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  • ललितपुर में बी फार्मा: छात्र की हत्या, शराब की दुकान के बाहर 5 युवकों ने घेरा और चाकू-पत्थरों से किया हमला.

    ललितपुर में बी फार्मा: छात्र की हत्या, शराब की दुकान के बाहर 5 युवकों ने घेरा और चाकू-पत्थरों से किया हमला.

    ललितपुर में बी फार्मा: छात्र की हत्या, शराब की दुकान के बाहर 5 युवकों ने घेरा और चाकू-पत्थरों से किया हमला.

    उत्तर प्रदेश के ललितपुर में बी फार्मा के एक छात्र की हत्या का मामला सामने आया है। सदर कोतवाली क्षेत्र के चौकाबाग में अंग्रेजी शराब की दुकान के बाहर पांच युवकों ने छात्र को घेरकर उसके साथ मारपीट की। आरोप है कि हमलावरों ने पहले पत्थरों से हमला किया और इसके बाद चाकू से वार कर दिए। गंभीर रूप से घायल छात्र की मौत हो गई।

    इस पूरी घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है, जिसमें कई युवक छात्र को घेरकर हमला करते दिखाई दे रहे हैं। पुलिस ने मामले में एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि अन्य आरोपियों की तलाश जारी है।

    शराब की दुकान के बाहर घेरकर किया हमला

    मृतक की पहचान भूपेंद्र उर्फ छोटू के रूप में हुई है। वह ललितपुर के मसौरा का रहने वाला था और फिलहाल पटेल नगर में रहकर बी फार्मा की पढ़ाई कर रहा था।

    बताया जा रहा है कि चौकाबाग स्थित अंग्रेजी शराब की दुकान के बाहर कुछ युवकों ने भूपेंद्र को घेर लिया। इसके बाद उसके साथ मारपीट शुरू कर दी गई। CCTV फुटेज में हमलावर छात्र पर पत्थरों से हमला करते दिखाई दे रहे हैं।

    हमले के दौरान भूपेंद्र खुद को बचाने की कोशिश करता रहा, लेकिन आरोप है कि हमलावर लगातार उस पर हमला करते रहे।

    चाकू से भी किए गए वार

    मारपीट के दौरान एक हमलावर ने चाकू निकाल लिया और भूपेंद्र पर हमला कर दिया। चाकू से वार होने के बाद छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया। बाद में उसकी मौत हो गई।

    घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और मामले की जांच शुरू की। मृतक के परिजनों की लिखित शिकायत के आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।

    एक आरोपी गिरफ्तार, चार की तलाश जारी

    पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं, वारदात में शामिल बताए जा रहे चार अन्य आरोपियों की तलाश की जा रही है।

    चारों की गिरफ्तारी के लिए क्षेत्राधिकारी सदर के नेतृत्व में तीन पुलिस टीमों का गठन किया गया है। पुलिस संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है और CCTV फुटेज समेत अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच कर रही है।

  • अंग्रेज भारत में पेट्रोल’ कहां से मंगवाते थे, तब कौन संभालता था आयात-निर्यात

    अंग्रेज भारत में पेट्रोल’ कहां से मंगवाते थे, तब कौन संभालता था आयात-निर्यात

    अंग्रेज भारत में पेट्रोल’ कहां से मंगवाते थे, तब कौन संभालता था आयात-निर्यात

    ईरान संकट के बीच भारतीय तेल इतिहास की बात करें तो ब्रिटिश काल में भारत विदेशों से पेट्रोल आयात करता था, जिसे बर्मा-शेल जैसी विदेशी कंपनियां नियंत्रित करती थीं. आइए इस बारे में और विस्तार से समझें.

    पश्चिम एशिया में जारी ईरान और अमेरिका के बीच की राजनीतिक खींचतान ने वैश्विक कच्चे तेल के बाजार में हलचल पैदा कर दी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे मुख्य जलमार्ग को बंद किए जाने और अमेरिकी पाबंदियों की अनिश्चितता से दुनिया भर में ईंधन की कीमतें चढ़ने लगी हैं. इस संकट ने एक बार फिर भारत की विदेशी तेल पर निर्भरता को चर्चा में ला दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आजादी से पहले ब्रिटिश हुकूमत के दौर में जब देश में गाड़ियां कम थीं, तब पेट्रोल और मिट्टी का तेल कहां से आता था और इसका पूरा कारोबार कौन देखता था? आइए समझ लेते हैं.

    शुरुआती दौर में ईंधन भारत में कहां से आता था?

    19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में भारत में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही थी. उस समय देश के भीतर परिवहन और रोशनी के लिए केरोसिन तेल की भारी मांग थी. ब्रिटिश प्रशासन अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से विदेशी स्रोतों पर आश्रित था. इसमें सबसे बड़ा योगदान पड़ोसी देश म्यांमार यानी तत्कालीन बर्मा का था. बर्मा के तेल क्षेत्रों से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल और ईंधन भारत के बंदरगाहों तक पहुंचाया जाता था. इसके अलावा मध्य पूर्व के देशों जैसे ईरान, इराक और सऊदी अरब के कुओं से भी ईंधन की खेप भारत मंगवाई जाती थी.

    अंग्रेजी हुकूमत में तेल बाजार के प्रमुख खिलाड़ी कौन?

    ब्रिटिश भारत में कच्चे तेल के आयात, भंडारण और बिक्री का पूरा तंत्र चुनिंदा विदेशी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों में केंद्रित था. इनमें सबसे शक्तिशाली संस्था ‘बर्मा ऑयल कंपनी’ थी, जिसने बर्मा के साथ-साथ असम के क्षेत्रों में भी अपनी जड़ें जमा रखी थीं. इसके अलावा डच और ब्रिटिश पूंजी से बनी ‘एशियाटिक पेट्रोलियम’ देश के बड़े शहरों में वितरण का काम संभालती थी. 1928 में बाजार पर पूरी तरह कब्जा जमाने के मकसद से एशियाटिक पेट्रोलियम और बर्मा ऑयल कंपनी ने हाथ मिलाया और ‘बर्मा-शेल’ की नींव रखी. आगे चलकर आजादी के बाद यही कंपनी सरकारी नियंत्रण में आकर भारत पेट्रोलियम (BPCL) बनी. इसके अलावा ‘कैल्टेक्स’ और ‘स्टैंडर्ड वैक्यूम’ जैसी अमेरिकी कंपनियों की भी बाजार में मौजूदगी थी.

    भारत में तेल की पहली खोज

    भारत की अपनी धरती पर कच्चे तेल की खोज का इतिहास 19वीं सदी के उत्तरार्ध से जुड़ा हुआ है. साल 1866 में असम के घने जंगलों में पहली बार तेल के निशान देखे गए थे, लेकिन व्यापारिक स्तर पर सफलता 1889 में मिली. असम के डिगबोई इलाके में पहला सफल तेल का कुआं खोदा गया. इस खोज के पीछे एक रोचक किस्सा भी मशहूर है. जब ब्रिटिश इंजीनियरों ने देखा कि डिगबोई के जंगलों में पटरियां बिछा रहे हाथियों के पैरों में काला चिपचिपा पदार्थ लगा है, तो उन्होंने मजदूरों को उत्साहित करते हुए चिल्लाकर कहा- ‘डिग, बॉय, डिग’ यानी ‘खोदो, लड़के, खोदो’. माना जाता है कि इसी वाक्य से इस ऐतिहासिक जगह का नाम डिगबोई पड़ा.

    एशिया की पहली रिफाइनरी

    डिगबोई में तेल मिलने के बाद भारत में ऊर्जा क्षेत्र की वास्तविक क्रांति की शुरुआत हुई. साल 1901 में ‘असम ऑयल कंपनी’ ने डिगबोई में एक अत्याधुनिक तेल शोधन कारखाना यानी रिफाइनरी स्थापित की गई. यह न केवल भारत की पहली रिफाइनरी थी, बल्कि पूरे एशिया महाद्वीप में अपनी तरह का पहला रिफाइनिंग प्लांट था. इसे आज भी भारतीय पेट्रोलियम उद्योग की गंगोत्री माना जाता है. हालांकि, इस रिफाइनरी की क्षमता इतनी नहीं थी कि वह पूरे अविभाजित भारत की तेजी से बढ़ती जरूरतों को अकेला पूरा कर सके, इसलिए घरेलू उत्पादन के बावजूद विदेशी आयात जारी रहा.

    देश के पहले पेट्रोल पंप की शुरुआत

    20वीं सदी के दूसरे दशक तक आते-आते भारत के प्रमुख महानगरों में गाड़ियां सड़कों पर दिखने लगी थीं. इससे पहले पेट्रोल मुख्य रूप से टिन के डिब्बों या कैन में बिकता था. ईंधन की बढ़ती मांग को देखते हुए वितरण प्रणाली को आधुनिक बनाने की शुरुआत हुई. साल 1928 में एशियाटिक पेट्रोलियम कंपनी ने मुंबई के लैमिंगटन रोड पर देश का पहला आधिकारिक पेट्रोल पंप स्थापित किया. इस पंप के शुरू होने के बाद देश के अन्य बड़े शहरों जैसे कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली में भी पंप खोलने का सिलसिला शुरू हुआ, जिसने भारत में आधुनिक ऑटोमोबाइल युग का रास्ता साफ किया.

  • मरीजों की जिंदगियों से खिलवाड़’एनआईएमएस की लक्ष्मी भास्कर, जिसकी वजह से करोड़ों का नुकसान हो सकता था!

    मरीजों की जिंदगियों से खिलवाड़’एनआईएमएस की लक्ष्मी भास्कर, जिसकी वजह से करोड़ों का नुकसान हो सकता था!

    मरीजों की जिंदगियों से खिलवाड़’एनआईएमएस की लक्ष्मी भास्कर, जिसकी वजह से करोड़ों का नुकसान हो सकता था!

    एनआईएमएस के अतिरिक्त अधीक्षक डॉ. लक्ष्मी भास्कर के मामले में सनसनीखेज खुलासे हुए हैं, जिन्हें एसीबी ने भारी मात्रा में अवैध संपत्ति जमा करने के आरोप में पकड़ा था। अधिकारियों ने पाया कि उनकी अवैध संपत्ति करोड़ों रुपये की थी। अधिकारियों को यह भी पता चला कि वे अक्सर भ्रष्टाचार के धन से विदेश यात्रा करते थे। उन्होंने बताया कि वे देश के आलीशान होटलों में ठहरते थे और रिसॉर्ट्स में पार्टियां करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि वे हर दिन एक महंगी कार में यात्रा करते थे। लक्ष्मी भास्कर ने जून 2007 में दूसरी बार एनआईएमएस अस्पताल में कार्यभार संभाला था। इससे पहले जब वे एनआईएमएस में डॉक्टर के रूप में कार्यरत थे, तब उन्हें एक मरीज से पैसे लेते हुए पकड़ा गया था और तत्कालीन एनआईएमएस निदेशक काकरला सुब्बाराओ ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था। बाद में, वरिष्ठों के उकसावे पर एनआईएमएस में पुनः प्रवेश पाने वाले लक्ष्मी भास्कर प्रशासनिक विभाग में अपनी मजबूत पकड़ बना चुके थे। एसीबी अधिकारियों ने पाया कि वे जहां से भी संभव हो, धन इकट्ठा करते थे।

    लक्ष्मी भास्कर: एसीबी अधिकारियों ने एनआईएमएस के कई कर्मचारियों के घरों पर छापा मारा

    2007 से लेकर इस साल 21 सितंबर को एसीबी द्वारा उनके खिलाफ मामला दर्ज किए जाने तक, उनकी आय मात्र 2 करोड़ रुपये थी और उनका खर्च 94.33 लाख रुपये था। एसीबी द्वारा मामला दर्ज किए जाने के समय, उनकी अचल संपत्तियों का मूल्य 2,75,95,200 रुपये था। इसके अलावा, एसीबी ने पाया कि उन्होंने बेनामी रूप से अपने नाम पर भारी संपत्ति जमा कर रखी थी। इस मामले में, एसीबी अधिकारियों ने एनआईएमएस के कई कर्मचारियों के घरों की तलाशी ली। हैदराबाद और विजयवाड़ा में कीमतें कैसी हैं..! उनके घरों से महत्वपूर्ण दस्तावेज और नकदी का विवरण जुटाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि एनआईएमएस में नाई का काम करने वाले धनराज के घर की तलाशी के दौरान नोटों के बंडल बरामद हुए।

  • दुनिया में सबसे ज्यादा’ कर्ज वाला देश कौन, कहां-कहां से लिया उधार?

    दुनिया में सबसे ज्यादा’ कर्ज वाला देश कौन, कहां-कहां से लिया उधार?

    दुनिया में सबसे ज्यादा’ कर्ज वाला देश कौन, कहां-कहां से लिया उधार?

    जब सरकारी कर्ज की बात आती है तो अमेरिका पर सबसे ज्यादा कर्ज है. उसका कल सरकारी कर्ज लगभग 35 ट्रिलियन डॉलर यानी ₹3,350 लाख करोड़ से ज्यादा है. हालांकि, जब कर्ज की तुलना देश की अर्थव्यवस्था के आकार से की जाती है, तो स्थिति बदल जाती है.

    जीडीपी के मुकाबले कर्ज के आधार पर जापान सबसे ऊपर है. यहां पब्लिक कर्ज उसकी जीडीपी का 240% से ज्यादा है. इन देशों के कर्ज लेने के स्रोत भी अलग-अलग हैं. जहां अमेरिका घरेलू और विदेशी निवेशकों दोनों पर निर्भर है वहीं जापान और चीन मुख्य रूप से घरेलू स्रोतों पर निर्भर हैं.

    अमेरिका पर कुल 35 ट्रिलियन डॉलर से अधिक सरकारी कर्ज है।

    जापान का कर्ज जीडीपी से 240% ज्यादा है, मुख्यत: घरेलू।

    चीन दूसरा सबसे बड़ा कर्जदार, उसका भी अधिकांश कर्ज घरेलू है।

    कर्ज की स्थिति समझने को स्रोत और जीडीपी अनुपात महत्वपूर्ण हैं।

    अमेरिका ने कहां से कर्ज लिया है?

    अमेरिकी सरकार का कर्ज किसी एक देश या फिर संस्था का नहीं है. यह कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्रोतों में फैला हुआ है. विदेशी सरकारें और केंद्रीय बैंक अमेरिकी ट्रेजरी सिक्योरिटीज के बड़े धारक हैं. देश अपने वित्तीय रिजर्व और निवेश के हिस्से के तौर पर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड खरीदते हैं. जापान और चीन अमेरिका के सबसे बड़े विदेशी लेनदारों में शामिल हैं. इसी के साथ दूसरे बड़े धारकों में यूके, लक्जमबर्ग और केमैन आइलैंड्स शामिल हैं.

    अमेरिकी कर्ज का एक बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर भी है. अमेरिकी नागरिक, कमर्शियल बैंक, बीमा कंपनी और म्युचुअल फंड अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में निवेश करते हैं. इससे वे असल में सरकार को पैसा उधार देते हैं.

    अमेरिकी फेडरल रिजर्व भी एक बड़ा भागीदार है. केंद्रीय बैंक बाजार से अमेरिकी सरकारी बॉन्ड खरीद सकता है जिससे सरकार को अप्रत्यक्ष रूप से फंडिंग मिलती है. इसके अलावा सरकारी ट्रस्ट फंड के पास भी अमेरिकी सरकारी कर्ज का काफी हिस्सा है.

    जापान ने कहां से कर्ज लिया?

    जापान की कर्ज की स्थिति अलग है क्योंकि उसका ज्यादातर सरकारी कर्ज घरेलू स्तर पर ही है. देश की जीडीपी से दोगुने से ज्यादा पब्लिक कर्ज होने के बावजूद जापान को भारी विदेशी कर्ज से जुड़े बाहरी कर्ज के दबाव का सामना नहीं करना पड़ा है.

    जापान के सरकारी कर्ज का लगभग 90% हिस्सा घरेलू संस्थाओं के पास है. इनमें जापानी नागरिक, घरेलू बैंक, बीमा कंपनी और बैंक ऑफ जापान शामिल हैं. जापान ने विदेशी सरकारों और आईएमएफ या फिर विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से काफी कम कर्ज लिया है. यानी कि उसका कर्ज मुख्य रूप से उसके अपने वित्तीय सिस्टम के अंदर ही फंड किया जाता है.

    चीन ने कहां से कर्ज लिया?

    सरकारी कर्ज के कुल आंकड़ों के हिसाब से चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कर्जदार देश है. इस पर कुल सरकारी कर्ज लगभग 15 ट्रिलियन डॉलर है. जापान की तरह चीन का कर्ज भी मुख्य रूप से घरेलू स्रोतों से लिया गया है. चीनी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास कार्यों के लिए भारी मात्रा में कर्ज लिया है. इसके मुख्य स्रोतों में सरकारी बैंक, स्थानीय वित्तीय संस्थान और घरेलू संस्थागत निवेशक शामिल हैं. यह कॉरपोरेट बॉन्ड जैसे अलग-अलग तरीकों से कर्ज देते हैं.

    सरकारी कर्ज के मामले में शीर्ष पांच देश

    अमेरिका: $35 ट्रिलियन से ज्यादा

    चीन: लगभग $15 ट्रिलियन

    जापान: $9 ट्रिलियन से ज्यादा

    यूके: लगभग $3.8 ट्रिलियन

    फ्रांस: लगभग $3.5 ट्रिलियन

    यूके ने बैंक ऑफ इंग्लैंड, घरेलू पेंशन फंड और विदेशी संस्थागत निवेशकों जैसे स्रोतों से फंड जुटाया है. वहीं फ्रांस ने मुख्य रूप से यूरोपीय सेंट्रल बैंक, घरेलू कमर्शियल बैंकों और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे स्रोतों से कर्ज लिया है.

    क्या कहते हैं आंकड़े?

    आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ सरकारी कर्ज की कुल राशि से पूरी स्थिति का पता नहीं चलता. कुल राशि के हिसाब से यूएसए पर दुनिया का सबसे ज्यादा सरकारी कर्ज है और जापान का कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में काफी ज्यादा है.

    एक और बड़ा फर्क यह है कि कर्ज किसके पास है. जापान और चीन जैसे देश काफी हद तक घरेलू स्रोतों पर निर्भर हैं. इसी के साथ यूएस के पास घरेलू और विदेशी दोनों तरह के लेनदार हैं. इस वजह से किसी देश के कर्ज को समझने के लिए न सिर्फ यह देखना जरूरी है कि उस पर कितना कर्ज है बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि कर्ज किससे लिया गया है और उसे कैसे चुकाए या फिर मैनेज किया जा रहा है.

  • सिलेंडर विस्फोट में लोगों’ की मौत: फतेहपुर में सिलेंडर विस्फोट हुआ, दो मंजिला इमारत ढह गई।

    सिलेंडर विस्फोट में लोगों’ की मौत: फतेहपुर में सिलेंडर विस्फोट हुआ, दो मंजिला इमारत ढह गई।

    सिलेंडर विस्फोट में लोगों’ की मौत: फतेहपुर में सिलेंडर विस्फोट हुआ, दो मंजिला इमारत ढह गई।

    सिलेंडर विस्फोट में लोगों की मौत: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के मालवान में गैस सिलेंडर विस्फोट से भीषण त्रासदी हुई है। खाना पकाते समय हुए इस विस्फोट के कारण दो मंजिला मकान ढह गया। पुलिस, दमकलकर्मी और आपदा राहत दल मलबे के नीचे फंसे परिवार के सदस्यों को बचाने के लिए बचाव अभियान चला रहे हैं। इस हादसे में एक ही परिवार के चार सदस्यों की जान चली गई। मृतकों में तीन बच्चे थे। डॉक्टरों ने बताया कि कुणाल (19), वेद (14), यश (8) और अर्पिता (15) की इलाज के दौरान मौत हो गई। विस्फोट के बाद घायलों को पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया।

    विस्फोट के कारण आसपास के घरों को नुकसान पहुंचा।

    सिलेंडर विस्फोट की तीव्रता के कारण मुख्य इमारत पूरी तरह से ढह गई और आसपास के मकानों को भी नुकसान पहुंचा। कुछ मकानों की दीवारें गिर गईं और अन्य के बीम क्षतिग्रस्त हो गए। अधिकारियों ने बताया कि विस्फोट के समय आसपास के कुछ परिवार अपने घरों से बाहर थे, इसलिए किसी की जान नहीं गई। आलोक गुप्ता (23) इस दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। बताया जा रहा है कि उन्हें लगभग 90 प्रतिशत चोटें आई हैं। उनकी हालत फिलहाल गंभीर है। सुरेश गुप्ता, ओम और शिवानी भी घायल हुए, जिनमें से शिवानी को इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। इमारत के पूरी तरह ढह जाने के कारण, अधिकारियों ने इस संभावना की जांच की कि कुछ अन्य लोग मलबे के नीचे फंसे हो सकते हैं। इसके चलते एसडीआरएफ टीमों को तैनात किया गया। रात में भी मलबा हटाने का काम जारी रखने के लिए भारी रोशनी की व्यवस्था की गई। पुलिस, अग्निशमन कर्मियों और अन्य विभागों ने बचाव अभियान में समन्वय किया।

    सिलेंडर विस्फोट में लोगों की मौत: विस्फोट के कारणों की जांच जारी है

    फोरेंसिक और दमकल विभाग की टीमें गैस सिलेंडर विस्फोट के वास्तविक कारण की जांच कर रही हैं। अधिकारी दुर्घटना से पहले घर में गैस की खपत की स्थिति, सिलेंडर की हालत और अन्य तकनीकी पहलुओं की जांच कर रहे हैं। जांच पूरी होने के बाद विस्फोट का सटीक कारण स्पष्ट होने की संभावना है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर दुख व्यक्त किया। सरकार ने मृतकों के परिवारों को 2 लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। उन्होंने अधिकारियों को घायलों के बेहतर इलाज की व्यवस्था करने के निर्देश दिए।

  • अन्नदान के लिए​​​​​​​ बन रहा था सांभर, अचानक खौलते बर्तन में गिरी महिला; इलाज के दौरान मौत

    अन्नदान के लिए​​​​​​​ बन रहा था सांभर, अचानक खौलते बर्तन में गिरी महिला; इलाज के दौरान मौत

    अन्नदान के लिए​​​​​​​ बन रहा था सांभर, अचानक खौलते बर्तन में गिरी महिला; इलाज के दौरान मौत

    आंध्र प्रदेश में अन्नदान कार्यक्रम की तैयारियों के दौरान एक दर्दनाक हादसा हो गया। यहां बड़ी मात्रा में सांभर तैयार करने के दौरान एक महिला अचानक खौलते हुए बड़े बर्तन में गिर गई। हादसे में महिला गंभीर रूप से झुलस गई। उसे तुरंत बाहर निकालकर अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

    घटना के बाद कार्यक्रम स्थल पर अफरा-तफरी मच गई। जिस जगह कुछ देर पहले अन्नदान के लिए भोजन तैयार किया जा रहा था, वहां हादसे के बाद मातम का माहौल हो गया।

    सांभर तैयार करते समय हुआ हादसा

    जानकारी के मुताबिक, अन्नदान कार्यक्रम के लिए बड़ी मात्रा में भोजन तैयार किया जा रहा था। इसी दौरान एक बड़े बर्तन में सांभर बनाया जा रहा था। इसी बीच महिला का अचानक संतुलन बिगड़ गया और वह खौलते सांभर के बर्तन में जा गिरी।

    महिला के बर्तन में गिरते ही वहां मौजूद लोगों में हड़कंप मच गया। आसपास के लोगों ने तुरंत उसे बाहर निकालने की कोशिश की और गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया।

    इलाज के दौरान महिला ने तोड़ा दम

    हादसे में महिला बुरी तरह झुलस गई थी। अस्पताल में डॉक्टरों ने उसका इलाज शुरू किया, लेकिन हालत गंभीर होने के कारण उसे बचाया नहीं जा सका। इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई।

    घटना की जानकारी मिलते ही महिला के परिजन और परिचित अस्पताल पहुंचे। मौत की खबर मिलते ही परिवार में मातम छा गया और परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।

    पुलिस ने शुरू की हादसे की जांच

    घटना की सूचना मिलने के बाद स्थानीय पुलिस भी मौके पर पहुंची और पूरे मामले की जानकारी जुटाई। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि महिला किस परिस्थिति में अपना संतुलन खो बैठी और बर्तन में गिर गई।

    पुलिस ने घटनास्थल पर मौजूद लोगों से भी जानकारी ली है। हादसे से जुड़े अन्य पहलुओं की जांच की जा रही है।

    अन्नदान के लिए चल रही तैयारियों के बीच हुए इस हादसे ने पूरे कार्यक्रम को शोक में बदल दिया। फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और दुर्घटना के कारणों का पता लगाने में जुटी है।

  • पुराने मोबाइल फोन से’ बने थे टोक्यो ओलंपिक के करीब 5000 मेडल, जापान ने अपनाया था अनोखा तरीका.

    पुराने मोबाइल फोन से’ बने थे टोक्यो ओलंपिक के करीब 5000 मेडल, जापान ने अपनाया था अनोखा तरीका.

    पुराने मोबाइल फोन से’ बने थे टोक्यो ओलंपिक के करीब 5000 मेडल, जापान ने अपनाया था अनोखा तरीका.

    आमतौर पर पुराना मोबाइल फोन खराब होने के बाद कबाड़ समझ लिया जाता है, लेकिन जापान ने इसी इलेक्ट्रॉनिक कचरे का ऐसा इस्तेमाल किया, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। टोक्यो 2020 ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों के लिए जापान ने पुराने मोबाइल फोन और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से धातुएं निकालकर करीब 5,000 मेडल तैयार किए थे।

    इसके लिए जापान में वर्ष 2017 से 2019 के बीच एक विशेष अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत लोगों से अपने पुराने मोबाइल फोन और छोटी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जमा करने की अपील की गई, ताकि उनमें मौजूद उपयोगी धातुओं को दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।

    लाखों पुराने मोबाइल फोन किए गए जमा

    अभियान के दौरान जापान में करीब 62.1 लाख पुराने मोबाइल फोन जमा किए गए। इसके अलावा लगभग 79 हजार छोटी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस भी एकत्र की गईं। इस अभियान को सफल बनाने में स्थानीय सरकारों, नगरपालिकाओं और कई कंपनियों ने भी सहयोग किया।

    पुराने फोन और इलेक्ट्रॉनिक सामान को सीधे पिघलाकर मेडल नहीं बनाए गए। पहले इन उपकरणों को प्रोसेस किया गया और उनमें मौजूद अलग-अलग धातुओं को निकाला गया। इसके बाद इन धातुओं को रिफाइन किया गया, ताकि उनका इस्तेमाल मेडल बनाने के लिए किया जा सके।

    निकाली गई सोना, चांदी और दूसरी धातुएं

    इस प्रक्रिया से करीब 32 किलोग्राम सोना और 3,500 किलोग्राम चांदी हासिल की गई। इसके अलावा ब्रॉन्ज मेडल के लिए जरूरी धातु भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से प्राप्त की गई। इन संसाधनों का इस्तेमाल टोक्यो ओलंपिक और पैरालंपिक के लिए करीब 5,000 मेडल तैयार करने में किया गया।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि हर मेडल पूरी तरह पुराने मोबाइल फोन से निकली धातु से बना था। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से धातुओं को निकालने और शुद्ध करने के बाद उन्हें मेडल निर्माण की प्रक्रिया में इस्तेमाल किया गया।

    सोने का मेडल भी पूरी तरह सोने का नहीं होता

    टोक्यो 2020 के मेडल्स को लेकर एक और दिलचस्प बात यह है कि गोल्ड मेडल पूरी तरह सोने से नहीं बना था। इसकी मुख्य बॉडी चांदी की थी और उसके ऊपर 6 ग्राम से अधिक सोने की परत इस्तेमाल की गई थी।

    वहीं सिल्वर मेडल चांदी से तैयार किया गया था, जबकि ब्रॉन्ज मेडल के लिए कॉपर-रिच एलॉय का इस्तेमाल किया गया था।

    कबाड़ से ओलंपिक तक का सफर

    जापान के इस अभियान की खासियत केवल हजारों मेडल तैयार करना नहीं थी। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जिन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को आमतौर पर बेकार समझकर फेंक दिया जाता है, उनमें मौजूद कीमती संसाधनों को दोबारा इस्तेमाल किया गया।

    मोबाइल फोन और दूसरी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में सोना, चांदी, तांबा जैसी कई उपयोगी धातुएं मौजूद होती हैं। इन्हें उचित तकनीक से अलग करके दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

    टोक्यो ओलंपिक के लिए चलाया गया यह अभियान रीसाइक्लिंग और संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल का एक अनोखा उदाहरण बन गया। इस पहल ने यह भी दिखाया कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे को केवल समस्या मानने के बजाय उसमें मौजूद संसाधनों को दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है।

  • बेगूसराय के होटल में महिला’ से मारपीट और दुष्कर्म का आरोप, चाकू के बल पर वारदात की शिकायत.

    बेगूसराय के होटल में महिला’ से मारपीट और दुष्कर्म का आरोप, चाकू के बल पर वारदात की शिकायत.

    बेगूसराय के होटल में महिला’ से मारपीट और दुष्कर्म का आरोप, चाकू के बल पर वारदात की शिकायत.

    बिहार के बेगूसराय जिले से महिला के साथ कथित अपहरण, मारपीट और दुष्कर्म का गंभीर मामला सामने आया है। नगर थाना क्षेत्र में सामने आई इस घटना को लेकर पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मुख्य आरोपी रोहित कुमार के खिलाफ मामला दर्ज कर उसकी तलाश शुरू कर दी है।

    पीड़िता स्वयं सहायता समूह से जुड़ी बताई जा रही है। महिला का आरोप है कि 27 सितंबर को एक परिचित युवक उसे बहाने से बाइक पर बैठाकर एनएच किनारे स्थित होटल ब्लू डायमंड ले गया। वहां कथित तौर पर उसे रोहित कुमार के हवाले कर दिया गया।

    होटल के कमरे में ले जाकर मारपीट करने का आरोप

    महिला के मुताबिक, होटल पहुंचने के बाद आरोपी उसे जबरन एक कमरे में ले गया और दरवाजा बंद कर दिया। इसके बाद उसके साथ मारपीट की गई। पीड़िता ने आरोप लगाया है कि उसके बाल पकड़कर घसीटा गया और लात-घूंसों तथा जूते-चप्पलों से पीटा गया।

    शिकायत के अनुसार, महिला ने खुद को बचाने की कोशिश की, लेकिन आरोपी ने उसके साथ मारपीट जारी रखी। इसके बाद चाकू का डर दिखाकर उसके साथ दुष्कर्म किए जाने का आरोप लगाया गया है।

    बाथरूम में जाकर परिजनों को दी सूचना

    पीड़िता ने बताया कि उसने किसी तरह आरोपी से बाथरूम जाने की अनुमति ली और अंदर जाकर खुद को बंद कर लिया। इसके बाद उसने मोबाइल फोन से अपने परिजनों को पूरी घटना की जानकारी दी और अपनी लोकेशन भी साझा की।

    सूचना मिलने के बाद परिजन होटल पहुंचे और महिला को वहां से बाहर निकाला। इसी दौरान आरोपी के मौके से फरार होने की बात सामने आई है।

    28 सितंबर को थाने पहुंची महिला

    घटना के अगले दिन 28 सितंबर की देर शाम पीड़िता नगर थाने पहुंची और पुलिस को लिखित शिकायत दी। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी।

    नगर थानाध्यक्ष सतीश कुमार हिमांशु के अनुसार, मामले में रोहित कुमार को मुख्य आरोपी बनाया गया है और उसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम संभावित ठिकानों पर कार्रवाई कर रही है।

    होटल की भूमिका और अन्य पहलुओं की भी जांच

    पुलिस इस बात की भी जांच कर रही है कि घटना के दौरान होटल में कौन-कौन लोग मौजूद थे और होटल की सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी। पुलिस होटल में लगे CCTV कैमरों की रिकॉर्डिंग और मामले से जुड़े अन्य साक्ष्यों की जांच कर रही है।

    पुलिस का कहना है कि जांच के दौरान सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की तलाश जारी है।

  • कालकाजी सामूहिक दुष्कर्म:​​​​​​​ तीन आरोपियों ने चाकू की नोक पर किशोरी से किया दुष्कर्म

    कालकाजी सामूहिक दुष्कर्म:​​​​​​​ तीन आरोपियों ने चाकू की नोक पर किशोरी से किया दुष्कर्म

    कालकाजी सामूहिक दुष्कर्म:​​​​​​​ तीन आरोपियों ने चाकू की नोक पर किशोरी से किया दुष्कर्म

    दिल्ली के आस्था कुंज पार्क बलात्कार कांड की 17 वर्षीय पीड़िता ने फॉरेंसिक टीम को वे स्थान दिखाए जहां उसके तीन लोगों ने चाकू दिखा कर उसके साथ कथित रूप से दुष्कर्म किया था। इससे जांचकर्ताओं को घटनास्थल से कई जैविक साक्ष्य बरामद करने में मदद मिली। पुलिस ने यह जानकारी दी।

    एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, किशोरी ने पुलिस को बताया कि पार्क में अलग-अलग सुनसान स्थानों पर दुष्कर्म के दौरान तीनों आरोपियों ने उसकी गर्दन पर चाकू लगाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। रोहिणी स्थित फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) की टीम और जिला मोबाइल अपराध टीम ने बाद में किशोरी द्वारा बताए गए स्थानों की जांच की और वैज्ञानिक परीक्षण के लिए कई नमूने एकत्र किए। अधिकारी ने पीटीआई-भाषा को बताया कि जैविक साक्ष्यों के डीएनए विश्लेषण से जांचकर्ताओं को आरोपियों और कथित अपराध के बीच संबंध स्थापित करने में मदद मिल सकती है।

    किशोरी अपने जन्मदिन के अवसर पर सोमवार को 17 वर्षीय मित्र के साथ कालकाजी मंदिर गई थी। मंदिर में पूजा करने के बाद दोनों ने कालकाजी मेट्रो स्टेशन के बाहर चिप्स और पानी की एक बोतल खरीदी और फिर गेट नंबर सात से आस्था कुंज पार्क में प्रवेश किया। घटना के विवरण के अनुसार, दोनों एक बेंच पर बैठकर चिप्स खा रहे थे, तभी तीनों आरोपी उनके पास पहुंचे।

    आरोपियों ने किशोरी के मित्र को कथित तौर पर पकड़ लिया, उसे थप्पड़ मारे और दोनों ने जब पूछा कि वे कौन हैं, तो आरोपियों ने खुद को पुलिसकर्मी बताया। आरोपियों ने उनके मोबाइल फोन कथित तौर पर छीन लिए और किशोरी को उसके मित्र से अलग कर दिया। उन्होंने दोनों को धमकाया और किशोरी को पार्क के एक सुनसान हिस्से की ओर ले गए।

    आरोपियों में से एक ने दूसरे से पिस्तौल निकालने को कहा। किशोरी ने पुलिस को बताया कि जिस व्यक्ति को अन्य लोग आसिफ कहकर बुला रहे थे, उसने बैंगनी रंग की शर्ट पहन रखी थी । और वह अन्य लोगों के मुकाबले थोड़ा मोटा था। उसने कथित तौर पर काले रंग का एक हथियार दिखाया और फिर उसे अपनी जेब में रख लिया।

    इसके बाद तीनों आरोपियों ने कथित तौर पर चाकू निकाले और किशोरी को पार्क के एक अंधेरे स्थान पर ले गए। अधिकारी के अनुसार, एक अन्य आरोपी को वे हेमू कहकर बुला रहे थे और उसे अपराध के दौरान निगरानी रखने को कहा। किशोरी ने आरोप लगाया कि आसिफ ने उसकी गर्दन पर चाकू लगाया और उसके साथ दुष्कर्म किया।

    इसके बाद उसने हेमू को बुलाया जो किशोरी को कथित तौर पर दूसरी बेंच पर ले गया और उसकी गर्दन पर चाकू लगाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। तीसरे आरोपी को वे दीपु कहकर बुला रहे थे और फिर उसने लड़की के साथ चाकू दिखा कर दुष्कर्म किया। किशोरी ने पुलिस को बताया कि कथित हमले के बाद आरोपियों ने उसे घटना के बारे में किसी को बताने पर उसे और उसके मित्र को जान से मारने की धमकी दी। उन्होंने उनके मोबाइल फोन वापस किए और दोनों को पार्क से बाहर ले गए। इसके बाद किशोरी ने अपने मित्र को कथित दुष्कर्म के बारे में बताया, जिसके बाद उसने पुलिस नियंत्रण कक्ष (पीसीआर) को फोन किया। रात करीब 8:45 बजे पुलिस को घटना की सूचना मिली और पुलिस की एक टीम पार्क के गेट नंबर सात के पास दोनों के पास पहुंची। पुलिस ने बताया कि किशोरी द्वारा घटना का विस्तृत विवरण दिए जाने से जांचकर्ताओं को आरोपियों की पहचान करने में मदद मिली। बाद में वह पुलिस टीम के साथ आस्था कुंज पार्क गई और उन स्थानों की पहचान की जहां कथित दुष्कर्म हुआ था।

    एफएसएल टीम और जिला मोबाइल अपराध टीम ने इन स्थानों की जांच की और जैविक तथा अन्य साक्ष्य एकत्र किए, जिनमें एक बेंच के पास मिला कंडोम भी शामिल है। अधिकारियों ने बताया कि नमूनों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है और जांचकर्ता डीएनए प्रोफाइलिंग समेत उनके परिणामों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अधिकारियों ने बताया कि आरोपियों आसिफ, हेमंत और महेश को बाद में गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने आसिफ को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया है। वह इसमें जख्मी हो गया था। तीनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

  • गोरे लोगों ने बसाया था या अंग्रेजों की छावनी से जुड़ा है नाम, छतरपुर के गोरगांव की कहानी आज भी रहस्य.

    गोरे लोगों ने बसाया था या अंग्रेजों की छावनी से जुड़ा है नाम, छतरपुर के गोरगांव की कहानी आज भी रहस्य.

    गोरे लोगों ने बसाया था या अंग्रेजों की छावनी से जुड़ा है नाम, छतरपुर के गोरगांव की कहानी आज भी रहस्य.

    मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में एक ऐसा गांव है, जिसका नाम सुनते ही लोगों के मन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं। गांव का नाम है गोरगांव। कुछ लोग इसे गोरेगांव कहते हैं तो कुछ गोर गांव। अंग्रेजी में इसका नाम GAURGAON लिखा जाता है।

    नाम को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि आज भी गांव के नाम की शुरुआत और इसके पीछे की असली कहानी को लेकर कोई स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं है। गांव में रहने वाले लोग अपने बुजुर्गों से सुनी अलग-अलग बातें बताते हैं। किसी का मानना है कि कभी यहां अंग्रेज रहते थे, तो कुछ लोग कहते हैं कि अंग्रेजों ने ही इस गांव को बसाया था।

    हालांकि, इन दावों की पुष्टि करने वाला कोई ठोस ऐतिहासिक प्रमाण स्थानीय स्तर पर उपलब्ध नहीं बताया जाता।

    पहले गोरेगांव कहा जाता था?

    गांव के स्थानीय निवासी मगनलाल अहिरवार के मुताबिक, गांव का पुराना नाम गोरेगांव बताया जाता है। बाद में सरकारी रिकॉर्ड में इसका नाम गोरगांव कर दिया गया।

    नाम को लेकर आज भी गांव में अलग-अलग उच्चारण सुनने को मिलते हैं। कुछ लोग गोरगांव कहते हैं, कुछ गोरेगांव और कुछ लोग इसे गोर गांव के नाम से जानते हैं। अंग्रेजी में लिखे जाने वाले GAURGAON नाम की वजह से भी कभी-कभी बाहरी लोग इसे अलग तरीके से पढ़ लेते हैं।

    क्या अंग्रेजों ने बसाया था गांव?

    गांव के बुजुर्गों से जुड़ी एक स्थानीय कहानी अंग्रेजों के दौर से भी जुड़ी हुई है।

    स्थानीय निवासी मथुरा प्रसाद बताते हैं कि गोरगांव के आसपास छतरपुर के अलावा नौगांव भी महत्वपूर्ण स्थान है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, अंग्रेजों के समय नौगांव में ब्रिटिश छावनी थी।

    पुराने लोगों से चली आ रही एक मान्यता यह है कि अंग्रेजों ने अपनी जरूरत के लिए इस इलाके में गांव बसाया होगा। बताया जाता है कि छावनी के आसपास रहने वाले लोगों की जरूरत पड़ने पर मदद ली जा सके, इसलिए गांव को नजदीक बसाया गया होगा।

    इसी कहानी को कुछ लोग गांव के नाम ‘गोरेगांव’ से जोड़ते हैं। हालांकि, यह बात स्थानीय लोगों द्वारा बताई गई पुरानी मान्यता है और इसकी स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि स्पष्ट नहीं है।

    गांव के बुजुर्ग भी नहीं बता पाए पूरी कहानी

    स्थानीय निवासी छग्गूलाल का कहना है कि गांव के नाम का असली इतिहास शायद उनके पुरखे ही बेहतर तरीके से बता सकते थे। वर्तमान पीढ़ी ने तो बचपन से यही नाम सुना है।

    वहीं मातादीन बताते हैं कि उन्होंने अपने पूर्वजों से गांव का नाम गोरेगांव ही सुना था। आज भी गांव के कुछ लोग इसी नाम का इस्तेमाल करते हैं।

    उनके मुताबिक, गांव का नाम सुनकर बाहर के लोग अक्सर सवाल पूछते हैं कि क्या यहां कभी गोरे लोग रहते थे या फिर गांव को अंग्रेजों ने बसाया था।

    आखिर गोरगांव नाम कैसे पड़ा?

    यही इस गांव की सबसे दिलचस्प बात है। गांव के नाम को लेकर कई कहानियां और स्थानीय धारणाएं मौजूद हैं, लेकिन इनमें से किसी एक को प्रमाणित इतिहास के रूप में बताना मुश्किल है।

    कुछ लोग इसे अंग्रेजों से जोड़ते हैं, कुछ पुराने नाम गोरेगांव से और कुछ लोग अलग-अलग स्थानीय उच्चारणों के आधार पर इसकी व्याख्या करते हैं।

    फिलहाल गोरगांव की नामकरण कहानी गांव के बुजुर्गों की यादों और पीढ़ियों से चली आ रही बातों में ही ज्यादा सुनाई देती है। यही वजह है कि छतरपुर का यह गांव अपने नाम को लेकर आज भी लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।