कहा जाता है कि इंसान प्रकृति को बहुत कुछ सिखाती है बशर्ते प्रकृति की भाषा को समझना आना चाहिए. धरती पर मौजूद पेड़-पौधे, नदी, पहाड़ से लेकर जानवर और इंसान तक सब प्रकृति की ही देन है. इंसानों के लिए इन सभी का अपना महत्व और खासियत है. आज ऐसे ही एक छोटे से जंतु की बात करने जा रहे हैं. यह दिखने में तो छोटा है लेकिन, ये जहां लग गया समझो उसे चट कर गया.
आशीष कुमार/पश्चिम चम्पारण:
बिहार के इकलौते टाइगर रिजर्व ‘वाल्मीकि’ में दीमकों के टीलों की भरमार है. रेतीली लाल मिट्टी से बने इन टीलों की लंबाई एक फीट से लेकर 12 फीट तक देखी गई है. आश्चर्य की बात यह है कि हर टीलों में लाखों दीमक रहते हैं, जो समय समय पर अपने आस पास मौजूद पेड़ पौधों या लकड़ियों में मौजूद सेल्यूलोज को खाते हैं. वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स का मानना है कि दीमक प्रकृति के एक शानदार इंजीनियर हैं, जिनकी कारीगरी का लोहा वैज्ञानिकों ने भी माना है.
12 फीट तक लंबे टीले
विशेषज्ञों के अनुसार, दीमको के ये टीले प्राकृतिक इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण हैं, जिन्हें वे अपनी लार, मल और मिट्टी के मिश्रण से तैयार करते हैं. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के मंगुराहा रेंज में कार्यरत नेचर गाइड सूरज बताते हैं कि रिजर्व के लगभग हर रेंज में इन टीलों की बड़ी संख्या देखने को मिलती है. इनकी ऊंचाई एक फीट से लेकर 12 फीट तक होती है और उनमें लाखों दीमक रहते हैं. एक बांबी को तैयार करने में 2 से 6 साल तक का समय लग जाता है.
गर्मी में भी ठंड का एहसास
वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ अभिषेक के मुताबिक, ये टीले बेहद मजबूत और टिकाऊ होते हैं. तेज बारिश, आंधी-तूफान या भीषण गर्मी का इन पर खास असर नहीं पड़ता. हैरानी की बात यह है कि बाहर का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद बांबी के अंदर का तापमान लगभग 24-25 डिग्री बना रहता है, जो प्राकृतिक एयर कंडीशनिंग का बेहतरीन उदाहरण है.
अनोखी संरचना
इनकी संरचना भी बेहद खास होती है. जितनी ऊंचाई जमीन के ऊपर होती है, उतनी ही गहराई जमीन के अंदर भी होती है. इस तरह की बनावट के कारण अंदर हवा का संतुलित प्रवाह बना रहता है, जिससे हर मौसम में अनुकूल वातावरण तैयार होता है.
प्रकृति के इंजीनियर
दीमक कॉलोनी में रहते हैं, जहां रानी, राजा, सैनिक और श्रमिक की स्पष्ट भूमिका होती है. रानी दीमक एक दिन में 25 से 30 हजार तक अंडे दे सकती है. हालांकि, ये कीट घरों में नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन जंगल में इन्हें ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ माना जाता है. भालू और पैंगोलिन जैसे जीव इनका शिकार भी करते हैं. सालों की मेहनत से तैयार ये टीले न केवल वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय हैं, बल्कि जंगल सफारी पर आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई हैं.
बच्चे के बुखार में माता-पिता को सिर्फ थर्मामीटर की रीडिंग पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि बच्चे की पूरी स्थिति पर नजर रखनी चाहिए. सही जानकारी और समय पर चिकित्सकीय सलाह अनावश्यक दवाओं से बचाने के साथ गंभीर बीमारी की पहचान में भी मदद कर सकती है.
बच्चों को बुखार आते ही माता-पिता अक्सर घबरा जाते हैं और तापमान कम करने के लिए तुरंत दवा, ठंडे पानी की पट्टी या एंटीबायोटिक का सहारा लेने लगते हैं. हालांकि, हर बुखार गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता. बुखार शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का संक्रमण से लड़ने का एक स्वाभाविक तरीका है. ऐसे में जरूरी है कि माता-पिता केवल थर्मामीटर की रीडिंग पर ध्यान देने के बजाय बच्चे की पूरी स्थिति को समझें. बच्चों में बुखार को लेकर के डॉ. जैन से बात की. उन्होंने बच्चों के बुखार से जुड़े कुछ आम मिथकों और जरूरी सावधानियों के बारे में बताया है.
मिथक 1: तेज बुखार का मतलब गंभीर बीमारी नहीं… तेज बुखार हमेशा गंभीर बीमारी का संकेत नहीं होता. वायरल संक्रमण में भी बच्चे का तापमान काफी बढ़ सकता है. बीमारी की गंभीरता जानने के लिए बच्चे का व्यवहार, उसकी सक्रियता, सांस लेने में परेशानी और पानी पीने की क्षमता पर ध्यान देना जरूरी है. अगर बुखार कम होने के बाद बच्चा सामान्य तरीके से खेल रहा है और तरल पदार्थ ले रहा है तो यह राहत की बात हो सकती है.
मिथक 2: हर बुखार में एंटीबायोटिक जरूरी अधिकांश बच्चों में बुखार वायरल संक्रमण के कारण होता है और एंटीबायोटिक वायरस पर असर नहीं करती. बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक देने से दुष्प्रभाव और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ सकता है. इसलिए दवा देने से पहले बुखार का कारण समझना जरूरी है.
मिथक 3: तापमान को तुरंत 98.6°F करना जरूरी बुखार का इलाज केवल तापमान को सामान्य करने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि बच्चे की परेशानी कम करना मुख्य उद्देश्य होता है. बच्चा आराम से है, पर्याप्त तरल पदार्थ ले रहा है और सामान्य व्यवहार कर रहा है तो सिर्फ तापमान के आंकड़े को लेकर घबराने की जरूरत नहीं है. आराम और पर्याप्त तरल पदार्थ देना भी महत्वपूर्ण है.
मिथक 4: ठंडे पानी या बर्फ से बुखार जल्दी उतरता है बहुत ठंडे पानी या बर्फ का इस्तेमाल करने से बच्चे को कंपकंपी हो सकती है और वह ज्यादा असहज महसूस कर सकता है. बच्चे को हल्के और आरामदायक कपड़े पहनाएं और पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ दें.
मिथक 5: दांत निकलने से तेज बुखार होता है दांत निकलने के दौरान बच्चे में चिड़चिड़ापन हो सकता है, लेकिन तेज बुखार को केवल दांत निकलने की वजह मानना सही नहीं है. ऐसे में संक्रमण जैसे दूसरे संभावित कारणों पर भी ध्यान देना चाहिए.इन लक्षणों में तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें अगर बच्चा बहुत सुस्त है, उसे जगाने में परेशानी हो रही है, सांस लेने में दिक्कत है, लगातार उल्टी हो रही है, वह पानी नहीं पी पा रहा है, पेशाब कम हो गया है, गर्दन अकड़ रही है, दौरा पड़ा है या शरीर पर असामान्य बैंगनी या खूनी दाने दिखाई दे रहे हैं तो तुरंत चिकित्सकीय मदद लें. तीन महीने से कम उम्र के बच्चे का तापमान 38°C या 100.4°F या इससे अधिक होने पर भी तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
झांसी: उत्तर प्रदेश के झांसी स्थित महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज से इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है। यहां एक महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई। इसके बाद उसका पति शव को स्ट्रेचर पर रखकर मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में बैठा रहा। उसके पास शव को घर ले जाने के लिए पैसे नहीं थे।
बारिश के बीच पति काफी देर तक मदद का इंतजार करता रहा। वहीं उसकी करीब 8 साल की बेटी अपनी मां के शव के पास बैठकर रोती रही। परिवार की हालत देखकर मेडिकल कॉलेज के एक पुलिसकर्मी ने पहल की और एंबुलेंस की व्यवस्था कराकर महिला का शव उसके घर भिजवाया।
इलाज के लिए ओरछा से झांसी आया था परिवार
जानकारी के मुताबिक, मध्य प्रदेश के ओरछा निवासी राहुल आदिवासी अपनी पत्नी रामवती का इलाज कराने अस्पताल पहुंचे थे। रामवती की तबीयत गंभीर होने के बाद उन्हें झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया।
राहुल के मुताबिक, परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। इसके बावजूद डॉक्टर ने पैसे देकर टैक्सी की व्यवस्था कराई, जिसके बाद वह अपनी पत्नी और करीब 8 साल की बेटी नंदनी के साथ झांसी पहुंचे।
मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों ने महिला को मृत घोषित किया
मेडिकल कॉलेज पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने रामवती को मृत घोषित कर दिया। पत्नी की मौत के बाद राहुल के सामने अब शव को वापस घर ले जाने की बड़ी समस्या खड़ी हो गई।
उसके पास शव को ले जाने के लिए वाहन का इंतजाम करने के पैसे नहीं थे। ऐसे में उसने पत्नी के शव को स्ट्रेचर पर रखा और मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में बैठकर मदद का इंतजार करने लगा।
बारिश में शव के पास बैठा रहा पति
राहुल काफी देर तक मेडिकल कॉलेज की पार्किंग में स्ट्रेचर के पास बैठा रहा। एक तरफ पत्नी का शव था और दूसरी तरफ उसकी छोटी बेटी मां की मौत से बेहद परेशान थी।
नंदनी अपनी मां के शव के पास बैठकर रोती रही। परिवार के पास न तो शव को घर ले जाने के लिए पर्याप्त पैसे थे और न ही कोई निजी वाहन।
बताया गया कि बारिश के कारण हालात और भी मुश्किल हो गए थे। परिवार को उम्मीद थी कि किसी तरह मदद मिल जाएगी और वे महिला के शव को अपने घर ले जा सकेंगे।
पुलिसकर्मी की नजर पड़ी तो हुई एंबुलेंस की व्यवस्था
कुछ देर बाद मेडिकल कॉलेज चौकी में तैनात सिपाही अजय की नजर पार्किंग में बैठे परिवार पर पड़ी। उसने स्थिति को समझने के बाद तत्काल मदद की कोशिश शुरू की।
सिपाही ने एंबुलेंस की व्यवस्था कराई। इसके बाद रामवती के शव को एंबुलेंस के जरिए उनके घर भेजा गया।
मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने जांच की बात कही
इस मामले को लेकर मेडिकल कॉलेज के सीएमएस सचिन माहौर ने बताया कि किसी मरीज की मौत के बाद परिजन शव वाहन की मांग करते हैं तो मेडिकल कॉलेज की ओर से वाहन उपलब्ध कराया जाता है।
उन्होंने संभावना जताई कि डॉक्टरों ने शव परिजनों को सौंप दिया हो, लेकिन परिवार की ओर से शव वाहन की जरूरत के बारे में जानकारी नहीं दी गई हो। हालांकि, उन्होंने इस पूरे मामले की जांच कराने की बात कही है।
यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए किसी अपने की मौत के बाद अंतिम संस्कार तक शव पहुंचाना भी कई बार बड़ी चुनौती बन जाता है।
हनुमान चालीसा की कौन सी चौपाई किस समस्या के लिए पढ़ी जाती है? जानें बुद्धि, एकाग्रता, स्वास्थ्य, रिश्तों और मुश्किल समय के लिए खास चौपाइयां, साथ ही जाप करने की सही विधि और जरूरी सावधानियां.
हनुमान चालीसा भगवान हनुमान की भक्ति और प्रार्थना का एक सरल माध्यम है. इसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा था. इसमें 40 चौपाइयां हैं, इसलिए इसे चालीसा कहा जाता है. आसान भाषा में होने के कारण इसका पाठ बड़ी संख्या में लोग करते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, हनुमान चालीसा का पाठ मन को शांति देता है और भगवान हनुमान की कृपा पाने में मदद करता है.
क्या है हनुमान चालीसा का महत्व?
हनुमान चालीसा की अलग-अलग चौपाइयों को अलग-अलग भाव और प्रार्थना से जोड़ा जाता है. भक्त अपनी जरूरत के अनुसार किसी चौपाई का जाप कर सकते हैं. मान्यता है कि नियमित पाठ से डर और चिंता कम करने में मदद मिल सकती है और मन में आत्मविश्वास बढ़ता है.
हनुमान चालीसा का पाठ कैसे करें?
हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए सबसे पहले भगवान हनुमान और श्रीराम की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठें. सामने जल से भरा पात्र रख सकते हैं. अपनी श्रद्धा के अनुसार 3 से 108 बार तक हनुमान चालीसा का पाठ किया जाता है. पाठ पूरा होने के बाद जल को प्रसाद की तरह ग्रहण करने की धार्मिक परंपरा भी है.
कोशिश करें कि रोज एक ही समय पर पाठ किया जाए. विशेष स्थिति में यात्रा के दौरान या सोने से पहले भी हनुमान चालीसा पढ़ी जा सकती है. मन लगाकर और श्रद्धा के साथ पाठ करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.
चौपाइयों का जाप कैसे करें?
अपनी जरूरत के अनुसार हनुमान चालीसा की किसी एक चौपाई का चयन कर सकते हैं. धार्मिक विधि के अनुसार सुबह तुलसी की माला से 3 से 11 माला तक जाप किया जाता है. जिस अवधि तक यह जाप करें, उस दौरान खान-पान और व्यवहार में संयम रखने की सलाह दी जाती है.
• बुद्धि और एकाग्रता के लिए
पढ़ाई, बुद्धि और एकाग्रता के लिए इस चौपाई का जाप किया जाता है:
सऊदी अरब: दुनिया के सबसे शुष्क देशों में शामिल सऊदी अरब में पानी की जरूरत पूरी करना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है। देश का बड़ा हिस्सा रेगिस्तान है, बारिश बेहद कम होती है और प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत भी सीमित हैं। इसके बावजूद यहां करोड़ों लोग रहते हैं और उनके घरों तक रोजाना पीने का पानी पहुंचता है।
आखिर ऐसा कैसे संभव है? इसके पीछे समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने की आधुनिक तकनीक, विशाल डिसेलिनेशन प्लांट और सैकड़ों किलोमीटर लंबा पाइपलाइन नेटवर्क काम करता है।
रेगिस्तान में पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती
सऊदी अरब का अधिकांश हिस्सा बेहद सूखा और रेगिस्तानी है। देश के कई इलाकों में गर्मियों के दौरान तापमान 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच जाता है, जबकि बारिश भी बहुत कम होती है।
देश की बड़ी आबादी लाल सागर और फारस की खाड़ी के आसपास रहती है। वहीं अंदरूनी हिस्सों में कई इलाके बेहद शुष्क और कम आबादी वाले हैं। ऐसे में समुद्र के किनारे तैयार किए गए पानी को दूर बसे शहरों तक पहुंचाने के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया गया है।
समुद्र का खारा पानी बनता है पीने लायक
सऊदी अरब के लिए समुद्र पानी का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है, लेकिन समुद्री पानी सीधे पीने योग्य नहीं होता। इसमें बड़ी मात्रा में नमक और अन्य अशुद्धियां मौजूद होती हैं।
इसी वजह से देश में बड़े-बड़े डिसेलिनेशन प्लांट लगाए गए हैं। इन प्लांट में समुद्र से पानी खींचकर उसे कई चरणों में साफ किया जाता है और उसमें मौजूद नमक तथा दूसरी अशुद्धियों को अलग किया जाता है।
समुद्र से पानी प्लांट तक पहुंचाने के लिए तट के पास बड़े इनटेक पाइप लगाए जाते हैं। पानी के साथ समुद्री जीव और बड़े कण सिस्टम में न आएं, इसके लिए शुरुआती स्तर पर विशेष स्क्रीन का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके बाद पानी को अलग-अलग फिल्टर से गुजारा जाता है। पहले बड़े कण और अशुद्धियां हटाई जाती हैं, फिर सैंड फिल्टर और अन्य फिल्ट्रेशन सिस्टम के जरिए पानी को और साफ किया जाता है। इसके बाद बारीक कार्ट्रिज फिल्टर छोटे कणों को भी अलग करने में मदद करते हैं।
रिवर्स ऑस्मोसिस है सबसे अहम चरण
समुद्री पानी को मीठा बनाने की प्रक्रिया में रिवर्स ऑस्मोसिस बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें हाई-प्रेशर पंप समुद्री पानी को विशेष मेम्ब्रेन से गुजारते हैं।
इस मेम्ब्रेन से पानी के अणु आगे निकल जाते हैं, जबकि नमक और कई दूसरी अशुद्धियां पीछे रह जाती हैं। इस प्रक्रिया के बाद पानी काफी हद तक शुद्ध हो जाता है।
हालांकि, रिवर्स ऑस्मोसिस के बाद पानी में जरूरी मिनरल की मात्रा भी कम हो सकती है। इसलिए इसे पीने योग्य बनाने के लिए कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी मिनरल दोबारा मिलाए जाते हैं। साथ ही पानी का pH स्तर भी नियंत्रित किया जाता है।
सैकड़ों किलोमीटर तक जाती हैं पानी की पाइपलाइन
पानी को समुद्र के किनारे तैयार करने के बाद असली चुनौती उसे रेगिस्तान के दूर-दराज इलाकों तक पहुंचाने की होती है। इसके लिए सऊदी अरब ने विशाल पाइपलाइन नेटवर्क तैयार किया है।
इन पाइपलाइनों के जरिए डिसेलिनेशन प्लांट से तैयार पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर शहरों और दूसरे इलाकों तक पहुंचाया जाता है। इसे रेगिस्तान के बीच बनी एक कृत्रिम नदी की तरह समझा जा सकता है।
इतनी गर्मी में कैसे टिकती हैं पाइपलाइन?
रेगिस्तान में पाइपलाइन बिछाना आसान काम नहीं है। तेज गर्मी, रेत के खिसकने और जमीन के दबाव जैसी कई चुनौतियां सामने आती हैं।
इसके लिए मजबूत सामग्री से पाइप तैयार किए जाते हैं। बड़े पैमाने पर कार्बन स्टील का इस्तेमाल किया जाता है। पाइप तैयार होने के बाद उनकी अल्ट्रासोनिक टेस्टिंग की जाती है और जंग से बचाने के लिए विशेष कोटिंग भी की जाती है।
पाइपलाइन बिछाने से पहले सर्वे टीमें इलाके का निरीक्षण करती हैं। GPS और आधुनिक सर्वे उपकरणों की मदद से पाइपलाइन का रास्ता तय किया जाता है। ऐसे क्षेत्रों से बचने की कोशिश की जाती है जहां रेत के टीले लगातार खिसकते रहते हैं या जमीन पाइपलाइन के लिए खतरा पैदा कर सकती है।
इस पूरे सिस्टम पर खर्च होता है भारी पैसा
सऊदी अरब के लिए समुद्री पानी को पीने योग्य बनाना और फिर उसे दूर-दराज के शहरों तक पहुंचाना बेहद महंगा काम है।
बड़े डिसेलिनेशन प्लांट बनाने और चलाने के अलावा पानी को सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंचाने के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क की जरूरत होती है। इसके निर्माण, रखरखाव और पानी की पंपिंग पर भी भारी खर्च आता है।
दरअसल, सऊदी अरब में पानी की पूरी व्यवस्था उसकी प्राकृतिक परिस्थितियों की मजबूरी भी है। जहां नदियां और बारिश बेहद सीमित हैं, वहां आधुनिक तकनीक ने समुद्र को ही मीठे पानी के बड़े स्रोत में बदल दिया है।
यही वजह है कि डिसेलिनेशन प्लांट और विशाल पाइपलाइन नेटवर्क सऊदी अरब के लिए सिर्फ तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने वाला बेहद महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा बन चुका है।
Saudi Arabia has no rivers… yet billions of litres of freshwater are produced every day.
So how does a desert country turn the ocean into drinking water?
चंडीगढ़ के एक आर्मी अफसर के ब्रेन डेड घोषित होने के बाद परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए हृदय दान किया, जिसे ग्रीन कॉरिडोर बनाकर महज 16 मिनट में नोएडा के फोर्टिस अस्पताल पहुंचाया गया.
चंडीगढ़ के एक आर्मी अफसर ने दुनिया से विदा होने के बाद भी किसी जरूरतमंद को नई जिंदगी देने की मिसाल पेश की. ब्रेन डेड घोषित किए जाने के बाद परिवार ने अफसर की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए उनके अंगदान का फैसला लिया. उनका दिल नोएडा के फोर्टिस अस्पताल में भर्ती एक मरीज के हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए भेजा गया. दिल को समय पर अस्पताल पहुंचाने के लिए पुलिस ने ऐसा ग्रीन कॉरिडोर बनाया, जिससे करीब 20 किलोमीटर का सफर सिर्फ 16 मिनट में पूरा हो गया.
हिंडन एयरपोर्ट से ग्रीन कॉरिडोर के जरिए पहुंचा दिल अफसर का हृदय चंडीगढ़ से हवाई जहाज के जरिए गाजियाबाद के हिंडन एयरपोर्ट लाया गया. यहां से इसे नोएडा के फोर्टिस अस्पताल, सेक्टर-62 तक पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती थी. अंगदान के मामलों में हर मिनट बेहद महत्वपूर्ण होता है, इसलिए गाजियाबाद और गौतमबुद्धनगर पुलिस ने आपसी तालमेल से ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया. नोएडा पुलिस के मुताबिक, 9 सितंबर 2026 को दोपहर करीब 2:03 बजे हृदय को लेकर एंबुलेंस हिंडन एयरपोर्ट से रवाना हुई. ट्रैफिक पुलिस की टीम ने पूरे रास्ते यातायात को नियंत्रित किया और एंबुलेंस के लिए रास्ता साफ रखा.20 किलोमीटर की दूरी सिर्फ 16 मिनट में तय पुलिस की निगरानी में एंबुलेंस बिना किसी बड़ी रुकावट के हिंडन एयरपोर्ट से फोर्टिस अस्पताल पहुंची. करीब 20 किलोमीटर की दूरी महज 16 मिनट में पूरी की गई. इस दौरान ट्रैफिक पुलिस की टीम लगातार एंबुलेंस की सुरक्षित और तेज आवाजाही सुनिश्चित करती रही.
अस्पताल पहुंचते ही शुरू हुआ ट्रांसप्लांट हृदय के अस्पताल पहुंचने से पहले ही डॉक्टरों की टीम ट्रांसप्लांट के लिए तैयार थी. एंबुलेंस के अस्पताल पहुंचते ही हृदय को मेडिकल टीम को सौंप दिया गया और हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू कर दी गई. इस ग्रीन कॉरिडोर की मदद से मरीज को समय पर नया जीवन मिलने की उम्मीद मजबूत हुई. नोएडा पुलिस ने इसे कमिश्नरेट गौतमबुद्धनगर में सुरक्षित हृदय ट्रांसप्लांट के लिए बनाए गए पहले ग्रीन कॉरिडोर की कार्रवाई बताया है. इस पूरे अभियान में ट्रैफिक पुलिस की भूमिका बेहद अहम रही.
ग्रेटर नोएडा: ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ते चलन के बीच ग्रेटर नोएडा से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक युवक ने वेबसाइट के जरिए एंड्रॉयड डिवाइस ऑर्डर किया था। ऑर्डर के समय उसने सामान की पूरी कीमत ऑनलाइन ही चुका दी थी। उसे उम्मीद थी कि कुछ दिनों में उसका सामान घर पहुंच जाएगा, लेकिन डिलीवरी मिलने के बाद पैकेट खोलते ही उसके होश उड़ गए।
एंड्रॉयड डिवाइस की जगह पैकेट के अंदर गोबर भरा हुआ था। युवक ने जब यह देखा तो उसने मामले की शिकायत पुलिस से की। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी है।
ऑनलाइन किया था एंड्रॉयड डिवाइस का ऑर्डर
मामला थाना दनकौर क्षेत्र के आकाश नगर का बताया जा रहा है। यहां रहने वाले एक युवक ने कुछ दिन पहले एक वेबसाइट के माध्यम से एंड्रॉयड डिवाइस बुक किया था। ऑर्डर करते समय उसने डिवाइस की पूरी कीमत ऑनलाइन भुगतान के जरिए जमा कर दी थी।
भुगतान करने के बाद युवक डिलीवरी का इंतजार कर रहा था। उसे भरोसा था कि तय समय पर उसका ऑर्डर सही सामान के साथ उसके घर पहुंच जाएगा।
पैकेट खोला तो उड़ गए होश
सोमवार शाम करीब 5 बजे कोरियर के जरिए युवक के घर पैकेट पहुंचा। पैकेट मिलने के बाद उसने उसे खोला, लेकिन अंदर का सामान देखकर वह हैरान रह गया।
जिस पैकेट में एंड्रॉयड डिवाइस होना चाहिए था, उसमें डिवाइस की जगह गोबर भरा हुआ था। युवक का आरोप है कि उसके साथ ऑनलाइन खरीदारी के नाम पर धोखाधड़ी की गई है।
सामान की जगह गोबर मिलने के बाद युवक ने मामले की शिकायत पुलिस से की और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
पुलिस ने शुरू की मामले की जांच
शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस ऑनलाइन ऑर्डर से जुड़ी वेबसाइट, भुगतान की जानकारी, ऑर्डर की प्रक्रिया और डिलीवरी से संबंधित तथ्यों की जांच कर रही है।
जांच के दौरान जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
ऑनलाइन खरीदारी में इन बातों का रखें ध्यान
इस तरह की घटनाएं ऑनलाइन खरीदारी करते समय सावधानी बरतने की जरूरत बताती हैं। किसी भी वेबसाइट से सामान खरीदने से पहले उसकी विश्वसनीयता की जांच करना जरूरी है।
ऑर्डर करने से पहले वेबसाइट की कंपनी संबंधी जानकारी, ग्राहक समीक्षाएं, रिटर्न और रिफंड पॉलिसी तथा कस्टमर केयर की जानकारी जरूर देख लें। अनजान वेबसाइट या संदिग्ध थर्ड पार्टी प्लेटफॉर्म पर भुगतान करने से बचना भी बेहतर है।
ऑनलाइन खरीदारी करते समय जल्दबाजी के बजाय वेबसाइट और विक्रेता की पूरी जानकारी जांचने से इस तरह की धोखाधड़ी के जोखिम को कम किया जा सकता है।
मामला उज्जैन के कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक होने वाले सड़क चौड़ीकरण से जुड़ा है. सिंहस्थ 2028 से पहले पुराने शहर के इस हिस्से को व्यवस्थित करने की तैयारी है. प्रशासन ने सड़क की जद में आ रहे मंदिर के भवन को तोड़ दिया लेकिन जब बात हनुमान प्रतिमा को सुरक्षित विस्थापित करने की आई, तो चुनौती बढ़ गई.
उज्जैन में सड़क बनाम आस्था
उज्जैन में सड़क बनाम आस्था
प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी
प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित स्थान पर ले जाना जरूरी
सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन में सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने का काम तेजी से चल रहा है, लेकिन इसी विकास के बीच आस्था का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने प्रशासन के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. कंठाल चौराहे से छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण के लिए प्राचीन खड़े हनुमान मंदिर का भवन तोड़ दिया गया. अब जब हनुमान प्रतिमा को दूसरी जगह ले जाने की कोशिश की गई, तो मामला अटक गया. दावा है कि कई प्रयासों के बावजूद प्रतिमा अपनी जगह से नहीं हिली. इसके बाद हिंदू संगठनों ने प्रतिमा हटाने का विरोध शुरू कर दिया है.
मंदिर का भवन टूटा, प्रतिमा टेंट के नीचे विराजमान सड़क चौड़ीकरण की जद में आने के कारण मंदिर का भवन हटाया जा चुका है. फिलहाल हनुमान प्रतिमा को टेंट की छत के नीचे रखा गया है. प्रशासन अब प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह विस्थापित करने का रास्ता तलाश रहा है. वहीं श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों का कहना है कि जब प्रतिमा को हटाने की कोशिश के बावजूद सफलता नहीं मिली, तो इसे अपनी जगह से हटाने की जरूरत ही क्या है.
मंगलवार को सैकड़ों लोगों ने की महाआरती विरोध के बीच मंगलवार शाम मंदिर स्थल पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे. यहां महाआरती की गई, ढोल-ताशे बजाए गए और हनुमान चालीसा का पाठ हुआ. लोगों ने एकजुट होकर प्रशासन से मांग की कि सड़क चौड़ीकरण का काम किया जाए, लेकिन हनुमान प्रतिमा को उसकी मौजूदा जगह से न हटाया जाए. हिंदू संगठनों का दावा है कि प्रतिमा को हटाने की करीब चार बार कोशिश की जा चुकी है. हर बार प्रयास विफल रहा.
छेनी-हथौड़े से कोशिश, फिर भी नहीं हिली प्रतिमा बताया जा रहा है कि प्रतिमा को नीचे से हटाने के लिए भी प्रयास किए गए. छेनी-हथौड़े की मदद से उसे निकालने की कोशिश हुई, लेकिन प्रशासन को सफलता नहीं मिली. अब अधिकारियों की ओर से विशेषज्ञों की मदद लेने की तैयारी है, ताकि प्रतिमा को किसी तरह का नुकसान पहुंचाए बिना सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाया जा सके.
इतिहासकार बोले- जगह का भी है ऐतिहासिक महत्व उज्जैन के इतिहास के जानकार भगवती लाल राजपुरोहित के मुताबिक यह प्रतिमा बेहद प्राचीन मानी जाती है. हालांकि लंबे समय से सिंदूर चढ़ाए जाने के कारण प्रतिमा की मूल भाव-भंगिमा पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाती. उनके अनुसार मंदिर का यह स्थान भी उज्जैन के ऐतिहासिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण माना जाता है. ऐसे में प्रतिमा को हटाने का मामला केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे धार्मिक और ऐतिहासिक भावनाएं भी जुड़ी हैं.
प्रशासन के सामने विकास और आस्था दोनों की चुनौती इंजीनियरिंग विशेषज्ञों के मुताबिक पुरानी और भारी प्रतिमाओं को आधुनिक तकनीक की मदद से सुरक्षित तरीके से दूसरी जगह ले जाना संभव है. लेकिन यहां चुनौती सिर्फ तकनीकी नहीं है. प्रतिमा प्राण-प्रतिष्ठित होने के कारण श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना भी जरूरी है.
अगर आप आगामी समय में किसी बीच पर घूमने का प्लान बना रहे हैं तो गुजरात के दक्षिणी तट के करीब स्थित केंद्र शासित प्रदेश दीव जा सकते हैं। दीव देश के अन्य समुद्र तट स्थलों से बहुत अलग है। इसे इसले ऑफ काम भी बोला जाता है।
इस दीव गोवा की तरह यहां पर पुर्तगल प्रभाव आपको देखने को मिलेगा। यहां पर आपको बहुत से खूबसूरत बीचेज का दीदार करने का मौका मिलेगा। यहां जाने से आपका टूर यादगार बन जाएगा। दीव शहर में घूमने के लिए कुछ बेहतरीन जगहें हैं। अब इसे स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित किया जा रहा है।
यहां पर ऐतिहासिक धरोहरों का दीदार करने के साथ ही आपको हॉट एयर बलून राइड, पैराग्लाइडिंग, स्कूबा डाइविंग, डॉलफिन ट्रिप और पैरासेलिंग जैसी रोमांचक एक्टिविटीज का मजा लेने का भी मौका मिलेगा। आप आज ही यहां पर घूमने का प्लान बना लें।
दर्द होने पर कई लोग तुरंत पेनकिलर ले लेते हैं. इससे कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन हर बार इससे दर्द की असली वजह दूर नहीं होती.
आजकल कम उम्र में ही कमर, गर्दन, कंधे और घुटनों में दर्द की शिकायत आम हो गई है. ऑफिस में लगातार कुर्सी पर बैठना, घंटों मोबाइल चलाना, गलत तरीके से बैठना और शारीरिक गतिविधि कम होना इसके बड़े कारण हैं. घर का काम करने वालों में भी लगातार झुककर काम करने या एक ही मुद्रा में लंबे समय तक रहने से शरीर में खिंचाव और अकड़न हो सकती है. कई लोग इसे सामान्य थकान समझकर नजरअंदाज कर देते हैं या तुरंत दर्द की गोली ले लेते हैं. लेकिन अगर दर्द बार-बार हो रहा है, कई दिनों तक बना रहता है या रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगे हैं तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.
सेंटर फॉर नी एंड हिप केयर, गाजियाबाद के फिजियोथेरेपी डिपार्टमेंट के HOD डॉ. इंद्रमणि उपाध्याय ने बताया कि लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने से मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है. इससे मांसपेशियों में खिंचाव, जकड़न और दर्द की समस्या हो सकती है.
कम उम्र में ही क्यों बढ़ रहा है कमर और गर्दन का दर्द? पहले कमर या गर्दन के दर्द को उम्र बढ़ने से जोड़कर देखा जाता था, लेकिन अब युवाओं में भी यह समस्या तेजी से देखने को मिल रही है. इसका एक बड़ा कारण हमारी रोजमर्रा की जीवनशैली है. ऑफिस में कई घंटे लगातार बैठना, लैपटॉप पर काम करते समय गर्दन झुकाए रखना, मोबाइल को नीचे रखकर लंबे समय तक देखना और एक्सरसाइज न करना शरीर पर असर डालता है. लगातार बैठे रहने से शरीर की कुछ मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है. लंबे समय में इससे गर्दन और कमर में अकड़न, मांसपेशियों में खिंचाव और बार-बार होने वाला दर्द परेशान कर सकता है. इसके अलावा तनाव भी मांसपेशियों में खिंचाव बढ़ा सकता है. यानी दर्द सिर्फ ज्यादा काम करने से नहीं, बल्कि गलत तरीके से बैठने और कम चलने-फिरने से भी हो सकता है.
घंटों बैठने के बाद दर्द होना सामान्य है या बीमारी का संकेत? अगर कोई व्यक्ति लगातार कई घंटे बैठा रहता है तो थोड़ी देर के लिए कमर, गर्दन या पैरों में भारीपन और अकड़न महसूस होना संभव है. इसकी वजह यह है कि मांसपेशियां लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहती हैं. लेकिन हर बार दर्द को सामान्य मान लेना सही नहीं है. अगर दर्द बार-बार हो रहा है, बहुत ज्यादा है या आराम करने के बाद भी ठीक नहीं हो रहा तो इसकी वजह जानना जरूरी है. ऑफिस में काम करने वाले लोग कुछ देर में अपनी सीट से उठें. लगातार एक ही जगह बैठे रहने के बजाय थोड़ी देर उठकर चलें. कुर्सी पर बैठते समय पीठ को उचित सहारा दें और मोबाइल या लैपटॉप इस्तेमाल करते समय गर्दन को लगातार नीचे झुकाने से बचें.
सुबह उठते ही कमर, गर्दन या घुटनों में अकड़न क्यों होती है?
सुबह उठने पर शरीर में थोड़ी अकड़न कई कारणों से हो सकती है. लंबे समय तक एक ही स्थिति में सोना, सोने की गलत मुद्रा या मांसपेशियों में खिंचाव इसकी वजह हो सकता है.
सुबह उठने पर शरीर में थोड़ी अकड़न कई कारणों से हो सकती है. लंबे समय तक एक ही स्थिति में सोना, सोने की गलत मुद्रा या मांसपेशियों में खिंचाव इसकी वजह हो सकता है.
ऐसे में उठते ही अचानक तेज एक्सरसाइज या झटके वाली गतिविधि करने से बचें. पहले धीरे-धीरे शरीर को हिलाएं और हल्की स्ट्रेचिंग करें. सोने की मुद्रा और गद्दे के आराम को भी ध्यान में रखना चाहिए.
ऐसे में उठते ही अचानक तेज एक्सरसाइज या झटके वाली गतिविधि करने से बचें. पहले धीरे-धीरे शरीर को हिलाएं और हल्की स्ट्रेचिंग करें. सोने की मुद्रा और गद्दे के आराम को भी ध्यान में रखना चाहिए.
अगर सुबह की अकड़न बहुत ज्यादा है, लगातार बनी रहती है, धीरे-धीरे बढ़ रही है या इसके साथ सूजन और कमजोरी भी महसूस हो रही है तो डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेना बेहतर है.
अगर सुबह की अकड़न बहुत ज्यादा है, लगातार बनी रहती है, धीरे-धीरे बढ़ रही है या इसके साथ सूजन और कमजोरी भी महसूस हो रही है तो डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेना बेहतर है.
क्या सिर्फ स्ट्रेचिंग से दर्द से बचा जा सकता है?
कई सामान्य दर्द और अकड़न से बचने में नियमित स्ट्रेचिंग और हल्की एक्सरसाइज मदद कर सकती है. इससे शरीर का लचीलापन बढ़ता है, मांसपेशियां मजबूत होती हैं और जोड़ों की मूवमेंट बेहतर रहती है.
कई सामान्य दर्द और अकड़न से बचने में नियमित स्ट्रेचिंग और हल्की एक्सरसाइज मदद कर सकती है. इससे शरीर का लचीलापन बढ़ता है, मांसपेशियां मजबूत होती हैं और जोड़ों की मूवमेंट बेहतर रहती है.
खासकर उन लोगों के लिए यह जरूरी है जो दिन का बड़ा हिस्सा कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं. हर कुछ देर में उठना, थोड़ा चलना और शरीर की स्थिति बदलना मांसपेशियों पर पड़ने वाले लगातार दबाव को कम कर सकता है.
खासकर उन लोगों के लिए यह जरूरी है जो दिन का बड़ा हिस्सा कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं. हर कुछ देर में उठना, थोड़ा चलना और शरीर की स्थिति बदलना मांसपेशियों पर पड़ने वाले लगातार दबाव को कम कर सकता है.
हालांकि एक्सरसाइज का तरीका सही होना भी जरूरी है. गलत तरीके से स्ट्रेचिंग या जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करने से उल्टा चोट लग सकती है. इसलिए अगर पहले से दर्द है तो अपनी तरफ से कोई कठिन एक्सरसाइज शुरू करने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है.
हालांकि एक्सरसाइज का तरीका सही होना भी जरूरी है. गलत तरीके से स्ट्रेचिंग या जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करने से उल्टा चोट लग सकती है. इसलिए अगर पहले से दर्द है तो अपनी तरफ से कोई कठिन एक्सरसाइज शुरू करने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है.
कौन सा दर्द फिजियोथेरेपी से ठीक या कम हो सकता है? फिजियोथेरेपी खासतौर पर मांसपेशियों, जोड़ों की मूवमेंट, कमजोरी, गलत पॉश्चर और शरीर की गतिविधियों से जुड़ी कई समस्याओं में उपयोगी हो सकती है. कमर और गर्दन में होने वाला दर्द, मांसपेशियों का खिंचाव, लंबे समय तक बैठने से होने वाली अकड़न और ऐसी समस्याएं जिनमें शरीर की मूवमेंट प्रभावित हो रही हो, उनमें फिजियोथेरेपी की मदद ली जा सकती है. फिजियोथेरेपिस्ट सिर्फ दर्द वाली जगह पर ध्यान नहीं देता, बल्कि यह भी देखता है कि दर्द क्यों हो रहा है. पॉश्चर, शरीर की मूवमेंट, मांसपेशियों की ताकत और कमजोरी को देखकर जरूरत के मुताबिक एक्सरसाइज और रिहैबिलिटेशन प्लान तैयार किया जा सकता है.
दर्द की गोली कब तक लेते रहना ठीक नहीं? दर्द होने पर कई लोग तुरंत पेनकिलर ले लेते हैं. इससे कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन हर बार इससे दर्द की असली वजह दूर नहीं होती.
अगर दर्द कुछ दिनों से बना हुआ है, बार-बार लौट रहा है, रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो रही है या आराम के बावजूद मूवमेंट प्रभावित हो रही है तो सिर्फ दर्द की गोली लेकर उसे दबाते रहना सही तरीका नहीं है.
ऐसी स्थिति में डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट से सलाह लेकर दर्द का कारण समझना जरूरी है. कई बार सही एक्सरसाइज, पॉश्चर में सुधार और मांसपेशियों को मजबूत करने से समस्या को लंबे समय तक नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.
घर और ऑफिस में ये 5 आदतें अपनाएं
1. एक ही जगह लगातार न बैठें- कुछ समय के अंतराल पर उठकर थोड़ा चलें.
2. मोबाइल नीचे रखकर न देखें- स्क्रीन को आंखों के करीब उचित ऊंचाई पर रखें ताकि गर्दन ज्यादा न झुके.
3. बैठने का तरीका सुधारें- पीठ को सहारा दें और लंबे समय तक झुककर न बैठें.
4. रोज थोड़ा चलें-फिरें- शरीर को सक्रिय रखना मांसपेशियों और जोड़ों के लिए जरूरी है.
5. दर्द को बार-बार नजरअंदाज न करें- दर्द लगातार हो या रोजमर्रा के काम प्रभावित करे तो विशेषज्ञ से सलाह लें.