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  • सोने से भी ज्यादा चमकदार नजारा! जमीन की खुदाई करते ही दिखते हैं चमकते पत्थर, जानें कहां है ये जगह​​​​

    सोने से भी ज्यादा चमकदार नजारा! जमीन की खुदाई करते ही दिखते हैं चमकते पत्थर, जानें कहां है ये जगह​​​​

    सोने से भी ज्यादा चमकदार नजारा! जमीन की खुदाई करते ही दिखते हैं चमकते पत्थर, जानें कहां है ये जगह​​​​

    दुनिया की हर जगह की अपनी एक अलग पहचान होती है. कहीं प्रकृति ने हरी-भरी वादियां बिछाई हैं तो कहीं बर्फीली चोटियां मन मोह लेती हैं. कुछ स्थान अपने खान-पान की विविधता से प्रसिद्ध हैं तो कुछ अपनी ऐतिहासिक इमारतों के कारण. झारखंड राज्य का कोडरमा जिला अपनी धरती की चमक से पहचाना जाता है. यहां जमीन की खुदाई करते ही आंखें चौंधिया जाती हैं क्योंकि नीचे चमकदार अभ्रक यानी माइका के पत्थर भरे पड़े हैं.

    इन चमकीले पत्थरों को दुनिया भर में भेजा जाता था और आज भी कोडरमा की पहचान इन्हीं से जुड़ी हुई है. कोडरमा को कभी भारत की अभ्रक राजधानी या अब्रख नगरी कहा जाता था. यह जिला छोटा नागपुर पठार का हिस्सा है और यहां की भूगर्भीय संरचना में अभ्रक की प्रचुर मात्रा पाई जाती है. अभ्रक एक खास तरह का खनिज है जो परतदार और चमकदार होता है. इसे आसानी से पतली चादरों में अलग किया जा सकता है. इसकी चमक इतनी तेज होती है कि धूप में या रोशनी में देखने पर आंखें चकाचौंध हो जाती हैं. स्थानीय लोग इसे अब्रख कहते हैं. इस जिले का इतिहास भी उतना ही दिलचस्प है जितना इसका खनिज भंडार.

    चमकीला है इतिहास
    ब्रिटिश काल में उन्नीसवीं सदी के मध्य में यहां वैज्ञानिक तरीके से अभ्रक खनन की शुरुआत हुई थी. 1843 के आसपास कोडरमा गवर्नमेंट एस्टेट में संगठित खनन शुरू हुआ. यूरोपीय उद्यमी एफएफ क्रिस्टियन ने यहां विस्फोटकों का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर निकालना शुरू किया. उन्होंने देखा कि अभ्रक की इंसुलेशन क्वालिटी एस्बेस्टस से भी बेहतर है. लंदन में सैंपल भेजने के बाद इसकी कीमत आसमान छूने लगी. धीरे-धीरे स्थानीय व्यापारियों ने भी इस कारोबार में कदम रखा. वैश्य बंधु छठू राम और होरील राम जैसे लोगों ने दो विश्व युद्धों के बीच विशाल खनन और निर्यात का नेटवर्क खड़ा कर दिया. बीसवीं सदी के मध्य तक भारत दुनिया के अभ्रक बाजार पर लगभग राज करता था. 1940 और 1950 के दशक में भारत विश्व की मांग का बड़ा हिस्सा पूरा करता था. कोडरमा, गिरिडीह, हजारीबाग और आसपास के इलाके मिलकर ग्रेट माइका बेल्ट बनाते थे जो करीब 160 किलोमीटर लंबा और 25 से 40 किलोमीटर चौड़ा था. कोडरमा क्षेत्र इसमें सबसे महत्वपूर्ण था.

    उच्च क्वालिटी का माल
    कोडरमा में उच्च गुणवत्ता वाला रूबी माइका मिलता था जो इलेक्ट्रॉनिक्स और विद्युत उद्योग के लिए बेहद कीमती माना जाता था. अभ्रक के उपयोग कई क्षेत्रों में होते हैं. यह बिजली का अच्छा कुचालक है इसलिए पुराने समय में रेडियो, टीवी, हीटर, माइक्रोवेव और अन्य उपकरणों में इंसुलेटर के रूप में इस्तेमाल होता था. आज भी कॉस्मेटिक्स में चमक पैदा करने, पेंट्स, प्लास्टिक और कुछ विशेष औद्योगिक अनुप्रयोगों में इसकी मांग बनी हुई है. इसकी रासायनिक स्थिरता और गर्मी सहन करने की क्षमता इसे खास बनाती है. 1970 और 1980 के दशक में कोडरमा में सैकड़ों खदानें सक्रिय थीं. दिबौर घाटी और नीरू पहाड़ी जैसे इलाके प्रमुख केंद्र थे. हजारों मजदूर इन खदानों में काम करते थे. क्लियर माइका की कीमत उस समय प्रति किलो 15 रुपये से लेकर हजारों रुपये तक पहुंच जाती थी. झुमरी तिलैया कस्बा अभ्रक व्यापार का बड़ा केंद्र बन गया था. निर्यात से अच्छी आमदनी होती थी और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत थी. लेकिन 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद स्थिति बदल गई. अधिकांश खदानें घने जंगलों और बाद में घोषित वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्रों में स्थित थीं. पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी खनन बंद कर दिया गया. आधिकारिक रूप से बड़े पैमाने का औद्योगिक खनन रुक गया. इसके बाद उत्पादन में भारी गिरावट आई. आज आधिकारिक आंकड़ों में झारखंड से अभ्रक उत्पादन लगभग ना के बराबर दर्ज होता है जबकि आंध्र प्रदेश और राजस्थान आधिकारिक उत्पादन में आगे हैं. फिर भी कोडरमा की धरती में अभ्रक की उपस्थिति बनी हुई है. कुछ क्षेत्रों में छोटे पैमाने पर संग्रहण की गतिविधियां चलती रही हैं.

     

     
  • उम्र बड़ी, चेहरा बच्चे जैसा! लोग उड़ाते थे मजाक, फिर दाढ़ी के लिए खर्च कर दिए ₹10 लाख..​​​​

    उम्र बड़ी, चेहरा बच्चे जैसा! लोग उड़ाते थे मजाक, फिर दाढ़ी के लिए खर्च कर दिए ₹10 लाख..​​​​

    उम्र बड़ी, चेहरा बच्चे जैसा! लोग उड़ाते थे मजाक, फिर दाढ़ी के लिए खर्च कर दिए ₹10 लाख..​​​​

    कहते हैं जो दिखताहै वो बिकता है… अगर आपका चेहरा उम्र से बहुत छोटा दिखे, तो कईबार लोग आपको सीरियस नहीं लेते हैं. एक शख्स के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. उसे लगा कि उसकी काबिलियत नहीं, बल्कि बेबी फेस लोगों की नजर में उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया है. फिर क्या था… उसने करीब 10 लाख रुपए खर्च कर दाढ़ी उगवा ली. अब उसका दावा है कि दाढ़ी आते ही ऑफिस में लोग उसे ज्यादा गंभीरता से लेने लगे, सम्मान बढ़ गया और आत्मविश्वास भी पहले से कहीं ज्यादा हो गया.

    दाढ़ी न आने की वजह से लोग गंभीरता से नहीं लेते थे
    मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक युवक प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल सेक्टर में काम करता है. उसने बताया कि उसका चेहरा उम्र से काफी कम दिखता था. इसी वजह से कई बार मीटिंग में उसकी राय को नजरअंदाज कर दिया जाता था. उसे लगता था कि लोग उसे फ्रेशर समझते हैं और बड़े फैसलों के लिए उस पर भरोसा नहीं करते.

    युवक का कहना है कि कई बार उसे ऐसे पदों के लिए भी मौका नहीं मिला, जिनके लिए वह पूरी तरह योग्य था. हालांकि किसी ने सीधे तौर पर यह नहीं कहा कि उसकी शक्ल इसकी वजह है, लेकिन लगातार मिलने वाले इशारे और मजाक उसके मन में असुरक्षा की भावना पैदा करने लगे.

    दाढ़ी उगाने की हर कोशिश हुई नाकाम
    बेहतर लुक पाने के लिए उसने पहले प्राकृतिक तरीके अपनाए. उसने दाढ़ी बढ़ाने वाले तेल, विटामिन और बाल उगाने वाली दवा मिनॉक्सिडिल का भी इस्तेमाल किया. लेकिन महीनों की कोशिश के बाद भी मनचाही दाढ़ी नहीं आई. जब सभी उपाय बेअसर रहे, तब उसने दाढ़ी ट्रांसप्लांट कराने का फैसला लिया. इस प्रक्रिया में सिर के पीछे के हिस्से से बाल निकालकर चेहरे के उन हिस्सों में लगाए गए, जहां दाढ़ी कम थी.

    5 घंटे चली सर्जरी, 10 दिन में ठीक हुआ चेहरा
    युवक के अनुसार पूरी सर्जरी करीब पांच घंटे तक चली. ऑपरेशन के बाद करीब 10 दिनों तक चेहरे पर छोटे-छोटे निशान और पपड़ी बनी रही. धीरे-धीरे नई दाढ़ी उगने लगी और कुछ समय बाद उसका चेहरा पूरी तरह बदल गया.

    दाढ़ी आने के बाद बदल गया लोगों का नजरिया
    युवक का दावा है कि दाढ़ी आने के बाद ऑफिस में किसी ने उसके कम उम्र के लुक का मजाक नहीं उड़ाया. सहकर्मी उसकी बातों को पहले से ज्यादा गंभीरता से सुनने लगे. कई लोगों ने उससे कहा कि अब वह पहले की तुलना में ज्यादा परिपक्व और आत्मविश्वासी दिखता है. उसके मुताबिक इस बदलाव का असर उसकी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ दोनों पर पड़ा.

    दाढ़ी ट्रांसप्लांट पर करीब 10 हजार डॉलर खर्च करने के बावजूद युवक को इस फैसले का कोई पछतावा नहीं है. उसका कहना है कि यह रकम भले ही बड़ी थी, लेकिन इससे उसका आत्मविश्वास लौटा और खुद को लेकर जो असुरक्षा थी, वह काफी हद तक खत्म हो गई.

  • नेपालियों की आंखों का आकार ऐसा क्यों होता है? जानें इस खास फीचर के पीछे की वैज्ञानिक वजह​​​​

    नेपालियों की आंखों का आकार ऐसा क्यों होता है? जानें इस खास फीचर के पीछे की वैज्ञानिक वजह​​​​

    नेपालियों की आंखों का आकार ऐसा क्यों होता है? जानें इस खास फीचर के पीछे की वैज्ञानिक वजह​​​​

    दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले लोगों की शारीरिक बनावट में फर्क साफ दिखता है. त्वचा का रंग, बालों की बनावट, नाक की शक्ल और आंखों का आकार—ये सब प्रकृति और पर्यावरण के लंबे असर का नतीजा होते हैं. इन्हीं में से एक खास फीचर है पूर्वी एशियाई लोगों की आंखें. कोरियाई, चीनी, जापानी, मंगोलियाई और नेपाली समुदायों में आंखों का आकार आम यूरोपीय या दक्षिण एशियाई लोगों से अलग दिखता है.

    इन्हें आम भाषा में “खींची हुई आंखें” या वैज्ञानिक भाषा में मोनीलिड और एपिकैंथिक फोल्ड कहा जाता है. कई लोग इस फर्क को सिर्फ सुंदरता या फैशन से जोड़कर देखते हैं. कुछ सेलिब्रिटी डबल आईलिड सर्जरी करवाकर अपनी आंखों का आकार बदलवा लेते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि प्रकृति ने इन इलाकों में रहने वाले लोगों की आंखें ऐसी क्यों बनाईं?

    प्रकृति की समझदारी
    इसका जवाब पर्यावरणीय अनुकूलन यानी एवोल्यूशनरी एडाप्टेशन में छिपा है. ठंड, तेज हवा, बर्फ की चमक और कठोर जलवायु से बचाव के लिए प्रकृति ने यह अनोखा फीचर विकसित किया है. मोनीलिड आंखों में ऊपरी पलक पर एक अतिरिक्त त्वचा की परत होती है जो आंख के भीतरी कोने को ढक लेती है. इसे एपिकैंथिक फोल्ड कहते हैं. इससे आंखें थोड़ी संकरी और खींची हुई दिखती हैं. यह फीचर सिर्फ पूर्वी एशिया तक सीमित नहीं है. कुछ मूल अमेरिकी जनजातियों, दक्षिण-पूर्व एशिया के कुछ समूहों और मध्य एशिया के लोगों में भी यह पाया जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह फीचर हजारों साल पहले विकसित हुआ जब मनुष्य कठोर ठंडे इलाकों में रहने लगे. सबसे प्रचलित सिद्धांत यह है कि एपिकैंथिक फोल्ड ठंडी और हवा वाली जलवायु में फायदेमंद साबित हुआ. साइबेरिया, मंगोलिया, उत्तरी चीन और कोरिया जैसे इलाकों में सर्दियां बहुत कठोर होती हैं. तेज ठंडी हवा आंखों को नुकसान पहुंचा सकती है. बर्फ और बर्फीली धरती से परावर्तित होने वाली तेज रोशनी यानी स्नो ग्लेयर से आंखें प्रभावित हो सकती हैं. इस फोल्ड की वजह से आंख का खुला हिस्सा कम हो जाता है. इससे ठंडी हवा का सीधा संपर्क कम होता है और तेज रोशनी से भी बचाव मिलता है. आंखों के आसपास की वसा की परत भी अतिरिक्त सुरक्षा देती है.

    रिसर्चर्स भी इम्प्रेस
    कई शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अनुकूलन अंतिम हिम युग के दौरान और उसके बाद मजबूत हुआ है. जब मनुष्य समूह उत्तर की ओर बढ़े और ठंडे मैदानों में बसने लगे तो जिन लोगों में यह फीचर था उन्हें जीवित रहने में फायदा मिला. धीरे-धीरे यह जेनेटिक रूप से उन आबादियों में आम हो गया. नेपाल के ऊंचाई वाले इलाकों में भी ठंड और तेज हवा आम है. इसलिए वहां के कई समुदायों में भी इसी तरह की आंखों की बनावट दिखती है. यह समझना जरूरी है कि आंखों का यह आकार किसी भी तरह की कमी या कमजोरी नहीं है. यह शुद्ध रूप से पर्यावरण के अनुकूल ढलने का नतीजा है. जैसे अफ्रीकी क्षेत्रों में गहरी त्वचा सूरज की तेज किरणों से बचाव करती है, वैसे ही पूर्वी एशियाई आंखें ठंड और चमक से बचाव करती हैं. प्रकृति ने हर इलाके की जरूरत के हिसाब से फीचर दिए हैं.

     
  • गणित के सवाल का अनोखा जवाब! छात्र की कॉपी में लिखा ये पढ़कर लोग बोले- ‘भाई ने दिल की बात कह दी’​​​​

    गणित के सवाल का अनोखा जवाब! छात्र की कॉपी में लिखा ये पढ़कर लोग बोले- ‘भाई ने दिल की बात कह दी’​​​​

    गणित के सवाल का अनोखा जवाब! छात्र की कॉपी में लिखा ये पढ़कर लोग बोले- ‘भाई ने दिल की बात कह दी’​​​​

    सोशल मीडिया पर आए दिन ऐसी तस्वीरें वायरल होती रहती हैं, जो पढ़ाई से जुड़ी होने के बावजूद लोगों के चेहरे पर मुस्कान ला देती हैं. इन दिनों एक कॉपी का पन्ना इंटरनेट पर खूब चर्चा में है. इसमें एक छात्र ने गणित की परिभाषा पूछे जाने पर ऐसा जवाब लिखा कि पढ़ने वाला अपनी हंसी रोक नहीं पा रहा है.

    तस्वीर में परीक्षा का एक सवाल दिखाई दे रहा है. सवाल है- Explain the meaning of Mathematics in your own words. यानी अपने शब्दों में गणित का अर्थ समझाइए. इसके जवाब में छात्र ने लिखा कि गणित ही ऐसा विषय है जिसे वह अब तक समझ नहीं पाया है. इसके बाद छात्र ने गुणा के नियम को लेकर एक मजेदार सवाल खड़ा कर दिया.

    छात्र का तर्क है कि अगर 1,000 लोगों को शून्य से गुणा किया जाए और जवाब शून्य लोग आएं, तो आखिर वे 1,000 लोग गए कहां? यही मासूम और मजाकिया सवाल इस तस्वीर को खास बना रहा है. जवाब के नीचे कॉपी पर शिक्षक की तरफ से 0/20 भी लिखा नजर आ रहा है, जिससे तस्वीर का हास्य और बढ़ जाता है.

    गणित के सवाल पर छात्र की मजेदार सोच

    असल में गणित के नियम के अनुसार किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर परिणाम शून्य ही होता है. उदाहरण के लिए 1,000 × 0 = 0. इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि 1,000 लोग कहीं गायब हो गए. यह केवल गणितीय गुणा का नियम है, जिसमें शून्य से गुणा करने पर परिणाम शून्य आता है.

    लेकिन छात्र ने इसी नियम को आम जिंदगी की स्थिति से जोड़कर ऐसा सवाल बना दिया, जिसे देखकर लोग हंसने लगे. यही वजह है कि तस्वीर को सोशल मीडिया पर मजेदार और क्रिएटिव जवाब के तौर पर शेयर किया जा रहा है.

    शिक्षक ने दिए कितने नंबर?

    तस्वीर में छात्र के जवाब के नीचे लाल पेन से 0/20 अंक दिखाई दे रहे हैं. हालांकि, तस्वीर किस परीक्षा, स्कूल या छात्र से जुड़ी है, इसकी स्वतंत्र जानकारी उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे वास्तविक परीक्षा की घटना मानने के बजाय वायरल सोशल मीडिया पोस्ट के रूप में देखना बेहतर है. यह खबर भी वायरल वीडियो और सोशल मीडिया पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर है. न्यूज18 इस वीडियो में किए गए दावों और घटना की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता है.

    सोशल मीडिया यूजर्स भी ऐसे जवाबों को पढ़कर अक्सर कहते हैं कि पढ़ाई में कभी-कभी बच्चों की मासूम सोच ही सबसे ज्यादा मनोरंजन करती है. फिलहाल यह तस्वीर लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. गणित का एक साधारण-सा नियम और उसे लेकर छात्र का अनोखा सवाल इंटरनेट पर लोगों को खूब गुदगुदा रहा है.

  • हिमालय का रहस्यमयी ‘डायमंड’, ट्रेकिंग करने वालों को दिख जाए तो सौभाग्य..​​​​

    हिमालय का रहस्यमयी ‘डायमंड’, ट्रेकिंग करने वालों को दिख जाए तो सौभाग्य..​​​​

    हिमालयन डायमंड ट्रेकर्स को दिखना सौभाग्य की बात है (AI कॉन्सेप्ट इमेज)

    हिमालय की बर्फीली और सुनसान चोटियों पर एक बहुत ही अनोखा और रहस्यमयी ‘डायमंड’ उगता है. ये इतना बड़ा होता है कि इंसान से भी ऊंचा निकल जाता है. सुनने में ये भले ही किसी पौराणिक कहानी जैसा लगे, लेकिन कुदरत का ये करिश्मा कोई पत्थर नहीं, बल्कि एक बेहद कीमती फूल है. इसे ‘हिमालयन डायमंड’ कहा जाता है. समुद्र तल से करीब 13,000 फीट की ऊंचाई पर उगने वाला यह फूल रोज-रोज नजर नहीं आता. ये जमा देने वाली ठंड को 7 से 15 साल तक सहता है और अपनी पूरी जिंदगी में सिर्फ एक ही बार खिलता है. पहाड़ों में ट्रेकिंग करने वालों के लिए इस खिलते हुए फूल को देखना किसी बहुत बड़े सौभाग्य से कम नहीं होता.

    ‘केनजो’ या ‘पदमचाल’ कैसे खिलता है?

    स्थानीय लोग इस अनोखे पौधे को ‘केनजो’ या ‘पदमचाल’ कहते हैं. यह आम रंग-बिरंगे जंगली फूलों जैसा बिल्कुल नहीं दिखता. पहाड़ों के पथरीले ढलानों और ग्लेशियरों के पास उगने वाला ये पौधा बेहद सब्र वाला है.

    ये रातों-रात या हर मौसम में नहीं उगता. इसे खिलने में 7 से 15 साल का लंबा वक्त लगता है. इतने सालों तक ये पौधा बर्फीली चट्टानों में खुद को बचाकर रखता है, फिर अपनी जिंदगी में केवल एक बार खिलता है. जैसे ही फूल खिलता है, ये अपने बीज हवा में बिखेर देता है और फिर इसका जीवन खत्म हो जाता है.

    इसे क्यों कहते हैं ‘हिमालयन डायमंड’?

    • गजब की ताकत: हीरा दुनिया की सबसे सख्त चीज मानी जाती है. ठीक वैसे ही ये फूल धरती के सबसे कठिन मौसम में मुस्कुराता है. इतनी ऊंचाई पर जहां ऑक्सीजन 40 फीसदी तक कम होती है और हाड़-कांपने वाली हवाएं चलती हैं, वहां यह सीना ताने खड़ा रहता है.
    • कुदरती शील्ड: इस फूल के चारों तरफ पारदर्शी पत्तियों की एक परत होती है. ये धूप की गर्मी को अंदर सोख लेती है और बर्फीली हवाओं को रोकती है. बर्फ के बीच जब धूप इस पर पड़ती है तो ये बिल्कुल हीरे की तरह जगमगाता है.

    अगर आप इस अजूबे को अपनी आंखों से देखना चाहते हैं तो जुलाई के अंत से सितंबर की शुरुआत का समय सबसे अच्छा माना जाता है. मानसून में जब पहाड़ियों पर हल्की बारिश और धुंध होती है, तब ये पौधे खिलते हैं.

    कहां-कहा पाया जाता है ये रहस्यमयी फूल?

    1. वैली ऑफ फ्लावर्स (उत्तराखंड): यूनेस्को की इस विश्व धरोहर में जुलाई और अगस्त के महीने में यह दुर्लभ पौधा देखा जा सकता है.
    2. हेमकुंड साहिब और गंगोत्री: हेमकुंड के कठिन रास्तों और गोमुख-तपोवन की घाटियों में जहां का मौसम बेहद सख्त होता है, वहां ये केनजो उगता है.
    3. नॉर्थ सिक्किम: लाचेन, लाचुंग और जीरो पॉइंट जैसे बेहद ऊंचे इलाकों में भी इसके खिलने की खबरें आती हैं.
    4. भूटान का हिमालय: हाल ही में माउंट जोमोलहारी के बेस कैंप (4,300 मीटर) पर वैज्ञानिकों ने इसकी शानदार तस्वीरें ली हैं.

    आयुर्वेद का अनोखा खजाना

    हिमालय के वैद्यों और स्थानीय लोगों के लिए ये पौधा किसी वरदान से कम नहीं है. सदियों से इसका इस्तेमाल जड़ी-बूटी के रूप में होता आ रहा है.

    • हड्डियों के फ्रैक्चर और गहरे जख्मों को भरने में
    • सिरदर्द और शरीर की सूजन कम करने में
    • पेट दर्द और बदहजमी से राहत दिलाने में
    • खतरे में है ‘हिमालयन डायमंड’

    ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते तापमान की वजह से ऊंचे पहाड़ों का बर्फीला माहौल बदल रहा है. इस वजह से ‘हिमालयन डायमंड’ के उगने की जगहें लगातार कम हो रही हैं. इसलिए पर्यावरण विशेषज्ञ पर्यटकों से अपील करते हैं कि अगर वो इस दुर्लभ फूल को देखें तो इसे सिर्फ दूर से निहारें. इसे तोड़ने या नुकसान पहुंचाने की भूल बिल्कुल न करें, क्योंकि इसे उगने में कई साल लगते हैं.

  • पूरी बिल्डिंग में सिर्फ एक किराएदार! 126 फ्लैटों के बीच अकेले रहने की जिद, वजह बेहद दिलचस्प..​​​​

    पूरी बिल्डिंग में सिर्फ एक किराएदार! 126 फ्लैटों के बीच अकेले रहने की जिद, वजह बेहद दिलचस्प..​​​​

    पूरी बिल्डिंग में सिर्फ एक किराएदार! 126 फ्लैटों के बीच अकेले रहने की जिद, वजह बेहद दिलचस्प..​​​​

    जब किसी हंसते-खेलते मोहल्ले से लोग धीरे-धीरे जाने लगते हैं और पूरी इमारत खाली हो जाती है, तो वहां का सन्नाटा भी इंसान को डराने लगता है. लेकिन ब्रिटेन के ग्रेटर मैनचेस्टर में स्थित रोचडेल के लोअर फालिंगे इलाके में 126 खाली पड़े फ्लैट्स की पूरी इमारत में सिर्फ एक अकेला परिवार रहता है. इतना ही नहीं, वो अपने इस घर को खाली भी नहीं करना चाहते हैं. इस परिवार के प्रमुख 51 साल के एंडी रोश हैं. प्रशासन इस पूरी जगह को जमींदोज करने की तैयारी में है, लेकिन एंडी अपने 28 साल पुराने आशियाने को छोड़कर कहीं भी जाने को तैयार नहीं हैं. बता दें कि जिस जगह पर एंडी रोश अपनी पार्टनर के साथ रहते हैं, उसके आसपास 1960 के दशक की छह बड़ी टावर ब्लॉक इमारतें मौजूद हैं. प्रशासन ने इन सभी इमारतों को खाली कराकर उनके दरवाजों और खिड़कियों पर प्लाइवुड के बड़े-बड़े तख्ते ठोक दिए हैं.

    रोचडेल बरोवाइडे हाउसिंग (RBH) नाम की हाउसिंग संस्था इस जर्जर हो चुकी जगह को बुलडोजर से गिराकर यहां 270 नए घर बनाना चाहती है. लेकिन लगभग 50 हजार रुपए महीने वाले इस किराए के फ्लैट में पिछले 28 सालों से रह रहे एंडी ने अपना घर खाली करने से साफ मना कर दिया है. एंडी का कहना है कि वे बचपन से इसी इलाके में रहे हैं और उन्हें यहां का हरा-भरा माहौल बहुत पसंद है. हालांकि, समस्या सिर्फ घर न छोड़ने की नहीं है, बल्कि एंडी और उनकी पार्टनर दोनों ऑटिज्म से जूझ रहे हैं. ऑटिस्टिक होने के कारण उन्हें तेज आवाज, अजीब महक और तेज रोशनी से बहुत ज्यादा परेशानी होती है. एंडी का आरोप है कि RBH उनकी इन खास जरूरतों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर रहा है. संस्था ने उन्हें जो नए मकान ऑफर किए हैं, वे या तो किसी शराबखाने के बगल में हैं या फिर किसी शोर-शराबे वाली फैक्ट्री के पास, जहां रहना उनके लिए नामुमकिन है. उन्होंने प्रशासन को अपनी जरूरतों की एक पूरी लिस्ट दी थी, लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है.

    एक बिल्कुल सुनसान और खाली पड़ी विशाल इमारत में अकेले रहना एंडी और उनकी पार्टनर के लिए किसी बुरे सपने जैसा बन गया है. आसपास के सभी पड़ोसी फ्लैट्स खाली होने के कारण वहां हीटिंग बंद पड़ी है, जिससे कड़ाके की ठंड में उनका अपना घर भी बर्फ की तरह ठंडा हो जाता है. इसके अलावा, खाली पड़े इलाके में अपराधियों और चोरों का डर भी बना रहता है. एंडी बताते हैं कि जब भी बाहर से किसी गाड़ी या इंसान की आवाज आती है, तो दिल दहल जाता है कि कहीं बुलडोजर इमारत गिराने तो नहीं आ गया. जब भी उनके लेटरबॉक्स में कोई चिट्ठी गिरती है, तो उन्हें लगता है कि यह कोर्ट से बेदखली का नोटिस होगा. प्रशासन से लगातार मिल रहे कानूनी नोटिसों ने एंडी को तोड़कर रख दिया है. उन्होंने रोते हुए बताया कि यह स्थिति उनके लिए इतनी ज्यादा तनावपूर्ण है कि इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता, यह उनके लिए जिंदगी और मौत की लड़ाई बन चुकी है.

    वहीं, पास के इलाकों में रहने वाले पड़ोसी भी इस स्थिति से हैरान हैं. एक स्थानीय महिला ने ब्रिटेन में चल रहे हाउसिंग संकट पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब देश में घर ढूंढने की इतनी बड़ी किल्लत है, तो इतनी बड़ी-बड़ी इमारतों को खाली कराकर गिराने के बजाय लोगों को रहने के लिए क्यों नहीं दिया जा रहा. दूसरी तरफ, RBH के प्रवक्ता का कहना है कि ये 1960 की बनी जर्जर इमारतें अब अपनी उम्र पूरी कर चुकी हैं और इंसानों के रहने के लिए सुरक्षित नहीं हैं. उन्होंने दावा किया कि वे जून 2025 से लेकर अब तक एंडी को 5 अलग-अलग जगहों पर नए घर ऑफर कर चुके हैं. संस्था का कहना है कि वे एंडी और उनकी पार्टनर की मदद करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं और उन्हें नया घर ढूंढने में पूरी आर्थिक और व्यावहारिक मदद देंगे. लेकिन फिलहाल, एंडी रोश ब्रिटेन के सबसे अकेले किराएदार बनकर बुलडोजर के खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं.

  • ब्रेकअप के बाद भी नहीं छूटा EX का मोह! उसे वापस पाने के लिए महिलाएं खर्च कर रहीं लाखों रुपये..​​​​

    ब्रेकअप के बाद भी नहीं छूटा EX का मोह! उसे वापस पाने के लिए महिलाएं खर्च कर रहीं लाखों रुपये..​​​​

    ब्रेकअप के बाद भी नहीं छूटा EX का मोह! उसे वापस पाने के लिए महिलाएं खर्च कर रहीं लाखों रुपये..​​​​

    ब्रेकअप के बाद अक्सर लोग दोस्तों का सहारा लेते हैं या वक्त के साथ आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं. लेकिन चीन में कई महिलाएं टूटे रिश्ते को दोबारा जोड़ने के लिए हजारों-लाखों रुपये खर्च कर रही हैं. सोशल मीडिया पर खुद को ‘रिलेशनशिप एक्सपर्ट’ बताने वाले लोग दावा करते हैं कि वे बिछड़े प्यार को वापस ला सकते हैं. दर्द में डूबी महिलाएं इन दावों पर भरोसा कर रही हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में उन्हें सिर्फ निराशा ही हाथ लग रही है.

    24 घंटे की कोचिंग के लिए फीस 42 हजार रुपए
    28 साल की महिला वान ने अपने एक्स-बॉयफ्रेंड को वापस पाने के लिए एक रिलेशनशिप कोच को 3,500 युआन (करीब 42 हजार रुपए) दिए. इसके बदले उसे एक महीने की 24 घंटे की कोचिंग मिली. शुरुआत में 90 मिनट की मुफ्त कॉल पर कोच ने कहा कि रिश्ता इसलिए नहीं टूटा क्योंकि उसका पार्टनर प्यार नहीं करता था, बल्कि उसकी असुरक्षा रिश्ते पर भारी पड़ गई.

    21 दिन तक एक्स से बात नहीं
    कोच ने वान को 21 दिन तक एक्स से बिल्कुल कॉन्टैक्ट न करने की सलाह दी. साथ ही लुक बदलने, सोशल मीडिया पर खुश, बेहतर जिंदगी दिखाने और दोबारा बात शुरू करने के खास तरीके भी सिखाए. दावा किया गया कि अगर वो ये सब मानेगी तो उसक एक्स वपस आ सकता है.

    नतीजा उल्टा निकला, एक्स ने कर दिया ब्लॉक
    वान ने पूरी सलाह मानी, लेकिन उसका एक्स उसे चैट ऐप पर ब्लॉक कर गया. जब उसने 90% सफलता वाले दावे पर सवाल किया तो उसे और महंगा पैकेज खरीदने का सुझाव दिया गया, जिसकी कीमत 9,800 युआन (करीब 1.17 लाख रुपए) थी.

    टूटे दिल को बिजनेस का जरिया बना रहे लोग
    चीन के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर #getbacktogether और #datingskills जैसे हैशटैग अरबों बार देखे जा चुके हैं. इससे साफ है कि ब्रेकअप के बाद लोग जल्दी समाधान चाहते हैं और यही कमजोरी कई कंपनियों के लिए कमाई का जरिया बन गई है. कुछ महिलाएं तो अपने रिश्ते को बचाने के लिए 20 हजार युआन (करीब 2.4 लाख रुपए) तक खर्च कर चुकी हैं.

  • बच्चे ने चुराया पिता का सीक्रेट! 25 सेकंड में निकल गई मां की जान..​​​​

    बच्चे ने चुराया पिता का सीक्रेट! 25 सेकंड में निकल गई मां की जान..​​​​

    बच्चे ने चुराया पिता का सीक्रेट! 25 सेकंड में निकल गई मां की जान..​​​​

    कहते हैं कि बच्चे अपने माता-पिता की हर हरकत की नकल करते हैं. वे देखकर सीखते हैं. खेल-खेल में भी यही होता है. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक दिल दहला देने वाली घटना शेयर की गई. इसमें एक छोटे बच्चे ने अपने पिता की लुकाछिपी वाली सीक्रेट जगह जान ली. फिर उसी की नकल करके वह इतनी अच्छी तरह छिप गया कि घरवाले उसे ढूंढ ही नहीं पाए.

    इस दौरान सिर्फ 25 सेकंड में मां की जान निकल गई. पूरा परिवार सदमे में था. वीडियो या पोस्ट में बताया गया कि पिता अक्सर दरवाजे के पीछे छिपते थे. यह उनकी पसंदीदा जगह थी. बच्चा इसे देखता रहा और एक दिन खुद उसी जगह छिप गया. जब खेल शुरू हुआ तो परिवार वाले घर भर में ढूंढने लगे. लेकिन बच्चा नजर नहीं आया. मां की चिंता तेजी से बढ़ी. घबराहट में उनकी हालत बिगड़ गई. पिता भी उसे ढूंढने लगा लेकिन बाद में बच्चा सुरक्षित मिल गया.

    लुका-छिपी पड़ी महंगी
    यह घटना याद दिलाती है कि बच्चों के खेल कितने सहज और निर्दोष लगते हैं लेकिन कभी-कभी अनजाने में बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं. लुकाछिपी जैसे पारंपरिक खेल पीढ़ियों से खेले जाते रहे हैं. वे बच्चों में छिपने, ढूंढने और धैर्य की आदत डालते हैं. लेकिन घर के अंदर या आसपास खतरनाक जगहों पर छिपना घातक हो सकता है. फ्रिज, वॉशिंग मशीन, ट्रंक, पानी की टंकी या बंद कमरों में छिपने से कई दुखद घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं. माता-पिता को बच्चों की निगरानी हमेशा रखनी चाहिए. खेल के दौरान घर के हर कोने की जांच करें। खासकर छोटे बच्चों के साथ कभी अकेला ना छोड़ें. दरवाजे के पीछे या तंग जगहों को सीक्रेट स्पॉट ना बनाएं. बच्चों को सिखाएं कि सुरक्षित जगहों पर ही छिपें जहां हवा आती-जाती रहे और आसानी से खोला जा सके.

    अक्सर होते हैं हादसे
    इस तरह की घटनाओं से मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा असर पड़ता है. अचानक बच्चे के गायब होने का सदमा माता-पिता को पैनिक अटैक या हार्ट अटैक तक पहुंचा सकता है. खासकर अगर पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या हो तो. 25 सेकंड का समय बहुत कम लगता है लेकिन घबराहट में शरीर का रिएक्शन तेजी से बिगड़ सकता है. इसलिए शांत रहना और व्यवस्थित तरीके से ढूंढना जरूरी है. घर में बच्चों की सुरक्षा के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं. खतरनाक जगहों को लॉक रखें. बड़े फर्नीचर या दरवाजों के पीछे की जगहें बंद करें. खेल शुरू करने से पहले नियम बना लें कि कहां छिप सकते हैं और कहां नहीं. अगर बच्चा लंबे समय तक ना मिले तो तुरंत मदद लें. पड़ोसियों या पुलिस को सूचित करें।

     
  • आप भी मेहनत करते हैं, फिर भी दूसरे निकल जाते हैं आगे? Psychology बताती है असली वजह..​​​​

    आप भी मेहनत करते हैं, फिर भी दूसरे निकल जाते हैं आगे? Psychology बताती है असली वजह..​​​​

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    क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर एक जैसे हालात में क्यों कुछ लोग जल्दी सफल हो जाते हैं? जबकि कुछ लोग बार-बार मेहनत करने के बाद भी पीछे रह जाते हैं… साइकोलॉजी कहती है कि इसकी एक बड़ी वजह हमारी सोच और भरोसा हो सकता है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इंसान को सिर्फ वह नहीं मिलता जो वह चाहता है, बल्कि वह अपने भरोसे से लिए फैसले और उसी दिशा में उठाए कदम को हासिल करता है. यही वजह है कि पॉजिटिव सोच के साथ खुद पर भरोसा रखना बहुत जरूरी माना जाता है.

    कहते हैं जो लोग मानते हैं कि वे अपनी मानसिक स्थिति को बेहतर बना सकते हैं, उनमें खुश रहने और तनाव से बेहतर तरीके से निपटने के चांस ज्यादा होते हैं. यानी बदलाव की शुरुआत इस भरोसे से होती है कि आप बदलाव ला सकते हैं.

    किन चीज़ों पर दिमाग देगा ध्यान

    एक्सपर्ट्स बताते हैं कि हमारा दिमाग हर समय आसपास की सभी चीजों पर ध्यान नहीं देता. वह उन्हीं बातों और मौकों को ज्यादा पहचानता है, जिन पर हमारा भरोसा और फोकस होता है. इसलिए अगर आप खुद को काबिल मानते हैं, तो आपको मौके भी ज्यादा दिखाई देने लगते हैं.

    नेगेटिव सोच भी डालती है असर

    जिस तरह अच्छी उम्मीदें हमें आगे बढ़ा सकती हैं, उसी तरह लगातार नेगेटिव सोच भी नुकसान पहुंचा सकती है. अगर कोई व्यक्ति पहले से मान ले कि वह सफल नहीं होगा, तो उसका कॉन्फिडेंस और कोशिश दोनों कमजोर पड़ सकते हैं.

    खुद पर भरोसा रखना है जरूरी

    साइकोलॉजी के अनुसार, जब इंसान अपनी काबिलियत पर भरोसा करता है, तो वह नए मौके अपनाने, मेहनत करने और मुश्किल समय में भी डटे रहने की कोशिश करता है. उसकी यही आदत लंबे समय में सफलता की संभावना बढ़ाती है.

    सिर्फ सोच ही काफी नहीं

    पॉजिटिव सोच का मतलब यह नहीं कि बिना मेहनत किए सब कुछ मिल जाएगा. सही सोच तभी असर दिखाती है, जब उसके साथ लगातार मेहनत, सही फैसले और पेशेंस भी जुड़ा हो. केवल इच्छा करने से नहीं, बल्कि उस दिशा में कदम बढ़ाने से बदलाव आता है.

    अगर आप अपने लक्ष्य को हासिल करना चाहते हैं, तो सबसे पहले खुद पर भरोसा करना सीखें. अपनी कमजोरियों की जगह अपनी काबिलियत पर ध्यान दें और रोज छोटे-छोटे कदम उठाएं. आपकी सोच आपके फैसलों को बदलती है, फैसले आपकी आदतों को और आदतें धीरे-धीरे आपकी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर सकती हैं.

  • फट गया या खो गया Driving License? मोबाइल से 2 मिनट में करें डाउनलोड, जानें सबसे आसान तरीक..?

    फट गया या खो गया Driving License? मोबाइल से 2 मिनट में करें डाउनलोड, जानें सबसे आसान तरीक..?

    फट गया या खो गया Driving License? मोबाइल से 2 मिनट में करें डाउनलोड, जानें सबसे आसान तरीक..?

    अगर आपका ड्राइविंग लाइसेंस फट गया है या खो गया है, तो नया बनवाने के लिए तुरंत RTO जाने की जरूरत नहीं है. सरकार ने ऐसे कई तरीके दिए हैं, जिनसे आप कुछ मिनटों में फोन पर ही डिजिटल DL डाउनलोड कर सकते हैं. ड्राइविंग लाइसेंस (DL) एक जरूरी डॉक्यूमेंट है, जिसके बिना आप वाहन नहीं चला सकते. लेकिन कई बार यह फट जाता है, इसकी छपाई हल्की पड़ जाती है या फिर यह कहीं खो जाता है. ऐसे में कैसे करेंगे आप इसे डाउनलोड.

    DigiLocker से करें डाउनलोड

    अगर आप डिजिटल ड्राइविंग लाइसेंस डाउनलोड करना चाहते हैं, तो DigiLocker सबसे आसान तरीका है. इसके लिए अपने फोन में DigiLocker ऐप डाउनलोड करें या इसकी वेबसाइट खोलकर अपने अकाउंट में लॉग-इन करें.

    इसके बाद सर्च बार में Driving License लिखकर खोजें. अब अपने राज्य के परिवहन विभाग को चुनें और अपना ड्राइविंग लाइसेंस नंबर दर्ज करें. कुछ ही सेकंड में आपका लाइसेंस DigiLocker अकाउंट में दिखाई देने लगेगा. इसे आप कभी भी डाउनलोड कर सकते हैं या जरूरत पड़ने पर सीधे फोन में दिखा सकते हैं.

    WhatsApp पर भी मिलेगा ड्राइविंग लाइसेंस

    अगर आप कोई ऐप डाउनलोड नहीं करना चाहते, तो WhatsApp के जरिए भी अपना ड्राइविंग लाइसेंस पा सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले 9013151515 नंबर अपने फोन में सेव करें और इस पर Hi या Hello भेजें. इसके बाद DigiLocker Services का विकल्प चुनें. OTP से पहचान की पुष्टि करने के बाद आपके DigiLocker में मौजूद सभी डॉक्यूमेंट दिखाई देंगे. यहां Driving License चुनते ही उसका PDF सीधे WhatsApp पर डाउनलोड किया जा सकता है.

    M.Parivahan ऐप से बनाएं डिजिटल DL

    सरकार का mParivahan ऐप भी ड्राइविंग लाइसेंस डाउनलोड करने का आसान तरीका है. ऐप इंस्टॉल करने के बाद लॉग-इन करें और Create Virtual DL विकल्प पर जाएं. अब अपना ड्राइविंग लाइसेंस नंबर और जन्मतिथि भरें. इसके बाद आपकी स्क्रीन पर QR Code वाला डिजिटल ड्राइविंग लाइसेंस दिखाई देगा. इसे डाउनलोड करके आप बिना इंटरनेट के भी इस्तेमाल कर सकते हैं.