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  • अगर हैं शिव भक्त, तो जीवन में एक बार जरूर करें महादेव के इन 7 विश्व प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन..?

    अगर हैं शिव भक्त, तो जीवन में एक बार जरूर करें महादेव के इन 7 विश्व प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन..?

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    भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक काशी विश्वनाथ मंदिर दुनिया के सबसे पवित्र शिव धामों में गिना जाता है.मान्यता है कि यहां दर्शन और गंगा स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.सावन, महाशिवरात्रि और देव दीपावली के दौरान लाखों श्रद्धालु यहां बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए पहुंचते हैं.यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का भी प्रतीक है.

    नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है.यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल यह मंदिर बागमती नदी के किनारे स्थित है और यहां केवल हिंदू श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति है.महाशिवरात्रि के अवसर पर दुनियाभर से साधु-संत और लाखों भक्त यहां पहुंचते हैं.इसकी भव्य वास्तुकला और धार्मिक महत्व इसे वैश्विक पहचान दिलाते हैं.

    नेपाल की राजधानी काठमांडू में स्थित पशुपतिनाथ मंदिर भगवान शिव के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है.यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल यह मंदिर बागमती नदी के किनारे स्थित है और यहां केवल हिंदू श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति है.महाशिवरात्रि के अवसर पर दुनियाभर से साधु-संत और लाखों भक्त यहां पहुंचते हैं.इसकी भव्य वास्तुकला और धार्मिक महत्व इसे वैश्विक पहचान दिलाते हैं.

    अमरनाथ गुफा भगवान शिव के सबसे चमत्कारी धामों में मानी जाती है.यहां प्राकृतिक रूप से बनने वाला बर्फ का शिवलिंग श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है.हर वर्ष सीमित समय के लिए खुलने वाली अमरनाथ यात्रा में देश-विदेश से लाखों भक्त शामिल होते हैं.धार्मिक मान्यता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य इसी गुफा में सुनाया था.

    अरब सागर के किनारे स्थित मुरुदेश्वर मंदिर अपनी विशाल शिव प्रतिमा के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है.यहां स्थापित भगवान शिव की करीब 123 फीट ऊंची प्रतिमा दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों और श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है.समुद्र के सुंदर नजारों के बीच स्थित यह मंदिर आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ प्राकृतिक सौंदर्य का भी अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है.

    चिदंबरम का नटराज मंदिर भगवान शिव के नटराज स्वरूप को समर्पित है, जहां उन्हें सृष्टि के दिव्य नर्तक के रूप में पूजा जाता है.द्रविड़ शैली की भव्य वास्तुकला, विशाल गोपुरम और सदियों पुरानी परंपराएं इस मंदिर को विशेष बनाती हैं.यहां का ‘चिदंबरम रहस्य’ आज भी श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं के बीच जिज्ञासा का विषय बना हुआ है.

    ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर भगवान हरिहर (शिव और विष्णु के संयुक्त स्वरूप) को समर्पित है.लगभग एक हजार वर्ष पुराने इस मंदिर को कलिंग वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है.इसकी भव्य नक्काशी, विशाल परिसर और धार्मिक महत्व इसे दुनिया के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में शामिल करते हैं.महाशिवरात्रि के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और पूरा मंदिर ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठता है.

  • झारखंड का रहस्यमयी शिव धाम! खुद मां गंगा करती हैं जलाभिषेक, 1925 में जमीन के नीचे मिला था ये मंदिर..

    झारखंड का रहस्यमयी शिव धाम! खुद मां गंगा करती हैं जलाभिषेक, 1925 में जमीन के नीचे मिला था ये मंदिर..

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     हिंदू धर्म में भगवान शिव की भक्ति का विशेष महत्व माना जाता है. झारखंड के रामगढ़ में एक ऐसा प्राचीन शिव मंदिर है, जहां शिवलिंग पर वर्षभर प्राकृतिक जलधारा गिरती रहती है. हिंदू धर्म की मान्यताओं में इस जलाभिषेक को पवित्र माना जाता है. बताया जाता है कि मंदिर के भीतर मां गंगा की प्रतिमा से जल निकलकर शिवलिंग पर गिरता है. यही अनोखी घटना इस धाम को आस्था, चमत्कार और रहस्य से जुड़ा धार्मिक स्थल बनाती है. रामगढ़ का यह शिव मंदिर अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण लंबे समय से श्रद्धालुओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. यहां सबसे बड़ा आकर्षण शिवलिंग पर होने वाला प्राकृतिक जलाभिषेक है. मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, यह जलधारा किसी श्रद्धालु द्वारा नहीं चढ़ाई जाती, बल्कि अपने आप लगातार शिवलिंग तक पहुंचती है.

    खुदाई में सामने आया था प्राचीन मंदिर

    बताया जाता है कि इस मंदिर का इतिहास वर्ष 1925 से जुड़ा है. उस समय इलाके में पानी की तलाश में खुदाई का काम चल रहा था. इसी दौरान जमीन के नीचे गुंबद जैसी संरचना दिखाई दी. आगे खुदाई होने पर वहां एक पूरा प्राचीन मंदिर सामने आया. मंदिर के भीतर भगवान शिव का शिवलिंग स्थापित था. इसके ठीक ऊपर मां गंगा की सफेद रंग की प्रतिमा मिली. सबसे हैरान करने वाली बात प्रतिमा से जुड़ी जलधारा को लेकर बताई जाती है, जो नाभि के हिस्से से निकलकर नीचे शिवलिंग तक पहुंचती है.

    मां गंगा की प्रतिमा से निकलता है जल

    स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां गंगा की प्रतिमा से निकलने वाला जल दोनों हथेलियों से होकर शिवलिंग पर गिरता है. इस तरह भगवान शिव का लगातार जलाभिषेक होता रहता है. यही कारण है कि श्रद्धालु इस स्थान को बेहद पवित्र मानते हैं. इस प्राकृतिक जलधारा का वास्तविक स्रोत कहां है, इसे लेकर आज भी लोगों के मन में सवाल हैं. जल के स्रोत को समझने के लिए जांच किए जाने की बातें भी सामने आती रही हैं, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए इसका धार्मिक महत्व सबसे बड़ा है.

    बिना चलाए पानी देते हैं हैंडपंप

    इस झारखंड मंदिर का रहस्य केवल शिवलिंग तक सीमित नहीं बताया जाता. मंदिर परिसर में लगे दो हैंडपंप भी लोगों का ध्यान खींचते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार, इनसे बिना चलाए भी पानी निकलता रहता है. इससे जुड़े दावे खास तौर पर तब चर्चा में आते हैं, जब आसपास के जलस्रोतों में पानी कम हो जाता है. यही वजह है कि मंदिर में आने वाले लोग इसे भगवान शिव की कृपा और प्राकृतिक चमत्कार से जोड़कर देखते हैं.

    श्रद्धालुओं के लिए क्यों खास है यह धाम?

    इस मंदिर से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं इसे सामान्य शिव मंदिरों से अलग पहचान देती हैं. श्रद्धालु यहां होने वाले प्राकृतिक जलाभिषेक को भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद मानते हैं. मान्यता है कि सच्चे मन से यहां प्रार्थना करने पर मनोकामना पूरी होती है. इसी विश्वास के कारण दूर-दराज से लोग दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं.

    इस धाम की प्रमुख विशेषताएं

    • शिवलिंग पर लगातार प्राकृतिक जलाभिषेक.
    • मां गंगा की प्रतिमा से जलधारा निकलने की मान्यता.
    • वर्ष 1925 में खुदाई के दौरान मंदिर मिलने की कहानी.
    • मंदिर परिसर में लगातार पानी देने वाले हैंडपंप.
    • जलधारा के वास्तविक स्रोत को लेकर आज भी रहस्य.

    हिंदू धर्म, भगवान शिव, मां गंगा और प्राकृतिक जलाभिषेक से जुड़ी इन मान्यताओं के कारण रामगढ़ का यह प्राचीन धाम श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विशेष केंद्र बना हुआ है. मंदिर का रहस्य लोगों की जिज्ञासा बढ़ाता है, जबकि यहां की धार्मिक मान्यताएं इसे झारखंड के चर्चित शिव धामों में अलग पहचान देती हैं.

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  • क्या आज भी धरती पर भटक रहे हैं महाभारत के अश्वत्थामा? जानें पूरा रहस्य..

    क्या आज भी धरती पर भटक रहे हैं महाभारत के अश्वत्थामा? जानें पूरा रहस्य..

    क्या अश्वत्थामा आज भी इस धरती पर मौजूद हैं या फिर उनकी अमरता की कहानी केवल एक प्राचीन लोककथा है? महाभारत के इस योद्धा को लेकर सदियों से तरह-तरह के दावे किए जाते रहे हैं. कहीं उन्हें जंगलों में देखे जाने की बात कही जाती है, तो कहीं मंदिरों में रात के समय उनके आने के किस्से सुनाए जाते हैं. कुछ कथाओं में उनके माथे के घाव और तेल मांगने का भी जिक्र मिलता है. लेकिन सवाल यह है कि इन दावों में कितनी सच्चाई है? क्या वाकई कोई व्यक्ति हजारों वर्षों से जीवित रह सकता है या फिर इसके पीछे धार्मिक आस्था, लोककथाएं और मानवीय कल्पना का मेल है? आइए जानते हैं अश्वत्थामा से जुड़े रहस्य.

    कौन थे अश्वत्थामा और क्यों मिला था उन्हें श्राप?

    महाभारत में अश्वत्थामा को गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र बताया गया है. वे कौरवों की ओर से युद्ध करने वाले प्रमुख योद्धाओं में शामिल थे. युद्ध समाप्त होने के बाद भी उनके भीतर बदले की आग शांत नहीं हुई.

    कथाओं के अनुसार, रात के समय अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में प्रवेश किया था और वहां सो रहे द्रौपदी के पांच पुत्रों का वध कर दिया था. इसके बाद उन्होंने पांडव वंश को समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रह्मास्त्र का प्रयोग भी किया था. यही घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ मानी जाती है. धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा को उनके कर्मों के लिए श्राप दिया. उनकी मस्तक पर स्थित दिव्य मणि भी उनसे ले ली गई और उन्हें लंबे समय तक धरती पर भटकते रहने का श्राप मिला था.

    मान्यता है कि इस श्राप के कारण अश्वत्थामा को न मृत्यु मिलेगी और न ही सामान्य जीवन की तरह उन्हें मुक्ति प्राप्त होगी. उनके माथे का घाव कभी नहीं भरेगा और वे अपने कर्मों का परिणाम भुगतते रहेंगे. यहीं से शुरू होती है अश्वत्थामा के अमर होने की वह कहानी, जिसने हजारों वर्षों से लोगों की कल्पना और आस्था को अपने साथ जोड़े रखा है.

    असीरगढ़ का किला और अश्वत्थामा से जुड़ा रहस्य

    मध्य प्रदेश के बुरहानपुर के पास स्थित असीरगढ़ किले का नाम अश्वत्थामा से जुड़ी कहानियों में अक्सर सामने आता है. स्थानीय लोककथाओं में दावा किया जाता है कि अश्वत्थामा आज भी इस क्षेत्र में आते हैं. किले के आसपास मौजूद प्राचीन धार्मिक स्थलों को लेकर भी कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि अश्वत्थामा रात के समय भगवान शिव की पूजा करने के लिए किसी मंदिर में पहुंचते हैं.

    कुछ स्थानीय लोगों और पुजारियों द्वारा यह दावा किया गया है कि सुबह मंदिर के कपाट खुलने पर शिवलिंग पर ताजे फूल या चंदन चढ़ा हुआ मिलता है. इसके बाद यह सवाल उठता रहा है कि आखिर रात में पूजा कौन करता है? इन दावों को अश्वत्थामा की कथा से जोड़ दिया जाता है. हालांकि, ऐसी घटनाओं का कोई ऐसा वैज्ञानिक प्रमाण सामने नहीं आया है, जिससे यह निश्चित रूप से साबित हो सके कि मंदिर में पूजा करने वाला व्यक्ति अश्वत्थामा ही है. फिर भी असीरगढ़ का नाम इस रहस्य से इतनी मजबूती से जुड़ चुका है कि आज भी लोग इस कहानी को बड़े उत्सुकता से सुनते और सुनाते हैं.

    माथे के घाव से लेकर तेल मांगने तक, क्या हैं ये दावे?

    अश्वत्थामा को लेकर सबसे चर्चित लोककथाओं में उनके माथे के घाव का जिक्र मिलता है. मान्यता है कि भगवान कृष्ण के श्राप के बाद उनके माथे का घाव कभी ठीक नहीं हुआ. इसी कहानी से जुड़ा एक और दावा है कि अश्वत्थामा अलग-अलग जगहों पर साधुओं या ग्रामीणों के सामने प्रकट होते हैं और उनसे तेल मांगते हैं. कहा जाता है कि माथे के घाव में होने वाली जलन को कम करने के लिए उन्हें तेल की आवश्यकता होती है.

    नर्मदा नदी के आसपास के इलाकों में भी इस तरह की लोककथाएं सुनने को मिलती हैं. कुछ साधु और स्थानीय लोग दावा करते रहे हैं कि उन्होंने एक बेहद लंबे और रहस्यमय व्यक्ति को देखा, जो कभी-कभी तेल मांगता था और फिर अचानक वहां से गायब हो जाता था. इन कथाओं में व्यक्ति का हुलिया भी कई बार एक जैसा बताया गया है जैसे लंबा कद, शरीर पर असामान्य निशान और माथे पर गहरा घाव.

    लेकिन इन घटनाओं को प्रमाणित करने वाला कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक या ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है. इसलिए इन्हें अश्वत्थामा के अस्तित्व का प्रमाण मानने के बजाय लोकविश्वास और कथाओं के रूप में देखना अधिक उचित है.

    पृथ्वीराज चौहान से मुलाकात की कहानी कितनी सच?

    अश्वत्थामा को लेकर एक और बेहद दिलचस्प कहानी पृथ्वीराज चौहान से जुड़ी है. लोककथाओं में कहा जाता है कि शिकार के दौरान पृथ्वीराज चौहान की मुलाकात एक रहस्यमय व्यक्ति से हुई थी. उस व्यक्ति के माथे पर गहरा घाव था और वह सामान्य मनुष्य से अलग दिखाई देता था. कथा के अनुसार, पृथ्वीराज चौहान ने उस घाव को ठीक करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली.

    कई दिनों तक उपचार के बाद भी जब घाव ठीक नहीं हुआ, तब उस रहस्यमय व्यक्ति की पहचान को लेकर संदेह पैदा हुआ. आगे की कथा में दावा किया जाता है कि उसने स्वयं को अश्वत्थामा बताया. हालांकि, यहां यह समझना जरूरी है कि इस कहानी का आधार मजबूत समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जाता. पृथ्वीराज रासो में कई घटनाओं का वर्णन मिलता है, लेकिन इसकी रचना और ऐतिहासिक विश्वसनीयता को लेकर इतिहासकारों के बीच लंबे समय से बहस रही है.

    इसलिए पृथ्वीराज चौहान और अश्वत्थामा की कथित मुलाकात को इतिहास की प्रमाणित घटना कहना सही नहीं होगा. इसे अश्वत्थामा से जुड़ी प्रचलित लोककथाओं के हिस्से के रूप में देखा जाता है.

    गुजरात के जंगलों से नर्मदा तक, कहां-कहां दिखने का दावा?

    अश्वत्थामा को लेकर सिर्फ मध्य प्रदेश या नर्मदा क्षेत्र में ही कहानियां नहीं मिलतीं. देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर लोगों ने एक रहस्यमय और असामान्य रूप से लंबे व्यक्ति को देखने का दावा किया है. गुजरात के डांग क्षेत्र से भी ऐसी ही एक पुरानी कहानी सामने आती है. कहा जाता है कि जंगल के पास काम कर रहे एक व्यक्ति ने रात के समय एक विशालकाय आकृति को रेलवे ट्रैक के पास देखा था.

    उसने जब रोशनी डालकर देखने की कोशिश की, तो उसे एक थका हुआ और विचित्र चेहरा नजर आया. कुछ ही क्षणों में वह आकृति जंगल की तरफ चली गई और फिर दिखाई नहीं दी. बाद में इस घटना को भी अश्वत्थामा से जोड़कर देखा जाने लगा. हालांकि, ऐसी घटनाओं में प्रत्यक्षदर्शी की धारणा, अंधेरा, दूरी और डर जैसी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. यही वजह है कि किसी व्यक्ति को कुछ सेकंड के लिए देखने भर से उसकी पहचान हजारों साल पुराने किसी पात्र के रूप में तय नहीं की जा सकती.

    क्या कलयुग के अंत तक धरती पर रहेंगे अश्वत्थामा?

    अश्वत्थामा की कहानी का सबसे रहस्यमय हिस्सा उनका भविष्य है. हिंदू धार्मिक परंपराओं में उन्हें चिरंजीवी माना जाता है. चिरंजीवियों को लेकर मान्यता है कि वे लंबे समय तक धरती पर मौजूद रहेंगे. कुछ धार्मिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि भविष्य में जब भगवान कल्कि का अवतार होगा, तब अश्वत्थामा की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी. उन्हें भविष्य के एक बड़े धार्मिक परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है.

    यही विश्वास उनकी कहानी को सिर्फ अतीत तक सीमित नहीं रहने देता. उनके बारे में कहा जाता है कि उनका प्रायश्चित अभी पूरा नहीं हुआ है और वे अपने श्राप के कारण कलियुग के अंत तक भटकते रहेंगे. लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि आज सचमुच अश्वत्थामा हमारे बीच जीवित हैं?

    अश्वत्थामा की कहानी को अगर केवल डर की नजर से देखें तो यह एक श्रापित योद्धा की कहानी लगती है. लेकिन अगर इसे कर्म और उसके परिणाम के रूप में समझें, तो इसका संदेश और भी गहरा हो जाता है. हो सकता है अश्वत्थामा का अस्तित्व केवल धार्मिक मान्यता में हो, या फिर सदियों पुरानी इन कथाओं के पीछे कोई ऐसी कहानी हो, जिसे हम आज तक पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं.

    लेकिन एक बात तय है कि अश्वत्थामा की कथा केवल उनके जीवित होने के सवाल तक सीमित नहीं है. यह हमें कर्म, क्रोध, प्रतिशोध और प्रायश्चित की ऐसी कहानी सुनाती है, जिसका असर महाभारत के युग से लेकर आज तक दिखाई देता है. शायद इसी वजह से अश्वत्थामा आज भी सिर्फ एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय लोकस्मृति का एक ऐसा रहस्य हैं, जिसका जवाब लोग सदियों से तलाश रहे हैं.

  • गरुड़ पुराण:  मृत्यु के कितने दिनों बाद आत्मा यमलोक पहुंचती है, रास्ते में क्या-क्या पड़ता है..?

    गरुड़ पुराण: मृत्यु के कितने दिनों बाद आत्मा यमलोक पहुंचती है, रास्ते में क्या-क्या पड़ता है..?

    मृत्यु को अटल सत्य कहा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो आया है उसे जाना भी होगा। गरुड़ पुराण में लाइफ के हर रहस्य के बारे में लिखा है। व्यक्ति के मरने के बाद आत्मा 13 दिन तक घर में रहती है, फिर 47 दिन बात यमलोक जाती है। यमलोक जाने पर क्या-क्या मिलता है। इस 47 जिन की यात्रा के लिए आत्मा को किन चीजों से जूझना पड़ता है, इसके बारे में यमलोक में बताया गया है। वहां जाने के बाद होता है आपके कर्मों का हिसाब। आपने क्या अच्छा किया और क्या गलत किया इन सभी का हिसाब होता है। आइए जानें यमलोक कैसे जाते हैं रास्ते में कौन सी नदी पड़ती है और आत्मा कैसे यमलोक पहुंचती है।

    मृत्यु से पहले दिखते हैं यमराज

    जिसकी मृत्यु होने वाली होती है, उसे यमराज दिखते हैं। यमराज अंगूठे के बराबर आत्मा को अपने साथ ले जाते हैं, लेकिन फिर आत्मा वापस शरीर में जाने के लिए कहती है, यमराज उसे बांधे रखते हैं। इसके बाद 13 दिन तक आत्मा घर में रहती है और फिर 1 3 दिन बाद यमलोक के लिए जाती है। इसलिए 13वें दिन आत्मा के साथ चप्पल, छतरी, टॉर्च, बिस्तर आदि रख कर देते हैं।

    पिंड-दान अगर ना किया जाए

    अगर किसी व्यक्ति का पिंडदान या अंतिम संस्कार ना किया जाए तो आत्मा भटकने लगती है। अगर दाह संस्कार हो जाता है और विधि विधान से सभी कार्य होते हैं तो आत्मा यमलोक की यात्रा पर निकलती है। यमलोक 99 योजन दूर है। रास्त में कई दिक्कतें झेलनी पड़ती है, वहां बहुत गर्म होता है, रास्ते में खाना और पानी भी नहीं मिलता। यमराज के सामने प्रस्तुत करते हैं। यमराज उस आत्मा को उसके द्वारा किए गए पापों के अनुसार सजा देते हैं>

    10 दिन तक पिंडदान

    गरुड़ पुराण के अनुसार मृत्यु के बाद 13 दिन तक आत्मा घर में ही रहती है, लेकिन जब लगातार पिंडदान होते हैं तो पिंडदान से आत्मा का शरीर बनने लगता है। 13 दिन बात आत्मा घर से चली जाती है।

    वैतरणी नदी यमलोक के जाने वाले रास्ते में मिलती है। इसे पारकरके ही यमलोक पहुंचा जा सकता है। यह रास्त उनके लिए कठिन हो जाता है, जिन्होंने पाप किए हैं, उनके लिए कई परेशानियां आती हैं। कहा जाता है कि यमलोक तक पहुंचने के लिए 16 पुरियों को पार करना होता है।

  • क्यों अशुभ है पूजा के दौरान दीपक का बुझना? क्या बुझी हुई बाती को फिर से जलाएं या नहीं..?

    क्यों अशुभ है पूजा के दौरान दीपक का बुझना? क्या बुझी हुई बाती को फिर से जलाएं या नहीं..?

    Puja Path Niyam: हिंदू धर्म में पूजा के दौरान दीप प्रज्वलन किया जाता है. दीपक जलाने को हिंदू संस्कृति में शुभता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानते हैं. किसी भी देवी-देवता की पूजा से पहले दीपक अवश्य जलाते हैं. ऐसा माना जाता है कि, पूजा के दौरान दीपक जलाने से एकाग्रता बढ़ती है. कई बार पूजा के दौरान दीपक बुझ जाता है. दीपक का बुझना अशुभ माना जाता है. दीपक के बुझने को अपशकुन क्यों मानते हैं और इससे क्या संकेत मिलते हैं. आइये जानते हैं.

    क्यों अशुभ है दीपक का बुझना?

    हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपक का बुझना अशुभ मानते हैं. अगर पूजा के दौरान अचानक दीपक बुझ जाता है, तो यह भगवान के नाराज होने का संकेत माना जाता है. यह जीवन में बाधाओं के आने और पूजा में एकाग्रता की कमी होने की ओर इशारा करता है. हालांकि, सामान्य तौर पर दीपक का बुझना लापरवाही और महज संयोग माना जाता है. इसको लेकर परंपरा से जुड़े विश्वास और सामान्य मत अलग-अलग हैं.

    दीपक बुझने से मिलते हैं कई संकेत

    काम में बाधा – अगर पूजा के दौरान दीपक बुझ जाता है, तो यह अशुभ होता है. इसका अर्थ है कि, आपको भविष्य में काम में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है.

    ध्यान का भटकना – दीपक का बुझना पूजा के दौरान एकाग्रता की कमी और ध्यान के भटकने का संकेत होता है. आपको पूजा के दौरान एकाग्र रहना चाहिए.

    नकारात्मक ऊर्जा – अगर आसपास नकारात्मक ऊर्जा होती है या वास्तु दोष होता है, इसके कारण भी दीपक बुझ सकता है. कई बार दीपक बुझना देवताओं के नाराज होने का संकेत होता है.

    पितरों की नाराजगी – कई लोग दीपक के बुझने को पितरों की नाराजगी से जोड़कर देखते हैं. अगर पूजा के दौरान दीपक बुझ जाता है, तो भगवान और इष्ट देव से क्षमा प्रार्थना करनी चाहिए.

    क्या फिर से जलाएं बुझी हुई बाती?

    पूजा के दौरान दीपक के बुझ जाने पर इसे फिर से जला सकते हैं. हालांकि, जली हुई बाती को दोबारा जलाने से परहेज करना चाहिए. आप दीपक को फिर से जलाने से पहले दीपक के तेल या घी की मात्रा को देख लें. अगर बाती छोटी या मोटी हो तो इसे फिर से सही से बनाएं. इसके बाद इष्ट देव से माफी मांगने के बाद दीपक जला सकते हैं. दीपक जलाने के दौरान दीप प्रज्वलन मंत्र का जाप करना चाहिए.

    ‘शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदाम्।
    शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥’

  • चोटी-जनेऊ रखने वाले ये महान लोग कौन थे? भगवान कृष्ण से चाणक्य-शंकराचार्य तक की कहानी कर देगी हैरान..

    चोटी-जनेऊ रखने वाले ये महान लोग कौन थे? भगवान कृष्ण से चाणक्य-शंकराचार्य तक की कहानी कर देगी हैरान..

    भारत की हिंदू परंपरा में चोटी यानी शिखा का अपना अलग महत्व रहा है. पुराने समय में इसे सिर्फ हेयरस्टाइल नहीं माना जाता था. यह पहचान, अनुशासन और धार्मिक परंपरा से जुड़ी थी. कई विद्वानों और महापुरुषों ने शिखा धारण की. इनमें भगवान कृष्ण, बलराम, चाणक्य और आदि शंकराचार्य जैसे नाम शामिल हैं. आइए जानते हैं, इतिहास और परंपरा में चोटी रखने वाले इन महान लोगों के बारे में, जिनका नाम आज भी लिया जाता है.

    आचार्य चाणक्य की अटूट प्रतिज्ञा

    आचार्य चाणक्य का नाम आते ही उनकी खुली शिखा वाली प्रतिज्ञा याद आती है. यह इतिहास की सबसे प्रसिद्ध घटना है. कहते हैं, मगध के राजा धनानंद के दरबार में उनका अपमान हुआ था. इसके बाद चाणक्य ने अपनी शिखा खोल दी. उन्होंने संकल्प लिया कि नंद वंश का अंत किए बिना शिखा नहीं बांधेंगे. यही संकल्प आगे चलकर चंद्रगुप्त मौर्य के उत्थान से जुड़ा. मौर्य साम्राज्य की नींव पड़ी. लक्ष्य पूरा होने के बाद ही चाणक्य ने अपनी शिखा बांधी. इस वजह से उनकी शिखा उनके मजबूत इरादे की पहचान बन गई.

    भगवान कृष्ण और बलराम

    पौराणिक प्रसंगों में भगवान कृष्ण और बलराम की शिखा का उल्लेख मिलता है. बाल कृष्ण की चोटी से जुड़े कई रोचक प्रसंग मिलते हैं. माता यशोदा के साथ उनके संवाद में भी चोटी का जिक्र आता है. उनके उपनयन के समय बलरामजी के साथ भी पारंपरिक रूप में शिखा का वर्णन मिलता है. इससे साबित होता है कि द्वापर युग के उस दौर में भी चोटी जीवन और संस्कृति का हिस्सा थी.

    आदि शंकराचार्य और ऋषि-मुनि

    आदि शंकराचार्य का नाम भारतीय दर्शन के इतिहास में बेहद खास है. उन्होंने अद्वैत वेदांत को व्यापक रूप से स्थापित किया. पारंपरिक चित्रण और विवरणों में उन्हें शिखाधारी संन्यासी के रूप में देखा जाता है. प्राचीन ऋषि-मुनियों में भी शिखा की परंपरा रही है. वशिष्ठ, अगस्त्य और सांदीपनि जैसे ऋषियों का नाम इस संदर्भ में लिया जाता है. गुरुकुल और वैदिक शिक्षा में शिखा को ज्ञान और श्रेष्ठता का प्रतीक भी था.

    वीर योद्धाओं और महापुरुषों की पहचान

    महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह जैसे ऐतिहासिक महापुरुषों का नाम भी हिंदू सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं की रक्षा के संदर्भ में लिया जाता है. इनके दौर में चोटी और जनेऊ को लेकर धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का सवाल भी महत्वपूर्ण था.

    डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है.

  • दोस्ती या दिखावा, आचार्य चाणक्य से जानिए कैसे करें सच्चे मित्र की पहचान? वरना मिलेगा धोखा..

    दोस्ती या दिखावा, आचार्य चाणक्य से जानिए कैसे करें सच्चे मित्र की पहचान? वरना मिलेगा धोखा..

    Chanakya Niti: महान शिक्षक, अर्थशास्त्री और कूटनीतिज्ञ चाणक्य अपनी खास नीतियों के लिए जाने जाते हैं. वह अपनी बुद्धिमत्ता और रणनीतिक कौशल के लिए जाने जाते थे. आचार्य चाणक्य की कई नीतियां आज के समय में भी प्रासंगिक हैं. उन्होंने अपनी नीतियों में मित्रों के बारे में बताया है. सच्चे मित्र के बारे में आचार्य चाणक्य के श्लोक के जरिए जान सकते हैं.

    “आतुरे व्यसने प्राप्ते दुर्भिक्षे शत्रु-संकटे.
    राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥”

    आचार्य चाणक्य के इस श्लोक के जरिए सच्चे मित्र की पहचान के बारे में जान सकते हैं. मित्रता से जुड़ा एक प्रसिद्ध श्लोक सच्चे मित्र की पहचान के बारे में बताया है. आइये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं कि, कौन लोग आपके सच्चे मित्र होते हैं और कौन लोग सिर्फ दिखावे के लिए आपके साथ होते हैं.

    बीमारी में साथ – आप बीमार हैं या घर-परिवार में कोई सदस्य बीमारी से जूझ रहा है, ऐसे समय में साथ देने वाला ही सच्चा मित्र होता है. अगर ऐसे समय में कोई साथ छोड़ देता हैं तो वह सिर्फ दिखावे का मित्र है.

    विपत्ति और संकट में साथ – आपके ऊपर कोई बड़ा संकट या विपत्ति आती है, ऐसे समय में साथ रहने वाला ही आपका सच्चा मित्र है. नौकरी जाने, व्यापार में नुकसान होने या जीवन में संकट के समय साथ देने वाला सच्चा दोस्त होता है.

    आर्थिक तंगी में साथ – आप जीवन में किसी कारण से आर्थिक तंगी से परेशान हैं. इस समय में दोस्त आपका साथ छोड़ दें, तो वह सिर्फ दिखावे का मित्र है. असली दोस्त आपकी हर संभव मदद करेगा.

    विरोध या लड़ाई में साथ – किसी से लड़ाई होने पर साथ देना वाला ही आपका दोस्त होता है. ऐसे समय में मुंह मोड़ लेने वाला आपका सच्चा दोस्त नहीं हो सकता है. आपका सच्चा मित्र शत्रु के सामने आपके साथ खड़ा रहेगा.

    कानूनी परेशानी में साथ – अक्सर लोग कानूनी मामलों में उलझ जाते हैं. इस बुरे समय में सभी लोग साथ छोड़ देते हैं. लेकिन आपका सच्चा दोस्त इस समय में आपका साथ नहीं छोड़ेगा. जरूरत के समय वह हमेशा साथ खड़ा मिलेगा.

    पारिवारिक पीड़ा में दे साथ – सच्चा मित्र सिर्फ आपका ही नहीं, बल्कि परिवार का भी साथ देता है. परिवार में किसी अनहोनी के होने या किसी की मृत्यु होने पर भी आपके साथ खड़ा रहता है. आचार्य चाणक्य के इस श्लोक के अनुसार, बुरे समय में दोस्त साथ नहीं देता है, तो वह सच्चा मित्र नहीं है.

  • नीम करोली बाबा का ‘बेस्ट पेरेंटिंग’ फॉर्मूला, जिद्दी बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए अपनाएं ये बातें..

    नीम करोली बाबा का ‘बेस्ट पेरेंटिंग’ फॉर्मूला, जिद्दी बच्चों को संस्कारी बनाने के लिए अपनाएं ये बातें..

    बचपन में बच्चे जो सीखते हैं, उसका असर लंबे समय तक रहता है. लेकिन डिजिटल दौर में बच्चों की परवरिश किसी चक्रव्यूह से कम नहीं है. इंटरनेट, सोशल मीडिया और बढ़ती जिद के बीच संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं. हर माता-पिता अपने बच्चे को सफल बनाना चाहते हैं, लेकिन इस होड़ में नैतिक मूल्य गायब हो रहे हैं. अगर आप भी इस पेरेंटिंग की उलझन से परेशान हैं, तो आपको सदियों पुराना लेकिन बेहद सटीक समाधान चाहिए.

    यह समाधान छिपा है बीसवीं सदी के महान संत नीम करोली बाबा की शिक्षाओं में. बाबा की सीख में अनुशासन, सेवा, सच्चाई और प्रेम को खास जगह मिली है. स्टीव जॉब्स से लेकर मार्क जुकरबर्ग तक को जीवन की राह दिखाने वाले बाबा ने बच्चों की परवरिश के सरल लेकिन अचूक नियम बताए हैं. आइए जानते हैं बाबा के वे 5 चमत्कारी पेरेंटिंग टिप्स, जो आपके बच्चे को संस्कारी और सफल बना सकते हैं. पांचवीं सीख तो आज के हर बच्चे के लिए संजीवनी बूटी है.

    सुबह की शुरुआत प्रार्थना से

    बच्चों को सुबह जल्दी उठने की आदत डालें. दिन की शुरुआत भगवान को याद करके करें. कोई छोटा मंत्र बोलने को कह सकते हैं. या बस कुछ पल शांत बैठने दें. इससे बच्चे दिन की शुरुआत पॉजिटिव तरीके से करेंगे. मन भी शांत रहेगा. धीरे-धीरे उनमें कृतज्ञता की आदत बन सकती है. यह छोटी सी आदत उनके कॉन्फिडेंस और सोच पर भी अच्छा असर डाल सकती है.

    नियमित दिनचर्या का पालन

    बच्चों की लाइफ में रूटीन होना जरूरी है. सोने, उठने, पढ़ने और खेलने का समय तय रखें. हर बात में डांटने के बजाय प्यार से समझाएं. मोबाइल और गेमिंग का टाइम भी तय किया जा सकता है. इससे बच्चा खुद अपने समय को मैनेज करना सीखता है. पढ़ाई के साथ खेल और आराम के लिए भी वक्त मिले. ऐसी आदत आगे चलकर जिम्मेदारी निभाने में काम आती है.

    दूसरों की मदद

    नीम करोली बाबा की सीख में सेवा और प्रेम का खास महत्व है. बच्चों को दूसरों की मदद करना सिखाएं. दोस्त की पढ़ाई में मदद करना हो या घर में किसी छोटे काम में हाथ बंटाना. छोटी-छोटी चीजें भी मायने रखती हैं. उन्हें जरूरतमंद के साथ सम्मान से पेश आना बताएं. इससे बच्चे में दया और संवेदनशीलता बढ़ सकती है. वह सिर्फ अपने बारे में सोचने के बजाय दूसरों की फीलिंग्स भी समझना सीखेगा.

    सच्चाई और विनम्रता

    बच्चे से हमेशा सच बोलने की उम्मीद करें. लेकिन गलती होने पर उसे डराएं नहीं. उसे समझाएं कि सच बोलना ज्यादा जरूरी है. अपनी गलती मानना कमजोरी नहीं है. दूसरों से सम्मान से बात करना भी सिखाएं. बाबा की सीख के मुताबिक, अहंकार से दूर रहना जरूरी है. किसी ने बुरा व्यवहार किया हो, तब भी खुद का व्यवहार अच्छा रखना सीखें. यही आदत बच्चे की पर्सनैलिटी को मजबूत बना सकती है.

    सादगीपूर्ण जीवन जीना

    बच्चों को हर नई चीज दिलाना जरूरी नहीं है. महंगा फोन या गैजेट खुशी की गारंटी नहीं है. उन्हें चीजों की वैल्यू समझाएं. दिखावे की जगह जरूरत को महत्व देना सिखाएं. परिवार के साथ समय बिताएं. साथ बैठकर खाना खाएं. कभी बिना मोबाइल के बातचीत करें. ऐसी छोटी आदतें बच्चे को रिश्तों की अहमियत समझाती हैं. सादगी के साथ जीने वाला बच्चा लाइफ के उतार-चढ़ाव को भी ज्यादा सहजता से संभालना सीख सकता है.

    डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए दी जा रही है.

  • Premanand Maharaj: ऑफिस में छुट्टी के लिए झूठ बोलना पाप है या नहीं? प्रेमानंद महाराज से जानिए जवाब..

    Premanand Maharaj: ऑफिस में छुट्टी के लिए झूठ बोलना पाप है या नहीं? प्रेमानंद महाराज से जानिए जवाब..

    Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज अपने साधक और भक्तों से एकांतिक वार्तालाप करते हैं. इसके कई वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं. वह एकांतिक वार्तालाप के दौरान भक्तों द्वारा किए जाने वाले सभी सवालों का जबाव देते हैं. भक्त अक्सर सामान्य जीवन और धर्म-कर्म से जुड़े सवाल पूछते हैं. एक भक्त ने महाराज जी से ऑफिस में छूट्टी के लिए झूठ बोलने के बारे में पूछा.

    छुट्टी के लिए झूठ बोलना

    एक व्यक्ति ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि, ‘मैं एक प्राइवेट कंपनी में काम करता हूं. कंपनी में जरूरी काम के कारण कई बार छुट्टी नहीं मिलती है. ऐसे में कई बार दादी, फूफा या किसी अन्य रिश्तेदार की मौत का बहाना बनाकर छुट्टी लेनी पड़ती है, तो क्या छुट्टी के लिए झूठ बोलने से पाप लगता है?’ इस बात को सुनकर प्रेमानंद महाराज के चेहरे पर हंसी आ गई. इसके बाद उन्होंने इस बात का जबाव दिया.

    क्या बोले प्रेमानंद महाराज?

    इसका जबाव प्रेमानंद महाराज ने हंसते हुए एक कहावत के साथ दिया, उन्होंने बोला कि, यह सब कलयुग का प्रभाव है. ‘झूठइ लेना झूठइ देना, झूठइ भोजन झूठ चबेना’ वह बोले कि, लेकिन कुछ भी हो झूठ बोलना पाप ही होता है. ऐसा करने से बचना चाहिए. उन्होंने आगे बताया कि, ‘सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप, जाके हृदय ताप है. तांके हृदय आप’ यानी जिसके मन में सच्चाई होती है उसके मन में भगवान का वास होता है. आप अपनी कठिनाइयों से लड़ें लेकिन झूठ बोलने से बचना चाहिए.

    प्रेमानंद महाराज को वहां बैठे एक व्यक्ति ने बताया कि, वह आज भी झूठ बोलकर यहां आया है. वरना उसे वृंदावन आने के लिए छुट्टी नहीं मिलती. इसको लेकर महाराज जी ने कहा कि, भजन, धाम और भगवत प्राप्ति के लिए झूठ बोलना झूठ नहीं होता है. आप पूजा-अर्चना और भगवान के दर्शन के छुट्टी लेकर जा सकते हैं. धार्मिक कार्यों के लिए झूठ बोलना उचित हो सकता है लेकिन सांसारिक कार्यों के लिए झूठ नहीं बोलना चाहिए.

  • कारागार में भक्ति की अनोखी गाथा, जानिए तुलसीदास जी ने कैसे की थी हनुमान चालीसा की रचना..?

    कारागार में भक्ति की अनोखी गाथा, जानिए तुलसीदास जी ने कैसे की थी हनुमान चालीसा की रचना..?

    तुलसीदास जी महान संत और भगवान श्रीराम के परम भक्त थे. वह 16वीं शताब्दी के महान संत थे. वह हनुमान जी की भक्ति करते थे. तुलसीदास जी ने रामचरितमानस महाकाव्य, हनुमान चालीसा और कई महाकाव्य की रचना की थी. उन्होंने अकबर की कैद में रहकर हनुमान चालीसा की रचना की थी.

    गोस्वामी तुलसीदास जी ने मुश्किल परिस्थितियों में हनुमान चालीसा की रचना की थी.

    अकबर की कैद में लिखी थी हनुमान चालीसा?

    प्रचलित कहानियों के अनुसार, एक बार मुगल बादशाह अकबर ने गोस्वामी तुलसीदास जी को अपने दरबार में बुलाया था. इसके बाद अकबर ने तुलसीदास जी से चमत्कार दिखाने के लिए कहा. उनके मना करने से अकबर ने तुलसीदास जी को फतेहपुर सीकरी के कारागार में डाल दिया था. तुलसीदास जी ने अकबर की कैद में रहने के दौरान हनुमान चालीसा की रचना की थी.

    तुलसीदास जी ने कारागार में रोजाना हनुमान जी की स्तुति की और रोजानाा एक चौपाई लिखि. इस प्रकार 40 दिनों तक अकबर की कैद में रहने के दौरान तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा की रचना की थी. लोक कथाओं के अनुसार, तुलसीदास जी के कैद में होने के दौरान 40वें दिन बंदरों ने फतेहपुर सीकरी के कारागार में हमला कर दिया. अकबर की सेना भी उन्हें नहीं रोक पाई. इसके बाद एक दरबारी ने सलाह दी कि, तुलसीदास जी को मुक्त कर दें. अकबर ने दरबारी की सलाह मानी और तुलसीदास जी को मुक्त कर दिया गया. इसके बाद सभी बंदर भी वहां से चले गए. इस प्रकार से हनुमान चालीसा की रचना हुई थी.