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  • उत्तर प्रदेश आई प्रेमिका निकली 4 बच्चों की मां, 24 घंटे भी न चली शादी, अजब प्रेम की गजब कहानी का हैरान करने वाला अंत.

    उत्तर प्रदेश आई प्रेमिका निकली 4 बच्चों की मां, 24 घंटे भी न चली शादी, अजब प्रेम की गजब कहानी का हैरान करने वाला अंत.

    उत्तर प्रदेश के जिले में एक शादी के बाद ऐसा खुलासा हुआ, जिसने दूल्हे और उसके परिवार को हैरान कर दिया। गुजरात के सिलवासा में काम करने के दौरान शुरू हुई प्रेम कहानी शादी तक पहुंची, लेकिन शादी के अगले ही दिन महिला का पहला पति अपने चार बच्चों के साथ वहां पहुंच गया। इसके बाद महिला अपने पहले परिवार के साथ वापस लौट गई।

    जरिया थाना क्षेत्र से जुड़े इस मामले में युवक ने गुजरात में साथ काम करने वाली महिला से शादी की थी। शादी के बाद परिवार में खुशी का माहौल था, लेकिन कुछ ही समय बाद महिला के पहले पति और बच्चों के पहुंचने से पूरा मामला बदल गया।

    सिलवासा में हुई थी दोनों की मुलाकात

    जानकारी के मुताबिक, युवक और महिला सिलवासा की एक कंपनी में काम करते थे। साथ काम करने के दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और उन्होंने साथ रहने का फैसला कर लिया।

    इसके बाद महिला गुजरात से हमीरपुर पहुंची और युवक से शादी कर ली। युवक के परिवार को यह जानकारी नहीं थी कि महिला पहले से शादीशुदा है और उसके चार बच्चे हैं।

    शादी के अगले दिन सामने आया सच

    शादी के करीब 24 घंटे बाद महिला का पहला पति अपने चार बच्चों को लेकर सरीला पहुंच गया। बच्चों को देखकर युवक के परिवार को महिला की पहली शादी और उसके बच्चों के बारे में पता चला।

    बताया जा रहा है कि महिला का पहला पति करीब पांच महीने पहले रोजगार के लिए सिलवासा गया था। उसकी पत्नी भी वहीं मजदूरी करती थी। इसी दौरान महिला की मुलाकात दूसरे युवक से हुई और दोनों के बीच संबंध बन गए।

    बच्चों के साथ लौटने का फैसला

    पहले पति और बच्चों को सामने देखकर महिला ने उनके साथ वापस जाने का फैसला किया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई और लिखित समझौता कराया गया।

    समझौते के बाद महिला अपने पहले पति और चारों बच्चों के साथ मिर्जापुर लौट गई। जिस युवक से उसने एक दिन पहले शादी की थी, उसके साथ उसका रिश्ता महज 24 घंटे में खत्म हो गया।

    पति ने बताई पूरी कहानी

    महिला के पहले पति के मुताबिक, उसकी शादी करीब 20 साल पहले हुई थी और उनके चार बच्चे हैं। वह काम के सिलसिले में सिलवासा गया था। एक रात ड्यूटी से लौटने पर बच्चों ने बताया कि उनकी मां घर पर नहीं है।

    काफी तलाश के बाद उसे जानकारी मिली कि महिला ने दूसरे युवक से शादी कर ली है। इसके बाद वह बच्चों को साथ लेकर सरीला पहुंचा।

    शिकायत दर्ज नहीं कराई गई

    स्थानीय पुलिस के अनुसार, मामले में किसी भी पक्ष ने औपचारिक शिकायत नहीं दी। महिला ने अपनी इच्छा से पहले पति और बच्चों के साथ जाने की बात कही। इसके बाद दोनों पक्षों की सहमति से समझौता हुआ और महिला अपने परिवार के साथ लौट गई।

    शादी के अगले ही दिन सामने आए इस घटनाक्रम की इलाके में चर्चा है। गुजरात में शुरू हुई प्रेम कहानी हमीरपुर पहुंचकर शादी तक तो पहुंची, लेकिन महिला अपने चार बच्चों और पहले पति के साथ वापस लौट गई।

  • बांके बिहारी की मंगला आरती साल में केवल जन्माष्टमी पर क्यों? रात 2 बजे दर्शन के पीछे छिपी है.?

    बांके बिहारी की मंगला आरती साल में केवल जन्माष्टमी पर क्यों? रात 2 बजे दर्शन के पीछे छिपी है.?

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    Banke Bihari Mandir: बांके बिहारी मंदिर की मंगला आरती जन्माष्टमी की विशेष सेवा है, जो साल में सिर्फ एक बार की जाती है, आखिर क्या है वजह कि साल में सिर्फ एक बार ही ये आरती होती है.

    Banke Bihari Mandir: वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव अपने आप में बेहद खास होता है. देशभर के कृष्ण मंदिरों में जन्माष्टमी के बाद मंगला आरती होती है, लेकिन बांके बिहारी मंदिर की परंपरा सबसे अलग है.

    यहां मंगला आरती साल में केवल एक बार, जन्माष्टमी की रात के बाद ही होती है. मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, जन्माष्टमी पर मध्यरात्रि में महाभिषेक के बाद करीब 2 बजे से विशेष दर्शन शुरू होते हैं और मंगला आरती लगभग 3:30 बजे की जाती है.

    मंगला आरती क्या है, इसका महत्व

    सनातन परंपरा में मंगला आरती का अर्थ है भगवान को सुबह प्रेमपूर्वक जगाना और दिन की पहली सेवा करना. आमतौर पर यह सूर्योदय से पहले की जाती है. लेकिन बांके बिहारी मंदिर में ठाकुर जी को बाल स्वरूप में मानकर उनकी सेवा की जाती है इसलिए यहां उनकी दिनचर्या भी एक बालक की तरह मानी जाती है समय पर भोग, विश्राम और सेवा.

    जन्माष्टमी के अलावा क्यों नहीं होती मंगला आरती

    बांके बिहारी मंदिर की विशिष्ट परंपरा के अनुसार आम दिनों में ठाकुर जी को सुबह बहुत जल्दी जगाकर मंगला आरती नहीं की जाती. ब्रज की लोक आस्था में इसका संबंध निधिवन की रात्रिकालीन रासलीला से भी जोड़ा जाता है. मान्यता है कि ठाकुर जी रात में निधिवन में रास रचाने जाते हैं और देर रात लौटकर विश्राम करते हैं इसलिए सुबह उन्हें जगाना उचित नहीं माना जाता. हालांकि ये धार्मिक मान्यता है.

    फिर जन्माष्टमी पर क्यों खुलते हैं रात में पट?

    • जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का उत्सव है. इसलिए इस दिन ठाकुर जी की सेवा पद्धति में विशेष बदलाव होता है.
    • मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक जन्माष्टमी की रात शयन आरती के बाद ठाकुर जी विश्राम करते हैं.
    • मध्यरात्रि में गर्भगृह में महाभिषेक होता है, जिसमें दूध, दही, शहद, घी और जल से अभिषेक किया जाता है.
    • इसके बाद उन्हें विशेष वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं. फिर करीब अभिषेक के बाद दर्शन शुरू होते हैं.
    • यही कारण है कि जन्माष्टमी की रात होने वाला दर्शन सामान्य सुबह के दर्शन से बिल्कुल अलग माना जाता है.
    • भक्त अपने आराध्य के जन्मोत्सव के तुरंत बाद बालकृष्ण के रूप में दर्शन करते हैं.

    निधिवन और कान्हा का संबंध

    निधिवन श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला का प्रमुख स्थल रहा है. यहां लगे तुलसी के पौधों को भी भक्त विशेष श्रद्धा से देखते हैं और मान्यता है कि रात में ये गोपियों का स्वरूप धारण करते हैं. निधिवन में स्थित रंग महल को लेकर मान्यता है कि रात्रि में राधा-कृष्ण यहां विश्राम करते हैं. इसी वजह से सूर्यास्त के बाद निधिवन के अंदर किसी के रुकने की परंपरा नहीं है.

    1. बांके बिहारी मंदिर में मंगला आरती साल में केवल एक बार क्यों होती है?
    बाल स्वरूप ठाकुर जी को रात में विश्राम कराने की मान्यता के कारण सामान्य दिनों में उन्हें सुबह जल्दी नहीं जगाया जाता, जबकि जन्माष्टमी पर विशेष मंगला आरती की जाती है.

    2. जन्माष्टमी पर बांके बिहारी मंदिर में रात में दर्शन क्यों होते हैं?
    जन्माष्टमी पर मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण का महाभिषेक और विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसके बाद भक्तों के लिए विशेष दर्शन खोले जाते हैं.

    3. बांके बिहारी जी की मंगला आरती का क्या महत्व है?
    मंगला आरती भगवान को प्रातः जगाने और दिन की पहली सेवा करने की परंपरा है, जन्माष्टमी पर यह श्रीकृष्ण के प्राकट्य के बाद होने वाली विशेष सेवा मानी जाती है.

    4. क्या हर भक्त बांके बिहारी जी की मंगला आरती के दर्शन कर सकता है?
    मंगला आरती के दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंच सकते हैं, लेकिन प्रवेश और भीड़ की व्यवस्था मंदिर प्रशासन के निर्देशों के अनुसार होती है.

  • इस देश में बच्चों को नहीं सताता पढ़ाई और परीक्षा का डर, रोज सिर्फ 4 घंटे स्कूल; जानिए क्या है अनोखा सिस्टम.

    इस देश में बच्चों को नहीं सताता पढ़ाई और परीक्षा का डर, रोज सिर्फ 4 घंटे स्कूल; जानिए क्या है अनोखा सिस्टम.

    भारत में बच्चों की पढ़ाई को लेकर अक्सर चर्चा होती रहती है। छोटी उम्र से ही बच्चों पर पढ़ाई, होमवर्क और परीक्षाओं का दबाव बढ़ने लगता है। जैसे-जैसे कक्षा आगे बढ़ती है, बोर्ड परीक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की चिंता भी बच्चों के साथ-साथ माता-पिता पर हावी होने लगती है। लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जहां बच्चों की शिक्षा का तरीका इससे काफी अलग है।

    यह देश है फिनलैंड, जिसे लंबे समय से अपनी शिक्षा व्यवस्था के लिए दुनिया के प्रमुख देशों में गिना जाता है। यहां बच्चों को कम उम्र में भारी-भरकम परीक्षाओं के दबाव में नहीं डाला जाता। पढ़ाई का मकसद सिर्फ अच्छे नंबर हासिल करना नहीं, बल्कि बच्चों में समझ, रचनात्मकता और आत्मविश्वास विकसित करना माना जाता है।

    कक्षा 1 से 9 तक नहीं होती राष्ट्रीय परीक्षा

    फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की सबसे खास बात यह है कि बेसिक एजुकेशन यानी कक्षा 1 से 9 तक बच्चों के लिए कोई राष्ट्रीय स्तर की स्टैंडर्डाइज्ड परीक्षा नहीं होती। उनकी प्रगति का आकलन स्कूल के शिक्षक लगातार करते हैं।

    बच्चों की क्षमता को केवल परीक्षा के नंबरों से नहीं मापा जाता। क्लास में उनकी भागीदारी, प्रोजेक्ट, रोजाना के काम, सीखने की क्षमता और खुद के प्रदर्शन का आकलन भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

    बड़ा राष्ट्रीय स्तर का परीक्षा सिस्टम ऊपरी माध्यमिक शिक्षा के अंत में आता है। मैट्रिकुलेशन एग्जाम आमतौर पर तब होता है, जब छात्र करीब 18 से 19 वर्ष की उम्र में पहुंच जाते हैं।

    छोटे बच्चों के लिए करीब 4 घंटे की पढ़ाई

    फिनलैंड में शुरुआती कक्षाओं के बच्चों के स्कूल का समय भी कई देशों की तुलना में कम रहता है। कक्षा 1 और 2 में सप्ताह के दौरान न्यूनतम 20 लेसन होते हैं। एक लेसन करीब 45 मिनट का होता है।

    इस हिसाब से शुरुआती कक्षाओं में बच्चों का रोजाना स्कूल समय लगभग चार घंटे के आसपास रह सकता है। पढ़ाई के बीच बच्चों को पर्याप्त ब्रेक भी दिए जाते हैं।

    इस व्यवस्था का उद्देश्य बच्चों को लगातार किताबों के सामने बैठाए रखना नहीं, बल्कि पढ़ाई के साथ उन्हें खेलने, आराम करने और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर देना है।

    7 साल की उम्र से शुरू होती है औपचारिक स्कूली शिक्षा

    फिनलैंड में औपचारिक स्कूली शिक्षा आमतौर पर 7 वर्ष की उम्र से शुरू होती है। इससे पहले करीब 6 साल की उम्र में बच्चों के लिए प्री-प्राइमरी एजुकेशन की व्यवस्था होती है।

    इस चरण में बच्चों को केवल किताबें और कठिन पाठ याद कराने पर जोर नहीं दिया जाता। खेल और गतिविधियों के जरिए उन्हें नई चीजें समझने का अवसर दिया जाता है।

    यहां शिक्षा का फोकस रटने की बजाय चीजों को समझने, सवाल पूछने, अपनी सोच विकसित करने और सामाजिक कौशल सीखने पर रहता है।

    होमवर्क का बोझ भी कम

    फिनलैंड की शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को भारी-भरकम होमवर्क देने की परंपरा नहीं है। पढ़ाई के अलावा बच्चों के मानसिक आराम और व्यक्तिगत समय को भी महत्व दिया जाता है।

    इस शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। फिनलैंड में शिक्षक बनने के लिए उच्च स्तर की शिक्षा और कठिन प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। शिक्षकों को पढ़ाने के तरीके को लेकर भी काफी स्वतंत्रता दी जाती है।

    वे पाठ्यक्रम के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए बच्चों की जरूरत के अनुसार अपनी शिक्षण पद्धति तैयार कर सकते हैं।

    अमीर-गरीब का फर्क कम करने की कोशिश

    फिनलैंड में शिक्षा को अधिक समान बनाने पर भी जोर दिया जाता है। बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ कई जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। स्कूलों में मुफ्त भोजन, किताबें और अन्य शैक्षणिक सुविधाएं भी व्यवस्था का हिस्सा हैं।

    अगर किसी बच्चे को पढ़ाई में परेशानी आती है या वह बाकी बच्चों से पीछे रह जाता है, तो उसे अतिरिक्त सहायता देने की कोशिश की जाती है। उद्देश्य यह होता है कि बच्चा कमजोर होने की वजह से शिक्षा की दौड़ में पीछे न छूट जाए।

    सिर्फ नंबर नहीं, बच्चे की पूरी क्षमता पर ध्यान

    फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा संदेश यही माना जाता है कि बच्चे की क्षमता को केवल परीक्षा के अंकों से तय नहीं किया जाना चाहिए।

    पढ़ाई के साथ उसका मानसिक स्वास्थ्य, रचनात्मक सोच, सामाजिक व्यवहार, आत्मविश्वास और सीखने की इच्छा भी महत्वपूर्ण है।

    हालांकि फिनलैंड के प्रदर्शन में हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय पीआईएसए आकलन में कुछ गिरावट देखने को मिली है, फिर भी उसकी शिक्षा व्यवस्था आज भी दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है।

    यही वजह है कि जब बच्चों पर बढ़ते पढ़ाई और परीक्षा के दबाव की बात होती है, तो फिनलैंड का मॉडल अक्सर उदाहरण के तौर पर सामने आता है। इसका मूल विचार यही है कि बच्चे को सिर्फ परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी के लिए तैयार किया जाए।

  • भारत के इस बाजार में बिक रहे हैं सांप के अंडे! कीमत सुनकर रह जाएंगे हैरान, जानिए क्यों खाते हैं लोग.

    भारत के इस बाजार में बिक रहे हैं सांप के अंडे! कीमत सुनकर रह जाएंगे हैरान, जानिए क्यों खाते हैं लोग.

    भारत में खान-पान की विविधता इतनी ज्यादा है कि एक राज्य में जो चीज सामान्य भोजन मानी जाती है, वही दूसरे हिस्से के लोगों के लिए बेहद अजीब हो सकती है। खासकर पूर्वोत्तर भारत में पारंपरिक खान-पान की अपनी अलग पहचान है। यहां कई ऐसी चीजें भोजन में शामिल की जाती हैं, जिन्हें देश के दूसरे हिस्सों में आमतौर पर नहीं खाया जाता।

    इसी बीच नागालैंड के एक स्थानीय बाजार से जुड़ी एक तस्वीर और जानकारी चर्चा में है। दावा किया जा रहा है कि बाजार में सांप के अंडे बेचे जा रहे थे। इनकी कीमत करीब 1000 रुपये प्रति दर्जन बताई गई। हालांकि, बाजार में मौजूद अंडे वास्तव में अजगर के ही थे या किसी दूसरी सांप प्रजाति के, इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

    इस दावे ने लोगों का ध्यान इसलिए भी खींचा क्योंकि भारत के अधिकांश हिस्सों में सांप के अंडों को भोजन के रूप में देखना बेहद असामान्य माना जाता है।

    पूर्वोत्तर का खान-पान क्यों है इतना अलग?

    पूर्वोत्तर भारत के कई समुदायों की पारंपरिक भोजन संस्कृति प्रकृति और स्थानीय संसाधनों से गहराई से जुड़ी हुई है। जंगलों और आसपास के क्षेत्रों में उपलब्ध कई तरह के खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल पीढ़ियों से भोजन में किया जाता रहा है।

    कुछ इलाकों में कीड़े-मकोड़े, घोंघे, रेशम के कीड़े, टिड्डे और अन्य स्थानीय खाद्य पदार्थ भी पारंपरिक व्यंजनों का हिस्सा रहे हैं। इन चीजों को कई समुदाय स्वाद के साथ-साथ पोषण के नजरिए से भी महत्वपूर्ण मानते हैं।

    नागालैंड समेत पूर्वोत्तर के राज्यों में खान-पान समुदाय और इलाके के हिसाब से काफी बदल जाता है। इसलिए किसी एक भोजन को पूरे पूर्वोत्तर की संस्कृति से जोड़ना सही नहीं होगा।

    नागालैंड के भोजन में क्या-क्या मिलता है?

    नागालैंड की पारंपरिक भोजन संस्कृति में मांसाहारी व्यंजनों की बड़ी भूमिका है। सूअर का मांस, बीफ, स्मोक्ड मीट, स्थानीय साग और बांस की कोपलों से तैयार व्यंजन कई जगहों पर लोकप्रिय हैं।

    इसके अलावा कुछ समुदायों में अलग-अलग तरह के कीड़ों और लार्वा को भी भोजन के रूप में इस्तेमाल करने की परंपरा रही है। स्थानीय बाजारों में मौसम और उपलब्धता के आधार पर ऐसे खाद्य पदार्थ दिखाई दे सकते हैं।

    यही वजह है कि नागालैंड के बाजारों में मिलने वाली कुछ चीजें देश के दूसरे हिस्सों के लोगों को हैरान कर देती हैं।

    क्या सच में बिकते हैं अजगर के अंडे?

    जिस बाजार की तस्वीर चर्चा में है, वहां मौजूद अंडों को अजगर के अंडे बताया गया है और उनकी कीमत लगभग 1000 रुपये दर्जन बताई गई है। लेकिन सिर्फ तस्वीर या सोशल मीडिया पर किए गए दावे के आधार पर अंडों की प्रजाति की पक्की पहचान नहीं की जा सकती।

    यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भारत में कई सांप और वन्यजीव प्रजातियां कानून के तहत संरक्षित हैं। इसलिए किसी संरक्षित वन्यजीव का शिकार, अंडे इकट्ठा करना या उनका अवैध कारोबार कानूनी कार्रवाई का कारण बन सकता है।

    इसलिए बाजार में किसी जंगली जीव से जुड़ा उत्पाद दिखाई देने का मतलब यह नहीं है कि उसका व्यापार कानूनी रूप से भी अनुमति प्राप्त है।

    सोशल मीडिया पर क्यों मचा बवाल?

    सांप के अंडों से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद लोगों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं। कुछ लोग इसे देखकर हैरान हुए, जबकि कुछ ने इसे पूर्वोत्तर भारत की पारंपरिक खाद्य संस्कृति का हिस्सा बताते हुए समझने की बात कही।

    दरअसल, भारत की खान-पान संस्कृति बेहद विविध है। अलग-अलग इलाकों में सदियों से स्थानीय जलवायु, जंगल, कृषि और उपलब्ध संसाधनों के आधार पर भोजन की परंपराएं विकसित हुई हैं।

    इसलिए किसी अनोखे खाद्य पदार्थ को देखकर हैरान होना स्वाभाविक है, लेकिन उसके पीछे की स्थानीय संस्कृति को समझना भी उतना ही जरूरी है।

    हालांकि, सांप या किसी अन्य वन्यजीव से जुड़े खाद्य पदार्थों के मामले में यह जरूर देखना चाहिए कि उनका स्रोत और बिक्री कानून के अनुरूप है या नहीं।

  • पिता जी को हर तीसरे साल सांप काटता है… बेटे ने बताई रूह कंपा देने वाली पुनर्जन्म की दुश्मनी!.

    पिता जी को हर तीसरे साल सांप काटता है… बेटे ने बताई रूह कंपा देने वाली पुनर्जन्म की दुश्मनी!.

    पिता जी को हर तीसरे साल सांप काटता है... बेटे ने बताई रूह कंपा देने वाली पुनर्जन्म की दुश्मनी!

    झांसी के चिरगांव थाना क्षेत्र के ग्राम पट्टी कुम्हर्रा स्थित खेड़ापति हनुमान मंदिर पर झाड़फूंक कराने पहुंचे 70 वर्षीय सीताराम को 14 बार काला सांप काट चुका है. सीताराम का कहना है कि जब वह 28 साल के युवा थे, तब सांप ने उन्हें पहली बार कटा था और तब से लेकर आज तक हर तीन साल के अंतराल में सांप उन्हें 14 बार काट चुका है.

    पुनर्जन्म की दुश्मनी हर बार सांप के काटने के बाद सीताराम की जान जोखिम में पड़ जाती है, लेकिन वह हर बार बच जाते हैं. इस घटना को लेकर गांव में तरह-तरह की चर्चा हो रही है. कोई इसे नाग-नागिन का बदला कहता है तो कोई पुनर्जन्म की दुश्मनी. लेकिन असलियत क्या है, यह कोई भी नहीं जानता. फिलहाल, सीताराम की यह कहानी गांव में चर्चा का विषय बनी हुई है.

    सीताराम की स्थिति देखकर यह कहा जा सकता है कि वह इस समस्या से काफी परेशान हैं और बार-बार सांप के काटने से सीताराम काफी सदमे में रहने लगे हैं. वह अब खेड़ापति हनुमान मंदिर पर झाड़फूंक कराने पहुंचे हैं ताकि उन्हें इस समस्या से निजात मिल सके. सीताराम की स्थिति देखकर यह कहा जा सकता है कि वह इस समस्या से काफी परेशान हैं.

    सीताराम ने बेटने ने क्या बताया? सीताराम का बेटे ने बताया कि पुराने जमाने की कुछ जो बुराइयां है इसलिए सांप पिताजी को काटता रहता है. पिताजी ने पिछली बार बताया था कि हम ठाकुर हैं वह गुर्जर था. हमने बंदूक से मार दिया था, वह सांप बन गया और हम इंसान बन गए, तो वह बार-बार काटता रहता है, सपने में वह बताता है कि हम दो दिन बाद काट लेंगे फिर वह सांप काट लेता है, काटते हुए कोई भी देख नहीं पता है और नहीं किसी को पता चलता है, सिर्फ उन्हीं को नजर आता है अभी तक 14 बार सांप काट चुका है इसलिए मंदिर पर झाड़ फूंक करवाने आए हैं उन्होंने ही झाड़फूंक करके पिताजी को ठीक किया है.

  • गोल नहीं, चौकोर पॉटी करता है ये जीव! जानिए वॉम्बैट के इस अनोखे राज का सच.

    गोल नहीं, चौकोर पॉटी करता है ये जीव! जानिए वॉम्बैट के इस अनोखे राज का सच.

    दुनिया में ऐसे कई जीव हैं जिनकी खासियतें इंसानों को हैरान कर देती हैं। कोई आसमान में उड़ सकता है, कोई पानी में घंटों रह सकता है तो कोई जमीन के अंदर लंबी सुरंग बना लेता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया में पाया जाने वाला एक जीव ऐसा है जिसकी पहचान ही उसकी बेहद अनोखी पॉटी से होती है। वॉम्बैट दुनिया का एकमात्र ज्ञात स्तनधारी है जो क्यूब यानी चौकोर आकार की पॉटी करता है।

    पहली बार सुनने पर यह बात किसी मजाक जैसी लग सकती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने रिसर्च के जरिए इसके पीछे छिपा पूरा रहस्य समझ लिया है।

    भालू जैसा दिखता है वॉम्बैट

    वॉम्बैट ऑस्ट्रेलिया का मूल निवासी एक मार्सूपियल जीव है। इसका शरीर मजबूत और पैर छोटे होते हैं। देखने में यह छोटे भालू या बैजर जैसा दिखाई देता है। इसके पंजे बेहद ताकतवर होते हैं, जिनकी मदद से यह जमीन के अंदर बिल बनाता है।

    यह शाकाहारी जानवर है और मुख्य रूप से घास, जड़ें, छाल और दूसरी वनस्पतियां खाता है। वॉम्बैट ज्यादातर रात में सक्रिय रहता है और दिन का काफी समय अपने बिल में आराम करते हुए बिताता है।

    लेकिन इसकी सबसे दिलचस्प बात इसका खाना या रहन-सहन नहीं, बल्कि उसका पाचन तंत्र है।

    आखिर चौकोर कैसे बनती है पॉटी?

    आमतौर पर जानवरों का मल गोल या बेलनाकार आकार का होता है। इसकी वजह यह है कि आंतों की मांसपेशियां एक खास तरीके से सिकुड़ती हैं। फिर वॉम्बैट की पॉटी चौकोर कैसे हो जाती है?

    वैज्ञानिकों ने इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वॉम्बैट की आंतों का अध्ययन किया। रिसर्च से पता चला कि इसकी आंत का आखिरी हिस्सा बाकी हिस्सों से अलग तरीके से काम करता है।

    वॉम्बैट की आंत में कुछ हिस्से ज्यादा सख्त होते हैं, जबकि कुछ हिस्से अपेक्षाकृत लचीले होते हैं। जब आंतों की मांसपेशियां सिकुड़ती हैं तो इन अलग-अलग हिस्सों पर दबाव भी अलग पड़ता है। इसी असमान दबाव के कारण मल धीरे-धीरे अपने कोनों वाला आकार लेने लगता है और आखिर में क्यूब जैसा बन जाता है।

    यानी चौकोर पॉटी बनने का राज मलद्वार में नहीं, बल्कि आंतों की बनावट में छिपा है।

    पहले लोग समझते थे कुछ और

    वॉम्बैट की चौकोर पॉटी को लेकर लंबे समय तक अलग-अलग तरह के अनुमान लगाए जाते रहे। कुछ लोगों का मानना था कि शायद इसका मलद्वार ही चौकोर आकार का होता होगा।

    लेकिन वैज्ञानिक अध्ययन ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया। वॉम्बैट का मलद्वार सामान्य रूप से गोल होता है। चौकोर आकार आंत के अंदर ही बनता है और फिर वही क्यूब बाहर निकलता है।

    वैज्ञानिकों ने आंतों की संरचना का अध्ययन करके पाया कि अलग-अलग हिस्सों की लोच और संकुचन की गति में अंतर इस अनोखे आकार के पीछे बड़ी वजह है।

    सूखा मल भी है एक खास वजह

    वॉम्बैट का पाचन तंत्र उसके जीवनशैली के हिसाब से बेहद खास है। इसकी आंतें भोजन से काफी मात्रा में पानी सोख लेती हैं, जिसके कारण इसका मल बेहद सूखा और सख्त हो जाता है।

    इसके बाद आंत के अंतिम हिस्से में होने वाले असमान संकुचन मल को क्यूब के आकार में ढाल देते हैं।

    इस पूरी प्रक्रिया को देखकर वैज्ञानिक भी हैरान हुए, क्योंकि प्रकृति ने एक ही जीव के शरीर में ऐसी व्यवस्था विकसित कर दी है जो उसके मल को बाकी स्तनधारियों से बिल्कुल अलग आकार देती है।

    चौकोर पॉटी का फायदा क्या है?

    वॉम्बैट अक्सर अपनी पॉटी को चट्टानों, लकड़ियों या दूसरी ऊंची जगहों के आसपास छोड़ता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि क्यूब आकार होने के कारण ये छोटे-छोटे टुकड़े आसानी से लुढ़कते नहीं हैं।

    वॉम्बैट इन्हें अपने इलाके की सीमा चिन्हित करने के लिए इस्तेमाल करता है। इस तरह चौकोर आकार उसके लिए सिर्फ एक अजीब प्राकृतिक घटना नहीं, बल्कि व्यवहारिक फायदा भी दे सकता है।

    प्रकृति में ऐसी अनोखी व्यवस्थाएं अक्सर जीवों के रहने और अपने आसपास के माहौल के साथ तालमेल बैठाने से जुड़ी होती हैं।

    प्रकृति का अनोखा कमाल

    वॉम्बैट की चौकोर पॉटी भले ही सुनने में मजेदार लगे, लेकिन इसके पीछे छिपी जैविक प्रक्रिया वैज्ञानिकों के लिए काफी दिलचस्प है। इसकी आंतों की अलग-अलग लोच और मांसपेशियों के असमान संकुचन मिलकर ऐसा आकार बनाते हैं, जिसकी कल्पना शायद किसी इंसान ने कभी नहीं की होगी।

    यही वजह है कि वॉम्बैट को प्रकृति के सबसे अनोखे जीवों में गिना जाता है।

    एक गोल रास्ते से चौकोर चीज बाहर निकल सकती है—वॉम्बैट का शरीर इसका हैरान कर देने वाला उदाहरण है।

     

     
  • पत्ते तो कई बार देखे होंगे, कभी देखा है पान का फूल..?

    पत्ते तो कई बार देखे होंगे, कभी देखा है पान का फूल..?

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    पान के पत्ते भारत की संस्कृति का अभिन्न अंग हैं. शादी-ब्याह, पूजा-पाठ, मेहमानवाजी या रोजमर्रा के पान-सुपारी के शौक में पान के पत्ते हर जगह नजर आते हैं. लोग इन्हें चाव से खाते हैं और इनसे कई आयुर्वेदिक औषधियां भी बनाई जाती हैं. लेकिन क्या आपने कभी पान का फूल देखा है? ज्यादातर लोगों का जवाब होगा नहीं.

    हाल ही में सोशल मीडिया पर एक महिला ने पान की बेल पर लगे फूलों की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए तो लोग हैरान रह गए. कई कमेंट्स में लिखा गया कि सालों से पान के पत्ते देख रहे हैं लेकिन फूल पहली बार देखा. वास्तव में पान का पौधा (वैज्ञानिक नाम पाइपर बेटल) एक बेलनुमा पौधा है जो पिपरेसी परिवार से आता है. यह मुख्य रूप से पत्तियों के लिए उगाया जाता है. इसकी पत्तियां दिल के आकार की, चमकदार हरी और सुगंधित होती हैं. लेकिन यह पौधा फूल भी देता है.

    विरले हैं ये फूल
    पान के फूल छोटे होते हैं और स्पाइक या कैटकिन के रूप में लगते हैं. नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर होते हैं. ये फूल आमतौर पर सफेद या हरे रंग के होते हैं और बहुत आकर्षक नहीं लगते, इसलिए लोग इन्हें नोटिस भी नहीं करते. खेती में पान के पौधों को अक्सर कटिंग से लगाया जाता है और हर कुछ साल बाद नए पौधे लगा दिए जाते हैं. इसलिए ज्यादातर व्यावसायिक बेलों पर फूल आने का मौका ही नहीं मिलता. विशेषज्ञों के अनुसार पौधों को फूल आने में 8 से 10 साल तक का समय लग सकता है. घरों में गमलों में या लंबे समय तक एक ही बेल रखने वाले लोग ही कभी-कभी इन फूलों को देख पाते हैं. इसलिए इन्हें दुर्लभ माना जाता है और “सालों की तपस्या” के बाद खिलने वाला कहा जाता है.

    नहीं होते काम के
    पान के फूलों का व्यावसायिक या औषधीय उपयोग लगभग ना के बराबर है. पूरा फोकस पत्तियों पर रहता है क्योंकि वे ही खाई जाती हैं और बेची जाती हैं. भारत में पान की कई किस्में प्रचलित हैं जैसे बनारसी, मैगही, बंगला, कापूरी आदि. हर किस्म का स्वाद, सुगंध और आकार अलग होता है. पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर राज्यों में पान की खेती बड़े पैमाने पर होती है. आयुर्वेद में पान के पत्तों को कई गुणों वाला माना जाता है. ये पाचन सुधारने, मुंह की दुर्गंध दूर करने, एंटीसेप्टिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के लिए जाने जाते हैं. हालांकि तंबाकू या जर्दा के साथ पान खाने के नुकसान भी बताए जाते हैं. शुद्ध पान के पत्ते कई लोगों के लिए फायदेमंद माने जाते हैं.सोशल मीडिया पर इस वीडियो के वायरल होने के बाद लोग अपने अनुभव साझा कर रहे हैं. कुछ ने बताया कि उनके घर की पुरानी बेल पर कभी फूल आए थे. कुछ बागवानी प्रेमी अब जानबूझकर पौधे को लंबे समय तक रखना चाहते हैं ताकि फूल देख सकें.

     

     

  • आपने मेरे पति से अपनी बहन की मंगनी करा दी है… सुनते ही दुल्हन के भाई के उड़ गए होश..

    आपने मेरे पति से अपनी बहन की मंगनी करा दी है… सुनते ही दुल्हन के भाई के उड़ गए होश..

    सुनिए! आपने मेरे पति से अपनी बहन की मंगनी करा दी है... सुनते ही दुल्हन के भाई के उड़ गए होश

    शादी की तैयारियों में जुटे एक परिवार की खुशियां गम में बदल गई. यहां तक कि शादी के कार्ड तक छपवा दिए थे, लेकिन मंगनी के कुछ ही दिन बाद एक फोन कॉल ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया. फोन पर आई यह आवाज सुनते ही दुल्हन के भाई के पैरों तले जमीन खिसक गई. सामने वाली महिला ने कहा कि आपने मेरे पति से अपनी बहन की मंगनी करा दी है. यह सुनते ही पूरे परिवार के अरमान बिखर गए.

    कहां का है ये मामला? थाना बाबूगढ़ क्षेत्र के गांव आरिफपुर सरावनी निवासी मनव्वर अली ने बताया कि उसने अपनी बहन मुमताज का निकाह मुजफ्फरनगर जिले के गांव सूजडू निवासी साजिद से तय किया था. 2 फरवरी 2025 को मंगनी हुई, जिसमें साजिद के परिजन और करीब 15-20 लोग शामिल हुए. इस दौरान आठ लाख रुपये से अधिक का दहेज दिया गया. निकाह की तारीख 13 अप्रैल तय हुई और कार्ड भी छपवाकर बांट दिए गए.

    लेकिन इसी बीच मनव्वर के पास एक फोन आया. कॉल करने वाली महिला ने कहा कि सुनो! मैं साजिद की पत्नी तरन्नुम बोल रही हूं. आपने अपने बहन की मंगनी मेरे पति से कराई है. यह सुनकर मनव्वर के होश उड़ गए. तरन्नुम ने अपने निकाह के दस्तावेज और फोटो भी भेजकर साबित कर दिया कि साजिद पहले से शादीशुदा है. घटना की जानकारी समाज में फैलते ही मुमताज के परिवार को बदनामी झेलनी पड़ी. जब पीड़ित ने दहेज का सामान वापस मांगा तो आरोपितों ने लौटाने से साफ इनकार कर दिया और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी.

    पुलिस ने दर्ज की रिपोर्ट मनव्वर ने पहले थाना बाबूगढ़ में शिकायत दी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई. इसके बाद 8 सितंबर को एसपी से शिकायत की गई. एसपी ज्ञानंजय सिंह ने बताया कि पीड़ित की तहरीर पर नामजद और अज्ञात आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. पुलिस जांच कर रही है और आरोपितों की तलाश जारी है.

  • इलाज के बहाने बेहोशी का इंजेक्शन, महिला ने डॉक्टर पर लगाए गंभीर आरोप..

    इलाज के बहाने बेहोशी का इंजेक्शन, महिला ने डॉक्टर पर लगाए गंभीर आरोप..

    UP जिले के एक गांव में रहने वाली महिला की तबीयत कुछ दिनों से खराब चल रही थी। इलाज की उम्मीद में वह स्थानीय स्तर पर मरीजों को देखने वाले एक डॉक्टर के पास पहुंची। महिला का आरोप है कि डॉक्टर ने जांच के नाम पर उसे एक इंजेक्शन लगाया, जिसके बाद वह बेहोश हो गई।

    महिला के मुताबिक, जब उसे होश आया तो वह खुद को असहज स्थिति में पाकर घबरा गई। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और उसे शक हुआ कि बेहोशी की हालत में उसके साथ गलत काम किया गया है। उसने डॉक्टर से इस बारे में सवाल किया और विरोध जताया।

    महिला का आरोप है कि डॉक्टर ने अपनी गलती मानने के बजाय उसे धमकाना शुरू कर दिया। कथित तौर पर उसे कहा गया कि अगर उसने किसी को कुछ बताया, तो उसे और उसके पति को जान से मार दिया जाएगा। इस धमकी के बाद महिला काफी डर गई और उसने तुरंत पुलिस से संपर्क नहीं किया।

    कुछ समय तक वह इस घटना को लेकर चुप रही। बाद में उसने हिम्मत जुटाकर अपने पति को पूरी बात बताई। इसके बाद दोनों ने अधिकारियों से संपर्क करने का फैसला किया। करीब एक महीने बाद महिला ने क्षेत्राधिकारी के सामने शिकायत दर्ज कराते हुए मामले की जांच और कार्रवाई की मांग की।

    शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि महिला के आरोपों की जांच की जा रही है। शुरुआती जानकारी में महिला और आरोपी के बीच पहले से परिचय होने की बात भी सामने आई है, हालांकि इस संबंध में अभी कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकला है।

    पुलिस अधिकारियों के अनुसार, शिकायत में लगाए गए आरोपों की पुष्टि के लिए सभी पहलुओं की जांच की जाएगी। जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि घटना के समय वास्तव में क्या हुआ था और आरोपों में कितनी सच्चाई है।

    फिलहाल महिला ने निष्पक्ष जांच और न्याय की मांग की है। वहीं, इस घटना ने ग्रामीण इलाकों में बिना उचित योग्यता के इलाज करने वाले लोगों की भूमिका और मरीजों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

  • पेरिस का पहला भव्य हिंदू मंदिर तैयार, सितंबर में 13 दिन के महाउत्सव के साथ होगा उद्घाटन, जानें क्यों खास है यह धाम..

    पेरिस का पहला भव्य हिंदू मंदिर तैयार, सितंबर में 13 दिन के महाउत्सव के साथ होगा उद्घाटन, जानें क्यों खास है यह धाम..

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    पेरिस के बुसी-सेंट-जॉर्जेस में बीएपीएस (BAPS) स्वामीनारायण हिंदू मंदिर का भव्य उद्घाटन होने जा रहा है। यह मंदिर भारत-फ्रांस के बीच मजबूत होते सांस्कृतिक संबंधों का बड़ा प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सामुदायिक जुड़ाव और विभिन्न धर्म  के लोगों के बीच आपसी सौहार्द का प्रमुख केंद्र भी बनेगा। लगभग 5,000 वर्ग मीटर में फैला यह पूरा मंदिर परिसर इस सितंबर में आयोजित होने वाले 13 दिवसीय ऐतिहासिक ‘संस्कृति महोत्सव’ के साथ आधिकारिक तौर पर खुलने जा रहा है, जिसका उद्घाटन महंत स्वामी महाराज जी करेंगे। इस महोत्सव में फ्रांस और दुनिया भर से हजारों श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है।

    13 दिवसीय सांस्कृतिक उत्सव के साथ खुलेगा मंदिर

    मंदिर के भव्य उद्घाटन के उपलक्ष्य में 2 से 14 सितंबर तक 13 दिनों का भव्य सांस्कृतिक महोत्सव आयोजित किया जाएगा। महंत स्वामी महाराज के पावन कर-कमलों द्वारा 6 सितंबर को मंदिर का उद्घाटन और प्राण-प्रतिष्ठा समारोह संपन्न होगा। इस भव्य सांस्कृतिक महोत्सव में कई धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल होंगे जो इस प्रकार हैं:

    • पालकी यात्रा – 2 सितंबर
    • वैदिक महायज्ञ – 2 से 13 सितंबर
    • जल यात्रा – 3 सितंबर
    • नगर यात्रा – 5 सितंबर
    • मूर्ति प्रतिष्ठा – 6 सितंबर
    • समर्पण सभा – 6 सितंबर
    • महंत स्वामी महाराज जन्म जयंती – 13 सितंबर
    • हिंदू सांस्कृतिक उत्सव – 14 सितंबर

    मंदिर की खासियतें

    • यह भव्य मंदिर पारंपरिक भारतीय वास्तुकला और आधुनिक फ्रेंच इंजीनियरिंग का एक अनूठा उदाहरण है।
    • ऊपरी तल पर पारंपरिक मंदिर और निचले तल पर ‘मारू गुर्जर’ शैली में निर्मित भव्य सांस्कृतिक हवेली बनाई गई है।
    • परिसर में 5 भव्य शिखर, 10 विशाल गुंबद, बारीक नक्काशी वाले 20 स्तंभ, 120 नक्काशीदार खिड़कियां, 49 मूर्तिकला पैनल और 4 सुंदर छतरियां शामिल हैं।
    • मंदिर के निर्माण के लिए ग्रीस, इटली, वियतनाम और भारत से विशेष संगमरमर और ग्वालियर से बलुआ पत्थर मंगाए गए हैं।
    • भारत में कुशल कारीगरों ने इन पत्थरों को हाथों से तराशा और फिर इन्हें फ्रांस भेजकर मंदिर में स्थापित किया गया।

    महंत स्वामी महाराज4

    इस मंदिर को लेकर महंत स्वामी महाराज का प्रेरणादायक संदेश

    महंत स्वामी महाराज जी ने कहा कि इस मंदिर का निर्माण किसी एक समुदाय की पहचान स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि विभिन्न पहचान वाले लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए हुआ है। हमारे रास्ते भले ही अलग हों, लेकिन सम्मान और सहअस्तित्व की जमीन एक हो सकती है।