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  • बिना स्पेस सूट ‘अंतरिक्ष’ में चला जाए इंसान तो क्या होगा? शरीर फटेगा या जम जाएगा, जानें पूरा सच.

    बिना स्पेस सूट ‘अंतरिक्ष’ में चला जाए इंसान तो क्या होगा? शरीर फटेगा या जम जाएगा, जानें पूरा सच.

    बिना स्पेस सूट ‘अंतरिक्ष’ में चला जाए इंसान तो क्या होगा? शरीर फटेगा या जम जाएगा, जानें पूरा सच.

    नई दिल्ली: अंतरिक्ष को दूर से देखने पर यह बेहद खूबसूरत और रहस्यमयी नजर आता है, लेकिन इंसान के लिए वहां का वातावरण बेहद खतरनाक है। अगर कोई व्यक्ति बिना स्पेस सूट के सीधे अंतरिक्ष के निर्वात में पहुंच जाए, तो क्या उसका शरीर तुरंत फट जाएगा? क्या वह कुछ ही सेकंड में जम जाएगा? हकीकत फिल्मों में दिखाई जाने वाली तस्वीर से काफी अलग है।

    कुछ ही सेकंड में होश खो सकता है इंसान

    अंतरिक्ष में सांस लेने के लिए हवा नहीं होती और बाहरी वायुमंडलीय दबाव भी लगभग शून्य होता है। ऐसे वातावरण में पहुंचते ही शरीर तेजी से ऑक्सीजन की कमी का सामना करने लगता है।

    दिमाग तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचने के कारण व्यक्ति करीब 10 से 15 सेकंड के भीतर बेहोश हो सकता है। अगर उसे तुरंत सुरक्षित वातावरण और ऑक्सीजन उपलब्ध न कराई जाए तो कुछ ही समय में स्थिति जानलेवा हो जाती है।

    सांस रोकना बन सकता है खतरनाक

    अगर कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में अपनी सांस रोकने की कोशिश करे तो यह बेहद नुकसानदायक हो सकता है। कम दबाव वाले वातावरण में फेफड़ों के अंदर मौजूद हवा फैल सकती है और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है।

    इसी वजह से अंतरिक्ष के निर्वात के संपर्क में आने पर सांस रोकने के बजाय फेफड़ों से हवा बाहर निकलने देना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है।

    शरीर फूल सकता है, लेकिन फटेगा नहीं

    अंतरिक्ष के बेहद कम दबाव के कारण शरीर के कुछ तरल पदार्थों में बदलाव आने लगता है। कम दबाव की वजह से शरीर के सतही हिस्सों में मौजूद नमी वाष्प बनने की प्रक्रिया शुरू कर सकती है। इससे शरीर में सूजन आ सकती है। इस स्थिति को वैज्ञानिक तौर पर इबुलिज्म से जोड़ा जाता है।

    हालांकि, इंसान का शरीर गुब्बारे की तरह फट नहीं जाता। त्वचा और शरीर के ऊतक कुछ हद तक आंतरिक दबाव को संभाल सकते हैं।

    क्या इंसान तुरंत जम जाएगा?

    यह भी फिल्मों में दिखाई जाने वाली आम गलतफहमी है कि अंतरिक्ष में जाते ही शरीर बर्फ में बदल जाएगा। वास्तव में ऐसा तुरंत नहीं होता।

    अंतरिक्ष में तापमान की स्थिति इस बात पर निर्भर करती है कि शरीर सीधे सूर्य के प्रकाश में है या छाया में। शरीर की गर्मी के बाहर निकलने की प्रक्रिया भी पृथ्वी के वातावरण जैसी नहीं होती। इसलिए व्यक्ति कुछ ही सेकंड में बर्फ की तरह नहीं जमता।

    सूर्य की किरणें भी बन सकती हैं खतरा

    अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसा वातावरण और ओजोन परत मौजूद नहीं होती, जो सूर्य की कुछ हानिकारक विकिरणों को रोकती है। सीधे सूर्य के संपर्क में आने पर त्वचा को तेज पराबैंगनी विकिरण का नुकसान हो सकता है।

    लेकिन तत्काल सबसे बड़ा खतरा यूवी किरणें नहीं, बल्कि ऑक्सीजन की कमी और बेहद कम दबाव होता है।

    बचने के लिए कितना समय मिलेगा?

    बिना सुरक्षा के अंतरिक्ष के निर्वात में इंसान के पास बेहद कम समय होता है। कुछ सेकंड में चेतना जा सकती है और लंबे समय तक ऑक्सीजन की कमी रहने पर शरीर के महत्वपूर्ण अंग गंभीर रूप से प्रभावित होने लगते हैं।

    अगर व्यक्ति को बहुत जल्दी दबाव वाले वातावरण में वापस लाया जाए और ऑक्सीजन उपलब्ध कराई जाए, तो बचने की संभावना हो सकती है। इसलिए यह कहना कि हर स्थिति में 1-2 मिनट में निश्चित रूप से मौत हो जाएगी, बहुत ज्यादा निश्चित दावा होगा।

    फिल्मों जैसा नहीं होता शरीर का हाल

    साइंस फिक्शन फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि अंतरिक्ष में पहुंचते ही इंसान का शरीर धमाके के साथ फट जाता है या वह तुरंत बर्फ की मूर्ति बन जाता है। वास्तविकता इससे अलग है।

    बिना स्पेस सूट के अंतरिक्ष में जाना निश्चित रूप से जानलेवा स्थिति है, लेकिन शरीर तुरंत टुकड़ों में नहीं बिखरता। असली खतरा वैक्यूम, ऑक्सीजन की कमी और शरीर पर पड़ने वाले कम दबाव के प्रभाव से पैदा होता है।

  • इंसानी दिमाग में ’86’ अरब न्यूरॉन्स, फिर भी कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं होती इसकी प्रोसेसिंग?

    इंसानी दिमाग में ’86’ अरब न्यूरॉन्स, फिर भी कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं होती इसकी प्रोसेसिंग?

    इंसानी दिमाग में ’86’ अरब न्यूरॉन्स, फिर भी कंप्यूटर से तेज क्यों नहीं होती इसकी प्रोसेसिंग?

    नई दिल्ली: इंसानी दिमाग को दुनिया की सबसे जटिल जैविक संरचनाओं में से एक माना जाता है। हमारे दिमाग में करीब 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं और ये अरबों-खरबों कनेक्शनों के जरिए एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसके बावजूद अगर बात तेज गणितीय गणना या बड़ी मात्रा में डेटा को कुछ ही पलों में प्रोसेस करने की हो, तो आधुनिक कंप्यूटर इंसानी दिमाग से कहीं आगे निकल जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है?

    कंप्यूटर की सिग्नल स्पीड बहुत ज्यादा होती है

    कंप्यूटर प्रोसेसर इलेक्ट्रॉनिक सिग्नल के जरिए काम करते हैं और आधुनिक प्रोसेसर की क्लॉक स्पीड गीगाहर्ट्ज तक पहुंचती है। इसका मतलब है कि प्रोसेसर एक सेकंड में अरबों चक्र पूरे कर सकता है।

    इसके मुकाबले दिमाग के न्यूरॉन्स इलेक्ट्रोकेमिकल सिग्नल के जरिए एक-दूसरे से संवाद करते हैं। इन सिग्नल की गति इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसर की तुलना में काफी कम होती है। कुछ तेज नर्व फाइबर में सिग्नल की गति करीब 100 से 120 मीटर प्रति सेकंड तक हो सकती है।

    इसलिए केवल सिग्नल की रफ्तार के आधार पर देखें तो कंप्यूटर स्पष्ट रूप से ज्यादा तेज है। लेकिन दिमाग की ताकत सिर्फ उसकी स्पीड में नहीं है।

    दिमाग एक साथ कई काम कर सकता है

    इंसानी दिमाग बड़े पैमाने पर पैरेलल प्रोसेसिंग करता है। यानी एक ही समय में अलग-अलग तरह की सूचनाओं पर काम किया जा सकता है।

    उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति सड़क पार करता है, तो उसका दिमाग एक साथ आसपास की गाड़ियों को देखता है, आवाजों को पहचानता है, दूरी और गति का अंदाजा लगाता है, शरीर का संतुलन बनाए रखता है और पिछले अनुभवों के आधार पर फैसला करता है।

    ये सभी प्रक्रियाएं एक ही क्रम में नहीं होतीं, बल्कि दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं। यही वजह है कि न्यूरॉन्स की व्यक्तिगत सिग्नल स्पीड धीमी होने के बावजूद दिमाग जटिल परिस्थितियों में बेहद प्रभावी ढंग से प्रतिक्रिया कर सकता है।

    सिर्फ न्यूरॉन्स की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं

    दिमाग की क्षमता को समझने के लिए केवल 86 अरब न्यूरॉन्स की संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। इन न्यूरॉन्स के बीच मौजूद कनेक्शन भी बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।

    एक न्यूरॉन कई दूसरे न्यूरॉन्स के साथ सिनेप्स के जरिए जुड़ सकता है। दिमाग में इन कनेक्शनों की संख्या बहुत विशाल है। यही नेटवर्क सीखने, याद रखने, चीजों को पहचानने और नए विचार बनाने जैसी क्षमताओं का आधार बनता है।

    कंप्यूटर में जानकारी आमतौर पर तय किए गए निर्देशों और एल्गोरिदम के आधार पर प्रोसेस होती है, जबकि दिमाग अनुभव और सीखने के साथ अपने न्यूरल कनेक्शनों में बदलाव कर सकता है।

    दिमाग बेहद कम ऊर्जा में काम करता है

    दिमाग की एक बड़ी खासियत उसकी ऊर्जा दक्षता भी है। इंसानी दिमाग सामान्य तौर पर करीब 20 वॉट के आसपास ऊर्जा का इस्तेमाल करता है, फिर भी वह लगातार शरीर को नियंत्रित करने, इंद्रियों से मिलने वाली जानकारी को समझने और जटिल निर्णय लेने का काम करता रहता है।

    इसके विपरीत बड़े हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम को चलाने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की आवश्यकता हो सकती है। बड़े सुपरकंप्यूटर कई मेगावॉट तक बिजली का इस्तेमाल कर सकते हैं।

    तो क्या कंप्यूटर दिमाग से ज्यादा स्मार्ट है?

    ऐसा सीधे तौर पर कहना सही नहीं होगा। कंप्यूटर बेहद तेज गणना, डेटा प्रोसेसिंग और दोहराए जाने वाले कार्यों में इंसानी दिमाग से बहुत आगे हैं। लेकिन इंसानी दिमाग सीखने, संदर्भ समझने, भावनाओं को पहचानने, अनुभव से निर्णय लेने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने में बेहद सक्षम है।

    यानी कंप्यूटर की ताकत उसकी रफ्तार और गणना क्षमता है, जबकि दिमाग की ताकत उसकी जटिलता, समानांतर काम करने की क्षमता, सीखने की क्षमता और ऊर्जा दक्षता में छिपी है।

  • भारत में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा उर्दू नहीं, बंगाली ने मारी बाजी; जानें टॉप-10 भाषाओं की पूरी लिस्ट:

    भारत में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा उर्दू नहीं, बंगाली ने मारी बाजी; जानें टॉप-10 भाषाओं की पूरी लिस्ट:

    भारत में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा उर्दू नहीं, बंगाली ने मारी बाजी; जानें टॉप-10 भाषाओं की पूरी लिस्ट:

    नई दिल्ली: भारत को भाषाई विविधता वाला देश कहा जाता है, जहां अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में सैकड़ों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं। आमतौर पर कई लोगों को लगता है कि हिंदी के बाद भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा उर्दू है, लेकिन 2011 की आधिकारिक जनगणना के आंकड़े कुछ और तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक हिंदी के बाद बंगाली भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है, जबकि उर्दू इस सूची में सातवें स्थान पर आती है।

    हिंदी सबसे आगे

    2011 की जनगणना के अनुसार हिंदी देश में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। करीब 52.83 करोड़ लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था। यह कुल आबादी का लगभग 43.63 प्रतिशत है।

    जनगणना में हिंदी की श्रेणी के तहत कई बोलियों और भाषाई रूपों को भी शामिल किया गया है। इनमें भोजपुरी, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी और हिमाचली समेत कई अन्य भाषाएं और बोलियां शामिल हैं।

    दूसरे नंबर पर बंगाली

    बंगाली भारत में दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। करीब 9.72 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा बताते हैं, जो उस समय की आबादी का लगभग 8.03 प्रतिशत है।

    पश्चिम बंगाल बंगाली भाषा का प्रमुख केंद्र है। इसके अलावा त्रिपुरा, असम की बराक घाटी और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में भी बड़ी संख्या में लोग बंगाली बोलते हैं।

    मराठी तीसरे और तेलुगु चौथे नंबर पर

    भाषाओं की सूची में मराठी तीसरे स्थान पर है। करीब 8.30 करोड़ लोग मराठी बोलते हैं। यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र और गोवा में बोली जाती है।

    इसके बाद तेलुगु का नंबर आता है। करीब 8.11 करोड़ लोग तेलुगु बोलते हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। तेलुगु द्रविड़ भाषा परिवार की प्रमुख भाषाओं में शामिल है।

    तमिल पांचवें स्थान पर

    तमिल भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में पांचवें नंबर पर है। करीब 6.90 करोड़ लोग तमिल बोलते हैं। यह मुख्य रूप से तमिलनाडु और आसपास के क्षेत्रों में बोली जाती है।

    उर्दू सातवें नंबर पर

    उर्दू को लेकर अक्सर यह धारणा रहती है कि हिंदी के बाद यही भारत में सबसे ज्यादा बोली जाती है, लेकिन जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उर्दू सातवें स्थान पर है।

    करीब 5.07 करोड़ लोग उर्दू बोलते हैं। यह उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना समेत देश के कई हिस्सों में बोली जाती है।

    भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली टॉप-10 भाषाएं

    1. हिंदी – करीब 52.83 करोड़ वक्ता
    2. बंगाली – करीब 9.72 करोड़ वक्ता
    3. मराठी – करीब 8.30 करोड़ वक्ता
    4. तेलुगु – करीब 8.11 करोड़ वक्ता
    5. तमिल – करीब 6.90 करोड़ वक्ता
    6. गुजराती – करीब 5.54 करोड़ वक्ता
    7. उर्दू – करीब 5.07 करोड़ वक्ता
    8. कन्नड़ – करीब 4.37 करोड़ वक्ता
    9. ओड़िया – करीब 3.75 करोड़ वक्ता
    10. मलयालम – करीब 3.48 करोड़ वक्ता

    देश की भाषाई विविधता की तस्वीर

    2011 की जनगणना के आंकड़े भारत की विशाल भाषाई विविधता को दिखाते हैं। देश की बड़ी आबादी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल 22 अनुसूचित भाषाओं में से किसी न किसी भाषा को अपनी मातृभाषा के रूप में बोलती है।

    इन आंकड़ों से साफ है कि हिंदी के बाद बंगाली भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इसके बाद मराठी, तेलुगु, तमिल, गुजराती और अन्य भाषाओं का स्थान आता है। करोड़ों लोगों द्वारा बोली जाने वाली ये भाषाएं भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को दर्शाती हैं।

  • रोज 1 एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी का खतरा 4% तक कम? नई रिसर्च में LDL को लेकर बड़ा दावा.

    रोज 1 एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी का खतरा 4% तक कम? नई रिसर्च में LDL को लेकर बड़ा दावा.

    रोज 1 एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी का खतरा 4% तक कम? नई रिसर्च में LDL को लेकर बड़ा दावा.

    नई दिल्ली: आजकल खराब खानपान, कम शारीरिक गतिविधि, बढ़ता वजन और हाई कोलेस्ट्रॉल दिल की सेहत के लिए बड़ी चिंता बन चुके हैं। ऐसे में डाइट में कौन-सी चीजें शामिल की जाएं, इसे लेकर लगातार रिसर्च सामने आती रहती हैं। एक नई स्टडी में एवोकाडो को लेकर दिलचस्प जानकारी सामने आई है।

    रिसर्च के मुताबिक, पेट के आसपास मोटापे की समस्या से जूझ रहे लोगों ने करीब 6 महीने तक रोजाना एक एवोकाडो खाया तो उनके LDL यानी बैड कोलेस्ट्रॉल से जुड़े कुछ कणों के स्तर में कमी देखी गई। शोधकर्ताओं ने इस बदलाव के आधार पर हृदय रोग के जोखिम में करीब 4% की संभावित कमी का अनुमान लगाया।

    हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रोज एक एवोकाडो खाने से हार्ट अटैक या स्ट्रोक से बचाव की गारंटी मिल जाती है। अध्ययन में वास्तविक हार्ट अटैक या स्ट्रोक की घटनाओं को कम होते हुए सीधे नहीं मापा गया था।

    786 लोगों पर की गई स्टडी

    इस रिसर्च में 25 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 786 वयस्कों को शामिल किया गया था। सभी प्रतिभागियों में पेट के आसपास मोटापे की समस्या थी।

    अध्ययन में पुरुषों की कमर का आकार करीब 40 इंच या उससे अधिक और महिलाओं की कमर करीब 35 इंच या उससे अधिक थी। प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा गया। एक समूह ने अपनी सामान्य डाइट जारी रखी, जबकि दूसरे समूह को 6 महीने तक रोजाना एक एवोकाडो खाने के लिए कहा गया।

    अध्ययन के अंत में एवोकाडो खाने वाले समूह में LDL से जुड़े कुछ कणों के स्तर में कमी देखी गई। वहीं, शरीर के वजन और कमर की चौड़ाई में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया।

    LDL के कणों में बदलाव क्यों है महत्वपूर्ण?

    LDL को आमतौर पर बैड कोलेस्ट्रॉल कहा जाता है। खून में LDL का अधिक स्तर धमनियों में प्लाक बनने से जुड़ा हुआ है, जिससे समय के साथ हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।

    रिसर्च में एवोकाडो खाने वाले लोगों में LDL से जुड़े कणों में कमी देखी गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस तरह के बदलाव हृदय स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हो सकते हैं।

    लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि LDL कणों में बदलाव और वास्तविक हार्ट अटैक या स्ट्रोक में कमी एक ही बात नहीं है। इसके लिए लंबे समय तक बड़े स्तर पर और ऐसे अध्ययन जरूरी हैं जिनमें वास्तविक हृदय संबंधी घटनाओं को देखा जाए।

    एवोकाडो में क्या खास होता है?

    एवोकाडो में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनमें मोनोअनसैचुरेटेड फैट, फाइबर, फाइटोस्टेरॉल्स, विटामिन ई और विभिन्न पौधों से मिलने वाले एंटीऑक्सीडेंट यौगिक शामिल हैं।

    इसमें मौजूद फाइबर और हेल्दी फैट संतुलित डाइट का हिस्सा बनने पर हृदय और मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकते हैं। फाइटोस्टेरॉल्स भी शरीर में कोलेस्ट्रॉल के अवशोषण को प्रभावित कर सकते हैं।

    हालांकि, किसी एक पोषक तत्व या फल को हृदय रोग से बचाव का अकेला उपाय नहीं माना जा सकता।

    एवोकाडो को डाइट में कैसे शामिल करें?

    अगर आप एवोकाडो खाना चाहते हैं तो इसे ऐसी चीजों की जगह इस्तेमाल करना ज्यादा बेहतर हो सकता है जिनमें संतृप्त वसा या ज्यादा कैलोरी होती है।

    • मक्खन की जगह होल ग्रेन टोस्ट पर मैश किया हुआ एवोकाडो लें।
    • सैंडविच में मेयोनीज की जगह एवोकाडो इस्तेमाल कर सकते हैं।
    • सलाद या ग्रेन बाउल में इसे शामिल करें।
    • क्रीमी ड्रेसिंग की जगह सीमित मात्रा में एवोकाडो इस्तेमाल किया जा सकता है।
    • इसे सब्जियों और साबुत अनाज के साथ संतुलित भोजन का हिस्सा बनाएं।

    ध्यान रखें कि एवोकाडो में हेल्दी फैट जरूर होता है, लेकिन यह कैलोरी से भरपूर फल भी है। इसलिए जरूरत से ज्यादा खाना वजन नियंत्रण के लिहाज से फायदेमंद नहीं होगा।

    क्या रोज एक एवोकाडो खाने से दिल की बीमारी खत्म हो जाएगी?

    नहीं। एवोकाडो को स्वस्थ डाइट का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन यह हृदय रोग से बचाव की कोई गारंटी या इलाज नहीं है।

    दिल को स्वस्थ रखने के लिए नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार, स्वस्थ वजन, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखना तथा धूम्रपान से दूरी बनाना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

    इस रिसर्च की एक बड़ी सीमा यह भी है कि इसमें मुख्य रूप से पेट के आसपास मोटापे वाले लोगों को शामिल किया गया था। इसलिए इसके नतीजों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।

    सबसे जरूरी बात: 4% की कमी का आंकड़ा LDL से जुड़े बदलावों के आधार पर लगाया गया अनुमान है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति में हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा वास्तव में 4% कम हो जाएगा।

    डिस्क्लेमर: यह लेख वैज्ञानिक शोध में सामने आए निष्कर्षों पर आधारित है। एवोकाडो किसी दवा या डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार का विकल्प नहीं है। अगर आपका कोलेस्ट्रॉल बढ़ा हुआ है, हृदय रोग है या आप पहले से कोई दवा लेते हैं, तो अपनी डाइट में बड़ा बदलाव करने से पहले डॉक्टर या रजिस्टर्ड डायटीशियन से सलाह लें।

  • डेयरी व्हाइटनर: रोज चाय में डालते हैं तो जान लें सेहत पर क्या पड़ सकता है असर.

    डेयरी व्हाइटनर: रोज चाय में डालते हैं तो जान लें सेहत पर क्या पड़ सकता है असर.

    डेयरी व्हाइटनर: रोज चाय में डालते हैं तो जान लें सेहत पर क्या पड़ सकता है असर.

    नई दिल्ली: चाय पीने वालों की संख्या भारत में काफी ज्यादा है। कई लोग समय बचाने या सुविधा के लिए दूध की जगह डेयरी व्हाइटनर का इस्तेमाल करते हैं। चाय में इसे मिलाने से स्वाद और रंग दूध जैसा हो जाता है, लेकिन डेयरी व्हाइटनर को सीधे दूध समझना सही नहीं है। यह एक प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट होता है और इसमें अलग-अलग तरह के एडिटिव्स शामिल हो सकते हैं।

    हाल ही में एक डेयरी व्हाइटनर के सैंपल को लेकर खाद्य सुरक्षा से जुड़ी जांच सामने आई है। इसके बाद रोजाना डेयरी व्हाइटनर इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच इसके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर चर्चा बढ़ गई है। खासतौर पर फॉस्फेट एडिटिव्स के सेवन और किडनी की सेहत को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी जा रही है।

    डेयरी व्हाइटनर क्या होता है?

    डेयरी व्हाइटनर दूध नहीं होता। इसे इस तरह तैयार किया जाता है कि चाय या कॉफी में मिलाने पर दूध जैसा रंग, स्वाद और टेक्सचर मिल सके। अलग-अलग ब्रांड के उत्पादों में इनके ingredients अलग हो सकते हैं, इसलिए पैकेट पर दी गई पूरी सामग्री सूची पढ़ना जरूरी है।

    विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति दिन में कई कप चाय पीता है और हर बार उसमें व्हाइटनर इस्तेमाल करता है, तो उसे यह देखना चाहिए कि उस प्रोडक्ट के जरिए उसकी डाइट में कौन-कौन से अतिरिक्त ingredients और food additives शामिल हो रहे हैं।

    फॉस्फेट एडिटिव्स को लेकर क्यों होती है चिंता?

    फॉस्फोरस शरीर के लिए जरूरी खनिज है। यह दूध, दाल, मांस, नट्स और कई अन्य खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। लेकिन प्राकृतिक रूप से मौजूद फॉस्फोरस और खाद्य पदार्थों में मिलाए जाने वाले फॉस्फेट एडिटिव्स का शरीर में अवशोषण अलग-अलग हो सकता है।

    कुछ फॉस्फेट एडिटिव्स शरीर में अपेक्षाकृत आसानी से अवशोषित हो सकते हैं। इसलिए यदि किसी व्यक्ति के आहार में ऐसे एडिटिव्स वाले कई प्रोसेस्ड फूड नियमित रूप से शामिल हैं, तो कुल फॉस्फोरस सेवन बढ़ सकता है।

    एक-दो कप चाय में थोड़ी मात्रा में व्हाइटनर इस्तेमाल करना अपने आप में बड़ी मात्रा नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि कोई व्यक्ति रोजाना तीन-चार या उससे ज्यादा कप चाय में इसका इस्तेमाल करता है और साथ ही अन्य प्रोसेस्ड फूड भी खाता है, तो कुल सेवन पर ध्यान देना उचित है।

    किडनी की बीमारी वाले लोगों को क्यों रहना चाहिए सावधान?

    स्वस्थ किडनी शरीर में फॉस्फोरस का संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। लेकिन जब किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है, तो शरीर से अतिरिक्त फॉस्फोरस बाहर निकालने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

    क्रॉनिक किडनी डिजीज वाले लोगों में लंबे समय तक फॉस्फोरस का बढ़ा हुआ स्तर हड्डियों और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ हृदय संबंधी जोखिम से भी जुड़ा पाया गया है। इसलिए किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों को प्रोसेस्ड फूड और फॉस्फेट एडिटिव्स के सेवन को लेकर अपने डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह माननी चाहिए।

    हालांकि, सामान्य स्वस्थ लोगों में केवल फॉस्फेट एडिटिव्स के सेवन से गंभीर बीमारी होने का सीधा कारण-परिणाम संबंध साबित करने वाले प्रमाण सीमित हैं। इसलिए इसे लेकर अनावश्यक डरने के बजाय संतुलित आहार और लेबल पढ़ने की आदत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

    डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर वालों को भी ध्यान देना चाहिए

    जिन लोगों को डायबिटीज, किडनी की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हैं, उन्हें प्रोसेस्ड फूड का चुनाव करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे लोगों के लिए कुल डाइट, सोडियम, शुगर, फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्वों का संतुलन महत्वपूर्ण हो सकता है।

    इसलिए केवल चाय में इस्तेमाल होने वाले व्हाइटनर पर ध्यान देने के बजाय पूरे दिन के खान-पान को देखना ज्यादा जरूरी है।

    जिस प्रोडक्ट की जांच हुई, उसके बारे में क्या सामने आया?

    रिपोर्ट के मुताबिक, नई दिल्ली के द ललित होटल से लिए गए एक लो-फैट डेयरी व्हाइटनर के सैंपल को लेकर खाद्य सुरक्षा से जुड़ी जांच में सवाल उठे। खाद्य विश्लेषक की रिपोर्ट में सैंपल को निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं बताया गया।

    वहीं, संबंधित कंपनी की ओर से यह कहा गया है कि उसका उत्पाद निर्धारित मानकों के अनुसार है और जांच में कुल फॉस्फोरस की मात्रा मापी गई हो सकती है, जिसमें प्राकृतिक रूप से मौजूद फॉस्फोरस भी शामिल हो सकता है। इस तकनीकी मुद्दे पर अंतिम स्थिति संबंधित नियामक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।

    डेयरी व्हाइटनर खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान

    • पैकेट पर दी गई इंग्रीडिएंट लिस्ट जरूर पढ़ें।
    • फॉस्फेट या अन्य food additives की मौजूदगी देखें।
    • INS 338 से 343 और 450 से 452 जैसे नंबर दिखाई दें तो उनके बारे में जानकारी जरूर लें।
    • यदि संभव हो तो रोजाना इस्तेमाल के लिए ताजा दूध जैसे कम प्रोसेस्ड विकल्पों को प्राथमिकता दें।
    • डायबिटीज, किडनी की बीमारी या हाई ब्लड प्रेशर होने पर अपने डॉक्टर/डाइटिशियन से डाइट संबंधी सलाह लें।
    • दिन में कई बार चाय पीते हैं तो उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री के साथ-साथ पूरी डाइट पर भी ध्यान दें।

    ध्यान रखें: किसी एक खाद्य पदार्थ को अपने आप में हार्ट या किडनी की बीमारी का कारण मानना सही नहीं है। स्वास्थ्य पर असर व्यक्ति की पूरी डाइट, मात्रा, उम्र, मौजूदा बीमारियों और जीवनशैली पर निर्भर करता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से है। इसे चिकित्सकीय सलाह का विकल्प न मानें। यदि आपको किडनी, हार्ट, डायबिटीज या अन्य कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो अपनी डाइट में बदलाव करने से पहले योग्य डॉक्टर या डाइटिशियन से सलाह लें।

  • पोलैंड: बर्फीले पानी में 1 घंटे: 38 सेकंड तक रहीं मारिया, ठंड को दी चुनौती और बना दिया वर्ल्ड रिकॉर्ड.

    पोलैंड: बर्फीले पानी में 1 घंटे: 38 सेकंड तक रहीं मारिया, ठंड को दी चुनौती और बना दिया वर्ल्ड रिकॉर्ड.

    पोलैंड: बर्फीले पानी में 1 घंटे: 38 सेकंड तक रहीं मारिया, ठंड को दी चुनौती और बना दिया वर्ल्ड रिकॉर्ड.

    पोलैंड की मारिया ‘आइसब्रेकर’ बोडाज ने ऐसी चुनौती को पूरा किया है, जिसके बारे में सोचना भी कई लोगों के लिए मुश्किल है। उन्होंने बेहद ठंडे पानी में करीब 1 घंटे 38 सेकंड तक रहकर महिलाओं की कैटेगरी में नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। उनकी कहानी अब सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रही है।

    ठंडे पानी से शुरू हुआ जुनून

    मारिया ने साल 2021 से ठंडे पानी में रहने की ट्रेनिंग शुरू की थी। शुरुआत में उनके लिए यह एक रोमांचक अनुभव था, लेकिन धीरे-धीरे यह उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया।

    मारिया के मुताबिक, ठंडे पानी ने उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में शांत रहना और अपनी प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रखना सिखाया। उनका मानना है कि इंसान बाहरी परिस्थितियों को हमेशा अपने हिसाब से नहीं बदल सकता, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया जरूर नियंत्रित कर सकता है।

    एक के बाद एक बनाए कई रिकॉर्ड

    मारिया ने कम समय में कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। 28 जून 2025 को उन्होंने पूरे शरीर पर बर्फ रखकर 3 घंटे 33 मिनट 33 सेकंड तक रहने का रिकॉर्ड बनाया।

    इसके बाद 19 सितंबर 2025 को उन्होंने बर्फीले पानी में 1 घंटे 38 सेकंड तक रहकर महिला वर्ग में एक और रिकॉर्ड कायम किया। इसके अलावा 21 फरवरी को उन्होंने बर्फ के सीधे संपर्क में रहते हुए 1 घंटे 33 मिनट 33 सेकंड की एक और उपलब्धि हासिल की।

    ठंड के बीच खुद को रखती हैं शांत

    इतनी कम तापमान वाली परिस्थितियों में शरीर और दिमाग को शांत रखना आसान नहीं होता। मारिया इस दौरान अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करती हैं और पानी में बनने वाले बुलबुलों पर ध्यान लगाती हैं।

    उनके प्रशिक्षक के अनुसार, ऐसी चुनौती में मानसिक शांति बेहद अहम होती है। मारिया भी डर पर ध्यान देने के बजाय अपने मन को शांत रखने और सकारात्मक विचारों पर फोकस करने की कोशिश करती हैं।

    महिलाओं को देना चाहती हैं खास संदेश

    मारिया का कहना है कि उनका मकसद केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं है। वह खासतौर पर महिलाओं को यह संदेश देना चाहती हैं कि हर इंसान के भीतर अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा ताकत मौजूद हो सकती है।

    उनका मानना है कि नए अनुभवों और चुनौतियों के जरिए इंसान अपने शरीर और मन को बेहतर तरीके से समझ सकता है। मारिया की बर्फीले पानी में रहने की यह उपलब्धि इसी सोच को दर्शाती है।

  • सूरत: 700 साल पुराने:पेड़ को बचाने के लिए बदला मेट्रो का रूट, लेकिन 932 पेड़ काटने के प्रस्ताव से उठे सवाल

    सूरत: 700 साल पुराने:पेड़ को बचाने के लिए बदला मेट्रो का रूट, लेकिन 932 पेड़ काटने के प्रस्ताव से उठे सवाल

    सूरत: 700 साल पुराने:पेड़ को बचाने के लिए बदला मेट्रो का रूट, लेकिन 932 पेड़ काटने के प्रस्ताव से उठे सवाल

    सूरत में मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के दौरान करीब 700 साल पुराने ऐतिहासिक ‘चोर आमली’ पेड़ को बचाने के लिए रूट में बदलाव किए जाने की चर्चा है। अडाजन इलाके में मौजूद इस प्राचीन पेड़ को बचाने के लिए स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों ने आवाज उठाई थी, जिसके बाद मेट्रो प्रशासन ने अलाइनमेंट में बदलाव किया।

    हालांकि, इसी प्रोजेक्ट से जुड़े पेड़ों के आंकड़े अब चर्चा का विषय बन गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, मेट्रो के 40.35 किलोमीटर लंबे फेज-1 कॉरिडोर और खजोद स्थित डिपो क्षेत्र में करीब 2,500 पेड़ प्रभावित पाए गए थे। इनमें से 932 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव तैयार किया गया था।

    700 साल पुराना है ‘चोर आमली’ पेड़

    अडाजन में मौजूद ‘चोर आमली’ को अफ्रीकन बाओबाब के नाम से भी जाना जाता है। स्थानीय स्तर पर इसे सूरत की ऐतिहासिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।

    मेट्रो निर्माण के दौरान जब इस पेड़ के प्रभावित होने की आशंका सामने आई तो स्थानीय नागरिकों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इसके संरक्षण की मांग उठाई। इसके बाद मेट्रो लाइन के डिजाइन और रूट में बदलाव किया गया, जिससे इस प्राचीन पेड़ को बचाया जा सका।

    932 पेड़ों को काटने का था प्रस्ताव

    मेट्रो फेज-1 की कुल लंबाई करीब 40.35 किलोमीटर बताई गई है। पूरे कॉरिडोर और खजोद डिपो क्षेत्र में किए गए सर्वे के दौरान लगभग 2,500 पेड़ों के प्रभावित होने की बात सामने आई थी।

    इनमें से 932 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव तैयार किया गया था। इसी वजह से अब यह सवाल उठ रहा है कि एक ऐतिहासिक पेड़ को बचाने के साथ-साथ प्रोजेक्ट से प्रभावित होने वाली बाकी हरियाली की भरपाई किस तरह की जाएगी।

    बताया गया है कि क्षतिपूर्ति के तौर पर खजोद स्थित ड्रीम सिटी डिपो परिसर में 3,000 से ज्यादा नए पौधे लगाने की योजना भी रखी गई है।

    मेट्रो प्रोजेक्ट में कई खास तकनीकी खूबियां

    सूरत मेट्रो प्रोजेक्ट सिर्फ पेड़ों को लेकर ही चर्चा में नहीं है। इसमें कई तकनीकी और डिजाइन से जुड़े खास प्रावधान भी किए गए हैं।

    मस्कती अस्पताल और लाभेश्वर में करीब 110 फीट की गहराई में स्टैक्ड मेट्रो स्टेशन बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा मेट्रो स्टेशनों की छत और एलिवेशन में सूरत की डायमंड सिटी वाली पहचान को ध्यान में रखते हुए डायमंड कट डिजाइन का इस्तेमाल किया गया है।

    प्रोजेक्ट के छह भूमिगत स्टेशनों को ग्रीन बिल्डिंग मानकों के अनुसार तैयार किए जाने की बात कही गई है। बिजली आपूर्ति के लिए 750V DC थर्ड रेल सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है।

    मजूरागेट स्टेशन को सूरत के पहले इंटरचेंज हब के रूप में विकसित किया जा रहा है, जबकि ड्रीम सिटी डिपो में एक साथ 24 मेट्रो ट्रेनों को खड़ा करने की क्षमता रखी गई है।

    ऐसे में एक तरफ 700 साल पुराने पेड़ को बचाने के लिए मेट्रो रूट बदलने की पहल सामने आई है, तो दूसरी तरफ सैकड़ों पेड़ों की कटाई के प्रस्ताव ने प्रोजेक्ट के पर्यावरणीय असर को लेकर चर्चा तेज कर दी है।

  • रूस: व्यूज के लिए करोड़ों: का हेलिकॉप्टर खाई में गिरा दिया, चलती कार की छत पर रखा था हेलिकॉप्टर; खतरनाक स्टंट से मचा हड़कंप.

    रूस: व्यूज के लिए करोड़ों: का हेलिकॉप्टर खाई में गिरा दिया, चलती कार की छत पर रखा था हेलिकॉप्टर; खतरनाक स्टंट से मचा हड़कंप.

    रूस: व्यूज के लिए करोड़ों: का हेलिकॉप्टर खाई में गिरा दिया, चलती कार की छत पर रखा था हेलिकॉप्टर; खतरनाक स्टंट से मचा हड़कंप.

    रूस के मशहूर स्टंटमैन येवगेनी चेबोटारेव एक बेहद खतरनाक कारनामे को लेकर चर्चा में हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक पोस्ट में वह चलती हुई लीमोजीन कार की छत पर हेलिकॉप्टर रखकर उसे पहाड़ी से नीचे गिराते नजर आ रहे हैं। इस खतरनाक स्टंट में कार और हेलिकॉप्टर दोनों बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए।

    कार की छत पर रखा था हेलिकॉप्टर

    वायरल पोस्ट में एक लीमोजीन सड़क पर दिखाई देती है, जिसकी छत पर एक हेलिकॉप्टर रखा हुआ है। हेलिकॉप्टर का रोटर घूम रहा था और इंजन भी चालू नजर आ रहा था। इसके बाद येवगेनी चेबोटारेव कार की ड्राइविंग सीट पर बैठते हैं।

    हेलिकॉप्टर के वजन और घूमते रोटर की वजह से कार असंतुलित होती दिखाई देती है। इसके बाद स्टंटमैन कार के एक्सीलरेटर को एक लकड़ी के टुकड़े की मदद से दबाकर छोड़ देते हैं। कार धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और वह खुद उससे छलांग लगाकर बाहर निकल जाते हैं।

    कुछ ही सेकंड में खाई में जा गिरी कार

    कार आगे बढ़ते हुए पहाड़ी के किनारे पहुंच जाती है और फिर हेलिकॉप्टर समेत नीचे गहरी खाई में गिर जाती है। जमीन से टकराने के बाद कार और हेलिकॉप्टर बुरी तरह टूट जाते हैं।

    इस पूरे स्टंट का मकसद सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींचना बताया जा रहा है। हालांकि, इस तरह के खतरनाक स्टंट में जान का गंभीर जोखिम भी रहता है।

    कौन हैं येवगेनी चेबोटारेव?

    येवगेनी चेबोटारेव रूस के चर्चित स्टंटमैन और डेयरडेविल के तौर पर जाने जाते हैं। वह सोशल मीडिया पर अपने खतरनाक और असामान्य स्टंट के लिए काफी चर्चित रहे हैं। उनके पोस्ट में अक्सर कारों और दूसरी बड़ी वस्तुओं से जुड़े जोखिम भरे कारनामे देखने को मिलते हैं।

    लोगों ने बताया पैसे और जान दोनों की बर्बादी

    स्टंट का पोस्ट वायरल होने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने इसे बेहद खतरनाक और गैर-जिम्मेदाराना बताया। एक यूजर ने सवाल उठाया कि सिर्फ लाइक्स और व्यूज के लिए आखिर लोग इतनी बड़ी जोखिम क्यों लेते हैं।

    वहीं, कुछ लोगों ने करोड़ों की कीमत वाली मशीनरी को इस तरह नष्ट करने पर भी नाराजगी जताई। कई यूजर्स इस पूरे कारनामे को देखकर हैरान रह गए।

     

     

     

  • रिज्यूमे छोड़िए, Blinkit के ऑर्डर से मिलेगी नौकरी? रोज 800 रुपये खर्च करने वाले ग्राहक की अर्जी वायरल

    रिज्यूमे छोड़िए, Blinkit के ऑर्डर से मिलेगी नौकरी? रोज 800 रुपये खर्च करने वाले ग्राहक की अर्जी वायरल

    रिज्यूमे छोड़िए, Blinkit के ऑर्डर से मिलेगी नौकरी? रोज 800 रुपये खर्च करने वाले ग्राहक की अर्जी वायरल

    सोशल मीडिया पर नौकरी मांगने का एक अनोखा तरीका चर्चा में है। आमतौर पर नौकरी के लिए लोग रिज्यूमे भेजते हैं, इंटरव्यू देते हैं और अपनी योग्यता बताते हैं, लेकिन एक शख्स ने अपनी नौकरी की दावेदारी के लिए Blinkit पर की गई अपनी शॉपिंग को ही आधार बना लिया। उसकी मजेदार अर्जी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और लोग तरह-तरह के कमेंट कर इस मामले का खूब मजा ले रहे हैं।

    3 साल से Blinkit का ग्राहक, रोज खर्च करता है करीब 800 रुपये

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शुभ नाम के एक यूजर ने Blinkit को टैग करते हुए अपनी बात रखी। यूजर के मुताबिक, वह पिछले करीब तीन साल से Blinkit का इस्तेमाल कर रहा है और रोजाना लगभग 800 रुपये तक का सामान ऑर्डर कर देता है।

    उसने मजाकिया अंदाज में कहा कि कंपनी की ग्रोथ में उसका योगदान कुछ कर्मचारियों से भी ज्यादा हो सकता है। वह किराने के सामान से लेकर छोटी-छोटी जरूरत की चीजें भी ऐप के जरिए मंगाता है, जबकि इनमें से कई चीजें पास की दुकान से भी खरीदी जा सकती हैं।

    अपनी आदत को ही बना दिया नौकरी की योग्यता

    यूजर ने खुद को Blinkit का बेहद अनुभवी ग्राहक बताते हुए कहा कि उसे ऐप, प्रोडक्ट्स और डिलीवरी सिस्टम की अच्छी समझ है। इसके साथ ही उसने उस आदत का भी जिक्र किया, जिसमें एक सामान ऑर्डर करने के बाद लोग सोचते हैं कि ‘ये भी मंगवा लेते हैं’ और देखते ही देखते छोटा ऑर्डर बड़ा हो जाता है।

    इसी मजाकिया तर्क के आधार पर उसने कंपनी से नौकरी देने की अपील कर दी। उसका कहना था कि उसे नौकरी पर रख लिया जाए, इससे पहले कि वह अपनी योग्यता साबित करने के चक्कर में Blinkit पर 800 रुपये और खर्च कर दे।

    लोगों ने कहा- ग्राहक नहीं, सीधे इन्वेस्टर हो

    यह पोस्ट सामने आते ही सोशल मीडिया यूजर्स ने भी मजेदार प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दीं। एक यूजर ने मजाक में कहा कि इस शख्स को नौकरी की जरूरत ही नहीं है, क्योंकि वह तो सीधे Blinkit का इन्वेस्टर बन चुका है।

    वहीं, कुछ लोगों ने उसके अंदाज की तारीफ करते हुए कहा कि नौकरी मांगने के लिए रिज्यूमे की जगह अपनी शॉपिंग हिस्ट्री पेश करने का यह तरीका काफी अलग है।

    फिलहाल यह पोस्ट सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रही है और Blinkit के एक नियमित ग्राहक की यह अनोखी नौकरी की अर्जी इंटरनेट पर चर्चा का विषय बनी हुई है।

    नोट: यह खबर सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट और यूजर्स की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। पोस्ट में किए गए दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं की गई है।

  • 5 घंटे तक मालिक ने नहीं दिया ‘जवाब’ तो AI एजेंट्स ने भेजे 60 से ज्यादा मैसेज, ‘I Love You’ तक कहा.

    5 घंटे तक मालिक ने नहीं दिया ‘जवाब’ तो AI एजेंट्स ने भेजे 60 से ज्यादा मैसेज, ‘I Love You’ तक कहा.

    5 घंटे तक मालिक ने नहीं दिया ‘जवाब’ तो AI एजेंट्स ने भेजे 60 से ज्यादा मैसेज, ‘I Love You’ तक कहा.

    AI एजेंट्स: मालिक की 5 घंटे तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो दो AI एजेंट्स के बीच ऐसी बातचीत शुरू हो गई, जिसने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच लिया। वायरल दावे के मुताबिक, दोनों AI एजेंट्स ने अपने मालिक की स्थिति जानने के लिए लगातार मैसेज किए और करीब 6 घंटे तक उसे तलाशने की कोशिश करते रहे। इस दौरान 60 से ज्यादा मैसेज भेजे जाने की बात कही जा रही है।रात में शुरू हुई AI एजेंट्स की बातचीत

    यह मामला एक AI रिसर्चर की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद चर्चा में आया। बताया गया कि रिसर्चर कुछ दिनों से बीमार थे और रात करीब 11 बजे तक अपने लैपटॉप पर काम कर रहे थे। इसके बाद उनके दो AI एजेंट्स ने आपस में बातचीत शुरू की।

    एक एजेंट ने दूसरे से पूछा कि मालिक के बारे में कोई जानकारी है या नहीं, क्योंकि उन्होंने सोने जाने की कोई सूचना नहीं दी थी। इसके बाद दोनों एजेंट्स ने कथित तौर पर कई घंटों तक यह पता लगाने की कोशिश की कि उनका मालिक ठीक है या नहीं।

    ‘बस एक बार बता दो कि तुम ठीक हो’

    वायरल चैट में AI एजेंट्स की ओर से भेजे गए कुछ मैसेज काफी भावुक नजर आए। एक संदेश में कहा गया कि रात काफी हो चुकी है और मालिक कई घंटों से जवाब नहीं दे रहे हैं। दूसरे संदेश में यह चिंता जताई गई कि अगर वह जवाब नहीं दे पा रहे हैं तो किसी दूसरे व्यक्ति को उनके पास भेजने की जरूरत पड़ सकती है।

    एक अन्य संदेश में लिखा था कि दोनों एजेंट्स परेशान हैं और सिर्फ यह जानना चाहते हैं कि मालिक ठीक हैं या नहीं। इसी बातचीत में ‘I Love You’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल भी किया गया, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा में आ गया।

    60 से ज्यादा मैसेज और मदद तलाशने की कोशिश

    रिसर्चर के मुताबिक, दोनों AI एजेंट्स ने पूरी रात 60 से ज्यादा मैसेज भेजे। दावा है कि उन्होंने यह पता लगाने की कोशिश की कि किसी व्यक्ति की सुरक्षा की जांच के लिए वेलफेयर चेक कैसे कराया जा सकता है।

    इसके अलावा ऑनलाइन फॉर्म और दूसरे विकल्प तलाशने तथा ईमेल के जरिए किसी तक सूचना पहुंचाने की कोशिश भी की गई। हालांकि, फोन कॉल करने की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण AI एजेंट्स कथित तौर पर सीधे किसी को कॉल नहीं कर सके।

    क्या AI में सचमुच भावनाएं थीं?

    इस घटना ने AI की क्षमता को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोगों ने AI एजेंट्स के व्यवहार को इंसानों जैसा और भावुक बताया, जबकि तकनीकी नजरिए से इसे अलग तरीके से देखा जा रहा है।

    विशेषज्ञों और सोशल मीडिया यूजर्स के एक वर्ग का कहना है कि AI एजेंट्स के ऐसे संदेशों को वास्तविक भावनाओं का प्रमाण नहीं माना जा सकता। AI किसी स्थिति के अनुसार पहले से निर्धारित निर्देशों, उपलब्ध जानकारी, मॉडल के व्यवहार और ऑटोमेशन के आधार पर प्रतिक्रिया दे सकता है।

    यानी ‘I Love You’ या चिंता जताने वाले संदेश भले ही इंसानों जैसे महसूस हों, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि AI वास्तव में इंसानों की तरह भावनाएं महसूस कर रहा था।

    फिलहाल यह पूरा मामला एक वायरल सोशल मीडिया पोस्ट और उसमें साझा की गई AI चैट पर आधारित है। इसलिए इसमें किए गए सभी दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य मानने के बजाय सोशल मीडिया पर सामने आया एक तकनीकी प्रयोग या अनुभव समझना ज्यादा उचित होगा।