सुबह का वक्त था. सड़क पर रोज की तरह सफाई चल रही थी. एक महिला स्कूटी से जा रही थी. तभी एक कार उसके पास रुकी. कुछ लोग उतरे और महिला को जबरन कार में खींचने लगे. महिला चीखी… चीख सुनकर सड़क साफ कर रही तीन महिलाएं झाड़ू लेकर दौड़ीं और आरोपियों से भिड़ गईं. देहरादून की इस घटना की पूरी कहानी अब सामने आई है.
देहरादून में सुबह-सुबह एक महिला अपनी बेटी को कॉलेज बस तक छोड़कर स्कूटर से घर लौट रही थी. रास्ते में एक काले रंग की कार उसके पास आकर रुकी. इसके बाद कार सवार कुछ युवकों ने महिला को पकड़कर गाड़ी के अंदर खींचने की कोशिश की. महिला ने शोर मचा दिया. आवाज सुनी तो आसपास के लोग दौड़ पड़े. और इसी बीच सड़क पर सफाई कर रहीं तीन महिला सफाईकर्मी भी वहां पहुंच गईं. उनके हाथ में झाड़ू थी. उन्होंने आव देखा न ताव, झाड़ू उठाई और आरोपियों को पीटना शुरू कर दिया.
अचानक हुए इस विरोध से आरोपी घबरा गए और मौके से भाग निकले. पुलिस अब CCTV फुटेज के जरिए आरोपियों की पहचान करने में जुटी है. मामला देहरादून के सहस्त्रधारा रोड स्थित नालापानी चौक का है. पुलिस के मुताबिक, 45 साल की महिला अपनी बेटी को कॉलेज की बस तक छोड़ने गई थी. बेटी को बस में बैठाने के बाद वह स्कूटी से अपने घर की तरफ लौट रही थी. महिला नालापानी चौक के पास पहुंची ही थी कि एक काले रंग की कार स्कूटी के पास आकर रुकी. आरोप है कि कार में मौजूद युवकों ने महिला को पकड़ लिया और जबरन कार के अंदर खींचने की कोशिश करने लगे.
महिला ने खुद को बचाने के लिए शोर मचाना शुरू कर दिया. महिला की आवाज सुनकर आसपास मौजूद लोग घटनास्थल की तरफ भागे. इसी दौरान वहां सड़क की सफाई कर रहीं तीन महिला सफाईकर्मियों ने भी शोर सुना. वे भी झाड़ू लेकर मौके पर पहुंच गईं. पुलिस के मुताबिक, महिला सफाईकर्मियों ने आरोपियों का विरोध किया और झाड़ू से उनकी पिटाई शुरू कर दी. आसपास के लोगों के पहुंचने और सफाईकर्मियों के इस अचानक विरोध के बाद आरोपियों के हौसले पस्त हो गए.
वे महिला को छोड़कर मौके से भाग निकले. जिस महिला को कुछ लोग जबरन कार में बैठाने की कोशिश कर रहे थे, उसी महिला की मदद के लिए कुछ ही देर में आसपास के लोग और तीन महिला सफाईकर्मी पहुंची थीं. इन सफाईकर्मियों के हाथ में उस वक्त कोई हथियार नहीं था. सिर्फ वही झाड़ू थी, जिससे वे सड़क साफ कर रही थीं.
कितने लोग थे, अभी साफ नहीं
पुलिस के मुताबिक, घटना में तीन से चार युवकों के शामिल होने की बात सामने आई है. हालांकि अभी किसी आरोपी की पहचान नहीं हो सकी है. पीड़ित महिला की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज कर लिया है. अब आसपास लगे CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है. पुलिस कार और उसमें मौजूद लोगों की पहचान करने की कोशिश कर रही है.
फिलहाल पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि आरोपियों ने महिला को कार में खींचने की कोशिश क्यों की थी और उनका मकसद क्या था. पुलिस ने बताया कि घटना बुधवार सुबह हुई. शिकायत मिलने के बाद मामले की जांच शुरू कर दी गई है. CCTV फुटेज के जरिए आरोपियों की पहचान की जा रही है और उनकी तलाश की जा रही है.
अधिकांश लोग हाई ब्लड प्रेशर के डर से नमक कम खाने की सलाह देते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शरीर में नमक (सोडियम) का स्तर जरूरत से ज्यादा गिरना भी बेहद खतरनाक और जानलेवा साबित हो सकता है? डॉक्टरों के मुताबिक मेडिकल भाषा में इसे हाइपोनेट्रेमिया (Hyponatremia) कहा जाता है। जब खून में सोडियम का स्तर कम होता है, तो यह दिमाग और शरीर की कोशिकाओं में सूजन पैदा कर सकता है, जिससे शरीर के अंग प्रभावित होने लगते हैं। अगर समय रहते इसके संकेतों को न पहचाना जाए, तो स्थिति गंभीर रूप ले सकती है
आकाश हेल्थकेयर के सीनियर कंसल्टेंट-इंटरनल मेडिसिन डॉ. प्रभात रंजन सिन्हा ने बताया नमक सोडियम का एक प्रमुख स्रोत है। यह सिर्फ खाने का स्वाद बढ़ाने वाला पदार्थ नहीं है, बल्कि शरीर में तरल पदार्थों का संतुलन बनाए रखने, नसों के सही तरीके से काम करने और मांसपेशियों की गतिविधियों के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हमें अक्सर सोडियम का सेवन कम करने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह शरीर के लिए जरूरी खनिज है, जिसे हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता। शरीर में सोडियम का स्तर संतुलित रखने और अतिरिक्त सोडियम को किडनी के जरिए बाहर निकालने की प्राकृतिक व्यवस्था होती है।
खासकर गर्म मौसम में, ज्यादा पसीना आने, एक्सरसाइज करने या शरीर से अधिक मात्रा में तरल पदार्थ निकलने पर शरीर को सिर्फ पानी ही नहीं, बल्कि सोडियम जैसे जरूरी इलेक्ट्रोलाइट्स की भी जरूरत पड़ सकती है। डॉ. सिन्हा के अनुसार, सोडियम शरीर में ब्लड वॉल्यूम बनाए रखने, ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने, नसों के जरिए संकेतों के संचार और मांसपेशियों के सिकुड़ने के लिए जरूरी है।
डॉ. सिन्हा बताते हैं कि लंबे समय तक सोडियम का सेवन बहुत कम रहने पर अचानक मीठा खाने की इच्छा, ब्लड प्रेशर कम होना और शरीर के तरल पदार्थों को कंट्रोल करने में किडनी की क्षमता प्रभावित होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। समय के साथ इससे शरीर के हार्मोनल सिस्टम पर दबाव पड़ सकता है। इनमें रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन सिस्टम भी शामिल है, जो शरीर में सोडियम को बचाकर रखने में मदद करता है।
बॉडी में सॉल्ट की कमी के लक्षण?
डॉ. सिन्हा के मुताबिक, नमक की मात्रा अचानक और बहुत ज्यादा कम करने पर शरीर में कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं। सोडियम नसों तक संकेत पहुंचाने और मांसपेशियों के संकुचन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सोडियम का स्तर तेजी से कम होने पर ब्लड प्रेशर गिर सकता है, जिससे मस्तिष्क तक ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित हो सकता है और बॉडी में कुछ समस्याएं भी हो सकती हैं जैसे चक्कर आना, सिर हल्का लगना और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
वयस्कों के लिए रोजाना कितना नमक लेना है जरूरी
इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट-इंटरनल मेडिसिन डॉ. राकेश गुप्ता के अनुसार, वयस्कों के लिए रोजाना सोडियम की आदर्श मात्रा लगभग 1,500 से 2,300 मिलीग्राम के बीच हो सकती है। इसकी ज्यादातर मात्रा नमक से मिलती है। हालांकि, प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड के अधिक सेवन के कारण लोग अक्सर जरूरत से ज्यादा सोडियम ले लेते हैं, जिससे हाई ब्लड प्रेशर, हृदय रोग और स्ट्रोक जैसी हेल्थ प्रोब्लम का जोखिम बढ़ सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) रोजाना 2,000 मिलीग्राम नमक का सेवन करने की सलाह देता है, जबकि अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन बेहतर हार्ट हेल्थ के लिए 1,500 मिलीग्राम तक सोडियम लेने की सलाह देता है। डॉ. गुप्ता के अनुसार, गंभीर मामलों में लंबे समय तक सोडियम की कमी से हाइपोनेट्रेमिया हो सकता है। यह ऐसी स्थिति है जिसमें खून में सोडियम का स्तर खतरनाक रूप से कम हो जाता है। इससे मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है और भ्रम, कमजोरी, शारीरिक क्षमता में कमी और व्यायाम या शारीरिक गतिविधि के दौरान प्रदर्शन प्रभावित होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
बॉडी में नमक का स्तर कम होने पर क्या करना चाहिए?
डॉ. सिन्हा ने बताया नमक के सेवन पर कंट्रोल रखना बेहद जरूरी है। लोगों को प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड से मिलने वाले अतिरिक्त सोडियम पर कंट्रोल करना चाहिए, इन फूड्स से बॉडी में जरुरत से ज्यादा सोडियम पहुंचता है। डॉक्टर ने बताया घर के बने नॉर्मल खाने से मिलने वाले नेचुरल सोडियम को पूरी तरह खत्म करने की जरूरत नहीं है। डॉ. सिन्हा ने बताया शरीर को सोडियम की जरूरत मौसम, शारीरिक गतिविधि और व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। लगातार थकान, चक्कर आना या मांसपेशियों में ऐंठन जैसे संकेतों पर ध्यान देना जरूरी है। जिन लोगों को ब्लड प्रेशर या किडनी से जुड़ी समस्या है, उन्हें नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही नमक का सेवन कितनी मात्रा में करना है ये तय करना चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों की राय के आधार पर तैयार किया गया है। सोडियम या नमक का सेवन व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और जरूरत के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। हाई ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय संबंधी समस्या होने पर नमक की मात्रा में बदलाव करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
भागदौड़ भरी जिंदगी, लगातार काम का दबाव और अनियंत्रित दिनचर्या के कारण मानसिक तनाव व मानसिक थकान होना बेहद आम बात हो गई है। जब दिमाग को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन और रक्त संचार (Blood Circulation) नहीं मिलता, तो एकाग्रता में कमी और चिड़चिड़ापन बढ़ने लगता है। योग विशेषज्ञों के अनुसार कुछ विशेष योगासनों का नियमित अभ्यास मस्तिष्क में ऑक्सीजन के प्रवाह को बेहतर बनाने और नर्वस सिस्टम को शांत करने में बहुत मददगार साबित हो सकता है।
योग गुरु बाबा रामदेव ने बताया अगर आप हर दिन सुबह उठकर कुछ योगासन कर लें तो आप अपने दिमाग को रिलैक्स और तनाव मुक्त कर सकते हैं। कुछ योगासन ब्रेन की बेहतरीन एक्सरसाइज हैं। अगर आप भी दिनभर की मानसिक थकावट से राहत पाना चाहते हैं, तो योग गुरु से जानिए वे 4 प्रमुख योगासन जो आपके दिमाग को शांत रखकर उसमें नई ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।
भस्त्रिका प्राणायाम करें
योग गुरु बाबा रामदेव ने बताया भस्त्रिका में तेज और गहरी सांस लेने-छोड़ने की प्रक्रिया होती है। इसमें सांस पर लगातार ध्यान देना पड़ता है, इसलिए मन को इधर-उधर भटकने से रोकने में मदद मिल सकती है। नियमित और सही तरीके से रोज अभ्यास करने पर इंसान ज्यादा एनर्जेटिक और एक्टिव महसूस करता है। इसे करने के लिए तेज सांस लेने और छोड़ने की तकनीक का इस्तेमाल होता है जिससे कुछ लोगों में उत्तेजना या चक्कर जैसी परेशानी हो सकती है। इसलिए शुरुआत में ये प्राणायाम कम ही करें और गति धीरे-धीरे ही बढ़ाएं।
कपालभाति करें
कपालभाति में पेट की मांसपेशियों की मदद से सांस को जोर से बाहर छोड़ा जाता है, जबकि सांस अंदर सामान्य रूप से आती है। इस दौरान व्यक्ति को सांस की गति और शरीर की गतिविधि पर ध्यान देना होता है, जिससे एकाग्रता बढ़ाने और मन को शांत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, कपालभाति भी तेज श्वसन वाला अभ्यास है, इसलिए इसे बहुत तेज या लंबे समय तक करने से बचना चाहिए। तेज तेज करने से चक्कर या असहजता महसूस हो सकती है। इस योगासन को आराम से और सही तकनीक के साथ करना चाहिए।
अनुलोम-विलोम प्राणायाम करें
अनुलोम-विलोम एक ऐसा प्राणायाम है जिसमें बारी-बारी से एक-एक नाक से सांस लेना और दूसरी से छोड़ना शामिल होता है। इसे करने के लिए रीढ़ सीधी रखी जाती है और कंधे रिलैक्स रखे जाते हैं। इसे करने के लिए एक नासिका से सांस लेकर दूसरी से सांस छोड़ी जाती है और फिर प्रक्रिया को उल्टा किया जाता है। इसकी धीमी और नियंत्रित गति व्यक्ति का ध्यान सांस पर केंद्रित करती है। धीमी सांस लेने से शरीर के रिलैक्सेशन रिस्पॉन्स को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे तनाव के समय दिल की धड़कन और सांस की गति को सामान्य करने में मदद मिल सकती है। यही वजह है कि इसे तनाव और मानसिक बेचैनी के समय किया जाने वाला सरल श्वसन अभ्यास माना जाता है।
चंद्रभेदन प्राणायाम करें
चंद्रभेदन प्राणायाम है भी एक ऐसा प्राणायाम है जिसमें आमतौर पर सांस बाईं नासिका से लेकर दाईं नासिका से सांस छोड़ी जाती है। योग परंपरा में बाईं नासिका को शांत और शीतल प्रभाव से जोड़ा जाता है। इस अभ्यास में सांस धीमी और कंट्रोल रहती है, जिससे व्यक्ति अपना ध्यान सांसों पर लगाता है और कुछ समय के लिए तनाव पैदा करने वाले विचारों से दूरी बना सकता है। योग गुरु ने बताया आप रोजाना इसे करें तो दिमाग रिलैक्स और मन शांत महसूस करेगा।
ये प्राणायाम मन को शांत करने में कैसे मदद कर सकता हैं?
इन सभी अभ्यासों में दिमाग को रिलैक्स और मन को शांत करने के लिए सांस से जुड़ी एक्सरसाइज करने पर ज़ोर दिया गया है। जब व्यक्ति तनाव में होता है, तो सांस तेज और उथली हो सकती है। इसके विपरीत, धीमी और नियंत्रित सांस लेने से शरीर को आराम की स्थिति में जाने में मदद मिलती है।
डिस्कलेमर : यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और योग जागरूकता के उद्देश्य से साझा की गई है। अगर आपको गर्दन, रीढ़ की हड्डी, उच्च ब्लड प्रेशर या कोई दूसरी हेल्थ प्रॉब्लम है तो इन योगासनों का अभ्यास करने से पहले किसी प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ या डॉक्टर की सलाह लें।
क्या आप भी कब्ज से परेशान रहते हैं और पेट साफ करने के लिए और कब्ज (Constipation) से तुरंत राहत पाने के लिए हर सुबह लैक्सेटिव या गोलियों का सहारा लेते हैं? गैस्ट्रोएंट्रोलोजिस्ट के मुताबिक लंबे समय तक इन दवाइयों पर निर्भर रहना आपकी आंतों की कार्यप्रणाली को कमजोर बना सकता है। पाचन तंत्र को स्वस्थ और पेट को नेचुरल तरीके से साफ करने के लिए दवाइयों से ज्यादा आपकी डाइट और लाइफस्टाइल मायने रखता है। डाइट, पर्याप्त पानी और नियमित योग जैसे छोटे लेकिन प्रभावी बदलाव न केवल कब्ज की समस्या को जड़ से दूर कर सकते हैं, बल्कि आपकी आंतों की सेहत (Gut Health) को भी मजबूत बनाते हैं।
भारतीय योग गुरु, लेखक, शोधकर्ता और टीवी पर्सनालिटी डॉक्टर हंसा योगेंद्र के मुताबिक कब्ज आजकल एक आम समस्या बन गई है। कई लोग सुबह पेट साफ न होने पर तुरंत हर्बल चाय, अरंडी का तेल या दूसरी लैक्सेटिव दवाओं का सहारा लेने लगते हैं जिसके सेहत पर साइड इफेक्ट होते हैं। एक्सपर्ट ने बताया कब्ज से राहत पाने के लिए सबसे पहले रोज की दिनचर्या, खानपान, पानी और शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान देना जरूरी है। कुछ लोगों में नियमित रूप से फाइबर युक्त भोजन, पर्याप्त पानी और हल्की एक्सरसाइज करने से मल त्याग को नियमित रखने में मदद मिल सकती है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि ऐसी कौन-कौन सी 5 आदतें है जो कब्ज का इलाज कर सकती है और पाचन को दुरुस्त कर सकती हैं।
सुबह की शुरुआत करें पानी से
हंसा जी योगेंद्र ने बताया अगर आप कब्ज से परेशान रहते हैं तो आप सुबह उठते ही एक गिलास गुनगुना पानी पिएं। रात भर सोने के बाद सुबह पानी का सेवन बॉडी को हाइड्रेट करता है और पाचन को दुरुस्त करता है। पानी पीने के बाद आप हल्की पेट की एक्सरसाइज या मूवमेंट कर सकते हैं। सुबह शौचालय जाने के लिए नियमित समय तय करना भी कब्ज से राहत दिलाने में मददगार हो सकता है। अगर तुरंत मल त्याग न हो तो ज्यादा जोर न लगाएं। शरीर को धीरे-धीरे नियमित रूटीन की आदत डालने की कोशिश करें।
खाने में फाइबर की मात्रा बढ़ाएं
कब्ज से बचाव के लिए डाइट में पर्याप्त फाइबर लेना बेहद जरूरी है। रोज करीब 25-30 ग्राम फाइबर का सेवन करें। हालांकि फाइबर का सेवन व्यक्ति की उम्र, लिंग और स्वास्थ्य के अनुसार अलग हो सकता है। फाइबर के लिए आप खाने में सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और फलों का सेवन करें। नाश्ते में वेजिटेबल ओट्स या दलिया, वेजिटेबल पोहा, इडली-सांभर या सब्जियों से बना बेसन या मूंग दाल के चीला का सेवन करें। मूंग, मसूर, चना, राजमा और हरी मटर जैसी दालें और फलियां भी फाइबर के स्रोत हैं। इसके अलावा गेहूं की रोटी, ब्राउन राइस और मिलेट्स को डाइट में शामिल करें कब्ज से बचाव में मददगार साबित होंगे।
कब्ज से परेशान हैं तो रोज एक फल खाएं
अगर आप कब्ज से परेशान हैं तो रोजाना एक फल का सेवन करें। फलों में आप पपीता, अमरूद, नाशपाती, अंजीर, कीवी और प्रून जैसे फलों का सेवन कर सकते हैं। साथ ही थोड़ी मात्रा में नट्स, बीज और सूखे मेवे भी डाइट में शामिल करें।
मुनक्का और अंजीर का करें सेवन
अगर आप कब्ज से परेशान रहते हैं तो रोज मुनक्का और अंजीर का सेवन सुबह खाली पेट करें। रात भर भिगोए हुए 8-10 काली किशमिश या मुनक्का सुबह खाएं। दो सूखे अंजीर सुबह खाने से फायदा होता है। ध्यान रखें कि फाइबर बढ़ाने के साथ पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थों का भी सेवन करें। फाइबर अचानक बहुत ज्यादा बढ़ाने से कुछ लोगों में गैस और ब्लोटिंग की समस्या हो सकती है, इसलिए इसे धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर है।
त्रिफला और इसबगोल का करें सेवन
कब्ज से राहत पाना चाहते हैं तो आप त्रिफला और इसबगोल का सेवन करें। त्रिफला हरड़, बहेड़ा और आंवला से तैयार किया जाता है और आयुर्वेद में इसे पाचन तथा मल त्याग को सपोर्ट करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। कुछ दिनों तक त्रिफला या इसबगोल खाने से आपको कब्ज से राहत मिल सकती है। इसबगोल एक घुलनशील फाइबर है। यह पानी को सोखकर मल को नरम और भारी बनाने में मदद कर सकता है। इसका सेवन पर्याप्त पानी के साथ करना जरूरी है।
अरंडी के तेल का करें सेवन
कब्ज को दूर करने के लिए आप अरंडी के तेल का सेवन करें। अरंडी का तेल यानी Castor oil दूसरे उपायों से अलग है। यह एक stimulant laxative है और मल त्याग करा सकता है, लेकिन इससे पेट में ऐंठन, मितली या दस्त जैसी परेशानी हो सकती है इसलिए रोजाना इसका सेवन नहीं करें।
कब्ज में मदद कर सकते हैं ये योगासन
पाचन और पेट की गतिविधियों को सपोर्ट करने के लिए कुछ हल्के योग अभ्यास भी आपकी मदद कर सकते हैं। योगा एक्सपर्ट ने बताया आप कब्ज को दूर करने के लिए रोजाना मार्जरी आसन-बितिलासन (Cat-Cow Pose), पवनमुक्तासन, हल्का स्पाइनल ट्विस्ट, पेट से गहरी सांस लेने का अभ्यास, शवासन और निस्पंद भाव करने से आपको राहत मिल सकती है। इन अभ्यासों को अपनी क्षमता के अनुसार आराम से करना चाहिए और किसी भी आसन में दर्द या असहजता होने पर उसे रोक देना चाहिए। भोजन के बाद हल्की वॉक करना भी रोज की शारीरिक गतिविधि बढ़ाने का आसान तरीका हो सकता है।
बार-बार कब्ज हो तो वजह समझना जरूरी
अगर अच्छी डाइट, पर्याप्त पानी और नियमित शारीरिक गतिविधि के बावजूद कब्ज बार-बार हो रही है तो केवल घरेलू नुस्खे बदलते रहने के बजाय आप कब्ज के कारण का पता लगाएं। कुछ दवाएं, शरीर में पानी की कमी, कम शारीरिक गतिविधि और दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं भी कब्ज में योगदान दे सकती हैं। तनाव और चिंता भी कुछ लोगों में पाचन संबंधी समस्याओं को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए पर्याप्त आराम, नियमित नींद, हल्की एक्सरसाइज और तनाव कम करने वाली गतिविधियों को अपनी डेली लाइफ में शामिल करें आपको फायदा होगा।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। कब्ज लंबे समय तक रहने, बार-बार होने या गंभीर लक्षणों के साथ होने पर डॉक्टर से सलाह लें। किसी भी आयुर्वेदिक उपाय, सप्लीमेंट या लैक्सेटिव का नियमित इस्तेमाल विशेषज्ञ की सलाह के बिना न करें।
लिवर हमारे शरीर का एक ऐसा महत्वपूर्ण अंग है, जो शुरुआती समस्याओं या बीमारी के दौरान अक्सर कोई स्पष्ट संकेत नहीं देता। यही वजह है कि इसके खराब होने या फैटी लिवर जैसी स्थितियों का पता आसानी से और जल्दी नहीं चलता। हालांकि, शरीर छोटे-छोटे संकेतों के ज़रिए सजग करने की कोशिश करता है जिनमें से एक प्रमुख संकेत पेशाब (Urinary System) के रंग, मल या पेट के पाचन में बदलाव से जुड़ा होता है।
AIIMS, हार्वर्ड और स्टैनफोर्ड से प्रशिक्षित,बोर्ड-सर्टिफाइड गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट एवं हेपेटोलॉजिस्ट,डॉ. सौरभ सेठी ने बताया अगर आपके पेशाब का रंग गहरा पीला, लाल या असामान्य दिखता है, तो इसे सामान्य डिहाइड्रेशन मानकर नज़रअंदाज़ करना जोखिम भरा हो सकता है। लिवर की बीमारी के गंभीर लक्षणों का इंतजार करने के बजाय अपने जोखिम कारकों को समझना और जरूरत पड़ने पर समय पर जांच कराना ज्यादा जरूरी है। आइए एक्सपर्ट्स से समझते हैं लिवर से जुड़े 7 शुरुआती लक्षण कौन-कौन से हैं और पेशाब का बदला रंग आपके लिवर की सेहत के बारे में क्या संकेत देता है।
पेशाब का रंग गहरा होना नजरअंदाज न करें
डॉक्टर सौरव ने बताया लिवर में परेशानी होने पर यूरिन और मल के रंग में बदलाव हो सकता है। हालांकि पेशाब का गहरा रंग कई बार शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन की वजह से हो सकता है। इसी तरह कभी-कभार मल का थोड़ा हल्का या तैरता हुआ होना हमेशा चिंता का कारण नहीं होता। लेकिन अगर पर्याप्त पानी पीने के बावजूद पेशाब लगातार बहुत गहरा रहे और मल बार-बार सफेद, ग्रे या मिट्टी जैसे रंग का दिखाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पित्त मल को उसका सामान्य भूरा रंग देने में भूमिका निभाता है। अगर पित्त आंतों तक सामान्य तरीके से नहीं पहुंच पाता, तो मल का रंग फीका हो सकता है। वहीं बिलीरुबिन बढ़ने पर यह पेशाब में पहुंचकर उसे चाय या कोला जैसे गहरे रंग का बना सकता है। ऐसा लिवर में सूजन या बाइल डक्ट में रुकावट जैसी स्थितियों में हो सकता है। अगर इसके साथ खुजली या आंखों में पीलापन भी दिखाई दे, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।
बिना किसी दाने के लगातार खुजली होना
शरीर में खुजली होने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन लिवर में परेशानी होने पर भी बॉडी में खुजली की दिक्कत हो सकती है। लिवर और बाइल डक्ट यानी पित्त नली से जुड़ी बीमारियों में पित्त के सामान्य प्रवाह में रुकावट आ सकती है, जिससे स्किन पर किसी भी तरह का दाना दिखे बिना ही तेज खुजली हो सकती है। इसे कोलेस्टेटिक प्रुरिटस (Cholestatic Pruritus) कहा जाता है। यह खुजली शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है, लेकिन हथेलियों और तलवों में ज्यादा परेशानी हो सकती है। कई लोगों में यह रात के समय अधिक महसूस हो सकती है। अगर खुजली लगातार बनी हुई है और इसका कोई स्पष्ट कारण समझ नहीं आ रहा है, खासकर अगर इसके साथ दूसरे लक्षण भी मौजूद हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
स्किन पर मकड़ी जैसी छोटी लाल नसें दिखाई देना
स्किन पर मकड़ी के आकार जैसी छोटी-छोटी लाल रक्त वाहिकाओं को स्पाइडर एंजियोमा (Spider Angioma) कहा जाता है। इसमें बीच में एक लाल बिंदु होता है और वहां से छोटी रक्त वाहिकाएं बाहर की तरफ फैलती हुई दिखाई देती हैं। एक-दो स्पाइडर एंजियोमा हेल्दी लोगों में भी हो सकते हैं, इसलिए इन्हें देखकर घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर ऐसी कई नई रक्त वाहिकाएं दिखाई देने लगें, खासकर चेहरे, कंधों और छाती के ऊपरी हिस्से पर, तो उसे नजरअंदाज नहीं करें। कुछ मामलों में इनका संबंध क्रॉनिक लिवर डिजीज या सिरोसिस से हो सकता है।
हथेलियों का लाल होना आम नहीं
हथेलियों का जरूरत से ज्यादा लाल दिखाई देना पाल्मर एरिथेमा (Palmar Erythema) कहलाता है। इसमें खासतौर पर अंगूठे और छोटी उंगली के आधार के आसपास हथेलियों में रेडनेस दिखाई दे सकती है। हालांकि ये सिर्फ लिवर की बीमारी का संकेत नहीं है। गर्भावस्था, थायरॉयड से जुड़ी समस्या और रूमेटाइड आर्थराइटिस जैसी दूसरी स्थितियों में भी हथेलियां लाल हो सकती हैं। इसलिए केवल लाल हथेलियों के आधार पर लिवर की बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। लेकिन अगर इसके साथ स्पाइडर एंजियोमा और लिवर टेस्ट में असामान्यता जैसे दूसरे संकेत भी हों, तो डॉक्टर इसकी वजह की जांच कर सकते हैं।
अचानक आसानी से चोट लगना या खून निकलना
अगर पहले की तुलना में शरीर पर आसानी से नीले निशान पड़ने लगे हैं या बिना स्पष्ट कारण के खून निकलने जैसी समस्या होने लगी है, तो इसे गंभीरता से लेना जरूरी है। लिवर शरीर में सामान्य ब्लड क्लॉटिंग यानी खून जमने की प्रक्रिया में शामिल कई महत्वपूर्ण प्रोटीन बनाता है। गंभीर या एडवांस्ड लिवर डिजीज में इस प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है।
पेट में लगातार सूजन या पानी भरना
पेट का लगातार बढ़ना, खासकर जब इसके साथ पैरों और टखनों में सूजन भी हो, लिवर की गंभीर बीमारी में देखा जा सकता है। एडवांस सिरोसिस में पेट के अंदर तरल पदार्थ जमा हो सकता है। इसे असाइटिस (Ascites) कहा जाता है। इसके कारण पेट का आकार धीरे-धीरे बढ़ सकता है। सिरोसिस के शुरुआती चरण में लिवर अपनी जरूरी प्रक्रियाएं काफी हद तक संभाल सकता है, लेकिन जब पेट में असाइटिस जैसी जटिलताएं विकसित होने लगती हैं, तो यह बीमारी के गंभीर होने का संकेत हो सकता है। अगर पेट लगातार बढ़ रहा है और साथ में पैरों में सूजन, सांस लेने में परेशानी, पेट दर्द या बुखार भी है, तो तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए।
आंखों का पीला होना या अचानक भ्रम की स्थिति
आंखों के सफेद हिस्से का पीला पड़ना पीलिया (Jaundice) कहलाता है। शरीर में बिलीरुबिन जमा होने के कारण ऐसा हो सकता है। पीलिया का मतलब हमेशा एंड-स्टेज सिरोसिस नहीं होता। एक्यूट हेपेटाइटिस, कुछ दवाओं से होने वाली लिवर इंजरी और बाइल डक्ट में रुकावट जैसी कई अन्य स्थितियां भी पीलिया का कारण बन सकती हैं। फिर भी अगर आंखें या स्किन अचानक पीली पड़ने लगे, तो इसकी वजह जानने के लिए जल्द डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। अगर लिवर की बीमारी से जूझ रहा व्यक्ति अचानक कंफ्यूज होने लगे, बहुत ज्यादा नींद आने लगे, चीजें भूलने लगे या उसके व्यवहार में असामान्य बदलाव दिखाई दे, तो यह हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी जैसी गंभीर जटिलता का संकेत हो सकता है।
डिस्क्लेमर: ये जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के लिए है। इनमें से किसी एक लक्षण का होना लिवर की बीमारी की पुष्टि नहीं करता। लक्षणों के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। लगातार या गंभीर लक्षण होने पर डॉक्टर से जांच और उचित सलाह लें।
गलत खान-पान, अनियमित खानेका समय, ज्यादा तला-भुना भोजन और खराब लाइफस्टाइल के कारण गैस, अपच और पेट फूलने जैसी समस्याएं आम हो गई हैं। ऐसे में कुछ लोग घरेलू उपायों का सहारा लेते हैं। अजवाइन का पानी भी ऐसा ही एक पारंपरिक घरेलू नुस्खा है, जिसका इस्तेमाल लंबे समय से पाचन संबंधी परेशानियों में किया जाता रहा है। योग और वेलनेस एक्सपर्ट हंसाजी योगेंद्र के अनुसार, अजवाइन में थाइमोल (Thymol) जैसे यौगिक पाए जाते हैं, जो पाचन तंत्र पर असर डाल सकते हैं, पेट की ऐंठन या असहजता में मदद कर सकते हैं।
हंसाजी योगेंद्र ने बताया ये पानी पेट की गैस और ब्लोटिंग को कंट्रोल करता है। अजवाइन में मौजूद कुछ सक्रिय यौगिक पाचन प्रक्रिया को सपोर्ट कर सकते हैं, जिससे कुछ लोगों को गैस और ब्लोटिंग में राहत महसूस हो सकती है। अजवाइन में पाया जाने वाला थाइमोल इसके प्रमुख सक्रिय यौगिकों में से एक है जो पाचन को सपोर्ट करता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि अजवाइन का पानी कैसे पाचन को दुरुस्त करता है।
अजवाइन का पानी कैसे गैस, ब्लोटिंग और भारीपन में देता है राहत
अजवाइन में मौजूद कुछ यौगिक पाचन प्रक्रिया को सपोर्ट कर सकते हैं। इसका पानी गैस और पेट फूलने जैसी पाचन से जुड़ी दिक्कतों में राहत दे सकता है। खासकर भारी खाना खाने के बाद अजवाइन का सेवन पेट के भारीपन को कम करने में मददगार माना जाता है। अजवाइन का इस्तेमाल पेट में होने वाली हल्की ऐंठन और मरोड़ के लिए भी घरेलू उपाय के तौर पर किया जाता है। इसमें मौजूद कुछ यौगिक पाचन तंत्र की मांसपेशियों को रिलैक्स करने में मदद कर सकते हैं। अजवाइन में मौजूद थाइमोल जैसे यौगिकों में एंटीमाइक्रोबियल गुण पाए गए हैं। कई रिसर्च में ये बात साबित हो चुकी है कि ये पानी पेट में मौजूद हानिकारक सूक्ष्मजीवों के खिलाफ प्रभावी असर दिखाता है।
अजवाइन के पानी पर क्या कहती है रिसर्च
अजवाइन में थाइमोल और गैस्ट्रिक एंजाइम का स्राव होता है। फार्माकोलॉजिकल स्टडीज जैसे Journal of Ethnopharmacology और Evidence Based Complementary and Alternative Medicine के अनुसार थाइमोल पेट में Gastric Acid, पित्त और पाचन एंजाइमों जैसे एमाइलेज और लाइपेज के स्राव को उत्तेजित करता है। जब एंजाइम सही मात्रा में बनते हैं, तो खाना तेजी से और ठीक से पचता है, जिससे भोजन सड़ता नहीं है और गैस या पेट फूलने की समस्या नहीं बनती।
अजवाइन में एंटीस्पास्मोडिक और कार्मिनेटिव गुण मौजूद होते हैं जो गैस बाहर निकालने वाले माने जाते हैं। लैब अध्ययनों और इन-विवो (In-vivo) स्टडीज से पता चला है कि थाइमोल आंतों की चिकनी मांसपेशियों पर कैल्शियम चैनल ब्लॉक करने का काम करता है। इससे पेट और आंतों की मांसपेशियों में आने वाली ऐंठन, मरोड़ और ब्लोटिंग दूर होती है। इसका सेवन करने से पेट में फंसी हुई गैस आसानी से बाहर निकल जाती है और पेट का भारीपन व ऐंठन मिनटों में कम हो जाती है।
अजवाइन के वाष्पशील तेलों में थाइमोल और गामा-टेरपीनेने (γ-terpinene) जैसे एंटीमाइक्रोबियल यौगिक होते हैं। Journal of Food Science और कई माइक्रोबायोलॉजिकल अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि अजवाइन का अर्क पेट और आंतों में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया जैसे E. coli, Salmonella और Helicobacter pylori के विकास को रोकता है। जब पेट में खराब बैक्टीरिया पनपते हैं, तो वे भोजन को फॉर्मेट करके अत्यधिक गैस पैदा करते हैं। अजवाइन का पानी इन हानिकारक सूक्ष्मजीवों को कंट्रोल कर गैस बनने से रोकता है। कई रिसर्च में पाया गया है कि अजवाइन पेट खाली होने की दर (Gastric Emptying Time) में सुधार करती है। यानी जब आप बहुत भारी या तला-भुना खाना खाते हैं, तो अजवाइन का पानी पेट में भोजन को रुकने नहीं देता और इसे आंतों की ओर तेजी से बढ़ाता है, जिससे भारीपन की शिकायत नहीं होती।
अजवाइन का पानी बनाने के दो आसान तरीके
अजवाइन का पानी बनाने के लिए एक तरीका है कि एक चम्मच अजवाइन को एक गिलास पानी में रातभर भिगोकर सुबह छानकर पिया जाए। दूसरे तरीके में एक चम्मच अजवाइन को दो कप पानी में करीब 5 मिनट तक उबालकर, ठंडा होने दें और उसके बाद छानकर उसका सेवन कर लें। स्वाद के लिए इसमें थोड़ी मात्रा में काला नमक या नींबू भी मिला सकते हैं।
डिस्क्लेमर: अजवाइन का पानी गैस, अपच या एसिडिटी का इलाज नहीं है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लगातार बने रहने पर डॉक्टर से सलाह लें।
डायबिटीज से पीड़ित मरीजों के लिए खानपान का सही चुनाव करना हमेशा एक बड़ी चुनौती होता है, खासकर जब बात फलों के सेवन की आए। मीठे स्वाद और प्राकृतिक शुगर के कारण अक्सर मरीज दुविधा में रहते हैं कि अंगूर खाएं या सेब। जहां सेब में भरपूर फाइबर और लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जो शुगर स्पाइक को रोकने में मदद करता है; वहीं अंगूर में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होते हैं, लेकिन इसका ग्लाइसेमिक लोड थोड़ा अलग हो सकता है। अमेरिकी कृषि विभाग (USDA) के फूड डेटा सेंट्रल के अनुसार, अंगूर में भी कई पोषक तत्व पाए जाते हैं जो सेहत को फायदा पहुंचाते हैं। डायबिटीज कंट्रोल करने और ब्लड शुगर के स्तर को कंट्रोल रखने के लिए इन दोनों में से कौन सा फल अधिक सुरक्षित है, किसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बेहतर है और इन्हें खाने का सही तरीका क्या होना चाहिए? सभी बातों की जानकारी होना जरूरी है।
हेल्थडॉटकॉम में रजिस्टर्ड डायटीशियन, ब्रियाना टोब्रिट्ज़होफर के प्रकाशित लेख में डायटीशियन ने बताया ब्लड शुगर को मैनेज करने के मामले में सेब (Apple) अंगूर की तुलना में थोड़ा बेहतर विकल्प हो सकता है, क्योंकि इसमें अंगूर के मुकाबले ज्यादा फाइबर होता है। एक मीडियम साइज के सेब में लगभग 4 ग्राम फाइबर होता है, जबकि एक कप अंगूर में करीब 1.5 ग्राम फाइबर पाया जाता है। फाइबर कार्बोहाइड्रेट के पाचन और शरीर में इसके अवशोषण की प्रक्रिया को धीमा करने में मदद करता है। इससे खाना खाने के बाद ब्लड शुगर धीरे-धीरे बढ़ता है। आइए एक्सपर्ट से जानते हैं कि डायबिटीज मरीजों के लिए अंगूर का सेवन ज्यादा फायदेमंद है या फिर सेब का।
डायबिटीज में सेब और अंगूर कैसे करता है असर?
सेब में पेक्टिन (Pectin) नाम का एक घुलनशील फाइबर भी होता है। यह पाचन तंत्र में जेल जैसी संरचना बना सकता है। पेक्टिन पाचन को बेहतर रखने में मदद करता है। इसके अलावा ये ब्लड शुगर कंट्रोल करने और हार्ट हेल्थ को दुरुस्त रखने में भी अहम किरदार निभा सकता है। इसका मतलब यह नहीं है कि अंगूर सेहत के लिए खराब विकल्प हैं। अंगूर में पॉलीफेनॉल (Polyphenols) पाए जाते हैं। ये प्राकृतिक पौधों के यौगिक हैं, जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने वाली सूजन से बचाने में मदद कर सकते हैं। अंगूर में मौजूद रेस्वेराट्रोल (Resveratrol) और एंथोसायनिन (Anthocyanins) जैसे कुछ यौगिक ब्लड शुगर को नॉर्मल रखने में मददगार हो सकते हैं।
कोई भी खाना कितनी तेजी से ब्लड शुगर का स्तर बढ़ा सकता है इसका अंदाजा शोधकर्ता उस फूड के ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) से लगाते हैं। GI कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थों को इस आधार पर रैंक करता है कि वो तय भोजन की तुलना में ब्लड शुगर कितनी तेजी से बढ़ाते हैं। आमतौर पर कम GI वाले खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर को ज्यादा धीरे बढ़ाते हैं, जबकि ज्यादा GI वाले खाद्य पदार्थ ब्लड शुगर को तेजी से बढ़ा सकते हैं। सेब को लो-GI फूड माना जाता है। इसका GI आमतौर पर 36 से 40 के बीच होता है। वहीं, अंगूर का GI थोड़ा ज्यादा होता है और यह आमतौर पर 43 से 53 के बीच हो सकता है। यह अंतर अंगूर की किस्म के आधार पर बदल सकता है। हालांकि, दोनों ही फल लो से मॉडरेट GI रेंज में आते हैं और इनका GI सफेद ब्रेड, कैंडी या मीठे पेय जैसे खाद्य पदार्थों की तुलना में काफी कम होता है।
फलों की बनावट भी ब्लड शुगर को कर सकती है प्रभावित
फलों की बनावट भी इस बात को प्रभावित कर सकती है कि शरीर उसे कितनी तेजी से पचाता है। सेब सख्त होता है और इसे खाने के लिए ज्यादा चबाना पड़ता है। इसमें अंगूर की तुलना में अधिक फाइबर भी होता है। ये दोनों कारण खाना खाने के बाद ब्लड शुगर में होने वाली बढ़ोतरी को अपेक्षाकृत धीमा करने में मदद कर सकते हैं। साबुत अंगूर और साबुत सेब खाने पर इसमें मौजूद फाइबर बना रहता है लेकिन अगर फलों का सेवन उसका जूस बनाकर किया जाए तो उसमें से फाइबर की मात्रा बहुत कम या लगभग खत्म हो जाती है। जिस भी फूड या लिक्विड में फाइबर की मात्रा कम हो जाती है उसे खाने के बाद ब्लड में शुगर का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है।
सेब और अंगूर के पोषक तत्व
एक कप अंगूर और एक मध्यम आकार के सेब में पोषक तत्व
हालांकि सेब में फाइबर ज्यादा होता है, लेकिन अंगूर में विटामिन K और पोटैशियम जैसे कुछ पोषक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। दोनों ही फलों में कई तरह के विटामिन, मिनरल और प्राकृतिक पौधों के यौगिक मौजूद होते हैं। इसलिए किसी एक पोषक तत्व पर ध्यान देने के बजाय, दोनों फलों के पूरे पोषण प्रोफाइल को देखना ज्यादा बेहतर है। संतुलित डाइट में सेब और अंगूर दोनों ही पौष्टिक विकल्प हो सकते हैं।
ब्लड शुगर कंट्रोल रखने के लिए सेब और अंगूर का सेवन कैसे करें?
आप सेब खाएं या अंगूर, कुछ आसान आदतें खाने के बाद ब्लड शुगर को ज्यादा समय तक नॉर्मल रखने में मदद कर सकती हैं।
फल के साथ प्रोटीन वाली चीजें लें तो आपका ब्लड में शुगर का स्तर नॉर्मल रहेगा। फल को नट्स, दही, बीज या चीज जैसे प्रोटीन और हेल्दी फैट वाले खाद्य पदार्थों के साथ खाया जा सकता है। फल के साथ इन चीजों को लेने से पाचन धीमा हो सकता है और स्नैक या भोजन ज्यादा संतुलित बन सकता है जिससे ब्लड शुगर में अचानक बढ़ोतरी नहीं होती।
जूस की जगह साबुत फल खाएं। साबुत सेब और अंगूर में प्राकृतिक रूप से फाइबर मौजूद होता है, जबकि जूस में शुगर ज्यादा होती है और शरीर इसे तेजी से अवशोषित कर लेता है। इसलिए आमतौर पर जूस की तुलना में साबुत फल बेहतर विकल्प होते हैं।
अलग-अलग फलों को डाइट में शामिल करें। अलग-अलग फलों में अलग-अलग तरह के विटामिन, मिनरल और पौधों से मिलने वाले यौगिक पाए जाते हैं। इसलिए डाइट में कई तरह के फलों को शामिल करने से न्यूट्रिशन प्रोफाइल बेहतर हो सकती है।
फल की मात्रा का ध्यान रखें।कोई भी पौष्टिक भोजन ज्यादा मात्रा में खाने पर ब्लड शुगर बढ़ा सकता है। इसलिए एक मध्यम सेब या लगभग एक कप अंगूर एक उपयोगी सर्विंग के तौर पर देखा जा सकता है। ब्लड शुगर को मैनेज करने में इस तरह के छोटे और लगातार किए जाने वाले बदलाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। डायबिटीज में डाइट को लेकर अपने डॉक्टर या डायटीशियन की सलाह जरूर लें।
थायराइड के मरीजों में अक्सर यह भ्रम रहता है कि उनके लिए कौन सा नमक सही है। क्या आयोडीन युक्त नमक लेना चाहिए या फिर सेंधा नमक (Rock Salt)? खासकर हाइपोथायरायडिज्म में वजन बढ़ने और हाइपरथायराइडिज्म में वजन घटने जैसी समस्याओं के कारण लोग नमक को लेकर कई तरह की धारणाएं बना लेते हैं। हालांकि, शरीर में आयोडीन की कमी या जरूरत से ज्यादा आयोडीन, दोनों ही कुछ परिस्थितियों में थायराइड के कामकाज को प्रभावित कर सकते हैं।
मुंबई की एंडोक्राइनोलॉजिस्ट (हार्मोन विशेषज्ञ) डॉ. तनवी मयूर पटेल के अनुसार, थायराइड के मरीजों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि उन्हें आयोडाइज्ड नमक खाना चाहिए या नॉन-आयोडाइज्ड नमक। थायराइड ग्रंथि T3 और T4 हार्मोन बनाती है और इनके निर्माण के लिए आयोडीन जरूरी होता है। हमारा शरीर खुद आयोडीन नहीं बनाता, इसलिए इसकी पूर्ति भोजन के जरिए करनी पड़ती है। अब सवाल उठता है कि शरीर में आयोडीन की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने के लिए कौन सा नमक लेना चाहिए? क्या थायराइड के मरीजों को आयोडाइज्ड नमक छोड़कर सेंधा नमक लेना चाहिए? आइए एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. तनवी मयूर पटेल से जानते हैं।
बॉडी में आयोडीन की कमी होने पर कैसा होता है असर
थायराइड की बीमारी कम या ज्यादा नमक खाने से सीधे नहीं होती, लेकिन शरीर में आयोडीन की कमी या जरूरत से ज्यादा आयोडीन थायराइड के कामकाज को प्रभावित कर सकता है। शरीर में आयोडीन की कमी होने पर थायराइड हार्मोन का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। लंबे समय तक गंभीर आयोडीन की कमी रहने पर गॉइटर और हाइपोथायराइडिज्म जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। वहीं, जरूरत से ज्यादा आयोडीन का सेवन भी कुछ लोगों में थायराइड के कामकाज को प्रभावित कर सकता है। बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए पर्याप्त आयोडीन खासतौर पर जरूरी है, क्योंकि थायराइड हार्मोन शरीर के विकास में अहम भूमिका निभाते हैं।
शरीर के लिए कितनी मात्रा में आयोडीन जरूरी है?
आयोडीन की दैनिक जरूरत उम्र और स्थिति के अनुसार अलग अलग होती है। बच्चों में इसकी जरूरत कम होती है, जबकि 12 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए करीब 150 माइक्रोग्राम प्रतिदिन की जरूरत होती है। गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान आयोडीन की जरूरत बढ़ जाती है और यह करीब 250 माइक्रोग्राम प्रति दिन तक हो सकती है।
आयोडीन के दूसरे स्रोत कौन से हैं?
आयोडीन सिर्फ नमक से ही नहीं मिलता। समुद्री खाद्य पदार्थ, मछली, झींगा और कुछ समुद्री शैवाल इसके स्रोत हो सकते हैं। इसके अलावा दूध और कुछ डेयरी प्रोडक्ट से भी आयोडीन मिल सकता है। हालांकि, भोजन से मिलने वाली आयोडीन की मात्रा अलग-अलग हो सकती है।
क्या ज्यादा आयोडीन भी थायराइड के लिए नुकसानदायक है?
आयोडीन की कमी की तरह इसकी अत्यधिक मात्रा भी कुछ लोगों में थायराइड को प्रभावित कर सकती है। इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के आयोडीन सप्लीमेंट लेना सही नहीं माना जाता। कुछ दवाओं और मेडिकल प्रक्रियाओं में भी आयोडीन की मात्रा अधिक हो सकती है, इसलिए थायराइड के मरीजों को अपने डॉक्टर को ऐसी दवाओं या जांच के बारे में जानकारी देनी चाहिए।
क्या थायराइड के मरीज आयोडाइज्ड नमक खा सकते हैं?
डॉक्टर ने बताया थायराइड के मरीज आयोडाइज्ड नमक खा सकते हैं या नहीं यह इस बात पर निर्भर करता है कि थायराइड की समस्या किस वजह से है और व्यक्ति को भोजन से कितना आयोडीन मिल रहा है। अगर आयोडीन की कमी है, तो आयोडाइज्ड नमक उपयोगी हो सकता है। वहीं, जिन लोगों को भोजन या अन्य स्रोतों से पर्याप्त आयोडीन मिल रहा है, उनको अतिरिक्त आयोडीन की जरूरत नहीं होती। इसलिए थायराइड की बीमारी होने पर नमक को पूरी तरह बदलने या आयोडीन सप्लीमेंट लेने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।
हिमालयन पिंक सॉल्ट या सेंधा नमक कितना सही है?
हिमालयन पिंक सॉल्ट, रॉक सॉल्ट या सेंधा नमक को लोग अक्सर सामान्य नमक से ज्यादा हेल्दी मानते हैं। लेकिन इनमें आयोडीन की मात्रा आयोडाइज्ड नमक की तरह सुनिश्चित नहीं होती। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ नॉन-आयोडाइज्ड नमक इस्तेमाल करता है और भोजन से भी पर्याप्त आयोडीन नहीं मिल रहा है, तो आयोडीन की कमी हो सकती है। थायराइड के साथ-साथ नमक की कुल मात्रा पर भी ध्यान देना जरूरी है। ज्यादा नमक खाने से शरीर में सोडियम की मात्रा बढ़ सकती है, जिससे हाई ब्लड प्रेशर और पानी रुकने जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि नमक आयोडाइज्ड है या नहीं, बल्कि रोजाना कुल कितना नमक लिया जा रहा है यह भी जरूरी है।
पैकेट और प्रोसेस्ड फूड से भी बढ़ सकता है नमक का सेवन
नमक का सेवन आप सिर्फ खाने में ही नहीं करते बल्कि आप इसे चिप्स, पापड़, अचार, इंस्टेंट और अन्य पैकेज्ड या प्रोसेस्ड फूड में भी काफी मात्रा में कंज्यूम करते हैं। इन फूड्स के जरिए व्यक्ति जरूरत से ज्यादा नमक का सेवन कर सकता है।
थायराइड मरीज नमक को लेकर क्या सावधानी रखें?
थायराइड होने के बाद हर व्यक्ति को नॉन-आयोडाइज्ड नमक पर स्विच करने की जरूरत नहीं होती। आयोडाइज्ड नमक को पूरी तरह छोड़ने से पहले यह देखना जरूरी है कि शरीर को आयोडीन की पर्याप्त मात्रा दूसरे खाद्य स्रोतों से मिल रही है या नहीं। साथ ही, नमक की कुल मात्रा सीमित रखना भी जरूरी है। कौन सा नमक लेना है और आयोडीन की अतिरिक्त जरूरत है या नहीं, यह व्यक्ति की बीमारी, खान-पान और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर कर सकता है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य जागरूकता के लिए है। थायराइड मरीज नमक या आयोडीन की मात्रा में बदलाव करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
असंतुलित खान-पान, पानी की कमी और सुस्त जीवनशैली के कारण आज कब्ज (Constipation) एक बेहद आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या बन चुकी है। पेट साफ न होने पर दिनभर भारीपन, आलस और चिड़चिड़ापन बना रहता है। लोग अक्सर इससे राहत पाने के लिए तुरंत दवाइयों या चूर्ण का सहारा लेते हैं, लेकिन लंबे समय तक इसका सेवन आंतों को नुकसान पहुंचा सकता है। कब्ज एक आम समस्या है, जो किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है। आमतौर पर जब मल त्याग सामान्य से कम हो जाए, मल बहुत सख्त हो या मल त्याग करते समय दर्द और ज्यादा जोर लगाना पड़े, तो इसे कब्ज माना जाता है। हर व्यक्ति की टॉयलेट की आदत अलग होती है, लेकिन सामान्य रूप से दिन में तीन बार से लेकर हफ्ते में तीन बार तक मल त्याग होने को नॉर्मल माना जाता है।
हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड और एम्स से प्रशिक्षित गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, डॉ. सौरव सेठी ने बताया प्रकृति में कई ऐसे खाद्य पदार्थ मौजूद हैं जो दवाइयों के बजाय एकदम सुरक्षित और प्राकृतिक लैग्जेटिव की तरह काम करते हैं। आपकी रोजमर्रा की कुछ आदते आपके कब्ज का कारण बन सकती हैं इनमें सुधार करना जरूरी है। रोजाना डाइट में कम फाइबर का सेवन करना, पर्याप्त फल-सब्जियां नहीं खाना, शरीर में पानी की कमी और टॉयलेट जाने की इच्छा को बार-बार रोकना कब्ज के आम कारणों में शामिल हैं। हालांकि कई बार कब्ज का कोई स्पष्ट कारण नहीं पता चलता। डॉक्टर सौरव सेठी ने बताया अगर आप लाइफस्टाइल में बदलाव करें, कुछ नेचुरल चीजों का सेवन करें तो आसानी से कब्ज का इलाज कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि कब्ज का नेचुरल इलाज क्या है।
कब्ज में राहत के लिए 4 प्राकृतिक ड्रिंक
प्रून जूस का करें सेवन
द अमेरिकी जर्नल ऑफ गैस्ट्रोएंटरोलॉजी और PubMed Central में प्रकाशित क्लिनिकल ट्रायल्स के अनुसार, प्रून जूस क्रोनिक कब्ज के इलाज में काफी प्रभावी है। प्रून यानी सूखे बेर से बने प्रून जूस से है जिसमें सॉर्बिटोल नाम का नेचुरल शुगर अल्कोहल पाया जाता है। यह हल्के लैक्सेटिव की तरह काम कर सकता है और मल त्याग में मदद कर सकता है। हालांकि, ज्यादा मात्रा में लेने पर कुछ लोगों को गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है। एक्सपर्ट ने बताया प्रून जूस आंतों में पानी बनाए रखने में मदद कर सकता है और मल को नरम करने में मददगार हो सकता है। इसलिए प्रून जूस का इस्तेमाल कब्ज में राहत के लिए किया जाता है।
नींबू पानी पिएं
गुनगुने पानी में ताजा नींबू का रस मिलाकर पीना पाचन को बढ़ावा देने और कब्ज में राहत देने में बेहद असरदार साबित होता है। ये घरेलू उपाय सुबह के समय बेहद असरदार साबित होता है। खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का सेवन बॉडी को हाइड्रेट करता है और बॉडी को हेल्दी रखता है। मेडिकल स्टडीज और फिजियोलॉजी के अनुसार, नींबू पानी का असर मुख्य रूप से गैस्ट्रोकोलिक रिफ्लेक्स और हाइड्रेशन पर आधारित है। सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पीने से पेट और आंतों की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और कब्ज से राहत मिलती है।
अदरक की चाय पिएं
गैस्ट्रोएंटरोलॉजी रिसर्च और PubMed में दर्ज अध्ययनों के अनुसार, अदरक में प्रोकिनेटिक (Prokinetic) गुण होते हैं जो गैस्ट्रिक खाली होने की प्रक्रिया को तेज करते हैं। अदरक में पाए जाने वाले सक्रिय बायोएक्टिव यौगिक जिंजरोल और शोगाओल (Gingerol & Shogaol) आंतों की चिकनी मांसपेशियों के संकुचन को बढ़ाते हैं। अदरक की चाय कब्ज में मददगार साबित होती है। अदरक पाचन तंत्र को सक्रिय करने और मल त्याग को बढ़ावा देने में मददगार साबित होती है।
एलोवेरा जूस पिएं
एलोवेरा के लैक्सेटिव गुणों पर कई क्लिनिकल स्टडीज मौजूद हैं। यूएस एफडीए (FDA) ने भी इसको नेचुरल लैक्सेटिव बताया है। एलोवेरा में कुछ ऐसे यौगिक पाए जाते हैं जो पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं। थोड़ी मात्रा में एलोवेरा जूस का सेवन पानी के साथ करने से फायदा होता है। हालांकि, एलोवेरा जूस हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता, इसलिए इसका नियमित या अधिक मात्रा में सेवन करने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है।
इन तरीकों से करें कब्ज को दूर
टॉयलेट सीट पर पैर ऊंचे रखें
कब्ज में मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाने से बचने के लिए टॉयलेट पर बैठते समय पैरों के नीचे छोटा स्टूल रख लें। इससे घुटने कूल्हों से थोड़ा ऊपर आ जाते हैं और मलाशय का कोण सीधा होने में मदद मिल सकती है। इससे मल को डिस्चार्ज करने में मदद मिलती है।
पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं
मल को सॉफ्ट रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी है। रोजाना करीब आठ गिलास पानी पीना आपके पाचन के दुरुस्त रखने के लिए जरूरी है। हालांकि, पानी की जरूरत हर व्यक्ति में अलग हो सकती है। इसके साथ ही डाइट में फाइबर की मात्रा बढ़ाना भी मददगार हो सकता है।
डाइट में फाइबर बढ़ाएं
फाइबर मल में पानी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे मल सॉफ्ट हो सकता है और उसे बाहर निकालना आसान हो सकता है। इसके लिए डाइट में फल, सब्जियां और ओट्स जैसे फाइबर वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
रोजाना शारीरिक गतिविधि करें
नियमित रूप से पैदल चलना और एक्सरसाइज करना भी कब्ज से राहत पाने में मदद कर सकता है। शारीरिक गतिविधि आंतों की गति को बढ़ाने में मदद करती है। जब मल बड़ी आंत में ज्यादा समय तक रुका रहता है, तो उसमें से पानी अधिक अवशोषित हो सकता है और मल सूखकर सख्त हो सकता है।
जरूरत पड़ने पर लैक्सेटिव का करें इस्तेमाल
अगर खानपान और लाइफस्टाइल में बदलाव से कब्ज में पर्याप्त राहत नहीं मिलती, तो डॉक्टर की सलाह से लैक्सेटिव का इस्तेमाल किया जा सकता है। बाजार में अलग-अलग तरह के लैक्सेटिव उपलब्ध हैं, इसलिए इन्हें अपनी मर्जी से लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है। कुछ लैक्सेटिव केवल थोड़े समय के लिए इस्तेमाल किए जाने चाहिए।
बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव
बल्क-फॉर्मिंग लैक्सेटिव डाइट में फाइबर बढ़ाने की तरह काम करते हैं। ये मल में पानी बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे मल को बाहर निकालना आसान हो सकता है। इन्हें असर करने में आमतौर पर 2 से 3 दिन लग सकते हैं। शुरुआत में इससे गैस और पेट फूलने की समस्या हो सकती है, जो समय के साथ कम हो सकती है।
ऑस्मोटिक लैक्सेटिव
ऑस्मोटिक लैक्सेटिव आंतों में पानी बनाए रखने में मदद करते हैं, जिससे मल नरम हो जाता है और उसे बाहर निकालना आसान होता है। इन्हें भी असर करने में कुछ दिन लग सकते हैं। इनका इस्तेमाल करते समय पर्याप्त मात्रा में तरल पदार्थ लेना जरूरी होता है।
स्टीमुलेंट लैक्सेटिव
सेन्ना जैसे स्टीमुलेंट लैक्सेटिव आंतों की गतिविधि को बढ़ाकर मल त्याग में मदद करते हैं। इनके कारण आंतों में संकुचन बढ़ता है, जिससे कुछ लोगों को पेट में ऐंठन या क्रैंप हो सकते हैं। इनका असर कुछ घंटों में हो सकता है।
स्टूल सॉफ्टनर
डॉक्यूसेट सोडियम जैसे स्टूल सॉफ्टनर मल में पानी की मात्रा बढ़ाने में मदद करते हैं। इससे सख्त और सूखे मल को नरम करके बाहर निकालना आसान हो सकता है।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। कब्ज के घरेलू उपाय या लैक्सेटिव हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते। लगातार या बार-बार कब्ज, तेज पेट दर्द, उल्टी, मल में खून या अचानक वजन कम होने जैसे लक्षण हों तो डॉक्टर से सलाह लें। किसी भी लैक्सेटिव या एलोवेरा जूस का सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।
किडनी हमारे शरीर के सबसे जरूरी अंगों में से एक है। इसका मुख्य काम खून से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल पदार्थ को फिल्टर करके बाहर निकालना है। समस्या यह है कि किडनी की बीमारी शुरुआती दौर में अक्सर बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ सकती है। इसी वजह से कई लोगों को बीमारी का पता तब चलता है, जब किडनी की कार्यक्षमता काफी प्रभावित हो चुकी होती है।
हालांकि, शरीर में कुछ ऐसे बदलाव हो सकते हैं, जिन पर समय रहते ध्यान देना जरूरी है। खासकर पेशाब में बदलाव, पैरों या चेहरे पर सूजन और लगातार कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
शुरुआत में दिख सकते हैं ये संकेत
किडनी की समस्या के शुरुआती चरण में लक्षण बहुत हल्के हो सकते हैं। कुछ लोगों को रात में बार-बार पेशाब आने, सामान्य से ज्यादा कमजोरी या भूख कम लगने जैसी परेशानी हो सकती है।
लेकिन ये लक्षण केवल किडनी की बीमारी के कारण ही हों, यह जरूरी नहीं है। इसलिए सिर्फ लक्षणों के आधार पर किडनी की बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती।
बीमारी बढ़ने पर शरीर में क्या बदलाव होते हैं?
जब किडनी की कार्यक्षमता ज्यादा प्रभावित होने लगती है तो कुछ लक्षण अधिक स्पष्ट हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:
पैरों और टखनों में सूजन
चेहरे या आंखों के आसपास सूजन
पेशाब की मात्रा कम होना
भूख कम लगना
उल्टी या मतली
वजन कम होना
लगातार कमजोरी और थकान
गंभीर अवस्था में शरीर में विषैले पदार्थ बढ़ने के कारण भ्रम, बेहोशी या दौरे जैसी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं।
चेहरे और पैरों में सूजन क्यों आती है?
किडनी ठीक से काम नहीं करती तो शरीर में अतिरिक्त पानी और नमक जमा होने लग सकता है। इसका असर चेहरे, आंखों के आसपास और पैरों में सूजन के रूप में दिखाई दे सकता है।
दिनभर खड़े रहने या चलने से पैरों में सूजन ज्यादा नजर आ सकती है, जबकि लेटने या आराम करने के बाद चेहरे और आंखों के आसपास सूजन दिखाई दे सकती है। कुछ गंभीर मामलों में पेट में भी तरल पदार्थ जमा हो सकता है।
किडनी की बीमारी बिना लक्षण के भी हो सकती है
किडनी की बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती चरण में कई लोगों को कोई खास परेशानी महसूस नहीं होती। इसका मतलब यह है कि केवल शरीर में लक्षण दिखाई देने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं है।
डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, मोटापा, धूम्रपान की आदत या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास रखने वाले लोगों को नियमित जांच पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
किडनी की जांच के लिए कौन से टेस्ट होते हैं?
किडनी की कार्यक्षमता जांचने के लिए डॉक्टर जरूरत के अनुसार कई टेस्ट करा सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं:
सीरम क्रिएटिनिन: इससे किडनी की फिल्टर करने की क्षमता का अनुमान लगाने में मदद मिलती है।
eGFR: क्रिएटिनिन समेत अन्य जानकारी के आधार पर किडनी की फिल्ट्रेशन क्षमता का अनुमान लगाया जाता है।
UACR: पेशाब में एल्ब्यूमिन यानी प्रोटीन के रिसाव का पता लगाने में मदद करता है। किडनी की बीमारी के शुरुआती संकेतों में यह जांच महत्वपूर्ण हो सकती है।
अल्ट्रासाउंड: इससे किडनी के आकार, पथरी, रुकावट और कुछ अन्य संरचनात्मक समस्याओं की जानकारी मिल सकती है।
डायबिटीज और हाई BP से बढ़ सकता है किडनी का खतरा
डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर किडनी को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल हैं। लंबे समय तक ब्लड शुगर या ब्लड प्रेशर नियंत्रित न रहने पर किडनी की रक्त वाहिकाओं और फिल्टरिंग सिस्टम पर असर पड़ सकता है।
इसलिए डायबिटीज और हाई BP वाले लोगों के लिए नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह के अनुसार इन दोनों को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है।
क्या BP की दवा किडनी के लिए नुकसानदायक है?
आमतौर पर हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखना किडनी की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। कुछ BP की दवाएं पेशाब में प्रोटीन के रिसाव को कम करने और किडनी को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद कर सकती हैं।
हालांकि, दवा का चुनाव व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार किया जाता है। इसलिए BP की दवा अपनी मर्जी से बंद या शुरू नहीं करनी चाहिए।
किडनी मरीजों को नमक पर देना चाहिए ध्यान
किडनी की बीमारी और हाई BP वाले लोगों को नमक की मात्रा को लेकर सावधानी बरतनी पड़ सकती है। ज्यादा नमक शरीर में पानी जमा होने और ब्लड प्रेशर बढ़ने की समस्या को बढ़ा सकता है।
पापड़, नमकीन, पैकेज्ड स्नैक्स, अचार और ज्यादा नमक वाली चटनी जैसे खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखना उपयोगी हो सकता है। नमक की सही मात्रा व्यक्ति की बीमारी और डॉक्टर की सलाह के अनुसार तय की जानी चाहिए।
क्या किडनी मरीज दूध पी सकते हैं?
किडनी की बीमारी होने पर हर व्यक्ति के लिए दूध पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है। दूध में कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व होते हैं, लेकिन किडनी की बीमारी बढ़ने पर प्रोटीन, फास्फोरस और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा को लेकर विशेष डाइट की जरूरत पड़ सकती है।
इसलिए दूध और अन्य डेयरी उत्पादों की मात्रा मरीज की किडनी की स्थिति और पूरी डाइट के आधार पर तय करना बेहतर होता है।
CKD की कौन सी स्टेज गंभीर होती है?
क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी CKD को आमतौर पर पांच स्टेज में बांटा जाता है। स्टेज 5 में किडनी की कार्यक्षमता बहुत कम हो जाती है और eGFR आमतौर पर 15 से नीचे होता है।
हालांकि, केवल eGFR देखकर यह तय नहीं किया जाता कि मरीज को तुरंत डायलिसिस की जरूरत है या नहीं। शरीर में पानी जमा होना, पोटैशियम का बढ़ना, लगातार उल्टी, गंभीर कमजोरी और अन्य लक्षणों को भी ध्यान में रखा जाता है।
डायलिसिस कब पड़ सकती है जरूरत?
जब किडनी शरीर से अपशिष्ट पदार्थ और अतिरिक्त तरल पदार्थ पर्याप्त रूप से बाहर नहीं निकाल पाती, तब कुछ मरीजों में डायलिसिस की जरूरत पड़ सकती है।
डायलिसिस शुरू करने का फैसला केवल एक टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर नहीं होता। डॉक्टर मरीज के लक्षण, किडनी की कार्यक्षमता, शरीर में तरल पदार्थ, इलेक्ट्रोलाइट्स और पूरी स्वास्थ्य स्थिति को देखकर निर्णय लेते हैं।
किडनी को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें?
किडनी की सेहत बनाए रखने के लिए इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है:
ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखें।
नियमित शारीरिक गतिविधि करें।
धूम्रपान से बचें।
शराब का सेवन करते हैं तो इसे सीमित रखें।
बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार दर्द की दवाएं या अन्य OTC दवाएं न लें।
पर्याप्त पानी पिएं, लेकिन किडनी की बीमारी होने पर तरल पदार्थ की मात्रा डॉक्टर की सलाह से तय करें।
जोखिम वाले लोगों को नियमित किडनी जांच करानी चाहिए।
किन लोगों को नियमित किडनी जांच करानी चाहिए?
डायबिटीज, हाई BP, मोटापा, धूम्रपान की आदत या परिवार में किडनी की बीमारी का इतिहास रखने वाले लोगों को नियमित जांच पर ध्यान देना चाहिए। अधिक उम्र के लोगों में भी डॉक्टर की सलाह के अनुसार किडनी की जांच कराना उपयोगी हो सकता है।
किडनी की बीमारी में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि इसे केवल लक्षणों के आधार पर पहचानने की कोशिश न करें। अगर आप किसी जोखिम वाली श्रेणी में आते हैं या शरीर में लगातार असामान्य बदलाव दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेकर जरूरी जांच कराएं।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। किडनी की बीमारी का इलाज या दवा शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।