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  • जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    मुगल बादशाह अकबर और बीरबल.

    मुगल बादशाह अकबर के दरबार में कई विद्वान थे. इन लोगों को बाद में अकबर के नवरत्न कहा गया. इन नवरत्नों में बीरबल का नाम सबसे अलग दिखाई देता है. बीरबल केवल एक दरबारी नहीं थे. वह अकबर के करीबी दोस्त थे. कवि थे. बुद्धिमान सलाहकार थे. हाजिर-जवाब इंसान थे. अकबर को उनकी बातें बहुत पसंद थीं. बीरबल का असली नाम महेश दास था. उनका जन्म उत्तर भारत के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके जन्म-स्थान को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत मिलते हैं. कुछ लोग उन्हें कालपी का रहने वाला मानते हैं. कुछ स्रोत उन्हें कन्नौज या आसपास के क्षेत्र से जोड़ते हैं. महेश दास को बचपन से ही कविता और भाषा में रुचि थी. वह संस्कृत, हिंदी और फारसी का अच्छा ज्ञान रखते थे. उनकी बातों में सरलता थी. उनकी समझ बहुत तेज थी. भारत में अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में मनाने का चलन है.

    आइए, मित्रता दिवस के बहाने अकबर-बीरबल की दोस्ती की कहानियां जानते-समझते हैं? यह भी जानेंगे कि कैसे एक कवि बादशाह अकबर का न केवल दरबारी बना बल्कि नवरत्नों में शामिल हुआ और फिर दोनों गहरे दोस्त हो गए.

    पहली मुलाकात ने बदल दी जिंदगी

    कहा जाता है कि महेश दास की मुलाकात अकबर से तब हुई, जब वह दरबार में अपनी कविता सुनाने पहुंचे थे. उनकी कविता से अकबर बहुत प्रभावित हुए. अकबर उस समय ऐसे लोगों की तलाश में रहते थे, जो केवल उनकी प्रशंसा न करें. वह चाहते थे कि उनके आसपास समझदार और सच बोलने वाले लोग रहें. महेश दास ने अपनी बात बहुत आत्मविश्वास से रखी. उनकी भाषा में मिठास थी. उनकी बुद्धि में गहराई थी. अकबर ने उन्हें अपने दरबार में रख लिया. कुछ समय बाद अकबर ने उन्हें कविराय की उपाधि दी. बाद में वह राजा बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुए. माना जाता है कि बीरबल नाम अकबर ने ही उन्हें दिया था.

    बीरबल का असली नाम महेश दास था.

    दोस्ती की असली वजह क्या थी?

    अकबर और बीरबल की दोस्ती केवल मजाक और हंसी पर आधारित नहीं थी. इसके पीछे कई बड़ी वजहें थीं. बीरबल अकबर को सही सलाह देते थे. वह कठिन सवालों का आसान जवाब खोज लेते थे. वह बिना डरे बादशाह की गलतियों की ओर भी इशारा कर देते थे. अकबर को बीरबल की यही बात सबसे अच्छी लगती थी. दरबार में बहुत से लोग बादशाह की बात पर तुरंत सहमति जता देते थे. बीरबल ऐसा नहीं करते थे. वह अकबर का सम्मान करते थे. लेकिन जरूरत पड़ने पर असहमति भी जताते थे. यही वजह थी कि अकबर उन्हें केवल दरबारी नहीं, बल्कि दोस्त मानते थे.

    लाजवाब थी बीरबल की हाजिर-जवाबी

    बीरबल की सबसे बड़ी ताकत उनकी हाजिर-जवाबी थी. वह किसी भी परिस्थिति में शांत रहते थे. सामने चाहे बादशाह हों या कोई बड़ा सेनापति, वह अपनी बात समझदारी से रखते थे. एक प्रसिद्ध कथा में अकबर ने बीरबल से पूछा-दुनिया में सबसे ज्यादा कौवे कहां हैं? बीरबल ने तुरंत जवाब दिया-जहांपनाह, आपके राज्य में. अकबर ने पूछा-अगर कौवों की संख्या इससे कम निकली तो? बीरबल बोले-तो कुछ कौवे अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गए होंगे. अकबर ने फिर पूछा-अगर संख्या ज्यादा निकली तो? बीरबल ने कहा-तो दूसरे राज्यों के कौवे यहां मेहमान बनकर आए होंगे. यह लोककथा है. इसका पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन यह बीरबल की तेज बुद्धि और हास्यबोध को दिखाती है.

    बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी

    बीरबल और अकबर से जुड़ी एक और बहुत प्रसिद्ध कहानी है. इसमें एक गरीब आदमी ठंडे पानी में खड़े होकर इनाम पाने की कोशिश करता है. गरीब आदमी कहता है कि वह केवल दूर जल रहे दीपक को देखकर ठंडे पानी में खड़ा रहा. अकबर को लगता है कि दीपक की गर्मी से उसे सहारा मिला होगा. इसलिए वह उसे इनाम नहीं देते. बीरबल इस फैसले से दुखी होते हैं. अगले दिन वह दरबार में नहीं आते. अकबर उनके बारे में पूछते हैं. बीरबल संदेश भेजते हैं कि खिचड़ी पक रही है. लेकिन हांडी आग से बहुत दूर टंगी है. अकबर समझ जाते हैं कि इतनी दूर रखी हांडी में खिचड़ी नहीं पक सकती. तब बीरबल कहते हैं-अगर दूर का दीपक गरीब आदमी को गर्मी दे सकता है, तो दूर की आग खिचड़ी भी पका सकती है. अकबर को अपनी गलती समझ आती है. वह गरीब आदमी को उसका इनाम दे देते हैं. यह कहानी भी लोक प्रचलित है. इसका उद्देश्य न्याय और तर्क की बात समझाना है.

    जब बीरबल ने बादशाह को आईना दिखाया

    बीरबल अकबर की गलतियों पर सीधे हमला नहीं करते थे. वह अपनी बात कहानी या मजाक के जरिए कहते थे. एक कथा के अनुसार, अकबर ने कभी कहा कि उनके राज्य में सभी लोग बहुत समझदार हैं. बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि यह बात तभी साबित होगी, जब लोग बिना सोचे बादशाह की हर बात को सही न मानें. अकबर ने पूछा-क्या तुम मेरी बात को गलत कह रहे हो? बीरबल ने उत्तर दिया-मैं आपकी बात को गलत नहीं कह रहा. मैं केवल यह कह रहा हूं कि समझदार लोग सवाल भी पूछते हैं. अकबर को यह जवाब पसंद आया. वह जानते थे कि बीरबल उनका अपमान नहीं कर रहे. वह उन्हें बेहतर शासक बनने में मदद कर रहे हैं.

    धर्म और अकबर की समझदारी

    अकबर के शासनकाल में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते थे. अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाने की कोशिश की. बीरबल भी इस माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे. बीरबल हिंदू धर्म से जुड़े थे. फिर भी वह मुगल दरबार में सम्मानित थे. अकबर उनकी धार्मिक पहचान का सम्मान करते थे. कहा जाता है कि बीरबल ने कई बार अकबर को समझाया कि किसी भी धर्म या समुदाय के बारे में फैसला करने से पहले उसके विचारों को समझना जरूरी है. अकबर के धार्मिक विचारों में समय के साथ बदलाव आया. वह अलग-अलग धर्मों के विद्वानों से चर्चा करते थे. बीरबल भी ऐसे संवादों में शामिल रहते थे.

    नवरत्नों में बीरबल का स्थान

    अकबर के दरबार में अबुल फजल, फैजी, तानसेन, राजा टोडरमल, राजा मान सिंह और अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे महान लोग थे. इन लोगों को लोकप्रिय रूप से अकबर के नवरत्न कहा जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि नवरत्न की यह सूची बाद की परंपराओं में अधिक प्रसिद्ध हुई. अकबर के समय सभी नौ लोगों की एक आधिकारिक सूची का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. फिर भी बीरबल का महत्व इसमें कम नहीं होता. वह अकबर के भरोसेमंद सलाहकार थे. वह सैनिक अभियानों में भी शामिल हुए. उन्हें ऊंचा पद मिला. उनकी पहचान एक प्रभावशाली दरबारी के रूप में बनी.

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    बीरबल की मृत्यु और अकबर का दुख

    बीरबल की मृत्यु वर्ष 1586 में हुई. वह उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में एक सैन्य अभियान पर गए थे. यह अभियान यूसुफजई कबीलों के खिलाफ था. युद्ध में बीरबल और उनके साथ बड़ी संख्या में सैनिक मारे गए. यह अकबर के शासनकाल की बड़ी सैन्य त्रासदियों में से एक थी. इतिहास में यह भी मिलता है कि अकबर को बीरबल की मृत्यु से गहरा दुख हुआ. बीरबल उनके सबसे करीबी लोगों में थे. दरबार में उनकी जगह कोई आसानी से नहीं ले सका. उनकी मृत्यु के बाद अकबर के जीवन से हंसी का एक बड़ा स्रोत चला गया. बीरबल के साथ अकबर को केवल एक मंत्री नहीं, बल्कि अपना सच्चा मित्र खोना पड़ा.

    क्यों लोकप्रिय हैं बीरबल की कहानियां?

    बीरबल की कहानियां बच्चों और बड़ों दोनों को पसंद आती हैं. इनमें मनोरंजन भी है और सीख भी. इन कहानियों में बीरबल कमजोर व्यक्ति की मदद करते हैं. वह लालची लोगों को सबक सिखाते हैं. झूठे लोगों का पर्दाफाश करते हैं. वह अकबर को भी तर्क के जरिए समझाते हैं. इनमें से कई कहानियां लोककथाएं हैं. उन्हें इतिहास का पक्का दस्तावेज नहीं माना जा सकता. फिर भी वे बीरबल की लोकप्रिय छवि को समझने में मदद करती हैं. बीरबल की असली महानता उनकी बुद्धि में थी. उन्होंने साबित किया कि दरबार में स्थान केवल ताकत से नहीं मिलता. ज्ञान, विनम्रता और सही समय पर सही बात कहने की क्षमता भी बहुत जरूरी होती है. अकबर और बीरबल की दोस्ती इसी विश्वास पर टिकी थी. एक बादशाह था. दूसरा उसका समझदार सलाहकार, लेकिन दोनों के बीच रिश्ता दोस्ती का था. यही वजह है कि सैकड़ों साल बाद भी बीरबल और अकबर की जोड़ी लोगों के दिलों में जिंदा है.

  • इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऑफिस का काम हो, ई-मेल लिखना हो या कोई आइडिया सोचना हो, हर जगह लोग धड़ल्ले से AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से सोशल मीडिया पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसके बारे में जानकर हर कोई दंग रह गया है. दरअसल, यहां एक शख्स ने अपनी लव लाइफ को ही ऑटोमेट कर दिया. जब इस बात का खुलासा हुआ, तो उसकी गर्लफ्रेंड ने फौरन ब्रेकअप कर लिया. आइए जानते हैं इस दिलचस्प कहानी के बारे में.

    क्या है पूरा मामला?

    यह अनोखी लव स्टोरी X (पहले ट्विटर) पर डेलिया लाजारेस्कु (Delia Lazarescu ) नाम की एक यूजर की पोस्ट के जरिए वायरल हुई. सैन फ्रांसिस्को की एक महिला को लंबे समय तक यह लगता रहा कि उसका बॉयफ्रेंड उससे बेपनाह मोहब्बत करता है. वह उसकी दिन भर परवाह करता है. हर पल प्यारे-प्यारे मैसेज भेजता है. लेकिन जब इसके पीछे का सच सामने आया, तो महिला के पैरों तले मानो जमीन खिसक गई. असल में महिला जिससे हर दिन बातें कर रही थी, वो कोई इंसान नहीं बल्कि एक AI चैटबॉट था.

    AI चैटबॉट संभाल रहा था रिश्ते की हर जिम्मेदारी

    वायरल दावे के अनुसार, शख्स ने अपने इस रिलेशनशिप के लगभग सारे काम AI चैटबॉट को सौंप रखे थे. गुड मॉर्निंग मैसेज से लेकर दिनभर हालचाल पूछने तक, सब कुछ AI चैटबॉट ही करता था. यहां तक कि छोटी-मोटी बहस के दौरान क्या जवाब देना है, यह भी AI चैटबॉट ही तय करता था. डिनर डेट और घूमने-फिरने की प्लानिंग भी शख्स ने ऑटोमेट कर रखा था. यानी महिला जिसे सच्ची मोहब्बत समझ रही थी, असल में वह कोडिंग और एल्गोरिदम था. यह भी पढ़ें:Viral Video: तोहफा हो तो ऐसा! AI लव स्टोरी देखकर छलके दुल्हन के आंसू; देखें ये वायरल वीडियो

    इंटरनेट पर लोगों के मजेदार रिएक्शन

    इस अजब प्रेम की गजब कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई. एक यूजर ने मजाकिया लहजे में लिखा, भाई ने अपनी पूरी लव लाइफ ही आउटसोर्स कर दी और अंत में ब्रेकअप का तोहफा मिल गया. दूसरे ने कहा कि इस शख्स ने हर चीज ऑटोमेट करने के आइडिया को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया था. यह भी पढ़ें: वो मेरी जिंदगी है 72 की बुजुर्ग महिला के प्यार में पागल हुआ 22 साल का लड़का, रचा ली शादी; चर्चा में अजब प्रेम की गजब कहानी

    Disclaimer: यह खबर वायरल सोशल मीडिया पोस्ट और नेटिजन्स की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है.

  • इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद…

    इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद…

    इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद…

    बालाघाट. प्रकृति में कई ऐसे सवाल है, जिसका जवाब मिलना मुश्किल ही हो जाता है. ऐसे में हम उसे चमत्कार कहते हैं. एक ऐसा ही चमत्कार बालाघाट जिले के गढ़दा गांव की पहाड़ी पर देखने को मिलता है, जहां पर करीब चार किलोमीटर की चढ़ाई करने के बाद मां अन्नपूर्णा का धाम आता है. वहीं पर मां अन्नपूर्णा चट्टानों के बीज विराजित है. उसी विशाल चट्टान पर एक पेड़ है, जो काफी बड़ा है. ऐसे में उस पेड़ को देख लोग हैरान हो जाते हैं. वहीं, उस पेड़ की प्रजाति का है इसकी जानकारी बहुत नहीं थी. अब इस पेड़ को लेकर कई दावे किए जाते हैं.

    अब से कुछ साल पहले तक इस पेड़ की पहचान नहीं हो सकी थी. लेकिन काशी से कुछ लोग आए थे. ऐसे में उन्होंने बताया कि यह पेड़ की पहचान कल्पवृक्ष के रूप में किए थे. हालांकि, मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. यह वृक्ष भी काफी विशाल है.

    दुर्लभ प्रजाति का है ये पेड़
    बालाघाट जिला एक वना आधारित जिला है. यहां पर कई प्रकार और कई प्रजाति की वनस्पति है. ऐसे में ज्यादातर पेड़ों या वृक्षों की पहचान हो चुकी है. लेकिन कई ऐसे पेड़ है, जिसे स्थानीय लोग भी नहीं पहचान पाते हैं. ऐसे में इसे दुर्लभ माना जाता है. यह वृक्ष इतना विशाल है कि इसका अंदाजा लगाना कठिन है कि वह कितना बड़ा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस वृक्ष का क्षेत्रफल करीब 100 वर्ग फीट से भी ज्यादा है.

    जड़ नहीं दिखती पत्तियों में स्वाद नहीं
    मां अन्नापूर्णा धाम के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ को देख हैरानी होती है. दरअसल, यह विशाल वृक्ष सिर्फ चट्टान तक ही दिखता है. इसकी जड़ें भूमि में मिलती हुई प्रतीत नहीं होती है. ऐसे में यह एक रहस्य है, जहां कि दुर्लभ प्रजाति के पेड़ को पोषण कैसे मिलता है. जहां एक ओर जंगल के सारे पेड़ हमेशा से गर्मी में सुख जाते हैं. लेकिन यह वृक्ष साल भर हरा भरा रहता है. ऐसे में इस बात से भी लोग हैरान हो जाते हैं.

    इच्छा पूरी करने वाला है पेड़!
    मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह वृक्ष मनोकामनाएं पूरी करने वाला है. मां अन्नपूर्णा के गढ़दा धाम में प्रकट दिवस, नवरात्रि (शारदेय और चैत्र) में भक्तों की भारी भीड़ रहती है. ऐसे में आने वाले भक्त हमेशा अपनी मन्नत पूरी करने के लिए इस पेड़ मन्नत बांधते हैं. वहीं, मन्नत पूरी होने पर वह चुनरी भी छोड़ देते हैं. ऐसे में यहां नौकरी लगने से लेकर संतान प्राप्ति का कामना लेकर कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं और इस इच्छा पूरी करने वाले कल्प वृक्ष की अर्चना भी करते हैं.

    सेहत के लिए भी है फायदेमंद
    गढ़दा मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सहदेव अड़मे बताते हैं कि इसकी पत्तियों की सेवन से गैस की समस्या से राहत मिलती है. वहीं, मंदिर के पुजारी ने दावा किया कि इस वृक्ष की पत्तियों का चूर्ण बनाकर शहद के साथ सेवन करने से लकवा जैसी गंभीर बीमारी से राहत मिलती है. वहीं, इसकी पत्तियों के सेवन से ब्लड पेशर, गैस और पेट की बीमारियों से राहत मिल सकती है. लेकिन, लोकल 18 इन दावों की पुष्टि नहीं करता है.

    हालांकि, यह वृक्ष काफी विशाल है और दुर्लभ प्रजाति का जरूर है. ऐसे में चट्टान के ऊपर होना और जड़ का नजर न आना प्रकृति प्रेमियों में रोमांच उत्पन्न करता है.

  • जब मुगल शहज़ादियों से प्यार करना बना गुनाह… किसी को हाथी से रौंदा गया, किसी को जहर देकर मार डाला..

    जब मुगल शहज़ादियों से प्यार करना बना गुनाह… किसी को हाथी से रौंदा गया, किसी को जहर देकर मार डाला..

    जब मुगल शहज़ादियों से प्यार करना बना गुनाह… किसी को हाथी से रौंदा गया, किसी को जहर देकर मार डाला..

    मुगलों के हरम में सख़्त पाबंदियां थीं. आमतौर पर इन पर किन्नरों का पहरा था. फिर भी भीतर की कहानियां बाहर निकलती थीं. शहजादियों के प्रेम -प्रसंग खुसर-पुसुर और लुका-छिपी के बीच एक कान से दूसरे कान के बीच से गुजरते दूर तक उड़ान भर लेते थे. दरबारी इतिहासकारों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे इसे दर्ज करेंगे. लेकिन उस दौर में दरबार के नजदीक पहुंचे यूरोपीय यात्रियों और इतिहासकारों ने इसे कलमबंद किया. पकड़े जाने पर प्रेमियों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

    शहजादियों पर पहरा और कड़ा हुआ या कैद में डाली गईं. लेकिन अनेक शाहजादियां अविवाहित क्यों रहीं? असलियत में उनकी शादियों पर पाबंदी का चलन अकबर के समय शुरू हुआ, जिसकी सोच थी कि शाही परिवार में शादियां तख़्त के नए दावेदार खड़े कर समस्याएं बढ़ाएंगी. पढ़िए मुग़ल शहजादियों से जुड़े कुछ रोचक किस्से.

    तख़्त के दावेदारों से बचने के लिए शहजादियां रखीं गईं कुंवारी

    बाबर और हुमायूं के समय कुछ शहजादियों की शादियां मुगल दरबार के ऊंचे ओहदेदारों के साथ हुईं. लेकिन अकबर के समय से यह सिलसिला लगभग थम गया. इस रोक का मकसद सियासी माना जाता है. सोच थी कि मुगल खानदान से जुड़ने वाले दूसरे कुल के लोग शाही उत्तराधिकार के नए दावेदार के तौर पर न खड़े हो जाएं. दिलचस्प है कि इन शहजादियों को खूब धन-दौलत और नियमित आमदनी के लिए जागीरें सौंपी गईं.

    हरम की महिलाओं का बाग, दरगाह, या रिश्तेदारों के घर तक ही जाना होता था.

    ऊंचे खिताब दिए गए. उनकी बाहरी दुनिया चमक-दमक से रोशन थी लेकिन निजी जिंदगी अंधेरों से भरी और बेड़ियों से जकड़ी हुई थी. असलियत में शाही हरम के ठाठ-बाट बीच एक अलग दुनिया भी थी, जिसमें अनुशासन के नाम पर मन से रहने-जीने की गुंजाइश नहीं थी. अपनी मर्जी से शादी न करने का फैसला अलग मसला होता है. लेकिन जब यह पाबंदी पिता और परिवार की ओर से होती हैं , तो खतरों के बीच भी प्यार-मुहब्बत के अंकुर फूटते हैं.

    कई शहजादियों के साथ भी ऐसा ही हुआ है. बात अलग है कि इश्क-मुश्क छिपाये नहीं छिपता. वहां के खतरों का क्या कहना जहां यह बादशाह की बेटियों के साथ हो. भांडा जब भी फूटा तो आमतौर पर आशिकों ने जान देकर कीमत चुकाई. उधर शहजादियों पर बंदिशें और बढ़ीं. लेकिन तमाम रोक-टोक बीच यह सिलसिला चलता रहा.

    जहांआरा से मोहब्बत की सजा मौत

    मुगल इतिहास की शहजादियों में शाहजहां की बेटी जहांआरा बेगम का ऊंचा मुकाम है. मुमताज़ महल की मौत के बाद वही “पादशाह बेगम” बनी और पूरा हरम उसी के जिम्मे था. औरंगज़ेब द्वारा शाहजहां को बंदी बनाए जाने और फिर उसकी मौत तक जहांआरा पिता की खिदमत में रही. बाद में औरंगज़ेब ने भी उसे दरबार में ऊंचा दर्जा दिया. लेकिन शादी उसकी किस्मत में नहीं थी. बेहद जहीन जहांआरा खूब पढ़ती और लिखती थी. माना जाता है कि एक अत्यंत सुंदर एवं प्रभावशाली ईरानी अमीर नज़र ख़ां से उसका प्रेम प्रसंग चल रहा था. इसकी जानकारी मिलने पर शाहजहां कुपित हुआ.

    नज़र ख़ां को विष देकर मरवा दिया गया. फ्रांसीसी यात्री फ़्रांस्वा बर्नियर और इतालवी यात्री निकोलाओ मनुच्ची दोनों ही ने इसका उल्लेख किया है.अंग्रेज चिकित्सक गैब्रियल बॉटन से जुड़ा जहाँआरा का दूसरा प्रेम प्रसंग भी काफी चर्चित रहा है. हालांकि फारसी इतिहासकारों के ब्यौरों में उल्लेख न होने के कारण आधुनिक इतिहासकार इसकी प्रमाणिकता पर सवाल करते हैं.

    रोशनारा के इश्क का सिलसिला

    तख़्त की जंग में अगर जहांआरा बड़े भाई दारा के साथ थी तो उसकी बहन रोशन आरा छोटे भाई औरंगज़ेब के साथ. बादशाह बनने पर औरंगज़ेब ने रोशन आरा को मल्लिका-ए-जहां बनाया. इस हैसियत में रोशन आरा के खिलाफ तमाम शिकायतें थीं लेकिन औरंगज़ेब के सब्र का प्याला तब छलक गया, जब हरम में रोशन आरा के इश्क में गिरफ्तार मर्दों की आमद की जानकारी उस तक पहुंचीं. औरंगजेब ने खुद ही असलियत जानने का फैसला किया.

    शाही फ़ौज की एक टुकड़ी ने हरम से किसी के बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं छोड़ी. औरंगजेब हरम में पहुंचा और रोशनारा को अपने ईरानी आशिक के साथ पकड़ लिया. मल्लिका की बदनामी हरम से निकल दूर तक फैली. ईरानी को मौत की सजा हुई. असलियत में रोशन आरा का यह इश्क वालिद शाहजहां के वक्त से चल रहा था. वह आशिक नाना आसफजहां का दूर का रिश्तेदार था. शाहजहां को जब इसकी जानकारी हुई तो उसने रियायत की और सजा के तौर पर ईरानी को काबुल रवाना कर दिया था.

    औरंगज़ेब की बादशाहत के दौरान मजबूत होने पर रोशन आरा ने उस अमीर को वापस बुला लिया था. वालिद के वक्त में ही कम उम्र मे रोशन आरा दरबार के एक ऊंचे ओहदेदार अधिक उम्र के राजपूत अमीर पर फिदा हो गई थी. यह राजपूत मंसबदार शाहजहां की एक राजपूत बेगम के घराने का था. जागीर में वापस भेजकर शाहजहां ने उसे रोशनारा से दूर किया था.

    मुगल बादशाह औरंगजेब.

    बहन के बाद भतीजी की निगरानी में रोशन आरा

    वालिद के दौर में दोनों बहनों जहांआरा और रोशन आरा में दूरियां काफी बढ़ गई थीं. बड़ी बहन के अख्तियार से वह रोशन आरा को डांटती और टोकती रहती थी. उसकी हरकतों पर निगाह के लिए कई लड़कियां लगा दी थीं. औरंगजेब के यहां रोशन आरा के रास्ते में बहन का कांटा तो नहीं था लेकिन ईरानी आशिक के साथ पकड़े जाने के बाद

    औरंगजेब चौकन्ना था. उसने रोशन आरा की जासूसी की जिम्मेदारी अपनी बेटी जेबुन्निसा को सौंपी. उसने जो जानकारी जुटाई , उसके मुताबिक फूफी रोशनारा के एक-दो नहीं पूरे नौ आशिक हैं. वे समय-समय पर उससे मिलते रहते हैं. औरंगजेब ने रोशन आरा से सफाई मांगी. पलटवार में उसने जेबुन्निसा को ही कसूरवार ठहराया और अपने एक आशिक के जेबुन्निसा से नाजायज रिश्ते बताए. फिर ये आशिक पकड़े गए. काजी के सामने पेश किया गया.

    इन नौ में पांच जिनका गुनाह साबित हो गया था, उन्हें हनफ़ी कानून के तहत मौत की सजा दे दी गई. भारी फजीहत और बदनामी के चलते रोशन आरा ने जहर पीकर जान देने की नाकाम कोशिश की. उसके सारे शरीर में सूजन आ गई. हकीम, वैद्य और फिरंगी डॉक्टरों ने इस सूजन को धीमे जहर का असर बताया. जहाँआरा को शक था कि रोशन आरा ने जहर खुद नहीं पिया बल्कि यह औरंगज़ेब की करतूत थी.

    ज़ेबुन्निसा को मिली जेल

    औरंगज़ेब की बेहद खास बेटी ज़ेबुन्निसा फ़ारसी की शायरा थीं और “मख़्फ़ी” उपनाम शायरी करती थी. चर्चा थी कि उसका इश्क लाहौर के सूबेदार अक़ील ख़ां रज़ी से हुआ. दोनों के बीच शायरी का आदान-प्रदान भी होता था. रोशन आरा के दरबार से हटाए जाने के बाद एक बार फिर मल्लिका-ए-जहां बनी जहांआरा भी भतीजी के इस प्रेम प्रसंग से अनजान नहीं थी, पर उसने इस मसले पर चुप रहना बेहतर समझा. बात फिर भी औरंगज़ेब तक पहुंची और खूब गुस्सा हुआ.

    ज़ेबुन्निसा को उसने लंबे समय तक क़ैद में रखा. गुलबदन बेगम, सलीमा सुल्तान बेगम, ज़ीनत-उन-निसा आदि की प्रेम कथाएं भी चर्चा में रहीं. ऐसे प्रेम प्रसंगों का भांडा फूटने पर आशिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. किसी को जहर दिया गया तो किसी का गला घोंटा गया. कोई हाथी से कुचला गया तो कोई ऐसा गायब हुआ कि फिर कभी पता नहीं चला. खुशनसीब वे थे , जिनकी जान बची और सजा के तौर पर सिर्फ मुग़ल सल्तनत से दूर कहीं और भेज दिए गए.

  • “डॉक्टरों ने कहा था 1 साल से भी कम बचा है वक्त..”, जानिए कैसे दिया मौत को चकमा..

    “डॉक्टरों ने कहा था 1 साल से भी कम बचा है वक्त..”, जानिए कैसे दिया मौत को चकमा..

    “डॉक्टरों ने कहा था 1 साल से भी कम बचा है वक्त..”, जानिए कैसे दिया मौत को चकमा..

    वाशिंगटन. जीवन में जब इंसान को एक बार भी कैंसर जैसी घातक और खौफनाक बीमारी का सामना करना पड़ता है, तो उसकी पूरी दुनिया हिल जाती है. लेकिन अमेरिका के कंसास राज्य स्थित ओवरलैंड पार्क की रहने वाली 53 वर्षीय लिज बैंडिट की कहानी इंसान की अटूट इच्छाशक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जिसे सुनकर पूरी दुनिया हैरान है. लिज ने अपने जीवन में एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे छह बार कैंसर जैसे जानलेवा दुश्मन को पटकनी दी है. जब डॉक्टरों ने उनके पास महज एक साल का समय बचने की आशंका जताई थी, तब दो छोटे बच्चों की मां लिज ने हार मानने के बजाय हर बार मौत के मुंह से वापसी की और आज वे पूरी तरह स्वस्थ होकर हाफ मैराथन दौड़ रही हैं. लिज की यह खौफनाक यात्रा साल 2009 में शुरू हुई थी, जब वे 36 साल की थीं और दो छोटे बच्चों (3 साल की बेटी ईव और 1 साल के बेटे एलेक्स) की मां थीं.

    स्विमिंग पूल के पास टहलते समय उनकी मां की नजर लिज के पैर पर मौजूद एक अजीब तिल पर पड़ी. मां के बार-बार ज़िद करने पर जब लिज ने डर्मेटोलॉजिस्ट को दिखाया, तो रिपोर्ट में स्किन कैंसर यानी मेलानोमा की पुष्टि हुई. डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अगर यह कैंसर शरीर में फैल गया, तो उनके पास जीने के लिए एक साल से भी कम वक्त बचा है. दो मासूम बच्चों के सिर से मां का साया उठने का डर लिज के दिल में बैठ गया था, लेकिन पहली सर्जरी के जरिए उनका मेलानोमा ट्यूमर निकाल दिया गया. हालांकि, यह तो 15 साल लंबे दर्दनाक सिलसिले की महज शुरुआत थी. साल 2010 में लिज को थायरॉयड कैंसर हो गया, जिसके लिए उनकी सर्जरी कर थायरॉयड ग्रंथि हटानी पड़ी. इसके बाद 2015 में उनकी नाक पर बैसल सेल कार्सिनोमा का पता चला, जिससे उनकी चेहरे की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी करनी पड़ी.

    दुख का पहाड़ तब और टूट पड़ा जब 2017 में उनके बाएं ब्रेस्ट में कैंसर पाया गया, जिसके लिए 35 बार रेडिएशन थेरेपी और सर्जरी झेलनी पड़ी. हद तो तब हो गई जब 2023 में उनके दाहिने ब्रेस्ट में भी कैंसर की पुष्टि हुई और 2024 में एक बार फिर उनके पैर में मेलानोमा लौट आया. इतनी भयावह और बार-बार टूटने वाली परिस्थितियों के बावजूद लिज ने हिम्मत नहीं हारी. वे लगातार इलाज कराती रहीं और आखिरकार 2025 में डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह कैंसर-मुक्त घोषित कर दिया. छह बार मौत को चकमा देने के बाद लिज ने अपनी इस जीत का जश्न हाफ मैराथन दौड़कर मनाया. अपने दर्दनाक अनुभवों का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करते हुए लिज ने 2020 में द बाम बॉक्स नाम से एक कंपनी शुरू की, जो कैंसर मरीजों को उनके इलाज के हिसाब से जरूरी राहत सामग्री के केयर पैकेज बनाकर देती है. आज 53 साल की उम्र में लिज बेहद फिट हैं, हर हफ्ते अपने दोस्तों के साथ दौड़ती हैं और हर पल को खुशी-खुशी जी रही हैं.

  • अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन भील समुदाय के बीच बीता जो तीरंदाजी में माहिर थे.

    23 जुलाई 1906 को जन्मे और महज 24-25 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए. वे आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया. अंग्रेज उनसे थर-थर कांपते थे. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे. वे साहसी थे. तेज़ निर्णय लेते थे. अपने साथियों की सुरक्षा को बहुत महत्व देते थे. उनकी एक खास पहचान उनका सटीक निशाना भी था. ऐसे ही थे भारतीयों के रग-रग में बसे चंद्रशेखर आजाद.

    आइए, उनकी जन्म जयंती के बहाने जानते हैं कि वे निशानेबाजी में महारथ हासिल करने में कैसे कामयाब हुए? किस उम्र में पिस्टल-गोलियों से खेलने लगे?

    कम उम्र में ही पक्के निशानेबाज हो गए थे

    आज़ाद की निशानेबाजी केवल प्राकृतिक प्रतिभा नहीं थी. इसके पीछे बचपन का अभ्यास, मजबूत शरीर, धैर्य, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी. क्रांतिकारी जीवन में पिस्तौल उनके लिए शौक की वस्तु नहीं थी. वह आत्मरक्षा, साथी-सुरक्षा और संगठन की जिम्मेदारी का साधन थी.

    चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन मध्य भारत के भाबरा क्षेत्र में बीता. यह क्षेत्र वन, पहाड़ और आदिवासी जीवन से जुड़ा था. वहां भील समुदाय के लोग रहते थे. भील समुदाय को तीर-कमान चलाने की पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है. आज़ाद ने बचपन में भील बच्चों के साथ तीर चलाने का अभ्यास किया. यह अभ्यास उनके लिए बहुत उपयोगी बना. तीरंदाजी में आंख, हाथ और लक्ष्य के बीच सही तालमेल चाहिए होता है. निशाना लगाते समय सांस, शरीर और ध्यान को नियंत्रित रखना पड़ता है. यही गुण आगे चलकर पिस्तौल चलाने में भी उनके काम आए. तीर-कमान से मिला अभ्यास उनके हाथों की स्थिरता और नजर की एकाग्रता का आधार बना.

    क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद.

    इसलिए रखते थे पिस्तौल और गोलियां

    जब आज़ाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तब परिस्थितियां बदल गईं. अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष बहुत कठिन था. पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की तलाश में रहते थे. ऐसी स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी पड़ती थी. साथियों को सुरक्षित निकालना भी जरूरी होता था, इसलिए आज़ाद ने तीर-कमान के स्थान पर पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया. लेकिन इसे केवल हथियार रखने की कहानी नहीं मानना चाहिए. आज़ाद के लिए पिस्तौल जिम्मेदारी का प्रतीक थी. उन्हें कई बार संगठन के वरिष्ठ साथियों की रक्षा करनी होती थी. वे खतरे के समय पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनका उद्देश्य अंधाधुंध गोली चलाना नहीं था. वे परिस्थितियों को समझकर फैसला लेते थे. यही बात उन्हें सामान्य हथियारबंद व्यक्ति से अलग बनाती है.

    नियमित शारीरिक अभ्यास उनकी पहचान

    आज़ाद का शरीर बहुत मजबूत था. वे नियमित रूप से दंड-बैठक करते थे. उनका शरीर गठा हुआ था. उनकी मांसपेशियां मजबूत थीं. वे पेड़ों पर चढ़ने में भी कुशल थे. शारीरिक फिटनेस का निशानेबाजी से गहरा संबंध है. मजबूत शरीर का मतलब केवल ताकत नहीं होता. इसका अर्थ है बेहतर संतुलन. निशाना लगाते समय हाथ कांपना नहीं चाहिए. शरीर का नियंत्रण जरूरी है. तनाव में भी शरीर को स्थिर रखना पड़ता है. आज़ाद कठिन जीवन जीते थे. वे कम साधनों में रहते थे. कई बार जमीन पर अखबार बिछाकर सो जाते थे. फिर भी उनका अनुशासन नहीं टूटता था. यह अनुशासन उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता को मजबूत करता था.

    अपने मन पर जबरदस्त काबू रखते थे आजाद

    अच्छा निशानेबाज केवल अच्छी आंख वाला व्यक्ति नहीं होता. उसे डर और दबाव में भी शांत रहना पड़ता है. आज़ाद इस गुण के लिए प्रसिद्ध थे. वे लंबे समय तक अंग्रेज पुलिस से बचते रहे. वे लगातार अपना भेष बदलते. कभी व्यापारी तो कभी कुली बनते. कभी साधु का रूप धारण करते थे तो कभी अंग्रेज़ी पहनावे में दिखाई देते थे. इस जीवन में हर समय पकड़े जाने का खतरा था. ऐसी स्थिति में घबराहट स्वाभाविक थी, लेकिन आज़ाद में मानसिक संतुलन था. वे खतरे के बीच भी स्थिति को पढ़ते थे. वे समझते थे कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है और कब अपने साथी को बचाना है. यह मानसिक स्थिरता उनके निशाने को मजबूत बनाती थी.

    साथियों की सुरक्षा पहली जिम्मेदारी समझते थे आजाद

    चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष साथियों की सुरक्षा था. वे अक्सर अपने साथियों को बचाने के लिए पीछे रहते थे. उनका काम केवल हमला करना नहीं था. उनका पीछा कर रहे लोगों को रोकना भी था. लाहौर में सांडर्स की हत्या के बाद ऐसा ही एक प्रसंग सामने आता है. योजना में भगत सिंह और राजगुरु मुख्य भूमिका में थे. आज़ाद को पीछे से सुरक्षा देने की जिम्मेदारी मिली थी. घटना के बाद भगत सिंह और राजगुरु वहां से निकल रहे थे. हेड कॉन्स्टेबल चानन सिंह उनका पीछा कर रहा था. आज़ाद ने उसे रुकने की चेतावनी दी. जब उसने पीछा जारी रखा, तो आज़ाद ने गोली चलाई. यह घटना बताती है कि आज़ाद केवल निशाना लगाने में कुशल नहीं थे. वे संकट में अपने साथियों की रक्षा करने के लिए तैयार रहते थे. उनके लिए संगठन और साथियों की जान बहुत महत्वपूर्ण थी.

    अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से हुई अंतिम लड़ाई

    चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी की चर्चा उनकी अंतिम लड़ाई के कारण भी होती है. 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया. आज यह पार्क चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से ही जाना जाता है. उस समय वे अकेले नहीं थे. उनके साथ सुखदेव भी थे. आज़ाद ने पहले अपने साथी को सुरक्षित निकलने का अवसर दिया. उसके बाद वे पुलिस का सामना करते रहे.

    बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के आईजी रहे हॉलिंस के हवाले से आज़ाद के निशाने की प्रशंसा का उल्लेख मिलता है. हॉलिंस ने लिखा कि आज़ाद की पहली गोली नॉट बावर के कंधे में लगी थी. पुलिस इंस्पेक्टर विशेश्वर सिंह को भी गंभीर चोट लगी थी. हॉलिंस के अनुसार आज़ाद की गोलियां पेड़ पर इंसान की औसत ऊंचाई के आसपास लगी थीं. दूसरी ओर पुलिस की कई गोलियां काफी ऊपर लगी थीं. इस विवरण से यह संकेत मिलता है कि घिर जाने और घायल होने के बाद भी आज़ाद का नियंत्रण खुद पर बना हुआ था. यह उनके धैर्य और अभ्यास की बड़ी मिसाल है.

    आजाद के लिए पिस्तौल का अर्थ क्या था?

    आज़ाद के जीवन में पिस्तौल का अर्थ हिंसा का प्रदर्शन नहीं था. वह औपनिवेशिक दमन के दौर में आत्मरक्षा और प्रतिरोध का साधन थी. उस समय अनेक क्रांतिकारियों का मानना था कि अंग्रेज़ी शासन के सामने केवल अपील से आज़ादी नहीं मिलेगी. हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में कई विचारधाराएं थीं. महात्मा गांधी अहिंसा और जन-आंदोलन के पक्षधर थे. दूसरी ओर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी प्रतिरोध का रास्ता चुन रहे थे. दोनों धाराओं का लक्ष्य भारत की आज़ादी था, लेकिन तरीके अलग थे. आज़ाद की पिस्तौल उनके चुने हुए रास्ते का हिस्सा थी. फिर भी उनका व्यक्तिगत जीवन अनुशासन, सादगी और साथियों के प्रति समर्पण से भरा था.

    कम शब्दों में कहें तो चंद्रशेखर आज़ाद निशानेबाजी में इसलिए पक्के थे क्योंकि उन्होंने बचपन से लक्ष्य साधने का अभ्यास किया था. भील बच्चों के साथ तीरंदाजी ने उनकी नजर और हाथों को प्रशिक्षित किया. क्रांतिकारी जीवन ने उन्हें पिस्तौल का कुशल उपयोग सिखाया. उनकी शारीरिक शक्ति, मानसिक संतुलन और अनुशासन ने इस कौशल को और मजबूत बनाया. वे निशानेबाज जरूर थे, लेकिन उनकी पहचान केवल इसी तक सीमित नहीं थी. उनका जीवन यह बताता है कि किसी भी कौशल के पीछे अभ्यास, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य का बड़ा महत्व है.

  • बिन मारे घर से रफूचक्कर हो जाएंगे छछूंदर! बस कोने में रख दें रसोई की यह 1 चीज..?

    बिन मारे घर से रफूचक्कर हो जाएंगे छछूंदर! बस कोने में रख दें रसोई की यह 1 चीज..?

    बिन मारे घर से रफूचक्कर हो जाएंगे छछूंदर! बस कोने में रख दें रसोई की यह 1 चीज..?

    बरसात के दिनों में बिलों में पानी भर जाने पर अक्सर कई जीव-जंतु बाहर निकलकर लोगों के घरों में घुसने लगते हैं. ऐसा ही एक जीव छछूंदर है, जो बरसात के सीजन में बहुत परेशान करता है. उसकी गंदी स्मेल और अजीब लोग हर किसी को परेशान करता है. जब वह अजीब आवाज निकालता हुआ घरों में घुसता है तो बच्चे उससे डर जाते हैं. वह ऐसा जीव है, जो आसानी से पिंजरे में भी नहीं घुसता. ऐसे में लोग इस बात से परेशान हो जाते हैं कि उसे बिना मारे घर से कैसे दूर भगाया जाए. आइए, आज हम आपको ऐसा ही एक घरेलू नुस्खा बताने जा रहे हैं. जिसे आजमाकर आप छछूंदर की समस्या से हमेशा के लिए निजात पा सकते हैं.

    घर से छछूंदरों को भगाने का उपाय

    छछूंदर भगाने के लिए आप घर में ही देसी उपाय (Chuchundar Bhagane Ke Upay) कर सकते हैं. इसके लिए आप पुदीने की पत्तियों या उसकी डंडियों का इस्तेमाल करें. असल में पुदीने की खास गंध छछूंदरों को बिल्कुल रास नहीं आती है. वे इसकी गंध महसूस करते ही दूर भाग खड़े होते हैं. ऐसे में आप अपने घर के अंदर, बाहर, खिड़की, रसोई और प्रमुख जगहों पर पुदीने को रख दें. ऐसा करने से छछूंदर आपके घर में घुसने की कभी सोचेंगे भी नहीं.

    पुदीने की पत्तियों का करें इस्तेमाल

    इस ट्रिक को इस्तेमाल करने के लिए आप पुदीने की ताजा पत्तियां लें. इसके बाद उन्हें घर के हर कोने पर एक-एक पत्ता रख दें. आप चाहें तो पुदीने की पत्तियों को सुखाकर उसका पाउडर भी घर की प्रमुख जगहों पर रख सकते हैं. इन दो तरीकों के अलावा तीसरा तरीका स्प्रे बनाने का है. आप पुदीने की पत्तियों और डंडियों को उबालकर उसके गर्म पानी को स्प्रे बोतल में भर लें.

    स्प्रे से दूर भागते हैं छछूंदर

    इसके बाद आप घर के तमाम एंट्री पॉइंट्स पर समय-समय पर इस स्प्रे को छिड़कते रहें. खासकर उन जगहों पर जरूर छिड़कें, जहां से चूहों और छछूंदरों के आने का अंदेशा हो. इस ट्रिक की वजह से उनके आवागमन के सारे रास्ते ब्लॉक हो जाएंगे और वे आपके घर की ओर झांकेंगे भी नहीं. इस उपाय से आपको छछूंदरों के साथ ही चूहों से भी निजात मिल जाएगी.

    घर में पनपने न दें गंदगी

    इसके साथ ही आप छछूंदरों से निजात पाने के लिए कुछ ओर भी उपाय कर सकते हैं. सबसे पहले तो आप दरवाजों और खिड़कियों के आसपास जाली लगवा लें. दरवाजे के नीचे इतनी जगह न छोड़ें कि वहां से चूहे या छछूंदर अंदर घुस सकें. घर में कूड़ा इकट्ठा न होने दें. कूड़े की गंध चूहों और छछूंदरों को बहुत आकर्षित करती है. अगर गंदगी नहीं होगी तो उनका आना भी काफी हद तक रुक जाएगा.

  • हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    हैकर्स की नई चाल! होटल वाई-फाई से चुरा रहे आपका पर्सनल वीडियो और ऑडियो, जानिए ‘CaptiveCrunch’ का काला सच..

    Image Credit: AI Generated Image

    अगर आप अक्सर ट्रैवल करते हैं और होटल या एयरपोर्ट पर फ्री वाई-फाई का इस्तेमाल करते हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है. माइक्रोसॉफ्ट की थ्रेट इंटेलिजेंस टीम ने एक खतरनाक साइबर अटैक अभियान ‘CaptiveCrunch’ को लेकर दुनिया भर के यात्रियों को अलर्ट जारी किया है. रूसी हैकर्स का एक ग्रुप होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर के वाई-फाई नेटवर्क को निशाना बना रहा है. यह हैकिंग हमला इतना खतरनाक है कि हैकर्स आपके लैपटॉप या फोन का पासवर्ड चुराने के साथ-साथ ऑडियो और वीडियो भी रिकॉर्ड कर सकते हैं.

    क्या है ‘CaptiveCrunch’ और यह कैसे काम करता है?

    माइक्रोसॉफ्ट के अनुसार, इस हैकिंग अभियान को Storm-2945 नाम का ग्रुप चला रहा है, जो रूस के कुख्यात हैकर ग्रुप ‘माइडनाइट ब्लिजार्ड’ (APT29 या Cozy Bear) से जुड़ा हुआ है. यह हमला मुख्य रूप से कॉर्पोरेट ट्रैवलर्स को निशाना बनाकर किया जा रहा है.

    • नेटवर्क हैक करना:
      हैकर्स सबसे पहले होटल के राउटर या उस सिस्टम को हैक करते हैं जिससे वाई-फाई का लॉगिन पेज (Captive Portal) खुलता है.
    • नकली लॉगिन पेज:
      जब कोई यूजर वाई-फाई से कनेक्ट करता है, तो उसके सामने गूगल या माइक्रोसॉफ्ट 365 जैसा दिखने वाला फर्जी लॉगिन पेज आ जाता है.
    • पासवर्ड चोरी:
      यूजर जैसे ही अपना पासवर्ड डालता है, उसकी ईमेल, वनड्राइव फाइल्स और कंपनी के डेटा का एक्सेस सीधे हैकर्स के पास चला जाता है.

    फर्जी अपडेट के नाम पर मालवेयर का जाल

    • इस हमले की सबसे खतरनाक बात यह है कि हैकर्स यूजर्स को धोखा देने के लिए कई तरह के फर्जी पॉप-अप और यूटिलिटीज का सहारा लेते हैं.
    • यूजर के स्क्रीन पर ‘ब्राउजर अपडेट’, ‘विंडोज सिक्योरिटी चेक’ या ‘डायरेक्टएक्स/विजुअल सी++ इंस्टॉल’ करने के मैसेज आते हैं.
    • ये मैसेज बिल्कुल असली विंडोज या गूगल सर्विस की तरह दिखाई देते हैं.
    • जैसे ही यूजर इन फर्जी अपडेट्स पर क्लिक करता है, उसके डिवाइस में खतरनाक मालवेयर (Malware) डाउनलोड हो जाता है.

    हैकर्स आपके डिवाइस में क्या-क्या कर सकते हैं?

    माइक्रोसॉफ्ट ने चेतावनी दी है कि इस मालवेयर के जरिए हैकर्स आपके कंप्यूटर पर लगभग पूरा कंट्रोल हासिल कर लेते हैं.

    • ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग:
      हैकर्स आपके वेबकैम और माइक को चालू करके आपकी बातें और वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं.
    • पासवर्ड और कुकीज चोरी:
      ब्राउजर में सेव किए गए सभी पासवर्ड और बैंकिंग कुकीज चुरा सकते हैं.
    • स्क्रीनशॉट और की-स्ट्रोक्स:
      आप कीबोर्ड पर क्या टाइप कर रहे हैं (Keylogging), हैकर्स उसे ट्रैक कर सकते हैं और आपकी स्क्रीन के स्क्रीनशॉट ले सकते हैं.

    होटल वाई-फाई अटैक से कैसे बचें?

    माइक्रोसॉफ्ट ने यात्रियों और कंपनियों के लिए कुछ बेहद जरूरी सुरक्षा उपाय बताए हैं:

    • पब्लिक वाई-फाई से बचें:
      जब भी संभव हो, होटल या एयरपोर्ट के वाई-फाई के बजाय अपने फोन का पर्सनल मोबाइल हॉटस्पॉट इस्तेमाल करें.
    • कोई अपडेट न डाउनलोड करें:
      वाई-फाई कनेक्ट करते ही अगर कोई ब्राउजर या सॉफ्टवेयर अपडेट करने का मैसेज आए, तो उस पर भूलकर भी क्लिक न करें.
    • ऑफिशियल वेबसाइट का इस्तेमाल करें:
      किसी भी अपडेट के लिए हमेशा सॉफ्टवेयर की आधिकारिक वेबसाइट या सिस्टम सेटिंग्स का ही उपयोग करें.
    • एन्क्रिप्टेड प्राइवेट कनेक्शन (VPN):
      अगर पब्लिक वाई-फाई इस्तेमाल करना बहुत जरूरी हो, तो हमेशा एक सुरक्षित और भरोसेमंद VPN का उपयोग करें.

  • बारिश शुरू होते ही क्यों स्लो हो जाता है आपका Internet? Wi-Fi से 5G तक पर पड़ता है असर, जानें बचने का तरीका..

    बारिश शुरू होते ही क्यों स्लो हो जाता है आपका Internet? Wi-Fi से 5G तक पर पड़ता है असर, जानें बचने का तरीका..

    बारिश शुरू होते ही क्यों स्लो हो जाता है आपका Internet? Wi-Fi से 5G तक पर पड़ता है असर, जानें बचने का तरीका..

    मानसून का मौसम जहां एक ओर चिलचिलाती गर्मी से राहत दिलाता है, तो वहीं दूसरी तरफ कई बार यह आपके इंटरनेट और WiFi नेटवर्क की रफ्तार पर भी ब्रेक लगा देता है. बारिश के मौसम में कई बार जब तेज बरसात होती है, तो स्मार्टफोन से लेकर ब्रॉडबैंड की इंटरनेट स्पीड अचानक कम हो जाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बादलों के बरसते ही आपका इंटरनेट अचानक सुस्त क्यों हो जाता है?

    टेक्नोलॉजी की दुनिया में इस समस्या को रेन फेड कहते हैं. आइए जानते हैं इस समस्या के पीछे क्या कारण होता है और इससे बचने के लिए आपको क्या करना चाहिए.

    बारिश में इंटरनेट स्लो होने के कारण

    रेन फेड
    वाई-फाई, सैटेलाइट और मोबाइल नेटवर्क रेडियो तरंगों के जरिए काम करते हैं. जब हवा में बारिश की बूंदें होती हैं, तो वे इन तरंगों के रास्ते में बाधा बनती हैं. पानी की बूंदें सिग्नल को सोख लेती हैं और उन्हें फैला देती हैं, जिससे सिग्नल कमजोर होने लगता है.

    वहीं 5G और वाई-फाई सिग्नल काफी हाई फ्रीक्वेंसी पर काम करते हैं. ये सिग्नल बहुत तेज स्पीड तो देते हैं, लेकिन बारिश और नमी के संपर्क में आते ही सबसे जल्दी प्रभावित होते हैं.

    भारी बारिश के कारण अंडरग्राउंड या बाहरी केबलों में पानी घुसने का भी खतरा बना रहता है. तारों में नमी आने से न सिर्फ स्पीड स्लो होती है, बल्कि नेटवर्क में बार-बार रुकावट भी आने लगती है.

    तेज आंधी-तूफान और बारिश के कारण इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स के बाहरी डिवाइसों को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे पूरे इलाके का नेटवर्क प्रभावित हो जाता है.

    कौन-सा कनेक्शन है बारिश में बेस्ट?

    फाइबर ऑप्टिक
    बारिश के मौसम में फाइबर इंटरनेट सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. इसमें डेटा रेडियो वेव की जगह लाइट सिग्नल के जरिए केबल से यात्रा करता है, जिस पर बारिश या हवा का कोई असर नहीं पड़ता.

    5G और 4G मोबाइल डेटा
    बारिश के दिनों में मोबाइल डेटा की स्पीड में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है. 5G की फ्रीक्वेंसी ज्यादा होने के कारण यह बारिश से जल्दी प्रभावित होता है.

    सैटेलाइट इंटरनेट
    खराब मौसम में सैटेलाइट कनेक्शन सबसे ज्यादा कमजोर साबित होते हैं, क्योंकि बादलों और बारिश के बीच से सिग्नल आने-जाने में भारी रुकावट होती है.

    बारिश के मौसम में स्लो इंटरनेट की समस्या को कैसे ठीक करें?

    अगर बारिश के दौरान आपका वाई-फाई ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो आप कुछ आसान टिप्स की मदद से इंटरनेट स्पीड को तेज कर सकते हैं-

    5GHz बैंड पर स्विच करें
    अगर आपका राउटर डुअल-बैंड है, तो अपने डिवाइस को 2.4GHz की जगह 5GHz बैंड से कनेक्ट करें. यह कम भीड़भाड़ वाला बैंड है और बेहतर स्पीड देता है.

    राउटर को रीस्टार्ट करें
    किसी भी तकनीकी गिल्च या अस्थाई सिग्नल समस्या को दूर करने के लिए अपने मोडेम और राउटर को कुछ सेकेंड के लिए बंद करके फिर से ऑन करें.

    राउटर की जगह बदलें
    राउटर को किसी ऊंची जगह पर रखें. इसे मोटी दीवारों, धातु की चीजों और बंद कोनों से दूर रखें जिससे सिग्नल घर में सही तरीके से फैल सके.

    गैर-जरूरी डिवाइसेज को हटाएं
    नेटवर्क पर लोड कम करने के लिए उन फोन, टीवी या गैजेट्स का वाई-फाई बंद कर दें जिनका आप उस समय इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं.

    वाई-फाई एक्सटेंडर
    अगर घर के किसी हिस्से में सिग्नल कमजोर आ रहा है, तो सिग्नल रेंज बढ़ाने के लिए एक्सटेंडर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

  • फिल्मों में ताजमहल बिकता था, प्रयागराज में तो पूरा पहाड़ ही बेच दिया… जानिए कैसे हुआ करोड़ों की सरकारी जमीन का खेल..

    फिल्मों में ताजमहल बिकता था, प्रयागराज में तो पूरा पहाड़ ही बेच दिया… जानिए कैसे हुआ करोड़ों की सरकारी जमीन का खेल..

    फिल्मों में ताजमहल बिकता था, प्रयागराज में तो पूरा पहाड़ ही बेच दिया… जानिए कैसे हुआ करोड़ों की सरकारी जमीन का खेल..
    • सरकारी रिकॉर्ड में कैसे हुई हेराफेरी?

    • ‘पहाड़’ की जमीन इतनी खास क्यों होती है?

    बॉलीवुड फिल्मों में आपने कई बार सुना होगा कि जालसाजों ने ताजमहल, लाल किला तक बेच दिया. ऐसी बातें पर्दे पर मजेदार लगती हैं, लेकिन प्रयागराज में ऐसा मामला सामने आया है, जिसने हकीकत और फिल्मों के बीच की दूरी कम कर दी. यहां भू-माफियाओं ने राजस्व रिकॉर्ड में सरकारी ‘पहाड़’ के नाम दर्ज करोड़ों रुपये की जमीन को पहले अपने नाम कराया और फिर उसे बेच भी दिया. मामला सामने आने के बाद प्रशासन और पुलिस दोनों हरकत में आ गए हैं.

    क्या है पूरा मामला?
    यह मामला प्रयागराज की बारा तहसील के गोल्हैया गांव का है. यहां आराजी संख्या-1 की करीब 83 बीघा 19 बिस्वा (लगभग 19.16 हेक्टेयर) जमीन राजस्व रिकॉर्ड में ‘पहाड़’ यानी सार्वजनिक सरकारी भूमि के रूप में दर्ज थी. आरोप है कि कुछ लोगों ने फर्जी दस्तावेज और राजस्व रिकॉर्ड में हेराफेरी कर इस सरकारी जमीन को अपने नाम दर्ज करा लिया. इसके बाद जमीन की खरीद-फरोख्त भी शुरू कर दी गई.

    सरकारी रिकॉर्ड में कैसे हुई हेराफेरी?
    जमीन किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि सरकारी खाते में दर्ज थी. लेकिन आरोपियों ने कथित तौर पर राजस्व अभिलेखों में बदलाव कर खुद को जमीन का मालिक दिखा दिया. जब रिकॉर्ड में नाम दर्ज हो गए, तो उसी आधार पर जमीन की रजिस्ट्री और बिक्री भी होती रही. यानी कागजों पर सरकारी पहाड़ निजी संपत्ति बन गया.

    मामला सामने कैसे आया?
    प्रशासन को जमीन में गड़बड़ी की जानकारी मिलने के बाद जांच शुरू हुई. जांच में पाया गया कि जमीन को गलत तरीके से निजी खातों में दर्ज कराया गया था.इसके बाद प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए सभी फर्जी नाम निरस्त कर दिए और जमीन को दोबारा सरकारी खाते में दर्ज कर दिया.

    कितने लोगों पर केस दर्ज हुआ?
    लेखपाल प्राची सिंह परिहार की शिकायत पर लालापुर थाने में 19 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है. इनमें पूर्व खाताधारक, जमीन खरीदने वाले लोग और एके ड्रीम सिटी प्राइवेट लिमिटेड नाम की निजी कंपनी के निदेशक भी शामिल हैं. पुलिस ने सभी के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी संपत्ति से जुड़े गंभीर आरोपों में मामला दर्ज किया है.

    ‘पहाड़’ की जमीन इतनी खास क्यों होती है?
    राजस्व रिकॉर्ड में ‘पहाड़’ के रूप में दर्ज जमीन सार्वजनिक संपत्ति मानी जाती है. इसका इस्तेमाल प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सार्वजनिक हित के लिए होता है. ऐसी जमीन को कोई व्यक्ति अपने नाम नहीं करा सकता और न ही उसकी खरीद-बिक्री की जा सकती है. इसलिए इस तरह की हेराफेरी को गंभीर अपराध माना जाता है.

    अब आगे क्या होगा?
    पुलिस का कहना है कि एफआईआर दर्ज होने के बाद पूरे मामले की विस्तृत जांच की जा रही है. जांच में राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण (म्यूटेशन), रजिस्ट्री, जमीन के हस्तांतरण और सभी दस्तावेजों की बारीकी से जांच होगी. यदि किसी सरकारी कर्मचारी की भूमिका सामने आती है तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है.

    पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
    देश के अलग-अलग राज्यों में पहले भी सरकारी जमीन, तालाब, चारागाह और ग्राम समाज की जमीन पर फर्जी तरीके से कब्जा करने या रिकॉर्ड बदलने के मामले सामने आते रहे हैं. हालांकि किसी ‘पहाड़’ को ही कागजों में निजी संपत्ति बनाकर बेचने का मामला बेहद दुर्लभ माना जा रहा है. यही वजह है कि प्रयागराज का यह मामला चर्चा में है.