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  • लाल रंग की बिल्ली देख कांप गए लोग, अमेरिका के इस शहर..

    लाल रंग की बिल्ली देख कांप गए लोग, अमेरिका के इस शहर..

    लाल रंग की बिल्ली देख कांप गए लोग, अमेरिका के इस शहर..

    अमेरिका के टेक्सस राज्य के लीग सिटी से एक बेहद अजीबोगरीब और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां सड़कों पर चमकीले गहरे लाल रंग की एक बिल्ली घूमती हुई देखी गई है. पहली नजर में खून से सनी या लाल रंग में रंगी दिखाई देने वाली इस बिल्ली को देखकर स्थानीय निवासी दहशत में आ गए हैं. सोशल मीडिया पर लोगों ने इस अजीबोगरीब जीव को ‘नरक की बिल्ली’ और ‘लूसिफर (यमराज)’ तक का नाम दे दिया है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पशु संरक्षण विभाग ने आपातकालीन अलर्ट जारी कर आम जनता को इस बिल्ली से दूर रहने की सख्त हिदायत दी है. लीग सिटी एनिमल केयर की टीम इस लाल रंग की बिल्ली को सुरक्षित पकड़ने के लिए लगातार रेस्क्यू अभियान चला रही है.

    अधिकारियों ने आम लोगों से अपील की है कि वे बिल्ली को खुद पकड़ने या उसके पास जाने की कोशिश बिल्कुल न करें, क्योंकि इससे बिल्ली डरकर भाग सकती है और रेस्क्यू टीम के प्रयासों में बाधा आ सकती है. संस्था ने बयान जारी कर बताया कि वे आसपास के कैट-केयरगिवर्स की मदद से पिंजरा लगाकर बिल्ली को सुरक्षित हिरासत में लेने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उसके शरीर पर लगे खतरनाक केमिकल या डाई का इलाज किया जा सके. सोशल मीडिया पर इस लाल बिल्ली की तस्वीरें वायरल होते ही लोगों ने जानवर के प्रति क्रूरता और अवैध गतिविधियों से जुड़े कई गंभीर दावे किए हैं.

    कुछ स्थानीय लोगों का आशंका जताई है कि इस बिल्ली को किसी अवैध डॉग-फाइटिंग रिंग (कुत्तों की खूनी लड़ाई) का शिकार बनाने या टारगेट प्रैक्टिस के लिए लाल रंग से रंगा गया हो सकता है. लोगों का मानना है कि बिल्ली किसी तरह वहां से भाग निकली है. ऐसे में पुलिस को इस इलाके में जानवरों की क्रूरता से जुड़े गिरोहों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए. वहीं, कुछ कैट लवर्स ने इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है. हालांकि, पुलिस ने अभी तक किसी औपचारिक आपराधिक जांच या एनिमल क्रुएल्टी केस दर्ज करने की घोषणा नहीं की है. फिलहाल रेस्क्यू टीम का पूरा ध्यान बिल्ली को सुरक्षित पकड़कर उसका मेडिकल चेकअप करने और उसे एक सुरक्षित घर दिलाने पर टिका हुआ है.

  • लाल रंग की बिल्ली देख कांप गए लोग, अमेरिका के इस शहर..

    लाल रंग की बिल्ली देख कांप गए लोग, अमेरिका के इस शहर..

    लाल रंग की बिल्ली देख कांप गए लोग, अमेरिका के इस शहर..

    अमेरिका के टेक्सस राज्य के लीग सिटी से एक बेहद अजीबोगरीब और हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है. यहां सड़कों पर चमकीले गहरे लाल रंग की एक बिल्ली घूमती हुई देखी गई है. पहली नजर में खून से सनी या लाल रंग में रंगी दिखाई देने वाली इस बिल्ली को देखकर स्थानीय निवासी दहशत में आ गए हैं. सोशल मीडिया पर लोगों ने इस अजीबोगरीब जीव को ‘नरक की बिल्ली’ और ‘लूसिफर (यमराज)’ तक का नाम दे दिया है. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन और पशु संरक्षण विभाग ने आपातकालीन अलर्ट जारी कर आम जनता को इस बिल्ली से दूर रहने की सख्त हिदायत दी है. लीग सिटी एनिमल केयर की टीम इस लाल रंग की बिल्ली को सुरक्षित पकड़ने के लिए लगातार रेस्क्यू अभियान चला रही है.

    अधिकारियों ने आम लोगों से अपील की है कि वे बिल्ली को खुद पकड़ने या उसके पास जाने की कोशिश बिल्कुल न करें, क्योंकि इससे बिल्ली डरकर भाग सकती है और रेस्क्यू टीम के प्रयासों में बाधा आ सकती है. संस्था ने बयान जारी कर बताया कि वे आसपास के कैट-केयरगिवर्स की मदद से पिंजरा लगाकर बिल्ली को सुरक्षित हिरासत में लेने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उसके शरीर पर लगे खतरनाक केमिकल या डाई का इलाज किया जा सके. सोशल मीडिया पर इस लाल बिल्ली की तस्वीरें वायरल होते ही लोगों ने जानवर के प्रति क्रूरता और अवैध गतिविधियों से जुड़े कई गंभीर दावे किए हैं.

    कुछ स्थानीय लोगों का आशंका जताई है कि इस बिल्ली को किसी अवैध डॉग-फाइटिंग रिंग (कुत्तों की खूनी लड़ाई) का शिकार बनाने या टारगेट प्रैक्टिस के लिए लाल रंग से रंगा गया हो सकता है. लोगों का मानना है कि बिल्ली किसी तरह वहां से भाग निकली है. ऐसे में पुलिस को इस इलाके में जानवरों की क्रूरता से जुड़े गिरोहों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए. वहीं, कुछ कैट लवर्स ने इस घटना पर दुख व्यक्त करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है. हालांकि, पुलिस ने अभी तक किसी औपचारिक आपराधिक जांच या एनिमल क्रुएल्टी केस दर्ज करने की घोषणा नहीं की है. फिलहाल रेस्क्यू टीम का पूरा ध्यान बिल्ली को सुरक्षित पकड़कर उसका मेडिकल चेकअप करने और उसे एक सुरक्षित घर दिलाने पर टिका हुआ है.

  • दुनिया का सबसे खतरनाक रेलवे ट्रैक, जहां बैक गियर में पहाड़ चढ़ती है ट्रेन!

    दुनिया का सबसे खतरनाक रेलवे ट्रैक, जहां बैक गियर में पहाड़ चढ़ती है ट्रेन!

    दुनिया का सबसे खतरनाक रेलवे ट्रैक, जहां बैक गियर में पहाड़ चढ़ती है ट्रेन!

    दुनिया में इंसानों ने अपनी जिद और काबिलियत के दम पर कई ऐसे कमाल किए हैं, जो नामुमकिन लगते हैं. ऐसा ही एक कारनामा आज से करीब 125 साल पहले इक्वाडोर के खतरनाक एंडीज पहाड़ों पर किया गया था. यहां एक ऐसा रेलवे ट्रैक बनाया गया, जिसे आज भी दुनिया का सबसे मुश्किल और खतरनाक रेलवे ट्रैक माना जाता है. इस ट्रैक का नाम डेविल्स नोज यानी शैतान की नाक है. इस ट्रैक की कहानी जितनी रोमांचक है, उतनी ही डरावनी भी है, क्योंकि इसे बनाने के लिए इंसानों को प्रकृति के साथ-साथ एक ऐसे खौफ से लड़ना पड़ा, जिसे लोग शैतान का श्राप मानते थे.

    बात साल 1895 की है, जब इक्वाडोर के राष्ट्रपति जनरल एलोय अल्फारो ने सत्ता संभालते ही एक बड़ा ऐलान किया. उन्होंने देश के तटीय शहर गुआयाकिल को पहाड़ों पर बसी राजधानी क्विटो से रेलवे लाइन के जरिए जोड़ने की बात कही. इस ऐलान के बाद देश में उनका भारी विरोध हुआ. नेताओं से लेकर आम जनता तक, सबका मानना था कि विशाल और ऊंचे एंडीज पहाड़ों को चीरकर ट्रेन ले जाना बिल्कुल नामुमकिन है. लेकिन राष्ट्रपति अल्फारो अपनी जिद के पक्के थे. उन्होंने विरोध प्रदर्शनों की परवाह न करते हुए अमेरिका के कुछ बड़े ठेकेदारों को काम पर रख लिया और उन्हें दुनिया का सबसे कठिन रेलवे ट्रैक बनाने का काम सौंप दिया. इसके बाद साल 1899 में इस ऐतिहासिक रेल लाइन का काम शुरू हुआ.

    जहरीले सांप, जगुआर और भयंकर बीमारियां
    पहाड़ों पर इस रेलवे लाइन को बिछाना कोई बच्चों का खेल नहीं था. काम शुरू होते ही मजदूरों और इंजीनियरों का सामना लगातार आने वाले भूकंप के झटकों, भारी बारिश, घने जंगलों में घूमने वाले खूंखार जगुआर और जहरीले सांपों से हुआ. इतना ही नहीं, मलेरिया और पीला बुखार (येलो फीवर) जैसी घातक बीमारियों ने काम को बहुत धीमा कर दिया. लेकिन इस पूरे रास्ते का सबसे खतरनाक हिस्सा अलाउसी और सिबाम्बे के बीच खड़ी एक 800 मीटर ऊंची सीधी चट्टान था, जिसे डेविल्स नोज कहा जाता था.

    इस सीधी खड़ी चट्टान पर ट्रेन चढ़ाने के लिए इंजीनियरों ने एक अनोखा ‘जिग-जैग’ (Switchback) तरीका निकाला. ट्रेन को 3.5% की सीधी ढलान पर चढ़ाने के लिए ट्रैक को ऐसे काटा गया कि ट्रेन पहले आगे जाती, फिर एक जगह रुकती. इसके बाद ट्रेन का गार्ड नीचे उतरकर ट्रैक का लीवर बदलता और ट्रेन उल्टी दिशा में (रिवर्स होकर) ऊपर की तरफ चढ़ती. फिर यही प्रक्रिया दोबारा दोहराई जाती. इस तरह आगे-पीछे करते हुए ट्रेन इस जानलेवा चट्टान को पार करती थी.

    शैतान का श्राप और 2000 मजदूरों की मौत!
    उस दौर में स्थानीय लोगों के बीच यह बात फैल गई थी कि इस पहाड़ी पर खुद शैतान का वास है. लोग कहते थे कि शैतान नहीं चाहता कि उसके इलाके में कोई ट्रेन चले, इसलिए जो भी यहां काम करेगा उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा. लोगों का यह डर सच साबित होता दिखा. इस खतरनाक ट्रैक को पूरा करते-करते बीमारी, हादसों और खराब मौसम की वजह से 2,000 से ज्यादा मजदूरों की मौत हो गई. इन मरने वालों में जमैका से लाए गए मजदूर, आजादी के लालच में काम पर लगाए गए सैकड़ों कैदी और खुद इस प्रोजेक्ट के चीफ इंजीनियर मेजर जॉन हरमन शामिल थे.

    तमाम मौतों और दिक्कतों के बाद भी साल 1902 में पहली बार ट्रेन ने डेविल्स नोज की चढ़ाई पूरी की, जो उस समय इंजीनियरिंग का एक बहुत बड़ा अजूबा था. यह ट्रेन रूट सालों तक चलता रहा, लेकिन साल 1997 में आए एल नीनो तूफान और भारी लैंडस्लाइड्स ने इस ट्रैक को बुरी तरह तबाह कर दिया, जिससे पूरी लाइन बंद हो गई. हालांकि, आज भी पर्यटकों के रोमांच के लिए अलाउसी से सिबाम्बे के बीच का 12 किलोमीटर का हिस्सा खुला रखा गया है, जहां दुनिया भर से लोग इस ‘शैतान की नाक’ वाले ट्रैक पर ट्रेन के सफर का लुत्फ उठाने और खूबसूरत वादियों को देखने आते हैं.

  • दुनिया का सबसे छोटा ‘ज्वालामुखी’, जिसके अंदर सीढ़ियों से उतरते हैं..

    दुनिया का सबसे छोटा ‘ज्वालामुखी’, जिसके अंदर सीढ़ियों से उतरते हैं..

    दुनिया का सबसे छोटा ‘ज्वालामुखी’, जिसके अंदर सीढ़ियों से उतरते हैं..

    दुनिया में ऐसे कई प्राकृतिक अजूबे हैं, जो वैज्ञानिकों को हैरान करते हैं और पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित करते हैं. ऐसा ही एक अनोखा और रूह कंपा देने वाला ढांचा मेक्सिको के प्यूब्ला शहर के ला लिबर्टाड इलाके में स्थित है, जिसे स्थानीय लोग सदियों से दुनिया का सबसे छोटा ज्वालामुखी कहते आ रहे हैं. इस ऐतिहासिक और रहस्यमयी प्राकृतिक बनावट का नाम है ‘कुएक्सकोमेट’ (Cuexcomate). यह दुनिया की इकलौती ऐसी जगह है, जहां लोग इस सोए हुए ज्वालामुखी के ऊपर चढ़कर लोहे की घुमावदार सीढ़ियों के सहारे इसके पाताल जैसे गहरे और खोखली खाई के अंदर उतर सकते हैं. वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिकों के अनुसार, कुएक्सकोमेट असल में कोई सक्रिय या मृत ज्वालामुखी नहीं है, बल्कि यह एक बुझा हुआ गीजर (जमीन के अंदर से निकलने वाला गर्म पानी का झरना) या एक ‘मिट्टी का ज्वालामुखी’ है.

    स्थानीय नहुआतल भाषा में ‘कुएक्सकोमेट’ शब्द का अर्थ ही मिट्टी का मटका होता है. माना जाता है कि इसका निर्माण साल 1064 में मेक्सिको के दूसरे सबसे ऊंचे और सक्रिय ज्वालामुखी ‘पोपोकाटेपेटल’ के एक भयंकर विस्फोट के दौरान हुआ था. उस भीषण ज्वालामुखी विस्फोट के कारण जमीन के अंदर मौजूद भू-तापीय झरने सक्रिय हो गए और वे चूना पत्थर की परतों को चीरते हुए भारी दबाव के साथ बाहर आए. इस प्रक्रिया में जमे कैल्साइट और सिलिकेट के मलबे ने धीरे-धीरे एक विशाल ढेर का रूप ले लिया. आज यह ढांचा 43 फीट ऊंचा और 75 फीट चौड़ा है, जो दिखने में बिल्कुल किसी छोटे ज्वालामुखी के शंकु जैसा प्रतीत होता है. यह भीतर से पूरी तरह खोखला है और इसके शीर्ष पर 23 फीट चौड़ा एक बड़ा मुहाना है. टूरिस्ट्स की सुविधा के लिए अब इसमें एक घुमावदार धातु की सीढ़ी लगाई गई है, जिसके जरिए लोग इसके अंदर आसानी से उतरकर अद्भुत नजारा देख सकते हैं.

    नरबलि का खौफनाक इतिहास
    कुएक्सकोमेट का इतिहास जितना वैज्ञानिक रूप से दिलचस्प है, उतना ही सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से डरावना भी रहा है. इसके बाहर साल 1970 में लगाए गए एक शिलालेख पर साल 1585 के एक इतिहासकार का कथन लिखा है. उन्होंने इसे एक विशाल अकेले खड़े पत्थर के रूप में वर्णित किया था, जिसके शिखर पर एक बहुत बड़ा मुंह है, मानो कोई गहरा कुआं हो और जिसके तल में बेहद दुर्गंधयुक्त पानी भरा हुआ था. इस शिलालेख से यह भी पता चलता है कि प्राचीन काल में स्थानीय स्वदेशी जनजातियों द्वारा अपने देवताओं को खुश करने के लिए इस खोखले ढांचे के अंदर इंसानों की बलि दी जाती थी. इतना ही नहीं, बाद के दौर में समाज द्वारा तिरस्कृत और आत्महत्या करने वाले लोगों के शवों को भी इसी गहरे गड्ढे में फेंक दिया जाता था, क्योंकि उस समय के समाज का मानना था कि आत्महत्या करने वाले लोग शोक या पारंपरिक दफ़न के हकदार नहीं हैं.

    इन खौफनाक और रूह कंपा देने वाले हादसों के कारण ही इस गीजर के आसपास रहने वाले स्थानीय लोगों को कभी-कभी बेहद खौफनाक नाम “शैतान की नाभि की संतानें” (Children of the Devil’s Navel) कहकर पुकारा जाता था. एक समय था जब यह सुनसान इलाके में दूर से दिखने वाली इकलौती ऐतिहासिक पहचान थी, लेकिन आज इसके चारों तरफ आधुनिक शहरी विकास हो चुका है. इसके बावजूद, अपने इसी डरावने इतिहास, अनोखी बनावट और रोमांचक अनुभव के कारण कुएक्सकोमेट आज भी मेक्सिको के प्यूब्ला शहर का सबसे पसंदीदा और लोकप्रिय पर्यटन स्थल बना हुआ है, जहां हर साल हजारों सैलानी ज्वालामुखी की गहराई में उतरने का अनूठा रोमांच महसूस करने आते हैं.

  • खूबसूरती की चाह में चेहरे पर रोज लगाती थी सिलिकॉन इंजेक्शन..?

    खूबसूरती की चाह में चेहरे पर रोज लगाती थी सिलिकॉन इंजेक्शन..?

    खूबसूरती की चाह में चेहरे पर रोज लगाती थी सिलिकॉन इंजेक्शन..?

    वारसॉ (पोलैंड). खूबसूरती पाने की चाहत जब एक पागलपन या मानसिक बीमारी का रूप ले ले, तो इसके नतीजे कितने खौफनाक हो सकते हैं, इसका एक जीता-जागता और डरावना उदाहरण पोलैंड से सामने आया है. यहां एक 26 साल की युवती एल्वा ने महंगे डॉक्टरों और कॉस्मेटिक क्लीनिकों की फीस से बचने के लिए इंटरनेट से नकली और बिना लाइसेंस वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स खरीदे. इसके बाद उसने किसी भी ट्रेनिंग के बिना, घर पर ही खुद से अपने चेहरे पर सिलिकॉन के इंजेक्शन लगाना शुरू कर दिया. इस जानलेवा लापरवाही का नतीजा यह हुआ कि आज उसके चेहरे की हालत बद से बदतर हो चुकी है. आईने में एल्वा अब खुद को भी पहचान नहीं पा रही है.

    मूल रूप से पोलैंड के एक छोटे से शहर में लड़के के रूप में जन्मी एल्वा पिछले कई सालों से अपनी शारीरिक बनावट और लुक को लेकर मानसिक तनाव से गुजर रही थीं. अपने चेहरे को बदलने की चाहत में उसने कुछ साल पहले ब्लैक मार्केट से संदिग्ध कॉस्मेटिक उत्पाद ऑर्डर करना शुरू किया. शुरुआत में उन्होंने खुद ही चेहरे की चर्बी घटाने वाली दवाओं के इंजेक्शन सप्ताह में दो बार अपने चेहरे पर लगाने शुरू किए. इसका असर यह हुआ कि उसका चेहरा जरूरत से ज्यादा पतला और पिचक गया. इस नुकसान की भरपाई करने के लिए उसने इंटरनेट से इंजेक्टेबल लिपोलिसिस और नकली सिलिकॉन खरीदा और उसे चेहरे पर इंजेक्ट करना शुरू कर दिया.

    एल्वा ने एक पोलिश समाचार आउटलेट को बताया कि शुरुआत में वे सप्ताह में एक बार सिलिकॉन इंजेक्शन लगाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें इसकी ऐसी लत लगी कि वे हर दिन अपने चेहरे पर खुद ही सुई चुभाने लगीं. उस समय वे वारसॉ शहर में रह रही थीं और उनकी अधिकांश कमाई कमरे के किराए में चली जाती थी, इसलिए उनके पास किसी एक्सपर्ट डॉक्टर के पास जाने के पैसे नहीं थे. ऐसे में बिना किसी डॉक्टरी प्रशिक्षण और भारी मात्रा में नकली सिलिकॉन का इस्तेमाल करने के कारण एल्वा के पूरे चेहरे पर गंभीर सूजन आ गई. उनकी त्वचा पर गहरे निशान (Scars) पड़ गए हैं और उनकी आंखें सूजन के कारण लगभग पूरी तरह बंद हो चुकी हैं.

    इस मामले पर चिंता जताते हुए एस्थेटिक मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ मारेक वासिलुक ने कहा कि एल्वा ने जिन उत्पादों का इस्तेमाल किया है, वे प्रमाणित नहीं हैं और बेहद खतरनाक हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि भले ही अभी कोई गंभीर संक्रमण न दिख रहा हो, लेकिन अगले छह महीनों में यह सूजन जानलेवा इन्फेक्शन का रूप ले सकती है, जिसमें उनकी आंखों को सबसे बड़ा खतरा है. वहीं, मनोवैज्ञानिक पॉलिना मिएर्जेजेवस्का का मानना है कि एल्वा ‘बॉडी डिस्मॉर्फिया’ नाम की एक गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, जिसमें व्यक्ति अपने वास्तविक रूप को नापसंद करने लगता है और जोखिमों की परवाह किए बिना काल्पनिक रूप पाने की जिद में अंधा हो जाता है. डॉक्टरों के अनुसार, एल्वा को वापस सामान्य स्थिति में लाने के लिए पहले मानसिक काउंसलिंग और फिर चेहरे के नुकसान का आकलन करने के लिए एमआरआई कराना होगा.

  • युवाओं के मन में क्रांति का बीज बोने वाले सुखदेव की कहानी, देश के लिए हर रिश्ता किया कुर्बान…

    युवाओं के मन में क्रांति का बीज बोने वाले सुखदेव की कहानी, देश के लिए हर रिश्ता किया कुर्बान…

    युवाओं के मन में क्रांति का बीज बोने वाले सुखदेव की कहानी, देश के लिए हर रिश्ता किया कुर्बान…

    उस बच्चे को दिवाली के मेले के लिए मिले पैसों से मिठाई की जगह झांसी की रानी की तस्वीर की तलाश रहती थी. तस्वीर न मिलती तो मन उदास हो जाता. मिल जाती तो चेहरे पर चमक आ जाती. मां से वो बच्चा कहता कि झांसी की रानी के रास्ते चलूंगा. लाहौर में आगे की पढ़ाई के समय आर्यसमाजी ताऊ की सलाह डी.ए.वी.कॉलेज के लिए थी. उस किशोर की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था, जो राष्ट्रीय आंदोलन की नर्सरी था. यहीं सुखदेव और सरदार भगत सिंह का साथ हुआ. यह ऐसा साथ था कि फांसी के फंदे पर भी कायम रहा.

    क्रांतिकारी रास्ते से ब्रितानी हुकूमत को उखाड़ फेंकने में यकीन रखने वाले सुखदेव और उनके साथियों के हाथों में सिर्फ पिस्तौल-बम नहीं थे. वे खूब पढ़ते थे. वैचारिक दृष्टि से समृद्ध थे. महात्मा गांधी से मतभेद थे लेकिन उनका आदर करते थे. सवाल भी करते थे. उन्होंने महात्मा गांधी को लिखा था “मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित कल्पना में विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं. विनाश और संहार में आनंद मनाते हैं. वस्तुस्थिति ठीक उल्टी है. वे सदैव कोई कदम उठाने से पहले खूब विचार कर लेते हैं.” सरदार भगत सिंह के साथ फांसी पर चढ़ने वाले 23 साल के सुखदेव उन जैसे ही पढ़ाकू, तेजस्वी और साहसी थे. पढ़िए अमर शहीद सुखदेव की गाथा.

    झांसी की रानी जैसा बनूंगा

    15 मई 1907 को जन्मे सुखदेव के सिर से सिर्फ तीन साल की उम्र में पिता रामलाल थापर का साया उठ गया था. मां रल्ली देई की ममता और गांधीवादी ताऊ चिन्त राम थापर के संरक्षण के बीच वे पढ़ते और देश-समाज को समझने की कोशिश करते रहे. लेकिन उनकी मंजिल क्या होगी, इसके संकेत बचपन में ही मिलने लगे थे.

    Rani Laxmi Bai

    रानी लक्ष्मीबाई.

    दिवाली में घर के बच्चों को पैसे मिलते. वे पटाके और मिठाइयां खरीदने के लिए निकल पड़ते. लेकिन छोटे से सुखदेव को उस तस्वीर की तलाश रहती जिसमें घोड़े पर सवार झांसी की रानी पीठ पर बच्चा बंधा होता. एक हाथ में लगाम होती. दूसरे में तलवार. कभी तस्वीर मिलती. कभी नहीं. जब नहीं मिलती, तब उदासी घेर लेती. मिल जाती तो चेहरा चमक उठता. घर पहुंच मां को तस्वीर दिखाते वह यही कहता – ऐसा ही बनूँगा.

    कॉलेज में हुआ भगत सिंह का साथ

    एक सदी से अधिक पहले के उस दौर की कल्पना की जाए, जब न इतने अखबार थे और न चौबीस घंटे चलने वाले खबरिया चैनल. देश-दुनिया के हाल जानने के सीमित संचार साधनों के बीच भी जो सजग-संवेदनशील और जागरूक थे, उसे पंद्रह साल के किशोर सुखदेव के जरिए समझिए. 1922 में लायलपुर से उन्होंने हाईस्कूल पास किया. आगे की पढ़ाई के लिए लाहौर गए.

    आर्यसमाजी ताऊ उन्हें डी.ए.वी.कॉलेज में दाखिल कराना चाहते थे. लेकिन सुखदेव की पसंद लाला लाजपत राय द्वारा संस्थापित नेशनल कॉलेज था. उन्हें पता था कि यह कॉलेज उनकी राष्ट्रवादी सोच के अनुकूल है और जिस माहौल और साथ की उन्हें चाह है , वह यहीं हासिल हो सकता है. यहीं उनका साथ सरदार भगत सिंह का साथ हुआ, जो आखिरी सांस तक कायम रहा.

    सुखदेव.

    सुखदेव भी भगत सिंह जैसे पढ़ाकू

    तीन साल बाद सुखदेव के छोटे भाई मथरादास भी पढ़ाई के लिए लाहौर पहुंचे. हॉस्टल छोड़कर सुखदेव एक किराए के मकान में आ गए. इस बीच सुखदेव अपने कोर्स से ज्यादा इतिहास, राजनीति और दुनिया के कई देशों की क्रांतियों से जुड़ी किताबों में डूबे रहे. उनकी आलमारी में ये किताबें सिर्फ सजी नहीं थीं , बल्कि सुखदेव और साथियों के बीच उन पर लगातार चर्चा होती रहती थी. सुखदेव और भगत सिंह के बीच अराजकतावाद पर लंबी बहसें मथरादास ने भी खूब सुनीं. बाद में अपने भाई सुखदेव पर लिखी किताब में मथरादास ने याद किया कि उन्हीं दिनों भगत सिंह ने द्वारका दास लाइब्रेरी से प्राप्त किताब “अनारकिज्म एंड अदर एसेज” पढ़ी थी. इस किताब पर भगत सिंह और सुखदेव महीनों तक मंथन करते रहे. प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने लिखा है, “भगत सिंह और सुखदेव को छोड़कर अन्य किसी साथी ने समाजवाद पर उन जैसा पढ़ा और मनन नहीं किया था. उनका ज्ञान हमारी तुलना में कहीं अधिक था.”

    क्रांति के लिए हर रिश्ता कुर्बान

    अप्रैल 1929 के मशहूर असेंबली बम एक्शन के लिए चंद्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को नहीं चुना था. यह पहला क्रांतिकारी एक्शन था, जिसमें बम फेंकने के बाद भागने की जगह क्रांतिकारियों को अपनी गिरफ्तारी देनी थी. पुलिस को सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह की तलाश थी. आजाद को पता था कि एक बार भगत सिंह के जेल में पहुंच जाने के बाद उनकी वापसी मुमकिन नहीं होगी. आजाद अपने बेशकीमती साथी को खोना नहीं चाहते थे. लेकिन सुखदेव का प्रस्ताव था कि इसमें भगत सिंह को जरूर शामिल किया जाए.

    साथियों की बैठक में सुखदेव सिंह ने भगत सिंह को ललकारा भी था. फिर भगत सिंह अड़ गए थे. आजाद के बहुत समझाने पर भी नहीं माने थे. बटुकेश्वर दत्त के साथ सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद उन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी थी. सुखदेव की दलील थी कि भगत सिंह अकेले व्यक्ति हैं, जो दल के उद्देश्यों को प्रभावी तरीके से जनता के सामने रख सकते हैं.

    Bhagat Singh

    भगत सिंह.

    प्रसिद्ध क्रांतिकारी शिव वर्मा ने “संस्मृतियों” में लिखा, “सुखदेव में व्यक्तिगत तौर पर सबसे ज्यादा भगत सिंह के लिए ममता थी. प्यार नाम की जो पूंजी उनके पास थी, वह उन्होंने भगत सिंह को ही सौंपी थी. लेकिन समय आने पर आदर्शों के लिए अपने सबसे प्यारे दोस्त को मौत के मुंह में भेजने में उन्होंने संकोच नहीं किया. क्रांति के रास्ते प्यार और दोस्ती कैसे आड़े आ सकती थी?”

    अदालत में बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं

    असेंबली बम कांड में जेल पहुंचे भगत सिंह सांडर्स हत्याकांड के भी अभियुक्त थे. सुखदेव की भी इसी मामले में गिरफ्तारी हुई. लाहौर षडयंत्र केस के नाम से चर्चित इस मामले में स्पेशल ट्रिब्यूनल के सामने अन्य साथियों की तरह सुखदेव की भी अपने बचाव में कोई दिलचस्पी नहीं थे. सरकारी खर्च पर वकील मुहैया करने की अदालत की पेशकश पर उनका जवाब था कि वे इस अदालत को ही मान्यता नहीं देते. भगत सिंह की तरह सुखदेव ने भी अदालती कार्यवाही को क्रांतिकारी आदर्शों के प्रचार का जरिया बनाया. इस दौरान या तो ब्रिटिश राज के खिलाफ नारे लगाते रहे या फिर कटघरे में ही किसी किताब में डूबे रहे. तय मानते थे कि सरकार छोड़ेगी नहीं और जिन्हें फांसी होनी है, उसमें उनका भी नाम होगा. कभी कह पड़ते थे कि न्याय का यह आडंबर कब तक चलता रहेगा ? फैसला वही हुआ. अदालत ने भगत सिंह और राजगुरु के साथ सुखदेव को भी फांसी की सजा सुनाई.

    जेल से महात्मा गांधी को पत्र

    फांसी का सुखदेव और साथियों को बेसब्री से इंतजार था. इस दौरान भी वे लिख-पढ़ रहे थे. आखिरी दिनों में सुखदेव ने अपने छोटे भाई मथरादास को महात्मा गांधी के नाम लिखा एक पत्र सिपुर्द किया था. मथरादास ने काफी मुश्किलों के बीच इसे कांग्रेस के कराची अधिवेशन में महात्मा गांधी तक महादेव देसाई के जरिए पहुंचाया था. दुर्भाग्य से उसके पहले 23 मार्च 1931 को सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को फांसी हो चुकी थी. सुखदेव ने महात्मा गांधी को लिखा था कि समझौते (गांधी-इर्विन पैक्ट) के बाद क्रांतिकारियों से अपना आंदोलन बंद करने और अहिंसक उपायों के प्रयोग की आपने कई प्रकट प्रार्थनाएं की हैं.

    Mahatma Gandhi

    महात्मा गांधी.

    हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के नाम से ही स्पष्ट है कि क्रांतिकारियों का आदर्श समाज सत्तावादी प्रजातंत्र स्थापित करना है और जब तक ये ध्येय प्राप्त न हो और जब तक आदर्श सिद्ध न हों ,वे लड़ाई जारी रखने के लिए बंधे हुए हैं. क्रांतिकारी युद्ध जुदा जुदा मौकों पर अलग रूप धारण करता है. कभी गुप्त, कभी प्रकट और कभी जीवन मरण का भयानक संग्राम बन जाता है. ऐसी परिस्थिति में क्रांतिकारियों के सामने अपना आंदोलन बंद करने के लिए विशेष कारण होने चाहिए. निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतिकारी युद्ध में कोई महत्व नहीं होता.

    महात्मा गांधी पर नौकरशाही की मदद का आक्षेप

    सुखदेव ने महात्मा गांधी से उम्मीद जताई थी,”मैं नहीं मानता कि आप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास करते हैं कि क्रांतिकारी बुद्धिहीन हैं. विनाश और संहार में आनंद मनाते हैं. वस्तुस्थिति ठीक उल्टी है. वे सदैव कोई कदम उठाने से पहले खूब विचार कर लेते हैं. क्रांति के कार्य में दूसरे किसी अंग की अपेक्षा रचनात्मक पक्ष का महत्व समझते हैं लेकिन मौजूदा हालत में अपने संहारक अंग पर डटे रहने के अलावा कोई चारा नहीं है.”

    याद दिलाया कि 1915 से जेलों में पड़े गदर पार्टी के बीसियों कैदियों सजा की मियाद पूरी करने के बाद भी सड़ रहे हैं. मार्शल लॉ के बीसियों कैदी आज भी जिंदा कब्रों में दफनाए पड़े हैं.यही हाल बब्बर अकाली कैदियों का है. देवगढ़, काकोरी, मछुआ बाजार और लाहौर षड्यंत्र के कैदी भी जेलों में हैं. लाहौर, दिल्ली, चटगांव,बंबई, कलकत्ता और अन्य जगहों के आधा दर्जन से ज्यादा षड्यंत्र मामले चल रहे हैं. बहुसंख्यक क्रांतिकारी जिसमे स्त्रियां भी हैं भागते फिर रहे हैं. सचमुच आधा दर्जन से ज्यादा कैदी फांसी के इंतजार में हैं. ये सब होने के बाद भी आप उन्हें अपना आंदोलन स्थगित करने की सलाह देते हैं. ऐसी दशा में आपकी प्रार्थनाओं का यही मतलब होता है कि इस आंदोलन को कुचल देने में आप नौकरशाही की मदद कर रहे हैं और आपकी विनती का अर्थ उनके दल का द्रोह,पलायन और विश्वासघात का उपदेश करना है.

    गांधी का जवाब लेकिन तब तक सुखदेव नहीं रहे

    30 अप्रैल 1931 के “हिंदी नवजीवन” में महात्मा गांधी ने सुखदेव के पत्र का जवाब दिया था लेकिन तब तक वे शहीद हो चुके थे. सुखदेव ने गांधी को लिखे पत्र में स्वयं को अनेकों में एक बताया था. बापू ने लिखा कि स्वर्गीय सुखदेव का यह पत्र मुझे उनकी मृत्यु के बाद दिया गया. वे अनेकों में एक नहीं हैं. राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए फांसी को गले लगाने वाले अनेक नहीं होते. राजनीतिक खून चाहें जितने निंद्य हों, तो भी जिस देश प्रेम और साहस के कारण ऐसे भयानक काम किए जाते हैं, उनकी कद्र किए बिना नहीं रहा जा सकता. और, यह आशा रखें कि राजनीतिक खूनियों का संप्रदाय बढ़ नहीं रहा है. यदि भारत वर्ष का प्रयोग सफल हुआ, और होना ही चाहिए, तो राजनीतिक खूनियों का पेशा सदा ले लिए बंद हो जाएगा. मैं स्वयं तो इसी श्रद्धा के साथ काम कर रहा हूं. लेखक यह कहकर मेरे साथ अन्याय करते हैं कि क्रांतिकारियों से उनका आंदोलन बंद करने की भावपूर्ण प्रार्थनाएं करने के सिवा मैंने कुछ नहीं किया.उल्टे मेरा दावा तो यह है कि मैंने उनके सामने नग्न सत्य रखा है, जिसका इन स्तंभों में कई बार जिक्र किया जा चुका है और उसे फिर से दोहराया जा सकता है.

  • OMG! जिससे शादी कर दो बच्चे किए, वो निकली चचेरी बहन, सच्चाई जान हिल गया पति..

    OMG! जिससे शादी कर दो बच्चे किए, वो निकली चचेरी बहन, सच्चाई जान हिल गया पति..

    OMG! जिससे शादी कर दो बच्चे किए, वो निकली चचेरी बहन, सच्चाई जान हिल गया पति..

    सोशल मीडिया पर इन दिनों एक अजीबोगरीब और हैरान कर देने वाला मामला तेजी से वायरल हो रहा है. एक टिकटॉक क्रिएटर ने जब अपने परिवार के इतिहास का पता लगाने के लिए DNA टेस्ट कराया, तो जो सच सामने आया उसने उसके पैरों तले जमीन खिसका दी. जिस महिला से उसकी शादी हुई और जिससे उसके दो प्यारे बच्चे हैं, वह असल में उसकी चचेरी बहन निकली. इस चौंकाने वाले खुलासे ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी है और लोग इस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

    जब अजनबी बन गए रिश्तेदार

    बोर्ड पांडा की रिपोर्ट के अनुसार, टिकटॉक पर @toothlessandruthless नाम से वीडियो शेयर करने वाले इस क्रिएटर ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसका पारिवारिक इतिहास ऐसा मोड़ लेगा. वह और उसकी पत्नी दोनों ही अपनी फैमिली हिस्ट्री और डीएनए का पता लगाना चाहते थे. जब दोनों की डीएनए रिपोर्ट्स आईं, तो पता चला कि वे दोनों आपस में फर्स्ट कजिन हैं. हैरानी की बात यह थी कि शादी से पहले इस बात की भनक न तो उन दोनों को थी और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य को.

    बच्चों के भविष्य और तलाक की चिंता

    इस खुलासे के बाद से वह व्यक्ति गहरे मानसिक तनाव में है. उसने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करते हुए लोगों से सलाह मांगी कि अब उसे क्या करना चाहिए. उसने वीडियो में कहा, जब से मुझे पता चला है कि मैंने अपनी चचेरी बहन से शादी की है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या करूं. क्या हमें तलाक ले लेना चाहिए? हमारे बच्चों का क्या होगा? उनका यह वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया और इसे करोड़ों लोग देख चुके हैं.

    क्यों नहीं हुई थी किसी को पहले इस रिश्ते की भनक?

    लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह था कि शादी के वक्त किसी को इस पारिवारिक संबंध के बारे में क्यों नहीं पता चला? इस पर क्रिएटर ने सफाई दी कि यह रिश्ता उनकी फैमिली ट्री की एक ऐसी भूली-बिसरी शाखा से जुड़ा था जिसके बारे में किसी को जानकारी नहीं थी. उनकी दादी और उनकी पत्नी की दादी सगी बहनें थीं, लेकिन वक्त के साथ यह संपर्क टूट गया और दोनों परिवारों को कभी इस बात का अंदाजा ही नहीं हुआ.

    दो हिस्सों में बंटे नेटिजन्स

    इस वायरल खुलासे पर सोशल मीडिया यूजर्स की राय दो हिस्सों में बंट गई है. कुछ लोगों का कहना है कि चचेरे भाई-बहनों में शादी के बाद पैदा होने वाले बच्चों में थैलेसीमिया, सिस्टिक फाइब्रोसिस जैसी जेनेटिक बीमारियां होने का खतरा थोड़ा बढ़ जाता है. इसलिए उन्हें तुरंत बच्चों की मेडिकल जांच करवानी चाहिए और कपल्स थेरेपी लेनी चाहिए. यह भी पढ़ें: डर की ऐसी की तैसी! 97 साल की ‘दादी’ ने उड़ते प्लेन पर किया ऐसा स्टंट, देख दंग रह गई दुनिया

    बात को दबाने की सलाह

    वहीं कुछ यूजर्स का मानना है कि अब बहुत देर हो चुकी है, उनके दो बच्चे हैं, इसलिए उन्हें डरने की जरूरत नहीं है और इस बात को यहीं खत्म कर देना चाहिए क्योंकि इतिहास में भी ऐसे कई उदाहरण रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय शांत रहकर डॉक्टर और जेनेटिक काउंसलर की मदद लेनी चाहिए.

  • पेपर में मैडम ने पूछा- जानवर क्यों हो रहे गायब, बच्चे ने दिया ऐसा जवाब

    पेपर में मैडम ने पूछा- जानवर क्यों हो रहे गायब, बच्चे ने दिया ऐसा जवाब

    पेपर में मैडम ने पूछा- जानवर क्यों हो रहे गायब, बच्चे ने दिया ऐसा जवाब

    सोशल मीडिया पर तमाम तरह के वीडियो वायरल होते रहते हैं, जो बहुत मजेदार होते हैं. खासतौर पर बच्चों के फनी वीडियो को लोग खूब पसंद करते हैं. आजकल जैसे-जैसे सोशल मीडिया का जमाना आगे बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे अलग-अलग तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते रहते हैं. स्कूल के वीडियो भी खूब लोगों को पसंद आते हैं. ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर इन दिनों वायरल हो रहा है. वायरल हो रहा वीडियो एक स्कूल के क्लासरूम का है, जिसमें एक क्लास टीचर नजर आ रही है और कुछ बच्चे बेंच पर बैठे हुए नजर आ रहे हैं.

    वायरल वीडियो में मैडम बच्चों की टेस्ट कॉपी देख रही हैं. जिसमें एक कॉपी को लेकर वह बहुत हंसती हुई नजर आ रही हैं. दरअसल, टेस्ट में सवाल पूछा गया था कि जंगलों से वन्य जीव क्यों कम होते जा रहे हैं, इसका कारण क्या है? इस सवाल का जवाब एक बच्चे ने बहुत मजेदार दिया है. बच्चे ने कॉपी में प्रश्न का जवाब लिखा है कि जंगलों से वन्य जीव इसलिए गायब हो रहे हैं. क्योंकि वह किडनैप हो रहे हैं और फिर उनको जू में लाया जा रहा है.

     

     

    बच्चे ने जवाब में लिखा, ‘इतने पेड़-पौधे कट रहे हैं. और जानवर किडनैप हो रहे हैं. और जू में जा रहे हैं. इसलिए वन्यजीवों की संख्या में गिरावट आ रही है. इस वायरल वीडियो को हजारों लोगों ने लाइक्स किया है. इस तरह के वीडियो खूब वायरल होते रहते हैं. क्योंकि लोग खूब पसंद करते हैं. बच्चे सवालों के जवाब बहुत मजेदार देते हैं.

  • हर सपना सुबह तक याद क्यों नहीं रहता? पता चल गई असली वजह..

    हर सपना सुबह तक याद क्यों नहीं रहता? पता चल गई असली वजह..

    हर सपना सुबह तक याद क्यों नहीं रहता? पता चल गई असली वजह..

    सपने आने के पीछे वैज्ञानिकों ने कई वजह बताई है.

    सपना हर कोई देखता है, लेकिन हर सपना सुबह तक याद नहीं रहता. कुछ बिल्कुल याद नहीं रहता. कुछ थोड़ा-बहुत मेमोरी में रह जाता है. अब सवाल है कि सपना देखते ही क्यों है और यह पूरी तरह से याद क्यों रहता. विज्ञान कहता है, सपने का कनेक्शन इस बात से होता है कि हमारे दिमाग की मेमोरी कैसी है. सोते समय कौन-कौन सी बातें याद हैं और वो इंसान भावनात्मक रूप से यानी इमोशनली कैसा है.

    नींद कई चरणों में बंटी होती है. इसका एक हिस्सा है REM (रैपिड आई मूवमेंट) स्लीप. सपने नींद के इसी चरण में आते हैं. इस दौरान आंखें तेजी से इधर-उधर घूमती हैं, दिल की धड़कन और सांस की रफ्तार बदलती रहती है, और दिमाग लगभग उतना ही सक्रिय हो जाता है जितना जागते समय होता है, बस शरीर सोया रहता है.

    सपने क्यों आते हैं?

    इस सवाल पर वैज्ञानिकों के बीच अभी भी पूरी सहमति नहीं है, लेकिन कुछ ठोस थ्योरी बताई गई हैं.

    1- मेमोरी प्रोसेसिंग थ्योरी

    इस थ्योरी की सबसे ज्यादा मानी जाने वाली वजह यह है कि नींद के दौरान दिमाग जरूरी जानकारियों और यादों को व्यवस्थित करता है, यही वजह है कि कोई नई चीज सीखने के बाद अच्छी नींद लेने से उसे बेहतर तरीके से याद रखा जा सकता है.

    सपने इसी प्रोसेस का एक साइड-इफेक्ट माने जाते हैं. दिमाग दिनभर जमा हुई जानकारी को छांटता है, जरूरी यादों को पक्का करता है और बेकार डेटा को हटाता है.

    नींद के दौरान दिमाग जरूरी जानकारियों और यादों को व्यवस्थित करता है. फोटो: Pexels

    2-दिमाग का कौन सा हिस्सा शामिल?

    ब्रेन स्कैन से पता चलता है कि सपने देखते वक्त याद्दाश्त, इमोशन और कल्पना से जुड़े दिमाग के कई हिस्से बेहद सक्रिय हो जाते हैं. हिप्पोकैम्पस दिनभर की यादों को प्रोसेस करने में मदद करता है, जबकि एमिग्डाला (जो डर और भावनाओं को संभालता है) भी उसी समय बहुत सक्रिय हो जाता है.

    यही वजह है कि कई सपनों में डर, चिंता या भावनाएं शामिल होती हैं. दिमाग असल में उन्हीं भावनाओं को प्रोसेस कर रहा होता है जो दिनभर में अनुभव हुईं या कुछ समय पहले हुई.

    3- इमोशनल रिहर्सल थ्योरी

    कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि सपने एक तरह की “इमोशनल रिहर्सल” हैं. दिमाग मुश्किल या तनावपूर्ण स्थितियों को सुरक्षित माहौल में दोहराकर हमें असल जिंदगी में उनसे निपटने के लिए तैयार करता है.

    नींद के जिस भी चरण में हम अचानक जागते हैं, उसका असर मेमोरी पर पड़ता है. फोटो: Pexels

    पूरा सपना क्यों नहीं याद रहता?

    यहां दिमाग की केमिस्ट्री एक बड़ा रोल निभाती है. REM स्लीप के दौरान ‘नॉरपेनेफ्रिन’ नाम का एक केमिकल दिमाग में बेहद कम मात्रा में मौजूद होता है. यह वही केमिकल है जो हमें नई यादों को मजबूती से दर्ज करने और बाद में याद रखने में मदद करता है. चूंकि सपने देखते वक्त इसका स्तर बहुत नीचे रहता है, दिमाग उस अनुभव को स्थायी याददाश्त में ठीक से “सेव” नहीं कर पाता. इसलिए जागते ही ज्यादातर सपने धुंधले पड़ने लगते हैं और कुछ ही मिनटों में पूरी तरह गायब हो जाते हैं.

    इसके अलावा टाइमिंग का भी बड़ा असर होता है. नींद के जिस भी चरण में हम अचानक जागते हैं, उसका असर याद रहने पर पड़ता है. अगर कोई व्यक्ति REM चरण के ठीक अंत में जागता है, जब शरीर नींद के अगले चरण के लिए तैयार हो रहा होता है. तो उसे अपने सपने सबसे ज्यादा याद रहते हैं. यही वजह है कि अलार्म की आवाज से अचानक जागने पर कई बार सपना बहुत साफ याद रहता है, जबकि अपने-आप धीरे-धीरे जागने पर वही सपना कुछ ही देर में भूल जाता है.

  • 258 करोड़ की Online Shopping, फिर भी एक भी पैकेट नहीं खोला… महिला की कहानी सुन रह जाएंगे हैरान

    258 करोड़ की Online Shopping, फिर भी एक भी पैकेट नहीं खोला… महिला की कहानी सुन रह जाएंगे हैरान

    258 करोड़ की Online Shopping, फिर भी एक भी पैकेट नहीं खोला… महिला की कहानी सुन रह जाएंगे हैरान

    कई लोग तनाव कम करने के लिए संगीत सुनते हैं, फिल्म देखते हैं या दोस्तों के साथ समय बिताते हैं. लेकिन जापान में एक महिला ने स्ट्रेस दूर करने के लिए ऐसा तरीका अपनाया, जिसे सुनकर शायद आप भी हैरान रह जाएंगे. महिला ऑनलाइन शॉपिंग साइट पर एनीमे कैरेक्टर्स से जुड़े सामान देखती थी और सामान को ऑर्डर करने से उसे काफी सुकून मिलता था. हैरानी की बात यह है कि उसने करीब दो साल में 258 करोड़ रुपये से ज्यादा के सामान के ऑर्डर कर डाले, लेकिन इनमें से एक भी प्रोडक्ट उसके घर नहीं पहुंचा.

    जापान की 32 वर्षीय महिला योशिदा पर आरोप है कि वह ऑनलाइन स्टोर से सामान ऑर्डर करने के बाद अलग-अलग तरीकों से उसे कैंसिल करवा देती थी. कई बार वह डिलीवरी के लिए अपना सही पता देने के बजाय गलत या नकली पता इस्तेमाल करती थी. ऐसे में डिलीवरी एजेंट किसी दूसरे घर तक पहुंच जाता और सामान महिला तक पहुंचने से पहले ही ऑर्डर रद्द हो जाता था. कुछ मामलों में उसने पार्सल की पेमेंट के लिए कन्वीनियंस स्टोर का विकल्प चुना, लेकिन तय समय के अंदर भुगतान नहीं किया. वहीं कुछ ऑर्डर में उसने कैश ऑन डिलीवरी के समय सामान लेने से साफ इनकार कर दिया. इस तरह ऑर्डर करने और फिर उसे कैंसिल कराने का सिलसिला लगातार चलता रहा.

    दो साल में 2 हजार से ज्यादा ऑर्डर कैंसिल
    रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सिलसिला करीब दो साल तक चला और इस दौरान महिला ने 2,000 से ज्यादा ऑर्डर अलग-अलग तरीकों से कैंसिल किए. बार-बार ऑर्डर कैंसिल होने से सिर्फ ऑनलाइन स्टोर का काम ही प्रभावित नहीं हुआ, बल्कि कंपनी को डिलीवरी और उससे जुड़े खर्चों का भी नुकसान उठाना पड़ा. जापानी ब्रॉडकास्टर FNN प्राइम ऑनलाइन के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया में शुएशा के Jump Characters Store को करीब 75 लाख येन यानी लगभग 45 लाख रुपये का नुकसान हुआ. कंपनी के लिए परेशानी इसलिए भी बढ़ी क्योंकि जिन प्रोडक्ट्स को महिला बार-बार बुक करती और फिर कैंसिल करती थी, उन्हें उस दौरान दूसरे ग्राहक खरीद नहीं पाते थे.

    महिला ने बताया, ऑर्डर करने से मिलता था सुकून
    जांच के दौरान योशिदा ने अपने इस व्यवहार की वजह भी बताई. उसके मुताबिक, उसे ऑनलाइन स्टोर पर एनीमे कैरेक्टर्स के सामान देखना काफी पसंद था. रोजमर्रा की जिंदगी में टेंशन ज्यादा होने के कारण जब भी वह किसी सामान के उपलब्ध होने से पहले उसे ऑर्डर करती थी, तो उसे एक अलग तरह की संतुष्टि महसूस होती थी. उसने यह भी कहा कि कंपनी के प्रति उसकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी. वह यह सब अपने टेंशन को कम करने और खुद को अच्छा महसूस कराने के लिए करती थी. यानी उसके लिए असली खुशी सामान हासिल करने में नहीं, बल्कि उसे ऑनलाइन ऑर्डर करने में थी.

    238 अलग-अलग अकाउंट्स से करती थी शॉपिंग
    इस मामले की एक और हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि महिला ने ऑनलाइन शॉपिंग के लिए करीब 238 अलग-अलग अकाउंट्स का इस्तेमाल किया. FNN (फुजी न्यूज नेटवर्क) की रिपोर्ट के अनुसार, उसने लगभग छह साल पहले इस ऑनलाइन स्टोर से सामान खरीदना शुरू किया था. शुरुआत में वह सामान ऑर्डर करने के बाद उसकी डिलीवरी भी लेती थी. लेकिन अक्टूबर 2023 के आसपास उसका तरीका बदल गया. इसके बाद वह सामान ऑर्डर करने और फिर किसी न किसी तरीके से उसे कैंसिल कराने लगी. धीरे-धीरे यह आदत इतनी बढ़ गई कि हजारों ऑर्डर इस प्रक्रिया का हिस्सा बन गए.

    कंपनी ने पुलिस से की सख्त कार्रवाई की मांग
    शुएशा का कहना है कि महिला की इस हरकत का असर उन ग्राहकों पर भी पड़ा, जो वास्तव में प्रोडक्ट खरीदना चाहते थे. जब कोई सामान बार-बार बुक होकर कैंसिल होता रहा, तो दूसरे ग्राहकों को उसे खरीदने का मौका नहीं मिल पाता था. कंपनी ने इस वजह से पुलिस से मामले में कार्रवाई की मांग की. रिपोर्ट्स के मुताबिक, योशिदा ने अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार कर लिया है. अब जापानी कानून के तहत उसके खिलाफ कथित तौर पर धोखाधड़ी के जरिए कारोबार में रुकावट डालने के मामले में कार्रवाई की जा रही है. यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यहां ऑनलाइन शॉपिंग का मकसद सामान खरीदना नहीं, बल्कि सिर्फ ऑर्डर करने से मिलने वाला मानसिक सुकून बताया गया है.