Category: Gazab

  • संभल में अनोखी शवयात्रा: आगे-आगे पालतू हाथी, पीछे राम-कृष्ण की झांकी और सैकड़ों ट्रैक्टर.

    संभल में अनोखी शवयात्रा: आगे-आगे पालतू हाथी, पीछे राम-कृष्ण की झांकी और सैकड़ों ट्रैक्टर.

    संभल में अनोखी शवयात्रा: आगे-आगे पालतू हाथी, पीछे राम-कृष्ण की झांकी और सैकड़ों ट्रैक्टर.

    संभल: उत्तर प्रदेश के संभल में 74 वर्षीय रामबेटी देवी की अंतिम यात्रा चर्चा का विषय बन गई। उनकी शवयात्रा में आगे-आगे परिवार के पालतू हाथी मोहन और परमा चलते रहे, जबकि पीछे भगवान शिव और कृष्ण की झांकी के साथ सैकड़ों ट्रैक्टरों का काफिला नजर आया। करीब 15 किलोमीटर लंबी इस अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए।

    पालतू हाथियों के साथ निकली अंतिम यात्रा

    रजपुरा थाना क्षेत्र के ब्यौरा गांव की रहने वाली रामबेटी देवी की तबीयत खराब होने के बाद उन्हें अलीगढ़ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बुधवार सुबह उनका निधन हो गया। इसकी जानकारी मिलते ही आसपास के इलाकों से लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचने लगे।

    परिवार ने अंतिम संस्कार की तैयारी की और जब अंतिम यात्रा गांव से निकली तो उसमें रामबेटी देवी के पालतू हाथी मोहन और परमा भी शामिल हुए। दोनों हाथी अर्थी के आगे-आगे चलते हुए राजघाट गंगा घाट तक पहुंचे।

    राम-कृष्ण की झांकी और ट्रैक्टरों का काफिला

    रामबेटी देवी की अंतिम यात्रा में धार्मिक झांकियां भी शामिल थीं। अर्थी के पीछे ट्रैक्टर पर भगवान शिव और कृष्ण की झांकी सजाई गई थी। इसके अलावा बड़ी संख्या में ट्रैक्टर अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

    बताया गया कि ब्यौरा गांव से शुरू हुई अंतिम यात्रा करीब 15 किलोमीटर दूर राजघाट गंगा घाट तक पहुंची। इस दौरान करीब एक हजार लोग इसमें शामिल हुए।

    पति के निधन के बाद दोनों हाथियों को पाला

    रामबेटी देवी के बेटे मनवीर के मुताबिक, उनके पिता का वर्ष 2012 में निधन हो गया था। इसके बाद उनकी मां ने दोनों हाथियों मोहन और परमा की देखभाल की और उन्हें परिवार के सदस्य की तरह पाला।

    परिवार का कहना है कि रामबेटी देवी का दोनों हाथियों से काफी लगाव था। इसी वजह से उनकी इच्छा और परिवार के रिश्ते को देखते हुए दोनों हाथियों को अंतिम यात्रा में शामिल किया गया।

    मां की मौत के बाद उदास हैं हाथी

    परिवार के मुताबिक, रामबेटी देवी के निधन के बाद दोनों हाथियों के व्यवहार में भी उदासी नजर आ रही है। आसपास के इलाके में इस परिवार की पहचान भी हाथियों के कारण रही है।

    रामबेटी देवी की अंतिम यात्रा में पालतू हाथियों की मौजूदगी ने इसे बेहद अलग बना दिया। परिवार के लिए यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि उस महिला को अंतिम विदाई देने का भावुक पल था, जिसने वर्षों तक दोनों हाथियों को अपने परिवार के सदस्य की तरह संभाला था।

  • प्रयागराज में रामलीला के लिए ‘मुस्लिम’ कारीगर बना रहे धनुष-बाण और दिव्य अस्त्र-शस्त्र, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल.

    प्रयागराज में रामलीला के लिए ‘मुस्लिम’ कारीगर बना रहे धनुष-बाण और दिव्य अस्त्र-शस्त्र, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल.

    प्रयागराज में रामलीला के लिए ‘मुस्लिम’ कारीगर बना रहे धनुष-बाण और दिव्य अस्त्र-शस्त्र, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल.

    प्रयागराज: नवरात्रि और दशहरे की तैयारियों के बीच प्रयागराज की ऐतिहासिक श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी में एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो धार्मिक सद्भाव और पारंपरिक कारीगरी की मिसाल पेश करती है। यहां मुस्लिम कारीगर निसार अहमद कई वर्षों से रामलीला में इस्तेमाल होने वाले अस्त्र-शस्त्र, रथ और अन्य सामान तैयार करते आ रहे हैं।

    निसार की बनाई कारीगरी में भगवान राम की लीला में इस्तेमाल होने वाले धनुष-बाण, गदा, तलवार, त्रिशूल और अन्य पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र शामिल हैं। वह इन वस्तुओं को इस तरह तैयार करते हैं कि मंचन के दौरान उनका स्वरूप आकर्षक और प्रभावशाली नजर आए।

    पीढ़ियों से जुड़ा है रामलीला का काम

    निसार अहमद का परिवार लंबे समय से कारीगरी के इस काम से जुड़ा है। बताया जाता है कि उनके पिता और दादा भी पथरचट्टी रामलीला से जुड़े रहे हैं। इस तरह रामलीला के लिए सामान तैयार करने का हुनर उन्हें परिवार से विरासत में मिला।

    दिलचस्प बात यह है कि उनका परिवार मोहर्रम के दौरान ताजिए बनाने के लिए भी जाना जाता है। एक ओर मोहर्रम के लिए ताजिए तैयार किए जाते हैं तो दूसरी ओर दशहरे के समय रामलीला के लिए अस्त्र-शस्त्र और रथ बनाने का काम किया जाता है।

    भगवान राम का किरदार पसंद है

    निसार बताते हैं कि उन्हें रामलीला के लिए काम करने में खुशी और सुकून मिलता है। उन्होंने रामानंद सागर की ‘रामायण’ भी देखी है और भगवान राम का किरदार उन्हें काफी पसंद है।

    उनका कहना है कि हर धर्म में अच्छाई और शक्ति का संदेश मिलता है। उनके लिए रामलीला के लिए सामान तैयार करना केवल कारीगरी का काम नहीं, बल्कि अपनी कला और परंपरा से जुड़ी सेवा भी है।

    परिवार और मोहल्ले ने कभी नहीं जताई आपत्ति

    निसार के मुताबिक, उनके परिवार, रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने कभी उनके रामलीला से जुड़े काम पर आपत्ति नहीं जताई। उनका मानना है कि समाज में सभी लोगों को मिल-जुलकर रहना चाहिए।

    वह खुद रामलीला देखने भी जाते हैं और भगवान राम की लीला के मंचन के लिए अपनी कला का योगदान देना अपने लिए सम्मान की बात मानते हैं। उनकी इच्छा है कि वह आखिरी समय तक अपनी इस कला से जुड़े रहें।

    कला के जरिए मजबूत होती है सद्भाव की परंपरा

    श्री पथरचट्टी रामलीला कमेटी अपनी भव्य प्रस्तुतियों और आधुनिक लाइट एंड साउंड व्यवस्था के लिए जानी जाती है। ऐसे बड़े आयोजन को तैयार करने में कलाकारों और कारीगरों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

    निसार अहमद की कहानी इसी परंपरा का एक उदाहरण है। मोहर्रम के लिए ताजिए और रामलीला के लिए अस्त्र-शस्त्र बनाने वाला उनका परिवार दिखाता है कि कला और हुनर कई बार धार्मिक सीमाओं से आगे जाकर लोगों को जोड़ने का काम करते हैं। प्रयागराज की यह परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी सद्भाव की एक खूबसूरत तस्वीर पेश करती है।

  • मुंबई में 14 लोगों: से भरी लिफ्ट 6 मंजिल नीचे गिरी, 3 घंटे बाद रेस्क्यू, बाल-बाल बची जान.

    मुंबई में 14 लोगों: से भरी लिफ्ट 6 मंजिल नीचे गिरी, 3 घंटे बाद रेस्क्यू, बाल-बाल बची जान.

    मुंबई में 14 लोगों: से भरी लिफ्ट 6 मंजिल नीचे गिरी, 3 घंटे बाद रेस्क्यू, बाल-बाल बची जान.

    मुंबई: नेहरू नगर इलाके की एक बिल्डिंग में जन्मदिन की पार्टी के बाद घर लौट रहे 14 लोग उस समय दहशत में आ गए, जब लिफ्ट अचानक तेजी से नीचे गिरने लगी। बताया जा रहा है कि लिफ्ट करीब छह मंजिल नीचे चली गई और ग्राउंड फ्लोर से कुछ पहले अचानक रुक गई। हादसे के बाद लिफ्ट के अंदर चीख-पुकार मच गई।

    घटना नेहरू नगर स्थित ‘मास मेट्रोपोलिस’ बिल्डिंग की बताई जा रही है। 14वीं मंजिल पर जन्मदिन की पार्टी के बाद रिश्तेदार और मेहमान नीचे जाने के लिए लिफ्ट में सवार हुए थे। शुरुआत में लिफ्ट सामान्य तरीके से नीचे आ रही थी, लेकिन छठी मंजिल के आसपास अचानक तेज झटका लगा और लिफ्ट बेकाबू होकर नीचे की ओर जाने लगी।

    अचानक नीचे गिरने लगी लिफ्ट

    लिफ्ट के तेजी से नीचे जाने से उसके अंदर मौजूद लोगों में अफरा-तफरी मच गई। कुछ ही सेकंड में छह मंजिल नीचे जाने के बाद लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर से पहले रुक गई। अचानक हुए इस हादसे में अंदर मौजूद लोग बुरी तरह घबरा गए।

    लिफ्ट रुकने के बाद भी उनकी मुश्किल खत्म नहीं हुई। दरवाजे नहीं खुल रहे थे और सभी लोग अंदर ही फंसे हुए थे। घबराए लोगों ने इमरजेंसी अलार्म बजाया, जिसके बाद बिल्डिंग में मौजूद लोगों को घटना की जानकारी हुई।

    पुलिस और दमकल विभाग ने शुरू किया रेस्क्यू

    बाहर मौजूद लोगों ने लिफ्ट के दरवाजे खोलने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। स्थिति गंभीर देखते हुए पुलिस और दमकल विभाग को सूचना दी गई।

    रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और कटर तथा हाइड्रोलिक जैक की मदद से लिफ्ट को खोलने का काम शुरू किया। अंदर फंसे लोगों को करीब तीन घंटे तक इंतजार करना पड़ा।

    लगातार प्रयास के बाद दमकल कर्मियों ने लिफ्ट के हिस्से को काटकर अंदर फंसे सभी 14 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। इनमें चार बच्चे भी शामिल बताए जा रहे हैं।

    तीन घंटे तक दहशत में रहे लोग

    लिफ्ट में लंबे समय तक फंसे रहने के कारण कई लोग काफी घबरा गए थे। बाहर निकलने के बाद भी उनके चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था। राहत की बात रही कि इस घटना में किसी की जान नहीं गई।

    ओवरलोडिंग या तकनीकी खराबी, जांच जारी

    हादसे के बाद अब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि लिफ्ट में 14 लोगों के सवार होने से उसकी निर्धारित क्षमता तो नहीं बढ़ी थी। इसके अलावा लिफ्ट के मेंटेनेंस, तकनीकी स्थिति, सुरक्षा ऑडिट और किसी संभावित खराबी की भी जांच की जा रही है।

    पुलिस यह भी देख रही है कि लिफ्ट की नियमित जांच और रखरखाव निर्धारित मानकों के अनुसार हुआ था या नहीं। फिलहाल हादसे की सही वजह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

  • राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला: पॉलिटिक्स’ की क्यों हो रही चर्चा? अचानक एक्शन से सड़क तक कैसे बदली रणनीति.

    राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला: पॉलिटिक्स’ की क्यों हो रही चर्चा? अचानक एक्शन से सड़क तक कैसे बदली रणनीति.

    राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला: पॉलिटिक्स’ की क्यों हो रही चर्चा? अचानक एक्शन से सड़क तक कैसे बदली रणनीति.

    नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की हालिया राजनीतिक गतिविधियों में अचानक कार्रवाई, औचक धरना और छोटे समूह के साथ विरोध दर्ज कराने की रणनीति चर्चा में है। कई मौकों पर वह बिना लंबे कार्यक्रम या बड़े जमावड़े के अचानक किसी मुद्दे पर सक्रिय होते नजर आए हैं। कांग्रेस की राजनीति में इसे सरकार के सामने राहुल गांधी की अलग और आक्रामक राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

    कभी अचानक धरने पर बैठना, कभी पुलिस थाने की ओर बढ़ना और कभी बिना पहले से बड़े स्तर पर घोषणा किए किसी जगह पहुंच जाना—राहुल गांधी की राजनीति में इस तरह के कदमों की चर्चा बढ़ी है। उनके इन कदमों में एक बात समान दिखाई देती है कि बड़े प्रदर्शन के बजाय सीमित लोगों के साथ सीधे मौके पर पहुंचकर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की जाती है।

    अचानक एक्शन को बनाया रणनीति का हिस्सा

    राहुल गांधी की यह शैली पूरी तरह नई नहीं है। वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश के भट्टा-पारसौल में किसानों के आंदोलन के दौरान भी वह अचानक वहां पहुंचे थे। उस समय उनके इस कदम ने काफी राजनीतिक सुर्खियां बटोरी थीं।

    हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में उनकी सड़क और जमीनी राजनीति में ऐसे औचक कदमों की आवृत्ति बढ़ी है। उनका फोकस कई बार बड़े कार्यक्रम के बजाय सीधे उस जगह पहुंचने पर दिखाई देता है, जहां कोई राजनीतिक या सामाजिक मुद्दा गर्म हो।

    मार्शल आर्ट से राजनीति तक कनेक्शन

    राहुल गांधी लंबे समय से मार्शल आर्ट का अभ्यास करते रहे हैं। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी उन्होंने यात्रियों के साथ मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग से जुड़े अभ्यास किए थे।

    राहुल गांधी कई मौकों पर यह भी कह चुके हैं कि मार्शल आर्ट ने उन्हें मुश्किल परिस्थितियों में संतुलन और प्रतिक्रिया को लेकर अलग नजरिया दिया है। उनकी राजनीतिक शैली को देखने वाले कुछ लोग उनके इस प्रशिक्षण को उनके आत्मविश्वास और आक्रामक राजनीतिक तेवर से जोड़कर देखते हैं।

    धरना और सड़क की राजनीति में फिटनेस भी अहम

    सड़क पर लंबे समय तक रहना, लगातार यात्रा करना और धरने जैसे राजनीतिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहना शारीरिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है। राहुल गांधी अपनी फिटनेस को लेकर भी सार्वजनिक रूप से बात करते रहे हैं और नियमित कसरत को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बताते हैं।

    हालांकि, उनकी राजनीतिक रणनीति को केवल फिटनेस या मार्शल आर्ट से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे मुद्दे का चयन, राजनीतिक समय, संगठनात्मक रणनीति और जनता तक संदेश पहुंचाने की कोशिश भी महत्वपूर्ण होती है।

    ‘अड़ियल तेवर’ या सोची-समझी रणनीति?

    हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों में राहुल गांधी कई बार सरकार के खिलाफ सीधे मोर्चे पर उतरते दिखाई दिए हैं। धरने से लेकर पुलिस कार्रवाई का सामना करने और किसी मुद्दे पर मौके पर डटे रहने तक, उनकी शैली में टकराव का संदेश स्पष्ट नजर आता है।

    कांग्रेस के भीतर इसे सरकार पर दबाव बनाने और पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय नेतृत्व की छवि मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। वहीं राजनीतिक विरोधी इसे आक्रामक या टकराव वाली राजनीति के तौर पर पेश करते हैं।

    राहुल गांधी के समर्थकों का तर्क रहा है कि वह कई बार राजनीतिक नफा-नुकसान की गणना से ज्यादा अपने मुद्दे पर टिके रहने को प्राथमिकता देते हैं। यही वजह है कि उनकी मौजूदा राजनीति में अचानक फैसले और मौके पर पहुंचकर विरोध दर्ज कराने की शैली को खास तौर पर नोटिस किया जा रहा है।

    ‘ब्रैंड मोदी’ के सामने अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश?

    राष्ट्रीय राजनीति में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लंबे समय से स्थापित राजनीतिक छवि है। ऐसे में कांग्रेस की रणनीति में राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई देती है, जो सत्ता के स्थापित तौर-तरीकों से अलग सड़क पर उतरकर सीधे संघर्ष करने वाली राजनीति करता है।

    एक ओर मोदी की स्थापित और केंद्रीय नेतृत्व वाली राजनीतिक शैली है, तो दूसरी ओर राहुल गांधी की मौजूदा रणनीति में सड़क पर उतरना, अचानक कार्रवाई करना और राजनीतिक टकराव को स्वीकार करना प्रमुखता से दिखाई देता है।

    आने वाले समय में यह रणनीति राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए कितना राजनीतिक लाभ लेकर आती है, यह चुनावी राजनीति और जनता की प्रतिक्रिया से तय होगा। फिलहाल ‘गुरिल्ला पॉलिटिक्स’ की चर्चा इस बात का संकेत है कि राहुल गांधी की राजनीतिक शैली में अचानक और सीधे एक्शन को एक अलग पहचान के तौर पर स्थापित करने की कोशिश तेज हुई है।

  • इंडिगो विमान पर ‘गिरी’ बिजली, फिर भी सुरक्षित रहे 104 यात्री, जानिए प्लेन को कैसे बचाता है सुरक्षा का विज्ञान’

    इंडिगो विमान पर ‘गिरी’ बिजली, फिर भी सुरक्षित रहे 104 यात्री, जानिए प्लेन को कैसे बचाता है सुरक्षा का विज्ञान’

    इंडिगो विमान पर ‘गिरी’ बिजली, फिर भी सुरक्षित रहे 104 यात्री, जानिए प्लेन को कैसे बचाता है सुरक्षा का विज्ञान’

    पटना: पटना से लखनऊ जा रही इंडिगो की फ्लाइट उस समय आकाशीय बिजली की चपेट में आ गई, जब विमान करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था। विमान में 104 यात्री सवार थे। बिजली गिरने के बावजूद किसी यात्री को नुकसान नहीं हुआ और पायलट ने विमान को सुरक्षित लखनऊ एयरपोर्ट पर उतार लिया।

    इस घटना के बाद लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर आसमान में उड़ रहे विमान पर बिजली गिरने के बावजूद अंदर बैठे यात्रियों को करंट क्यों नहीं लगता? दरअसल, आधुनिक विमानों को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि आकाशीय बिजली का प्रभाव मुख्य रूप से विमान की बाहरी सतह तक सीमित रहे।

    विमान पर बिजली गिरने पर क्या होता है?

    बिजली गिरने पर विमान के बाहरी हिस्से से विद्युत धारा गुजरती है और वह विमान की सतह के जरिए एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक अपना रास्ता बनाती है। विमान की संरचना में इस्तेमाल होने वाली चालक धातु और विशेष इलेक्ट्रिकल प्रोटेक्शन सिस्टम बिजली को यात्रियों और विमान के संवेदनशील हिस्सों से दूर रखने में मदद करते हैं।

    आधुनिक विमानों में एल्यूमिनियम जैसी चालक धातुओं के अलावा कुछ जगहों पर कंपोजिट सामग्री के साथ विशेष कंडक्टिव लेयर का इस्तेमाल किया जाता है। इसका उद्देश्य विद्युत धारा को विमान की बाहरी सतह के आसपास नियंत्रित तरीके से प्रवाहित करना होता है।

    फैराडे केज सिद्धांत कैसे करता है काम?

    विमान की सुरक्षा को समझने के लिए फैराडे केज सिद्धांत महत्वपूर्ण है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी चालक पदार्थ की बंद या लगभग बंद संरचना पर बाहरी विद्युत क्षेत्र पड़ने पर विद्युत आवेश उसकी बाहरी सतह पर व्यवस्थित हो जाता है। इससे अंदर का हिस्सा बाहरी विद्युत क्षेत्र के प्रभाव से काफी हद तक सुरक्षित रहता है।

    यही कारण है कि विमान के बाहरी हिस्से से गुजरने वाली बिजली सीधे यात्री के शरीर तक नहीं पहुंचती। हालांकि विमान में इस्तेमाल होने वाली सुरक्षा व्यवस्था केवल फैराडे केज पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इसमें विद्युत सुरक्षा, वायरिंग प्रोटेक्शन और अन्य डिजाइन उपाय भी शामिल होते हैं।

    क्या विमान को बिल्कुल नुकसान नहीं होता?

    ऐसा नहीं है कि बिजली गिरने का विमान पर कोई असर ही नहीं होता। आकाशीय बिजली के संपर्क में आने पर विमान की बाहरी सतह पर छोटे जलने के निशान, खरोंच या अन्य मामूली क्षति हो सकती है। विमान के कुछ बाहरी हिस्सों की जांच भी करनी पड़ सकती है।

    विमान के महत्वपूर्ण इलेक्ट्रॉनिक और ईंधन सिस्टम को भी इस तरह डिजाइन किया जाता है कि बिजली गिरने की स्थिति में जोखिम को कम किया जा सके। यही वजह है कि ऐसी घटनाओं के बाद विमान की तकनीकी जांच की जाती है।

    यात्रियों को क्यों नहीं लगता करंट?

    बिजली का रास्ता मुख्य रूप से विमान की बाहरी चालक संरचना के साथ रहता है। यात्री केबिन को इस विद्युत प्रवाह से अलग रखने के लिए विमान के डिजाइन में कई सुरक्षा उपाय किए जाते हैं। इसलिए बाहर से देखने पर बिजली गिरने की घटना बेहद खतरनाक लग सकती है, लेकिन विमान के अंदर बैठे यात्रियों के लिए सुरक्षा व्यवस्था काफी मजबूत होती है।

    यानी आसमान में विमान पर बिजली गिरना असामान्य घटना जरूर है, लेकिन आधुनिक यात्री विमानों को ऐसी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही डिजाइन और प्रमाणित किया जाता है। यही वजह है कि बिजली की चपेट में आने के बाद भी विमान सुरक्षित रूप से अपनी उड़ान जारी रख सकता है या जरूरत पड़ने पर नजदीकी एयरपोर्ट पर उतर सकता है।

  • झारखंड में साड़ी पहनकर: नंगे पांव 1600 मीटर दौड़ी कविता महतो, होमगार्ड बनने के जज्बे ने जीता लोगों का दिल.

    झारखंड में साड़ी पहनकर: नंगे पांव 1600 मीटर दौड़ी कविता महतो, होमगार्ड बनने के जज्बे ने जीता लोगों का दिल.

    झारखंड में साड़ी पहनकर: नंगे पांव 1600 मीटर दौड़ी कविता महतो, होमगार्ड बनने के जज्बे ने जीता लोगों का दिल.

    झारखंड: होमगार्ड भर्ती के दौरान एक महिला अभ्यर्थी ने साड़ी पहनकर और नंगे पांव 1600 मीटर की दौड़ पूरी की। कविता महतो नाम की इस महिला की मेहनत और हौसले की चर्चा अब झारखंड के साथ-साथ बिहार में भी हो रही है। सीमित संसाधनों के बावजूद भर्ती प्रक्रिया में शामिल होकर दौड़ पूरी करने की उनकी कोशिश ने लोगों का ध्यान खींचा है।

    कविता महतो को लेकर सामने आई जानकारी के मुताबिक, वह विधवा हैं और ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं। आर्थिक परेशानियों के बीच उन्होंने सरकारी नौकरी हासिल करने का सपना देखा और होमगार्ड भर्ती के लिए मैदान में उतरीं।

    साड़ी संभालते हुए पूरी की 1600 मीटर दौड़

    भर्ती के दौरान कविता ने दौड़ के लिए अलग से स्पोर्ट्स ड्रेस या जूते नहीं पहने। वह साड़ी पहनकर ही मैदान में पहुंचीं और नंगे पांव 1600 मीटर की दौड़ पूरी की।

    दौड़ के दौरान उन्हें साड़ी भी संभालनी पड़ रही थी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी और निर्धारित दूरी पूरी की। उनकी इसी कोशिश ने लोगों को प्रभावित किया और उनकी कहानी सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गई।

    पति की मौत के बाद खुद संभाला परिवार

    बताया जाता है कि कविता के पति का निधन हो चुका है। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए वह ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करती हैं।

    मुश्किल आर्थिक परिस्थितियों के बावजूद सरकारी नौकरी का सपना देखना और उसके लिए भर्ती प्रक्रिया में हिस्सा लेना उनके संघर्ष को दिखाता है। 1600 मीटर की दौड़ पूरी करना उनके लिए सिर्फ भर्ती का एक चरण नहीं, बल्कि बेहतर भविष्य की उम्मीद से जुड़ी कोशिश भी थी।

    दीपा मांझी ने भी की तारीफ

    कविता महतो की कहानी सामने आने के बाद गया जिले के इमामगंज की विधायक दीपा मांझी ने भी उनकी हिम्मत की तारीफ की। उन्होंने कविता को बधाई देते हुए कहा कि महिलाओं में मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता होती है।

    दीपा मांझी ने कविता के संघर्ष को महिलाओं के साहस से जोड़ते हुए कहा कि ऐसी महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

    सम्मान और प्रोत्साहन की मांग

    दीपा मांझी ने झारखंड सरकार से कविता जैसी महिलाओं को प्रोत्साहित और सम्मानित करने की अपील की। उनका कहना है कि कविता ने जिस परिस्थिति में साड़ी पहनकर और नंगे पांव दौड़ पूरी की, वह उनके मजबूत इरादे को दर्शाता है।

    कविता की कहानी यह भी बताती है कि सीमित साधन किसी व्यक्ति के सपने को रोक नहीं सकते। अब लोगों की नजर इस बात पर है कि होमगार्ड भर्ती की आगे की प्रक्रिया में कविता का चयन होता है या नहीं।

  • क्या है ‘जिंदा ईंट’? मंगल ग्रह पर इसी तकनीक से बन सकते हैं इंसानों के घर, जानिए कैसे काम करेगी तकनीक.

    क्या है ‘जिंदा ईंट’? मंगल ग्रह पर इसी तकनीक से बन सकते हैं इंसानों के घर, जानिए कैसे काम करेगी तकनीक.

    क्या है ‘जिंदा ईंट’? मंगल ग्रह पर इसी तकनीक से बन सकते हैं इंसानों के घर, जानिए कैसे काम करेगी तकनीक.

    मंगल ग्रह: मंगल ग्रह पर इंसानी बस्ती बसाने की दिशा में वैज्ञानिक लगातार नई तकनीकों पर काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक वहां रहने के लिए सुरक्षित और मजबूत ढांचे तैयार करना है। पृथ्वी से बड़ी मात्रा में सीमेंट, ईंट और निर्माण मशीनरी मंगल तक पहुंचाना बेहद मुश्किल और महंगा होगा। ऐसे में वैज्ञानिक ऐसी निर्माण सामग्री विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे स्थानीय संसाधनों की मदद से तैयार किया जा सके।

    इसी दिशा में हांगकांग के शोधकर्ताओं ने एक तरह की ‘लिविंग बिल्डिंग मटेरियल’ पर काम किया है, जिसे आम भाषा में ‘जिंदा ईंट’ कहा जा रहा है। इस तकनीक में जैविक सामग्री और स्थानीय संसाधनों को मिलाकर ऐसा मिश्रण तैयार करने की कोशिश की जाती है, जिसे भविष्य में 3D प्रिंटिंग के जरिए निर्माण में इस्तेमाल किया जा सके।

    मंगल पर घर बनाना इतनी बड़ी चुनौती क्यों है?

    मंगल की परिस्थितियां पृथ्वी से काफी अलग हैं। वहां वायुमंडलीय दबाव बहुत कम है और तापमान भी बेहद ठंडा हो सकता है। इसके अलावा मंगल की सतह पर मौजूद धूल और रेगोलिथ को सीधे पारंपरिक निर्माण सामग्री की तरह इस्तेमाल करना आसान नहीं है।

    पारंपरिक ईंटें बनाने के लिए गर्म करने और बड़ी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत पड़ सकती है। मंगल पर भट्ठियां, भारी मशीनरी और निर्माण सामग्री पहुंचाना किसी भी अंतरिक्ष मिशन का वजन और लागत काफी बढ़ा सकता है।

    इसी वजह से वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर दे रहे हैं जिसमें मंगल पर उपलब्ध सामग्री का अधिकतम इस्तेमाल हो और पृथ्वी से केवल जरूरी जैविक घटक ही ले जाने पड़ें।

    क्या होती है ‘जिंदा ईंट’?

    ‘जिंदा ईंट’ नाम सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ईंट किसी जीव की तरह चलती या बढ़ती है। इसे लिविंग बिल्डिंग मटेरियल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी संरचना में जैविक घटकों का इस्तेमाल किया जाता है।

    रिपोर्ट के मुताबिक, इस तरह की सामग्री में रेत जैसे कणों के साथ जिलेटिन आधारित हाइड्रोजेल और विशेष रूप से तैयार यीस्ट का इस्तेमाल किया जाता है। यीस्ट की सतह पर ऐसा जैविक प्रोटीन इस्तेमाल किया गया है, जो चिपकने वाले पदार्थ की तरह काम कर सकता है।

    यह प्रोटीन आसपास के कणों को एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है और मिश्रण को मजबूत संरचना में बदलने की क्षमता रखता है।

    मंगल पर कैसे बन सकता है घर?

    भविष्य में अगर इस तकनीक को मंगल के लिए सफलतापूर्वक विकसित किया जाता है, तो निर्माण प्रक्रिया कुछ इस तरह हो सकती है।

    सबसे पहले मंगल की सतह पर उपलब्ध रेगोलिथ या अन्य उपयुक्त स्थानीय सामग्री को एक जैविक मिश्रण के साथ मिलाया जाएगा। इसमें जरूरी मात्रा में हाइड्रोजेल और जैविक घटक शामिल किए जा सकते हैं।

    इसके बाद इस मिश्रण को रोबोटिक 3D प्रिंटर में डाला जा सकता है। कंप्यूटर में तैयार डिजाइन के मुताबिक प्रिंटर सामग्री की परत-दर-परत संरचना बनाकर दीवारें और दूसरे हिस्से तैयार करेगा।

    इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि निर्माण के लिए हर ईंट को पृथ्वी से मंगल तक ले जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

    क्या यह सामान्य ईंट जितनी मजबूत होगी?

    प्रयोगशाला में इस तरह की जैविक निर्माण सामग्री की मजबूती को लेकर परीक्षण किए गए हैं। रिपोर्ट में करीब 12 मेगापास्कल तक की कम्प्रेसिव स्ट्रेंथ का उल्लेख किया गया है। हालांकि प्रयोगशाला में प्राप्त मजबूती और वास्तविक मंगल परिस्थितियों में किसी भवन के प्रदर्शन को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

    मंगल पर लंबे समय तक विकिरण, अत्यधिक ठंड, कम वायुदाब और धूल जैसी परिस्थितियों का सामना करना होगा। इसलिए किसी वास्तविक मानव आवास के लिए इस्तेमाल से पहले इस तकनीक के कई और परीक्षण जरूरी होंगे।

    क्या मंगल की मिट्टी से ही बन जाएगा पूरा घर?

    यह तकनीक अभी भविष्य के मंगल अभियानों के लिए एक संभावित विकल्प के तौर पर देखी जा रही है। मंगल की मिट्टी को सीधे पृथ्वी की ईंटों जैसा मान लेना सही नहीं होगा। वहां उपलब्ध रेगोलिथ के गुणों, मिश्रण की स्थिरता और तैयार संरचना की मजबूती का विस्तृत परीक्षण जरूरी होगा।

    फिर भी इस तरह की तकनीक अंतरिक्ष निर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण विचार पेश करती है—पृथ्वी से भारी निर्माण सामग्री ले जाने के बजाय मंगल पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करना।

    अगर भविष्य के परीक्षण सफल रहते हैं, तो जैविक सामग्री और रोबोटिक 3D प्रिंटिंग का संयोजन मंगल पर बेस, दीवारें और अन्य संरचनाएं तैयार करने में मदद कर सकता है। फिलहाल यह तकनीक प्रयोगात्मक चरण में है, लेकिन मंगल पर इंसानी बस्ती बसाने की लंबी दौड़ में ऐसे कम वजन और कम ऊर्जा वाले निर्माण विकल्प बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

  • नाना पाटेकर का ‘असली’ नाम क्या था? बचपन में मिला था ‘नाना’ नाम, ऐसे बनी यही उनकी पहचान:

    नाना पाटेकर का ‘असली’ नाम क्या था? बचपन में मिला था ‘नाना’ नाम, ऐसे बनी यही उनकी पहचान:

    नाना पाटेकर का ‘असली’ नाम क्या था? बचपन में मिला था ‘नाना’ नाम, ऐसे बनी यही उनकी पहचान:

    गोवा: दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 8 अक्टूबर 2026 की सुबह गोवा स्थित अपने घर पर उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया। अस्पताल ले जाने के बाद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर से हिंदी और मराठी फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर है।

    नाना पाटेकर ने अपने दमदार अभिनय, प्रभावशाली आवाज और अलग अंदाज से सिनेमा में खास पहचान बनाई। ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘तिरंगा’, ‘प्रहार’ और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार आज भी दर्शकों को याद हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस नाम से उन्हें पूरी दुनिया जानती थी, वह उनका जन्म के समय रखा गया नाम नहीं था?

    विश्वनाथ पाटेकर था उनका असली नाम

    नाना पाटेकर का पूरा नाम विश्वनाथ दीनकर पाटेकर था। आधिकारिक रिकॉर्ड में भी उनका नाम इसी रूप में दर्ज रहा है और इसके साथ ‘नाना पाटेकर’ नाम से उनकी सार्वजनिक पहचान बनी।

    उनके नाम को लेकर खुद नाना पाटेकर ने भी एक इंटरव्यू में बताया था कि ‘नाना’ कोई बाद में अपनाया गया फिल्मी नाम नहीं था। उन्होंने कहा था कि बचपन से ही उनका नाम नाना था और उनके पासपोर्ट पर भी यही नाम दर्ज था।

    बचपन में ऐसे पड़ा ‘नाना’ नाम

    नाना नाम उनके बचपन से ही उनके साथ जुड़ गया था। परिवार और करीबियों के बीच उन्हें इसी नाम से पुकारा जाने लगा। धीरे-धीरे यह नाम इतना प्रचलित हो गया कि आगे चलकर यही उनकी सार्वजनिक और फिल्मी पहचान बन गया।

    उनके पुराने परिचित उन्हें कभी-कभी ‘विशू’ जैसे नाम से भी जानते थे। नाना पाटेकर ने बताया था कि जब कोई उन्हें विश्वनाथ या विशू कहकर बुलाता था तो उन्हें अंदाजा हो जाता था कि सामने वाला उनके पुराने दौर का परिचित है। बाकी लोगों के लिए वह हमेशा ‘नाना’ ही रहे।

    थिएटर से शुरू हुआ था अभिनय का सफर

    नाना पाटेकर ने अभिनय की दुनिया में सीधे फिल्मों से शुरुआत नहीं की थी। उनका जुड़ाव थिएटर से रहा और इसके बाद 1978 में फिल्म ‘गमन’ के जरिए उन्होंने सिनेमा में कदम रखा। आगे चलकर उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों में कई बेहद प्रभावशाली किरदार निभाए।

    ‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली। वहीं ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का किरदार उनके करियर के सबसे लोकप्रिय किरदारों में शामिल हो गया।

    तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित

    नाना पाटेकर को अपने अभिनय के लिए तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। उन्हें 2013 में पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया था।

    उनका अभिनय सिर्फ हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रहा। मराठी सिनेमा और थिएटर में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। गंभीर भूमिकाओं से लेकर हास्य और नकारात्मक किरदारों तक, उन्होंने अलग-अलग तरह के चरित्रों को पर्दे पर प्रभावी ढंग से निभाया।

    ‘नाना’ नाम ही बन गया उनकी पहचान

    फिल्मी दुनिया में आने के बाद विश्वनाथ पाटेकर के बजाय ‘नाना पाटेकर’ नाम ही लोगों की जुबान पर चढ़ गया। यह नाम इतना लोकप्रिय हुआ कि आने वाली पीढ़ियां भी उन्हें इसी नाम से जानने लगीं।

    इस तरह ‘नाना’ उनके लिए सिर्फ एक उपनाम नहीं रहा, बल्कि वही नाम उनकी दशकों लंबी फिल्मी यात्रा और दर्शकों की यादों का हिस्सा बन गया। 75 साल की उम्र में उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे कलाकार को खो दिया, जिसकी आवाज, संवाद अदायगी और अभिनय शैली की अलग पहचान थी।

  • बरेली: महिला ने एक साथ 2 बेटे और 2 बेटियों को दिया जन्म, चारों नवजात स्वस्थ; परिवार में खुशी का माहौल.

    बरेली: महिला ने एक साथ 2 बेटे और 2 बेटियों को दिया जन्म, चारों नवजात स्वस्थ; परिवार में खुशी का माहौल.

    बरेली: महिला ने एक साथ 2 बेटे और 2 बेटियों को दिया जन्म, चारों नवजात स्वस्थ; परिवार में खुशी का माहौल.

    बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से एक खुशखबरी सामने आई है। सीबीगंज थाना क्षेत्र की रहने वाली एक महिला ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया है। नवजातों में दो बेटे और दो बेटियां शामिल हैं। डॉक्टरों के मुताबिक मां और चारों बच्चे फिलहाल स्वस्थ हैं और सभी को चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया है।

    प्रसव पीड़ा के बाद अस्पताल पहुंची महिला

    सीबीगंज क्षेत्र के सनईया रानी गांव निवासी शबनम को सोमवार तड़के करीब 4 बजे प्रसव पीड़ा शुरू हुई। इसके बाद परिजन उन्हें मिनी बाईपास स्थित एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे। जांच के बाद डॉक्टरों ने महिला को अस्पताल में भर्ती कर लिया और चिकित्सकीय निगरानी में प्रसव कराया।

    प्रसव के दौरान शबनम ने एक साथ चार बच्चों को जन्म दिया। इनमें दो बेटे और दो बेटियां हैं। एक साथ चार बच्चों के जन्म की जानकारी मिलते ही परिवार में खुशी का माहौल बन गया। परिजनों ने खुशी में मिठाइयां भी बांटीं।

    एक साथ चार बच्चों का जन्म कितना दुर्लभ?

    चिकित्सकों के मुताबिक एक साथ चार बच्चों का जन्म सामान्य प्रसव की तुलना में काफी कम देखने को मिलता है। चिकित्सा विज्ञान में एक साथ चार बच्चों के जन्म को चतुष प्रसव (Quadruplets) कहा जाता है।

    ऐसे मामलों में मां और नवजातों की विशेष निगरानी जरूरी होती है, क्योंकि एक साथ कई बच्चों के जन्म के बाद उन्हें अतिरिक्त चिकित्सकीय देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है।

    डॉक्टरों की निगरानी में मां और चारों बच्चे

    प्रसव के बाद डॉक्टर मां और चारों नवजातों के स्वास्थ्य पर लगातार नजर रख रहे हैं। फिलहाल चिकित्सकों ने सभी की हालत ठीक बताई है और चारों बच्चों को निगरानी में रखा गया है।

    चार बच्चों के जन्म से परिवार में खुशी

    एक साथ दो बेटों और दो बेटियों के जन्म से परिवार में खुशी का माहौल है। परिजनों के लिए यह पल बेहद खास है। चार बच्चों के एक साथ घर में आने से परिवार के लोग काफी उत्साहित हैं।

  • 23 महीने 100% ‘ऑक्सीजन’ और वेंटिलेटर पर रहा 8 साल का बच्चा, PGIMS के डॉक्टरों ने बचाई जान

    23 महीने 100% ‘ऑक्सीजन’ और वेंटिलेटर पर रहा 8 साल का बच्चा, PGIMS के डॉक्टरों ने बचाई जान

    23 महीने 100% ‘ऑक्सीजन’ और वेंटिलेटर पर रहा 8 साल का बच्चा, PGIMS के डॉक्टरों ने बचाई जान

    रोहतक: हरियाणा के रोहतक स्थित PGIMS से एक बेहद चुनौतीपूर्ण इलाज का मामला सामने आया है। यहां एक 8 साल का बच्चा करीब 23 महीने तक 100 प्रतिशत ऑक्सीजन और वेंटिलेटर सपोर्ट पर रहने के बाद स्वस्थ होकर अपने घर लौटा। लंबे समय तक अस्पताल में इलाज और देखभाल के बाद जब बच्चे को डिस्चार्ज किया गया तो पीआईसीयू का पूरा स्टाफ भावुक हो गया।

    बच्चे को जब अस्पताल लाया गया था, तब उसकी उम्र महज 6 साल थी। उसकी हालत इतनी गंभीर थी कि वह अपने हाथ-पैर तक नहीं हिला पा रहा था। इसके बाद उसे पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट यानी पीआईसीयू में भर्ती किया गया और लगातार वेंटिलेटर व ऑक्सीजन सपोर्ट दिया गया।

    तेज बुखार के बाद बिगड़ी थी हालत

    पीआईसीयू इंचार्ज डॉ. कुंदन मित्तल के मुताबिक, बच्चा 5 अक्टूबर 2024 को अस्पताल पहुंचा था। उसे तेज बुखार था और शरीर में इतनी कमजोरी थी कि वह हाथ-पैर तक नहीं हिला पा रहा था।

    गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने तत्काल उसे पीआईसीयू में भर्ती किया। लंबे समय तक बच्चे को सांस लेने के लिए वेंटिलेटर और ऑक्सीजन की जरूरत बनी रही। इस दौरान उसकी स्थिति पर लगातार निगरानी रखी गई और उपचार में कई स्तरों पर सावधानी बरती गई।

    सिर्फ दवाओं पर निर्भर नहीं रहा इलाज

    बच्चे के इलाज में केवल दवाओं और वेंटिलेटर सपोर्ट पर ही निर्भर नहीं रहा गया। लंबे समय तक आईसीयू में रहने के कारण उसकी शारीरिक क्षमता को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती थी।

    डॉक्टरों और नर्सिंग टीम ने उसके लिए लगातार फिजियोथेरेपी और पोषण संबंधी सपोर्ट की व्यवस्था की। उसकी स्थिति में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर भी नजर रखी गई। धीरे-धीरे उसकी हालत में सुधार आने लगा और अब वह अपने शरीर को हिला-डुला पा रहा है।

    पिता ने बेटे के लिए छोड़ दिया काम

    बच्चे के पिता सोमबीर दहिया दिल्ली में टैक्सी चलाते हैं और परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य हैं। बेटे के लंबे इलाज के चलते उन्हें करीब दो साल तक अपना काम छोड़कर अस्पताल में रहना पड़ा।

    बच्चे की मां भी लगातार उसके साथ अस्पताल में मौजूद रहीं। लंबे इलाज के दौरान परिवार को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा। मेडिकल टीम की ओर से परिवार की मदद करने के प्रयास भी किए गए।

    23 महीने बाद घर लौटने पर भावुक हुआ पूरा वार्ड

    जब बच्चा स्वस्थ होकर अस्पताल से घर जाने की स्थिति में पहुंचा तो पीआईसीयू में भावुक माहौल बन गया। पिता ने डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के प्रति आभार जताया। परिवार ने इस मौके पर केक काटा और मेडिकल टीम को सम्मानित भी किया।

    बच्चे के पिता का कहना था कि डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने उनके बेटे को लगभग दो साल तक अपने परिवार के सदस्य की तरह संभाला। इस दौरान अस्पताल उनके परिवार के लिए दूसरे घर जैसा बन गया।

    नर्सिंग स्टाफ के लिए भी खास था बच्चा

    करीब 23 महीने तक पीआईसीयू में रहने के कारण बच्चा वहां के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ से बेहद घुल-मिल गया था। स्टाफ के सदस्यों ने बताया कि लंबे समय तक साथ रहने के कारण वह उनके लिए परिवार के सदस्य जैसा बन चुका था।

    उसका जन्मदिन भी अस्पताल के स्टाफ ने मिलकर मनाया। परिवार के खास मौकों पर स्टाफ बच्चे और उसके परिजनों के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ा रहा।

    लगभग दो साल तक चले इलाज, लगातार निगरानी, पोषण और फिजियोथेरेपी के बाद बच्चे का घर लौटना उसके परिवार के लिए किसी नई शुरुआत से कम नहीं है। यह मामला लंबे समय तक गंभीर स्थिति में रहने वाले बच्चों की देखभाल में मेडिकल टीम, परिवार और नर्सिंग स्टाफ के निरंतर सहयोग की अहमियत को भी दिखाता है।