेश्वर या भूतों के स्वामी पड़ा। मंदिर की एक और रोचक कथा मथुरा की स्थापना से जुड़ी है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, श्री राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने मधु नामक राक्षस का वध किया और उसके बाद मथुरा शहर की स्थापना की। इसी ऐतिहासिक और पावन भूमि पर भूतेश्वर महादेव मंदिर हजारों वर्षों से मौजूद है। यह मथुरा का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है।

    स्थानीय लोग मानते हैं कि भूतेश्वर महादेव मंदिर शहर को नकारात्मक शक्तियों और बुरी नजर से बचाता है। यहां महादेव का जागृत स्वरूप और मनमोहक श्रृंगार भक्तों को असीम शांति और आत्मिक शक्ति प्रदान करता है। भक्तों का विश्वास है कि भूतेश्वर महादेव के दर्शन से मन की सारी चिंताएं दूर हो जाती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।भूतेश्वर महादेव मंदिर में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है। मंदिर प्रतिदिन शाम 4 बजे से रात 9:30 बजे तक खुला रहता है।

    मंदिर गर्रावकेंद्र के पास स्थित है। निकटतम बस स्टॉप शांति नगर स्थित मथुरा बस स्टॉप है, जो मंदिर से लगभग 1.5 किलोमीटर दूर है। बस स्टॉप से मंदिर पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता है। ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है। वहीं, रेलवे स्टेशन मथुरा जंक्शन है, जो मंदिर से मात्र 3 किलोमीटर दूर है। दिल्ली, आगरा, जयपुर, लखनऊ आदि शहरों से मथुरा जंक्शन पर ट्रेनें उपलब्ध हैं।

  • 4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’, 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल..

    4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’, 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल..

    4,000 मीटर की ऊंचाई पर खिलता है ‘हिमालयी हीरा’, 7 से 15 साल में सिर्फ एक बार आता है फूल..

    प्रकृति अपने अनोखे और दुर्लभ चमत्कारों से समय-समय पर लोगों को हैरान करती रहती है। इन दिनों सोशल मीडिया पर हिमालय के ऊंचे पहाड़ी इलाकों का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक बेहद दुर्लभ और विशालकाय फूल लोगों का ध्यान खींच रहा है। अपनी अनोखी बनावट और दुर्लभता के कारण इसे लोग ‘हिमालयी हीरा’ या ‘डायमंड फ्लावर’ कह रहे हैं।

    क्या है ‘हिमालयी हीरा’? सोशल मीडिया पर जिस पौधे को ‘डायमंड फ्लावर’ कहा जा रहा है, उसका वैज्ञानिक नाम रियम नोबाइल (Rheum nobile) है। स्थानीय क्षेत्रों में इसे पदमचाल या केन्जो के नाम से भी जाना जाता है। इसकी पारदर्शी और चमकदार संरचना इसे अन्य पौधों से बिल्कुल अलग बनाती है, यही वजह है कि इसे ‘हिमालयी हीरा’ की उपाधि मिली है।जीवन में सिर्फ एक बार खिलता है फूलइस पौधे की सबसे अनोखी विशेषता इसका जीवन चक्र है। जहां अधिकांश पौधे हर साल फूल देते हैं, वहीं रियम नोबाइल अपने पूरे जीवन में केवल एक बार ही फूल देता है। इस प्रक्रिया में करीब 7 से 15 साल का समय लग सकता है। फूल खिलने के बाद धीरे-धीरे पौधे का जीवन चक्र समाप्त होने लगता है।ऊंचाई में इंसान को भी दे सकता है टक्करयह दुर्लभ पौधा अपनी लंबाई के लिए भी जाना जाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 3.2 फीट से 6.5 फीट तक पहुंच सकती है। वायरल वीडियो में यह पौधा पहाड़ों के बीच इंसानों के बराबर या उनसे भी ऊंचा दिखाई देता है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है।

    13 हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर होता है विकसितरियम नोबाइल सामान्य स्थानों पर नहीं उगता। यह हिमालय के दुर्गम और ठंडे इलाकों में समुद्र तल से लगभग 4,000 मीटर (करीब 13,000 फीट) या उससे अधिक ऊंचाई पर पाया जाता है। कम ऑक्सीजन और बेहद कम तापमान जैसी कठिन परिस्थितियों में भी इसका विकसित होना प्रकृति का अद्भुत उदाहरण माना जाता है।वीडियो के बाद संरक्षण की उठी मांगसोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग इस दुर्लभ पौधे को छूते और तोड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसे लेकर पर्यावरण प्रेमियों और सोशल मीडिया यूजर्स ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि इतने दुर्लभ पौधों को नुकसान पहुंचाने के बजाय उनका संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी प्रकृति के इस अनमोल उपहार को देख सकें।

  • धरती पर नहीं, समुद्र के नीचे मिली नई दुनिया! वैज्ञानिकों की खोज से बढ़ा रोमांच.

    धरती पर नहीं, समुद्र के नीचे मिली नई दुनिया! वैज्ञानिकों की खोज से बढ़ा रोमांच.

    धरती पर नहीं, समुद्र के नीचे मिली नई दुनिया! वैज्ञानिकों की खोज से बढ़ा रोमांच.

    वैज्ञानिकों ने बताया कि इस क्षेत्र में जेलीफिश, ऑक्टोपस, केकड़े, मछलियां और कई अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए गए. वैज्ञानिकों ने यहां दुर्लभ ‘जायंट फैंटम जेलीफिश’ को भी देखा, जिसे दुनिया की सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश प्रजातियों में गिना जाता है.

    समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने ऐसी अद्भुत दुनिया खोजी है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है. हाल ही में दक्षिण अटलांटिक महासागर में एक रिसर्च अभियान के दौरान शोधकर्ताओं ने एक विशाल कोरल रीफ (मूंगा चट्टान) की खोज की है. यह रीफ लगभग वैटिकन सिटी के आकार जितना बड़ा बताया जा रहा है और समुद्री जीवों से भरा हुआ है. बताया गया कि वैज्ञानिक समुद्र के भीतर मौजूद ‘कोल्ड सीप्स’ यानी ऐसे स्थानों की तलाश कर रहे थे, जहां समुद्र की गहराई से गैस और खनिज निकलते हैं. लेकिन खोज के दौरान उन्हें विशाल और जीवंत कोरल साम्राज्य मिल गया. यह रीफ दुर्लभ प्रजाति के कोरल बैथेलिया कैंडिडा से बना है और इसे इस प्रजाति का अब तक का सबसे बड़ा रीफ माना जा रहा है.

    समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिकों ने क्या-क्या खोजा

    वैज्ञानिकों ने बताया कि इस क्षेत्र में जेलीफिश, ऑक्टोपस, केकड़े, मछलियां और कई अन्य समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए गए. वैज्ञानिकों ने यहां दुर्लभ ‘जायंट फैंटम जेलीफिश’ को भी देखा, जिसे दुनिया की सबसे कम दिखाई देने वाली जेलीफिश प्रजातियों में गिना जाता है. समुद्र की गहराई में रिकॉर्ड किए गए वीडियो में रंग-बिरंगे कोरल, समुद्री जीवों की हलचल और जीवन से भरा पूरा पारिस्थितिकी तंत्र साफ नजर आया. सबसे दिलचस्प बात यह है कि शोधकर्ताओं ने इस अभियान के दौरान 28 ऐसी प्रजातियां भी इकट्ठा की हैं, जिन्हें विज्ञान की दुनिया के लिए नई प्रजातियां माना जा रहा है. अगर आगे की जांच में इसकी पुष्टि होती है, तो यह समुद्री विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि होगी.

    क्या बोलो एक्सपर्ट्स

    मामले में एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसी खोजें समुद्री जीवों की विविधता समझने में मदद करती हैं. इससे यह भी पता चलता है कि समुद्र की गहराइयों में अभी भी बहुत कुछ ऐसा छिपा है, जिसके बारे में इंसानों को जानकारी नहीं है. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये खोज एक बार फिर साबित करती है कि पृथ्वी पर अभी भी कई रहस्य बाकी हैं और समुद्र की गहराइयों में ऐसी अनदेखी दुनियाएं मौजूद हैं, जो हर नई खोज के साथ हमें चौंका रही हैं.

  • रोटी बनाने के बाद भूलकर भी उल्टा न रखें तवा, ये छोटी सी आदत बन सकती है आर्थिक और शारीरिक कष्ट की वजह.

    रोटी बनाने के बाद भूलकर भी उल्टा न रखें तवा, ये छोटी सी आदत बन सकती है आर्थिक और शारीरिक कष्ट की वजह.

    रोटी बनाने के बाद भूलकर भी उल्टा न रखें तवा, ये छोटी सी आदत बन सकती है आर्थिक और शारीरिक कष्ट की वजह.

    माना जाता है कि रसोई और यहां रखी चीजों से जुड़े हर छोटे-बड़े नियमों का पालन सही से किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। ऐसे ही तवे को लेकर भी कुछ नियम बताए गए हैं। आपने अक्सर अपनी मम्मी या दादी-नानी से सुना होगा कि तवे को कभी उल्टा नहीं रखना चाहिए। कहते हैं कि तवे को उल्टा रखना शुभ नहीं होता और इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है। तो चलिए जानते हैं इस पर क्या कहता है वास्तु शास्त्र

    राहु ग्रह से है तवे का संबंध

    रोटी, परांठा, चीला, डोसा आदि बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला तवा केवल खाना बनाने का एक बर्तन नहीं। इसे वास्तु में विशेष महत्व दिया गया है। तवे का संबंध राहु ग्रह से माना जाता है। इसलिए इसे रखने का तरीका बहुत मायने रखता है। मान्यता है कि तवे को उल्टा रखने से घर की सुख-समृद्धि और माहौल पर बुरा असर पड़ सकता है।

    क्यों नहीं रखना चाहिए उल्टा तवा?

    वास्तु शास्त्र के अनुसार, तवे को कभी भी उल्टा करके नहीं रखना चाहिए। खासतौर पर रात में खाना बनाने के बाद इसे तुंरत साफ करके सीधा रखने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि आपकी इस एक छोटी सी आदत से घर में हमेशा पॉजिटिविटी बनी रहती है और नकारात्मक प्रभावों से बचाव होता है।

    आर्थिक परेशानी का संकेत

    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तवे को उल्टा रखने से घर की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है। इससे अनावश्यक खर्च बढ़ने और धन संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही परिवार की सुख-शांति पर भी असर पड़ने की बात कही जाती है।

    राहु दोष और तनाव

    वास्तु मान्यताओं के अनुसार, उल्टा तवा रखने से राहु दोष बढ़ सकता है। इसकी वजह से घर में विवाद, मानसिक तनाव और आपसी मतभेद बढ़ने की आशंका रहती है। कुछ जगहों पर इसे परिवार के मुखिया के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालने से भी जोड़ा जाता है।

    तवे से जुड़े वास्तु नियम

    तवे का उपयोग करने के बाद उसे अच्छी तरह साफ करके सुखा लें और हमेशा सीधा रखें। इसके अलावा तवे को ऐसी जगह रखने की सलाह दी जाती है, जहां बाहर से आने वाले व्यक्ति की सीधी नजर तवे पर न पड़े।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • राजस्थान में भगवान देव नारायण की आस्था से जुड़ा अनोखा गांव, जहां नहीं लगते घरों में ताले..

    राजस्थान में भगवान देव नारायण की आस्था से जुड़ा अनोखा गांव, जहां नहीं लगते घरों में ताले..

    राजस्थान में भगवान देव नारायण की आस्था से जुड़ा अनोखा गांव, जहां नहीं लगते घरों में ताले

    देश-दुनिया के कोने-कोने में कई खूबसूरत और आस्था को प्रगाढ़ करते देवालय हैं, जिनके शिखर मात्र से भक्तों का मन प्रसन्न हो जाता है। मात्र देवालय या शिखर ही नहीं बल्कि मंदिर के आस पास की जगह भी बेहद खूबसूरत और उससे जुड़ी कथा हैरत में डालती है।

    ऐसा ही नारायण को समर्पित राजस्थान में एक खूबसूरत गांव है, जो नारायण को समर्पित है। खास बात है कि नारायण के इस गांव में मिट्टी के कच्चे घरों में कभी ताले नहीं लगते और साल 2024 में बेस्ट टूरिज्म विलेज का खिताब भी मिल चुका है। राजस्थान की अरावली पर्वत शृंखला की गोद में बसा एक अनोखा गांव आज पूरे देश और दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। नाम है देवमाली।

    अजमेर जिले के ब्यावर क्षेत्र का यह छोटा सा गांव न केवल अपनी प्राचीन मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, बल्कि यहां की अनूठी परंपराओं ने इसे भारत का सर्वश्रेष्ठ पर्यटन गांव बना दिया है।साल 2024 में केंद्र सरकार के पर्यटन विभाग ने विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर देवमाली गांव को बेस्ट टूरिज्म विलेज का प्रतिष्ठित खिताब प्रदान किया था।

    यह पुरस्कार ब्यावर के तत्कालीन कलेक्टर और गांव की सरपंच ने ग्रहण किया था। राजस्थान पर्यटन विभाग भी इस गांव को विशेष रूप से प्रचारित कर रहा है।देवमाली गांव भगवान देव नारायण को समर्पित है, जिन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि लगभग एक हजार वर्ष पहले जब देव नारायण भगवान यहां पधारे थे, तो गांव के सभी पत्थर और चट्टानें उन्हें नमन करने के लिए झुक गई थीं। आज भी गांव के चारों ओर झुकी हुई चट्टानें इस पौराणिक कथा की गवाही देती हैं।

    देवमाली की सबसे बड़ी खासियत यहां के घर हैं। पूरे गांव में कोई भी पक्का मकान नहीं बनाया जाता। घर केवल पीली मिट्टी और गाय के गोबर से बनाए जाते हैं। हर दो-तीन महीने में इनकी लिपाई-पुताई होती है, जिसे शुद्धिकरण माना जाता है। गांववासी मानते हैं कि भगवान देव नारायण ने वचन दिया था, “मेरा मंदिर पक्का रखो, तुम्हारे घर कच्चे रखो”। इस परंपरा को आज भी सख्ती से निभाया जाता है।

    सबसे अनोखी बात यहां के घरों में कभी ताले नहीं लगते।गांववासी गर्व से कहते हैं कि सदियों से यहां न चोरी होती है और न कोई विवाद। चाहे कोई करोड़पति हो या साधारण किसान, सब एक समान कच्चे घरों में रहते हैं। व्यसनों पर भी पूर्ण प्रतिबंध है, न शराब, न मांस का उपयोग होता है।

    शनिवार को दूध नहीं बेचा जाता, उसे खीर बनाकर या पड़ोसियों में बांट दिया जाता है।देवमाली पर्यटकों को पारंपरिक ग्रामीण जीवन का शानदार अनुभव कराता है। राष्ट्रीय राजमार्ग से मात्र 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह गांव अरावली की हरी-भरी वादियों से घिरा हुआ है। यहां आने वाले पर्यटक प्राचीन देव नारायण मंदिर के दर्शन करते हैं। मान्यता है कि मंदिर में दर्शन करने व मत्था टेकने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।

  • 40 साल तक दराज में पड़ा रहा ‘पत्थर’, जांच हुई तो निकला करोड़ों साल पुराना डायनासोर का जीवाश्म.

    40 साल तक दराज में पड़ा रहा ‘पत्थर’, जांच हुई तो निकला करोड़ों साल पुराना डायनासोर का जीवाश्म.

    दुनिया में कई बार ऐसी चीजें सामने आती हैं, जिनकी असली पहचान सामने आने में दशकों लग जाते हैं। अंटार्कटिका से जुड़ी एक ऐसी ही हैरान करने वाली खोज इन दिनों चर्चा में है। करीब 40 साल तक एक दराज में सामान्य पत्थर की तरह पड़ा एक नमूना जब वैज्ञानिकों की नजर में आया और उसकी गहराई से जांच की गई, तो उसकी असली पहचान ने सभी को चौंका दिया।

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, जिसे इतने वर्षों तक मामूली पत्थर समझकर रखा गया था, वह दरअसल एक दुर्लभ डायनासोर की पूंछ की हड्डी का जीवाश्म निकला।

    1985 में अंटार्कटिका से मिला था नमूना

    इस जीवाश्म की कहानी करीब चार दशक पुरानी है। रिपोर्ट के मुताबिक, 1985 में अंटार्कटिका में एक वैज्ञानिक अभियान के दौरान यह नमूना मिला था। खोज के बाद इसे ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के कैम्ब्रिज स्थित भूवैज्ञानिक संग्रह में सुरक्षित रख दिया गया।

    नमूना वहां लंबे समय तक पड़ा रहा, लेकिन इसकी विस्तृत वैज्ञानिक जांच नहीं हो सकी। हाल के वर्षों में जब विशेषज्ञों ने पुराने जीवाश्मों और भूवैज्ञानिक नमूनों की दोबारा जांच शुरू की, तब यह नमूना भी उनके सामने आया।

    इसके बाद इसकी बारीकी से जांच की गई और पता चला कि यह कोई साधारण चट्टान नहीं है।

    जांच में सामने आई डायनासोर की कहानी

    वैज्ञानिकों की जांच में संकेत मिला कि यह टाइटेनोसॉर नाम के विशाल शाकाहारी डायनासोर की पूंछ की हड्डी का हिस्सा है।

    टाइटेनोसॉर विशाल आकार वाले शाकाहारी डायनासोरों का एक समूह था। इनके जीवाश्म दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मिले हैं। लेकिन अंटार्कटिका से डायनासोर के जीवाश्मों का मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है।

    यही वजह है कि करीब 40 साल तक संग्रह में रखे इस नमूने की पहचान सामने आने के बाद वैज्ञानिकों की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है।

    आज बर्फ से ढका अंटार्कटिका कभी था हरा-भरा

    आज अंटार्कटिका का नाम सुनते ही बर्फ से ढका विशाल इलाका आंखों के सामने आता है। लेकिन करोड़ों साल पहले इस महाद्वीप का वातावरण बिल्कुल अलग था।

    वैज्ञानिकों के अनुसार, पृथ्वी के प्राचीन इतिहास के अलग-अलग दौर में अंटार्कटिका का मौसम आज की तुलना में काफी गर्म रहा होगा। यहां वनस्पतियां और जंगल मौजूद थे और विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु भी रहते थे।

    डायनासोर का यह जीवाश्म उसी प्राचीन दुनिया की झलक देता है। इसके अध्ययन से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि उस समय अंटार्कटिका का पर्यावरण कैसा था और वहां रहने वाले जीव किस तरह के थे।

    पुराने संग्रहों में छिपे हैं कई और राज

    इस खोज का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि दुनिया के संग्रहालयों और शोध संस्थानों में दशकों पुराने हजारों जीवाश्म और भूवैज्ञानिक नमूने सुरक्षित रखे हुए हैं। इनमें से कई की पहचान या वैज्ञानिक महत्व अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है।

    नई तकनीकों और आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों के जरिए अब पुराने नमूनों की दोबारा जांच की जा रही है। ऐसे में संभव है कि आने वाले समय में वैज्ञानिकों को पुराने संग्रहों से ही कई और महत्वपूर्ण जीवाश्म मिलें।

    40 साल बाद बदली एक ‘पत्थर’ की पहचान

    करीब चार दशक तक दराज में पड़े इस नमूने की कहानी यह बताती है कि वैज्ञानिक खोज हमेशा नई जगह पर खुदाई करने से ही नहीं होती। कई बार किसी संग्रह में वर्षों से रखी चीज भी बड़े वैज्ञानिक रहस्य का जवाब अपने अंदर छिपाए होती है।

    जिस नमूने को कभी साधारण पत्थर समझकर रख दिया गया था, वही अब अंटार्कटिका के प्राचीन इतिहास और डायनासोरों की दुनिया को समझने में वैज्ञानिकों के लिए महत्वपूर्ण सुराग बन गया है।

  • फ्लैट खरीदते समय ध्यान रखें वास्तु शास्त्र के ये जरूरी नियम, घर में बनी रहेगी बरकत और सुख-समृद्धि.

    फ्लैट खरीदते समय ध्यान रखें वास्तु शास्त्र के ये जरूरी नियम, घर में बनी रहेगी बरकत और सुख-समृद्धि.

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    एक मध्यवर्गीय परिवार का सबसे बड़ा सपना होता है कि कब उसके पास अपना घर होगा। एक घर को लेने के लिए आम आदमी अपने पूरे जीवन की जमापूंजी लगा देता है। इतना ही नहीं वो अपने आने वालों सालो की कमाई को भी एक घर को खरीदने में लगा देता है। लोग अपनी मेहनत की कमाई से नया आशियाना तलाशते हैं ताकि परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। लेकिन कई बार हम वास्तु के नियमों को अनदेखा कर देते हैं। वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर की गलत दिशा आपके फ्लैट में वास्तु दोष उत्पन्न कर सकता है। इसके साथ ही आपके घर में नकारात्मकता भी फैला सकता है। तो चलिए जानते हैं कि नया फ्लैट खरीदते समय किन महत्वपूर्ण वास्तु नियमों का ध्यान रखना जरूरी होता है।

    मुख्य प्रवेश द्वार

    वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का मुख्य द्वार  उत्तर, उत्तर-पूर्व और पूर्व दिशा में होना सबसे अधिक शुभ माना जाता है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में स्थित मुख्य द्वार को सामान्यतः कम शुभ माना जाता है। वहीं ध्यान रखें कि दरवाजे के सामने सीढ़ियां, बंद दीवार या संकरी गैलरी न हो।

    रसोई की दिशा

    रसोई की दिशा हमेशा दक्षिण-पूर्व दिशा में होना सबसे शुभ माना जाता है। दक्षिण-पूर्व दिशा अग्नि तत्व की दिशा मानी जाती है। इसके अलावा  उत्तर-पश्चिम दिशा भी रसोई यानी किचन के लिए उत्तम होता है।

    मास्टर बेडरूम की दिशा

    फ्लैट का मास्टर बेडरूप की दिशा का भी ध्यान रखें। मास्टर बेडरूम दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना अच्छा माना जाता है। इस दिशा में मास्टर बेडरूम होने से आत्मविश्वास और निर्णय क्षमता मजबूत होता है।

    टॉयलेट की दिशा

    फ्लैट खरीदते समय टॉयलेट की दिशा का जरूर ध्यान रखें। टॉयलेट कभी भी उत्तर-पूर्व दिशा में नहीं होना चाहिए। वास्तु के अनुसार यह स्थान आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है। शौचालय का स्थान पश्चिम या उत्तर-पश्चिम दिशा में होना बेहतर माना जाता है।

    बालकनी और खिड़कियों की दिशा

    उत्तर और पूर्व दिशा में खुलने वाली बालकनी या बड़ी खिड़कियां घर में प्राकृतिक प्रकाश और सकारात्मक ऊर्जा लाने में सहायक मानी जाती हैं।

    फ्लैट का आकार

    वास्तु शास्त्र के अनुसार, फ्लैट का आकार वर्गाकार या आयताकार होना चाहिए। ऐसे फ्लैट सबसे अच्छे माने जाते हैं। वहीं फ्लैट का  उत्तर-पूर्व दिशा खुला होना चाहिए तभी  सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ेगा। वास्तु शास्त्र में उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) को सबसे पवित्र दिशा माना गया है ।

    (Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

  • डार्क मैटर की खोज में वैज्ञानिकों को मिला रहस्यमयी संकेत, वैज्ञानिकों ने कहा- अभी और सबूत जरूरी..

    डार्क मैटर की खोज में वैज्ञानिकों को मिला रहस्यमयी संकेत, वैज्ञानिकों ने कहा- अभी और सबूत जरूरी..

    नई दिल्ली। ब्रह्मांड के सबसे बड़े रहस्यों में शामिल डार्क मैटर को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों को एक दिलचस्प संकेत मिला है। अमेरिका में जमीन के करीब एक मील नीचे स्थापित एक बेहद संवेदनशील डिटेक्टर ने एक ऐसी घटना रिकॉर्ड की है, जिसने वैज्ञानिकों का ध्यान खींचा है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इसे डार्क मैटर की सीधी खोज कहना अभी जल्दबाजी होगी।

    LZ डिटेक्टर ने दर्ज किया खास संकेत

    यह संकेत LUX-ZEPLIN (LZ) नाम के डिटेक्टर से मिला है। इसे दुनिया के सबसे संवेदनशील डार्क मैटर डिटेक्टरों में माना जाता है। वैज्ञानिक लंबे समय से इसके जरिए ऐसे कणों की तलाश कर रहे हैं, जो डार्क मैटर के रहस्य को समझने में मदद कर सकें।

    करीब 250 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम ने लगभग दो साल तक डिटेक्टर से मिले डेटा का विश्लेषण किया। इस टीम में छह देशों के 39 संस्थानों से जुड़े शोधकर्ता शामिल हैं।

    विश्लेषण के दौरान वैज्ञानिकों को एक ऐसी घटना दिखाई दी, जिसमें किसी कण के एक परमाणु से टकराने के संकेत मिले। यही घटना अब वैज्ञानिकों के लिए खास दिलचस्पी का विषय बनी हुई है।

    क्या यह WIMP कण हो सकता है?

    वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस घटना के पीछे WIMP यानी Weakly Interacting Massive Particle की भूमिका हो सकती है। WIMP को डार्क मैटर के संभावित कणों में से एक माना जाता है।

    वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर डार्क मैटर का कोई कण सामान्य पदार्थ के परमाणु से टकराता है, तो उससे बेहद कमजोर संकेत पैदा हो सकता है। LZ जैसे डिटेक्टरों को इसी तरह के बेहद सूक्ष्म संकेतों को पकड़ने के लिए तैयार किया गया है।

    हालांकि, सिर्फ एक घटना के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वैज्ञानिकों ने वास्तव में डार्क मैटर का कण पकड़ लिया है।

    2.6 सिग्मा का संकेत कितना महत्वपूर्ण?

    इस घटना को वैज्ञानिकों की ओर से 2.6 सिग्मा का महत्व दिया गया है। विज्ञान में सिग्मा का इस्तेमाल किसी परिणाम की सांख्यिकीय मजबूती को समझने के लिए किया जाता है।

    आमतौर पर किसी नई वैज्ञानिक खोज को बेहद मजबूत प्रमाण मानने के लिए करीब 5 सिग्मा का स्तर महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में 2.6 सिग्मा का परिणाम दिलचस्प तो है, लेकिन इसे अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता।

    ब्राउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रिक गैटस्कैल ने भी स्पष्ट किया है कि टीम यह दावा नहीं कर रही कि उसने डार्क मैटर की खोज कर ली है। उनके मुताबिक, वैज्ञानिकों ने जरूर कुछ असामान्य और दिलचस्प देखा है, लेकिन इसकी सही व्याख्या के लिए अभी और अध्ययन की जरूरत है।

    आखिर क्या है डार्क मैटर?

    डार्क मैटर ब्रह्मांड के उन रहस्यमयी घटकों में से है, जिन्हें सीधे देखा नहीं जा सकता। यह सामान्य पदार्थ की तरह प्रकाश को उत्सर्जित या परावर्तित नहीं करता, इसलिए इसे सीधे पहचानना बेहद मुश्किल है।

    फिर भी वैज्ञानिकों को इसके अस्तित्व के मजबूत संकेत मिलते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण इसका गुरुत्वाकर्षण प्रभाव है, जो आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड में मौजूद दूसरी वस्तुओं की गति को प्रभावित करता है।

    वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार, ब्रह्मांड के कुल पदार्थ का लगभग 85 फीसदी हिस्सा डार्क मैटर हो सकता है। यही वजह है कि इसके वास्तविक स्वरूप और कणों की पहचान करना आधुनिक भौतिकी के सबसे बड़े सवालों में से एक बना हुआ है।

    LZ डिटेक्टर से मिला नया संकेत इस रहस्य को सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुराग जरूर हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों को इसे पुख्ता खोज मानने के लिए अभी और डेटा तथा स्वतंत्र प्रमाणों की जरूरत होगी।