
असम के दिमा हसाओ जिले में स्थित जतिंगा गांव लंबे समय से एक रहस्यमयी प्राकृतिक घटना के लिए चर्चा में रहा है। मानसून के बाद हर साल बड़ी संख्या में पक्षी यहां घायल या मृत अवस्था में पाए जाते हैं। इसी वजह से जतिंगा को लंबे समय से ‘बर्ड सुसाइड पॉइंट’ जैसे नामों से जाना जाता है।
हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक, पक्षी जानबूझकर अपनी जान नहीं देते। इसके पीछे मौसम, घना कोहरा, तेज हवाएं, कम दृश्यता और कृत्रिम रोशनी जैसे कई प्राकृतिक और पर्यावरणीय कारणों की भूमिका मानी जाती है।
सितंबर से नवंबर के बीच बढ़ जाती है घटना
जतिंगा में यह घटना मुख्य रूप से सितंबर से नवंबर के बीच देखने को मिलती है। मानसून के बाद घाटी में मौसम तेजी से बदलता है। इस दौरान घना कोहरा और तेज हवाएं पक्षियों के लिए उड़ान भरना और सही दिशा में नेविगेट करना मुश्किल बना सकती हैं।
रात के समय जब पक्षी उड़ते हैं तो अंधेरा, कोहरा और हवा की दिशा में बदलाव मिलकर उनकी सामान्य दिशा पहचानने की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में वे भटककर जमीन के करीब आ सकते हैं।
रोशनी भी बन सकती है वजह
इस पूरी घटना में कृत्रिम रोशनी को भी एक महत्वपूर्ण कारक माना जाता है। जब पक्षी खराब मौसम और कम रोशनी के कारण भ्रमित होते हैं, तो वे गांव में मौजूद लैंप या दूसरी प्रकाश स्रोतों की तरफ आकर्षित हो सकते हैं।
रोशनी की ओर उड़ते समय घने कोहरे के कारण उन्हें सामने मौजूद पेड़, घर, बांस के खंभे और दूसरी संरचनाएं साफ दिखाई नहीं देतीं। ऐसे में पक्षियों के इन चीजों से टकराने का खतरा बढ़ जाता है।
टक्कर से घायल होकर गिर सकते हैं पक्षी
तेज हवा और कम दृश्यता के बीच उड़ते हुए पक्षी जब किसी पेड़ या दूसरी संरचना से टकराते हैं तो उन्हें गंभीर चोट लग सकती है। कई पक्षी घायल होकर जमीन पर गिर जाते हैं, जबकि कुछ की मौत भी हो सकती है।
इसी वजह से इस मौसम में जतिंगा में बड़ी संख्या में पक्षियों के मृत या घायल मिलने की घटनाएं सामने आती हैं।
क्या चुंबकीय क्षेत्र भी है जिम्मेदार?
जतिंगा की घटना को समझाने के लिए समय-समय पर कुछ अन्य वैज्ञानिक सिद्धांत भी सामने आए हैं। इनमें स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से जुड़ी संभावनाएं भी शामिल हैं।
एक सिद्धांत के मुताबिक, क्षेत्र की भूगर्भीय संरचना और भूमिगत जल प्रवाह स्थानीय चुंबकीय परिस्थितियों को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पक्षियों की नेविगेशन क्षमता पर असर पड़ने की संभावना हो सकती है। हालांकि इसे इस घटना की अंतिम और पूरी तरह प्रमाणित वजह नहीं माना गया है।
कभी रहस्य और अंधविश्वास से जुड़ी थी कहानी
पहले स्थानीय स्तर पर पक्षियों के इस तरह गिरने या मरने को रहस्यमयी और दैवीय घटनाओं से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन समय के साथ पक्षी विज्ञान और पर्यावरण से जुड़े अध्ययनों ने इस घटना को प्राकृतिक परिस्थितियों से जोड़कर समझने की कोशिश की।
आज जतिंगा की घटना को पक्षियों के ‘आत्महत्या करने’ के बजाय पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण होने वाली असामान्य पक्षी मृत्यु और चोटों के रूप में समझा जाता है।
अब पक्षियों की सुरक्षा पर दिया जा रहा जोर
समय के साथ प्रशासन और वन्यजीव संगठनों का ध्यान इस घटना को देखने के बजाय पक्षियों को सुरक्षित रखने पर भी गया है। रात के समय तेज कृत्रिम रोशनी को नियंत्रित करने और संवेदनशील इलाकों में मानवीय गतिविधियों को कम करने जैसे उपायों का उद्देश्य पक्षियों के भटकने और दुर्घटनाओं के जोखिम को कम करना है।
जतिंगा की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि जिसे लंबे समय तक ‘पक्षियों की आत्महत्या’ जैसी रहस्यमयी घटना माना गया, उसके पीछे वैज्ञानिकों ने मौसम, भूगोल, प्रकाश और पक्षियों की नेविगेशन संबंधी परेशानियों जैसी संभावित वजहों पर ध्यान दिया है।
यानी पक्षी यहां अपनी जान देने नहीं आते, बल्कि कुछ खास पर्यावरणीय परिस्थितियां उन्हें ऐसी खतरनाक स्थिति में पहुंचा सकती हैं, जहां उनके घायल होने या मरने का खतरा बढ़ जाता है।

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