हिमालय की ऊंची पहाड़ियों में स्थित केदारनाथ धाम सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि अपनी प्राचीन स्थापत्य शैली और कठिन प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण भी हमेशा चर्चा में रहा है। मंदिर से जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं और ऐतिहासिक किस्से आज भी लोगों की जिज्ञासा बढ़ाते हैं।
शिव की पीठ के रूप में क्यों होती है पूजा?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद पांडव भगवान शिव से मिलने हिमालय पहुंचे थे। कहा जाता है कि शिव ने उनसे बचने के लिए बैल का रूप धारण किया, लेकिन भीम ने उन्हें पहचान लिया। जब शिव धरती में समाने लगे तो भीम उनके पिछले हिस्से को पकड़ने में सफल रहे। इसी स्वरूप को केदारनाथ में शिव की पीठ के रूप में पूजे जाने की मान्यता है।
मंदिर का निर्माण किसने कराया?
केदारनाथ मंदिर को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। कुछ परंपराएं इसका संबंध पांडवों से जोड़ती हैं, जबकि मंदिर के पुनरुद्धार और धार्मिक व्यवस्था को आदि शंकराचार्य से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इसके वास्तविक निर्माण की एक निश्चित ऐतिहासिक तारीख को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं।
2013 की आपदा में कैसे बचा मंदिर?
2013 में उत्तराखंड में आई विनाशकारी बाढ़ और मलबे ने केदारनाथ क्षेत्र में भारी तबाही मचाई थी। कई इमारतें और रास्ते बह गए, लेकिन मुख्य मंदिर का ढांचा बचा रहा। मंदिर के पीछे आकर रुकी एक विशाल चट्टान ने पानी और मलबे के बहाव को दो दिशाओं में मोड़ने में मदद की। भक्त इसे भगवान शिव की कृपा मानते हैं, जबकि विशेषज्ञ इसे प्राकृतिक परिस्थितियों और चट्टान की स्थिति से जोड़कर देखते हैं।
क्या मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा?
केदारनाथ के बारे में यह दावा भी किया जाता है कि मंदिर लंबे समय तक बर्फ में दबा रहा था। हालांकि इसके 400 वर्षों तक पूरी तरह बर्फ में दबे रहने का पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसलिए इस बात को तथ्य के बजाय एक प्रचलित दावा या मान्यता के रूप में देखना उचित है।
सर्दियों में कहां होती है पूजा?
भारी बर्फबारी के कारण सर्दियों में केदारनाथ के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान भगवान केदारनाथ की पूजा उखीमठ में जारी रहती है। मौसम अनुकूल होने पर कपाट दोबारा खोले जाते हैं और पूजा केदारनाथ धाम में शुरू होती है।
मंदिर से जुड़े कई रहस्य
केदारनाथ से जुड़ी कई बातें धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और ऐतिहासिक परंपराओं का हिस्सा हैं। इसलिए हर दावे को वैज्ञानिक तथ्य मानना सही नहीं होगा। लेकिन हिमालय जैसी कठिन परिस्थितियों में सदियों से खड़ा यह मंदिर भारत की प्राचीन धार्मिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
नोट: केदारनाथ से जुड़ी चमत्कार, भविष्यवाणी और प्राचीन निर्माण तकनीक संबंधी कई बातें धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें प्रमाणित वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखना चाहिए।
रामायण केवल भगवान श्रीराम, माता सीता और रावण के बीच हुए युद्ध की कथा नहीं है। इससे जुड़ी कई ऐसी मान्यताएं और लोककथाएं भी हैं, जो सदियों से लोगों के बीच प्रचलित हैं। इनमें लक्ष्मण का 14 साल तक न सोना, हनुमान जी के पुत्र मकरध्वज और रावण के राम की पूजा कराने जैसी कथाएं शामिल हैं।
राजा दशरथ की एक बेटी भी थीं
राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के अलावा राजा दशरथ की एक पुत्री होने की भी मान्यता है। उनका नाम शांता बताया जाता है। कहा जाता है कि उनका पालन-पोषण अंगदेश के राजा रोमपाद के यहां हुआ और बाद में उनका विवाह ऋष्यशृंग से हुआ।
लक्ष्मण ने 14 साल तक नहीं ली नींद?
लोककथा के अनुसार, वनवास के दौरान लक्ष्मण ने श्रीराम और माता सीता की सुरक्षा के लिए 14 वर्षों तक सोने का त्याग किया था। कहा जाता है कि उनकी पत्नी उर्मिला ने उनकी ओर से निद्रा स्वीकार की थी। हालांकि यह कथा वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ में विस्तार से नहीं मिलती।
बाली और श्रीकृष्ण के बीच कनेक्शन
एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, श्रीराम के हाथों बाली की मृत्यु और अगले जन्म में श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान के बीच संबंध था। कथा में बाली को अगले जन्म में जरा नामक शिकारी बताया गया है, जिसके बाण से श्रीकृष्ण के देह त्याग की कथा जुड़ी है।
ब्रह्मचारी हनुमान के पुत्र मकरध्वज
हनुमान जी को ब्रह्मचारी माना जाता है, लेकिन लोककथाओं में उनके पुत्र मकरध्वज का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार लंका दहन के बाद समुद्र में उतरे हनुमान जी के शरीर से गिरी पसीने की बूंद को एक मछली ने निगल लिया, जिससे मकरध्वज का जन्म हुआ।
क्या रावण ने राम की पूजा कराई थी?
एक लोकप्रिय लोकमान्यता के अनुसार, रावण भगवान शिव का परम भक्त और पूजा-विधि का ज्ञाता था। इसी वजह से रामेश्वरम में शिव पूजा के दौरान उसने भगवान राम की पूजा कराने में पुरोहित की भूमिका निभाई थी। हालांकि यह प्रसंग अलग-अलग परंपराओं में अलग रूप में मिलता है।
कुंभकर्ण छह महीने क्यों सोता था?
पौराणिक कथा के अनुसार, कुंभकर्ण जब वरदान मांगने वाला था, तब देवताओं को डर था कि वह कोई अत्यंत शक्तिशाली वरदान मांग सकता है। कथा में देवी सरस्वती द्वारा उसकी वाणी प्रभावित करने का उल्लेख मिलता है। इसी से उसके लंबे समय तक सोने की कहानी जुड़ी है।
पंचमुखी हनुमान की कथा
लोकमान्यता के अनुसार, अहिरावण राम और लक्ष्मण को पाताल लोक ले गया था। उन्हें बचाने के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण किया और पांच दिशाओं में जल रहे दीपकों को एक साथ बुझाया। इसके बाद अहिरावण का वध कर राम-लक्ष्मण को मुक्त कराया।
रामायण और गायत्री मंत्र का संबंध
एक धार्मिक मान्यता के अनुसार, वाल्मीकि रामायण के करीब 24 हजार श्लोकों और गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों के बीच विशेष संबंध है। मान्यता है कि रामायण के प्रत्येक हजारवें श्लोक से एक अक्षर लेकर गायत्री मंत्र की रचना होती है।
रामायण से जुड़े प्रसंगों को समझना क्यों जरूरी है?
रामायण की परंपरा बेहद व्यापक है। इसलिए इससे जुड़ी हर कथा को एक ही स्रोत का हिस्सा मानना सही नहीं होगा। वाल्मीकि रामायण के मूल प्रसंगों के अलावा रामचरितमानस, पुराणों, क्षेत्रीय रामायणों और लोककथाओं में कई अलग-अलग कथाएं मिलती हैं। यही विविधता रामायण को भारतीय संस्कृति की एक विशाल और जीवंत परंपरा बनाती है।
रक्षाबंधन का त्योहार जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे इसकी तारीख को लेकर लोगों के बीच कंफ्यूजन बढ़ रहा है। इस बार सावन पूर्णिमा की तिथि 27 और 28 अगस्त, दोनों तारीखों को पड़ रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि भाई की कलाई पर राखी आखिर 27 अगस्त को बांधी जाए या 28 अगस्त को?
पंचांग की गणना के अनुसार, इस साल रक्षाबंधन 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह शुरू होकर 28 अगस्त की सुबह तक रहेगी।
28 अगस्त को ही क्यों मनाया जाएगा रक्षाबंधन?
रक्षाबंधन की तारीख तय करते समय केवल पूर्णिमा तिथि को नहीं देखा जाता, बल्कि भद्रा काल का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा के दौरान राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता।
इस साल पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह करीब 9:08 बजे शुरू होगी और 28 अगस्त की सुबह लगभग 9:48 बजे तक रहेगी। ऐसे में 28 अगस्त को सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि मौजूद रहेगी और भद्रा का प्रभाव भी समाप्त हो चुका होगा।
इसी वजह से 28 अगस्त को रक्षाबंधन मनाने की तारीख मानी जा रही है।
27 अगस्त को क्या रहेगा?
27 अगस्त को पूर्णिमा शुरू हो जाएगी, लेकिन इस दिन भद्रा का प्रभाव रहने की वजह से राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है। पंचांग गणना के अनुसार भद्रा रात तक समाप्त हो जाएगी।
इसलिए राखी बांधने के लिए 28 अगस्त का समय ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है।
28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ समय
दिल्ली के पंचांग के अनुसार 28 अगस्त को राखी बांधने के लिए सुबह 5:57 बजे से 9:48 बजे तक का समय बताया गया है। पूर्णिमा तिथि समाप्त होने तक यह समय उपलब्ध रहेगा।
हालांकि, अलग-अलग शहरों में सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
दिन के प्रमुख शुभ समय
अमृत चौघड़िया: सुबह 6:08 बजे से 10:53 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:04 बजे से 12:53 बजे तक
शुभ चौघड़िया: दोपहर 12:28 बजे से 2:03 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 1:44 बजे से शाम 4:16 बजे तक
चर चौघड़िया: शाम 5:13 बजे से 6:48 बजे तक
राखी बांधते समय क्या करें?
रक्षाबंधन के दिन बहन पूजा की थाली में राखी, रोली या कुमकुम, अक्षत, चंदन, दीपक और मिठाई रख सकती है। भाई को आसन पर बैठाकर पहले तिलक और अक्षत लगाने की परंपरा है।
इसके बाद बहन भाई की आरती उतारकर उसकी कलाई पर राखी बांधती है और मिठाई खिलाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाई का मुख पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है।
रक्षाबंधन पर बन रहा खास संयोग
ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस बार सावन पूर्णिमा पर शतभिषा नक्षत्र, सुकर्मा योग और मीन राशि में चंद्रमा का संयोग बनने की बात कही जा रही है। शुक्रवार के दिन सुकर्मा योग का संयोग भी इस पर्व को विशेष माना जा रहा है।
रक्षाबंधन का महत्व
रक्षाबंधन भाई-बहन के प्यार, विश्वास और आपसी जिम्मेदारी का पर्व माना जाता है। इस दिन बहन भाई की सुख-समृद्धि और लंबी आयु की कामना करते हुए उसकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है।
वहीं भाई अपनी बहन की रक्षा करने और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का संकल्प लेता है। यही वजह है कि समय के साथ यह त्योहार सिर्फ राखी बांधने की रस्म नहीं, बल्कि भाई-बहन के मजबूत रिश्ते का प्रतीक बन गया है।
नोट: शुभ मुहूर्त में स्थानीय पंचांग और शहर के सूर्योदय के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। पूजा या मुहूर्त के लिए अपने क्षेत्र के पंचांग की पुष्टि करना उचित रहेगा।
हिंदू धार्मिक कथाओं में देवताओं और असुरों के बीच हुए कई युद्धों का वर्णन मिलता है। इन्हीं कथाओं में रक्तबीज का नाम एक ऐसे असुर के रूप में आता है, जिसे उसकी असाधारण शक्ति के कारण हराना बेहद कठिन माना गया।
मान्यता के अनुसार, रक्तबीज को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से गिरने वाली हर रक्त की बूंद से उसके जैसा एक नया असुर पैदा हो जाता था। यही वजह थी कि युद्ध में उसे घायल करना भी देवताओं के लिए परेशानी बढ़ाने वाला साबित होता था।
कौन था रक्तबीज?
रक्तबीज का उल्लेख देवी महात्म्य यानी दुर्गा सप्तशती की कथा में मिलता है। उसे बेहद शक्तिशाली असुर बताया गया है, जिसने देवताओं के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी।
उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसका रक्त था। युद्ध के दौरान जैसे ही उसके शरीर से खून जमीन पर गिरता, उसी से एक नया रक्तबीज पैदा हो जाता। इस तरह उसे जितना अधिक घायल किया जाता, उसकी संख्या उतनी ही बढ़ती जाती।
मां दुर्गा के सामने खड़ी हुई बड़ी चुनौती
रक्तबीज से युद्ध के दौरान देवताओं और देवी की सेना ने उसे रोकने की कोशिश की, लेकिन उसकी शक्ति के कारण समस्या और गंभीर होती गई। उसके रक्त से लगातार नए असुर पैदा होने लगे और देखते ही देखते युद्धभूमि में रक्तबीज जैसे असुरों की संख्या बढ़ने लगी।
तब इस असुर का अंत करने के लिए देवी ने अपना उग्र स्वरूप धारण किया, जिसे मां काली के रूप में जाना जाता है।
मां काली ने कैसे किया रक्तबीज का अंत?
धार्मिक कथा के अनुसार, मां काली ने रक्तबीज के साथ पैदा होने वाले नए असुरों को रोकने के लिए एक विशेष रणनीति अपनाई। उन्होंने रक्तबीज के शरीर से निकलने वाले रक्त को जमीन पर गिरने से पहले ही ग्रहण करना शुरू कर दिया।
इससे उसके रक्त की बूंदों से नए असुर पैदा होने का सिलसिला रुक गया। मां काली ने एक-एक करके रक्तबीज से उत्पन्न असुरों का संहार किया और अंत में स्वयं रक्तबीज का भी वध कर दिया।
इस तरह उस असुर की वह शक्ति निष्प्रभावी हो गई, जिसके कारण वह युद्ध में लगभग अजेय दिखाई दे रहा था।
मां काली का उग्र रूप देखकर देवता भी चिंतित हुए
कथा के अनुसार, रक्तबीज के वध के बाद भी मां काली का क्रोध शांत नहीं हुआ। उनका उग्र रूप जारी रहा और वे भयंकर तांडव करने लगीं। देवताओं को चिंता हुई कि उनका यह रूप कहीं पूरी सृष्टि के लिए संकट न बन जाए।
तब भगवान शिव ने उन्हें शांत करने का उपाय किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शिव उनके मार्ग में लेट गए। तांडव करते हुए जब मां काली का पैर शिव पर पड़ा तो उन्हें इसका एहसास हुआ और उनका क्रोध शांत होने लगा।
इसी प्रसंग से जुड़ी मां काली की वह प्रसिद्ध छवि भी सामने आती है, जिसमें उनका पैर भगवान शिव पर दिखाई देता है और उनकी जीभ बाहर निकली होती है।
रक्तबीज की कथा क्या संदेश देती है?
रक्तबीज की कथा को केवल देव-असुर युद्ध की कहानी के रूप में नहीं देखा जाता। धार्मिक व्याख्याओं में इसे ऐसी नकारात्मक शक्तियों के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है, जिन्हें सीधे दबाने की कोशिश करने पर वे और बढ़ सकती हैं।
मां काली का स्वरूप शक्ति, साहस और बुराई के विनाश का प्रतीक माना जाता है। रक्तबीज का अंत इस बात का प्रतीक माना जाता है कि बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए सही रणनीति और शक्ति का इस्तेमाल जरूरी है।
ध्यान दें: यह लेख धार्मिक ग्रंथों और प्रचलित पौराणिक मान्यताओं पर आधारित कथा का सरल रूपांतरण है। इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत की धरती पर ऐसे कई संत और भविष्यवक्ता हुए हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने आने वाले हजारों वर्षों से जुड़ी घटनाओं की भविष्यवाणियां की थीं. खास बात यह है कि इन भविष्यवाणियों को नास्त्रेदमस या बाबा वेंगा की भविष्यवाणियों की तरह रहस्यमय और सांकेतिक भाषा में नहीं, बल्कि अपेक्षाकृत स्पष्ट रूप में बताया गया है.
इन्हीं प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं में आंध्र प्रदेश के सिद्ध संत श्री पोतुलूरी वीर ब्रह्मेंद्र स्वामी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है. माना जाता है कि स्वामी वीर ब्रह्मेंद्र का जन्म वर्ष 1608 में हुआ था. उन्होंने तेलुगु भाषा में कालज्ञानम नामक ग्रंथ की रचना की थी. इस ग्रंथ में भविष्य में होने वाली कई घटनाओं का उल्लेख होने का दावा किया जाता है. समय के साथ कालज्ञानम से जुड़ी भविष्यवाणियां सोशल मीडिया और इंटरनेट पर काफी चर्चा में आने लगी हैं. यही वजह है कि भविष्यवाणियों को लेकर लोगों की दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है.
आने वाले समय से जुड़ी भविष्यवाणियां
कालज्ञानम से जुड़ी कई ऐसी भविष्यवाणियां भी प्रचलित हैं, जिन्हें भविष्य में होने वाली घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है. इनमें प्राकृतिक आपदाओं, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक घटनाओं, महामारियों और बड़े युद्धों तक का उल्लेख होने का दावा किया जाता है. हालांकि इन दावों की व्याख्या अलग-अलग स्रोतों में अलग तरीके से मिलती है और इनकी प्रामाणिकता पर भी मतभेद हैं. लोकप्रिय रूप से बताई जाने वाली प्रमुख भविष्यवाणियां इस प्रकार हैं.
लाल बारिश और समुद्र का बढ़ता जलस्तर
कहा जाता है कि भविष्य में आसमान से लाल रंग की वर्षा होगी. साथ ही समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण कई तटीय शहरों के डूबने की भविष्यवाणी का भी उल्लेख मिलता है. इसे कुछ लोग जलवायु परिवर्तन, समुद्री स्तर में वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं से जोड़कर देखते हैं.
बढ़ता तापमान और दो सूरज जैसा दृश्य एक कथित भविष्यवाणी में धरती के अत्यधिक गर्म होने और पहाड़ों से आग निकलने जैसी घटना का वर्णन बताया जाता है. इसके साथ आकाश में ‘दो सूरज’ दिखाई देने की बात भी कही जाती है. इसे प्राकृतिक घटनाओं, ज्वालामुखीय गतिविधियों या असामान्य आकाशीय घटनाओं की प्रतीकात्मक व्याख्या माना जाता है.
दिन में दिखाई देंगे तारे कालज्ञानम से जुड़ी कुछ व्याख्याओं में कहा जाता है कि एक समय ऐसा आएगा जब दिन के उजाले में भी तारे दिखाई देंगे. इसके बाद कुछ क्षेत्रों की आबादी के पूरी तरह समाप्त होने की बात कही जाती है. इसे किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा या वातावरण में होने वाले असाधारण बदलाव से जोड़कर देखा जाता है.
तिरुपति बालाजी की वैश्विक प्रसिद्धि कहा जाता है कि आने वाले समय में तिरुपति बालाजी मंदिर की ख्याति पूरी दुनिया में फैल जाएगी और अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग भी यहां दर्शन के लिए पहुंचेंगे. इसे मंदिर की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता से जोड़कर देखा जाता है.
108 वर्षों तक संघर्ष और उथल-पुथल एक लोकप्रिय दावे के अनुसार, कलियुग के पांच हजार वर्ष पूरे होने के बाद अधर्म के अंत से पहले दुनिया को लगभग 108 वर्षों तक संघर्ष, अशांति और बड़े बदलावों का सामना करना पड़ेगा. इसे मानव सभ्यता के एक बड़े संक्रमणकाल के रूप में समझा जाता है.
शनि के मीन और मेष राशि में गोचर के समय भीषण युद्ध एक अन्य भविष्यवाणी में कहा जाता है कि जब शनि मीन और मेष राशि से संबंधित विशेष स्थिति में होगा, तब दुनिया में एक भयंकर और निर्णायक युद्ध हो सकता है. इस दावे को ज्योतिषीय घटनाओं और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसे किसी निश्चित भविष्य की घटना मानना उचित नहीं है.
विश्ववसु संवत्सर में कल्कि अवतार सबसे चर्चित दावों में से एक यह है कि ‘विश्ववसु’ नामक संवत्सर में भगवान कल्कि का अवतार होगा. मान्यता के अनुसार भगवान कल्कि अधर्म और अत्याचार का अंत करके धर्म की पुनर्स्थापना करेंगे. हालांकि संवत्सर की गणना और इस भविष्यवाणी के समय को लेकर अलग-अलग मत और व्याख्याएं मिलती हैं.
Mahabharat Facts: हिंदू धर्म में महाभारत को पंचम वेद माना जाता है. यह विश्व के सबसे बड़े महाकाव्यों में से एक है. महाभारत में दिया गया ज्ञान आज भी उतना ही मान्य है, जितना उस समय था. लेकिन क्या महाभारत जितनी हमारे सामने रखी गई है, उतनी ही है? या फिर इससे जुड़े ऐसे कुछ रहस्य हैं, जिनसे आज तक पर्दा नहीं उठ सका है?
महाभारत से जुड़े ऐसे रहस्यों के बारे में जानने की कोशिश करेंगे, जिनके बारे में अधिकांश लोगों को जानकारी नहीं है. तो चलिए, बिना देरी किए आज की इस वीडियो को शुरू करते हैं.
18 का रहस्य
महाभारत का युद्ध हुए यूं तो हजारों वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन आज भी लोगों में इसके प्रति जिज्ञासा बनी हुई है. आज भी इससे जुड़े कई ऐसे रहस्य हैं, जिन पर चर्चा होती रहती है. ऐसा ही एक रहस्य 18 अंक से जुड़ा है. दरअसल, महाभारत में 18 अंक का विशेष महत्व बताया जाता है. महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला था, जिसमें लाखों योद्धा मारे गए. इसके अलावा कौरवों और पांडवों की कुल 18 अक्षौहिणी सेना थी, जिसमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 अक्षौहिणी सेना थी.
यही नहीं, ऋषि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में कुल 18 पर्व बताए गए हैं. हिंदू धर्म में 18 पुराणों का भी विशेष महत्व है. श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान युद्ध के दौरान दिया और गीता में भी 18 अध्याय हैं. इसके अलावा, महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद कुल 18 प्रमुख योद्धाओं के जीवित बचने की बात कही जाती है. यह सब जानने के बाद इतना तो साफ है कि महाभारत और 18 अंक का गहरा नाता है. लेकिन ऐसा क्यों था, यह आज भी एक रहस्य है.
क्या आज भी जीवित हैं अश्वत्थामा?
महाभारत काल का एक ऐसा व्यक्ति, जिसके बारे में माना जाता है कि वह आज भी जीवित है, वह है अश्वत्थामा. अश्वत्थामा कौरवों और पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र थे. उन्होंने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से युद्ध किया था. लेकिन युद्ध के अंत में किए गए अपने कर्मों के कारण उन्हें श्राप मिला था.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अश्वत्थामा ने ब्रह्मास्त्र का गलत प्रयोग किया था. इससे भगवान श्रीकृष्ण क्रोधित हो गए और उन्होंने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि वह अपने किए गए पापों का बोझ उठाते हुए हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकता रहेगा. कहा जाता है कि इसी श्राप के कारण अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं और निर्जन स्थानों पर भटक रहे हैं. आज भी कई जगहों पर अश्वत्थामा को देखे जाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन इन दावों की सत्यता का कोई प्रमाण नहीं है.
विमान और परमाणु अस्त्रों का उपयोग
ऐसा कहा जाता है कि महाभारत काल में विमान और परमाणु अस्त्रों जैसे शक्तिशाली हथियारों का उपयोग किया गया था. हालांकि, इन दावों को लेकर इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के बीच मतभेद हैं. मोहनजोदड़ो की खुदाई में कुछ ऐसे कंकाल मिलने के दावे किए गए हैं, जिनमें रेडिएशन का असर होने की बात कही जाती है. कुछ लोग इसे महाभारत में बताए गए ब्रह्मास्त्र से जोड़ते हैं.
कहा जाता है कि दुनिया का सबसे पहला परमाणु बम जैसा अस्त्र यानी ब्रह्मास्त्र अश्वत्थामा ने छोड़ा था. यही नहीं, महाभारत के सौप्तिक पर्व में ब्रह्मास्त्र और उसके प्रभाव से जुड़े प्रसंग मिलते हैं. हालांकि, महाभारत काल में वास्तव में विमान या परमाणु बम जैसे आधुनिक अस्त्रों का उपयोग हुआ था या नहीं, यह आज भी रहस्य और बहस का विषय है.
गांधारी के 100 पुत्र और एक पुत्री का रहस्य
महाभारत में गांधारी के 100 पुत्रों और एक पुत्री का उल्लेख मिलता है. हालांकि, गांधारी के पुत्रों को लेकर कई लोगों के मन में सवाल रहता है कि आखिर उनका जन्म कैसे हुआ था. महाभारत की कथा के अनुसार, गांधारी ने महल में ऋषि वेदव्यास की सेवा की थी. उनकी सेवा से प्रसन्न होकर वेदव्यास ने उन्हें 100 पुत्रों का वरदान दिया था. लेकिन, जब समय आया तो गांधारी लंबे समय तक गर्भवती रहीं. अंत में उन्होंने एक बड़े मांस-पिंड को जन्म दिया. इसे देखकर गांधारी बहुत दुखी हुईं और उसे फेंकने का विचार किया.
तब वेदव्यास ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और उस मांस-पिंड को 100 टुकड़ों में बांटकर अलग-अलग घड़ों में रखने को कहा. गांधारी ने एक पुत्री की भी इच्छा व्यक्त की, जिसके बाद 101 टुकड़े किए गए. कुछ समय बाद इन घड़ों से 100 कौरव राजकुमारों और एक पुत्री का जन्म हुआ. महाभारत में कौरवों की इस बहन का नाम दुश्शला बताया गया है. बाद में उसका विवाह सिंधु नरेश जयद्रथ से हुआ.
विदेशों के योद्धाओं ने भी लिया था युद्ध में हिस्सा?
ऐसा भी कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में सिर्फ भारत के ही नहीं, बल्कि दूसरे क्षेत्रों के योद्धाओं ने भी हिस्सा लिया था. महाभारत में अलग-अलग जनपदों और दूर-दराज के क्षेत्रों से आए योद्धाओं और राजाओं का उल्लेख मिलता है. हालांकि, ग्रीस, रोम या अमेरिका जैसे आधुनिक देशों से योद्धाओं के महाभारत युद्ध में शामिल होने का दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है. इसी वजह से महाभारत को लेकर यह दावा भी किया जाता है कि यह एक तरह का विश्वव्यापी युद्ध था, लेकिन इसे प्रमाणित करने वाले ठोस ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं.
तीन चरणों में लिखी गई महाभारत
महाभारत एक विशाल महाकाव्य है, जिसे तैयार होने में लंबा समय लगा. परंपरा और कुछ विद्वानों के अनुसार, महाभारत के विकास को अलग-अलग चरणों में समझा जाता है. कहा जाता है कि शुरुआती रूप में इसमें 8,800 श्लोक थे, जिसे ‘जय’ कहा गया. इसके बाद इसका विस्तार ‘भारत’ के रूप में हुआ, जिसमें लगभग 24,000 श्लोक बताए गए. अंततः इसका विस्तृत रूप ‘महाभारत’ बना, जिसमें करीब एक लाख श्लोक बताए जाते हैं. इसी वजह से महाभारत को विश्व के सबसे विशाल महाकाव्यों में से एक माना जाता है.
क्या महाभारत काल में राशियां नहीं थीं?
ज्योतिष के इतिहास को लेकर यह बात कही जाती है कि प्राचीन भारतीय परंपरा में नक्षत्रों का विशेष महत्व था. वैदिक ज्योतिष में 27 नक्षत्रों का उल्लेख मिलता है. कुछ लोगों का दावा है कि महाभारत काल में आज की तरह 12 राशियों का उपयोग नहीं होता था और ज्योतिष मुख्य रूप से नक्षत्रों पर आधारित था. हालांकि, प्राचीन भारतीय ज्योतिष में राशि और नक्षत्र दोनों की परंपराओं का विकास अलग-अलग चरणों में हुआ है. इसलिए यह कहना कि महाभारत काल में राशियां बिल्कुल अस्तित्व में नहीं थीं, पूरी तरह सही नहीं माना जा सकता. महाभारत और वैदिक साहित्य में ग्रहों, नक्षत्रों और खगोलीय घटनाओं के कई उल्लेख मिलते हैं.
अभिमन्यु की मौत का सच
आप यह तो जानते ही होंगे कि अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की हत्या चक्रव्यूह में हुई थी. लेकिन इससे जुड़ी कई बातें ऐसी हैं, जिन पर अक्सर चर्चा होती है. महाभारत के अनुसार, अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश किया और बेहद वीरता से युद्ध किया. उन्होंने कई योद्धाओं को पराजित किया. अंत में कई महारथियों ने मिलकर उन पर हमला किया.
कथा के अनुसार, अभिमन्यु के पास उस समय अपने बचाव के लिए पर्याप्त अस्त्र-शस्त्र नहीं बचे थे. इसी दौरान दुर्योधन के पुत्र लक्ष्मण की मृत्यु भी अभिमन्यु के हाथों हुई. इससे कौरव पक्ष और अधिक क्रोधित हो गया था. अंततः द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा समेत कई योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु को घेर लिया. इसके बाद दुशासन के पुत्र ने अभिमन्यु पर अंतिम प्रहार किया और उनकी मृत्यु हो गई.
महान योद्धा बर्बरीक ने देखा था पूरा युद्ध
क्या आप उस महान योद्धा के बारे में जानते हैं, जिसके शीश ने महाभारत का पूरा युद्ध देखा था? वह महान योद्धा कोई और नहीं, बल्कि भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक थे. पौराणिक मान्यता के अनुसार, बर्बरीक ने प्रण लिया था कि वह महाभारत के युद्ध में हमेशा हारने वाले पक्ष की ओर से लड़ेंगे. उनके पास तीन ऐसे बाण थे, जिनकी शक्ति असाधारण मानी जाती थी. कहा जाता है कि बर्बरीक की शक्ति को देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण का भेष धारण करके उनसे दान में उनका शीश मांग लिया.
बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के अपना शीश दान कर दिया. इसके बाद उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि वह अंत तक महाभारत का युद्ध देखना चाहते हैं. श्रीकृष्ण ने उनकी इच्छा स्वीकार कर ली. पौराणिक कथा के अनुसार, उन्होंने बर्बरीक के शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया, जहां से बर्बरीक ने महाभारत का पूरा युद्ध देखा. इसी मान्यता के कारण बर्बरीक को आज कई स्थानों पर खाटू श्याम के रूप में पूजा जाता है.
आचार्य चाणक्य ने नीति शास्त्र में मानव जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं का वर्णन किया है। चाणक्य की नीतियां आज भी लोगों के बीच प्रासंगिक है और इन्हें अपनाकर सफलता का रास्ता आसान बनाते हैं। चाणक्य नीति के लिए कहा जाता है कि इसे अपनाना मुश्किल होता है, लेकिन जिसने भी अपना लिया उसे सफलता जरूर प्राप्त होती है। चाणक्य ने नीति शास्त्र में बताया है कि व्यक्ति को किन लोगों से दुश्मनी मोल लेना चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो सकता है। चाणक्य कहते हैं कि जीवन में सही रणनीति वही है जहां व्यक्ति को पता होता है कि कौन उसका हितैषी है और कौन दुश्मन। जानें चाणक्य नीति के अनुसार किनसे दुश्मनी नहीं करनी चाहिए।
1. अग्नि, सर्प, राजा और मूर्ख व्यक्ति:
श्लोक:
राजा अग्निर्महासर्पो मूर्खश्च बहुनायकः।
अहर्निशं न सेव्यन्तः शीघ्रं कुर्वन्ति सङ्क्षयम्॥
श्लोक का अर्थ:
चाणक्य के अनुसार, राजा (प्रशासनिक शक्ति), अग्नि, विषैला सर्प और मूर्ख लोगों से कभी बैर या असावधानी नहीं रखनी चाहिए। यह किसी भी पल विनाश का कारण बन सकते हैं।
चाणक्य कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो सामने मीठी-मीठी बातें करता हो, लेकिन पीठ पीछे काम बिगाड़ता हो, ऐसे लोगों से शत्रुता या लड़ाई नहीं करना परेशानी भरा हो सकता है। चाणक्य कहते हैं कि ऐसे लोग दूध से ढके विष के घड़े के समान हैं। चाणक्य कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति आपका भेद जानता हो, तो उससे सीधे तौर पर बैर करने की बजाए उचित दूरी बना लेना समझदारी भरा होता है।
3. ज्ञानी, वैद्य और शस्त्रधारी:
चाणक्य कहते हैं कि कभी भी ज्ञानी व्यक्ति, वैद्य और जिस व्यक्ति के पास शस्त्र हो उससे शत्रुता नहीं करनी चाहिए। चाणक्य के अनुसार, वैद्य या डॉक्टर आपकी स्वास्थ्य की हर कमजोरी जानता है और आपके मर्ज के हिसाब से दवा देता है। लेकिन जब आप शत्रुता मान लेते हैं, तो वैद्य के पास जाना छोड़ सकते हैं, जिससे सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। चाणक्य कहते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति से दुश्मनी मोल लेना अच्छा नहीं होता है, क्योंकि हो सकता है वह आपको ज्ञान की बातें बताना बंद कर दे। इसी तरह जिस व्यक्ति के पास तुरंत नुकसान या हानि पहुंचाने का साधन या बल हो, उससे टकराव करना आत्मघाती हो सकता है।
आचार्य चाणक्य को एक महान दूरदर्शी, राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ माना जाता है। चाणक्य ने अपने ग्रंथ नीति शास्त्र में मानव जीवन से जुड़े तमाम पहलुओं का विस्तार से वर्णन किया है। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी नीतियों के बल पर एक साधारण बालक चंद्र गुप्त को मौर्य वंश का सम्राट बनाया था। हालांकि चाणक्य की नीतियां अपनाना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन जिसने भी इन्हें अपनाया उसे सफलता पाना आसान हो जाता है। चाणक्य की नीतियां आज भी प्रासंगिक हैं। एक नीति में उन्होंने बताया है कि व्यक्ति को अपनी पांच बातों को सभी से छिपाकर रखना चाहिए, वरना परेशानियां घेर सकती हैं। जानें आज की चाणक्य नीति।
श्लोक:
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वञ्चनं चापमानं च मतिमान् न प्रकाशयेत्॥
श्लोक का अर्थ:
चाणक्य नीति के अनुसार, धन या पौसा सिर्फ व्यक्ति की आर्थिक स्थिति ही तय नहीं करता है बल्कि उसकी सुरक्षा और समाज में मान-प्रतिष्ठा का भी आधार होता है। इसलिए चाणक्य ने कहा है कि आय, धन की हानि और वित्तीय स्थिति की जानकारी हर किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहिए। इस श्लोक का वर्णन चाणक्य नीति के तीसरे अध्याय के पहले श्लोक में मिलता है।
ये 5 बातें व्यक्ति को रखनी चाहिए हमेशा गुप्त:
श्लोक का अर्थ है कि बुद्धिमान या समझदार व्यक्ति को कभी 5 बातों को दूसरों के सामने जाहिर नहीं करना चाहिए। पहला धन की हानि या कमाई। दूसरा मन का दुख या मानसिक परेशानी। तीसरा परिवार की गुप्त बातें या कमजोरी। चौथा अपने साथ हुए धोखा या ठगी। पांचवां खुद के साथ हुआ अपमान।
श्लोक का सार:
चाणक्य कहते हैं कि जब लोगों को किसी की कमाई का पता चल जाता है, तो वह मेहनत करने के बजाए उससे आर्थिक मदद मांगने की तलाश में रहते हैं। अगर आप अपने गुप्त शत्रुओं या ईर्ष्या करने वाले रिश्तेदारों या मित्रों को अपनी आय बताएंगे, तो वह आपसे जलेंगे और आपको नुकसान पहुंचाने की साजिश रच सकते हैं। कई बार लालची व्यक्ति अपने स्वार्थ वश ही आपकी कमाई और कमजोरी जानकर ही आपसे जुड़ना पसंद करता है और मौका मिलने से आपको आर्थिक और मानसिक चोट पहुंचा सकता है। कई बार अत्यधिक बोलने वाले व्यक्ति किसी का राज अपने पेट में नहीं पचा पाते हैं और दूसरों के सामने आपके राज को सार्वजनिक कर सकते हैं, जिससे आपकी सुरक्षा और प्रतिष्ठा खतरे में पड़ सकती है।
चाणक्य का मानना है कि धन की स्थिति को हमेशा छिपाकर रखना कमजोरी नहीं बल्कि बुद्धिमानी होती है। अधिक आय बताने पर लोग जलन या ईर्ष्या करने लगते हैं और कम बताने पर समाज में अनादर करते हैं। इसलिए व्यक्ति को अपनी कमाई हमेशा गुप्त ही रखनी चाहिए।
अगस्त का आखिरी सप्ताह खगोलीय घटनाओं के लिहाज से खास रहने वाला है। 28 अगस्त 2026 को साल का दूसरा चंद्रग्रहण लगेगा। यह सामान्य आंशिक चंद्रग्रहण नहीं होगा, बल्कि बेहद गहरा आंशिक चंद्रग्रहण होगा। नासा के मुताबिक ग्रहण के चरम पर चंद्रमा का करीब 93 फीसदी व्यास पृथ्वी की गहरी छाया यानी umbra में पहुंच जाएगा। यही वजह है कि ग्रहण के दौरान चंद्रमा का बड़ा हिस्सा गहरे लाल या तांबे जैसा नजर आ सकता है।
भारत में नहीं दिखेगा चंद्रग्रहण
इस ग्रहण को लेकर भारत में सबसे ज्यादा सवाल इसकी दृश्यता को लेकर है। 28 अगस्त का चंद्रग्रहण भारत से दिखाई नहीं देगा, क्योंकि ग्रहण के दौरान चंद्रमा भारत के आसमान में क्षितिज के ऊपर नहीं होगा। इसकी दृश्यता मुख्य रूप से उत्तर और दक्षिण अमेरिका के अलावा यूरोप और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में रहेगी। भारत में दिखाई नहीं देने की वजह से यहां इस ग्रहण को लेकर सामान्य तौर पर सूतक काल मान्य नहीं माना जाएगा। हालांकि धार्मिक परंपराओं में स्थानीय मान्यताएं अलग हो सकती हैं।
कब शुरू होगा ग्रहण?
वैश्विक समय के अनुसार चंद्रग्रहण 28 अगस्त को तड़के शुरू होगा और करीब साढ़े पांच घंटे तक इसकी अलग-अलग अवस्थाएं रहेंगी। भारत के समय के हिसाब से इसकी शुरुआत सुबह के समय पड़ेगी। ग्रहण का अधिकतम चरण भी भारत में दिन के समय होगा, इसलिए यहां से इसे देख पाना संभव नहीं होगा।
ज्योतिष में क्यों महत्वपूर्ण है?
ज्योतिष में चंद्रमा को मन, भावनाओं, मानसिक स्थिति और संवेदनशीलता का कारक माना जाता है। इसलिए चंद्रग्रहण को केवल खगोलीय घटना के तौर पर नहीं देखा जाता। वैदिक ज्योतिष में ग्रहण के दौरान चंद्रमा की स्थिति को कुंडली के संदर्भ में देखकर अलग-अलग परिणामों की व्याख्या की जाती है।
इस ग्रहण का असर किन राशियों पर अधिक माना जाएगा, यह केवल राशि देखकर तय नहीं किया जा सकता। जन्मकुंडली में चंद्रमा की स्थिति, लग्न और ग्रहों के संबंध भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए किसी भी राशि के लिए ग्रहण को निश्चित रूप से शुभ या अशुभ बताना सही नहीं होगा।
वैज्ञानिक दृष्टि से ग्रहण का किसी व्यक्ति की किस्मत या स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव साबित नहीं हुआ है। ज्योतिषीय प्रभावों को पारंपरिक मान्यताओं के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
आसमान में दिखेगा बेहद खास नजारा
वैज्ञानिक नजरिए से इस ग्रहण की सबसे खास बात इसका गहरा आंशिक चरण है। चंद्रमा का बड़ा हिस्सा पृथ्वी की umbra में जाने के कारण ग्रहण लगा हुआ भाग लाल, नारंगी या तांबे जैसा दिखाई दे सकता है। चंद्रग्रहण को देखने के लिए सोलर ग्रहण की तरह किसी विशेष चश्मे की जरूरत नहीं होती।
साल 2026 का यह दूसरा चंद्रग्रहण होगा। इससे पहले 3 मार्च को पूर्ण चंद्रग्रहण हुआ था। अगस्त के बाद अगला चंद्रग्रहण फरवरी 2027 में होगा।
घर का बीच का स्थान ब्राह्मा का माना जाता है, इसलिए इसे ब्राह्मस्थान कहा जाता है। इसे घर की सबसे अधिक पवित्र जगह मानी जाती है, इस जगह को घर का एनर्जी प्वाइंट कहा जाता है, इसलिए घर में इसे खाली छोड़ें और कोई भी भारी सामान इस जगह ना रखें। दरअसल सभी कमरों की एनर्जी यहीं आकर एकत्र होती हैं। पुराने समय में घर के बीच में तुलसी का पौधा रखा जाता था। लेकिन अब जगह कम होने के कारण लोग इस जगह पर अपने घरों में फर्नीचर रख देते हैं, जो बिल्कुल गलत है। इस जगह को खाली छोड़ेंगे तो आपको लाभ होगा। आइए जानें इस जगह में क्या नहीं रखना चाहिए, जिससे आपकी लाइफ में धन की कमी तो होती ही है, साथ ही परेशानियां भी आती हैं। इसलिए इस जगह जनरेटर, फर्नीचर को तो बिल्कुल ना रखें। इस जगह को फूलों और तुलसी से सजाकर रखें? अगर आपका घर छोटा है तो इस जगह में डाइनिंग एरिया बनार रख सकते हैं। इसमें हैवी फर्नीचर ना रखें। मीटिंग रूम के तौर पर भी इस जगह का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन सेंटर को खाली रखें। इस जगह में कोई कबाड़ या अग्नि से जुड़ा सामान ना रखें।
इस जगह ना रखें तिजोरी
ब्रह्मस्थान पर तिजोरी भूलकर भी नहीं रखनी चाहिए। पहले घर को माप लें और देख लें, अगर घर का बीच का स्थान है तो इस जगह तिजोरी ना रखें। कहा जाता है कि इसके होने से उसमें धन नहीं रुकता है और धन आगमन में भी बाधा आती है। ब्रह्मस्थान पर कबाड़ होने से जिंदगी में अड़चन आती रहती है। इसलिए इस स्थान को जितना साफ और खाली रखेंगे, उससे आपको लाभ होगा।
इस जगह ना रखें पानी की टंकी
पहले अपने घर के बीच की जगह का अच्छे से माप ले लें। फिर देखें कि क्या यहां शौचालय है, अगर ऐसा है तो कहा जाता है कि इससे घर में बीमारियों का प्रकोप बना रहता है। इस स्थान पर पानी की टंकी होने से व्यवसाय में हानि, रसोई होने से घर में क्लेश हाेना एवं गड्ढा होना आर्थिक व शारीरिक रूप से अत्यधिक हानिकारक होता है। यदि ब्रह्मस्थान में जनरेटर आदि हो तो फैक्ट्री में आए दिन मशीन खराब रहती है तथा उत्पादन प्रभावित होता है।