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  • आंखों के नीचे काले घेरे कैसे कम करें? अपनाएं ये आसान उपाय..​​​​​​

    आंखों के नीचे काले घेरे कैसे कम करें? अपनाएं ये आसान उपाय..​​​​​​

    आंखों के नीचे काले घेरे यानी डार्क सर्कल एक आम समस्या है। इसके पीछे नींद की कमी, आनुवंशिकता, बढ़ती उम्र, एलर्जी, डिहाइड्रेशन, आंखों को बार-बार रगड़ना और धूप में ज्यादा रहना जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए इन्हें कम करने के लिए सबसे पहले संभावित कारण पर ध्यान देना जरूरी है।

    1. रोज पर्याप्त नींद लें

    नींद पूरी न होने पर आंखों के नीचे की त्वचा अधिक थकी हुई और गहरी दिखाई दे सकती है। रोज करीब 7 घंटे या उससे अधिक की अच्छी नींद लेने की कोशिश करें। सोने और जागने का समय भी नियमित रखना फायदेमंद हो सकता है।

    2. आंखों पर ठंडी पट्टी रखें

    ठंडी पट्टी कुछ समय के लिए आंखों के आसपास की सूजन और डार्कनेस की उपस्थिति को कम करने में मदद कर सकती है। इसे बंद आंखों पर कुछ मिनट हल्के तरीके से रखा जा सकता है।

    3. आंखों को बार-बार न रगड़ें

    आंखों को लगातार रगड़ने या खुजाने से आसपास की त्वचा में सूजन और जलन हो सकती है। इससे आंखों के नीचे का हिस्सा और ज्यादा गहरा दिखाई दे सकता है। अगर एलर्जी के कारण आंखों में खुजली रहती है, तो उसके इलाज के लिए डॉक्टर से सलाह लें।

    4. धूप से त्वचा की सुरक्षा करें

    अत्यधिक धूप त्वचा में पिगमेंटेशन बढ़ा सकती है, जिससे आंखों के नीचे का हिस्सा ज्यादा गहरा दिखाई दे सकता है। चेहरे पर सनस्क्रीन लगाने और धूप में सनग्लास पहनने की आदत मददगार हो सकती है।

    5. शरीर को हाइड्रेट रखें

    पर्याप्त पानी न पीने पर त्वचा रूखी और फीकी दिखाई दे सकती है, जिससे डार्क सर्कल अधिक नजर आ सकते हैं। पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में पानी और अन्य स्वस्थ तरल पदार्थ लेते रहें।

    6. कैफीन या अन्य उपयुक्त स्किनकेयर वाले प्रोडक्ट पर विचार करें

    कुछ अंडर-आई उत्पादों में कैफीन या रेटिनॉल जैसे ingredients होते हैं, जो कुछ लोगों में सूजन या डार्क सर्कल की appearance को कम करने में मदद कर सकते हैं। आंखों के आसपास की त्वचा संवेदनशील होती है, इसलिए कोई भी नया प्रोडक्ट इस्तेमाल करने से पहले सावधानी बरतें।

    7. ज्यादा नमक और अस्वस्थ आदतों पर नियंत्रण रखें

    आंखों के आसपास सूजन और पफीनेस में कुछ lifestyle factors भूमिका निभा सकते हैं। संतुलित डाइट लेना, धूम्रपान से बचना और शराब का अधिक सेवन न करना त्वचा और सामान्य स्वास्थ्य के लिए बेहतर है।

    कब डॉक्टर से संपर्क करें?

    अगर काले घेरे अचानक दिखाई देने लगे हों, सिर्फ एक आंख के नीचे हों, या उनके साथ ज्यादा सूजन, दर्द अथवा आंखों से जुड़ी दूसरी समस्या हो, तो डॉक्टर या आई स्पेशलिस्ट से जांच कराना बेहतर है।

    निष्कर्ष: डार्क सर्कल को पूरी तरह हटाना हर व्यक्ति में संभव नहीं होता, क्योंकि आनुवंशिकता और उम्र जैसे कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। लेकिन पर्याप्त नींद, धूप से बचाव, हाइड्रेशन और सही स्किनकेयर से उनकी appearance को कम करने में मदद मिल सकती है।

  • खुदाई में मिली 200 साल पुरानी शराब फैक्ट्री, पहाड़ों की गहराई में होता था धंधा..

    खुदाई में मिली 200 साल पुरानी शराब फैक्ट्री, पहाड़ों की गहराई में होता था धंधा..

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    स्कॉटलैंड की दुर्गम पहाड़ियों और गहरे नालों के बीच पुरातत्वविदों ने एक ऐसा राज खोज निकाला है, जो पिछले 200 सालों से दुनिया की नजरों से ओझल था. पर्थशायर के ‘बेन लॉयर्स नेशनल नेचर रिजर्व’ में खुदाई के दौरान एक अवैध व्हिस्की डिस्टिलरी (शराब बनाने का कारखाना) के अवशेष मिले हैं. यह खोज उस दौर की याद दिलाती है, जब टैक्स से बचने के लिए लोग गुपचुप तरीके से पहाड़ों के बीच व्हिस्की तैयार किया करते थे. इस सीक्रेट जगह से तांबे के स्टिल का एक हिस्सा, पत्थर की संरचनाएं और लकड़ी के खंभे बरामद हुए हैं. जानकारों का मानना है कि यह एक बोथी (Bothy) यानी एक छोटा सा झोंपड़ा था, जिसे विशेष रूप से शराब बनाने के उपकरणों को छिपाने के लिए बनाया गया था.

    बता दें कि 1788 के एक्साइज एक्ट के बाद जब छोटे घरेलू उपकरणों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, तब 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान स्कॉटलैंड में अवैध व्हिस्की का व्यापार चरम पर था. नेशनल ट्रस्ट फॉर स्कॉटलैंड (NTS) के पुरातत्वविदों के अनुसार, इस कारखाने को बहुत ही चालाकी से ‘लॉयर्स बर्न’ नामक झरने के पास एक संकरे नाले में बनाया गया था. जगह का चुनाव इस तरह किया गया था कि झरने का मोड़ इसे ऊपर और नीचे दोनों तरफ से पूरी तरह ढंक लेता था. खुदाई में पत्थर के फर्श के नीचे एक नाली, एक चूल्हा और छत को सहारा देने वाला लकड़ी का खंभा मिला है. सबसे रोमांचक खोज तांबे के मिश्र धातु का वह टुकड़ा है, जो शराब बनाने वाली मशीन के दो हिस्सों को जोड़ने के काम आता था.

    जल्दबाजी में छूटा सबूत: तस्करों और अधिकारियों के बीच चूहे-बिल्ली का खेल
    पुरातत्व प्रमुख डेरेक अलेक्जेंडर का कहना है कि यह खोज शराब तस्करों और आबकारी अधिकारियों के बीच चलने वाले दिमागी युद्ध की गवाह है. अगर अधिकारियों ने इस ठिकाने पर छापा मारा होता, तो वे पूरे उपकरण को नष्ट कर देते. लेकिन वहां तांबे का हिस्सा मिलना यह संकेत देता है कि तस्करों को अधिकारियों के आने की भनक लग गई थी और वे जल्दबाजी में अपना सामान समेटकर भाग निकले. अफरा-तफरी में वे मशीन का यह छोटा सा हिस्सा वहीं भूल गए, जो आज 200 साल बाद इतिहास की गवाही दे रहा है. उस दौर में पहाड़ियों में अवैध व्हिस्की बनाना केवल एक व्यापार नहीं, बल्कि सरकारी कानूनों के खिलाफ ‘सामुदायिक प्रतिरोध’ का एक तरीका माना जाता था. तस्कर बहुत कम सामान के साथ यात्रा करते थे ताकि पकड़े जाने पर कोई सबूत न मिले, इसलिए ऐसे अवशेषों का मिलना बेहद दुर्लभ है.

    स्कॉटलैंड के अन्य हिस्सों में भी दबे मिले हैं ऐसे ही राज
    यह पहली बार नहीं है जब स्कॉटलैंड की धरती ने अपने नशीले इतिहास को उगला हो. इससे पहले 2008 में ग्लेन एफ्रिक में वानिकी कर्मचारियों को एक छोटी इमारत की नींव मिली थी, जिसे बाद में राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया. वहीं 2019 में लोच लोमोंड नेशनल पार्क में भी दो पुराने फार्मस्टेड की पहचान अवैध डिस्टिलरी के रूप में की गई थी. बेन लॉयर्स रिजर्व में अब तक पांच ऐसे ठिकाने मिल चुके हैं, लेकिन यह पहली बार है जब किसी साइट से व्हिस्की स्टिल का कोई वास्तविक हिस्सा बरामद हुआ है. ऐसे में ये खोजें साबित करती हैं कि स्कॉटलैंड की पहाड़ियों में सदियों पहले तस्करी का एक समानांतर साम्राज्य फलता-फूलता था.

  • अजब है ये पक्षी! सांपों का शौकीन और किसानों का रखवाला, नाम सुन यकीन नहीं होगा​..

    अजब है ये पक्षी! सांपों का शौकीन और किसानों का रखवाला, नाम सुन यकीन नहीं होगा​..

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    Neelkanth Bird: भारत में कई ऐसे पक्षी हैं, जिनका संबंध सिर्फ प्रकृति से नहीं बल्कि धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा हुआ है। नीलकंठ पक्षी भी इनमें से एक है। अपनी खूबसूरत उड़ान और नीले रंग वाले पंखों के कारण यह लोगों का ध्यान खींचता है। खास बात यह है कि नीलकंठ को किसानों के लिए भी काफी उपयोगी माना जाता है, क्योंकि यह खेतों में मौजूद कई तरह के कीड़े-मकोड़ों को खाता है।

    नीलकंठ को लेकर बुंदेलखंड में खास मान्यता

    बुंदेलखंड में नीलकंठ को लेकर एक पुरानी मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि अगर किसी व्यक्ति को नीलकंठ दिखाई दे जाए और वह मन से कोई प्रार्थना करे, तो उसकी मनोकामना पूरी हो सकती है।

    इसी वजह से नीलकंठ को शुभ संकेत और सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। दशहरे के दिन इसके दर्शन को तो विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

    महादेव से जुड़ा है नीलकंठ का नाम

    नीलकंठ का नाम भगवान शिव से भी जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान निकले विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया था, जिसके कारण उनका कंठ नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ कहा गया।

    इसी धार्मिक जुड़ाव की वजह से इस पक्षी को भी शुभ और पवित्र माना जाने लगा। हालांकि पक्षी का पूरा कंठ नीला नहीं होता। उड़ान के दौरान जब यह अपने पंख फैलाता है, तो उनमें मौजूद नीला रंग बेहद खूबसूरत दिखाई देता है।

    किसानों के लिए भी काफी मददगार

    नीलकंठ को किसानों का दोस्त भी कहा जाता है। यह खेतों के आसपास पाए जाने वाले कई तरह के कीड़े-मकोड़े और झींगुर खाता है। इससे फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों की संख्या कम करने में मदद मिल सकती है।

    इसके भोजन में छोटे जीव और कुछ छोटे सांप भी शामिल हो सकते हैं। यही वजह है कि खेतों के आसपास नीलकंठ की मौजूदगी किसानों के लिए फायदेमंद मानी जाती है।

    भारत समेत कई इलाकों में पाया जाता है

    नीलकंठ को इंडियन रोलर के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत के अलावा एशिया के कई हिस्सों में पाया जाता है। इसकी खूबसूरत बनावट और उड़ते समय नजर आने वाले नीले पंख इसे दूसरे पक्षियों से अलग बनाते हैं।

    बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में भी यह पक्षी दिखाई देता है, हालांकि इसकी आबादी कम होने की वजह से पहले की तुलना में इसके दर्शन आसान नहीं रहे हैं।

    दशहरे पर नीलकंठ दिखना क्यों माना जाता है शुभ?

    नीलकंठ को दशहरे से जोड़ने वाली धार्मिक मान्यता भगवान राम से संबंधित है। कहा जाता है कि भगवान राम ने रावण के वध से पहले नीलकंठ पक्षी के दर्शन किए थे। इसके बाद उन्होंने रावण का वध किया।

    इसी मान्यता के चलते दशहरे के दिन नीलकंठ का दिखाई देना शुभ माना जाता है। लोकविश्वास है कि इस दिन इसके दर्शन होने से व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि आती है, धन लाभ के अवसर बनते हैं और भाग्य का साथ मिलता है।

    हालांकि, नीलकंठ के दर्शन से धन लाभ या किस्मत बदलने की बातें धार्मिक और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाता।

  • हजारों साल पुरानी ममी के पेट से मिला रहस्यमयी कागज, खुलासे से वैज्ञानिक भी दंग..

    हजारों साल पुरानी ममी के पेट से मिला रहस्यमयी कागज, खुलासे से वैज्ञानिक भी दंग..

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    इतिहास की परतों में न जाने कितने ऐसे रहस्य दबे हैं, जो आज भी इंसानी दिमाग को चकरा देते हैं. हाल ही में मिस्र के अल-बहासा में पुरातत्वविदों को एक ऐसी ममी मिली है, जिसने अब तक की सभी मान्यताओं को हिलाकर रख दिया है. आमतौर पर जब भी कोई प्राचीन ममी मिलती है, तो उसके साथ जादुई मंत्र या धार्मिक ग्रंथ पाए जाते हैं, ताकि परलोक में उसकी आत्मा को शांति मिले. इसके अलावा सोने-चांदी के गहने-जेवरात भी होते हैं. लेकिन इस बार वैज्ञानिकों के हाथ कुछ ऐसा लगा, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. इस ममी के पेट के अंदर से एक प्राचीन कागज (पपायरस) निकला, जिस पर दुनिया की सबसे मशहूर युद्ध कथाओं में से एक का हिस्सा लिखा हुआ था. जांच के दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि ममी के पेट में दबा यह कागज असल में महान कवि होमर की सुप्रसिद्ध रचना ‘इलियड’ का एक अंश है.

    इसमें प्राचीन यूनानी सेनाओं और उनके जहाजों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो पौराणिक ट्रोजन युद्ध की ओर बढ़ रहे थे. पुरातत्वविदों के लिए यह खोज किसी चमत्कार से कम नहीं है, क्योंकि पूरी दुनिया में यह अपनी तरह का पहला मामला है, जहां किसी ममी के शरीर के भीतर से कोई साहित्यिक कृति बरामद हुई हो. इस खोज ने प्राचीन काल में शवों को दफनाने की परंपराओं पर एक नई बहस छेड़ दी है. इस रहस्यमयी पपायरस को हाल ही में की गई खुदाई के दौरान निकाला गया था. वैज्ञानिकों की टीम ने जब ग्रीक भाषा में लिखे इस पाठ का अध्ययन किया, तो वे दंग रह गए कि हजारों साल बाद भी यह सुरक्षित कैसे रहा. आमतौर पर ममी बनाने की प्रक्रिया के दौरान शरीर को रसायनों से भरा जाता है, लेकिन इस ममी को अनोखे तरीके से दफनाया गया.

    ममी के अंदर किसी साहित्यिक कविता का होना यह संकेत देता है कि उस समय के लोगों के लिए साहित्य का महत्व सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उसे परलोक की यात्रा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता था. इस खुदाई के दौरान सिर्फ यह अनोखी ममी ही नहीं मिली, बल्कि कई और चौंकाने वाले राज भी सामने आए हैं. पुरातत्वविदों को ऐसी ममी भी मिली हैं, जिनकी जीभ सोने की बनी हुई थी. प्राचीन मिस्र के लोगों का मानना था कि सोने की जीभ लगाने से मृत व्यक्ति मरने के बाद देवताओं से बात कर पाएगा. इसके अलावा वहां से सजे हुए ताबूत और कई प्राचीन कलाकृतियां भी बरामद की गई हैं, जो उस दौर की आलीशान जीवनशैली और उनकी अजीबोगरीब धार्मिक मान्यताओं को उजागर करती हैं. यह ऐतिहासिक मिशन बार्सिलोना विश्वविद्यालय के नेतृत्व में चलाया गया था, जो काहिरा से करीब 190 किलोमीटर दूर ऑक्सीरहिन्चस नामक प्राचीन शहर में स्थित है.

  • एक सेल्फी से खाली हो सकता है बैंक खाता, भूलकर भी न खिंचवाएं ऐसे फोटोज!..

    एक सेल्फी से खाली हो सकता है बैंक खाता, भूलकर भी न खिंचवाएं ऐसे फोटोज!..

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    आज के डिजिटल युग में जहां हम अपनी सुरक्षा के लिए बायोमेट्रिक्स और फिंगरप्रिंट लॉक पर सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं, वहीं एक ताजा चेतावनी ने स्मार्टफोन यूजर्स की नींद उड़ा दी है. साइबर सिक्युरिटी एक्सपर्ट्स ने आगाह किया है कि सोशल मीडिया पर ‘V’ साइन (तर्जनी और मध्यमा उंगली को बाहर की ओर फैलाकर) दिखाते हुए सेल्फी पोस्ट करना आपके लिए भारी मुसीबत बन सकता है. आधुनिक हाई-डेफिनिशन कैमरों और उन्नत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सॉफ्टवेयर के आने से अब यह तकनीकी रूप से संभव हो गया है कि आपकी तस्वीरों से आपके फिंगरप्रिंट की विस्तृत जानकारी चुराई जा सके और इसका उपयोग आपके बायोमेट्रिक सुरक्षा सिस्टम को भेदने के लिए किया जा सके. साथ ही उंगलियों के निशान से साइबर अपराधी बैंक खाता भी खाली कर सकते हैं.

    चीनी सिक्युरिटी एक्सपर्ट ली चांग ने हाल ही में एक रियलिटी शो के दौरान एक मशहूर हस्ती की सेल्फी का उदाहरण देते हुए यह दिखाया कि ‘V’ पोज वाली फोटो में उंगलियां कितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं. चांग के विश्लेषण के अनुसार, यदि तस्वीर 1.5 मीटर से कम की दूरी से ली गई है और उंगलियां सीधे कैमरे के सामने हैं, तो फिंगरप्रिंट की जानकारी पूरी तरह से निकाली जा सकती है. सेल्फी के मामले में यह दूरी और भी कम होती है, जो इसे विशेष रूप से खतरनाक बनाती है. हैरान करने वाली बात यह है कि 3 मीटर तक की दूरी से ली गई तस्वीरों से भी लगभग आधे फिंगरप्रिंट डेटा को आसानी से निकाला जा सकता है. इस खतरे को और भी अधिक वास्तविक बनाता है आधुनिक AI तकनीक का विकास.

    एक टीवी शो में ली चांग ने दर्शकों को तब चौंका दिया, जब उन्होंने फोटो एडिटिंग सॉफ्टवेयर और AI की मदद से उन फिंगरप्रिंट्स को बहुत करीब से साफ-साफ दिखाया, जो खुली आंखों से देखने पर धुंधले नजर आ रहे थे. ‘चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज’ के क्रिप्टोग्राफी प्रोफेसर जिंग जिउ ने भी इस बात की पुष्टि की है कि हाई-डेफिनिशन कैमरों की मदद से केवल ‘V’ पोज का उपयोग करके हाथ की जानकारी निकाली जा सकती है और उसके फिंगरप्रिंट्स भी बनाए जा सकते हैं. हालांकि, इस खबर के वायरल होने के बाद कुछ एक्सपर्ट्स ने स्पष्ट किया है कि फिंगरप्रिंट चोरी करना और उसका गलत इस्तेमाल करना इतना आसान भी नहीं है.

    आसान नहीं है फिंगरप्रिंट्स कॉपी करना
    उन्होंने कहा कि किसी के बायोमेट्रिक्स को सफलतापूर्वक कॉपी करने के लिए रोशनी की स्थिति, कैमरे का फोकस और इमेज की स्पष्टता जैसे कई कारक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. साथ ही, पहचान चुराने वालों को सटीक मिलान के लिए एक ही व्यक्ति की कई अलग-अलग तस्वीरों की जरूरत पड़ सकती है. फिर भी, तकनीक जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसे देखते हुए सुरक्षा विशेषज्ञ इसे एक उभरते हुए और गंभीर खतरे के रूप में देख रहे हैं. ऐसे में यदि आप अपनी बायोमेट्रिक सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं, लेकिन सेल्फी में ‘V’ साइन बनाने की अपनी आदत को भी नहीं छोड़ पा रहे हैं, तो विशेषज्ञ ली चांग ने इसके लिए कुछ आसान उपाय सुझाए हैं.

    कैसे बचें ठगी से?
    उनका सुझाव है कि सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें पोस्ट करने से पहले डिजिटल एडिटिंग टूल्स का उपयोग करके अपनी उंगलियों के पोरों को ‘ब्लर’ (धुंधला) कर दें या अपने फिंगरप्रिंट के निशानों को स्मूथ (सपाट) कर दें. सुरक्षा के लिहाज से यह एक छोटी सी सावधानी आपके डिजिटल डेटा और वित्तीय खातों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभा सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे कैमरे और अधिक शक्तिशाली होंगे, हमें अपनी ऑनलाइन प्राइवेसी को लेकर और भी अधिक जागरूक होना होगा. हालांकि, इस तरह की ठगी से बचने का सबसे बेहतर उपाय है कि वी सेप में उंगलियों के साथ फोटो ही न शेयर करें.

  • इस भारतीय को भगवान मानता है पूरा चीन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी झुकाते हैं सिर, फैमिली से बिना मिले नहीं लौटते देश..?

    इस भारतीय को भगवान मानता है पूरा चीन, राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी झुकाते हैं सिर, फैमिली से बिना मिले नहीं लौटते देश..?

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    एक ऐसा हिंदुस्तानी, जिसे खुद उसका अपना देश लगभग भूल चुका है. लेकिन सरहद पार हमारा पड़ोसी मुल्क चीन, आज भी उसे किसी मसीहा की तरह पूजता है. वहां के बच्चों को स्कूलों में उनकी कहानी पढ़ाई जाती है. उनके चेहरे वाले डाक टिकट जारी होते हैं. उनके नाम पर मेडिकल कॉलेज चलते हैं. यकीन मानिए, अगर इस जाबांज डॉक्टर की जिंदगी को आज के सिनेमाई परदे पर उतारा जाए, तो पूरी दुनिया दांतों तले उंगली दबा लेगी.

    बात शुरू होती है साल 1938 की. उस वक्त जापान ने चीन पर धावा बोल दिया था. चारों तरफ तबाही थी, चीख-पुकार थी और लाखों चीनी नागरिक और सैनिक लहूलुहान पड़े थे. मगर इलाज करने वाले डॉक्टर उंगलियों पर गिनने लायक भी नहीं थे. ऐसे में चीन के सेनापति जनरल झू दे ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक ख़त लिखा- ‘दोस्त, हमारी मदद करो, कुछ डॉक्टर भेजो’. तब का चीन आज जैसा ताकतवर और अमीर मुल्क नहीं था. नेहरू ने इस पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मशविरा किया, जो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष हुआ करते थे.

    नेताजी ने तुरंत पहल की और भारत के लोगों से पाई-पाई जोड़कर 22,000 रुपये का फंड इकट्ठा किया. फिर क्या था, पांच जाबांज हिंदुस्तानी डॉक्टरों की एक टीम समंदर के रास्ते चीन के लिए रवाना हो गई.

    Dr Dwarkanath Kotnis indian Doctor Hero in China Story

    पिता की मौत, लेकिन डॉक्टर का ईमान

    चीन गए तो पांच डॉक्टर थे, लेकिन जब जंग खत्म हुई तो लौटे सिर्फ चार. डॉक्टर कोटनीस वहीं रुक गए. उन्होंने वहां हजारों दम तोड़ते चीनी लोगों को मौत के मुंह से बाहर निकाला. इसी बीच भारत से खबर आई कि उनके पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया है. कोई और होता तो घर भाग आता, लेकिन कोटनीस नहीं लौटे. उन्होंने रोते हुए भी यही कहा कि इस वक्त चीन के इन बेबस मरीजों को मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है और मरीजों को बीच में छोड़ना एक डॉक्टर के ईमान के खिलाफ है.

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    72-72 घंटे लगातार ड्यूटी

    कोटनीस सीधे जंग के मैदान में कूद पड़े. पहाड़ों की कड़कड़ाती ठंड और पत्थरों की गुफाओं में, जहां बुनियादी दवाइयां तक नसीब नहीं थीं, उन्होंने एक के बाद एक कई ऑपरेशन किए. कई-कई बार तो वो लगातार 72-72 घंटे बिना पलक झपकाए मरीजों की जान बचाते रहे. इस अकेले मोर्चे पर उन्होंने करीब 800 चीनी सैनिकों की जान बचाई. चीनी लोग उन्हें आदर से ‘के दिहुआ’ (Ke Dihua) पुकारने लगे, इसके मतलब था भारत की भूमि से आया हुआ उपकारी.

    लगातार बिना सोए काम करना, खराब मौसम और कम साधनों के बीच दिन-रात मरीजों की सेवा करने का असर डॉक्टर कोटनीस की सेहत पर पड़ने लगा. उनका शरीर थक चुका था. दिसंबर 1942 में, अपने बेटे के जन्म के महज तीन महीने बाद, सिर्फ 32 साल की उम्र में इस मसीहा ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं. उनकी मौत की खबर से पूरा चीन सदमे में डूब गया. खुद माओ त्से तुंग ने बेहद भावुक होकर लिखा- “आज चीन ने अपना एक अनमोल दोस्त खो दिया है. हम उनके इस बलिदान को कभी नहीं भूलेंगे. उनका नाम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा.”

    Dr Dwarkanath Kotnis indian Doctor Hero in China Story

    मगर यह कहानी यहां खत्म नहीं होती. चीन के सबसे बड़े नेता माओ त्से तुंग ने खुद अपने हाथों से उनके सम्मान में शोक संदेश लिखा था. उन्होंने कहा था- ‘हमारी सेना ने अपना एक मजबूत हाथ खो दिया है और हमारे देश ने अपना सबसे सच्चा दोस्त गंवा दिया है’.

    आज भी चीन के शीजियाझुआंग (Shijiazhuang) शहर में उनकी एक भव्य समाधि और स्मारक है. उनके नाम पर वहां एक मेडिकल स्कूल चलाया जाता है. आज भी जब उस मेडिकल स्कूल के छात्र डॉक्टर बनकर निकलते हैं, तो वे डॉक्टर कोटनीस के नाम की शपथ लेते हैं.

    साल 2009 में जब चीन में वोटिंग हुई, तो वहां की जनता ने डॉक्टर कोटनीस को सदी के ‘टॉप 10 विदेशी नायकों’ में चुना. दशकों तक तो यह परंपरा ही बन गई थी कि चीन का कोई भी बड़ा नेता जब भी भारत के दौरे पर आता, तो डॉक्टर कोटनीस के परिवार से मिलने उनके घर जरूर जाता था. डॉक्टर कोटनीस को किसी सरहद या नक्शे से प्यार नहीं था, उन्हें तो बस इंसानों की जान बचाने से सरोकार था. सचमुच, इंसानी जज्बे की ऐसी मिसालें हर सदी में पैदा होनी चाहिए.

  • इलाज के पैसे खत्म हुए तो पिता ने खोदी 2 साल की बेटी की कब्र, सालों बाद उसी जगह खिले सूरजमुखी के फूल..?

    इलाज के पैसे खत्म हुए तो पिता ने खोदी 2 साल की बेटी की कब्र, सालों बाद उसी जगह खिले सूरजमुखी के फूल..?

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    जिंदगी और मौत की जंग से जुड़ी कभी-कभी ऐसी कहानियां सामने आ जाती हैं, जो इंसान की हिम्मत और उम्मीद पर भरोसा पक्का कर देती हैं. एक ऐसा ही मामला इन दिनों लोगों की आंखों से आंसू छलका रहा है. दरअसल, चीन (China) के सिचुआन प्रांत के नीजियांग में रहने वाले झांग लियॉन्ग की 2 साल की बेटी झांग शिनलेई (Zhang Xinlei) गंभीर थैलेसीमिया (thalassaemia) बीमारी से जूझ रही थी. इलाज के लिए हर महीने खून (blood) चढ़ाना पड़ता था, लेकिन फैक्ट्री में मामूली मजदूरी करने वाले पिता के पास जब सारे पैसे खत्म हो गए, तो उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया. पढ़ें पूरी खबर.

    साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट (SCMP) के मुताबिक, जून 2017 में जब मेडिकल बिल 1,40,000 युआन से ऊपर चले गए, तो मजबूर पिता ने अपनी जमीन पर एक कब्र खोदी. वो रोजाना अपनी बेटी को वहां ले जाते और उसके साथ लेटकर खेलते थे, ताकि अगर कल को मौत आ भी जाए, तो मासूम डर न महसूस करे. इस दर्दनाक तस्वीर के सामने आते ही कुछ लोगों ने पिता के दर्द को समझा, तो कई लोगों ने इसे गलत भी बताया, लेकिन इंटरनेट पर वायरल हुई इस लाचारी ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया.

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    सोशल मीडिया पर खबर फैलते ही क्राउडफंडिंग के जरिए मदद का सैलाब आ गया. इसके साथ ही स्थानीय सरकार ने भी मेडिकल खर्च उठाया. इसी बीच अगस्त 2017 में शिनलेई की छोटी बहन का जन्म हुआ. वैज्ञानिकों ने छोटी बहन के कॉर्ड ब्लड से स्टेम सेल का ट्रांसप्लांट किया. 8 घंटे तक चले इस मुश्किल ऑपरेशन के बाद शिनलेई की सेहत में ऐसा सुधार हुआ कि, उसे अब बार-बार खून चढ़ाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. आज शिनलेई प्राइमरी स्कूल में पढ़ती है, पेंटिंग करती है और डांस भी सीखती है. जिस जगह कभी पिता ने बेबसी में उसकी कब्र खोदी थी, आज वहां उसके माता-पिता ने सूरजमुखी का एक खूबसूरत बगीचा बना दिया है, जिसे वो मैजिक गार्डेन कहते हैं.

  • 10 मिनट के लिए मरकर दोबारा जिंदा हुआ शख्स, अब मौत को लेकर किया ऐसा खुलासा..

    10 मिनट के लिए मरकर दोबारा जिंदा हुआ शख्स, अब मौत को लेकर किया ऐसा खुलासा..

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    क्या आप जानते हैं कि मौत के बाद की दुनिया कैसी दिखती है? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए लोग सदियों से रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन रोमफोर्ड, ईस्ट लंदन के रहने वाले मैथ्यू एलिक के पास इस बारे में एक ऐसा जवाब है, जो आपको निराश कर सकता है. यकीनन, बहुत कम लोगों को पता होगा कि 43 साल के मैथ्यू, जो एक पिता, एक्टर और मॉडल हैं, अगस्त 2023 में करीब 10 मिनट के लिए क्लीनिकली डेड घोषित कर दिए गए थे. उस वक्त उन्हें एक बहुत बड़ा हार्ट अटैक आया था, जिसके बाद उनकी सांसें थम गईं और दिल ने धड़कना बंद कर दिया था.

    मैथ्यू को सांस लेने में दिक्कत और पैरों में सूजन की वजह से अस्पताल ले जाया गया था. डॉक्टरों ने पाया कि उनके दिल और फेफड़ों में क्रिकेट की गेंद के आकार के खून के थक्के जम गए थे. पल्मोनरी एम्बोलिज्म की वजह से उन्हें कार्डियक अरेस्ट हुआ और वे वहीं गिर पड़े. डॉक्टरों ने उन्हें वापस लाने के लिए डिफिब्रिलेटर का इस्तेमाल किया और इतनी ताकत से सीपीआर दिया कि उनके शरीर के अंदर ब्लीडिंग होने लगी. लगभग 10 मिनट तक क्लीनिकली डेड रहने के बाद आखिरकार डॉक्टरों ने उन्हें होश में ला दिया और फिर वे तीन दिनों तक कोमा में रहे.

    मौत का वो ‘निराश’ करने वाला अनुभव
    मैथ्यू जब कोमा से बाहर आए, तो उनसे सबसे पहला सवाल यही पूछा गया कि उन्होंने ‘दूसरी दुनिया’ में क्या देखा? मैथ्यू का जवाब सुनकर सब हैरान रह गए. उन्होंने कहा कि उन्हें कुछ भी याद नहीं है. उनके मुताबिक, मौत का अनुभव किसी दिव्य रोशनी या स्वर्ग जैसा नहीं था, बल्कि यह एक बेहद शांतिपूर्ण नींद से जागने जैसा महसूस हुआ. मैथ्यू का यह खुलासा उन लोगों के लिए निराशाजनक हो सकता है, जो मौत के बाद किसी जादुई दुनिया की उम्मीद करते हैं.

    जिंदगी की चुनौतियों से मुकाबला
    मौत के मुंह से वापस आने के बाद मैथ्यू की जिंदगी आसान नहीं थी. पिछले दो सालों में उन्होंने एक रिश्ता टूटने, नौकरी जाने, आर्थिक तंगी और अपने बेटे की खराब सेहत जैसी कई बड़ी चुनौतियों का सामना किया. लेकिन मैथ्यू का कहना है कि जब आप मौत को हरा देते हैं, तो कोई भी चुनौती आपको डरा नहीं सकती. उन्होंने रोने और हार मानने के बजाय खुद को दोबारा खड़ा करने का फैसला किया. आज वे अपनी बेस्ट फ्रेंड से सगाई कर चुके हैं, दोनों ने अपना घर खरीद लिया है और उनके बच्चे भी लाइफ में अच्छा कर रहे हैं.

    किताब के जरिए दी नई प्रेरणा
    मैथ्यू ने अपनी मौत और उसके बाद के 18 महीनों के संघर्ष को एक किताब ‘लाइफ आफ्टर बीइंग क्लीनिकली डेड’ बताया है. डिस्लेक्सिया (पढ़ने-लिखने की बीमारी) होने के बावजूद उन्होंने डिक्टाफोन में बोलकर अपनी कहानी लिखी और आज उनकी किताब की 1,000 से ज्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं. मैथ्यू अब मोटिवेशनल स्पीच देते हैं और ब्लड फाउंडेशन के साथ काम करते हैं, क्योंकि 7 बार खून चढ़ने की वजह से ही उनकी जान बच पाई थी. मैथ्यू की सेहत अब पहले जैसी नहीं रही और उन्हें पूरी उम्र खून पतला करने वाली दवा लेनी होगी, लेकिन वे अपनी कमियों पर नहीं बल्कि अपनी काबिलियत पर ध्यान दे रहे हैं. उनका मानना है कि जिंदगी बहुत छोटी है और हमें हर पल का लुत्फ उठाना चाहिए.

  • हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना..

    हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना..

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    हजारों साल पुराना लकड़ी का ये बाजार देख हक्के-बक्के रह गए लोग, खूबसूरती बना देगी दीवाना 

    मिस्र यानी इजिप्ट की राजधानी काहिरा अपनी हिस्ट्री और आर्किटेक्चर के लिए दुनियाभर में जानी जाती है. इन दिनों इंटरनेट पर काहिरा के एक बिजी मार्केट में हजारों साल पुराना एक ऐसा ऐतिहासिक ढांचा मौजूद है, जिसकी छत पूरी तरह से लकड़ी की बनी हुई है. इस लकड़ी की छत की ऊंचाई जमीन से लगभग 25 से 30 फीट है. इतने सालों बाद भी लकड़ी का ये काम बिना किसी नुकसान और बिना किसी मरम्मत के वैसे ही बेहद खूबसूरती से नजर आ रहा है. शायद यही वजह है कि, ये वीडियो लोगों का ध्यान खींच रहा है.

    वायरल हो रहे इस वीडियो में देखा जा सकता है कि, इस पुरानी इमारत की दीवारों पर पत्थरों की बहुत बारीक और सुंदर नक्काशी की गई है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, ये पुराना ढांचा और उसकी लकड़ी की छत लगभग हजारों साल पुरानी है. खास बात ये है कि इस पुरानी इमारत में अब तक कोई बड़ा मरम्मत का काम नहीं हुआ है. बावजूद इसके ये आज भी अपनी पुरानी चमक और मजबूती बनाए हुए है.

     

     
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    वीडियो में देखा जा सकता है कि, इमारत के नीचे के एरिया में आज दुकानें और मार्केट सज रहे हैं, जबकि इसके अंदर मदरसा भी मौजूद है. पत्थरों का महीन काम और ऊपर से लकड़ी की बड़ी सी छत इसे देखने आने वाले हर शख्स को हैरान कर देती है.

  • बेजुबान के लिए बुजुर्ग का ऐसा प्यार देख नम हो गईं आंखें, घायल डॉगी को अस्पताल ले जाकर बने सहारा

    बेजुबान के लिए बुजुर्ग का ऐसा प्यार देख नम हो गईं आंखें, घायल डॉगी को अस्पताल ले जाकर बने सहारा

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    कहते हैं कि इंसानियत के लिए न तो दौलत जरूरी है और न ही कोई बड़ा पद। सच्ची संवेदना हो तो इंसान किसी भी जीव के दर्द को अपना समझ सकता है। ऐसा ही एक भावुक कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक बुजुर्ग ने घायल आवारा कुत्ते के लिए जो किया, उसने लोगों का दिल जीत लिया।

    दरअसल, बुजुर्ग को सड़क पर एक घायल आवारा डॉगी मिला। उसकी हालत देखकर उन्होंने उसे अकेला छोड़ने के बजाय इलाज कराने का फैसला किया। वह डॉगी को लेकर पशु अस्पताल पहुंचे और उसके इलाज के दौरान लगातार उसके पास खड़े रहे।

    इलाज के दौरान डॉगी के पास खड़े रहे बुजुर्ग

    अस्पताल में डॉक्टर जब घायल डॉगी की जांच और इलाज कर रहे थे, उस दौरान बुजुर्ग उसके बिल्कुल पास खड़े रहे। वह लगातार इस बात का ख्याल रखते नजर आए कि घायल जानवर इलाज के दौरान खुद को अकेला या असहाय महसूस न करे।

    बुजुर्ग का यह व्यवहार बताता है कि इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है। किसी बेजुबान के दर्द को समझना और मुश्किल वक्त में उसका साथ देना भी सच्ची संवेदनशीलता की निशानी है।

    लोगों ने जमकर की बुजुर्ग की तारीफ

    घटना की तस्वीरें और वीडियो सामने आने के बाद लोगों ने बुजुर्ग की जमकर तारीफ की। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा कि असली अमीरी इंसान के बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि उसके दिल में मौजूद दया और करुणा में होती है।

    कुछ लोगों ने घायल डॉगी के इलाज में आर्थिक मदद करने की इच्छा भी जताई। इस घटना ने एक बार फिर दिखा दिया कि किसी बेजुबान के लिए किया गया छोटा सा प्रयास भी लोगों के दिल को छू सकता है।

    यह घटना हमें यही संदेश देती है कि किसी जरूरतमंद जीव की मदद करने के लिए बड़े साधनों की नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दिल की जरूरत होती है।