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  • लिवर खराब होने के 7 शुरुआती लक्षण; गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट से जानें पेशाब के रंग में बदलाव को क्यों न करें इग्नोर..

    लिवर खराब होने के 7 शुरुआती लक्षण; गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट से जानें पेशाब के रंग में बदलाव को क्यों न करें इग्नोर..

    लिवर खराब होने के 7 शुरुआती लक्षण; गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट से जानें पेशाब के रंग में बदलाव को क्यों न करें इग्नोर..

    लिवर हमारे शरीर का एक ऐसा महत्वपूर्ण अंग है, जो शुरुआती समस्याओं या बीमारी के दौरान अक्सर कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता। यही वजह है कि इसके खराब होने या फैटी लिवर जैसी स्थितियों का पता आसानी से और जल्दी नहीं चलता। हालांकि, शरीर छोटे-छोटे संकेतों के ज़रिए सजग करने की कोशिश करता है जिनमें से एक प्रमुख संकेत पेशाब (Urinary System) के रंग, मल या पेट के पाचन में बदलाव से जुड़ा होता है।

    AIIMS, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से प्रशिक्षित,बोर्ड-सर्टिफाइड गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट एवं हेपेटोलॉजिस्ट,डॉ. सौरभ सेठी ने बताया अगर आपके पेशाब का रंग गहरा पीला, लाल या असामान्य दिखता है, तो इसे सामान्य डिहाइड्रेशन मानकर नज़रअंदाज़ करना जोखिम भरा हो सकता है। लिवर की बीमारी के गंभीर लक्षणों का इंतजार करने के बजाय अपने जोखिम कारकों को समझना और जरूरत पड़ने पर समय पर जांच कराना ज्यादा जरूरी है। आइए एक्सपर्ट्स से समझते हैं लिवर से जुड़े 7 शुरुआती लक्षण कौन-कौन से हैं और पेशाब का बदला रंग आपके लिवर की सेहत के बारे में क्या संकेत देता है।

    पेशाब का रंग गहरा होना नजरअंदाज न करें

    डॉक्टर सौरव ने बताया लिवर में परेशानी होने पर यूरिन और मल के रंग में बदलाव हो सकता है। हालांकि पेशाब का गहरा रंग कई बार शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन की वजह से हो सकता है। इसी तरह कभी-कभार मल का थोड़ा हल्का या तैरता हुआ होना हमेशा चिंता का कारण नहीं होता। लेकिन अगर पर्याप्त पानी पीने के बावजूद पेशाब लगातार बहुत गहरा रहे और मल बार-बार सफेद, ग्रे या मिट्टी जैसे रंग का दिखाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पित्त मल को उसका सामान्य भूरा रंग देने में भूमिका निभाता है। अगर पित्त आंतों तक सामान्य तरीके से नहीं पहुंच पाता, तो मल का रंग फीका हो सकता है। वहीं बिलीरुबिन बढ़ने पर यह पेशाब में पहुंचकर उसे चाय या कोला जैसे गहरे रंग का बना सकता है। ऐसा लिवर में सूजन या बाइल डक्ट में रुकावट जैसी स्थितियों में हो सकता है। अगर इसके साथ खुजली या आंखों में पीलापन भी दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।

    बिना किसी दाने के लगातार खुजली होना

    शरीर में खुजली होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन लिवर में परेशानी होने पर भी बॉडी में खुजली की दिक्कत हो सकती है। लिवर और बाइल डक्ट यानी पित्त नली से जुड़ी बीमारियों में पित्त के सामान्य प्रवाह में रुकावट आ सकती है, जिससे स्किन पर किसी भी तरह का दाना दिखे बिना ही तेज खुजली हो सकती है। इसे कोलेस्टेटिक प्रुरिटस (Cholestatic Pruritus) कहा जाता है। यह खुजली शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है, लेकिन हथेलियों और तलवों में ज्यादा परेशानी हो सकती है। कई लोगों में यह रात के समय अधिक महसूस हो सकती है। अगर खुजली लगातार बनी हुई है और इसका कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आ रहा है, खासकर अगर इसके साथ दूसरे लक्षण भी मौजूद हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    स्किन पर मकड़ी जैसी छोटी लाल नसें दिखाई देना

    स्किन पर मकड़ी के आकार जैसी छोटी-छोटी लाल रक्त वाहिकाओं को स्पाइडर एंजियोमा (Spider Angioma) कहा जाता है। इसमें बीच में एक लाल बिंदु होता है और वहां से छोटी रक्त वाहिकाएं बाहर की तरफ फैलती हुई दिखाई देती हैं। एक-दो स्पाइडर एंजियोमा हेल्दी लोगों में भी हो सकते हैं, इसलिए इन्हें देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर ऐसी कई नई रक्त वाहिकाएं दिखाई देने लगें, खासकर चेहरे, कंधों और छाती के ऊपरी हिस्से पर, तो उसे नजरअंदाज नहीं करें। कुछ मामलों में इनका संबंध क्रॉनिक लिवर डिजीज या सिरोसिस से हो सकता है।

    हथेलियों का लाल होना आम नहीं

    हथेलियों का जरूरत से ज्यादा लाल दिखाई देना पाल्मर एरिथेमा (Palmar Erythema) कहलाता है। इसमें खासतौर पर अंगूठे और छोटी उंगली के आधार के आसपास हथेलियों में रेडनेस दिखाई दे सकती है। हालांकि ये सिर्फ लिवर की बीमारी का संकेत नहीं है। गर्भावस्था, थायरॉयड से जुड़ी समस्या और रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी दूसरी स्थितियों में भी हथेलियां लाल हो सकती हैं। इसलिए केवल लाल हथेलियों के आधार पर लिवर की बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन अगर इसके साथ स्पाइडर एंजियोमा और लिवर टेस्ट में असामान्यता जैसे दूसरे संकेत भी हों, तो डॉक्टर इसकी वजह की जांच कर सकते हैं।

    अचानक आसानी से चोट लगना या खून निकलना

    अगर पहले की तुलना में शरीर पर आसानी से नीले निशान पड़ने लगे हैं या बिना स्पष्ट कारण के खून निकलने जैसी समस्या होने लगी है, तो इसे गंभीरता से लेना जरूरी है। लिवर शरीर में सामान्य ब्लड क्लॉटिंग यानी खून जमने की प्रक्रिया में शामिल कई महत्वपूर्ण प्रोटीन बनाता है। गंभीर या एडवांस्ड लिवर डिजीज में इस प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।

    पेट में लगातार सूजन या पानी भरना

    पेट का लगातार बढ़ना, खासकर जब इसके साथ पैरों और टखनों में सूजन भी हो, लिवर की गंभीर बीमारी में देखा जा सकता है। एडवांस सिरोसिस में पेट के अंदर तरल पदार्थ जमा हो सकता है। इसे असाइटिस (Ascites) कहा जाता है। इसके कारण पेट का आकार धीरे-धीरे बढ़ सकता है। सिरोसिस के शुरुआती चरण में लिवर अपनी जरूरी प्रक्रियाएं काफी हद तक संभाल सकता है, लेकिन जब पेट में असाइटिस जैसी जटिलताएं विकसित होने लगती हैं, तो यह बीमारी के गंभीर होने का संकेत हो सकता है। अगर पेट लगातार बढ़ रहा है और साथ में पैरों में सूजन, सांस लेने में परेशानी, पेट दर्द या बुखार भी है, तो तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए।

    आंखों का पीला होना या अचानक भ्रम की स्थिति

    आंखों के सफेद हिस्से का पीला पड़ना पीलिया (Jaundice) कहलाता है। शरीर में बिलीरुबिन जमा होने के कारण ऐसा हो सकता है। पीलिया का मतलब हमेशा एंड-स्टेज सिरोसिस नहीं होता। एक्यूट हेपेटाइटिस, कुछ दवाओं से होने वाली लिवर इंजरी और बाइल डक्ट में रुकावट जैसी कई अन्य स्थितियां भी पीलिया का कारण बन सकती हैं। फिर भी अगर आंखें या स्किन अचानक पीली पड़ने लगे, तो इसकी वजह जानने के लिए जल्द डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। अगर लिवर की बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति अचानक कंफ्यूज होने लगे, बहुत ज्यादा नींद आने लगे, चीजें भूलने लगे या उसके व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई दे, तो यह हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी जैसी गंभीर जटिलता का संकेत हो सकता है।

    डिस्क्लेमर: ये जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। इनमें से किसी एक लक्षण का होना लिवर की बीमारी की पुष्टि नहीं करता। लक्षणों के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर डॉक्टर से जांच और उचित सलाह लें।

  • नेचुरल डायजेस्टिव टॉनिक का काम करता है अजवाइन का पानी, पेट की गैस और ब्लोटिंग से दे सकता है राहत, हंसाजी योगेंद्र ने बताया इसे बेस्ट सप्लीमेंट..

    नेचुरल डायजेस्टिव टॉनिक का काम करता है अजवाइन का पानी, पेट की गैस और ब्लोटिंग से दे सकता है राहत, हंसाजी योगेंद्र ने बताया इसे बेस्ट सप्लीमेंट..

    नेचुरल डायजेस्टिव टॉनिक का काम करता है अजवाइन का पानी, पेट की गैस और ब्लोटिंग से दे सकता है राहत, हंसाजी योगेंद्र ने बताया इसे बेस्ट सप्लीमेंट..

    गलत खान-पान, अनियमित खानेका समय, ज्यादा तला-भुना भोजन और खराब लाइफस्टाइल के कारण गैस, अपच और पेट फूलने जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। ऐसे में कुछ लोग घरेलू उपायों का सहारा लेते हैं। अजवाइन का पानी भी ऐसा ही एक पारंपरिक घरेलू नुस्खा है, जिसका इस्तेमाल लंबे समय से पाचन संबंधी परेशानियों में किया जाता रहा है। योग और वेलनेस एक्सपर्ट हंसाजी योगेंद्र के अनुसार, अजवाइन में थाइमोल (Thymol) जैसे यौगिक पाए जाते हैं, जो पाचन तंत्र पर असर डाल सकते हैं, पेट की ऐंठन या असहजता में मदद कर सकते हैं।

    हंसाजी योगेंद्र ने बताया ये पानी पेट की गैस और ब्लोटिंग को कंट्रोल करता है। अजवाइन में मौजूद कुछ सक्रिय यौगिक पाचन प्रक्रिया को सपोर्ट कर सकते हैं, जिससे कुछ लोगों को गैस और ब्लोटिंग में राहत महसूस हो सकती है। अजवाइन में पाया जाने वाला थाइमोल इसके प्रमुख सक्रिय यौगिकों में से एक है जो पाचन को सपोर्ट करता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि अजवाइन का पानी कैसे पाचन को दुरुस्त करता है।

    अजवाइन का पानी कैसे गैस, ब्लोटिंग और भारीपन में देता है राहत

    अजवाइन में मौजूद कुछ यौगिक पाचन प्रक्रिया को सपोर्ट कर सकते हैं। इसका पानी गैस और पेट फूलने जैसी पाचन से जुड़ी दिक्कतों में राहत दे सकता है। खासकर भारी खाना खाने के बाद अजवाइन का सेवन पेट के भारीपन को कम करने में मददगार माना जाता है। अजवाइन का इस्तेमाल पेट में होने वाली हल्की ऐंठन और मरोड़ के लिए भी घरेलू उपाय के तौर पर किया जाता है। इसमें मौजूद कुछ यौगिक पाचन तंत्र की मांसपेशियों को रिलैक्स करने में मदद कर सकते हैं। अजवाइन में मौजूद थाइमोल जैसे यौगिकों में एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए गए हैं। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि ये पानी पेट में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों के खिलाफ प्रभावी असर दिखाता है।

    अजवाइन के पानी पर क्या कहती है रिसर्च

    अजवाइन में थाइमोल और गैस्ट्रिक एंजाइम का स्राव होता है। फार्माकोलॉजिकल स्टडीज जैसे Journal of Ethnopharmacology और Evidence Based Complementary and Alternative Medicine के अनुसार थाइमोल पेट में Gastric Acid, पित्त और पाचन एंजाइमों जैसे एमाइलेज और लाइपेज के स्राव को उत्तेजित करता है। जब एंजाइम सही मात्रा में बनते हैं, तो खाना तेजी से और ठीक से पचता है, जिससे भोजन सड़ता नहीं है और गैस या पेट फूलने की समस्या नहीं बनती।

    अजवाइन में एंटीस्पास्मोडिक और कार्मिनेटिव गुण मौजूद होते हैं जो गैस बाहर निकालने वाले माने जाते हैं। लैब अध्ययनों और इन-विवो (In-vivo) स्टडीज से पता चला है कि थाइमोल आंतों की चिकनी मांसपेशियों पर कैल्शियम चैनल ब्लॉक करने का काम करता है। इससे पेट और आंतों की मांसपेशियों में आने वाली ऐंठन, मरोड़ और ब्लोटिंग दूर होती है। इसका सेवन करने से पेट में फंसी हुई गैस आसानी से बाहर निकल जाती है और पेट का भारीपन व ऐंठन मिनटों में कम हो जाती है।

    अजवाइन के वाष्पशील तेलों में थाइमोल और गामा-टेरपीनेने (γ-terpinene) जैसे एंटीमाइक्रोबियल यौगिक होते हैं। Journal of Food Science और कई माइक्रोबायोलॉजिकल अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि अजवाइन का अर्क पेट और आंतों में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया जैसे E. coli, Salmonella और Helicobacter pylori के विकास को रोकता है। जब पेट में खराब बैक्टीरिया पनपते हैं, तो वे भोजन को फॉर्मेट करके अत्यधिक गैस पैदा करते हैं। अजवाइन का पानी इन हानिकारक सूक्ष्मजीवों को कंट्रोल कर गैस बनने से रोकता है। कई रिसर्च में पाया गया है कि अजवाइन पेट खाली होने की दर (Gastric Emptying Time) में सुधार करती है। यानी जब आप बहुत भारी या तला-भुना खाना खाते हैं, तो अजवाइन का पानी पेट में भोजन को रुकने नहीं देता और इसे आंतों की ओर तेजी से बढ़ाता है, जिससे भारीपन की शिकायत नहीं होती।

    अजवाइन का पानी बनाने के दो आसान तरीके

    अजवाइन का पानी बनाने के लिए एक तरीका है कि एक चम्मच अजवाइन को एक गिलास पानी में रातभर भिगोकर सुबह छानकर पिया जाए। दूसरे तरीके में एक चम्मच अजवाइन को दो कप पानी में करीब 5 मिनट तक उबालकर, ठंडा होने दें और उसके बाद छानकर उसका सेवन कर लें। स्वाद के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में काला नमक या नींबू भी मिला सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: अजवाइन का पानी गैस, अपच या एसिडिटी का इलाज नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लगातार बने रहने पर डॉक्टर से सलाह लें।

  • डायबिटीज में सेब खाएं या अंगूर, कौन सा फल Blood Sugar के लिए बेहतर? जानें डायटीशियन की राय..

    डायबिटीज में सेब खाएं या अंगूर, कौन सा फल Blood Sugar के लिए बेहतर? जानें डायटीशियन की राय..

    डायबिटीज में सेब खाएं या अंगूर, कौन सा फल Blood Sugar के लिए बेहतर? जानें डायटीशियन की राय..

    डायबिटीज से पीड़ित मरीजों के लिए खानपान का सही चुनाव करना हमेशा एक बड़ी चुनौती होता है, खासकर जब बात फलों के सेवन की आए। मीठे स्वाद और प्राकृतिक शुगर के कारण अक्सर मरीज दुविधा में रहते हैं कि अंगूर खाएं या सेब। जहां सेब में भरपूर फाइबर और लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जो शुगर स्पाइक को रोकने में मदद करता है; वहीं अंगूर में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं, लेकिन इसका ग्लाइसेमिक लोड थोड़ा अलग हो सकता है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के फूड डेटा सेंट्रल के अनुसार, अंगूर में भी कई पोषक तत्व पाए जाते हैं जो सेहत को फायदा पहुंचाते हैं। डायबिटीज कंट्रोल करने और ब्लड शुगर के स्तर को कंट्रोल रखने के लिए इन दोनों में से कौन सा फल अधिक सुरक्षित है, किसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बेहतर है और इन्हें खाने का सही तरीका क्या होना चाहिए? सभी बातों की जानकारी होना जरूरी है।

    हेल्थडॉटकॉम में रजिस्टर्ड डायटीशियन, ब्रियाना टोब्रिट्ज़होफर के प्रकाशित लेख में डायटीशियन ने बताया ब्लड शुगर को मैनेज करने के मामले में सेब (Apple) अंगूर की तुलना में थोड़ा बेहतर विकल्प हो सकता है, क्योंकि इसमें अंगूर के मुकाबले ज्यादा फाइबर होता है। एक मीडियम साइज के सेब में लगभग 4 ग्राम फाइबर होता है, जबकि एक कप अंगूर में करीब 1.5 ग्राम फाइबर पाया जाता है। फाइबर कार्बोहाइड्रेट के पाचन और शरीर में इसके अवशोषण की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करता है। इससे खाना खाने के बाद ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि डायबिटीज मरीजों के लिए अंगूर का सेवन ज्यादा फायदेमंद है या फिर सेब का।

    डायबिटीज में सेब और अंगूर कैसे करता है असर?

    सेब में पेक्टिन (Pectin) नाम का एक घुलनशील फाइबर भी होता है। यह पाचन तंत्र में जेल जैसी संरचना बना सकता है। पेक्टिन पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है। इसके अलावा ये ब्लड शुगर कंट्रोल करने और हार्ट हेल्थ को दुरुस्त रखने में भी अहम किरदार निभा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि अंगूर सेहत के लिए खराब विकल्प हैं। अंगूर में पॉलीफेनॉल (Polyphenols) पाए जाते हैं। ये प्राकृतिक पौधों के यौगिक हैं, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली सूजन से बचाने में मदद कर सकते हैं। अंगूर में मौजूद रेस्वेराट्रोल (Resveratrol) और एंथोसायनिन (Anthocyanins) जैसे कुछ यौगिक ब्लड शुगर को नॉर्मल रखने में मददगार हो सकते हैं।

    कोई भी खाना कितनी तेजी से ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा सकता है इसका अंदाजा शोधकर्ता उस फूड के ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) से लगाते हैं। GI कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थों को इस आधार पर रैंक करता है कि वो तय भोजन की तुलना में ब्लड शुगर कितनी तेजी से बढ़ाते हैं। आमतौर पर कम GI वाले खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर को ज्यादा धीरे बढ़ाते हैं, जबकि ज्यादा GI वाले खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकते हैं। सेब को लो-GI फूड माना जाता है। इसका GI आमतौर पर 36 से 40 के बीच होता है। वहीं, अंगूर का GI थोड़ा ज्यादा होता है और यह आमतौर पर 43 से 53 के बीच हो सकता है। यह अंतर अंगूर की किस्म के आधार पर बदल सकता है। हालांकि, दोनों ही फल लो से मॉडरेट GI रेंज में आते हैं और इनका GI सफेद ब्रेड, कैंडी या मीठे पेय जैसे खाद्य पदार्थों की तुलना में काफी कम होता है।

    फलों की बनावट भी ब्लड शुगर को कर सकती है प्रभावित

    फलों की बनावट भी इस बात को प्रभावित कर सकती है कि शरीर उसे कितनी तेजी से पचाता है। सेब सख्त होता है और इसे खाने के लिए ज्यादा चबाना पड़ता है। इसमें अंगूर की तुलना में अधिक फाइबर भी होता है। ये दोनों कारण खाना खाने के बाद ब्लड शुगर में होने वाली बढ़ोतरी को अपेक्षाकृत धीमा करने में मदद कर सकते हैं। साबुत अंगूर और साबुत सेब खाने पर इसमें मौजूद फाइबर बना रहता है लेकिन अगर फलों का सेवन उसका जूस बनाकर किया जाए तो उसमें से फाइबर की मात्रा बहुत कम या लगभग खत्म हो जाती है। जिस भी फूड या लिक्विड में फाइबर की मात्रा कम हो जाती है उसे खाने के बाद ब्लड में शुगर का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है।

    सेब और अंगूर के पोषक तत्व

    एक कप अंगूर और एक मध्यम आकार के सेब में पोषक तत्व

    हालांकि सेब में फाइबर ज्यादा होता है, लेकिन अंगूर में विटामिन K और पोटैशियम जैसे कुछ पोषक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। दोनों ही फलों में कई तरह के विटामिन, मिनरल और प्राकृतिक पौधों के यौगिक मौजूद होते हैं। इसलिए किसी एक पोषक तत्व पर ध्यान देने के बजाय, दोनों फलों के पूरे पोषण प्रोफाइल को देखना ज्यादा बेहतर है। संतुलित डाइट में सेब और अंगूर दोनों ही पौष्टिक विकल्प हो सकते हैं।

    ब्लड शुगर कंट्रोल रखने के लिए सेब और अंगूर का सेवन कैसे करें?

    आप सेब खाएं या अंगूर, कुछ आसान आदतें खाने के बाद ब्लड शुगर को ज्यादा समय तक नॉर्मल रखने में मदद कर सकती हैं।

    फल के साथ प्रोटीन वाली चीजें लें तो आपका ब्लड में शुगर का स्तर नॉर्मल रहेगा। फल को नट्स, दही, बीज या चीज जैसे प्रोटीन और हेल्दी फैट वाले खाद्य पदार्थों के साथ खाया जा सकता है। फल के साथ इन चीजों को लेने से पाचन धीमा हो सकता है और स्नैक या भोजन ज्यादा संतुलित बन सकता है जिससे ब्लड शुगर में अचानक बढ़ोतरी नहीं होती।

    जूस की जगह साबुत फल खाएं। साबुत सेब और अंगूर में प्राकृतिक रूप से फाइबर मौजूद होता है, जबकि जूस में शुगर ज्यादा होती है और शरीर इसे तेजी से अवशोषित कर लेता है। इसलिए आमतौर पर जूस की तुलना में साबुत फल बेहतर विकल्प होते हैं।

    अलग-अलग फलों को डाइट में शामिल करें। अलग-अलग फलों में अलग-अलग तरह के विटामिन, मिनरल और पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं। इसलिए डाइट में कई तरह के फलों को शामिल करने से न्यूट्रिशन प्रोफाइल बेहतर हो सकती है।

    फल की मात्रा का ध्यान रखें।कोई भी पौष्टिक भोजन ज्यादा मात्रा में खाने पर ब्लड शुगर बढ़ा सकता है। इसलिए एक मध्यम सेब या लगभग एक कप अंगूर एक उपयोगी सर्विंग के तौर पर देखा जा सकता है। ब्लड शुगर को मैनेज करने में इस तरह के छोटे और लगातार किए जाने वाले बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। डायबिटीज में डाइट को लेकर अपने डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह जरूर लें।

  • थायरॉइड में कौन-सा नमक: है बेस्ट? Iodized या सेंधा? जानिए डॉक्टर की सही सलाह!.

    थायरॉइड में कौन-सा नमक: है बेस्ट? Iodized या सेंधा? जानिए डॉक्टर की सही सलाह!.

    थायरॉइड में कौन-सा नमक: है बेस्ट? Iodized या सेंधा? जानिए डॉक्टर की सही सलाह!.

    थायराइड के मरीजों में अक्सर यह भ्रम रहता है कि उनके लिए कौन सा नमक सही है। क्या आयोडीन युक्त नमक लेना चाहिए या फिर सेंधा नमक (Rock Salt)? खासकर हाइपोथायरायडिज्म में वजन बढ़ने और हाइपरथायराइडिज्म में वजन घटने जैसी समस्याओं के कारण लोग नमक को लेकर कई तरह की धारणाएं बना लेते हैं। हालांकि, शरीर में आयोडीन की कमी या जरूरत से ज्यादा आयोडीन, दोनों ही कुछ परिस्थितियों में थायराइड के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।

    मुंबई की एंडोक्राइनोलॉजिस्ट (हार्मोन विशेषज्ञ) डॉ. तनवी मयूर पटेल के अनुसार, थायराइड के मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि उन्हें आयोडाइज्ड नमक खाना चाहिए या नॉन-आयोडाइज्ड नमक। थायराइड ग्रंथि T3 और T4 हार्मोन बनाती है और इनके निर्माण के लिए आयोडीन जरूरी होता है। हमारा शरीर खुद आयोडीन नहीं बनाता, इसलिए इसकी पूर्ति भोजन के जरिए करनी पड़ती है। अब सवाल उठता है कि शरीर में आयोडीन की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने के लिए कौन सा नमक लेना चाहिए? क्या थायराइड के मरीजों को आयोडाइज्ड नमक छोड़कर सेंधा नमक लेना चाहिए? आइए एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. तनवी मयूर पटेल से जानते हैं।

    बॉडी में आयोडीन की कमी होने पर कैसा होता है असर

    थायराइड की बीमारी कम या ज्यादा नमक खाने से सीधे नहीं होती, लेकिन शरीर में आयोडीन की कमी या जरूरत से ज्यादा आयोडीन थायराइड के कामकाज को प्रभावित कर सकता है। शरीर में आयोडीन की कमी होने पर थायराइड हार्मोन का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक गंभीर आयोडीन की कमी रहने पर गॉइटर और हाइपोथायराइडिज्म जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, जरूरत से ज्यादा आयोडीन का सेवन भी कुछ लोगों में थायराइड के कामकाज को प्रभावित कर सकता है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पर्याप्त आयोडीन खासतौर पर जरूरी है, क्योंकि थायराइड हार्मोन शरीर के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।

    शरीर के लिए कितनी मात्रा में आयोडीन जरूरी है?

    आयोडीन की दैनिक जरूरत उम्र और स्थिति के अनुसार अलग अलग होती है। बच्चों में इसकी जरूरत कम होती है, जबकि 12 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए करीब 150 माइक्रोग्राम प्रतिदिन की जरूरत होती है। गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान आयोडीन की जरूरत बढ़ जाती है और यह करीब 250 माइक्रोग्राम प्रति दिन तक हो सकती है।

    आयोडीन के दूसरे स्रोत कौन से हैं?

    आयोडीन सिर्फ नमक से ही नहीं मिलता। समुद्री खाद्य पदार्थ, मछली, झींगा और कुछ समुद्री शैवाल इसके स्रोत हो सकते हैं। इसके अलावा दूध और कुछ डेयरी प्रोडक्ट से भी आयोडीन मिल सकता है। हालांकि, भोजन से मिलने वाली आयोडीन की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।

    क्या ज्यादा आयोडीन भी थायराइड के लिए नुकसानदायक है?

    आयोडीन की कमी की तरह इसकी अत्यधिक मात्रा भी कुछ लोगों में थायराइड को प्रभावित कर सकती है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के आयोडीन सप्लीमेंट लेना सही नहीं माना जाता। कुछ दवाओं और मेडिकल प्रक्रियाओं में भी आयोडीन की मात्रा अधिक हो सकती है, इसलिए थायराइड के मरीजों को अपने डॉक्टर को ऐसी दवाओं या जांच के बारे में जानकारी देनी चाहिए।

    क्या थायराइड के मरीज आयोडाइज्ड नमक खा सकते हैं?

    डॉक्टर ने बताया थायराइड के मरीज आयोडाइज्ड नमक खा सकते हैं या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि थायराइड की समस्या किस वजह से है और व्यक्ति को भोजन से कितना आयोडीन मिल रहा है। अगर आयोडीन की कमी है, तो आयोडाइज्ड नमक उपयोगी हो सकता है। वहीं, जिन लोगों को भोजन या अन्य स्रोतों से पर्याप्त आयोडीन मिल रहा है, उनको अतिरिक्त आयोडीन की जरूरत नहीं होती। इसलिए थायराइड की बीमारी होने पर नमक को पूरी तरह बदलने या आयोडीन सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

    हिमालयन पिंक सॉल्ट या सेंधा नमक कितना सही है?

    हिमालयन पिंक सॉल्ट, रॉक सॉल्ट या सेंधा नमक को लोग अक्सर सामान्य नमक से ज्यादा हेल्दी मानते हैं। लेकिन इनमें आयोडीन की मात्रा आयोडाइज्ड नमक की तरह सुनिश्चित नहीं होती। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ नॉन-आयोडाइज्ड नमक इस्तेमाल करता है और भोजन से भी पर्याप्त आयोडीन नहीं मिल रहा है, तो आयोडीन की कमी हो सकती है। थायराइड के साथ-साथ नमक की कुल मात्रा पर भी ध्यान देना जरूरी है। ज्यादा नमक खाने से शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ सकती है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर और पानी रुकने जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि नमक आयोडाइज्ड है या नहीं, बल्कि रोजाना कुल कितना नमक लिया जा रहा है यह भी जरूरी है।

    पैकेट और प्रोसेस्ड फूड से भी बढ़ सकता है नमक का सेवन

    नमक का सेवन आप सिर्फ खाने में ही नहीं करते बल्कि आप इसे चिप्स, पापड़, अचार, इंस्टेंट और अन्य पैकेज्ड या प्रोसेस्ड फूड में भी काफी मात्रा में कंज्यूम करते हैं। इन फूड्स के जरिए व्यक्ति जरूरत से ज्यादा नमक का सेवन कर सकता है।

    थायराइड मरीज नमक को लेकर क्या सावधानी रखें?

    थायराइड होने के बाद हर व्यक्ति को नॉन-आयोडाइज्ड नमक पर स्विच करने की जरूरत नहीं होती। आयोडाइज्ड नमक को पूरी तरह छोड़ने से पहले यह देखना जरूरी है कि शरीर को आयोडीन की पर्याप्त मात्रा दूसरे खाद्य स्रोतों से मिल रही है या नहीं। साथ ही, नमक की कुल मात्रा सीमित रखना भी जरूरी है। कौन सा नमक लेना है और आयोडीन की अतिरिक्त जरूरत है या नहीं, यह व्यक्ति की बीमारी, खान-पान और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर कर सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। थायराइड मरीज नमक या आयोडीन की मात्रा में बदलाव करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

  • कब्ज से हैं परेशान? गैस्ट्रोलॉजिस्ट से जानिए 4 नेचुरल ड्रिंक और खास तरीके जो पेट पर करेंगे नेचुरल लैक्जेटिव का काम.

    कब्ज से हैं परेशान? गैस्ट्रोलॉजिस्ट से जानिए 4 नेचुरल ड्रिंक और खास तरीके जो पेट पर करेंगे नेचुरल लैक्जेटिव का काम.

    कब्ज से हैं परेशान? गैस्ट्रोलॉजिस्ट से जानिए 4 नेचुरल ड्रिंक और खास तरीके जो पेट पर करेंगे नेचुरल लैक्जेटिव का काम.

    असंतुलित खान-पान, पानी की कमी और सुस्त जीवनशैली के कारण आज कब्ज (Constipation) एक बेहद आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या बन चुकी है। पेट साफ न होने पर दिनभर भारीपन, आलस और चिड़चिड़ापन बना रहता है। लोग अक्सर इससे राहत पाने के लिए तुरंत दवाइयों या चूर्ण का सहारा लेते हैं, लेकिन लंबे समय तक इसका सेवन आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है। कब्ज एक आम समस्या है, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। आमतौर पर जब मल त्याग सामान्य से कम हो जाए, मल बहुत सख्त हो या मल त्याग करते समय दर्द और ज्यादा जोर लगाना पड़े, तो इसे कब्ज माना जाता है। हर व्यक्ति की टॉयलेट की आदत अलग होती है, लेकिन सामान्य रूप से दिन में तीन बार से लेकर हफ्ते में तीन बार तक मल त्याग होने को नॉर्मल माना जाता है।

    हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और एम्स से प्रशिक्षित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, डॉ. सौरव सेठी ने बताया प्रकृति में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद हैं जो दवाइयों के बजाय एकदम सुरक्षित और प्राकृतिक लैग्जेटिव की तरह काम करते हैं। आपकी रोजमर्रा की कुछ आदते आपके कब्ज का कारण बन सकती हैं इनमें सुधार करना जरूरी है। रोजाना डाइट में कम फाइबर का सेवन करना, पर्याप्त फल-सब्जियां नहीं खाना, शरीर में पानी की कमी और टॉयलेट जाने की इच्छा को बार-बार रोकना कब्ज के आम कारणों में शामिल हैं। हालांकि कई बार कब्ज का कोई स्पष्ट कारण नहीं पता चलता। डॉक्टर सौरव सेठी ने बताया अगर आप लाइफस्टाइल में बदलाव करें, कुछ नेचुरल चीजों का सेवन करें तो आसानी से कब्ज का इलाज कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कब्ज का नेचुरल इलाज क्या है।

    कब्ज में राहत के लिए 4 प्राकृतिक ड्रिंक

    प्रून जूस का करें सेवन

    द अमेरिकी जर्नल ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और PubMed Central में प्रकाशित क्लिनिकल ट्रायल्स के अनुसार, प्रून जूस क्रोनिक कब्ज के इलाज में काफी प्रभावी है। प्रून यानी सूखे बेर से बने प्रून जूस से है जिसमें सॉर्बिटोल नाम का नेचुरल शुगर अल्कोहल पाया जाता है। यह हल्के लैक्सेटिव की तरह काम कर सकता है और मल त्याग में मदद कर सकता है। हालांकि, ज्यादा मात्रा में लेने पर कुछ लोगों को गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है। एक्सपर्ट ने बताया प्रून जूस आंतों में पानी बनाए रखने में मदद कर सकता है और मल को नरम करने में मददगार हो सकता है। इसलिए प्रून जूस का इस्तेमाल कब्ज में राहत के लिए किया जाता है।

    नींबू पानी पिएं

    गुनगुने पानी में ताजा नींबू का रस मिलाकर पीना पाचन को बढ़ावा देने और कब्ज में राहत देने में बेहद असरदार साबित होता है। ये घरेलू उपाय सुबह के समय बेहद असरदार साबित होता है। खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का सेवन बॉडी को हाइड्रेट करता है और बॉडी को हेल्दी रखता है। मेडिकल स्टडीज और फिजियोलॉजी के अनुसार, नींबू पानी का असर मुख्य रूप से गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स और हाइड्रेशन पर आधारित है। सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से पेट और आंतों की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और कब्ज से राहत मिलती है।

    अदरक की चाय पिएं

    गैस्ट्रोएंटरोलॉजी रिसर्च और PubMed में दर्ज अध्ययनों के अनुसार, अदरक में प्रोकिनेटिक (Prokinetic) गुण होते हैं जो गैस्ट्रिक खाली होने की प्रक्रिया को तेज करते हैं। अदरक में पाए जाने वाले सक्रिय बायोएक्टिव यौगिक जिंजरोल और शोगाओल (Gingerol & Shogaol) आंतों की चिकनी मांसपेशियों के संकुचन को बढ़ाते हैं। अदरक की चाय कब्ज में मददगार साबित होती है। अदरक पाचन तंत्र को सक्रिय करने और मल त्याग को बढ़ावा देने में मददगार साबित होती है।

    एलोवेरा जूस पिएं

    एलोवेरा के लैक्सेटिव गुणों पर कई क्लिनिकल स्टडीज मौजूद हैं। यूएस एफडीए (FDA) ने भी इसको नेचुरल लैक्सेटिव बताया है। एलोवेरा में कुछ ऐसे यौगिक पाए जाते हैं जो पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। थोड़ी मात्रा में एलोवेरा जूस का सेवन पानी के साथ करने से फायदा होता है। हालांकि, एलोवेरा जूस हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए इसका नियमित या अधिक मात्रा में सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।

    इन तरीकों से करें कब्ज को दूर

    टॉयलेट सीट पर पैर ऊंचे रखें

    कब्ज में मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाने से बचने के लिए टॉयलेट पर बैठते समय पैरों के नीचे छोटा स्टूल रख लें। इससे घुटने कूल्हों से थोड़ा ऊपर आ जाते हैं और मलाशय का कोण सीधा होने में मदद मिल सकती है। इससे मल को डिस्चार्ज करने में मदद मिलती है।

    पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं

    मल को सॉफ्ट रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी है। रोजाना करीब आठ गिलास पानी पीना आपके पाचन के दुरुस्त रखने के लिए जरूरी है। हालांकि, पानी की जरूरत हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। इसके साथ ही डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ाना भी मददगार हो सकता है।

    डाइट में फाइबर बढ़ाएं

    फाइबर मल में पानी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे मल सॉफ्ट हो सकता है और उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। इसके लिए डाइट में फल, सब्जियां और ओट्स जैसे फाइबर वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।

    रोजाना शारीरिक गतिविधि करें

    नियमित रूप से पैदल चलना और एक्सरसाइज करना भी कब्ज से राहत पाने में मदद कर सकता है। शारीरिक गतिविधि आंतों की गति को बढ़ाने में मदद करती है। जब मल बड़ी आंत में ज्यादा समय तक रुका रहता है, तो उसमें से पानी अधिक अवशोषित हो सकता है और मल सूखकर सख्त हो सकता है।

    जरूरत पड़ने पर लैक्सेटिव का करें इस्तेमाल

    अगर खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव से कब्ज में पर्याप्त राहत नहीं मिलती, तो डॉक्टर की सलाह से लैक्सेटिव का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाजार में अलग-अलग तरह के लैक्सेटिव उपलब्ध हैं, इसलिए इन्हें अपनी मर्जी से लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। कुछ लैक्सेटिव केवल थोड़े समय के लिए इस्तेमाल किए जाने चाहिए।

    बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव

    बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव डाइट में फाइबर बढ़ाने की तरह काम करते हैं। ये मल में पानी बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे मल को बाहर निकालना आसान हो सकता है। इन्हें असर करने में आमतौर पर 2 से 3 दिन लग सकते हैं। शुरुआत में इससे गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है, जो समय के साथ कम हो सकती है।

    ऑस्मोटिक लैक्सेटिव

    ऑस्मोटिक लैक्सेटिव आंतों में पानी बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे मल नरम हो जाता है और उसे बाहर निकालना आसान होता है। इन्हें भी असर करने में कुछ दिन लग सकते हैं। इनका इस्तेमाल करते समय पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी होता है।

    स्टीमुलेंट लैक्सेटिव

    सेन्ना जैसे स्टीमुलेंट लैक्सेटिव आंतों की गतिविधि को बढ़ाकर मल त्याग में मदद करते हैं। इनके कारण आंतों में संकुचन बढ़ता है, जिससे कुछ लोगों को पेट में ऐंठन या क्रैंप हो सकते हैं। इनका असर कुछ घंटों में हो सकता है।

    स्टूल सॉफ्टनर

    डॉक्यूसेट सोडियम जैसे स्टूल सॉफ्टनर मल में पानी की मात्रा बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे सख्त और सूखे मल को नरम करके बाहर निकालना आसान हो सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। कब्ज के घरेलू उपाय या लैक्सेटिव हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। लगातार या बार-बार कब्ज, तेज पेट दर्द, उल्टी, मल में खून या अचानक वजन कम होने जैसे लक्षण हों तो डॉक्टर से सलाह लें। किसी भी लैक्सेटिव या एलोवेरा जूस का सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।

  • किडनी खराब होने से पहले: शरीर देता है ये संकेत, इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

    किडनी खराब होने से पहले: शरीर देता है ये संकेत, इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

    किडनी खराब होने से पहले: शरीर देता है ये संकेत, इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

    किडनी हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है। इसका मुख्य काम खून से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल पदार्थ को फिल्टर करके बाहर निकालना है। समस्या यह है कि किडनी की बीमारी शुरुआती दौर में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकती है। इसी वजह से कई लोगों को बीमारी का पता तब चलता है, जब किडनी की कार्यक्षमता काफी प्रभावित हो चुकी होती है।

    हालांकि, शरीर में कुछ ऐसे बदलाव हो सकते हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देना जरूरी है। खासकर पेशाब में बदलाव, पैरों या चेहरे पर सूजन और लगातार कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

    शुरुआत में दिख सकते हैं ये संकेत

    किडनी की समस्या के शुरुआती चरण में लक्षण बहुत हल्के हो सकते हैं। कुछ लोगों को रात में बार-बार पेशाब आने, सामान्य से ज्यादा कमजोरी या भूख कम लगने जैसी परेशानी हो सकती है।

    लेकिन ये लक्षण केवल किडनी की बीमारी के कारण ही हों, यह जरूरी नहीं है। इसलिए सिर्फ लक्षणों के आधार पर किडनी की बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती।

    बीमारी बढ़ने पर शरीर में क्या बदलाव होते हैं?

    जब किडनी की कार्यक्षमता ज्यादा प्रभावित होने लगती है तो कुछ लक्षण अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:

    • पैरों और टखनों में सूजन
    • चेहरे या आंखों के आसपास सूजन
    • पेशाब की मात्रा कम होना
    • भूख कम लगना
    • उल्टी या मतली
    • वजन कम होना
    • लगातार कमजोरी और थकान

    गंभीर अवस्था में शरीर में विषैले पदार्थ बढ़ने के कारण भ्रम, बेहोशी या दौरे जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं।

    चेहरे और पैरों में सूजन क्यों आती है?

    किडनी ठीक से काम नहीं करती तो शरीर में अतिरिक्त पानी और नमक जमा होने लग सकता है। इसका असर चेहरे, आंखों के आसपास और पैरों में सूजन के रूप में दिखाई दे सकता है।

    दिनभर खड़े रहने या चलने से पैरों में सूजन ज्यादा नजर आ सकती है, जबकि लेटने या आराम करने के बाद चेहरे और आंखों के आसपास सूजन दिखाई दे सकती है। कुछ गंभीर मामलों में पेट में भी तरल पदार्थ जमा हो सकता है।

    किडनी की बीमारी बिना लक्षण के भी हो सकती है

    किडनी की बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में कई लोगों को कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। इसका मतलब यह है कि केवल शरीर में लक्षण दिखाई देने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है।

    डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान की आदत या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास रखने वाले लोगों को नियमित जांच पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

    किडनी की जांच के लिए कौन से टेस्ट होते हैं?

    किडनी की कार्यक्षमता जांचने के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार कई टेस्ट करा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:

    सीरम क्रिएटिनिन: इससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का अनुमान लगाने में मदद मिलती है।

    eGFR: क्रिएटिनिन समेत अन्य जानकारी के आधार पर किडनी की फिल्ट्रेशन क्षमता का अनुमान लगाया जाता है।

    UACR: पेशाब में एल्ब्यूमिन यानी प्रोटीन के रिसाव का पता लगाने में मदद करता है। किडनी की बीमारी के शुरुआती संकेतों में यह जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।

    अल्ट्रासाउंड: इससे किडनी के आकार, पथरी, रुकावट और कुछ अन्य संरचनात्मक समस्याओं की जानकारी मिल सकती है।

    डायबिटीज और हाई BP से बढ़ सकता है किडनी का खतरा

    डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। लंबे समय तक ब्लड शुगर या ब्लड प्रेशर नियंत्रित न रहने पर किडनी की रक्त वाहिकाओं और फिल्टरिंग सिस्टम पर असर पड़ सकता है।

    इसलिए डायबिटीज और हाई BP वाले लोगों के लिए नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इन दोनों को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है।

    क्या BP की दवा किडनी के लिए नुकसानदायक है?

    आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना किडनी की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। कुछ BP की दवाएं पेशाब में प्रोटीन के रिसाव को कम करने और किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद कर सकती हैं।

    हालांकि, दवा का चुनाव व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार किया जाता है। इसलिए BP की दवा अपनी मर्जी से बंद या शुरू नहीं करनी चाहिए।

    किडनी मरीजों को नमक पर देना चाहिए ध्यान

    किडनी की बीमारी और हाई BP वाले लोगों को नमक की मात्रा को लेकर सावधानी बरतनी पड़ सकती है। ज्यादा नमक शरीर में पानी जमा होने और ब्लड प्रेशर बढ़ने की समस्या को बढ़ा सकता है।

    पापड़, नमकीन, पैकेज्ड स्नैक्स, अचार और ज्यादा नमक वाली चटनी जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखना उपयोगी हो सकता है। नमक की सही मात्रा व्यक्ति की बीमारी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार तय की जानी चाहिए।

    क्या किडनी मरीज दूध पी सकते हैं?

    किडनी की बीमारी होने पर हर व्यक्ति के लिए दूध पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है। दूध में कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व होते हैं, लेकिन किडनी की बीमारी बढ़ने पर प्रोटीन, फास्फोरस और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा को लेकर विशेष डाइट की जरूरत पड़ सकती है।

    इसलिए दूध और अन्य डेयरी उत्पादों की मात्रा मरीज की किडनी की स्थिति और पूरी डाइट के आधार पर तय करना बेहतर होता है।

    CKD की कौन सी स्टेज गंभीर होती है?

    क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD को आमतौर पर पांच स्टेज में बांटा जाता है। स्टेज 5 में किडनी की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाती है और eGFR आमतौर पर 15 से नीचे होता है।

    हालांकि, केवल eGFR देखकर यह तय नहीं किया जाता कि मरीज को तुरंत डायलिसिस की जरूरत है या नहीं। शरीर में पानी जमा होना, पोटैशियम का बढ़ना, लगातार उल्टी, गंभीर कमजोरी और अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखा जाता है।

    डायलिसिस कब पड़ सकती है जरूरत?

    जब किडनी शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल पदार्थ पर्याप्त रूप से बाहर नहीं निकाल पाती, तब कुछ मरीजों में डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है।

    डायलिसिस शुरू करने का फैसला केवल एक टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर नहीं होता। डॉक्टर मरीज के लक्षण, किडनी की कार्यक्षमता, शरीर में तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट्स और पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर निर्णय लेते हैं।

    किडनी को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?

    किडनी की सेहत बनाए रखने के लिए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है:

    • ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखें।
    • नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
    • धूम्रपान से बचें।
    • शराब का सेवन करते हैं तो इसे सीमित रखें।
    • बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार दर्द की दवाएं या अन्य OTC दवाएं न लें।
    • पर्याप्त पानी पिएं, लेकिन किडनी की बीमारी होने पर तरल पदार्थ की मात्रा डॉक्टर की सलाह से तय करें।
    • जोखिम वाले लोगों को नियमित किडनी जांच करानी चाहिए।

    किन लोगों को नियमित किडनी जांच करानी चाहिए?

    डायबिटीज, हाई BP, मोटापा, धूम्रपान की आदत या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास रखने वाले लोगों को नियमित जांच पर ध्यान देना चाहिए। अधिक उम्र के लोगों में भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार किडनी की जांच कराना उपयोगी हो सकता है।

    किडनी की बीमारी में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसे केवल लक्षणों के आधार पर पहचानने की कोशिश न करें। अगर आप किसी जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं या शरीर में लगातार असामान्य बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर जरूरी जांच कराएं।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। किडनी की बीमारी का इलाज या दवा शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।

  • आंखों की रोशनी और पाचन: के लिए कितनी फायदेमंद है कद्दू की सब्जी? जानिए न्यूट्रिशनिस्ट की राय

    आंखों की रोशनी और पाचन: के लिए कितनी फायदेमंद है कद्दू की सब्जी? जानिए न्यूट्रिशनिस्ट की राय

    आंखों की रोशनी और पाचन: के लिए कितनी फायदेमंद है कद्दू की सब्जी? जानिए न्यूट्रिशनिस्ट की राय

    रोजमर्रा की भागदौड़ और अनियमित खानपान के बीच पेट की समस्याएं और आंखों की थकान आजकल एक आम परेशानी बन चुकी है। ऐसे में हमारी रसोई में पाई जाने वाली साधारण सी कद्दू (Sitaphal) की सब्जी शरीर के लिए किसी वरदान से कम साबित नहीं होती। विटामिन-A, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर कद्दू न केवल पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मदद करता है, बल्कि आंखों की रोशनी और ओवर ऑल हेल्थ को दुरुस्त रखने में भी मददगार माना जाता है।

    रजिस्टर्ड डाइटिशियन लॉरेन स्लेटन , MS, RD, For Trainers की संस्थापक ने बताया कद्दू को अक्सर सिर्फ सब्जी या मौसमी फल के तौर पर देखा जाता है, लेकिन पोषण के लिहाज से यह काफी उपयोगी फूड है। कद्दू में कैलोरी कम होती है और यह बीटा-कैरोटीन, फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्वों का स्रोत है। पोषण विशेषज्ञों के अनुसार इसे डाइट में शामिल करने से आंखों की रोशनी दुरुस्त रहती है, पाचन तंत्र ठीक से काम करता है और दिल की सेहत में भी सुधार होता है।

    कद्दू में कौन-कौन से पोषक तत्व पाए जाते हैं?

    कद्दू में विटामिन A प्रमुख पोषक तत्वों में से एक है। एक कप कद्दू से रोजाना की जरूरत का लगभग 78 प्रतिशत विटामिन A मिल सकता है। कद्दू बीटा-कैरोटीन का भी अच्छा स्रोत है। इसकी मात्रा कद्दू के कच्चे, पके या कैन्ड होने के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। एक्सपर्ट के मुताबिक कैन्ड कद्दू में बीटा-कैरोटीन की मात्रा अधिक हो सकती है। इसके अलावा कद्दू में थोड़ी मात्रा में विटामिन C, विटामिन E, पोटैशियम और कॉपर भी पाए जाते हैं। लगभग एक कप कैन्ड कद्दू में करीब 49 कैलोरी, 3 ग्राम फाइबर, 12 ग्राम कार्बोहाइड्रेट और 2 ग्राम प्रोटीन होता है। इसमें फैट की मात्रा बहुत कम होती है।

    आंखों के लिए कैसे फायदेमंद हो सकता है कद्दू?

    कद्दू में मौजूद विटामिन A और कैरोटीनॉयड आंखों की सेहत को दुरुस्त रखने में मददगार साबित होता है। इसमें पाया जाने वाला बीटा-कैरोटीन शरीर में विटामिन A में बदल सकता है, जो सामान्य दृष्टि और आंखों की हेल्थ के लिए बेहद जरूरी पोषक तत्व है। उम्र बढ़ने के साथ आंखों को हेल्दी रखने के लिए पर्याप्त पोषक तत्वों वाली डाइट महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

    पाचन और आंतों के लिए उपयोगी है फाइबर

    कद्दू में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए उपयोगी है। पर्याप्त फाइबर का सेवन मल त्याग को नियमित रखने और लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस कराने में मदद कर सकता है। फाइबर आंतों में मौजूद माइक्रोबायोटा के लिए भी उपयोगी होता है। यही वजह है कि फाइबर युक्त खाद्य पदार्थों को संतुलित डाइट का हिस्सा माना जाता है।

    इम्यून सिस्टम को सपोर्ट करता है कद्दू

    कद्दू में मौजूद विटामिन A और विटामिन C शरीर की इम्यूनिटी को सपोर्ट करने वाला पोषक तत्व हैं। इसके अलावा इसमें कैरोटीनॉयड जैसे एंटीऑक्सीडेंट यौगिक भी पाए जाते हैं। कद्दू की सब्जी का सेवन सब्जी,भुजिया,जूस और हलवा बनाकर करें तो बॉडी को फायदा होगा।

    हार्ट हेल्थ के लिए भी है उपयोगी

    कद्दू में पोटैशियम पाया जाता है, जो शरीर में कई महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जरूरी खनिज है। यह सामान्य मांसपेशियों के कामकाज और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल रखने में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए संतुलित आहार में पोटैशियम वाले खाद्य पदार्थों को शामिल करना दिल की हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकता है।

    वजन और भूख को मैनेज करने में है मददगार

    कद्दू में कैलोरी अपेक्षाकृत कम और भरपूर फाइबर मौजूद होता है। फाइबर की वजह से भोजन के बाद लंबे समय तक पेट भरा हुआ महसूस हो सकता है, जिससे बार-बार खाने या स्नैकिंग की इच्छा कम करने में मदद मिल सकती है। कद्दू का सेवन बैलेंस डाइट में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है।

    कद्दू खाने का सही तरीका क्या है?

    कद्दू में मौजूद बीटा-कैरोटीन फैट-सॉल्युबल होता है। इसे थोड़ी मात्रा में हेल्दी फैट वाले खाद्य पदार्थों के साथ खाने से शरीर में इसके अवशोषण में मदद मिल सकती है। इसके लिए कद्दू को ऑलिव ऑयल, एवोकाडो या नट्स जैसे खाद्य पदार्थों के साथ खाया जा सकता है। कद्दू को दाल या बीन्स जैसी चीजों के साथ भी पकाया जा सकता है। इससे एक ही डिश में अलग-अलग पोषक तत्व शामिल हो जाते हैं।

    कैंड कद्दू या ताजा कद्दू, कौन बेहतर?

    कैन्ड कद्दू और घर पर पकाए गए ताजा कद्दू में पोषण का अंतर बहुत ज्यादा नहीं होता। हालांकि, दोनों के स्वाद, टेक्सचर और इस्तेमाल में अंतर हो सकता है। एक्सपर्ट के मुताबिक हर जगह ताजा कद्दू आसानी से उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में 100 प्रतिशत कद्दू से बना, बिना अतिरिक्त चीनी या अन्य अनावश्यक सामग्री वाला कैन्ड pumpkin puree एक सुविधाजनक विकल्प हो सकता है। इसे लंबे समय तक स्टोर किया जा सकता है और साल भर अलग-अलग व्यंजनों में इस्तेमाल किया जा सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य पोषण संबंधी जानकारी पर आधारित है। किसी बीमारी या विशेष स्वास्थ्य स्थिति में डाइट में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य डाइटिशियन की सलाह लें।

  • क्यों 40 के बाद हेल्थ नंबर्स: जानना जरूरी है, आपको कौन सी जांच करानी चाहिए

    क्यों 40 के बाद हेल्थ नंबर्स: जानना जरूरी है, आपको कौन सी जांच करानी चाहिए

    शरीर में कोई लक्षण महसूस नहीं हो रहे हैं तो आप स्वस्थ हैं ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ बीमारियां साइलेंट होती हैं। अगर इनकी सही समय पर जांच करा ली जाए तो गंभीर खतरे को कम किया जा सकता है। आइये जानते हैं 40 साल के बाद आपको कौन सी जांच जरूर करानी चाहिए?

    हम अक्सर सोचते हैं कि दिल की बीमारियों का खतरा 40 या 50 की उम्र के बाद बढ़ता है। इसी वजह से 30 की उम्र में बहुत से लोग ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर या कोलेस्ट्रॉल जैसी बेसिक जांच को जरूरी नहीं मानते। लेकिन हृदय से जुड़े कई जोखिम कारक कम उम्र में ही शुरू हो सकते हैं और लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के रह सकते हैं। इसलिए आपको सतर्क होने और समय पर अपनी जांच करवाते रहना जरूरी है।

    उम्र से ज्यादा जरूरी है जोखिम समझना

    डॉक्टर दीपक संघवी (सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और एगिलस डायग्नोस्टिक्स में मुंबई रेफरेंस लैब के प्रमुख) के मुताबिक, हार्ट हेल्थ को केवल उम्र के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। परिवार में कम उम्र में हार्ट की बीमारियों का इतिहास, हाई ब्लड प्रेशर, बढ़ा हुआ ब्लड शुगर, हाई कोलेस्ट्रॉल, अधिक वजन, धूम्रपान और शारीरिक गतिविधि की कमी जैसे कारक जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर जरूरी नहीं कि कोई लक्षण दिखाई दे। व्यक्ति सामान्य महसूस कर सकता है, जबकि उसकी रिपोर्ट में बदलाव पहले से मौजूद हो सकते हैं। इसलिए केवल 40 की उम्र का इंतजार करना हर व्यक्ति के लिए सही तरीका नहीं है।

    कौन से हेल्थ टेस्ट आपको कराने चाहिए?

    शुरुआत में आप कुछ सामान्य टेस्ट करवा सकते हैं। ब्लड प्रेशर नियमित रूप से जांचना जरूरी है, क्योंकि हाई ब्लड प्रेशर अक्सर बिना लक्षण के रहता है। ब्लड शुगर से डायबिटीज या बढ़े हुए शुगर के स्तर का पता लगाने में मदद मिलती है। वहीं लिपिड प्रोफाइल के जरिए कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स जैसे स्तरों को समझा जा सकता है। इसके साथ वजन और कमर का घेरा भी ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि पेट के आसपास बढ़ी चर्बी कई स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ी हो सकती है।

    40 के बाद बढ़ जाता है बीमारियों का खतरा

    40 से पहले जांच कराने का मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को हर साल कई टेस्ट कराने चाहिए। परिवार का इतिहास, जीवनशैली, वजन और पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर जांच की जरूरत अलग हो सकती है। इसलिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच कराना बेहतर है। हृदय स्वास्थ्य के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि हम केवल बीमारी के लक्षण आने का इंतजार न करें। अपने जरूरी हेल्थ नंबर्स को समय-समय पर जानना, उनमें होने वाले बदलावों को समझना और जरूरत पड़ने पर जीवनशैली में सुधार करना, कम उम्र से ही हृदय की देखभाल की दिशा में एक अहम कदम हो सकता है।

  • वेट लॉस के दौरान क्यों: बढ़ जाती है मीठा खाने की क्रविंग? डॉक्टर ने बताया इसकी पीछे की

    वेट लॉस के दौरान क्यों: बढ़ जाती है मीठा खाने की क्रविंग? डॉक्टर ने बताया इसकी पीछे की

    वेट लॉस के दौरान क्यों: बढ़ जाती है मीठा खाने की क्रविंग? डॉक्टर ने बताया इसकी पीछे की

    वेट लॉस करने वाले लोगों में मीठा खाने की क्रेविंग बढ़ जाती है। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। यहां हम आपको बताने जा रहे हैं कि ऐसा क्यों होता है।

    आज के समय वेट लॉस करना काफी चैलेंजिंग हो गया है। जब लोग वजन घटाना शुरू करते हैं, तो अक्सर एक अजीब सी क्रेविंग होती है। आप जितना अपनी डाइट पर कंट्रोल करने की कोशिश करें, मीठा खाने की क्रेविंग उतनी ही बढ़ जाती है। दोपहर के खाने के बाद या रात को डिनर के बाद कुछ न कुछ मीठा खाने की बहुत ज्यादा क्रेविंग होती है। कई बार तो इतनी ज्यादा क्रेविंग होती है कि इसे कंट्रोल कर पाना मुश्किल हो जाता है और लोग न चाहते हुए भी मीठा खा लेते हैं। लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि ऐसा क्यों होता है। दरअसल इसके पीछे एक शारीरिक (physiological) कारण भी है जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। डॉ. प्रसन्ना कार्तिक एस, जनरल फिजिशियन एंड सीनियर कंसलटेंट, इंटरनल मेडिसिन, ग्लेनेगल्स बता रहे हैं कि ऐसा क्यों होता है।

    हार्मोनल चेंजेज की वजह से होती है मीठी खाने की क्रेविंग

    घ्रेलिन: यह हार्मोन भूख बढ़ाने का काम करता है। जब आप कैलोरी कम लेते हैं, तो भूख के ये संकेत और तेज करता है।

    लेप्टिन: यह हार्मोन शरीर के फैट से बनता है, जो दिमाग को एनर्जी और भूख को कंट्रोल करने में मदद करता है। वजन/फैट कम होने पर लेप्टिन का स्तर घटने लगता है। इन बदलावों के कारण व्यक्ति को ज्यादा भूख महसूस होती है और लंबे समय तक वजन घटाना मुश्किल लगने लगता है।

    एनर्जी बचाने का तरीका: हमारा शरीर अपनी बची हुई ऊर्जा की रक्षा करने के लिए बना है। जब कैलोरी की कमी होती है, तो शरीर को लगता है कि एनर्जी की कमी हो रही है। इस वजह से खाने की क्रेविंग होती है और खासतौर पर मीठा खाने का मन करता है। इसलिए वजन घटाने के दौरान शुगर क्रेविंग हमेशा अनुशासन की कमी नहीं होती, बल्कि यह डाइट में की गई कटौती पर शरीर की एक नेचुरल रिएक्शन हो सकती है।

    खाना छोड़ना, बहुत स्ट्रिक्ट डाइट फॉलो करना, या पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन और फाइबर न लेना भी कारण हो सकता है। इससे खाना खाने के तुरंत बाद फिर से भूख लगने लगती है।

    वहीं कुछ लोगों में ब्लड शुगर के उतार-चढ़ाव से भी ऐसा महसूस हो सकता है, हालांकि मीठा खाने की क्रेविंग का मतलब हमेशा लो ब्लड शुगर होना नहीं होता।

    मीठी चीजें दिमाग के उस हिस्से को सक्रिय करती हैं जो खुशी और संतुष्टि से जुड़ा है। जब कोई व्यक्ति तनाव में होता है, नींद पूरी नहीं लेता, या पसंदीदा खाने से दूर रहता है, तो मीठे की तलब बढ़ जाती है। किसी भी खाने को पूरी तरह से “मना” कर देने से संतुलित डाइट बनाए रखना और मुश्किल हो जाता है।

    क्रेविंग को कैसे कंट्रोल करें?

    अपनी डाइट में भरपूर पोषण, प्रोटीन और फाइबर लें।

    भोजन समय पर करें और कैलोरी की कटौती उतनी ही करें जो शरीर संभाल सके।

    अच्छी नींद, स्ट्रेस मैनेजमेंट और फिजिकल एक्टिविटी भी भूख को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।

    डॉक्टर की सलाह कब लें?

    कभी-कभार मीठा खाने का मन होना आम बात है और इसका मतलब यह नहीं है कि डायबिटीज या कोई हार्मोनल समस्या है। हालांकि, अगर बहुत ज्यादा प्यास लगने, बार-बार पेशाब आने या बिना वजह थकान महसूस होने के साथ लगातार मीठा खाने की क्रेविंग हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

  • Garba Partner on Rent: नवरात्रि में गर्लफ्रेंड नहीं तो क्या हुआ! अब किराए पर मिलेगा गरबा पार्टनर, ₹1000 से शुरू पैकेज, ₹2000 में पूरे दिन का साथ

    Garba Partner on Rent: नवरात्रि में गर्लफ्रेंड नहीं तो क्या हुआ! अब किराए पर मिलेगा गरबा पार्टनर, ₹1000 से शुरू पैकेज, ₹2000 में पूरे दिन का साथ

    Garba Partner on Rent: नवरात्रि में गर्लफ्रेंड नहीं तो क्या हुआ! अब किराए पर मिलेगा गरबा पार्टनर, ₹1000 से शुरू पैकेज, ₹2000 में पूरे दिन का साथ

    गुजरात: नवरात्रि का त्योहार आते ही गरबा और डांडिया की धूम शुरू हो जाती है। लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर गरबा खेलने की तैयारियों में जुट जाते हैं। लेकिन इस दौरान कई सिंगल लोगों के मन में एक सवाल रहता है कि आखिर गरबा खेलने के लिए पार्टनर कहां से लाएं? अब इसी परेशानी का एक अनोखा और मजेदार समाधान सामने आया है, जिसने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच लिया है।

    गुजरात के इंस्टाग्राम यूजर कृष मिस्त्री ने ‘रेंट-ए-गरबा पार्टनर’ नाम से एक अनोखा आइडिया शेयर किया है। इसमें गरबा खेलने के लिए अलग-अलग कीमतों पर पार्टनर के साथ समय बिताने के पैकेज बताए गए हैं। इन पैकेज की शुरुआती कीमत 1000 रुपये रखी गई है।

    ₹1000 के सिल्वर पैकेज में क्या मिलेगा?

    कृष मिस्त्री की ओर से साझा की गई जानकारी के मुताबिक, सिल्वर पैकेज की कीमत 1000 रुपये है। इसमें दो घंटे तक गरबा खेलने का मौका मिलेगा। इसके साथ मैचिंग आउटफिट, गरबा के बेसिक स्टेप्स सीखने और सेल्फी लेने जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

    यह पैकेज उन लोगों के लिए पेश किया गया है, जो गरबा खेलने के लिए साथी तलाश रहे हैं और कम समय के लिए इस अनुभव का हिस्सा बनना चाहते हैं।

    ₹1500 के गोल्ड पैकेज में फिल्मी अंदाज

    गोल्ड पैकेज की कीमत 1500 रुपये बताई गई है। इसके तहत चार घंटे तक गरबा खेलने का मौका मिलेगा। इसके अलावा पहली मुलाकात को फिल्मी अंदाज देने और सोशल मीडिया के लिए रील बनाने जैसी सुविधाओं का भी जिक्र किया गया है।

    यानी इस पैकेज में गरबा खेलने के साथ-साथ यादगार पल बनाने का विकल्प भी शामिल किया गया है।

    ₹2000 के प्लैटिनम पैकेज में पूरे दिन का साथ

    सबसे महंगा प्लैटिनम पैकेज 2000 रुपये का है। पोस्ट में इसके तहत पूरे दिन गरबा खेलने और कुछ अतिरिक्त सुविधाएं देने की बात कही गई है।

    इस पैकेज में माथे पर प्यार भरा किस, दुपट्टा और झुमके ठीक करने में मदद तथा कार्यक्रम के बाद घर तक सुरक्षित छोड़ने जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया गया है।

    सोशल मीडिया पर लोगों ने लिए जमकर मजे

    कृष मिस्त्री का यह अनोखा आइडिया सामने आते ही सोशल मीडिया पर लोगों ने मजेदार प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। कुछ लोगों ने पैकेज की जानकारी लेने में दिलचस्पी दिखाई, तो कुछ यूजर्स ने इसे साइड बिजनेस का अनोखा विचार बताया।

    वहीं, कई लोगों ने इस पूरे कॉन्सेप्ट को मजाकिया अंदाज में लिया और तरह-तरह के कमेंट किए। नवरात्रि के दौरान गरबा पार्टनर किराए पर देने का यह आइडिया लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

    फिलहाल यह जानकारी कृष मिस्त्री की सोशल मीडिया पोस्ट में साझा किए गए आइडिया और पैकेज पर आधारित है।