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  • न बिजली, न कार और न आधुनिक गैजेट्स… फिर भी डेटिंग स्टाइल देखकर रह जाएंगे हैरान!

    न बिजली, न कार और न आधुनिक गैजेट्स… फिर भी डेटिंग स्टाइल देखकर रह जाएंगे हैरान!

    न बिजली, न कार और न आधुनिक गैजेट्स… फिर भी डेटिंग स्टाइल देखकर रह जाएंगे हैरान!

    सिर्फ अंधेरे में हो होता है दो लोगों का मिलन (इमेज- सोशल मीडिया)

    दुनिया में कई समुदाय ऐसे हैं जो आधुनिक सुविधाओं से दूर रहना पसंद करते हैं. इनमें से एक सबसे चर्चित समुदाय है एमिश. अमेरिका और कनाडा के कुछ हिस्सों में बसे ये लोग बिजली, कार, टेलीविजन और अन्य आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल नहीं करते. उनके अनुसार इन चीजों का इस्तेमाल ईश्वर को नाराज कर सकता है. वे साधारण जीवन जीते हैं, घोड़ा-गाड़ी से चलते हैं, हाथ से खेती करते हैं और पारंपरिक कपड़े पहनते हैं.

    लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर एक एक्स-एमिश क्रिएटर ने उनके डेटिंग स्टाइल के बारे में ऐसे खुलासे किए हैं कि लोग हैरान रह गए हैं. लोविना हर्शबर्गर जूक नाम की यह युवती खुद एमिश समुदाय में पली-बढ़ी हैं. उन्होंने समुदाय छोड़ दिया है और अब सोशल मीडिया पर एमिश रेसिपीज, कहानियां और परंपराओं को शेयर करती हैं. उनके लाखों फॉलोअर्स हैं. हाल ही में उन्होंने एक पॉडकास्ट या इंटरव्यू में एमिश डेटिंग की परंपराओं के बारे में बताया.

    बेहद आधुनिक है डेटिंग रूल


    उनके मुताबिक, एमिश समुदाय में डेटिंग का तरीका काफी अलग और कुछ मायनों में आधुनिक भी है. एमिश लोग आधुनिक तकनीक से दूर रहते हैं. घरों में बिजली नहीं होती. रात में लालटेन या मोमबत्ती की रोशनी में काम चलता है. कार की जगह घोड़ा-गाड़ी का इस्तेमाल होता है. मोबाइल फोन, इंटरनेट, सोशल मीडिया जैसी चीजें आमतौर पर वर्जित होती है. समुदाय के सख्त नियम होते हैं जिन्हें तोड़ने पर बहिष्कार तक हो सकता है. फिर भी डेटिंग के मामले में उनका तरीका अनोखा है. लोविना के अनुसार, एमिश युवक-युवतियां रात के अंधेरे में मिलते हैं. दिन में खुलेआम घूमना या डेट पर जाना आम नहीं है. रात को जब परिवार सो जाता है या काम खत्म हो जाता है तब दो लोग एकांत में बैठकर घंटों बातें करते हैं. यह बातचीत काफी लंबी होती है. वे एक-दूसरे को जानने की कोशिश करते हैं, भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हैं और रिश्ते को आगे बढ़ाने का फैसला करते हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शादी से पहले शारीरिक संबंधों से पूरा परहेज रखा जाता है. समुदाय में शुद्धता और नैतिकता को बहुत महत्व दिया जाता है. सेक्स सिर्फ विवाह के बाद ही मान्य है.

     

     

    सख्ती से मनवाए जाते हैं नियम
    अगर कोई इस नियम को तोड़ता है तो सख्त सजा या सामाजिक बहिष्कार हो सकता है. इस लिहाज से उनकी डेटिंग स्टाइल पारंपरिक भी है और कुछ मायनों में आज के समय की “नो सेक्स बिफोर मैरिज” वाली सोच से मिलती-जुलती है. सोशल मीडिया पर लोविना के खुलासों ने काफी चर्चा पैदा कर दी है. लोग कमेंट कर रहे हैं कि तकनीक से इतने दूर रहने वाले लोगों की डेटिंग इतनी व्यवस्थित और सख्त कैसे हो सकती है. कुछ यूजर्स ने लिखा कि “अंधेरे में मिलना रोमांटिक लगता है” तो कुछ ने कहा कि “बिजली-कार नहीं चलानी लेकिन डेटिंग मॉडर्न है, अजीब विरोधाभास है.” कई लोगों ने एमिश जीवनशैली के बारे में और जानने की इच्छा जताई. एमिश समुदाय की जड़ें 17वीं-18वीं शताब्दी के यूरोपीय एनाबैप्टिस्ट आंदोलन में हैं. वे सादगी, समुदाय और धार्मिक नियमों को प्राथमिकता देते हैं. आधुनिक दुनिया की भागदौड़ और तकनीक को वे आत्मा के लिए हानिकारक मानते हैं. इसलिए बिजली के तार, कार के इंजन और स्क्रीन वाली चीजों से दूर रहते हैं. फिर भी मानव स्वभाव के अनुसार युवाओं में प्रेम और साथी चुनने की इच्छा स्वाभाविक है. समुदाय ने इसके लिए अपनी व्यवस्था बना रखी है.

  • कपड़े धोएं और पाएं 90 लाख रुपये! साथ में विदेश घूमने का मौका, लेकिन नौकरी में हैं ये शर्तें..

    कपड़े धोएं और पाएं 90 लाख रुपये! साथ में विदेश घूमने का मौका, लेकिन नौकरी में हैं ये शर्तें..

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    कपड़े धोओ, विदेश घूमो और पाओ ₹90 लाख! लेकिन ये हैं शर्तें; इस वायरल 'ड्रीम जॉब' ने मचाया तहलका

    सोशल मीडिया पर आजकल लंदन की एक जॉब वैकेंसी को लेकर बड़ी चर्चा है. पहली नजर में सुनने में आता है कि कपड़े धोने की नौकरी के लिए सालाना 90 लाख रुपए मिल रहे हैं, तो हर कोई हैरान रह जाता है. ब्रिटेन की ‘द लेडी’ मैगजीन और ‘ब्यूचैम्प पार्टनर्स’ एजेंसी के जरिए आई यह वैकेंसी सुनने में जितनी आसान लगती है, असलियत में उतनी ही कड़ी है. आइए जानते हैं कि इस 90 लाख के पैकेज के पीछे आखिर माजरा क्या है.

    सिर्फ कपड़े धोना नहीं, फैब्रिक का रखना होगा हिसाब

    यह कोई आम नौकरी नहीं है. इसमें आपको दुनिया के सबसे महंगे और नाजुक डिजाइनर कपड़ों की देखभाल करनी होगी. कौन सा कपड़ा किस तरह धोना है, कैसे सुखाना है और उसे कैसे संभालकर रखना है, इसकी पूरी समझ होनी चाहिए. जरा सी गलती से लाखों रुपए के कपड़े खराब हो सकते हैं.

    लग्जरी गाड़ियों की ड्राइविंग और देखभाल

    इस जॉब में सिर्फ कपड़े धोने तक सीमित नहीं रहना है. आपको मालिक की लग्जरी कारों को भी चलाना होगा. उन्हें सही सलामत मीटिंग्स या इवेंट्स तक पहुंचाना और गाड़ियों की देखरेख करना भी इसी काम का हिस्सा है.

    पार्टियों और इवेंट्स का मैनेजमेंट

    मालिक के घर होने वाली बड़ी और हाई-प्रोफाइल पार्टियों की जिम्मेदारी भी आपको ही संभालनी होगी. मेहमानों का ध्यान रखना और घर की व्यवस्था को अच्छे से चलाना इसी रोल का हिस्सा है.

    लगातार विदेश यात्राएं

    मालिक साल में करीब 90 दिन ही लंदन में रहते हैं. बाकी पूरा साल वे दुनिया भर में घूमते रहते हैं. ऐसे में आपको भी उनके साथ हर जगह यात्रा करनी होगी. इसके लिए आपके काम करने के घंटे फिक्स नहीं होंगे, यानी आपको हर समय तैयार रहना होगा.

    इतनी बड़ी सैलरी का सच क्या है?

    यह 90 लाख रुपए का पैकेज सिर्फ कपड़े धोने के लिए नहीं है, बल्कि एक ही इंसान से कई सारे काम करवाने का है. इसमें आपको ड्राइवर, लॉन्ड्री एक्सपर्ट, केयरटेकर और पर्सनल हेल्पर, सबकी भूमिका एक साथ निभानी होगी. यह भी पढ़ें: 40 की उम्र में गई नौकरी, तो शख्स बोला- भैया, Layoff के तो बड़े फायदे हैं! वायरल हुआ वीडियो

    सबसे बड़ी शर्त यह है कि मालिक की पर्सनल लाइफ और प्राइवेसी से जुड़ी बातें पूरी तरह गोपनीय रखनी होंगी, यानी किसी को कुछ बताना नहीं है. यह भी पढ़ें: OMG! शख्स की चमकी किस्मतरातों-रात बदल गई जिंदगी, एक टिकट से मिला 13,357 करोड़ का इनाम

  • कुदरत का अनोखा करिश्मा! जमीन के अंदर दबकर भी सालों जिंदा रहती है ये मछली, जानिए इसका रहस्य?

    कुदरत का अनोखा करिश्मा! जमीन के अंदर दबकर भी सालों जिंदा रहती है ये मछली, जानिए इसका रहस्य?

    कुदरत का अनोखा करिश्मा! जमीन के अंदर दबकर भी सालों जिंदा रहती है ये मछली, जानिए इसका रहस्य?

    दुनियाभर में कई ऐसे विचित्र जीव-जंतु हैं, जिनके बारे में जानकर हैरानी होती है. इनमें से कुछ जीव अपनी ही प्रजाति के दूसरे जीवों से बिल्कुल अलग होते हैं. अब मछली को ही ले लीजिए. बचपन से ही हम पढ़ते आ रहे हैं कि ‘मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है’, यानी बिना पानी के मछली का जिंदा रहना नामुमकीन है. वो तड़प-तड़प कर मर जाएगी. लेकिन एक मछली ऐसी भी है, जो पानी के बिना महीनों ही नहीं, बल्कि कई सालों तक जमीन पर जिंदा रह सकती है. इस अनोखी और रहस्यमयी मछली का नाम लंगफिश है, जिसे कई जगहों पर सालामैंडरफिश के नाम से भी पहचाना जाता है. यह मीठे पानी में पाई जाने वाली एक विशेष प्रकार की मछली है, जो जमीन पर रहने के अपने अद्भुत गुण के लिए दुनिया भर में मशहूर है.

    लंगफिश, इसके नाम से ही साफ पता चलता है, इस मछली के पास एक बहुत ही विकसित श्वसन तंत्र होता है. इंसानों और जमीनी जानवरों की तरह यह मछली भी सीधे हवा से ऑक्सीजन लेने में सक्षम होती है. लंगफिश का शरीर काफी लंबा और पतला होता है, जो देखने में बिल्कुल बाम मछली की तरह दिखाई देता है. इसके पास धागे जैसे पतले पंख होते हैं, जिनका उपयोग यह पानी में तैरने और सतह पर रेंगने के लिए करती है. यह मछली आमतौर पर उथले पानी के सोर्स जैसे दलदल, पोखर और झीलों में रहना पसंद करती है. जब तक पानी मौजूद रहता है, तब तक यह बाकी सामान्य मछलियों की तरह ही व्यवहार करती है और छोटे जीवों तथा केकड़ों को अपना भोजन बनाती है.

    सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि वयस्क होने पर इनमें से कुछ प्रजातियों के गलफड़े काम करना लगभग बंद कर देते हैं. ऐसे में पानी में रहते हुए भी इन्हें सांस लेने के लिए बार-बार सतह पर आना पड़ता है. अगर इस मछली को लंबे समय तक पानी के अंदर ही दबाकर रखा जाए, तो सांस न ले पाने के कारण यह पानी के भीतर ही डूबकर मर सकती है. यह बात इसे दुनिया की बाकी सभी मछलियों से एकदम अलग और अनोखा बनाती है. जब भीषण गर्मी और सूखे का मौसम आता है और नदियां-तालाब सूखने लगते हैं, तब लंगफिश अपनी जान बचाने का अनोखा तरीका अपनाती है. यह अपने मुंह में मिट्टी भरकर और उसे गलफड़ों से बाहर निकालकर कीचड़ के अंदर एक गहरा गड्ढा खोद लेती है.

    उस गड्ढे की गहराई में पहुंचने के बाद यह अपनी त्वचा से एक विशेष तरल पदार्थ (म्यूकस) छोड़ती है, जो सूखकर एक सुरक्षात्मक खोल बन जाता है. इस खोल के अंदर मछली का केवल मुंह सांस लेने के लिए खुला रहता है. सूखे के इस लंबे दौर में मछली अपनी मेटाबॉलिज्म को बहुत कम कर देती है और अपनी पूंछ के मांसपेशियों के ऊतकों को खाकर जीवित रहती है. जब दोबारा बारिश होती है और मिट्टी नरम पड़ती है, तो यह बाहर निकल आती है. यह मछली सूखे कीचड़ में 4 साल तक बिना पानी के जिंदा रह सकती है. यह मुख्य रूप से अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में पाई जाती है, जहां स्थानीय लोग सूखे के दौरान जमीन खोदकर इसे खाने के लिए निकालते हैं.

  • चॉकलेट के लिए मां से रूठा 3 साल का बच्चा, सीधे पुलिस के पास पहुंचकर बोला- ‘मम्मी की शिकायत करनी है!’

    चॉकलेट के लिए मां से रूठा 3 साल का बच्चा, सीधे पुलिस के पास पहुंचकर बोला- ‘मम्मी की शिकायत करनी है!’

    चॉकलेट के लिए मां से रूठा 3 साल का बच्चा, सीधे पुलिस के पास पहुंचकर बोला- ‘मम्मी की शिकायत करनी है!’

    Viral Video : बच्चों की नाराजगी भी कितनी मासूम होती है, इसका अंदाजा मध्य प्रदेश के बुरहानपुर से वायरल हुए एक पुराने वीडियो को देखकर लगाया जा सकता है. मामला साल 2022 का बताया जा रहा है, लेकिन बच्चे की मासूम शिकायत का वीडियो एक बार फिर सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहा है.

    वीडियो में करीब 3 साल का एक बच्चा पुलिस चौकी में पुलिस अधिकारी के सामने बैठा नजर आता है. देखने में यह बिल्कुल सामान्य शिकायत जैसा लगता है, लेकिन जब बच्चे से उसकी परेशानी पूछी जाती है तो उसकी बात सुनकर वहां मौजूद लोग मुस्कुराने लगते हैं.

    चॉकलेट को लेकर नाराज था बच्चा

    बताया जाता है कि बच्चा चॉकलेट या कैंडी खाने की जिद कर रहा था. इसी दौरान उसकी मां उसे नहलाने और काजल या टीका लगाने की कोशिश कर रही थीं. बच्चे की जिद और शरारत से परेशान होकर मां ने उसे डांट दिया और हल्की फटकार भी लगा दी.

    बस फिर क्या था, नन्हा बच्चा अपनी मां से नाराज हो गया. उसने अपने पिता से पुलिस के पास चलने की जिद पकड़ ली. पिता भी बच्चे की बात मानते हुए उसे लेकर डेढ़तलाई पुलिस चौकी पहुंच गए.

    चौकी में मौजूद सब-इंस्पेक्टर प्रियंका नायक ने जब बच्चे से उसकी परेशानी पूछी, तो उसने अपनी मासूम भाषा में मां के खिलाफ शिकायत शुरू कर दी. बच्चे का आरोप था कि उसकी मां उसकी चॉकलेट ले लेती हैं और उसे मारती भी हैं. मासूम ने यहां तक कह दिया कि उसकी मां को जेल में डाल दिया जाए.

    पुलिस अधिकारी ने भी निभाया ‘इंसाफ’

    बच्चे की शिकायत सुनकर पुलिसकर्मी उसकी मासूमियत पर मुस्कुराने लगे. हालांकि, अधिकारी ने उसकी बात को नजरअंदाज नहीं किया. उन्होंने बच्चे को सहज महसूस कराने के लिए कागज और पेन लिया और उसकी शिकायत लिखने का नाटक किया.

    जब बच्चे से शिकायत पर हस्ताक्षर करने को कहा गया, तो उसने भी बड़े गंभीर अंदाज में पेन उठाया और कागज पर कुछ लकीरें खींच दीं. उसके इस अंदाज ने पूरे माहौल को और मजेदार बना दिया.

    वीडियो ने फिर खींचा लोगों का ध्यान

    बच्चे की ‘पुलिस शिकायत’ का यह वीडियो सोशल मीडिया पर लोगों को खूब पसंद आ रहा है. यूजर्स उसकी मासूमियत, नाराजगी और पुलिस से न्याय मांगने के अंदाज पर मजेदार प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. कई लोगों के लिए यह वीडियो बचपन की उन छोटी-छोटी बातों की याद दिला रहा है, जब चॉकलेट, टॉफी या खिलौना न मिलने पर बच्चे दुनिया की सबसे बड़ी समस्या समझ लेते हैं. वीडियो 2022 की घटना से जुड़ा बताया जा रहा है और इसकी मूल परिस्थितियों की न्यूज18 स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता है.

  • पुरुषों की यौन सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है सहजन! जानिए इसके सेवन के फायदे..

    पुरुषों की यौन सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है सहजन! जानिए इसके सेवन के फायदे..

    पुरुषों की यौन सेहत के लिए फायदेमंद माना जाता है सहजन! जानिए इसके सेवन के फायदे..

    सहजन यानी मोरिंगा की फली भारतीय खान-पान का हिस्सा रही है। इसमें विटामिन, खनिज, फाइबर और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो संतुलित आहार का हिस्सा बनने पर शरीर के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। इसे खास तौर पर पुरुषों की यौनशक्ति बढ़ाने या शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने वाली दवा मानना सही नहीं है, लेकिन इसके पोषक गुण सामान्य स्वास्थ्य के लिए उपयोगी जरूर हैं।

    विटामिन और मिनरल्स से भरपूर

    सहजन की फली में विटामिन C, पोटैशियम और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। ये शरीर के सामान्य कामकाज और प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में मदद करते हैं।

    फाइबर का अच्छा स्रोत

    सहजन में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए उपयोगी होता है। नियमित और संतुलित आहार के साथ पर्याप्त फाइबर लेने से कब्ज जैसी समस्या से बचने में मदद मिल सकती है।

    पुरुषों की सेहत के लिए

    सहजन में मौजूद पोषक तत्व शरीर के सामान्य स्वास्थ्य को सपोर्ट करते हैं। अच्छी नींद, संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और तनाव को नियंत्रित करना भी पुरुषों की यौन और प्रजनन से जुड़ी सेहत के लिए महत्वपूर्ण है।

    क्या सहजन शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाता है?

    सहजन को सीधे तौर पर शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने या यौनशक्ति बढ़ाने की प्रमाणित दवा नहीं माना जा सकता। इस संबंध में उपलब्ध शोध सीमित हैं और इंसानों में इसके प्रभाव को लेकर पर्याप्त मजबूत प्रमाण नहीं हैं। इसलिए यौन कमजोरी या प्रजनन संबंधी समस्या होने पर केवल सहजन पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    महिलाओं के लिए भी उपयोगी

    सहजन में मौजूद फाइबर, विटामिन और खनिज महिलाओं के लिए भी संतुलित आहार का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, गर्भाशय की किसी बीमारी या दर्द का इलाज सहजन से होने का दावा वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं है।

    निष्कर्ष: सहजन को पौष्टिक सब्जी के रूप में अपनी डाइट में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसे यौनशक्ति बढ़ाने या शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने का निश्चित इलाज बताना सही नहीं होगा। किसी भी लगातार यौन या प्रजनन संबंधी समस्या के लिए विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।

    सहजन यानी मोरिंगा की फली भारतीय खान-पान का हिस्सा रही है। इसमें विटामिन, खनिज, फाइबर और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो संतुलित आहार का हिस्सा बनने पर शरीर के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। इसे खास तौर पर पुरुषों की यौनशक्ति बढ़ाने या शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने वाली दवा मानना सही नहीं है, लेकिन इसके पोषक गुण सामान्य स्वास्थ्य के लिए उपयोगी जरूर हैं।

    विटामिन और मिनरल्स से भरपूर

    सहजन की फली में विटामिन C, पोटैशियम और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। ये शरीर के सामान्य कामकाज और प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में मदद करते हैं।

    फाइबर का अच्छा स्रोत

    सहजन में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र के लिए उपयोगी होता है। नियमित और संतुलित आहार के साथ पर्याप्त फाइबर लेने से कब्ज जैसी समस्या से बचने में मदद मिल सकती है।

    पुरुषों की सेहत के लिए

    सहजन में मौजूद पोषक तत्व शरीर के सामान्य स्वास्थ्य को सपोर्ट करते हैं। अच्छी नींद, संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम और तनाव को नियंत्रित करना भी पुरुषों की यौन और प्रजनन से जुड़ी सेहत के लिए महत्वपूर्ण है।

    क्या सहजन शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाता है?

    सहजन को सीधे तौर पर शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने या यौनशक्ति बढ़ाने की प्रमाणित दवा नहीं माना जा सकता। इस संबंध में उपलब्ध शोध सीमित हैं और इंसानों में इसके प्रभाव को लेकर पर्याप्त मजबूत प्रमाण नहीं हैं। इसलिए यौन कमजोरी या प्रजनन संबंधी समस्या होने पर केवल सहजन पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

    महिलाओं के लिए भी उपयोगी

    सहजन में मौजूद फाइबर, विटामिन और खनिज महिलाओं के लिए भी संतुलित आहार का हिस्सा बन सकते हैं। हालांकि, गर्भाशय की किसी बीमारी या दर्द का इलाज सहजन से होने का दावा वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं है।

    निष्कर्ष: सहजन को पौष्टिक सब्जी के रूप में अपनी डाइट में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसे यौनशक्ति बढ़ाने या शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने का निश्चित इलाज बताना सही नहीं होगा। किसी भी लगातार यौन या प्रजनन संबंधी समस्या के लिए विशेषज्ञ की सलाह जरूरी है।

  • न शादी का सामान, न कोई गहना… दुल्हन की डोली में रखी जाती थी ये खास रोटी, वजह बेहद दिलचस्प..

    न शादी का सामान, न कोई गहना… दुल्हन की डोली में रखी जाती थी ये खास रोटी, वजह बेहद दिलचस्प..

    न शादी का सामान, न कोई गहना… दुल्हन की डोली में रखी जाती थी ये खास रोटी, वजह बेहद दिलचस्प..

    भारत और पाकिस्तान भले ही आज अलग-अलग देशों में बंटे हुए हैं, लेकिन दोनों जगहों की खान-पान और लाइफस्टाइल में आज भी कई समानताएं देखने को मिलती हैं. रोटी भी ऐसी ही चीज है, जो दोनों देशों के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा रही है. भारत में जहां नान, पराठा, रुमाली रोटी से लेकर कई तरह की पारंपरिक रोटियां बनाई जाती हैं, वहीं पाकिस्तान में भी अलग-अलग इलाकों की अपनी खास रोटियां हैं. इन्हीं में से एक है मुल्तान की मशहूर ‘डोली रोटी’, जिसका रिश्ता सिर्फ स्वाद से नहीं, बल्कि करीब 100 साल पुरानी एक दिलचस्प परंपरा से जुड़ा हुआ है.

    सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में कंटेंट क्रिएटर अक्सा जट ने मुल्तान की इसी खास रोटी के बारे में जानकारी दी है. वीडियो में वह बताती हैं कि करीब 100 साल पहले मुल्तान में शादी के समय दुल्हन की डोली के साथ यह रोटी रखी जाती थी. हालांकि, इसे सिर्फ दुल्हन के लिए नहीं रखा जाता था. यह बारात के लोगों के लिए रास्ते का खाना हुआ करता था. आज के दौर में शादी में कुछ घंटों का सफर तय करके बारात आसानी से दुल्हन के घर पहुंच जाती है, लेकिन पुराने समय में ऐसा नहीं था. उस वक्त न तो आज जैसी सड़कें थीं और न ही हर किसी के पास कार या दूसरे साधन उपलब्ध थे. कई बार बारात को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में कई दिन लग जाते थे.

    कई दिनों के सफर के लिए था खाने का इंतजाम
    अक्सा जट के मुताबिक, पुराने समय में लोग घोड़ों और तांगों से सफर करते थे. लंबी दूरी की यात्रा में सबसे बड़ी समस्या खाने-पीने की होती थी. रास्ते में हर जगह खाना मिलना आसान नहीं था और बारात में बड़ी संख्या में लोग भी शामिल होते थे. ऐसे में ऐसी चीज की जरूरत थी, जिसे पहले से तैयार करके लंबे सफर के दौरान आसानी से खाया जा सके. इसी जरूरत ने डोली रोटी को खास बना दिया. मीठी रोटी को डोली में रख दिया जाता था, ताकि रास्ते में जब किसी को भूख लगे तो वह इसे खा सके. इस तरह यह रोटी सिर्फ एक व्यंजन नहीं रही, बल्कि उस समय की यात्रा और शादी की जरूरत का हिस्सा बन गई.

    कभी सिर्फ मीठी होती थी डोली रोटी
    बताया जाता है कि पुराने समय में डोली रोटी मुख्य रूप से मीठी बनाई जाती थी. इसे इस तरह तैयार किया जाता था कि वह सफर के दौरान खाने के काम आ सके. समय के साथ इसके स्वाद और बनाने के तरीके में भी बदलाव आया. आज डोली रोटी के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं. इसमें खोया और कीमा जैसी चीजों का इस्तेमाल भी किया जाने लगा है. यानी एक समय बारात के लंबे सफर का सहारा रही यह रोटी अब स्वाद और स्थानीय पहचान का हिस्सा बन चुकी है. दशकों से रोटी बना रहा है मुल्तान का मशहूर रोटी वाला

     

     


    अक्सा जट ने अपने वीडियो में मुल्तान के मशहूर फहीम रोटी वाले की दुकान भी दिखाई. बताया जाता है कि यहां लंबे समय से इस तरह की पारंपरिक रोटी बनाई जा रही है. दुकान पर मिलने वाली डोली रोटी आज भी लोगों को मुल्तान की पुरानी परंपराओं और खान-पान की याद दिलाती है. इस रोटी की खासियत यह है कि इसे देखने और खाने के साथ-साथ इसके पीछे की कहानी भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ाती है. एक साधारण सी रोटी कैसे कभी बारात के कई दिनों के सफर का जरूरी खाना हुआ करती थी, यह बात आज के समय में काफी अनोखी लगती है.

    बंटवारे के बाद भी नहीं भूली गई यह परंपरा


    इस वीडियो को अक्सा जट ने अपने इंस्टाग्राम @aqsajutt1212 पर शेयर किया है. वीडियो पर एक भारतीय यूजर का कमेंट भी काफी खास रहा. उन्होंने बताया कि उनके परिवार का रिश्ता बंटवारे से पहले मुल्तान से था. उनके मुताबिक, मुल्तान से भारत आने के कई साल बाद भी उनकी दादी डोली रोटी बनाया करती थीं. यह बात दिखाती है कि खाने की परंपराएं सिर्फ एक जगह या सीमा तक सीमित नहीं रहतीं. लोग जब एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं, तब भी अपने साथ स्वाद, यादें और पुरानी रिवायतें लेकर जाते हैं. डोली रोटी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. आज मुल्तान की यह रोटी सोशल मीडिया के जरिए फिर चर्चा में है, लेकिन इसके पीछे छिपी कहानी इसे और खास बनाती है. कभी लंबी यात्रा के दौरान बारातियों का पेट भरने वाली यह मीठी रोटी आज एक पुरानी परंपरा, बदलते खान-पान और बंटवारे से पहले की साझा संस्कृति की याद दिलाती है.

  • रोना आपकी सेहत के लिए क्यों फायदेमंद हो सकता है? जानिए आंसुओं से जुड़े फायदे..

    रोना आपकी सेहत के लिए क्यों फायदेमंद हो सकता है? जानिए आंसुओं से जुड़े फायदे..

    रोना आपकी सेहत के लिए क्यों फायदेमंद हो सकता है? जानिए आंसुओं से जुड़े फायदे..

    रोना इंसानी भावनाओं का स्वाभाविक हिस्सा है। दुख, खुशी, तनाव या भावनात्मक दबाव के दौरान आंखों से आंसू निकलना सामान्य प्रक्रिया है। कई बार रोने के बाद व्यक्ति खुद को हल्का और बेहतर महसूस करता है। हालांकि, रोने को किसी बीमारी का इलाज नहीं माना जा सकता, लेकिन भावनात्मक रूप से यह तनाव कम करने में मदद कर सकता है।

    आइए जानते हैं रोने से जुड़े कुछ संभावित फायदे।

    आंखों को मिलती है नमी

    आंसू आंखों की सतह को नम रखने में मदद करते हैं। इससे आंखों में सूखापन और जलन जैसी परेशानी से राहत मिल सकती है। आंसुओं में मौजूद प्राकृतिक तत्व आंखों की सतह को सुरक्षित रखने में भी भूमिका निभाते हैं।

    भावनात्मक बोझ कम महसूस हो सकता है

    जब व्यक्ति लंबे समय तक अपनी भावनाओं को दबाकर रखता है, तो मानसिक दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में रोना भावनाओं को व्यक्त करने का एक प्राकृतिक तरीका हो सकता है। कई लोगों को रोने के बाद मन हल्का महसूस होता है।

    तनाव कम करने में मदद

    भावनात्मक तनाव के दौरान रोने के बाद कुछ लोगों को शांति और आराम महसूस होता है। रोने के साथ गहरी सांस लेना और भावनाओं को बाहर निकालना व्यक्ति को मानसिक रूप से रिलैक्स महसूस करा सकता है।

    मूड बेहतर हो सकता है

    रोने के बाद व्यक्ति को भावनात्मक राहत मिल सकती है, खासकर तब जब वह किसी परेशानी या दुख से गुजर रहा हो। हालांकि, हर व्यक्ति में इसका अनुभव अलग-अलग हो सकता है।

    भावनाओं को व्यक्त करने का स्वस्थ तरीका

    रोना कमजोरी की निशानी नहीं है। यह शरीर और दिमाग की भावनाओं को व्यक्त करने की प्राकृतिक प्रक्रिया है। अपनी भावनाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए ज्यादा मददगार हो सकता है।

    जरूरी बात: रोने से आंखों की रोशनी बढ़ने या शरीर के विषैले पदार्थ बाहर निकलने जैसे दावों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। अगर लगातार उदासी, तनाव, घबराहट या रोने की समस्या बनी रहती है और रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

  • यहां iPhone से भी सस्ता बिक रहा है बंगला, कौड़ियों के दाम खरीद रहे लोग…?

    यहां iPhone से भी सस्ता बिक रहा है बंगला, कौड़ियों के दाम खरीद रहे लोग…?

    यहां iPhone से भी सस्ता बिक रहा है बंगला, कौड़ियों के दाम खरीद रहे लोग…?

    आईफोन से भी सस्ता मिल रहा जापान में घर (इमेज- सोशल मीडिया)

    दुनिया के कई देशों में घर खरीदना सपना बनकर रह जाता है. कीमतें आसमान छूती हैं और आम आदमी के लिए अपना घर बसाना मुश्किल हो जाता है. लेकिन जापान में एक बिल्कुल उलटी तस्वीर देखने को मिल रही है. यहां लाखों घर सालों से खाली पड़े हैं. इन्हें जापानी भाषा में “अकिया” कहा जाता है. अब इन अकिया घरों की बिक्री जोरों पर है और कुछ तो इतने सस्ते हैं कि उनकी कीमत एक अच्छे आईफोन से भी कम बैठ रही है.

    लोग कौड़ियों के दाम में ये घर खरीदने के लिए भाग-भाग कर रजिस्ट्री करवा रहे हैं. जापान में अकिया की समस्या पिछले कई वर्षों से चर्चा में है. देश की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है और ग्रामीण इलाकों से युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं. नतीजा यह हुआ कि गांवों और छोटे कस्बों में लाखों घर खाली पड़ गए हैं. मालिक या तो गुजर चुके हैं या शहर में बस गए हैं और घर की देखभाल नहीं कर पा रहे. ऐसे में इन घरों को औने-पौने दामों में बेचा जा रहा है.

    लाखों घर हैं सुनसान
    अनुमान के मुताबिक जापान में ऐसे खाली घरों की संख्या कई लाखों में है और आने वाले वर्षों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. इन घरों की कीमत उनके आकार, लोकेशन और हालत पर निर्भर करती है. कुछ घर पूरी तरह जर्जर हो चुके हैं तो कुछ में थोड़ी मरम्मत की जरूरत है. दूरदराज के इलाकों में जहां आबादी बहुत कम है वहां कुछ संपत्तियां बेहद कम कीमत पर उपलब्ध हो जाती हैं. सोशल मीडिया और खबरों में दावा किया जा रहा है कि कुछ बंगले या घर आईफोन की कीमत से भी सस्ते में बिक रहे हैं. यही वजह है कि लोग इन घरों को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं और रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं. भारत सहित दुनिया के कई देशों में लोग इस खबर को पढ़कर हैरान हैं. कई भारतीय यूजर्स सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि वे जापान शिफ्ट होने के तरीके सर्च कर रहे हैं. सस्ता घर होने का लालच किसी को भी आकर्षित कर सकता है. लेकिन हकीकत सिर्फ कीमत तक सीमित नहीं है. इन घरों को खरीदने के बाद कई चुनौतियां भी आती है.

    कई को मरम्मत की जरुरत
    सालों से खाली पड़े इन घरों में सबसे बड़ी चुनौती मरम्मत की है. कई अकिया घर लंबे समय से बंद पड़े होने के कारण क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. छत लीक करती है, दीवारें कमजोर हो जाती हैं, पाइपलाइन और बिजली के तार पुराने पड़ जाते हैं. मरम्मत का खर्च कभी-कभी घर की कीमत से भी ज्यादा बैठ सकता है. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में नौकरी, स्वास्थ्य सुविधाएं, स्कूल और परिवहन के विकल्प सीमित होते हैं. युवा पीढ़ी के लिए शहरों की सुविधाएं छोड़कर गांव में बसना आसान नहीं होता.

    जापानी सरकार और स्थानीय प्रशासन अकिया समस्या से निपटने के लिए कई कदम उठा रहे हैं. कुछ जगहों पर खाली घरों को सस्ते में या कभी-कभी मुफ्त में देने की योजनाएं चलाई जाती हैं बशर्ते खरीदार वहां रहें और घर को ठीक रखें. कुछ स्थानीय निकाय विदेशी खरीदारों को भी आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं ताकि आबादी बढ़े और इलाका फिर से जीवंत हो जाए. फिर भी प्रक्रिया आसान नहीं है. कानूनी कागजी कार्रवाई, टैक्स और स्थानीय नियमों का पालन करना जरूरी होता है. सोशल मीडिया पर इस विषय ने खासी चर्चा पैदा कर दी है।. कुछ लोग इसे सुनहरा मौका बता रहे हैं तो कुछ चेतावनी दे रहे हैं कि सिर्फ सस्ता होने के चक्कर में फैसला ना करें.

  • एक साल से सरकारी रिकॉर्ड में ‘मुर्दा’ था शख्स, कलेक्टर के पास पहुंचकर बोला- साहब, मैं जिंदा हूं..

    एक साल से सरकारी रिकॉर्ड में ‘मुर्दा’ था शख्स, कलेक्टर के पास पहुंचकर बोला- साहब, मैं जिंदा हूं..

    एक साल से सरकारी रिकॉर्ड में ‘मुर्दा’ था शख्स, कलेक्टर के पास पहुंचकर बोला- साहब, मैं जिंदा हूं..

    मध्य प्रदेश के शिवपुरी में एक अनोखा मामले सामने आया है. मर चुका युवक एक अचानक जिंदा हो गया और कलेक्ट्रेट ऑफिस पहुंच गया. युवक ने कलेक्टर से गुहार लगाई कि साहब, मैं जिंदा हूं. दरअसल ये शख्स जिंदा हैं, लेकिन कागजों में इनको मृत घोषित कर दिया गया है. जिसकी वजह से इनको तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा है. इतना ही नहीं, जमीन जायदाद का काम भी अटका हुआ है.

    पिता की जगह बेटे का मृत्यु प्रमाण पत्र-
    शिवपुरी जिले की रन्नौद नगर परिषद की एक लापरवाही ने जिंदा इंसान को कागजों में मृत घोषित कर दिया. मामला सेसई निवासी गिटला आदिवासी का है. पिता के निधन के बाद मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने गए तो अधिकारियों ने पिता की जगह बेटे गिटला का ही मृत्यु प्रमाण पत्र बना दिया.

    ‘साहब, मैं जिंदा हूं…’
    गिटला ने शिवपुरी कलेक्ट्रेट में आयोजित जनसुनवाई में कलेक्टर को आवेदन सौंपा. उसने बताया कि मेरे पिताजी का निधन 2022 में हो गया था. नामांतरण करवाने गया तो पता चला कि नगर परिषद रन्नौद ने गलती से मेरा मृत्यु प्रमाण पत्र बना दिया है. ये प्रमाण पत्र 1 साल पहले बना था. गिटला का कहना है कि नगर परिषद में कई बार शिकायत की, सुनवाई नहीं हुई. अब जमीन-जायदाद के काम अटक गए हैं. बैंक, राशन, सरकारी योजनाएं सब बंद. जिंदा होते हुए भी सिस्टम ने उसे मृत मान लिया. बड़ा सवाल यह है कि रन्नौद नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारियों की गलती का खामियाजा पीड़ित युवक भुगत रहा है.

    उचित कार्रवाई होगी- एडीएम
    हालांकि प्रशासन भी इस मामले में उचित कार्रवाई का भरोसा दिला रहा है. लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. इस पूरे मामले को लेकर एडीएम दिनेश चंद शुक्ला का कहना है कि यह पूरा मामला मीडिया के द्वारा उनके संज्ञान में लाया गया है इस पूरे मामले की जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी.

  • अटल जी ने लिखी कविता, जगजीत सिंह ने गाया और कंपोज किया; ऐसे बनी ‘क्या खोया क्या पाया’ की यादगार धुन..

    अटल जी ने लिखी कविता, जगजीत सिंह ने गाया और कंपोज किया; ऐसे बनी ‘क्या खोया क्या पाया’ की यादगार धुन..

    अटल जी ने लिखी कविता, जगजीत सिंह ने गाया और कंपोज किया; ऐसे बनी ‘क्या खोया क्या पाया’ की यादगार धुन..

    पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सिर्फ राजनीति के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी कविताओं के लिए भी जाने जाते थे. उनकी लिखी पंक्तियों में जिंदगी, अकेलापन, संघर्ष और इंसानी भावनाओं की गहरी झलक दिखाई देती है. ऐसी ही एक चर्चित रचना ‘क्या खोया क्या पाया’ है, जिसे गजल सम्राट जगजीत सिंह ने अपनी आवाज और संगीत से ऐसा रूप दिया कि कविता का मूल भाव पूरी तरह बरकरार रहा.

    ‘संवेदना’ का हिस्सा था ‘क्या खोया क्या पाया’
    ‘क्या खोया क्या पाया’ को 2002 में आए चर्चित सहयोगी एल्बम ‘संवेदना’ (Samvedna) में शामिल किया गया था. इस पूरे प्रोजेक्ट में देश की राजनीति, साहित्य, संगीत और सिनेमा से जुड़े कई बड़े नाम एक साथ आए थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने इसमें कविताएं लिखीं और उन्हें अपनी आवाज में पेश भी किया. वहीं जगजीत सिंह ने इन कविताओं को संगीत दिया और अपनी आवाज में गाया.

    एल्बम में अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान भी जुड़े
    ‘संवेदना’ सिर्फ अटल जी और जगजीत सिंह की वजह से खास नहीं था. एल्बम के लिए प्रस्तावना जावेद अख्तर ने लिखी थी, जिसे अमिताभ बच्चन ने अपनी दमदार आवाज में पेश किया था. इसके अलावा इस प्रोजेक्ट के चर्चित म्यूजिक वीडियो में सुपरस्टार शाहरुख खान भी नजर आए थे, जिसका निर्देशन खुद यश चोपड़ा ने किया था.

    अटल जी की कविताओं के पीछे था गहरा दर्द
    जगजीत सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया था कि अटल बिहारी वाजपेयी से उनकी बैठकों के दौरान कविता और उसके पीछे की भावनाओं को लेकर बातचीत होती थी. अटल जी ने उन्हें समझाया था कि उनके जीवन में आया गहरा अकेलापन और देश के मुश्किल दौर ने उनके भीतर के कवि को और मजबूत किया. उनकी कई संवेदनशील रचनाओं पर इमरजेंसी के दौर में झेला गया कारावास और उस समय का व्यक्तिगत व सामूहिक दर्द भी असर डालता था.

    जगजीत सिंह ने करीब तीन साल तक तैयार किया संगीत
    जगजीत सिंह ने अटल जी की कविताओं को संगीत देने में जल्दबाजी नहीं की. उन्होंने करीब तीन साल तक ‘संवेदना’ की अवधारणा और इन कविताओं की धुनों पर काम किया. उनकी कोशिश थी कि संगीत कविता के शब्दों पर हावी न हो. इसलिए उन्होंने धुन को बेहद सादगी के साथ रखा, ताकि अटल जी की लिखी पंक्तियों की संवेदनशीलता, दार्शनिक गहराई और उनमें छिपा अकेलापन उसी तरह सामने आए.

    अटल जी की एक शर्त ने बदल दिया था पूरा नजरिया
    जगजीत सिंह अटल जी की रचनाओं को सामान्य राजनीतिक कविताओं की तरह पेश नहीं करना चाहते थे. उनका मकसद इन शब्दों को इंसान की जिंदगी, अकेलेपन, मृत्यु और मुश्किल समय में बने रहने की ताकत से जोड़ना था. अटल जी की शर्त भी यही थी कि कविता के मूल भाव और शब्दों के साथ छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए. जगजीत सिंह ने इसी बात का ध्यान रखते हुए संगीत को इतना सधा हुआ रखा कि कविता की अपनी पहचान बनी रहे. यही वजह है कि ‘क्या खोया क्या पाया’ सिर्फ एक कविता का संगीतबद्ध रूप नहीं लगा, बल्कि अटल जी के शब्दों और जगजीत सिंह के संगीत का ऐसा मेल बना, जिसमें दोनों की अपनी-अपनी पहचान साफ सुनाई देती है.