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  • क्या होती है रामसर साइट, अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को यह दर्जा क्यों मिला..?

    क्या होती है रामसर साइट, अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को यह दर्जा क्यों मिला..?

    क्या होती है रामसर साइट, अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को यह दर्जा क्यों मिला..?

    ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट बनी है.

    अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को रामसर साइट का दर्जा मिला है. यह राज्य के लिए बड़ी पर्यावरणीय उपलब्धि है. ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट बनी है. यह झील अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है. अब अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद इसका महत्व और बढ़ गया है. यह दर्जा झील के संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के लिए बहुत अहम माना जा रहा है. ताजे फैसले के बाद अब भारत में रामसर साइट्स की संख्या बढ़कर 101 हो गई है.

    आइए, ताजे संदर्भों के बहाने समझते हैं कि आखिर क्या होती है रामसर साइट? अरुणाचल प्रदेश की ग्लॉ झील को इसका दर्जा मिलन कितना महत्वपूर्ण? यह भी जानेंगे कि झील कितनी पुरानी और कितनी खास है?

    रामसर साइट के क्या हैं मायने?

    रामसर साइट ऐसी आर्द्रभूमि होती है, जिसका पर्यावरणीय महत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर माना जाता है. आर्द्रभूमि में झील, तालाब, दलदल, नदी का क्षेत्र, मैंग्रोव, बाढ़ का मैदान और कुछ तटीय इलाके शामिल हो सकते हैं. रामसर कन्वेंशन की शुरुआत 2 फरवरी 1971 को ईरान के रामसर शहर में हुई थी. इसी शहर के नाम पर इस समझौते को रामसर कन्वेंशन कहा गया. इसका उद्देश्य दुनिया की महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों का संरक्षण करना है. किसी क्षेत्र को रामसर साइट घोषित करने से पहले उसकी पारिस्थितिक स्थिति का अध्ययन किया जाता है. देखा जाता है कि वह क्षेत्र दुर्लभ जीव-जंतुओं और पौधों के लिए कितना महत्वपूर्ण है?

    यह भी देखा जाता है कि वहां पानी का प्राकृतिक चक्र, जैव विविधता और स्थानीय जीवन किस तरह जुड़ा हुआ है? रामसर साइट बनने का अर्थ यह नहीं है कि वहां किसी भी तरह की गतिविधि पूरी तरह बंद हो जाती है. इसका उद्देश्य उस क्षेत्र का समझदारी से और टिकाऊ तरीके से उपयोग करना है. साथ ही, विकास कार्यों और पर्यटन को इस तरह नियंत्रित करना होता है कि प्राकृतिक पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे.

    ग्लॉ झील कहां स्थित है?

    ग्लॉ झील अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में स्थित है. यह झील कमलांग टाइगर रिजर्व और वन्यजीव अभयारण्य के क्षेत्र में आती है. यह इलाका पूर्वी हिमालय का हिस्सा है. झील घने जंगलों और पहाड़ी जलधाराओं से घिरी हुई है. इसे बारहमासी पहाड़ी धाराओं से पानी मिलता है. इसका अर्थ है कि झील को साल भर प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी मिलता रहता है.

    ग्लॉ झील तक पहुंचना आसान नहीं है. यहां पहुंचने के लिए जंगल के बीच करीब 20 किलोमीटर तक पैदल यात्रा करनी पड़ती है. इसी कारण यह झील आज भी अपेक्षाकृत शांत और प्राकृतिक रूप में बची हुई है. यहां पहुंचने वाले यात्रियों को घने जंगल, पहाड़ी रास्ते, हरियाली और साफ वातावरण देखने को मिलता है.

    ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित किया गया है.

    ग्लॉ झील को रामसर दर्जा कब मिला?

    केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने इसी महीने ग्लॉ झील को भारत की 101वीं रामसर साइट घोषित किए जाने की जानकारी दी. यह अरुणाचल प्रदेश की पहली रामसर साइट है. इस घोषणा को राज्य की पर्यावरणीय विरासत के लिए महत्वपूर्ण कदम माना गया है. इससे ग्लॉ झील को देश और दुनिया में नई पहचान मिली है. राज्य के लिए यह दर्जा इसलिए भी खास है, क्योंकि अरुणाचल प्रदेश पूर्वी हिमालय का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यहां जंगल, नदियां, पहाड़ और आर्द्रभूमियां एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं.

    जैव विविधता के लिए क्यों खास है झील?

    ग्लॉ झील और इसके जल-ग्रहण क्षेत्र में पौधों और पेड़ों की 150 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं. इस क्षेत्र में ऑर्किड की करीब 49 प्रजातियां भी पाई जाती हैं. ऑर्किड हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों की खास वनस्पतियों में शामिल है. इनकी मौजूदगी इस क्षेत्र की जलवायु और वन पारिस्थितिकी के बारे में महत्वपूर्ण संकेत देती है. झील का आसपास का जंगल कई वन्यजीवों का घर भी है. कमलांग क्षेत्र में हाथी, हिरण, जंगली सूअर, सिवेट, तेंदुआ बिल्ली, विशाल गिलहरी और उड़ने वाली गिलहरी जैसे जीव पाए जाते हैं. झील स्वयं और इसके आसपास का वन्य क्षेत्र मिलकर एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं. इसमें पानी, मिट्टी, पौधे, कीड़े, पक्षी और वन्यजीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं.

    झील जल सुरक्षा में कैसे मदद करती है?

    आर्द्रभूमियां पानी को जमा करने का काम करती हैं. यह बारिश और पहाड़ी जलधाराओं के पानी को धीरे-धीरे आगे बढ़ाती हैं. इससे नीचे के क्षेत्रों में अचानक बाढ़ का खतरा कम हो सकता है. ग्लॉ झील जैसी ऊंचाई वाली मीठे पानी की झीलें स्थानीय जल-चक्र के लिए महत्वपूर्ण होती हैं. वे आसपास की धाराओं और नीचे बहने वाली नदियों को पानी देने में मदद करती हैं. आर्द्रभूमियां भूजल को रीचार्ज करने में भी योगदान देती हैं. वे मिट्टी में पानी के रिसाव को बढ़ाती हैं. इसके अलावा, इनके आसपास की वनस्पतियां मिट्टी के कटाव को रोकती हैं. जंगल और झील मिलकर कार्बन को भी अपने भीतर संचित करते हैं. इस कारण ऐसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं.

    मिश्मी समुदाय की आस्था से जुड़ी है यह झील

    ग्लॉ झील स्थानीय मिश्मी समुदायों की सांस्कृतिक आस्थाओं से भी जुड़ी हुई है. स्थानीय लोगों के लिए यह केवल पानी का स्रोत नहीं है. यह उनके इतिहास, परंपरा और प्रकृति से जुड़े विश्वासों का हिस्सा है. स्थानीय मान्यताओं में झील को पवित्र माना जाता है. लोक कथाओं के अनुसार, झील में चार संरक्षक देवताओं का निवास है. इन्हें दो लड़कों और दो लड़कियों के रूप में बताया जाता है. यह भी मान्यता है कि झील में कोई डूबता नहीं है. झील से जुड़ी ऐसी कथाएं स्थानीय संस्कृति का हिस्सा हैं. इनका वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. फिर भी, ये कहानियां झील को लोगों की भावनाओं से जोड़ती हैं. स्थानीय समुदाय लंबे समय से इस क्षेत्र के जंगल और जल-स्रोतों के साथ रहते आए हैं. उनके पारंपरिक ज्ञान और संरक्षण की आदतों ने झील की प्राकृतिक स्थिति बनाए रखने में भूमिका निभाई है.

    रामसर दर्जे से क्या लाभ होंगे?

    रामसर दर्जे के बाद ग्लॉ झील के संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है. इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, नियमित निगरानी और बेहतर प्रबंधन योजना तैयार की जा सकती है. झील के पानी, वनस्पतियों और वन्यजीवों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी. इससे प्रदूषण, अवैध गतिविधियों और पर्यावरणीय बदलावों की पहचान समय पर हो सकती है. इस दर्जे से जिम्मेदार इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिल सकता है. स्थानीय लोगों के लिए गाइड, होम-स्टे, परिवहन और हस्तशिल्प से जुड़े रोजगार के अवसर बन सकते हैं.

    ग्लॉ झील कितनी पुरानी है?

    ग्लॉ झील को बहुत पुरानी झील कहा जाता है. इसका कारण इसका प्राकृतिक और लंबे समय से सुरक्षित हिमालयी वातावरण है. लेकिन, झील की भूगर्भीय उम्र का कोई निश्चित आंकड़ा नहीं मिलता है. इसकी सही उम्र जानने के लिए वैज्ञानिक भूगर्भीय अध्ययन, तलछट की जांच और जलविज्ञान से जुड़े शोध की जरूरत होगी. रामसर साइट का दर्जा झील की उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि उसके पर्यावरणीय और जैव विविधता संबंधी महत्व के आधार पर मिला है.

  • सात साल आगे की दुनिया देखकर लौटा शख्स, कर दी ऐसी भविष्यवाणी, जो कर देगा हैरान..

    सात साल आगे की दुनिया देखकर लौटा शख्स, कर दी ऐसी भविष्यवाणी, जो कर देगा हैरान..

    सात साल आगे की दुनिया देखकर लौटा शख्स, कर दी ऐसी भविष्यवाणी, जो कर देगा हैरान..

    सांकेतिक तस्वीर

    भविष्य की दुनिया कैसी होगी और आने वाले सालों में इंसानी सभ्यता में क्या बड़े बदलाव होंगे, इसे लेकर अक्सर नई-नई थ्योरीज और दावे सामने आते रहते हैं. हाल ही में खुद को साल 2033 से आया टाइम ट्रेवलर बताने वाले डैरिल डीन नाम के एक अज्ञात शख्स के सनसनीखेज दावों ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है. डैरिल डीन का दावा है कि उसके पास भविष्य में होने वाली घटनाओं की एक पूरी टाइमलाइन मौजूद है. उसके मुताबिक बहुत जल्द पृथ्वी पर एलियंस आने वाले हैं, जिसके बाद दुनिया से युद्ध हमेशा के लिए खत्म हो जाएंगे. पैरानॉर्मल रिसर्च से जुड़े लोकप्रिय यूट्यूब चैनल एपेक्स टीवी पर बात करते हुए इस कथित टाइम ट्रेवलर ने अपने दावों को सही ठहराने के लिए कई भविष्यवाणियों के बारे में बताया.

    डैरिल डीन का कहना है कि वह मूल रूप से साल 2033 का रहने वाला है और थोड़े समय के लिए ही वर्तमान समय में आया था. उसने कहा कि वह दुनिया के हर इंसान को यह समझाने नहीं आया है कि वह सच बोल रहा है, बल्कि वह सिर्फ उन लोगों से बात करना चाहता है जो उसकी बात को गंभीरता से सुनने के लिए तैयार हैं. कथित टाइम ट्रेवलर के अनुसार, भविष्य में कोई भी बड़ा या विनाशकारी युद्ध नहीं होगा. उसने दावा किया कि साल 2028 में एलियंस पृथ्वी पर आएंगे और वे अपने साथ शांति और समृद्धि का एक नया दौर लेकर आएंगे. एलियंस के आने के बाद इंसानों को यह अहसास होगा कि वे आपस में एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, जिससे पूरा विश्व एकजुट हो जाएगा.

    इसके अलावा डीन ने यह भी कहा कि 2033 तक दुनिया के सभी मौजूदा धर्म खत्म हो जाएंगे और पूरी मानव जाति सिर्फ एक धर्म को मानेगी. हालांकि, इस शख्स ने नए धर्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताया. टाइम ट्रैवल की तकनीक को लेकर भी डैरिल डीन ने एक खुलासा किया है. उसका कहना है कि साल 2028 में इंसानों के सामने टाइम ट्रेवल तकनीक के राज से परदा उठा दिया जाएगा और इसी साल दूसरे ग्रहों के जीवों यानी एलियंस की सच्चाई भी दुनिया के सामने आ जाएगी. उसने दावा किया कि उसकी बातें कोरी भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि आने वाले समय में हर हाल में सच होकर रहेगी. डीन ने तकनीक का जिक्र करते हुए कहा कि 2019 के अंत में 5G वायरलेस नेटवर्क शुरू हुआ था, जिसने इंटरनेट स्पीड को तीन गुना बढ़ा दिया था.

    वहीं, उसने दावा किया कि आने वाले सालों में 6G इंटरनेट की तकनीक को पूरी दुनिया के लिए पूरी तरह से मुफ्त कर दिया जाएगा. इसका मतलब यह होगा कि दुनिया के हर देश और दूरदराज के इलाकों में लोगों को मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलने लगेगी. हालांकि, इस यूट्यूब वीडियो को देखने वाले ज्यादातर यूजर्स कथित टाइम ट्रेवलर के इन दावों से बिल्कुल भी सहमत नजर नहीं आ रहे हैं. कई लोगों ने वीडियो पर कमेंट करते हुए इसे पूरी तरह से फर्जी और कल्पना बताया है. कुछ यूजर्स का कहना है कि बातें बनाना आसान है, लेकिन इस बात का कोई ठोस सबूत नहीं है. वहीं, अन्य लोगों ने इसकी तुलना पुराने कथित टाइम ट्रेवलर नोआ से करते हुए कहा कि उसकी भविष्यवाणियां गलत साबित होने के बाद वह गायब हो गया था, और यह शख्स भी उसी की तरह झूठ बोल रहा है.

  • जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    जब पहली बार मिले अकबर और बीरबल… एक जवाब ने बना दिया बादशाह का सबसे करीबी सलाहकार..

    मुगल बादशाह अकबर और बीरबल.

    मुगल बादशाह अकबर के दरबार में कई विद्वान थे. इन लोगों को बाद में अकबर के नवरत्न कहा गया. इन नवरत्नों में बीरबल का नाम सबसे अलग दिखाई देता है. बीरबल केवल एक दरबारी नहीं थे. वह अकबर के करीबी दोस्त थे. कवि थे. बुद्धिमान सलाहकार थे. हाजिर-जवाब इंसान थे. अकबर को उनकी बातें बहुत पसंद थीं. बीरबल का असली नाम महेश दास था. उनका जन्म उत्तर भारत के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके जन्म-स्थान को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत मिलते हैं. कुछ लोग उन्हें कालपी का रहने वाला मानते हैं. कुछ स्रोत उन्हें कन्नौज या आसपास के क्षेत्र से जोड़ते हैं. महेश दास को बचपन से ही कविता और भाषा में रुचि थी. वह संस्कृत, हिंदी और फारसी का अच्छा ज्ञान रखते थे. उनकी बातों में सरलता थी. उनकी समझ बहुत तेज थी. भारत में अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में मनाने का चलन है.

    आइए, मित्रता दिवस के बहाने अकबर-बीरबल की दोस्ती की कहानियां जानते-समझते हैं? यह भी जानेंगे कि कैसे एक कवि बादशाह अकबर का न केवल दरबारी बना बल्कि नवरत्नों में शामिल हुआ और फिर दोनों गहरे दोस्त हो गए.

    पहली मुलाकात ने बदल दी जिंदगी

    कहा जाता है कि महेश दास की मुलाकात अकबर से तब हुई, जब वह दरबार में अपनी कविता सुनाने पहुंचे थे. उनकी कविता से अकबर बहुत प्रभावित हुए. अकबर उस समय ऐसे लोगों की तलाश में रहते थे, जो केवल उनकी प्रशंसा न करें. वह चाहते थे कि उनके आसपास समझदार और सच बोलने वाले लोग रहें. महेश दास ने अपनी बात बहुत आत्मविश्वास से रखी. उनकी भाषा में मिठास थी. उनकी बुद्धि में गहराई थी. अकबर ने उन्हें अपने दरबार में रख लिया. कुछ समय बाद अकबर ने उन्हें कविराय की उपाधि दी. बाद में वह राजा बीरबल के नाम से प्रसिद्ध हुए. माना जाता है कि बीरबल नाम अकबर ने ही उन्हें दिया था.

    बीरबल का असली नाम महेश दास था.

    दोस्ती की असली वजह क्या थी?

    अकबर और बीरबल की दोस्ती केवल मजाक और हंसी पर आधारित नहीं थी. इसके पीछे कई बड़ी वजहें थीं. बीरबल अकबर को सही सलाह देते थे. वह कठिन सवालों का आसान जवाब खोज लेते थे. वह बिना डरे बादशाह की गलतियों की ओर भी इशारा कर देते थे. अकबर को बीरबल की यही बात सबसे अच्छी लगती थी. दरबार में बहुत से लोग बादशाह की बात पर तुरंत सहमति जता देते थे. बीरबल ऐसा नहीं करते थे. वह अकबर का सम्मान करते थे. लेकिन जरूरत पड़ने पर असहमति भी जताते थे. यही वजह थी कि अकबर उन्हें केवल दरबारी नहीं, बल्कि दोस्त मानते थे.

    लाजवाब थी बीरबल की हाजिर-जवाबी

    बीरबल की सबसे बड़ी ताकत उनकी हाजिर-जवाबी थी. वह किसी भी परिस्थिति में शांत रहते थे. सामने चाहे बादशाह हों या कोई बड़ा सेनापति, वह अपनी बात समझदारी से रखते थे. एक प्रसिद्ध कथा में अकबर ने बीरबल से पूछा-दुनिया में सबसे ज्यादा कौवे कहां हैं? बीरबल ने तुरंत जवाब दिया-जहांपनाह, आपके राज्य में. अकबर ने पूछा-अगर कौवों की संख्या इससे कम निकली तो? बीरबल बोले-तो कुछ कौवे अपने रिश्तेदारों से मिलने दूसरे राज्यों में गए होंगे. अकबर ने फिर पूछा-अगर संख्या ज्यादा निकली तो? बीरबल ने कहा-तो दूसरे राज्यों के कौवे यहां मेहमान बनकर आए होंगे. यह लोककथा है. इसका पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, लेकिन यह बीरबल की तेज बुद्धि और हास्यबोध को दिखाती है.

    बीरबल की खिचड़ी वाली कहानी

    बीरबल और अकबर से जुड़ी एक और बहुत प्रसिद्ध कहानी है. इसमें एक गरीब आदमी ठंडे पानी में खड़े होकर इनाम पाने की कोशिश करता है. गरीब आदमी कहता है कि वह केवल दूर जल रहे दीपक को देखकर ठंडे पानी में खड़ा रहा. अकबर को लगता है कि दीपक की गर्मी से उसे सहारा मिला होगा. इसलिए वह उसे इनाम नहीं देते. बीरबल इस फैसले से दुखी होते हैं. अगले दिन वह दरबार में नहीं आते. अकबर उनके बारे में पूछते हैं. बीरबल संदेश भेजते हैं कि खिचड़ी पक रही है. लेकिन हांडी आग से बहुत दूर टंगी है. अकबर समझ जाते हैं कि इतनी दूर रखी हांडी में खिचड़ी नहीं पक सकती. तब बीरबल कहते हैं-अगर दूर का दीपक गरीब आदमी को गर्मी दे सकता है, तो दूर की आग खिचड़ी भी पका सकती है. अकबर को अपनी गलती समझ आती है. वह गरीब आदमी को उसका इनाम दे देते हैं. यह कहानी भी लोक प्रचलित है. इसका उद्देश्य न्याय और तर्क की बात समझाना है.

    जब बीरबल ने बादशाह को आईना दिखाया

    बीरबल अकबर की गलतियों पर सीधे हमला नहीं करते थे. वह अपनी बात कहानी या मजाक के जरिए कहते थे. एक कथा के अनुसार, अकबर ने कभी कहा कि उनके राज्य में सभी लोग बहुत समझदार हैं. बीरबल ने मुस्कुराकर कहा कि यह बात तभी साबित होगी, जब लोग बिना सोचे बादशाह की हर बात को सही न मानें. अकबर ने पूछा-क्या तुम मेरी बात को गलत कह रहे हो? बीरबल ने उत्तर दिया-मैं आपकी बात को गलत नहीं कह रहा. मैं केवल यह कह रहा हूं कि समझदार लोग सवाल भी पूछते हैं. अकबर को यह जवाब पसंद आया. वह जानते थे कि बीरबल उनका अपमान नहीं कर रहे. वह उन्हें बेहतर शासक बनने में मदद कर रहे हैं.

    धर्म और अकबर की समझदारी

    अकबर के शासनकाल में अलग-अलग धर्मों के लोग रहते थे. अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाने की कोशिश की. बीरबल भी इस माहौल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे. बीरबल हिंदू धर्म से जुड़े थे. फिर भी वह मुगल दरबार में सम्मानित थे. अकबर उनकी धार्मिक पहचान का सम्मान करते थे. कहा जाता है कि बीरबल ने कई बार अकबर को समझाया कि किसी भी धर्म या समुदाय के बारे में फैसला करने से पहले उसके विचारों को समझना जरूरी है. अकबर के धार्मिक विचारों में समय के साथ बदलाव आया. वह अलग-अलग धर्मों के विद्वानों से चर्चा करते थे. बीरबल भी ऐसे संवादों में शामिल रहते थे.

    नवरत्नों में बीरबल का स्थान

    अकबर के दरबार में अबुल फजल, फैजी, तानसेन, राजा टोडरमल, राजा मान सिंह और अब्दुर्रहीम खानखाना जैसे महान लोग थे. इन लोगों को लोकप्रिय रूप से अकबर के नवरत्न कहा जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि नवरत्न की यह सूची बाद की परंपराओं में अधिक प्रसिद्ध हुई. अकबर के समय सभी नौ लोगों की एक आधिकारिक सूची का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता. फिर भी बीरबल का महत्व इसमें कम नहीं होता. वह अकबर के भरोसेमंद सलाहकार थे. वह सैनिक अभियानों में भी शामिल हुए. उन्हें ऊंचा पद मिला. उनकी पहचान एक प्रभावशाली दरबारी के रूप में बनी.

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    बीरबल की मृत्यु और अकबर का दुख

    बीरबल की मृत्यु वर्ष 1586 में हुई. वह उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में एक सैन्य अभियान पर गए थे. यह अभियान यूसुफजई कबीलों के खिलाफ था. युद्ध में बीरबल और उनके साथ बड़ी संख्या में सैनिक मारे गए. यह अकबर के शासनकाल की बड़ी सैन्य त्रासदियों में से एक थी. इतिहास में यह भी मिलता है कि अकबर को बीरबल की मृत्यु से गहरा दुख हुआ. बीरबल उनके सबसे करीबी लोगों में थे. दरबार में उनकी जगह कोई आसानी से नहीं ले सका. उनकी मृत्यु के बाद अकबर के जीवन से हंसी का एक बड़ा स्रोत चला गया. बीरबल के साथ अकबर को केवल एक मंत्री नहीं, बल्कि अपना सच्चा मित्र खोना पड़ा.

    क्यों लोकप्रिय हैं बीरबल की कहानियां?

    बीरबल की कहानियां बच्चों और बड़ों दोनों को पसंद आती हैं. इनमें मनोरंजन भी है और सीख भी. इन कहानियों में बीरबल कमजोर व्यक्ति की मदद करते हैं. वह लालची लोगों को सबक सिखाते हैं. झूठे लोगों का पर्दाफाश करते हैं. वह अकबर को भी तर्क के जरिए समझाते हैं. इनमें से कई कहानियां लोककथाएं हैं. उन्हें इतिहास का पक्का दस्तावेज नहीं माना जा सकता. फिर भी वे बीरबल की लोकप्रिय छवि को समझने में मदद करती हैं. बीरबल की असली महानता उनकी बुद्धि में थी. उन्होंने साबित किया कि दरबार में स्थान केवल ताकत से नहीं मिलता. ज्ञान, विनम्रता और सही समय पर सही बात कहने की क्षमता भी बहुत जरूरी होती है. अकबर और बीरबल की दोस्ती इसी विश्वास पर टिकी थी. एक बादशाह था. दूसरा उसका समझदार सलाहकार, लेकिन दोनों के बीच रिश्ता दोस्ती का था. यही वजह है कि सैकड़ों साल बाद भी बीरबल और अकबर की जोड़ी लोगों के दिलों में जिंदा है.

  • इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    इश्क में AI का खेल; ब्वॉयफ्रेंड ने दिया ऐसा धोखा, जिसे जिंदगी भर नहीं भूल पाएगी गर्लफ्रेंड!.

    आज के दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऑफिस का काम हो, ई-मेल लिखना हो या कोई आइडिया सोचना हो, हर जगह लोग धड़ल्ले से AI का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को से सोशल मीडिया पर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसके बारे में जानकर हर कोई दंग रह गया है. दरअसल, यहां एक शख्स ने अपनी लव लाइफ को ही ऑटोमेट कर दिया. जब इस बात का खुलासा हुआ, तो उसकी गर्लफ्रेंड ने फौरन ब्रेकअप कर लिया. आइए जानते हैं इस दिलचस्प कहानी के बारे में.

    क्या है पूरा मामला?

    यह अनोखी लव स्टोरी X (पहले ट्विटर) पर डेलिया लाजारेस्कु (Delia Lazarescu ) नाम की एक यूजर की पोस्ट के जरिए वायरल हुई. सैन फ्रांसिस्को की एक महिला को लंबे समय तक यह लगता रहा कि उसका बॉयफ्रेंड उससे बेपनाह मोहब्बत करता है. वह उसकी दिन भर परवाह करता है. हर पल प्यारे-प्यारे मैसेज भेजता है. लेकिन जब इसके पीछे का सच सामने आया, तो महिला के पैरों तले मानो जमीन खिसक गई. असल में महिला जिससे हर दिन बातें कर रही थी, वो कोई इंसान नहीं बल्कि एक AI चैटबॉट था.

    AI चैटबॉट संभाल रहा था रिश्ते की हर जिम्मेदारी

    वायरल दावे के अनुसार, शख्स ने अपने इस रिलेशनशिप के लगभग सारे काम AI चैटबॉट को सौंप रखे थे. गुड मॉर्निंग मैसेज से लेकर दिनभर हालचाल पूछने तक, सब कुछ AI चैटबॉट ही करता था. यहां तक कि छोटी-मोटी बहस के दौरान क्या जवाब देना है, यह भी AI चैटबॉट ही तय करता था. डिनर डेट और घूमने-फिरने की प्लानिंग भी शख्स ने ऑटोमेट कर रखा था. यानी महिला जिसे सच्ची मोहब्बत समझ रही थी, असल में वह कोडिंग और एल्गोरिदम था. यह भी पढ़ें:Viral Video: तोहफा हो तो ऐसा! AI लव स्टोरी देखकर छलके दुल्हन के आंसू; देखें ये वायरल वीडियो

    इंटरनेट पर लोगों के मजेदार रिएक्शन

    इस अजब प्रेम की गजब कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई. एक यूजर ने मजाकिया लहजे में लिखा, भाई ने अपनी पूरी लव लाइफ ही आउटसोर्स कर दी और अंत में ब्रेकअप का तोहफा मिल गया. दूसरे ने कहा कि इस शख्स ने हर चीज ऑटोमेट करने के आइडिया को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया था. यह भी पढ़ें: वो मेरी जिंदगी है 72 की बुजुर्ग महिला के प्यार में पागल हुआ 22 साल का लड़का, रचा ली शादी; चर्चा में अजब प्रेम की गजब कहानी

    Disclaimer: यह खबर वायरल सोशल मीडिया पोस्ट और नेटिजन्स की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है.

  • इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद…

    इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद…

    इच्छा पूरी करने वाला पेड़! न जड़ दिखती न पत्तियों में स्वाद, लकवा में फायदेमंद…

    बालाघाट. प्रकृति में कई ऐसे सवाल है, जिसका जवाब मिलना मुश्किल ही हो जाता है. ऐसे में हम उसे चमत्कार कहते हैं. एक ऐसा ही चमत्कार बालाघाट जिले के गढ़दा गांव की पहाड़ी पर देखने को मिलता है, जहां पर करीब चार किलोमीटर की चढ़ाई करने के बाद मां अन्नपूर्णा का धाम आता है. वहीं पर मां अन्नपूर्णा चट्टानों के बीज विराजित है. उसी विशाल चट्टान पर एक पेड़ है, जो काफी बड़ा है. ऐसे में उस पेड़ को देख लोग हैरान हो जाते हैं. वहीं, उस पेड़ की प्रजाति का है इसकी जानकारी बहुत नहीं थी. अब इस पेड़ को लेकर कई दावे किए जाते हैं.

    अब से कुछ साल पहले तक इस पेड़ की पहचान नहीं हो सकी थी. लेकिन काशी से कुछ लोग आए थे. ऐसे में उन्होंने बताया कि यह पेड़ की पहचान कल्पवृक्ष के रूप में किए थे. हालांकि, मंदिर के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ की उम्र का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है. यह वृक्ष भी काफी विशाल है.

    दुर्लभ प्रजाति का है ये पेड़
    बालाघाट जिला एक वना आधारित जिला है. यहां पर कई प्रकार और कई प्रजाति की वनस्पति है. ऐसे में ज्यादातर पेड़ों या वृक्षों की पहचान हो चुकी है. लेकिन कई ऐसे पेड़ है, जिसे स्थानीय लोग भी नहीं पहचान पाते हैं. ऐसे में इसे दुर्लभ माना जाता है. यह वृक्ष इतना विशाल है कि इसका अंदाजा लगाना कठिन है कि वह कितना बड़ा है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस वृक्ष का क्षेत्रफल करीब 100 वर्ग फीट से भी ज्यादा है.

    जड़ नहीं दिखती पत्तियों में स्वाद नहीं
    मां अन्नापूर्णा धाम के पुजारी बताते हैं कि इस पेड़ को देख हैरानी होती है. दरअसल, यह विशाल वृक्ष सिर्फ चट्टान तक ही दिखता है. इसकी जड़ें भूमि में मिलती हुई प्रतीत नहीं होती है. ऐसे में यह एक रहस्य है, जहां कि दुर्लभ प्रजाति के पेड़ को पोषण कैसे मिलता है. जहां एक ओर जंगल के सारे पेड़ हमेशा से गर्मी में सुख जाते हैं. लेकिन यह वृक्ष साल भर हरा भरा रहता है. ऐसे में इस बात से भी लोग हैरान हो जाते हैं.

    इच्छा पूरी करने वाला है पेड़!
    मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यह वृक्ष मनोकामनाएं पूरी करने वाला है. मां अन्नपूर्णा के गढ़दा धाम में प्रकट दिवस, नवरात्रि (शारदेय और चैत्र) में भक्तों की भारी भीड़ रहती है. ऐसे में आने वाले भक्त हमेशा अपनी मन्नत पूरी करने के लिए इस पेड़ मन्नत बांधते हैं. वहीं, मन्नत पूरी होने पर वह चुनरी भी छोड़ देते हैं. ऐसे में यहां नौकरी लगने से लेकर संतान प्राप्ति का कामना लेकर कठिन चढ़ाई चढ़ते हैं और इस इच्छा पूरी करने वाले कल्प वृक्ष की अर्चना भी करते हैं.

    सेहत के लिए भी है फायदेमंद
    गढ़दा मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष सहदेव अड़मे बताते हैं कि इसकी पत्तियों की सेवन से गैस की समस्या से राहत मिलती है. वहीं, मंदिर के पुजारी ने दावा किया कि इस वृक्ष की पत्तियों का चूर्ण बनाकर शहद के साथ सेवन करने से लकवा जैसी गंभीर बीमारी से राहत मिलती है. वहीं, इसकी पत्तियों के सेवन से ब्लड पेशर, गैस और पेट की बीमारियों से राहत मिल सकती है. लेकिन, लोकल 18 इन दावों की पुष्टि नहीं करता है.

    हालांकि, यह वृक्ष काफी विशाल है और दुर्लभ प्रजाति का जरूर है. ऐसे में चट्टान के ऊपर होना और जड़ का नजर न आना प्रकृति प्रेमियों में रोमांच उत्पन्न करता है.

  • क्या आपको भी आते हैं ऐसे सपने? आर्थिक संकट और धन हानि के हो सकते हैं संकेत, स्वप्न शास्त्र से जानें रहस्य..

    क्या आपको भी आते हैं ऐसे सपने? आर्थिक संकट और धन हानि के हो सकते हैं संकेत, स्वप्न शास्त्र से जानें रहस्य..

    क्या आपको भी आते हैं ऐसे सपने? आर्थिक संकट और धन हानि के हो सकते हैं संकेत, स्वप्न शास्त्र से जानें रहस्य..

    सपनों को भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं के संकेत के रूप में भी देखा जाता है। मान्यता है कि व्यक्ति को सपनों के माध्यम से शुभ और अशुभ संकेत मिलते हैं। सपने में कुछ खास चीजें दिखाई दें, तो वे आने वाले समय में आर्थिक चुनौतियों का संकेत हो सकती हैं। ऐसे संकेतों को समझना जरूरी हो जाता है, ताकि व्यक्ति समय रहते आर्थिक मामलों में सावधानी बरत सके। जानिए किस तरह के संकेत आने वाले आर्थिक समस्याओं या धन हानि की तरफ इशारा करते हैं।

    बिखरे पैसे या खाली तिजोरी

    स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर सपने में नोट या सिक्के इधर-उधर बिखरे हुए दिखाई दें, तो यह अनावश्यक खर्च बढ़ने का संकेत होता है। वहीं सपने में खाली तिजोरी, अलमारी या खाली पर्स दिखाई देना भी भविष्य में आर्थिक तंगी की ओर इशारा करता है। ऐसे समय में फिजूलखर्ची से बचने, बजट बनाकर चलने और किसी भी निवेश से पहले अच्छी तरह सोचने की सलाह दी जाती है।

    सोना या गहने खोना

    अगर सपने में सोना, चांदी या अन्य कीमती आभूषण खोते हुए दिखाई दें, तो इसे धन या मूल्यवान वस्तुओं के नुकसान का संकेत माना जाता है। ऐसी स्थिति में अपनी आर्थिक योजनाओं पर विशेष ध्यान देना और लेनदेन के मामलों में सतर्क रहना बेहतर माना जाता है।

    धुंधला या अंधेरा रास्ता

    सपने में धुंधला या अंधेरे से भरा रास्ता दिखाई देना इस बात का संकेत माना जाता है कि जल्दबाजी में लिया गया कोई आर्थिक फैसला नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए किसी भी बड़े निवेश, साझेदारी या वित्तीय निर्णय से पहले सभी पहलुओं पर विचार करना जरूरी माना जाता है।

    पानी का बह जाना

    अगर सपने में लगातार बहता हुआ पानी दिखाई दे या ऐसा महसूस हो कि धन हाथ से निकल रहा है, तो स्वप्न शास्त्र में इसे अचानक बढ़ने वाले खर्च या आर्थिक हानि का संकेत माना गया है। ऐसी स्थिति में धन का सही प्रबंधन करना और अनावश्यक खर्चों से बचना लाभदायक माना जाता है। ऐसे सपने बार-बार दिखाई दें, तो इन्हें सतर्क रहने और आर्थिक मामलों में सोच-समझकर निर्णय लेने की सलाह दी जाती है।

  • जब मुगल शहज़ादियों से प्यार करना बना गुनाह… किसी को हाथी से रौंदा गया, किसी को जहर देकर मार डाला..

    जब मुगल शहज़ादियों से प्यार करना बना गुनाह… किसी को हाथी से रौंदा गया, किसी को जहर देकर मार डाला..

    जब मुगल शहज़ादियों से प्यार करना बना गुनाह… किसी को हाथी से रौंदा गया, किसी को जहर देकर मार डाला..

    मुगलों के हरम में सख़्त पाबंदियां थीं. आमतौर पर इन पर किन्नरों का पहरा था. फिर भी भीतर की कहानियां बाहर निकलती थीं. शहजादियों के प्रेम -प्रसंग खुसर-पुसुर और लुका-छिपी के बीच एक कान से दूसरे कान के बीच से गुजरते दूर तक उड़ान भर लेते थे. दरबारी इतिहासकारों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे इसे दर्ज करेंगे. लेकिन उस दौर में दरबार के नजदीक पहुंचे यूरोपीय यात्रियों और इतिहासकारों ने इसे कलमबंद किया. पकड़े जाने पर प्रेमियों को अपनी जान गंवानी पड़ी.

    शहजादियों पर पहरा और कड़ा हुआ या कैद में डाली गईं. लेकिन अनेक शाहजादियां अविवाहित क्यों रहीं? असलियत में उनकी शादियों पर पाबंदी का चलन अकबर के समय शुरू हुआ, जिसकी सोच थी कि शाही परिवार में शादियां तख़्त के नए दावेदार खड़े कर समस्याएं बढ़ाएंगी. पढ़िए मुग़ल शहजादियों से जुड़े कुछ रोचक किस्से.

    तख़्त के दावेदारों से बचने के लिए शहजादियां रखीं गईं कुंवारी

    बाबर और हुमायूं के समय कुछ शहजादियों की शादियां मुगल दरबार के ऊंचे ओहदेदारों के साथ हुईं. लेकिन अकबर के समय से यह सिलसिला लगभग थम गया. इस रोक का मकसद सियासी माना जाता है. सोच थी कि मुगल खानदान से जुड़ने वाले दूसरे कुल के लोग शाही उत्तराधिकार के नए दावेदार के तौर पर न खड़े हो जाएं. दिलचस्प है कि इन शहजादियों को खूब धन-दौलत और नियमित आमदनी के लिए जागीरें सौंपी गईं.

    हरम की महिलाओं का बाग, दरगाह, या रिश्तेदारों के घर तक ही जाना होता था.

    ऊंचे खिताब दिए गए. उनकी बाहरी दुनिया चमक-दमक से रोशन थी लेकिन निजी जिंदगी अंधेरों से भरी और बेड़ियों से जकड़ी हुई थी. असलियत में शाही हरम के ठाठ-बाट बीच एक अलग दुनिया भी थी, जिसमें अनुशासन के नाम पर मन से रहने-जीने की गुंजाइश नहीं थी. अपनी मर्जी से शादी न करने का फैसला अलग मसला होता है. लेकिन जब यह पाबंदी पिता और परिवार की ओर से होती हैं , तो खतरों के बीच भी प्यार-मुहब्बत के अंकुर फूटते हैं.

    कई शहजादियों के साथ भी ऐसा ही हुआ है. बात अलग है कि इश्क-मुश्क छिपाये नहीं छिपता. वहां के खतरों का क्या कहना जहां यह बादशाह की बेटियों के साथ हो. भांडा जब भी फूटा तो आमतौर पर आशिकों ने जान देकर कीमत चुकाई. उधर शहजादियों पर बंदिशें और बढ़ीं. लेकिन तमाम रोक-टोक बीच यह सिलसिला चलता रहा.

    जहांआरा से मोहब्बत की सजा मौत

    मुगल इतिहास की शहजादियों में शाहजहां की बेटी जहांआरा बेगम का ऊंचा मुकाम है. मुमताज़ महल की मौत के बाद वही “पादशाह बेगम” बनी और पूरा हरम उसी के जिम्मे था. औरंगज़ेब द्वारा शाहजहां को बंदी बनाए जाने और फिर उसकी मौत तक जहांआरा पिता की खिदमत में रही. बाद में औरंगज़ेब ने भी उसे दरबार में ऊंचा दर्जा दिया. लेकिन शादी उसकी किस्मत में नहीं थी. बेहद जहीन जहांआरा खूब पढ़ती और लिखती थी. माना जाता है कि एक अत्यंत सुंदर एवं प्रभावशाली ईरानी अमीर नज़र ख़ां से उसका प्रेम प्रसंग चल रहा था. इसकी जानकारी मिलने पर शाहजहां कुपित हुआ.

    नज़र ख़ां को विष देकर मरवा दिया गया. फ्रांसीसी यात्री फ़्रांस्वा बर्नियर और इतालवी यात्री निकोलाओ मनुच्ची दोनों ही ने इसका उल्लेख किया है.अंग्रेज चिकित्सक गैब्रियल बॉटन से जुड़ा जहाँआरा का दूसरा प्रेम प्रसंग भी काफी चर्चित रहा है. हालांकि फारसी इतिहासकारों के ब्यौरों में उल्लेख न होने के कारण आधुनिक इतिहासकार इसकी प्रमाणिकता पर सवाल करते हैं.

    रोशनारा के इश्क का सिलसिला

    तख़्त की जंग में अगर जहांआरा बड़े भाई दारा के साथ थी तो उसकी बहन रोशन आरा छोटे भाई औरंगज़ेब के साथ. बादशाह बनने पर औरंगज़ेब ने रोशन आरा को मल्लिका-ए-जहां बनाया. इस हैसियत में रोशन आरा के खिलाफ तमाम शिकायतें थीं लेकिन औरंगज़ेब के सब्र का प्याला तब छलक गया, जब हरम में रोशन आरा के इश्क में गिरफ्तार मर्दों की आमद की जानकारी उस तक पहुंचीं. औरंगजेब ने खुद ही असलियत जानने का फैसला किया.

    शाही फ़ौज की एक टुकड़ी ने हरम से किसी के बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं छोड़ी. औरंगजेब हरम में पहुंचा और रोशनारा को अपने ईरानी आशिक के साथ पकड़ लिया. मल्लिका की बदनामी हरम से निकल दूर तक फैली. ईरानी को मौत की सजा हुई. असलियत में रोशन आरा का यह इश्क वालिद शाहजहां के वक्त से चल रहा था. वह आशिक नाना आसफजहां का दूर का रिश्तेदार था. शाहजहां को जब इसकी जानकारी हुई तो उसने रियायत की और सजा के तौर पर ईरानी को काबुल रवाना कर दिया था.

    औरंगज़ेब की बादशाहत के दौरान मजबूत होने पर रोशन आरा ने उस अमीर को वापस बुला लिया था. वालिद के वक्त में ही कम उम्र मे रोशन आरा दरबार के एक ऊंचे ओहदेदार अधिक उम्र के राजपूत अमीर पर फिदा हो गई थी. यह राजपूत मंसबदार शाहजहां की एक राजपूत बेगम के घराने का था. जागीर में वापस भेजकर शाहजहां ने उसे रोशनारा से दूर किया था.

    मुगल बादशाह औरंगजेब.

    बहन के बाद भतीजी की निगरानी में रोशन आरा

    वालिद के दौर में दोनों बहनों जहांआरा और रोशन आरा में दूरियां काफी बढ़ गई थीं. बड़ी बहन के अख्तियार से वह रोशन आरा को डांटती और टोकती रहती थी. उसकी हरकतों पर निगाह के लिए कई लड़कियां लगा दी थीं. औरंगजेब के यहां रोशन आरा के रास्ते में बहन का कांटा तो नहीं था लेकिन ईरानी आशिक के साथ पकड़े जाने के बाद

    औरंगजेब चौकन्ना था. उसने रोशन आरा की जासूसी की जिम्मेदारी अपनी बेटी जेबुन्निसा को सौंपी. उसने जो जानकारी जुटाई , उसके मुताबिक फूफी रोशनारा के एक-दो नहीं पूरे नौ आशिक हैं. वे समय-समय पर उससे मिलते रहते हैं. औरंगजेब ने रोशन आरा से सफाई मांगी. पलटवार में उसने जेबुन्निसा को ही कसूरवार ठहराया और अपने एक आशिक के जेबुन्निसा से नाजायज रिश्ते बताए. फिर ये आशिक पकड़े गए. काजी के सामने पेश किया गया.

    इन नौ में पांच जिनका गुनाह साबित हो गया था, उन्हें हनफ़ी कानून के तहत मौत की सजा दे दी गई. भारी फजीहत और बदनामी के चलते रोशन आरा ने जहर पीकर जान देने की नाकाम कोशिश की. उसके सारे शरीर में सूजन आ गई. हकीम, वैद्य और फिरंगी डॉक्टरों ने इस सूजन को धीमे जहर का असर बताया. जहाँआरा को शक था कि रोशन आरा ने जहर खुद नहीं पिया बल्कि यह औरंगज़ेब की करतूत थी.

    ज़ेबुन्निसा को मिली जेल

    औरंगज़ेब की बेहद खास बेटी ज़ेबुन्निसा फ़ारसी की शायरा थीं और “मख़्फ़ी” उपनाम शायरी करती थी. चर्चा थी कि उसका इश्क लाहौर के सूबेदार अक़ील ख़ां रज़ी से हुआ. दोनों के बीच शायरी का आदान-प्रदान भी होता था. रोशन आरा के दरबार से हटाए जाने के बाद एक बार फिर मल्लिका-ए-जहां बनी जहांआरा भी भतीजी के इस प्रेम प्रसंग से अनजान नहीं थी, पर उसने इस मसले पर चुप रहना बेहतर समझा. बात फिर भी औरंगज़ेब तक पहुंची और खूब गुस्सा हुआ.

    ज़ेबुन्निसा को उसने लंबे समय तक क़ैद में रखा. गुलबदन बेगम, सलीमा सुल्तान बेगम, ज़ीनत-उन-निसा आदि की प्रेम कथाएं भी चर्चा में रहीं. ऐसे प्रेम प्रसंगों का भांडा फूटने पर आशिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ी. किसी को जहर दिया गया तो किसी का गला घोंटा गया. कोई हाथी से कुचला गया तो कोई ऐसा गायब हुआ कि फिर कभी पता नहीं चला. खुशनसीब वे थे , जिनकी जान बची और सजा के तौर पर सिर्फ मुग़ल सल्तनत से दूर कहीं और भेज दिए गए.

  • “डॉक्टरों ने कहा था 1 साल से भी कम बचा है वक्त..”, जानिए कैसे दिया मौत को चकमा..

    “डॉक्टरों ने कहा था 1 साल से भी कम बचा है वक्त..”, जानिए कैसे दिया मौत को चकमा..

    “डॉक्टरों ने कहा था 1 साल से भी कम बचा है वक्त..”, जानिए कैसे दिया मौत को चकमा..

    वाशिंगटन. जीवन में जब इंसान को एक बार भी कैंसर जैसी घातक और खौफनाक बीमारी का सामना करना पड़ता है, तो उसकी पूरी दुनिया हिल जाती है. लेकिन अमेरिका के कंसास राज्य स्थित ओवरलैंड पार्क की रहने वाली 53 वर्षीय लिज बैंडिट की कहानी इंसान की अटूट इच्छाशक्ति की एक ऐसी मिसाल है, जिसे सुनकर पूरी दुनिया हैरान है. लिज ने अपने जीवन में एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे छह बार कैंसर जैसे जानलेवा दुश्मन को पटकनी दी है. जब डॉक्टरों ने उनके पास महज एक साल का समय बचने की आशंका जताई थी, तब दो छोटे बच्चों की मां लिज ने हार मानने के बजाय हर बार मौत के मुंह से वापसी की और आज वे पूरी तरह स्वस्थ होकर हाफ मैराथन दौड़ रही हैं. लिज की यह खौफनाक यात्रा साल 2009 में शुरू हुई थी, जब वे 36 साल की थीं और दो छोटे बच्चों (3 साल की बेटी ईव और 1 साल के बेटे एलेक्स) की मां थीं.

    स्विमिंग पूल के पास टहलते समय उनकी मां की नजर लिज के पैर पर मौजूद एक अजीब तिल पर पड़ी. मां के बार-बार ज़िद करने पर जब लिज ने डर्मेटोलॉजिस्ट को दिखाया, तो रिपोर्ट में स्किन कैंसर यानी मेलानोमा की पुष्टि हुई. डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि अगर यह कैंसर शरीर में फैल गया, तो उनके पास जीने के लिए एक साल से भी कम वक्त बचा है. दो मासूम बच्चों के सिर से मां का साया उठने का डर लिज के दिल में बैठ गया था, लेकिन पहली सर्जरी के जरिए उनका मेलानोमा ट्यूमर निकाल दिया गया. हालांकि, यह तो 15 साल लंबे दर्दनाक सिलसिले की महज शुरुआत थी. साल 2010 में लिज को थायरॉयड कैंसर हो गया, जिसके लिए उनकी सर्जरी कर थायरॉयड ग्रंथि हटानी पड़ी. इसके बाद 2015 में उनकी नाक पर बैसल सेल कार्सिनोमा का पता चला, जिससे उनकी चेहरे की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी करनी पड़ी.

    दुख का पहाड़ तब और टूट पड़ा जब 2017 में उनके बाएं ब्रेस्ट में कैंसर पाया गया, जिसके लिए 35 बार रेडिएशन थेरेपी और सर्जरी झेलनी पड़ी. हद तो तब हो गई जब 2023 में उनके दाहिने ब्रेस्ट में भी कैंसर की पुष्टि हुई और 2024 में एक बार फिर उनके पैर में मेलानोमा लौट आया. इतनी भयावह और बार-बार टूटने वाली परिस्थितियों के बावजूद लिज ने हिम्मत नहीं हारी. वे लगातार इलाज कराती रहीं और आखिरकार 2025 में डॉक्टरों ने उन्हें पूरी तरह कैंसर-मुक्त घोषित कर दिया. छह बार मौत को चकमा देने के बाद लिज ने अपनी इस जीत का जश्न हाफ मैराथन दौड़कर मनाया. अपने दर्दनाक अनुभवों का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करते हुए लिज ने 2020 में द बाम बॉक्स नाम से एक कंपनी शुरू की, जो कैंसर मरीजों को उनके इलाज के हिसाब से जरूरी राहत सामग्री के केयर पैकेज बनाकर देती है. आज 53 साल की उम्र में लिज बेहद फिट हैं, हर हफ्ते अपने दोस्तों के साथ दौड़ती हैं और हर पल को खुशी-खुशी जी रही हैं.

  • अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    अंग्रेजों के होश उड़ाने वाले चंद्रशेखर आजाद कैसे कम उम्र में बने सटीक निशानेबाज?..

    चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन भील समुदाय के बीच बीता जो तीरंदाजी में माहिर थे.

    23 जुलाई 1906 को जन्मे और महज 24-25 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हो गए. वे आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया. अंग्रेज उनसे थर-थर कांपते थे. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे. वे साहसी थे. तेज़ निर्णय लेते थे. अपने साथियों की सुरक्षा को बहुत महत्व देते थे. उनकी एक खास पहचान उनका सटीक निशाना भी था. ऐसे ही थे भारतीयों के रग-रग में बसे चंद्रशेखर आजाद.

    आइए, उनकी जन्म जयंती के बहाने जानते हैं कि वे निशानेबाजी में महारथ हासिल करने में कैसे कामयाब हुए? किस उम्र में पिस्टल-गोलियों से खेलने लगे?

    कम उम्र में ही पक्के निशानेबाज हो गए थे

    आज़ाद की निशानेबाजी केवल प्राकृतिक प्रतिभा नहीं थी. इसके पीछे बचपन का अभ्यास, मजबूत शरीर, धैर्य, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी. क्रांतिकारी जीवन में पिस्तौल उनके लिए शौक की वस्तु नहीं थी. वह आत्मरक्षा, साथी-सुरक्षा और संगठन की जिम्मेदारी का साधन थी.

    चंद्रशेखर आज़ाद का बचपन मध्य भारत के भाबरा क्षेत्र में बीता. यह क्षेत्र वन, पहाड़ और आदिवासी जीवन से जुड़ा था. वहां भील समुदाय के लोग रहते थे. भील समुदाय को तीर-कमान चलाने की पारंपरिक कला के लिए जाना जाता है. आज़ाद ने बचपन में भील बच्चों के साथ तीर चलाने का अभ्यास किया. यह अभ्यास उनके लिए बहुत उपयोगी बना. तीरंदाजी में आंख, हाथ और लक्ष्य के बीच सही तालमेल चाहिए होता है. निशाना लगाते समय सांस, शरीर और ध्यान को नियंत्रित रखना पड़ता है. यही गुण आगे चलकर पिस्तौल चलाने में भी उनके काम आए. तीर-कमान से मिला अभ्यास उनके हाथों की स्थिरता और नजर की एकाग्रता का आधार बना.

    क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद.

    इसलिए रखते थे पिस्तौल और गोलियां

    जब आज़ाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तब परिस्थितियां बदल गईं. अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्ष बहुत कठिन था. पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की तलाश में रहते थे. ऐसी स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी पड़ती थी. साथियों को सुरक्षित निकालना भी जरूरी होता था, इसलिए आज़ाद ने तीर-कमान के स्थान पर पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया. लेकिन इसे केवल हथियार रखने की कहानी नहीं मानना चाहिए. आज़ाद के लिए पिस्तौल जिम्मेदारी का प्रतीक थी. उन्हें कई बार संगठन के वरिष्ठ साथियों की रक्षा करनी होती थी. वे खतरे के समय पीछे हटने वाले व्यक्ति नहीं थे. उनका उद्देश्य अंधाधुंध गोली चलाना नहीं था. वे परिस्थितियों को समझकर फैसला लेते थे. यही बात उन्हें सामान्य हथियारबंद व्यक्ति से अलग बनाती है.

    नियमित शारीरिक अभ्यास उनकी पहचान

    आज़ाद का शरीर बहुत मजबूत था. वे नियमित रूप से दंड-बैठक करते थे. उनका शरीर गठा हुआ था. उनकी मांसपेशियां मजबूत थीं. वे पेड़ों पर चढ़ने में भी कुशल थे. शारीरिक फिटनेस का निशानेबाजी से गहरा संबंध है. मजबूत शरीर का मतलब केवल ताकत नहीं होता. इसका अर्थ है बेहतर संतुलन. निशाना लगाते समय हाथ कांपना नहीं चाहिए. शरीर का नियंत्रण जरूरी है. तनाव में भी शरीर को स्थिर रखना पड़ता है. आज़ाद कठिन जीवन जीते थे. वे कम साधनों में रहते थे. कई बार जमीन पर अखबार बिछाकर सो जाते थे. फिर भी उनका अनुशासन नहीं टूटता था. यह अनुशासन उनकी मानसिक और शारीरिक क्षमता को मजबूत करता था.

    अपने मन पर जबरदस्त काबू रखते थे आजाद

    अच्छा निशानेबाज केवल अच्छी आंख वाला व्यक्ति नहीं होता. उसे डर और दबाव में भी शांत रहना पड़ता है. आज़ाद इस गुण के लिए प्रसिद्ध थे. वे लंबे समय तक अंग्रेज पुलिस से बचते रहे. वे लगातार अपना भेष बदलते. कभी व्यापारी तो कभी कुली बनते. कभी साधु का रूप धारण करते थे तो कभी अंग्रेज़ी पहनावे में दिखाई देते थे. इस जीवन में हर समय पकड़े जाने का खतरा था. ऐसी स्थिति में घबराहट स्वाभाविक थी, लेकिन आज़ाद में मानसिक संतुलन था. वे खतरे के बीच भी स्थिति को पढ़ते थे. वे समझते थे कि कब रुकना है, कब आगे बढ़ना है और कब अपने साथी को बचाना है. यह मानसिक स्थिरता उनके निशाने को मजबूत बनाती थी.

    साथियों की सुरक्षा पहली जिम्मेदारी समझते थे आजाद

    चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष साथियों की सुरक्षा था. वे अक्सर अपने साथियों को बचाने के लिए पीछे रहते थे. उनका काम केवल हमला करना नहीं था. उनका पीछा कर रहे लोगों को रोकना भी था. लाहौर में सांडर्स की हत्या के बाद ऐसा ही एक प्रसंग सामने आता है. योजना में भगत सिंह और राजगुरु मुख्य भूमिका में थे. आज़ाद को पीछे से सुरक्षा देने की जिम्मेदारी मिली थी. घटना के बाद भगत सिंह और राजगुरु वहां से निकल रहे थे. हेड कॉन्स्टेबल चानन सिंह उनका पीछा कर रहा था. आज़ाद ने उसे रुकने की चेतावनी दी. जब उसने पीछा जारी रखा, तो आज़ाद ने गोली चलाई. यह घटना बताती है कि आज़ाद केवल निशाना लगाने में कुशल नहीं थे. वे संकट में अपने साथियों की रक्षा करने के लिए तैयार रहते थे. उनके लिए संगठन और साथियों की जान बहुत महत्वपूर्ण थी.

    अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से हुई अंतिम लड़ाई

    चंद्रशेखर आज़ाद की निशानेबाजी की चर्चा उनकी अंतिम लड़ाई के कारण भी होती है. 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस ने उन्हें घेर लिया. आज यह पार्क चंद्रशेखर आज़ाद के नाम से ही जाना जाता है. उस समय वे अकेले नहीं थे. उनके साथ सुखदेव भी थे. आज़ाद ने पहले अपने साथी को सुरक्षित निकलने का अवसर दिया. उसके बाद वे पुलिस का सामना करते रहे.

    बीबीसी ने अपनी एक रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश के आईजी रहे हॉलिंस के हवाले से आज़ाद के निशाने की प्रशंसा का उल्लेख मिलता है. हॉलिंस ने लिखा कि आज़ाद की पहली गोली नॉट बावर के कंधे में लगी थी. पुलिस इंस्पेक्टर विशेश्वर सिंह को भी गंभीर चोट लगी थी. हॉलिंस के अनुसार आज़ाद की गोलियां पेड़ पर इंसान की औसत ऊंचाई के आसपास लगी थीं. दूसरी ओर पुलिस की कई गोलियां काफी ऊपर लगी थीं. इस विवरण से यह संकेत मिलता है कि घिर जाने और घायल होने के बाद भी आज़ाद का नियंत्रण खुद पर बना हुआ था. यह उनके धैर्य और अभ्यास की बड़ी मिसाल है.

    आजाद के लिए पिस्तौल का अर्थ क्या था?

    आज़ाद के जीवन में पिस्तौल का अर्थ हिंसा का प्रदर्शन नहीं था. वह औपनिवेशिक दमन के दौर में आत्मरक्षा और प्रतिरोध का साधन थी. उस समय अनेक क्रांतिकारियों का मानना था कि अंग्रेज़ी शासन के सामने केवल अपील से आज़ादी नहीं मिलेगी. हालांकि, स्वतंत्रता आंदोलन में कई विचारधाराएं थीं. महात्मा गांधी अहिंसा और जन-आंदोलन के पक्षधर थे. दूसरी ओर आज़ाद, भगत सिंह और उनके साथी क्रांतिकारी प्रतिरोध का रास्ता चुन रहे थे. दोनों धाराओं का लक्ष्य भारत की आज़ादी था, लेकिन तरीके अलग थे. आज़ाद की पिस्तौल उनके चुने हुए रास्ते का हिस्सा थी. फिर भी उनका व्यक्तिगत जीवन अनुशासन, सादगी और साथियों के प्रति समर्पण से भरा था.

    कम शब्दों में कहें तो चंद्रशेखर आज़ाद निशानेबाजी में इसलिए पक्के थे क्योंकि उन्होंने बचपन से लक्ष्य साधने का अभ्यास किया था. भील बच्चों के साथ तीरंदाजी ने उनकी नजर और हाथों को प्रशिक्षित किया. क्रांतिकारी जीवन ने उन्हें पिस्तौल का कुशल उपयोग सिखाया. उनकी शारीरिक शक्ति, मानसिक संतुलन और अनुशासन ने इस कौशल को और मजबूत बनाया. वे निशानेबाज जरूर थे, लेकिन उनकी पहचान केवल इसी तक सीमित नहीं थी. उनका जीवन यह बताता है कि किसी भी कौशल के पीछे अभ्यास, अनुशासन और स्पष्ट उद्देश्य का बड़ा महत्व है.

  • महिला का अचानक फूलने लगा पेट, लोग समझने लगे प्रेग्नेंट, फिर खुला खौफनाक राज..?

    महिला का अचानक फूलने लगा पेट, लोग समझने लगे प्रेग्नेंट, फिर खुला खौफनाक राज..?

    महिला का अचानक फूलने लगा पेट, लोग समझने लगे प्रेग्नेंट, फिर खुला खौफनाक राज..?

    लंदन. यूके के स्विंडन शहर की रहने वाली 51 वर्षीय डेब्स डनहम की जिंदगी में कुछ साल पहले एक ऐसा खौफनाक मोड़ आया, जिसने उनकी सेहत, पहचान और आत्मविश्वास को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया. साल 2020 में जब डेब्स 44 साल की थीं और अपनी नॉर्मल व हेल्दी लाइफ जी रही थीं, तब अचानक उनका पेट अजीब तरीके से बाहर निकलने लगा. जिम में साइकिल चलाते समय बार-बार उनका घुटना पेट से टकराने लगा. शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य मानते हुए मेनोपॉज का असर समझा. वे लगातार पुदीने की चाय पीने लगीं और पेट की गैस कम करने की दवाइयां निगलने लगीं. लेकिन पेट का आकार रुकने के बजाय दिन-ब-दिन बढ़ता ही गया. स्थिति इतनी बिगड़ गई कि बाहर निकलने पर लोग उन्हें गर्भवती समझने लगे. खुद उनके पति ने भी टोकते हुए कहा कि वे दिखने में प्रेग्नेंट लग रही हैं.

    डेब्स इतनी असहज महसूस करने लगीं कि उन्होंने शीशे के सामने जाना और पति के सामने कपड़े बदलना तक बंद कर दिया. जब कोई भी घरेलू नुस्खा काम नहीं आया और पेट गुब्बारे की तरह फूलता चला गया, तो वे डॉक्टर के पास पहुंचीं. डॉक्टरों ने तुरंत एमआरआई स्कैन और ब्लड टेस्ट किए. इसके बाद जब रिपोर्ट सामने आई तो डेब्स और उनके परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई. उनके पेट के अंदर 20 सेंटीमीटर बड़ा कैंसरयुक्त ट्यूमर तेजी से बढ़ रहा था. जान बचाने के लिए डॉक्टरों ने तुरंत सर्जरी कर पेट में जमा तरल पदार्थ को बाहर निकाला और गर्भाशय हटाने की प्रक्रिया को अंजाम दिया. सर्जरी पूरी तरह सफल रही और डेब्स कैंसर से मुक्त हो गईं. लेकिन इस गंभीर इलाज और सर्जिकल मेनोपॉज ने उनके शरीर पर भारी असर डाला. कैंसर के तनाव और बदले हुए हार्मोनल असंतुलन के कारण उनकी खाने-पीने की आदतें बुरी तरह बिगड़ गईं.

    डेब्स इसकी वजह से डिप्रेशन में चली गईं और बहुत ज्यादा खाना खाने लगीं, जिसके चलते उनका वजन बढ़कर लगभग 99 किलो तक पहुंच गया. उनके साइज के कपड़े छोटे पड़ने लगे. बीमारी के बाद ये भी एक ऐसा दौर था, जब वजन बढ़ने से डेब्स का आत्मविश्वास दोबारा डगमगाने लगा. लेकिन सितंबर 2023 में उन्होंने हार न मानते हुए खुद को बदलने का फैसला किया. उन्होंने वजन घटाने वाले इंजेक्शनों का सहारा लेने के बजाय संतुलित पोषण और सही पोर्शन कंट्रोल वाली डाइट प्लान की मदद ली. उन्होंने पोर्शन-कंट्रोल मील डिलीवरी का तरीका अपनाया और 9 महीनों के भीतर लगभग 29 किलो वजन कम कर लिया. आज 51 साल की उम्र में डेब्स पूरी तरह फिट हैं और उनकी शादीशुदा जिंदगी में भी पुरानी खुशियां लौट आई हैं.