दुनिया में आज भी ऐसी कई जगहें हैं जहां इंसानों की पहुंच पूरी तरह से नहीं है. यानी इन जगहों के बारे में इंसान जानते तो हैं, लेकिन यहां पहुंचने और रुक कर इन जगहों को जानने की स्थिति में इंसान अभी तक नहीं हैं. आज हम आपको ऐसी ही पांच जगहों के बारे में बताएंगे, जहां मॉर्डन इंसान यानी आज का इंसान नहीं पहुंच सका है. इनमें से एक जगह भारत में भी है.
पहले नंबर पर है Vale Do Javari
वाले डू जवारी (Vale Do Javari) ब्राजील में अमेज़न जंगल के अंदर लगभग 33 हजार स्क्वायर मील की एक जगह है. यहां दुनिया के सबसे खतरनाक कबीले रहते हैं. गिनती के हिसाब से देखें तो इस इलाके में लगभग 2000 लोग रहते हैं. हालांकि, इन 2 हजार लोगों में से 14 कबीले ऐसे भी हैं, जो अभी भी मॉर्डन इंसानों से दूर हैं. यानी आज के इंसानों ने इनसे अभी तक मजबूत संबंध स्थापित नहीं किए हैं. कहा जाता है कि यहां मौजूद 19 गांवों में रहने वाले लोग जंगल के सहारे ही अपनी जिंदगी जीते हैं और बाहरी लोगों के लिए बेहद खतरनाक हैं.
डेवोन आइलैंड (Devon Island)
डेवोन आइलैंड दुनिया की उन कुछ गिनी चुनी जगहों में से है जो इंसानों की नजर से हमेशा छिपी रहीं. नुनावुत कनाडा के पास मौजूद डेवोन आइलैंड को एलियन का घर भी कहा जाता है. दरअसल, इस जगह का तापमान और पर्यावरण ऐसा है कि यहां जीवन संभव ही नहीं है. यहां तक कि नासा को भी यहां रिसर्च करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था. यहां हमेशा घना कोहरा रहता है और कई बार यहां का तापमान गिरकर -58 फॉरेनहाइट यानी लगभग -50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है.
गंगखर पुनसुम (Gangkhar Puensum)
गंगखर पुनसुम इसे दुनिया की सबसे रहस्यमयी जगहों में से एक माना जाता है. उत्तर भूटान में तिब्बत के बॉर्डर पर मौजूद ये पहाड़ी आम लोगों के लिए नहीं है. यहां बिना इजाजत के आम लोग जा भी नहीं सकते. कहा जाता है कि इस पहाड़ी के आसपास रहने वाले लोग यहां कुछ खास तरह का पूजा पाठ करते हैं जो बाकी की दुनिया से अब तक छिपा है. समुद्र स्तर से 24,836 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस पहाड़ी की चोटी पर आज तक कुछ गिने चुने इंसान ही पहुंच पाए हैं.
स्टार माउंटेन (Star Mountains)
स्टार माउंटेन दुनिया की कुछ सबसे सुंदर और खतरनाक जगहों में से एक है. पापुआ न्यू गिनी में स्थित ये पर्वत ऐसा है जैसे दूसरी दुनिया का रास्ता. यहां से अगर आप आसमान की ओर देखेंगे तो आपको तारे बिल्कुल साफ और बड़े-बड़े दिखाई देंगे. इस पहाड़ी की चोटी 15 हजार फीट से ज्यादा है.
पांचवीं और आखिरी जगह
ये है नार्थ सेंटिनल आइलैंड. बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान द्वीप समूह का यह द्वीप ऐसे तो बहुत सुंदर है, लेकिन यहां रहने वाले सेंटिनल लोगों की वजह से ये बेहद खतरना भी है. यहां जाने की इजाजत किसी को नहीं है. सरकार ने इस द्वीप पर जाने की पाबंदी लगाई हुई है. दरअसल, इसहां रहने वाली जनजाति है, जिनका दुनिया से कोई संपर्क नहीं है. यह 23 वर्ग मील का एक छोटा-सा द्वीप है, जिसपर 60 हजार सालों से इंसान रह रहे हैं, लेकिन आज तक उनका खान-पान, रहन-सहन दुनिया के लिए रहस्य बना हुआ है.
रूस के मशहूर स्टंटमैन येवगेनी चेबोटारेव ने हेलिकॉप्टर के घूमते पंखे पर खड़े होकर हैरान करने वाला स्टंट किया है. देखिए वायरल वीडियो और लोगों के रिएक्शन.
Russian Daredevil Viral Stunt Video: सोशल मीडिया पर आपने एक से बढ़कर एक स्टंट वीडियो देखे होंगे, लेकिन रूस के डेयरडेविल येवगेनी चेबोटारेव (Yevgeny Chebotarev) ने इस बार जो कारनामा किया है उसने इंटरनेट पर तहलका मचा दिया है. इस शख्स ने अपनी जान को जोखिम में डालकर जो स्टंट किया है, उसे देखकर अच्छे-अच्छे दिग्गजों की सांसें थम गईं.
कौन हैं येवगेनी चेबोटारेव? (Who is Yevgeny Chebotarev?)
रूस के रोस्तोव-ऑन-डॉन के रहने वाले येवगेनी एक मशहूर स्टंटमैन हैं. वह अपने खतरनाक और जानलेवा कारनामों के लिए सोशल मीडिया पर जाने जाते हैं. उनके स्टंट में अक्सर हाई-स्पीड गाड़ियां और भारी मशीनरी शामिल होती हैं. वह कई बार गंभीर हादसों और टूटी हुई हड्डियों का सामना कर चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके हौसले और पागलपन में कोई कमी नहीं आई है.
चलते हेलिकॉप्टर के पंखे पर खड़े होने का सनसनीखेज कारनामा
वायरल हो रहे इस वीडियो में येवगेनी किसी फिल्म के खूंखार सीन की तरह हवा में उड़ रहे हेलिकॉप्टर के चलते हुए रोटर ब्लेड (पंखे) पर खड़े नजर आ रहे हैं. इस जानलेवा स्टंट को अंजाम देने के लिए उन्हें एक क्रेन की मदद से हार्नेस के जरिए ऊपर लटकाया गया था. जरा सी भी चूक उनकी जान ले सकती थी और हेलिकॉप्टर के पंखों के बीच आने से उनके परखच्चे उड़ सकते थे.
सोशल मीडिया यूजर्स की हैरान करने वाली प्रतिक्रियाएं
इस रोमांचक वीडियो को इंस्टाग्राम पर अब तक 72 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है. वीडियो शेयर करते हुए येवगेनी ने कैप्शन लिखा, मैंने हमेशा एक हेलिकॉप्टर खरीदने का सपना देखा था, अब मुझे एक प्लेन चाहिए. साथ ही उन्होंने अपने फैंस को चेतावनी दी है कि बिना ट्रेनिंग के इस तरह के खतरनाक स्टंट को बिल्कुल न दोहराएं. कमेंट बॉक्स में यूजर्स जमकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं.
एक यूजर ने लिखा, ये बंदा एकदम सनकी है. दूसरे यूजर ने कहा, भाई पागलपन की भी कोई हद होती है. तीसरे यूजर ने लिखा, स्टंट ये कर रहा है, रोंगटे मेरे खड़े हो रहे हैं.
यहां देखिए वायरल वीडियो
अभिषेक राय (Abhishek Roy) अभी TV9 भारतवर्ष के डिजिटल विंग में असिस्टेंट न्यूज एडिटर (Assistant News Editor) हैं. पत्रकारिता में उन्हें 14 साल से ज्यादा का अनुभव है और इस फील्ड में उनकी अपनी एक अलग पहचान है. अपने करियर में उन्होंने कई बड़े मीडिया संस्थानों में काम किया है. शुरुआत में वे भोपाल के ‘पीपुल्स समाचार’ अखबार (Peoples Samachar) से जुड़े. यहां उन्होंने प्रिंट मीडिया का काम सीखा. इसके बाद वे दैनिक भास्कर (Dainik Bhaskar) ग्रुप में लंबे समय तक रहे. खास बात ये कि उन्होंने भास्कर के अखबार और वेबसाइट, दोनों जगह काम किया. इससे उन्हें पुरानी और नई, दोनों तरह की पत्रकारिता का अनुभव मिला. अभिषेक ने अहमदाबाद के ‘जानो दुनिया’ (Jano Duniya) न्यूज चैनल में भी काम किया. यहां उन्होंने टीवी मीडिया में अपनी काबिलियत दिखाई. अभिषेक को राजनीति और विदेशी मामलों की अच्छी समझ है. वे राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक घटनाक्रमों और वैश्विक कूटनीति को बहुत ही बारीकी से समझते हैं. हालांकि, वर्तमान में डिजिटल मीडिया की बदलती मांग को देखते हुए वे अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं. इन दिनों वे ट्रेंडिंग खबरों, वायरल टॉपिक्स और हटके कंटेंट पर काम कर रहे हैं. अभिषेक के लिए पत्रकारिता महज एक पेशा या सिर्फ पाठकों तक सूचनाएं या खबरें पहुंचाना नहीं है. उनका विजन और उद्देश्य इससे कहीं अधिक व्यापक है. वे मानते हैं कि एक पत्रकार के रूप में उनकी जिम्मेदारी है कि पाठकों को हर बार कुछ नया और अनूठा पढ़ने को मिले. कंटेंट ऐसा हो जो पाठकों की सोच के दायरे को विस्तृत करे और उन्हें एक नया नजरिया दे. अभिषेक को पत्रकारिता के साथ-साथ ट्रैवलिंग का भी शौक है. भागदौड़ भरी जिंदगी से जब भी फुर्सत मिलती है, वे पहाड़ों की तरफ निकल जाते हैं और सुकून के पल बिताते हैं.
भारत में आपने बचपन से ‘चंगू-मंगू’ शब्द जरूर सुना होगा। आमतौर पर दो शरारती बच्चों या ऐसे लोगों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल मजाकिया अंदाज में किया जाता है, जो मिलकर कोई शरारत करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी ‘चंगा-मंगा’ नाम बेहद मशहूर है?
पहली नजर में दोनों नाम इतने मिलते-जुलते हैं कि लगता है जैसे इनके पीछे कोई पुराना कनेक्शन होगा। लेकिन असल कहानी इससे बिल्कुल अलग है।
भारत के चंगू-मंगू जहां आम बोलचाल और लोककथाओं में इस्तेमाल होने वाला नाम है, वहीं पाकिस्तान का चंगा-मंगा एक प्रसिद्ध वन क्षेत्र का नाम है। इसके नाम के पीछे दो लोगों की कहानी भी बताई जाती है।
भारत में चंगू-मंगू का मतलब क्या है?
भारत में ‘चंगू-मंगू’ किसी एक वास्तविक व्यक्ति का नाम नहीं है। यह मुख्य रूप से बोलचाल, हास्य और बच्चों की कहानियों में इस्तेमाल होने वाला एक काल्पनिक या सामान्य संबोधन है।
जब दो लोग साथ मिलकर शरारत करते हैं या कोई मजेदार हरकत करते हैं तो उन्हें मजाक में ‘चंगू-मंगू’ कह दिया जाता है।
समय के साथ यह नाम भारतीय लोकप्रिय संस्कृति और बोलचाल का हिस्सा बन गया। हालांकि, इसकी कोई एक प्रमाणित ऐतिहासिक कहानी नहीं है कि चंगू और मंगू नाम के दो वास्तविक व्यक्ति ही इस मुहावरे के मूल पात्र थे।
अब जानिए पाकिस्तान के चंगा-मंगा की कहानी
पाकिस्तान में ‘चंगा-मंगा’ शब्द सुनते ही सबसे पहले एक बड़े जंगल का नाम सामने आता है।
चंगा मंगा जंगल पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित एक मानव-निर्मित वन क्षेत्र है। यह लाहौर के आसपास के इलाके से जुड़ा हुआ है और पाकिस्तान के प्रमुख कृत्रिम वनों में गिना जाता है।
इस जंगल का नाम दो कथित डाकुओं—चंगा और मंगा—से जोड़ा जाता है। लोकप्रिय इतिहास और स्थानीय कथाओं में इन्हें ब्रिटिश काल के आसपास पंजाब क्षेत्र में सक्रिय डाकू बताया जाता है।
कहा जाता है कि दोनों के नाम और उनके अपराधों से जुड़ी कहानियां इतनी चर्चित हुईं कि बाद में इसी इलाके के जंगल को भी ‘चंगा-मंगा’ के नाम से जाना जाने लगा।
हालांकि, चंगा और मंगा की व्यक्तिगत जीवनी तथा जंगल के नामकरण को लेकर लोकप्रिय कथाओं और ऐतिहासिक स्रोतों में पूरी तरह एक जैसी जानकारी नहीं मिलती। इसलिए इससे जुड़ी कई बातें लोकप्रचलित कहानी के रूप में देखी जाती हैं।
चंगा-मंगा जंगल असल में है क्या?
चंगा-मंगा कोई प्राकृतिक रूप से सदियों से मौजूद जंगल नहीं था। इसे बड़े पैमाने पर मानव द्वारा विकसित वन क्षेत्र के रूप में तैयार किया गया था।
ब्रिटिश शासन के दौरान पंजाब क्षेत्र में रेलवे और दूसरे कामों के लिए लकड़ी की जरूरत बढ़ रही थी। इसी जरूरत को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ लगाने और वन क्षेत्र विकसित करने की योजनाएं शुरू की गईं।
इसी क्रम में चंगा-मंगा क्षेत्र में भी वृक्षारोपण किया गया।
कब शुरू हुआ था जंगल विकसित करने का काम?
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, चंगा-मंगा में वनरोपण का काम 1870 के दशक में शुरू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य लकड़ी और ईंधन की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ एक व्यवस्थित वन क्षेत्र विकसित करना था।
धीरे-धीरे यहां पेड़ों की संख्या बढ़ती गई और यह क्षेत्र एक बड़े मानव-निर्मित जंगल के रूप में विकसित हो गया।
सिर्फ जंगल ही नहीं, वन्यजीवों का भी घर बना
समय के साथ चंगा-मंगा केवल लकड़ी उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाला क्षेत्र नहीं रहा। यहां अलग-अलग प्रकार के पेड़-पौधे और वन्यजीव भी पाए जाने लगे।
जंगल को एक पर्यटन और वन्यजीव क्षेत्र के रूप में भी विकसित किया गया। यहां आने वाले लोगों के लिए प्राकृतिक वातावरण के साथ-साथ मनोरंजन से जुड़ी सुविधाएं भी बनाई गईं।
क्या आज भी चंगा-मंगा पहले जितना बड़ा है?
नहीं। समय के साथ पेड़ों की कटाई, मानवीय गतिविधियों और पर्यावरणीय दबावों का इस वन क्षेत्र पर असर पड़ा है।
जिस विशाल वन क्षेत्र के लिए चंगा-मंगा कभी प्रसिद्ध था, उसकी स्थिति समय के साथ बदली है। जंगल के संरक्षण और दोबारा हरियाली बढ़ाने की जरूरत लगातार महसूस की जाती रही है।
यानी आज चंगा-मंगा का नाम सुनकर जितने विशाल जंगल की तस्वीर दिमाग में आती है, उसकी वास्तविक स्थिति को समझने के लिए इसके इतिहास और वर्तमान पर्यावरणीय हालात दोनों को देखना जरूरी है।
क्या भारत के चंगू-मंगू और पाकिस्तान के चंगा-मंगा एक ही हैं?
नहीं।
नामों में समानता जरूर है, लेकिन दोनों के बीच कोई प्रमाणित सीधा संबंध नहीं है।
चंगू-मंगू — भारत में प्रचलित हास्य/लोकभाषा का नाम या संबोधन।
चंगा-मंगा — पाकिस्तान में प्रसिद्ध वन क्षेत्र का नाम।
चंगा-मंगा नाम को दो कथित डाकुओं से जोड़ने वाली लोकप्रिय कहानी भी प्रचलित है।
दोनों नामों की समान ध्वनि को ऐतिहासिक रिश्ता मानने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता।
एक नाम, दो देशों की बिल्कुल अलग कहानियां
यह कहानी इसलिए दिलचस्प है क्योंकि भारत में ‘चंगू-मंगू’ सुनते ही लोगों के दिमाग में दो शरारती किरदारों की छवि बनती है, जबकि पाकिस्तान में ‘चंगा-मंगा’ एक ऐतिहासिक वन क्षेत्र की पहचान है।
एक नाम जहां हंसी-मजाक और बोलचाल का हिस्सा बन गया, वहीं दूसरा नाम वन, इतिहास और स्थानीय लोककथाओं से जुड़ गया।
इसलिए अगली बार जब आपको ‘चंगू-मंगू’ या ‘चंगा-मंगा’ सुनाई दे, तो दोनों को एक ही कहानी के पात्र समझने की गलती मत कीजिए। नाम भले ही मिलते-जुलते हों, लेकिन उनकी कहानियां बिल्कुल अलग हैं।
डिस्क्लेमर: इस लेख में चंगा-मंगा नाम और इससे जुड़ी डाकुओं की कहानी के संबंध में प्रचलित ऐतिहासिक एवं स्थानीय विवरणों का उल्लेख किया गया है। अलग-अलग स्रोतों में नामकरण और पात्रों से जुड़ी जानकारी में अंतर मिल सकता है। इसलिए लोककथाओं को प्रमाणित इतिहास से अलग समझना जरूरी है। Satyareport.com किसी भी अप्रमाणित लोककथा को तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं करता।
राजस्थान अपनी समृद्ध संस्कृति, लोककलाओं, किलों और अनोखी परंपराओं के लिए दुनियाभर में जाना जाता है। यहां अलग-अलग समुदायों में समय के साथ कई सामाजिक रीति-रिवाज विकसित हुए हैं। इनमें कुछ परंपराएं आज भी चर्चा का विषय बनी हुई हैं। ऐसी ही एक सामाजिक प्रथा है ‘नाटा’ या ‘नातरा’, जिसका उल्लेख राजस्थान के कुछ समुदायों के सामाजिक जीवन के संदर्भ में मिलता है।
नाटा प्रथा को लेकर इंटरनेट और सोशल मीडिया पर कई तरह की बातें कही जाती हैं। कहीं इसे शादी के बाद दूसरा रिश्ता बनाने की व्यवस्था बताया जाता है तो कहीं इसे विधवा या परित्यक्त महिलाओं के पुनर्विवाह से जोड़कर देखा जाता है। वास्तव में इसके स्वरूप और नियम अलग-अलग समुदायों तथा क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं।
क्या है नाटा या नातरा प्रथा?
‘नाटा’ या ‘नातरा’ को सामान्य तौर पर ऐसी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के रूप में वर्णित किया जाता है, जिसमें किसी महिला या पुरुष के पहले वैवाहिक संबंध के समाप्त होने या अलगाव के बाद वह दूसरे साथी के साथ रहने का संबंध बना सकता है।
कुछ समुदायों में यह व्यवस्था पारंपरिक सामाजिक सहमति के माध्यम से होती रही है। इसे आधुनिक अर्थों में सामान्य विवाह की तरह समझना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसके सामाजिक नियम और प्रक्रियाएं अलग रही हैं।
इसका एक प्रमुख संदर्भ विधवा, परित्यक्त या अलग रह रही महिलाओं को दोबारा जीवनसाथी चुनने का सामाजिक रास्ता देना भी माना जाता है।
क्या शादीशुदा महिला दूसरे पुरुष के साथ रह सकती है?
नाटा प्रथा से जुड़ी चर्चाओं में यह बात सामने आती है कि किसी महिला के अपने मौजूदा पति से अलग होने के बाद वह दूसरे पुरुष के साथ रह सकती है। इसी तरह पुरुष भी नया संबंध बना सकता है।
परंपरागत व्यवस्था में परिवार और समुदाय की सहमति की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती थी। कई जगहों पर पहले संबंध से जुड़े आर्थिक या पारिवारिक मामलों को भी सुलझाया जाता था।
हालांकि, इसे यह कहकर समझाना कि “कोई भी शादीशुदा व्यक्ति जब चाहे किसी दूसरे व्यक्ति के साथ रहने लगता है”, इस प्रथा की पूरी तस्वीर नहीं बताता। इसके सामाजिक नियम क्षेत्र और समुदाय के अनुसार अलग हो सकते हैं।
पैसे देने की बात क्यों आती है?
नाटा प्रथा के बारे में उपलब्ध विवरणों में एक आर्थिक लेन-देन का उल्लेख मिलता है। कई जगह इसे ‘झगड़ा’ या पहले पति-पक्ष के साथ आर्थिक समझौते के रूप में बताया गया है।
ऐतिहासिक रूप से ऐसी व्यवस्था में महिला के पहले संबंध से जुड़े अधिकारों और आर्थिक जिम्मेदारियों को लेकर परिवारों के बीच समझौता किया जाता था।
इसे आधुनिक कानूनी अर्थों में “शादी खरीदना या रिश्ता खरीदना” समझना सही नहीं होगा। अलग-अलग इलाकों में इसके स्थानीय नियम अलग रहे हैं।
क्या यह विधवा महिलाओं के लिए दोबारा घर बसाने का रास्ता था?
नाटा प्रथा को समझने के लिए यह पहलू महत्वपूर्ण है।
पारंपरिक ग्रामीण समाज में विधवा या पति द्वारा छोड़ी गई महिला के लिए दोबारा विवाह करना कई सामाजिक परिस्थितियों में आसान नहीं था। ऐसे माहौल में कुछ समुदायों ने दूसरी साझेदारी या साथ रहने की स्थानीय सामाजिक व्यवस्था विकसित की।
इस नजरिए से नाटा को कुछ मामलों में विधवा या परित्यक्त महिला को दोबारा परिवार और सामाजिक जीवन से जोड़ने वाली व्यवस्था के रूप में देखा जाता है।
हालांकि, यह भी जरूरी है कि हर मामले को महिला की स्वतंत्र पसंद और सहमति के नजरिए से देखा जाए।
क्या नाटा में कोई रस्म नहीं होती?
नाटा संबंध सामान्य हिंदू विवाह संस्कार से अलग पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था हो सकता है। कई विवरणों में बताया गया है कि इसमें विवाह जैसी लंबी धार्मिक रस्में आवश्यक नहीं होती थीं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि कोई सामाजिक प्रक्रिया ही नहीं होती थी। कई मामलों में परिवार, समुदाय या बुजुर्गों की सहमति और आर्थिक समझौते महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
बच्चों को ‘बकरा’ कहने का दावा कितना सही है?
नाटा प्रथा से जुड़े लेखों में अक्सर दावा किया जाता है कि इस संबंध से जन्म लेने वाले बच्चों को ‘बकरा’ कहा जाता है।
हालांकि, इस शब्द को पूरे राजस्थान या नाटा प्रथा से जुड़े हर समुदाय के लिए सामान्य नियम मानना सही नहीं होगा। स्थानीय बोलियों और समुदायों में रिश्तों तथा बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द अलग-अलग हो सकते हैं।
इसलिए इस दावे को सार्वभौमिक तथ्य की तरह प्रस्तुत करने से बचना चाहिए।
क्या नाटा प्रथा आज भी मौजूद है?
नाटा को मुख्य रूप से राजस्थान और आसपास के कुछ समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में जाना जाता है। आधुनिक समय में शिक्षा, शहरीकरण, कानूनी जागरूकता और सामाजिक बदलावों के कारण ऐसी पारंपरिक व्यवस्थाओं का स्वरूप काफी बदल चुका है।
जहां कहीं ऐसी परंपराओं का उल्लेख मिलता है, वहां यह समझना जरूरी है कि परंपरागत सामाजिक व्यवस्था और वर्तमान भारतीय कानून एक ही चीज नहीं हैं।
आज किसी भी रिश्ते में व्यक्ति की स्वतंत्र सहमति, विवाह की कानूनी स्थिति, तलाक, भरण-पोषण और बच्चों के अधिकार जैसे मुद्दे कानून के तहत आते हैं।
क्या नाटा प्रथा कानूनी विवाह के बराबर है?
नहीं, केवल किसी पारंपरिक सामाजिक प्रथा का अस्तित्व अपने आप उसे आधुनिक कानूनी विवाह के बराबर नहीं बना देता।
भारत में विवाह और वैवाहिक संबंधों से जुड़े अधिकार अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों तथा लागू कानूनी प्रावधानों से निर्धारित होते हैं। इसलिए किसी पारंपरिक प्रथा के आधार पर यह मान लेना कि हर स्थिति में कानूनी विवाह, तलाक या उत्तराधिकार के सभी अधिकार अपने आप लागू हो जाएंगे, सही नहीं है।
इस प्रथा को सिर्फ ‘अजीब परंपरा’ कहना क्यों अधूरा है?
नाटा प्रथा को देखकर आज के नजरिए से कई लोगों को यह असामान्य लग सकती है। लेकिन किसी भी पुरानी सामाजिक व्यवस्था को समझने के लिए उस समय की सामाजिक परिस्थितियों को भी देखना जरूरी है।
ग्रामीण समाज में विधवा महिलाओं, पति से अलग हो चुकी महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने अलग तरह की चुनौतियां थीं। कुछ समुदायों में विकसित स्थानीय व्यवस्थाएं उन्हीं परिस्थितियों का सामाजिक समाधान रही होंगी।
वहीं दूसरी तरफ, किसी भी परंपरा का मूल्यांकन करते समय महिला की इच्छा, सहमति और सम्मान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
नाटा प्रथा हमें क्या बताती है?
नाटा या नातरा जैसी परंपराएं बताती हैं कि भारत के अलग-अलग समुदायों ने विवाह, परिवार और रिश्तों को लेकर अलग-अलग सामाजिक व्यवस्थाएं विकसित की थीं।
इसलिए इसे केवल “शादी के बाद दूसरा रिश्ता बनाने की प्रथा” कहना अधूरा होगा। इसके पीछे विधवा पुनर्विवाह, अलगाव, परिवार की सहमति, आर्थिक समझौते और स्थानीय सामाजिक नियम जैसे कई पहलू जुड़े हो सकते हैं।
ध्यान देने वाली बात: नाटा प्रथा के नियम और स्वरूप अलग-अलग समुदायों में अलग हो सकते हैं। इसलिए सोशल मीडिया पर चलने वाले हर दावे को पूरे राजस्थान पर लागू करना सही नहीं है। इसे राजस्थान के कुछ समुदायों से जुड़ी ऐतिहासिक/सामाजिक परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है।
डिस्क्लेमर: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। यहां यह बताना जरूरी है कि Satyareport.com किसी भी तरह की मान्यता या जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।
नौकरी जाना आमतौर पर लोगों के लिए आर्थिक चिंता की वजह बनता है। लेकिन क्या हो अगर किसी के पास कई साल तक बिना कमाए आराम से जिंदगी चलाने जितनी बचत हो और फिर भी बेरोजगारी उसे परेशान करने लगे?
अमेरिका के एक 29 वर्षीय कॉरपोरेट कर्मचारी के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। अप्रैल में उसकी नौकरी चली गई थी। कंपनी ने उसे करीब 9 महीने का सेवरेंस पैकेज दिया था और उसके पास इतनी बचत भी थी कि वह लगभग 5 साल तक अपने खर्च आसानी से चला सकता था। यानी तत्काल पैसों की कोई बड़ी परेशानी नहीं थी।
इसके बावजूद नौकरी जाने के बाद उसकी जिंदगी अचानक बदल गई।
200 से ज्यादा आवेदन, 15 से ज्यादा इंटरव्यू
नौकरी छूटने के बाद उसने दोबारा काम तलाशने में कोई कमी नहीं छोड़ी। उसने 200 से अधिक कंपनियों में आवेदन किया और 15 से ज्यादा इंटरव्यू दिए। लेकिन लगातार कोशिशों के बावजूद उसे कोई पक्की नौकरी नहीं मिली।
धीरे-धीरे इसका असर उसके आत्मविश्वास पर पड़ने लगा।
उसने अपनी कहानी सोशल मीडिया पर साझा करते हुए बताया कि बेरोजगारी के दौरान सबसे मुश्किल चीज पैसों की कमी नहीं थी, बल्कि जिंदगी से रूटीन का गायब हो जाना था। सुबह उठने के बाद कोई तय काम नहीं होता था और दिन कब शुरू हुआ और कब खत्म, इसका एहसास तक नहीं रहता था।
उसे लगने लगा कि वह खुद को बेकार समझने लगा है।
जिस नौकरी से खुश नहीं था, उसी को पाने की बेचैनी
इस कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि जिस तरह की कॉरपोरेट नौकरी में वह पहले काम करता था, उससे वह पूरी तरह खुश नहीं था। इसके बावजूद बेरोजगार होने के बाद उसका ध्यान बार-बार उसी नौकरी की तरफ जाने लगा।
उसे सिर्फ सैलरी की तलाश नहीं थी। वह उस रूटीन को वापस चाहता था जिसमें सुबह उठने के बाद पता हो कि दिन में क्या करना है, लोगों से बातचीत हो और कुछ घंटे किसी काम में व्यस्त रहने का मौका मिले।
यानी नौकरी उसके लिए कमाई से ज्यादा एक उद्देश्य और पहचान का हिस्सा बन चुकी थी।
फिर लिया ऐसा फैसला, जिसने सबको चौंका दिया
जब लंबे समय तक नौकरी नहीं मिली तो उसने कुछ अलग करने का फैसला किया। उसने पार्ट-टाइम डिशवॉशर यानी बर्तन धोने का काम शुरू करने का फैसला किया।
इस काम के लिए उसे करीब 11 डॉलर यानी लगभग 1049 रुपये प्रति घंटे मिलने वाले थे।
हालांकि, उसने साफ किया कि वह यह काम पैसों की जरूरत के कारण नहीं कर रहा है। उसके पास पर्याप्त इमरजेंसी फंड मौजूद है। उसका असली मकसद अपने दिन को एक रूटीन देना और खुद को किसी उपयोगी काम में व्यस्त रखना है।
उसके लिए कुछ घंटे बर्तन धोना भी उस खालीपन से बेहतर था, जिसमें पूरा दिन बिना किसी उद्देश्य के गुजर रहा था।
क्या रिटायरमेंट के बाद भी इंसान खालीपन महसूस करता है?
इस अनुभव ने उसे अपने भविष्य के बारे में सोचने पर भी मजबूर कर दिया।
उसने सवाल उठाया कि अगर भविष्य में उसके पास इतना पैसा हो जाए कि काम करने की जरूरत ही न पड़े, तब क्या वह खुश रहेगा? अगर आर्थिक चिंता न हो, शौक पूरे करने के लिए पर्याप्त पैसे हों और फिर भी दिन का बड़ा हिस्सा खाली बचा रहे, तो क्या वह उसी तरह बेचैनी महसूस करेगा?
उसने अपने पिता का उदाहरण भी दिया। उसके पिता करीब 30 साल तक कॉरपोरेट क्षेत्र में काम कर चुके हैं और कुछ समय बाद रिटायर होने वाले हैं। ऐसे में उसे चिंता है कि रिटायरमेंट के बाद उनके सामने भी यही सवाल खड़ा हो सकता है कि रोजमर्रा की जिंदगी को किस तरह व्यवस्थित रखा जाए।
लोगों ने कहा- इंसान सिर्फ अपनी नौकरी नहीं होता
सोशल मीडिया पर उसकी कहानी सामने आने के बाद कई लोगों ने अपने अनुभव भी साझा किए।
कुछ यूजर्स ने बताया कि नौकरी जाने के बाद उन्होंने छोटे-मोटे काम किए और इससे उन्हें मानसिक तौर पर काफी मदद मिली। एक व्यक्ति ने बताया कि अच्छी सैलरी वाली टेक कंपनी की नौकरी जाने के बाद वह लंबे समय तक बेरोजगार रहा और उसे ऐसे दौर से गुजरना पड़ा जब मुफ्त भोजन के लिए भी लाइन में खड़ा होना पड़ा।
एक अन्य यूजर ने बताया कि उसने भी कॉरपोरेट नौकरी छोड़ने के बाद बिल्कुल अलग तरह के छोटे काम किए। उसके मुताबिक, काम की प्रतिष्ठा से ज्यादा जरूरी यह था कि वह खुद को सक्रिय रखे।
एक बात कई लोगों की प्रतिक्रियाओं में बार-बार सामने आई—इंसान की पूरी पहचान उसकी नौकरी नहीं होती, लेकिन नौकरी से बनी दिनचर्या और उद्देश्य की भावना को अचानक खो देना बेहद मुश्किल हो सकता है।
इस 29 वर्षीय शख्स का बर्तन धोने का फैसला भी इसी बात की ओर इशारा करता है। कभी-कभी अच्छी जिंदगी के लिए सिर्फ पैसा पर्याप्त नहीं होता। इंसान को अपने दिन में किसी काम, जिम्मेदारी और उद्देश्य का एहसास भी चाहिए होता है।
दुनिया में घूमने के लिए एक से बढ़कर एक अनोखी जगहें हैं। कहीं खूबसूरत पहाड़ हैं तो कहीं ऐतिहासिक इमारतें और कहीं ऐसे थीम पार्क, जो लोगों को रोमांच का अलग अनुभव देते हैं। लेकिन दक्षिण कोरिया में एक ऐसी जगह है, जहां दिन में आपको सदियों पुरानी संस्कृति की झलक मिलती है और शाम होते ही पूरा माहौल डरावना हो जाता है।
यह जगह है कोरियन फोक विलेज, जो योंगिन शहर में स्थित है। यहां आने वाले पर्यटकों को एक तरफ पारंपरिक कोरियाई जीवनशैली देखने को मिलती है, वहीं दूसरी तरफ रात के समय डर और रोमांच से भरा अनुभव भी मिलता है।
खास बात यह है कि यहां डरावने किरदार निभाने वाले कलाकार भूत-पिशाच का रूप धारण करके गलियों में घूमते हैं। कुछ पर्यटक इनसे डरकर पीछे हटते हैं, तो कुछ इन्हीं के साथ तस्वीरें खिंचवाने के लिए उत्साहित नजर आते हैं।
दिन में दिखती है पुराने कोरिया की तस्वीर
कोरियन फोक विलेज की स्थापना 1974 में हुई थी। यह एक ओपन-एयर म्यूजियम और सांस्कृतिक थीम पार्क के तौर पर विकसित किया गया है।
यहां पुराने जोसियन काल की जीवनशैली को दर्शाने वाली सैकड़ों पारंपरिक संरचनाएं देखने को मिलती हैं। पुराने घर, मंदिर, स्कूल और गांव जैसी संरचनाएं लोगों को कोरिया के पुराने दौर की झलक देती हैं।
दिन के समय यहां कलाकार पारंपरिक कपड़ों में नजर आते हैं। लोक नृत्य, हस्तशिल्प और पारंपरिक गतिविधियों के जरिए पर्यटकों को कोरियाई संस्कृति से परिचित कराया जाता है।
लेकिन जैसे-जैसे सूरज ढलता है, इसी जगह का माहौल पूरी तरह बदलने लगता है।
शाम होते ही सामने आते हैं डरावने किरदार
रात के समय यहां विशेष हॉरर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके लिए कलाकार पारंपरिक कोरियाई भूतों और डरावने पात्रों का रूप धारण करते हैं।
सफेद पारंपरिक कपड़ों में डरावने किरदार, बिखरे बालों वाले भूत और मौत के दूत जैसे पात्र अचानक गलियों में दिखाई दे सकते हैं।
कुछ कलाकार अंधेरे कोनों में छिपे रहते हैं और अचानक सामने आकर लोगों को चौंका देते हैं। यही वजह है कि यहां घूमने वाले लोगों को कभी भी अंदाजा नहीं होता कि अगला डरावना किरदार कहां से सामने आ जाएगा।
दिलचस्प बात यह है कि डराने के बावजूद कई पर्यटक इन कलाकारों के साथ तस्वीरें खिंचवाने में काफी उत्साहित रहते हैं।
बच्चों के लिए डरावना हो सकता है अनुभव
जहां बड़े लोग इस अनुभव को रोमांच और मनोरंजन के तौर पर लेते हैं, वहीं छोटे बच्चों के लिए माहौल काफी डरावना हो सकता है।
अचानक सामने आने वाले डरावने किरदार, अंधेरी गलियां और तेज आवाजें बच्चों को घबरा सकती हैं। इसलिए छोटे बच्चों को ऐसे हॉरर आकर्षणों से दूर रखने की सलाह दी जाती है।
इसी वजह से रात के कुछ विशेष हॉरर अनुभवों के लिए उम्र संबंधी पाबंदियां भी रखी जाती हैं।
यहां सिर्फ भूत ही नहीं, डरावने गेम भी हैं
कोरियन फोक विलेज में हॉरर थीम के कई अलग-अलग आकर्षण हैं। इनमें अंधेरे पारंपरिक घर के भीतर से गुजरने वाला अनुभव भी शामिल है, जहां अचानक डरावने किरदार सामने आ सकते हैं।
इसके अलावा एक हॉरर प्रिजन थीम भी है, जिसमें खंडहर जैसे माहौल के बीच लोगों को डरावने किरदारों का सामना करना पड़ता है।
इस दौरान प्रशिक्षित कलाकार अलग-अलग जगहों से निकलकर लोगों को चौंकाते हैं। पूरा अनुभव इस तरह तैयार किया जाता है कि लोगों को ऐसा महसूस हो जैसे वे किसी डरावनी कहानी का हिस्सा बन गए हों।
डर के साथ सेल्फी का भी क्रेज
इस जगह की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां डर और मनोरंजन साथ-साथ चलते हैं।
कई पर्यटक डरावने किरदारों को देखकर चीख पड़ते हैं, लेकिन अगले ही पल उनके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए तैयार हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर भी इस जगह की तस्वीरें लोगों का ध्यान खींचती रहती हैं।
कुछ लोग इसे परिवार के साथ घूमने की जगह के रूप में देखते हैं, जबकि कुछ खास तौर पर डरावने अनुभव के लिए यहां पहुंचते हैं।
यानी अगर आप पुराने कोरियाई गांव की संस्कृति के साथ थोड़ा डर और रोमांच भी महसूस करना चाहते हैं, तो यह जगह आम थीम पार्क से बिल्कुल अलग अनुभव दे सकती है।
दिन में संस्कृति और रात में डर का यह अनोखा मेल ही कोरियन फोक विलेज को पर्यटकों के लिए खास बनाता है।
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से सामने आई यह घटना इंसान और जानवर के बीच रिश्ते की ऐसी तस्वीर दिखाती है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएंगी। घर में सो रहे परिवार को शायद अंदाजा भी नहीं था कि आधी रात उनके दरवाजे पर एक जहरीला खतरा दस्तक दे चुका है। लेकिन परिवार के पालतू कुत्ते टॉमी की नजर उस खतरे पर पड़ गई और उसने बिना अपनी जान की परवाह किए मोर्चा संभाल लिया।
मामला उभांव थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है। परिवार के मुताबिक, रविवार तड़के करीब 2 बजे एक जहरीला सांप घर के अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था। उस समय परिवार के सभी लोग सो रहे थे। अगर सांप चुपचाप घर के भीतर पहुंच जाता तो किसी बड़ी अनहोनी की आशंका थी।
खतरा देखा तो टॉमी ने मचा दिया शोर
सांप को देखते ही टॉमी सतर्क हो गया। उसने जोर-जोर से भौंकना शुरू कर दिया। उसकी आवाज से परिवार को खतरे का अंदाजा हुआ, लेकिन टॉमी यहीं नहीं रुका।
उसने सांप को घर के अंदर जाने से रोकने के लिए सीधे उस पर हमला कर दिया। इसके बाद दोनों के बीच ऐसी जंग शुरू हुई, जिसमें एक तरफ जहरीला नाग था और दूसरी तरफ अपने परिवार को बचाने के लिए डटा हुआ टॉमी।
परिजनों का कहना है कि दोनों के बीच करीब एक घंटे तक संघर्ष चलता रहा। टॉमी बार-बार सांप पर हमला करता रहा और उसे घर के अंदर पहुंचने से रोकता रहा।
आखिरकार नाग को मार गिराया
लंबी लड़ाई के बाद टॉमी ने जहरीले सांप को मार दिया। परिवार के लिए खतरा टल चुका था, लेकिन इस जीत की कीमत टॉमी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
दरअसल, संघर्ष के दौरान सांप ने टॉमी को कई जगह डस लिया था। लड़ाई खत्म होने के कुछ समय बाद उसके शरीर में जहर का असर तेजी से फैलने लगा। परिवार ने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार टॉमी ने अपने मालिक की गोद में दम तोड़ दिया।
9 साल से था परिवार का हिस्सा
परिवार के मुताबिक टॉमी करीब नौ साल से उनके साथ रह रहा था। वह सिर्फ घर का पालतू जानवर नहीं था, बल्कि परिवार के सदस्य की तरह था। इतने वर्षों तक उसने घर की रखवाली की और परिवार के साथ उसका गहरा लगाव बन गया था।
उस रात भी उसने वही किया, जो शायद कोई अपना ही करता। खतरा उसके सामने था, लेकिन उसने पीछे हटने के बजाय अपने मालिक और परिवार के बीच खुद को ढाल बना दिया।
टॉमी को नम आंखों से दी अंतिम विदाई
टॉमी की मौत के बाद परिवार का दुख संभालना मुश्किल हो गया। परिजनों का मानना है कि अगर वह समय रहते सांप को नहीं देखता और उससे भिड़ता नहीं, तो घर में सो रहे लोगों के साथ बड़ा हादसा हो सकता था।
परिवार ने टॉमी को पूरे सम्मान के साथ दफनाया। उसकी अंतिम विदाई के दौरान हर आंख नम थी। आसपास के लोगों के बीच भी टॉमी के साहस और वफादारी की चर्चा होने लगी।
टॉमी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उसने अपने परिवार की रक्षा के लिए जो किया, वह उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी पहचान बन गया। इंसानों की दुनिया में वफादारी के बड़े-बड़े किस्से सुनने को मिलते हैं, लेकिन कभी-कभी एक बेजुबान जानवर अपने कर्म से ऐसा उदाहरण छोड़ जाता है, जिसे लोग लंबे समय तक याद रखते हैं।
अफ्रीका के तंजानिया में रहने वाली मसाई जनजाति अपनी सदियों पुरानी परंपराओं और अलग जीवनशैली के लिए जानी जाती है। लंबे समय तक इस समुदाय के लोग आधुनिक सुविधाओं से काफी दूर रहे। लेकिन अब इसी समुदाय की महिलाओं की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
जो महिलाएं कभी मुख्य रूप से घर, परिवार और रोजमर्रा के कामों तक सीमित रहती थीं, वे अब तकनीकी प्रशिक्षण हासिल कर रही हैं। उन्हें सोलर एनर्जी सिस्टम लगाने और उसकी देखभाल करने की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसके बाद ये महिलाएं दूर-दराज के उन गांवों तक पहुंच रही हैं, जहां बिजली की सुविधा अब तक नहीं पहुंच सकी थी।
यह बदलाव सिर्फ गांवों को रोशन करने की कहानी नहीं है, बल्कि महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने और अपने समुदाय में नई भूमिका हासिल करने की मिसाल भी है।
पशुपालन पर निर्भर रहा है मसाई समुदाय
मसाई समुदाय मुख्य रूप से तंजानिया और केन्या के इलाकों में पाया जाता है। पारंपरिक रूप से इस समुदाय की जीवनशैली पशुपालन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रही है।
मसाई लोग अपनी पारंपरिक पोशाक, संस्कृति और रीति-रिवाजों के लिए भी दुनिया भर में पहचाने जाते हैं। हालांकि, आधुनिक सुविधाओं और तकनीकी शिक्षा तक पहुंच हर इलाके में समान नहीं रही है।
इसी वजह से ग्रामीण और दूर-दराज के क्षेत्रों में बिजली जैसी बुनियादी सुविधा भी लंबे समय तक चुनौती बनी रही।
महिलाओं ने सीखी सोलर तकनीक
अब कुछ स्थानीय पहलों और संगठनों की मदद से मसाई समुदाय की महिलाओं को सोलर तकनीक का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सोलर पैनल लगाने, बैटरी और वायरिंग को समझने, सिस्टम की जांच करने और छोटी-मोटी तकनीकी समस्या को ठीक करने जैसी जरूरी बातें सिखाई जाती हैं।
ट्रेनिंग पूरी करने के बाद महिलाएं अपने गांव के अलावा आसपास के दूसरे इलाकों में भी जाकर सोलर सिस्टम लगाने में मदद करती हैं। कई जगह वे समूह बनाकर काम करती हैं और एक-दूसरे के साथ तकनीकी अनुभव साझा करती हैं।
इस तरह महिलाएं सिर्फ बिजली की सुविधा पहुंचाने वाली कर्मचारी नहीं बन रही हैं, बल्कि अपने समुदाय के लिए तकनीकी ज्ञान का स्थानीय स्रोत भी तैयार कर रही हैं।
जिन गांवों में अंधेरा था, वहां जली रोशनी
दूर-दराज के गांवों में सोलर पैनल लगने के बाद लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में कई बदलाव आए हैं।
पहले सूरज ढलने के बाद बच्चों के लिए पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता था। अब सोलर लाइट की मदद से वे शाम और रात में भी पढ़ सकते हैं।
घरों में रोशनी होने से महिलाओं के लिए घरेलू काम करना आसान हुआ है। छोटे दुकानदार भी शाम के बाद कुछ अतिरिक्त समय तक अपना काम जारी रख सकते हैं।
मोबाइल फोन चार्ज करने की सुविधा मिलने से परिवारों का बाहरी दुनिया से संपर्क भी आसान हुआ है। कुछ ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में बिजली की सुविधा मिलने से रात के समय जरूरी सेवाओं को बेहतर तरीके से संचालित करने में मदद मिलती है।
बड़े बिजली नेटवर्क के बजाय सोलर क्यों?
दूर-दराज के इलाकों में पारंपरिक बिजली का नेटवर्क पहुंचाना आसान नहीं होता। इसके लिए लंबी दूरी तक बिजली की लाइनें बिछानी पड़ती हैं, जिसमें काफी समय और पैसा लग सकता है।
इसके मुकाबले सोलर सिस्टम छोटे स्तर पर अपेक्षाकृत आसानी से लगाया जा सकता है। तंजानिया जैसे धूप वाले देश में सौर ऊर्जा ग्रामीण इलाकों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।
सबसे खास बात यह है कि जब स्थानीय लोगों को ही सिस्टम की देखभाल की जानकारी मिल जाती है, तो छोटी-मोटी खराबियों के लिए हर बार बाहर से तकनीशियन बुलाने की जरूरत कम हो सकती है।
महिलाओं को मिल रही आर्थिक आजादी
इस पहल का असर सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है। सोलर तकनीक सीखने के बाद कई महिलाओं के लिए कमाई के नए रास्ते भी खुल रहे हैं।
वे सोलर सिस्टम की इंस्टॉलेशन और देखभाल से जुड़े काम कर सकती हैं। कुछ महिलाएं सोलर उत्पादों की बिक्री और छोटे कारोबार की दिशा में भी आगे बढ़ रही हैं।
इससे उनके परिवार में उनकी आर्थिक भूमिका मजबूत हो रही है। तकनीकी ज्ञान हासिल करने के बाद वे समुदाय के फैसलों में भी ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने की स्थिति में आ रही हैं।
बदलाव की यह कहानी क्यों है खास?
मसाई महिलाओं की यह पहल दिखाती है कि तकनीक सिर्फ बिजली पहुंचाने का माध्यम नहीं होती। सही प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर यही तकनीक किसी समुदाय के लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का रास्ता भी खोल सकती है।
जहां कभी बिजली और तकनीकी शिक्षा दूर की चीज लगती थी, वहीं अब उसी समुदाय की महिलाएं सोलर तकनीक सीखकर अपने गांवों में बदलाव की अगुवाई कर रही हैं।
अंधेरे गांवों में रोशनी पहुंचाने के साथ-साथ ये महिलाएं अपने लिए भी एक नई पहचान बना रही हैं—और यही इस पूरी पहल की सबसे बड़ी खासियत है।
जब भी दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ का नाम पूछा जाता है, ज्यादातर लोगों के दिमाग में एक ही नाम आता है—माउंट एवरेस्ट। नेपाल और तिब्बत की सीमा पर खड़ा एवरेस्ट समुद्र तल से करीब 8,848.86 मीटर ऊंचा है और लंबे समय से इसे दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माना जाता है।
लेकिन कहानी यहां थोड़ी दिलचस्प हो जाती है। अगर किसी पहाड़ की ऊंचाई उसके समुद्र तल से शिखर तक नहीं, बल्कि उसके वास्तविक आधार से चोटी तक मापी जाए, तो तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। इस पैमाने पर माउंट एवरेस्ट नंबर-1 नहीं रहता।
समुद्र के अंदर छिपा है विशाल पहाड़
दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ का खिताब इस मापदंड पर माउना केआ को मिलता है, जो अमेरिका के हवाई द्वीप पर स्थित है। यह एक विशाल और निष्क्रिय ज्वालामुखी है।
समुद्र तल से माउना केआ की ऊंचाई करीब 4,205 मीटर है। पहली नजर में यह एवरेस्ट से काफी छोटा लगता है, लेकिन इसकी असली ऊंचाई समुद्र के नीचे छिपी हुई है।
माउना केआ का आधार प्रशांत महासागर की गहराई में है। आधार से लेकर शिखर तक इसकी कुल ऊंचाई लगभग 10,205 मीटर बैठती है। यानी इस तरीके से मापने पर यह एवरेस्ट से करीब 1.4 किलोमीटर ज्यादा ऊंचा हो जाता है।
दरअसल, माउना केआ का करीब 6 किलोमीटर हिस्सा समुद्र के पानी के नीचे मौजूद है। यही वजह है कि जमीन से देखने पर इसकी वास्तविक विशालता का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।
नाम का मतलब भी है खास
माउना केआ नाम हवाईयन भाषा से आया है और इसका अर्थ लगभग ‘सफेद पहाड़’ माना जाता है। इसके ऊपरी हिस्से में सर्दियों के दौरान बर्फ भी दिखाई दे सकती है।
यह एक निष्क्रिय ज्वालामुखी है। माना जाता है कि यह हजारों वर्षों से नहीं फटा है, हालांकि वैज्ञानिक भविष्य में इसकी गतिविधि की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं करते।
माउना केआ की एक और खासियत है। इसके शिखर पर दुनिया की कई महत्वपूर्ण खगोलीय वेधशालाएं मौजूद हैं। ऊंचाई और वातावरण की परिस्थितियों के कारण यहां से अंतरिक्ष का अध्ययन करना काफी सुविधाजनक माना जाता है।
फिर एवरेस्ट का क्या स्थान है?
अब सवाल उठता है कि अगर माउना केआ आधार से शिखर तक सबसे ऊंचा है, तो एवरेस्ट को दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ क्यों कहा जाता है?
इसका कारण है ऊंचाई मापने का तरीका।
आम तौर पर पर्वत की ऊंचाई समुद्र तल से उसके शिखर तक मापी जाती है। इस पैमाने पर माउंट एवरेस्ट करीब 8,848.86 मीटर ऊंचा है और दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी बना हुआ है।
यानी एवरेस्ट को गलत कहना भी सही नहीं होगा। वह समुद्र तल से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है, जबकि माउना केआ अपने आधार से शिखर तक सबसे ऊंचे पहाड़ों में सबसे आगे है।
एक और पहाड़ भी है बेहद खास
इसी कहानी में हवाई का एक और विशाल ज्वालामुखी माउना लोआ भी आता है। आधार से शिखर तक इसकी कुल ऊंचाई लगभग 9,170 मीटर मानी जाती है। इसका बड़ा हिस्सा भी समुद्र के नीचे मौजूद है।
लेकिन दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ों की चर्चा केवल इन दो नामों तक सीमित नहीं है। इक्वाडोर का माउंट चिम्बोराजो भी अपनी एक अनोखी वजह से बेहद खास है।
पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर चिम्बोराजो
चिम्बोराजो समुद्र तल से एवरेस्ट जितना ऊंचा नहीं है और आधार से शिखर तक भी माउना केआ से पीछे है। फिर भी इसके पास एक ऐसा रिकॉर्ड है, जिसे जानकर आप हैरान हो सकते हैं।
पृथ्वी पूरी तरह गोल गेंद जैसी नहीं है। वह भूमध्य रेखा के आसपास थोड़ी उभरी हुई है। चिम्बोराजो भूमध्य रेखा के काफी करीब स्थित है। इसलिए इसका शिखर पृथ्वी के केंद्र से मापा जाए तो वह एवरेस्ट के शिखर से भी ज्यादा दूर निकल जाता है।
इस तरह तीन अलग-अलग मापदंडों पर तीन अलग-अलग पहाड़ खास बन जाते हैं।
समुद्र तल से ऊंचाई: माउंट एवरेस्ट आधार से शिखर तक ऊंचाई: माउना केआ पृथ्वी के केंद्र से सबसे दूर शिखर: माउंट चिम्बोराजो
तो अगली बार कोई पूछे कि दुनिया का सबसे ऊंचा पहाड़ कौन सा है, तो सिर्फ एवरेस्ट बोलने से पहले यह जरूर पूछिए—किस तरीके से ऊंचाई माप रहे हैं?
भारत घूमने आने वाले विदेशी पर्यटकों के लिए यहां की सड़कें, बाजार, खाना और भीड़ अक्सर एक अलग ही अनुभव लेकर आते हैं. लेकिन जब बात भारतीय रेलवे की आती है, तो कहानी और भी दिलचस्प हो जाती है. ट्रेन में सफर करना सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना नहीं, बल्कि भारत की रोजमर्रा की जिंदगी को करीब से देखने का मौका भी होता है. कुछ ऐसा ही अनुभव नीदरलैंड और मोल्दोवा से भारत घूमने आए मशहूर ट्रैवल ब्लॉगर कपल Wes और Nico का रहा. करीब एक महीने से भारत की अलग-अलग जगहों की यात्रा कर रहे इस कपल ने अब दिल्ली से आगरा तक ट्रेन में अपने पहले सफर का अनुभव सोशल मीडिया पर शेयर किया है. दिल्ली में पहुंचने के पहले ही दिन फोन चोरी होने का अनुभव शेयर करने के बाद अब कपल का भारतीय रेलवे से जुड़ा वीडियो चर्चा में है. करीब 43 सेकंड के इस वीडियो में उन्होंने ट्रेन के अंदर की सुविधाओं से लेकर सफाई, खाना और आगरा स्टेशन पर हुई अफरा-तफरी तक का जिक्र किया है. वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं.
663 रुपये में बुक किया AC स्लीपर केबिन इंस्टाग्राम अकाउंट @boutique.diaries पर 29 अगस्त को शेयर किए गए वीडियो में Nico ने बताया कि उन्होंने दिल्ली से आगरा तक करीब दो घंटे के सफर के लिए एक स्लीपर केबिन बुक किया था. ट्रेन में चढ़ने और सही कोच और सीट तलाशने में उन्हें थोड़ी परेशानी जरूर हुई, लेकिन जैसे ही वो अपने केबिन तक पहुंचे, उनकी उम्मीद के बिल्कुल उलट तस्वीर सामने थी. Nico के मुताबिक, उन्हें उम्मीद थी कि ट्रेन की हालत शायद काफी खराब होगी, लेकिन केबिन देखकर उन्हें अच्छा-खासा सरप्राइज मिला. उनका कहना था कि केबिन काफी साफ, बड़ा और एयर-कंडीशंड था. अंदर दो बेड, प्राइवेसी के लिए पर्दे, शीशा और ठीक से काम करने वाली लाइटें भी थीं. कपल के लिए सबसे खास बात यह रही कि करीब 6 यूरो यानी लगभग 663 रुपये में उन्हें इस तरह की सुविधा मिली. Nico ने माना कि इस कीमत के हिसाब से ट्रेन का अनुभव उनकी उम्मीद से कहीं बेहतर था. सफर के दौरान कपल ने ट्रेन में मिलने वाली दूसरी सुविधाओं पर भी ध्यान दिया. Nico ने बताया कि यात्री ट्रेन में खाना भी ऑर्डर कर सकते हैं. इसके अलावा ट्रेन के अंदर कई वेंडर्स भी घूमते हुए नजर आए, जो यात्रियों को खाने-पीने की चीजें बेच रहे थे. हालांकि, कपल ने इन वेंडर्स से कुछ खरीदना पसंद नहीं किया. यानी ट्रेन में सफर करते हुए उन्हें खाने के लिए कई विकल्प दिखाई दिए. हालांकि, हर चीज उन्हें पसंद आई हो, ऐसा नहीं था.
टॉयलेट की हालत ने किया निराश जहां केबिन ने विदेशी कपल को उम्मीद से ज्यादा प्रभावित किया, वहीं ट्रेन के टॉयलेट को लेकर उनका अनुभव काफी अलग रहा. Nico ने साफ तौर पर कहा कि टॉयलेट काफी गंदे थे और वहां से बदबू भी आ रही थी. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि उनका सफर सिर्फ करीब दो घंटे का था, इसलिए इस परेशानी को ज्यादा देर तक झेलना नहीं पड़ा. कुल मिलाकर कपल ने ट्रेन के सफर को उसकी कीमत के मुकाबले अच्छा बताया. लेकिन असली परेशानी उन्हें आगरा पहुंचने के बाद हुई.