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  • खाने के बाद ब्लड शुगर: बढ़ने से रोकें, सिर्फ 10 मिनट करें ये 4 एक्सरसाइज; वॉक से लेकर स्क्वाट तक जानें फायदे

    खाने के बाद ब्लड शुगर: बढ़ने से रोकें, सिर्फ 10 मिनट करें ये 4 एक्सरसाइज; वॉक से लेकर स्क्वाट तक जानें फायदे

    खाने के बाद ब्लड शुगर: बढ़ने से रोकें, सिर्फ 10 मिनट करें ये 4 एक्सरसाइज; वॉक से लेकर स्क्वाट तक जानें फायदे

    हम जो कुछ भी खाते हैं, शरीर उसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट को पचाकर ग्लूकोज में बदलता है। यह ग्लूकोज शरीर के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। डायबिटीज में इंसुलिन की कमी या उसके प्रभावी ढंग से काम न करने के कारण ग्लूकोज कोशिकाओं में ठीक से नहीं पहुंच पाता। ऐसे में खाना खाने के बाद खून में ग्लूकोज का स्तर बढ़ सकता है और यह सामान्य से ज्यादा समय तक बढ़ा हुआ रह सकता है। कुछ भी खाने के बाद डायबिटीज मरीजों के शरीर में ग्लूकोज का स्तर तेजी से बढ़ता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘पोस्टप्रांडियल ब्लड शुगर स्पाइक’ (Postprandial Blood Sugar Spike) कहा जाता है। डायबिटीज रोगियों और इंसुलिन रेजिस्टेंस से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति काफी जोखिम भरी हो सकती है।

    एक्सरसाइज स्पेशलिस्ट रिचर्ड के अनुसार, खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर लेटने या लंबे समय तक बैठे रहने के बजाय सिर्फ 10 से 15 मिनट की हल्की बॉडी एक्टिविटी मांसपेशियों द्वारा ग्लूकोज के अवशोषण को बढ़ा देती है। वॉक या स्कैट्स जैसी एक्सरसाइज खाने के बाद ब्लड में शुगर का स्तर कंट्रोल करने में मदद करती हैं। आइए, एक्सपर्ट्स से जानते हैं कि कौन-कौन सी 4 आसान एक्सरसाइज खाने के बाद ब्लड शुगर को अचानक बढ़ने से रोक सकती हैं।

    खाने के बाद ब्लड शुगर कैसे बढ़ता है?

    खाना खाने के बाद शरीर भोजन को पचाकर उसमें मौजूद कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलता है। इससे ब्लड शुगर बढ़ता है और Pancreas से इंसुलिन निकलता है। इंसुलिन ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है, जहां इसका इस्तेमाल ऊर्जा के लिए किया जाता है। भोजन के बाद ब्लड शुगर में यह बढ़ोतरी आमतौर पर करीब 2 से 3 घंटे तक रह सकती है।

    इंसुलिन रेजिस्टेंस में क्यों बढ़ सकती है ब्लड शुगर?

    इंसुलिन रेजिस्टेंस में शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन के प्रति कम प्रतिक्रिया देती हैं, जो टाइप-2 डायबिटीज का एक प्रमुख कारण है। खाने के बाद बार-बार ब्लड शुगर में तेज बढ़ोतरी लंबे समय में सेहत को नुकसान पहुंचा सकती है। हाई HbA1c दिल के लिए खतरा बढ़ा सकता है।

    खाने के बाद कब एक्सरसाइज करें?

    खाने के बाद ब्लड शुगर नॉर्मल रखना चाहते हैं तो आप खाने के बाद वॉक करें। खाने के बाद शुरुआती 45 से 90 मिनट में ब्लड शुगर में बढ़ोतरी देखी जा सकती है। इसलिए खाना खाने के करीब 10 से 30 मिनट बाद हल्की शारीरिक गतिविधि शुरू करना उपयोगी हो सकता है। एक्सरसाइज के दौरान मांसपेशियां ग्लूकोज का इस्तेमाल करती हैं, जिससे ब्लड शुगर में होने वाली बढ़ोतरी कम हो सकती है।

    खाना खाने के बाद 10 मिनट टहलें

    खाने के बाद हल्की से मध्यम गति से करीब 10 मिनट पैदल चलना एक बेहतरीन आसान एक्सरसाइज है। 10 मिनट की वॉक से भोजन के बाद ब्लड शुगर बढ़ने में करीब 10% तक कमी देखी गई। बहुत धीमी चाल के बजाय सामान्य से थोड़ी तेज गति से चलना बेहतर हो सकता है। आप वॉक ऑफिस के बाहर, घर के अंदर भी कर सकते हैं।

    सीढ़ी पर स्टेप-अप करें

    दूसरा विकल्प स्टेप-अप एक्सरसाइज है। इसके लिए सीढ़ी की सबसे निचली सीढ़ी या किसी सुरक्षित स्टेप का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें लगातार ऊपर-नीचे कदम रखना होता है। इससे पैरों और खासकर ग्लूट मसल्स की गतिविधि बढ़ती है, जिससे मांसपेशियां ब्लड में मौजूद ग्लूकोज का इस्तेमाल करती हैं जिससे ब्लड में शुगर का स्तर नॉर्मल होता है। खाने के बाद करीब 3 मिनट के स्टेप-अप से ब्लड शुगर बढ़ने में लगभग 18% की कमी आती है। ऊंचे स्टेप से एक्सरसाइज की तीव्रता बढ़ सकती है, लेकिन इसे अपनी क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए।

    स्टेप-अप करते समय किन लोगों को सावधानी रखनी चाहिए?

    स्टेप-अप करने के लिए सुरक्षित सीढ़ी या स्टेप का ही इस्तेमाल करें। यह एक्सरसाइज सामान्य वॉक की तुलना में ज्यादा मेहनत वाली हो सकती है और सांस फूलने की समस्या हो सकती है। जिन लोगों को फेफड़ों से जुड़ी बीमारी है या जो लंबे समय से एक्सरसाइज नहीं कर रहे हैं, उन्हें इसे शुरू करने से पहले विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।

    स्क्वाट करें

    तीसरा विकल्प स्क्वाट है। धीरे और नियंत्रित तरीके से बॉडी-वेट स्क्वाट करने से पैरों और ग्लूट्स की कई मांसपेशियां सक्रिय होती हैं। करीब 1 मिनट स्क्वाट करने से भोजन के बाद ब्लड शुगर बढ़ने में लगभग 21% की कमी आती है। अगर आपके घुटने में दर्द है तो आप स्क्वाट की जगह सिट टू स्टैंड जैसी एक्सरसाइज करें।

    कुर्सी पर बैठकर हील लिफ्ट करें

    चौथा विकल्प उन लोगों के लिए है जो खाना खाने के बाद उठकर चलना या स्क्वाट करना नहीं चाहते। इस एक्सरसाइज को बैठकर किया जा सकता है। इसमें कुर्सी पर बैठकर पैरों को जमीन पर रखते हुए एड़ियों को धीरे-धीरे ऊपर उठाकर नीचे लाना होता है। इसे सीटेट हील लिफ्ट या ‘सोलियस पुश-अप’ के नाम से जाना जाता है। इसमें पिंडली की मांसपेशी सोलियस (Soleus) सक्रिय होती है। यह मांसपेशी लंबे समय तक काम कर सकती है और ग्लूकोज के इस्तेमाल में योगदान दे सकती है।

    डायबिटीज और इंसुलिन लेने वाले लोग रखें खास ध्यान

    अगर कोई व्यक्ति डायबिटीज के लिए इंसुलिन लेता है, तो एक्सरसाइज से ब्लड शुगर पर असर पड़ सकता है। इसलिए नियमित रूप से एक्सरसाइज शुरू करने पर ब्लड शुगर की निगरानी करना जरूरी है। इंसुलिन की खुराक में खुद से बदलाव नहीं करना चाहिए; जरूरत होने पर डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

    खाने के तुरंत बाद भारी एक्सरसाइज न करें

    एक्सपर्ट ने बताया खाने के तुरंत बाद बहुत ज्यादा मेहनत वाली एक्सरसाइज या पूरी तरह से हार्ड वर्कआउट करने से बचें। भोजन के बाद हल्की गतिविधि जैसे वॉक, स्टेप-अप या अन्य आसान एक्सरसाइज की जा सकती है, लेकिन ज्यादा तीव्र वर्कआउट कुछ समय बाद करना बेहतर हो सकता है, ताकि पेट में ऐंठन या असहजता का जोखिम कम रहे।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जानकारी और एक्सपर्ट की सलाह पर आधारित है। डायबिटीज, इंसुलिन रेजिस्टेंस या किसी अन्य स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे लोग खाने के बाद एक्सरसाइज शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लें।

  • 150 साल पुरानी इंदौर की झांकी परंपरा, 25 सितंबर को फिर सजेगा शहर का सांस्कृतिक कारवां

    150 साल पुरानी इंदौर की झांकी परंपरा, 25 सितंबर को फिर सजेगा शहर का सांस्कृतिक कारवां

    150 साल पुरानी इंदौर की झांकी परंपरा, 25 सितंबर को फिर सजेगा शहर का सांस्कृतिक कारवां

    इंदौर की झांकी परंपरा का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है. शहर में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 1900 से पहले हुई थी. 21 सितंबर को हुई बैठक के मुताबिक शाम 6 बजे डीआरपी लाइन से झांकी कारवां शुरू होगा. इस बार समारोह में डीजे पर प्रतिबंध रहेगा.

    इंदौर की अनंत चतुर्दशी की झांकियां सिर्फ गणेश विसर्जन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये शहर की 150 साल से ज्यादा पुरानी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं. इस साल 25 सितंबर को निकलने वाले झांकी चल समारोह की तैयारियां अंतिम दौर में हैं. 21 सितंबर को हुई बैठक के मुताबिक शाम 6 बजे डीआरपी लाइन से झांकी कारवां शुरू होगा.

    इस बार समारोह में डीजे पर प्रतिबंध रहेगा. झांकी चल समारोह में सबसे आगे खजराना गणेश मंदिर की झांकी रहेगी. इसके बाद शास्त्री कॉर्नर नवयुवक मंडल, आईडीए, नगर निगम, होप टेक्सटाइल, कल्याण मिल, मालवा मिल, हुकुमचंद मिल, स्वदेशी मिल, राजकुमार मिल और स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी की झांकियां शामिल होंगी.

    रोशनी से सजी ये झांकियां शहर की सड़कों से गुजरेंगी.मिल मजदूरों ने शुरू की थी परंपरा इंदौर की झांकी परंपरा का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है. शहर में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 1900 से पहले हुई थी. इसी दौरान मिल मजदूरों ने झांकी बनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया. हुकुमचंद मिल से निकली शुरुआती झांकी के बाद यह सिलसिला लगातार बढ़ता गया और अनंत चतुर्दशी का झांकी चल समारोह इंदौर की पहचान बन गया. शुरुआत में झांकियां दिन में निकाली जाती थीं. अंधेरा होने पर गैस बत्तियों से रोशनी की जाती थी.

    बाद में बिजली के बल्ब और जनरेटर का इस्तेमाल शुरू हुआ. समय के साथ झांकियों में भी कई बदलाव आए.मिलें बंद हुईं, लेकिन कारीगरों ने नहीं छोड़ी विरासत आज इंदौर की कई मिलें बंद हो चुकी हैं, लेकिन झांकियां बनाने वाले कारीगर इस परंपरा को अब भी जिंदा रखे हुए हैं. झांकी निर्माता असलम बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें यह कला सिखाई. उनके परिवार के लिए झांकी बनाना सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है. पहले मिल मजदूरों को झांकी बनाने के लिए लकड़ी और लोहा जैसी सामग्री मिल परिसर से मिल जाती थी. अब मिलें बंद होने के बाद ज्यादातर सामान बाजार से खरीदना पड़ता है.

    मोटर, मशीन और चलित पुतलों जैसी तकनीक ने झांकियों को आकर्षक बनाया है, लेकिन इससे खर्च भी बढ़ा है.धार्मिक आयोजन से आगे बनी सांस्कृतिक पहचान झांकी परंपरा को करीब से देखने वाले महेश गौहर के मुताबिक पहले झांकियों में मिल मजदूरों की मेहनत और हाथों का हुनर साफ नजर आता था. समय के साथ मिलें बंद हुईं और तकनीक बदली, लेकिन लोगों का उत्साह कायम रहा. धीरे-धीरे झांकियों में सामाजिक, राष्ट्रीय और समसामयिक विषय भी शामिल होने लगे.

  • बार-बार पेनकिलर लेते: हैं तो हो जाएं सावधान! CDSCO की चेतावनी, बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेने से किडनी को हो सकता है नुकसान

    बार-बार पेनकिलर लेते: हैं तो हो जाएं सावधान! CDSCO की चेतावनी, बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेने से किडनी को हो सकता है नुकसान

    बार-बार पेनकिलर लेते: हैं तो हो जाएं सावधान! CDSCO की चेतावनी, बिना डॉक्टर की सलाह दवा लेने से किडनी को हो सकता है नुकसान

    सेहत डेस्क: सिरदर्द, बदन दर्द, बुखार या किसी दूसरी तकलीफ के दौरान कई लोग तुरंत राहत पाने के लिए खुद ही पेनकिलर खा लेते हैं। कुछ लोग तो दर्द दोबारा होने पर बार-बार दवा लेने लगते हैं। लेकिन बिना जरूरत और गलत तरीके से दवाओं का इस्तेमाल सेहत के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।

    देश के ड्रग रेगुलेटर सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) ने पेनकिलर और एंटीबायोटिक के गलत, जरूरत से ज्यादा या लंबे समय तक इस्तेमाल को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। इसके मुताबिक, कुछ दवाओं का अनुचित इस्तेमाल किडनी से जुड़ी गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ा सकता है। वहीं, एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) की समस्या को बढ़ावा दे सकता है।

  • सुबह-सुबह अचानक बढ़ने: लगती है दिल की धड़कन? कार्डियोलॉजिस्ट से जानिए यह सामान्य घबराहट है या हार्ट रिदम की समस्या.

    सुबह-सुबह अचानक बढ़ने: लगती है दिल की धड़कन? कार्डियोलॉजिस्ट से जानिए यह सामान्य घबराहट है या हार्ट रिदम की समस्या.

    सुबह-सुबह अचानक बढ़ने: लगती है दिल की धड़कन? कार्डियोलॉजिस्ट से जानिए यह सामान्य घबराहट है या हार्ट रिदम की समस्या.

    क्या आपने कभी महसूस किया है कि सुबह-सुबह बिस्तर से उठते ही आपके दिल की धड़कन तेज चलने लगती है और ऐसा महसूस होता है कि जैसे दिल सीने से बाहर निकल रहा है? हालांकि ये थोड़ा डरावना अनुभव हो सकता है। आमतौर पर इस तरह की परेशानी कभी-कभी होने के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे अचानक से सुबह झटके से उठ जाना या फिर डिहाइड्रेशन होने की वजह से कभी-कभी ये परेशानी हो सकती है। अगर आपको दिल धड़कने की ये समस्या अक्सर रहती है तो इसे नजरअंदाज नहीं करें। अक्सर धड़कन अनियंत्रित महसूस होना ‘हार्ट रिदम विकार’ (Arrhythmia) का संकेत भी हो सकती है। कार्डियोलॉजिस्ट के मुताबिक सही समय पर इसके संकेतों को पहचानना और सामान्य घबराहट से इसका अंतर समझना दिल की सेहत के लिए बेहद जरूरी है।

    बिस्तर से उठने के बाद दिल की धड़कन बढ़ने का कारण

    ISIC मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल, कार्डियक साइंसेज में डायरेक्टर एवं एचओडी, डॉ. असीम ढल्ल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया नींद से जागने के तुरंत बाद थोड़े समय के लिए दिल की धड़कन तेज होना काफी नॉर्मल है जिसके लिए परेशान होने की बात नहीं है। जागने के बाद कुछ देर के लिए इस तरह दिल का धड़कना नींद से जागने की प्रक्रिया में शरीर में होने वाला अचानक बदलाव है। जब शरीर नींद की अवस्था से जागने और सतर्क रहने की स्थिति में जाता है, तो एड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन रिलीज हो सकते हैं। इससे कुछ समय के लिए दिल की धड़कन बढ़ सकती है।

    अगर नींद अचानक खुल जाए तो नर्वस सिस्टम शरीर में ‘फाइट या फ्लाइट’ रिस्पॉन्स को सक्रिय कर सकता है। इससे थोड़े समय के लिए हार्ट रेट बढ़ जाता है। हार्ट रेट बढ़ने के लिए और भी कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे बहुत ज्यादा जीवंत सपना, डरावना सपना, अचानक नींद खुलना, चिंता, भावनात्मक तनाव, शरीर में पानी की कमी, कैफीन का सेवन, नींद पूरी न होना, एड्रेनालिन का बढ़ना और नींद से जुड़ी कुछ समस्याएं भी दिल की धड़कन तेज होने की वजह बन सकती हैं। नींद के दौरान भी शरीर का नर्वस सिस्टम सक्रिय रहता है। इस दौरान आने वाले तेज या डरावने सपने शरीर में वैसी ही शारीरिक प्रतिक्रिया पैदा कर सकते हैं, जैसी वास्तविक स्थिति में होती है। हालांकि, कई लोगों में दिल की धड़कन कुछ ही सेकंड में सामान्य हो जाती है। ऐसे मामलों में यह जरूरी नहीं कि यह किसी गंभीर दिल की बीमारी का संकेत हो।

    कब तेज धड़कन हार्ट रिदम की समस्या का संकेत हो सकती है?

    अगर दिल की धड़कन कुछ सेकंड के लिए तेज होती है और उसके बाद अपने आप नॉर्मल हो जाती है है और ऐसा कभी-कभार ही होता है, तो आमतौर पर यह गंभीर समस्या का संकेत नहीं होता। लेकिन अगर यह समस्या बार-बार हो, बिना किसी कारण के कई मिनट तक बनी रहे तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। कुछ मामलों में एट्रियल फिब्रिलेशन (Atrial Fibrillation), सुप्रो वेंट्रिकुलर टैचीकार्डिया (Supraventricular Tachycardia) या दिल की धड़कन की अन्य अनियमितताएं भी इस तरह के लक्षण पैदा कर सकती हैं। अगर दिल के अनियमित धड़कने की घटना बार-बार या लगातार बनी रहे तो तुरंत कार्डियोलॉजिस्ट से जांच करानी चाहिए।

    दिल की तेज धड़कन के साथ इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

    अगर दिल की धड़कन तेज होने के साथ सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी, चक्कर आना, बेहोशी, बहुत ज्यादा कमजोरी, अत्यधिक पसीना, भ्रम की स्थिति या बेहोश होने जैसी समस्याएं महसूस होती है तो आप इसे नजरअंदाज नहीं करें। दिल की धड़कन का लगातार धड़कना इस बात का संकेत है कि दिल शरीर में पर्याप्त मात्रा में खून पंप नहीं कर पा रहा है या कोई गंभीर हृदय संबंधी समस्या मौजूद हो सकती है। खासकर बुजुर्गों या पहले से हृदय रोग से जूझ रहे लोगों में अगर धड़कन अनियमित महसूस हो तो डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

    बार-बार ऐसा हो तो कौन-से टेस्ट कराए जा सकते हैं?

    अगर नींद से जागने के बाद दिल की धड़कन तेज होने की समस्या बार-बार बनी रहे तो आप कुछ जरूरी जांच जैसे ECG कराएं जिसके जरिए दिल की धड़कन की जांच। होल्टर मॉनिटर या एम्बुलेटरी ECG के जरिए 24 घंटे या उससे ज्यादा समय तक हार्ट रिदम रिकॉर्ड करना, थायरॉइड और इलेक्ट्रोलाइट लेवल की जांच के लिए ब्लड टेस्ट तथा दिल की संरचना और कामकाज देखने के लिए इकोकार्डियोग्राम (Echocardiogram) शामिल हो सकते हैं। लक्षणों के आधार पर डॉक्टर स्लीप स्टडी की सलाह भी दे सकते हैं, ताकि स्लीप एपनिया जैसी समस्या का पता लगाया जा सके। स्लीप एपनिया भी रात में या नींद के दौरान दिल की धड़कन बढ़ने में भूमिका निभा सकता है।

    डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।

  • अकोला के गणेश पंडाल: में जीवंत हुआ 1980 का दशक; माचिस के फोन से लेकर बैलगाड़ी तक, दिखा बीता जमाना

    अकोला के गणेश पंडाल: में जीवंत हुआ 1980 का दशक; माचिस के फोन से लेकर बैलगाड़ी तक, दिखा बीता जमाना

    अकोला के गणेश पंडाल: में जीवंत हुआ 1980 का दशक; माचिस के फोन से लेकर बैलगाड़ी तक, दिखा बीता जमाना

    महाराष्ट्र के अकोला स्थित ‘रोज परिवर्तन गणेश पंडाल’ में 1980 के दशक के गांव की जीवनशैली पर आधारित अद्भुत झांकी सजाई गई है. इसमें मिट्टी का चूल्हा, बायोस्कोप, एंटीना टीवी और धागे वाले माचिस फोन जैसी पुरानी यादें दिखाई गई हैं.

    आज सोशल मीडिया पर 1980 के दशक की तस्वीरों को AI के जरिए दोबारा बनाने का ट्रेंड चल रहा है, लेकिन महाराष्ट्र के अकोला में एक गणेश पंडाल ने इस दौर को तस्वीरों तक सीमित नहीं रखा. सिंधी कैंप के रोज परिवर्तन गणेश पंडाल में 1980 के दशक के गांव और देहात की जिंदगी को पूरी झांकी के रूप में सजाया गया है. यहां पहुंचते ही मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया से अलग उस समय का माहौल देखने को मिलता है. इस झांकी में उस दौर की कई ऐसी चीजें दिखाई गई हैं, जिन्हें आज की पीढ़ी शायद ही इस्तेमाल करती हो. दो माचिस की डिब्बियों और धागे से बनाया गया खिलौना फोन भी यहां रखा गया है. बच्चों के लिए यह उस समय का एक मजेदार खेल हुआ करता था. झांकी में कुएं से पानी भरना, बैलगाड़ी और खेती, मिट्टी के चूल्हे पर खाना, सिलबट्टे पर मसाला पीसना और गोबर से लिपे घर भी दिखाए गए हैं. कवेलू की छत, ग्राम पंचायत और खेतों में बैल-हल के जरिए खेती का दृश्य भी उस समय के गांव की तस्वीर सामने रखता है.

    साइकिल के टायर से लेकर जमीन पर पढ़ाई तक उस समय बच्चों के मनोरंजन के साधन भी आज से बिल्कुल अलग थे. पंडाल में साइकिल के पुराने टायर को लकड़ी से धकेलकर खेलने का दृश्य दिखाया गया है. वहीं, स्कूल में बच्चों के जमीन पर बैठकर पढ़ने, पुरानी स्कूल ड्रेस, किताबों और स्लेट से पढ़ाई करने की झलक भी दिखाई गई है. यह झांकी सिर्फ पुरानी चीजें दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को यह समझाने की कोशिश करती है कि उनके माता-पिता और दादा-दादी का बचपन किस तरह बीता था.

    मिट्टी का चूल्हा और सिलबट्टा बना आकर्षण 1980 के दशक की रसोई को भी पंडाल में खास जगह दी गई है. उस समय गैस स्टोव और आधुनिक किचन की जगह मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाने का चलन था. मसाले पीसने के लिए सिलबट्टे का इस्तेमाल किया जाता था. इन चीजों को देखकर पुरानी पीढ़ी के लोग अपने घर और बचपन की यादों से जुड़ रहे हैं.

    टीवी आया तो पूरे घर में जुटता था परिवार झांकी में उस दौर का बॉक्स टीवी और उसकी छत पर लगी एंटीना भी दिखाई गई है. गांव में जब नया-नया टेलीविजन आया था, तब वह अपने आप में बड़ा आकर्षण हुआ करता था. पूरा परिवार स्क्रीन के सामने बैठकर कार्यक्रम देखता था और पसंदीदा कार्यक्रम का इंतजार करता था.

    बायोस्कोप और चिट्ठी का इंतजार उस समय गांवों में टॉकीज आसानी से उपलब्ध नहीं होते थे, ऐसे में बायोस्कोप मनोरंजन का एक खास साधन था. पंडाल में बायोस्कोप के जरिए फिल्म देखने का दृश्य भी बनाया गया है. इसके साथ साइकिल पर चिट्ठी लेकर आता पोस्टमैन भी झांकी का हिस्सा है. उस दौर में किसी अपने की चिट्ठी का इंतजार कई दिनों तक रहता था.

    दो पीढ़ियों को जोड़ रही है झांकी रोज परिवर्तन गणेश पंडाल के अध्यक्ष राजकुमार गिर के मुताबिक, हर साल गणेश उत्सव के जरिए कोई न कोई संदेश देने की कोशिश की जाती है. इस बार 1980 के दशक के गांव और उस समय की जीवनशैली को दिखाने का प्रयास किया गया है. उनका कहना है कि आज की पीढ़ी मोबाइल और डिजिटल दुनिया में बड़ी हो रही है, इसलिए उसे यह भी पता होना चाहिए कि उनके माता-पिता और बुजुर्ग किस तरह की जिंदगी जीते थे. इस झांकी में एक तरफ स्मार्टफोन और इंटरनेट की आज की दुनिया है तो दूसरी ओर कुआं, मिट्टी का चूल्हा, बैल से खेती, बायोस्कोप, चिट्ठी और साइकिल का टायर वाला बचपन. यही वजह है कि गणपति बप्पा के सामने सजी यह 1980s थीम पुरानी पीढ़ी के लिए यादें और नई पीढ़ी के लिए एक अलग अनुभव बन गई है.

  • बदलते मौसम में सर्दी:जुकाम से हैं परेशान? अदरक- लहसुन का ये खास सूप दे सकता है आराम, जानिए इसके फायदे और तरीका

    बदलते मौसम में सर्दी:जुकाम से हैं परेशान? अदरक- लहसुन का ये खास सूप दे सकता है आराम, जानिए इसके फायदे और तरीका

    बदलते मौसम में सर्दी:जुकाम से हैं परेशान? अदरक- लहसुन का ये खास सूप दे सकता है आराम, जानिए इसके फायदे और तरीका

    गर्मी के मौसम में तेज गर्मी से बचने के लिए लोग अक्सर कूलर या एसी की ठंडी हवा में बैठते हैं। तापमान में अचानक बदलाव या ठंडी हवा के संपर्क में आने से कुछ लोगों को गले में खराश, नाक बंद होने या सर्दी-जुकाम जैसी परेशानी महसूस हो सकती है। मौसम बदलने के साथ भी सर्दी-जुकाम और गले में खराश की समस्या बढ़ सकती है। ऐसे में रसोई में मौजूद अदरक, लहसुन और काली मिर्च एक बेहतरीन घरेलू विकल्प साबित हो सकता है। लहसुन, अदरक और काली मिर्च का गर्म सूप गले को कुछ समय के लिए आराम देने और शरीर को गर्माहट देने में मदद कर सकता है।

    एम्स के पूर्व कंसल्टेंट और साओल हार्ट सेंटर के फाउंडर एंड डायरेक्टर डॉ. बिमल झांझर के मुताबिक, अदरक में जिंजरोल जैसे सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। अदरक का इस्तेमाल ताजा और सूखे, दोनों रूपों में किया जाता है। इसे संतुलित मात्रा में गर्म पेय या सूप के रूप में लेने से गले की परेशानी में राहत मिल सकती है। अदरक के साथ लहसुन और काली मिर्च का इस्तेमाल कर उसका सूप बनाकर पीने से बदलते मौसम में सर्दी-खांसी से राहत मिल सकती है। आइए जानते हैं सर्दी-जुकाम और गले की खराश में अदरक का सूप किस तरह मदद कर सकता है और इसे बनाने का सही तरीका क्या है।

    अदरक में पाए जाते हैं एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण

    अदरक में जिंजरोल जैसे प्राकृतिक यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। अदरक का सेवन गले में होने वाली हल्की परेशानी और सर्दी के दौरान होने वाली असहजता में राहत देने में मदद कर सकता है। हालांकि, अदरक को सर्दी-जुकाम का इलाज नहीं माना जाना चाहिए।

    लहसुन में मौजूद एलिसिन हो सकता है फायदेमंद

    लहसुन को पीसने या काटने पर एलिसिन नामक यौगिक बनता है। इसमें एंटीमाइक्रोबियल और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। इसलिए संतुलित डाइट के हिस्से के रूप में लहसुन को शामिल करना सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है।

    काली मिर्च दे सकती है गर्माहट का एहसास

    काली मिर्च में पाइपराइन नामक सक्रिय यौगिक पाया जाता है। इसका स्वाद तीखा होता है और गर्म सूप में इसे डालने से शरीर को गर्माहट का एहसास हो सकता है। काली मिर्च और गर्म तरल पदार्थ गले को कुछ समय के लिए आरामदायक महसूस करा सकते हैं।

    ये गर्म सूप कैसे गले को दे सकता है राहत

    गर्म सूप जैसे तरल पदार्थ शरीर को हाइड्रेट रखने में मदद करते हैं और गर्माहट के कारण गले में होने वाली खराश या असहजता कुछ समय के लिए कम महसूस हो सकती है। सूप को टेस्टी बनाने के लिए उसमें कुछ सब्जियां शामिल की जा सकती है जिससे आपका सूप विटामिन, मिनरल और दूसरे पोषक तत्वों से भर जाएगा।

    नींबू से मिलता है विटामिन सी

    इस सूप में नींबू का रस स्वाद बढ़ाने के साथ विटामिन सी की कमी भी पूरा करता है। विटामिन सी इम्यून सिस्टम के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी पोषक तत्व है। हालांकि, सिर्फ नींबू या विटामिन सी लेने से सर्दी-जुकाम तुरंत ठीक नहीं होता।

    सर्दी-जुकाम में सूप कब मददगार हो सकता है?

    कोल्ड और कफ के दौरान भूख कम लगने पर हल्का और गर्म सूप लेना बेहद असरदार साबित होगा। इस सूप में सब्जियां, अदरक, लहसुन और पर्याप्त मात्रा में तरल होने के कारण यह शरीर को हाइड्रेशन और कुछ पोषक तत्व देने का अच्छा विकल्प हो सकता है। लेकिन अगर तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी या लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

    सूप बनाने की विधि

    सबसे पहले लहसुन, अदरक और काली मिर्च लें और इन्हें सिलबट्टे की मदद से मोटा-मोटा (कोर्सली) क्रश कर लें।

    इसके बाद कढ़ाई में थोड़ा सा तेल गर्म करें। इसमें क्रश किया हुआ अदरक-लहसुन और काली मिर्च का मिश्रण डालकर करीब 1 मिनट तक भूनें। ध्यान रखें कि अदरक और लहसुन जलने न पाएं।

    अब इसमें गाजर और शिमला मिर्च डालें और तेज आंच पर थोड़ी देर स्टर-फ्राई करें। सब्जियों को बहुत ज्यादा न पकाएं, ताकि उनमें हल्का क्रंच बना रहे।

    इसके बाद कढ़ाई में पानी डालकर अच्छी तरह मिलाएं। सूप को करीब 5 मिनट तक उबलने दें, ताकि अदरक, लहसुन और काली मिर्च का स्वाद पानी में अच्छी तरह आ जाए।

    अब एक अलग कटोरी में कॉर्नफ्लोर और पानी मिलाकर स्लरी तैयार करें। इसमें गांठें नहीं रहनी चाहिए। इस स्लरी को धीरे-धीरे सूप में डालते हुए लगातार चलाते रहें।

    सूप को तब तक पकाएं, जब तक वह हल्का गाढ़ा और ग्लॉसी न हो जाए। आखिर में इसमें नींबू का रस और ताजा हरा धनिया डालकर अच्छी तरह मिला दें। गरमा-गरम जिंजर-गार्लिक सूप तैयार है।

    डिस्क्लेमर: यह सूप सर्दी-जुकाम के लक्षणों में आराम देने वाला एक घरेलू खाद्य विकल्प हो सकता है, लेकिन इसे किसी बीमारी का इलाज या दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

  • प्रयागराज संगम पर पितृ पक्ष: की तैयारियां शुरू, 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा श्राद्ध पक्ष, अब ऑनलाइन भी होगा पिंडदान

    प्रयागराज संगम पर पितृ पक्ष: की तैयारियां शुरू, 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा श्राद्ध पक्ष, अब ऑनलाइन भी होगा पिंडदान

    प्रयागराज संगम पर पितृ पक्ष: की तैयारियां शुरू, 26 सितंबर से 10 अक्टूबर तक चलेगा श्राद्ध पक्ष, अब ऑनलाइन भी होगा पिंडदान

    पितृ पक्ष के अवसर पर प्रयागराज स्थित पवित्र गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. लोग संगम में स्नान करने के बाद अपने पितरों के लिए तर्पण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति तथा परिवार के कल्याण की कामना करते हैं. कई परिवार अपने पूर्वजों की निर्धारित तिथि पर श्राद्ध और पिंडदान की धार्मिक विधि भी पूरी करते हैं.

    पितृ पक्ष हिंदू धर्म में अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है. इस अवधि में लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी तथा अन्य पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. इस बार पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है और यह 10 अक्टूबर को समाप्त होगा.

    संगम को पितृ कर्म के लिए विशेष श्रद्धा का स्थान माना जाता है. यहां दूर-दूर से लोग अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने आते हैं. कहा जाता है, विष्णु मुख प्रयाग, विष्णु नाभि काशी और विष्णु चरण गया, इन तीन जगहों पर लोग जाकर अपने पुरखों का पिंडदान करते हैं, तभी यह पूर्ण माना जाता है. पितृ पक्ष का यह अवसर केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की पिछली पीढ़ियों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी स्मृतियों को सम्मान देने की परंपरा भी है.

    इस बार प्रयागराज के तीर्थ पुरोहितों ने ऑनलाइन पिंडदान की भी व्यवस्था की है. उनका कहना है कि जो लोग देश-विदेश या किसी कारणवश अपने पुरखों का पिंडदान करने नहीं आ सकते, वे ऑनलाइन ही पिंडदान कर सकते हैं. ऐसा करके वे लोग अपने पूर्वजों और अपनी परंपरा से जुड़े रहते हैं.

    प्रयागराज में देशभर से लोग पितृ पक्ष में पिंडदान करने आते हैं. भारी संख्या में लोग प्रयागराज आकर अपने पुरखों और पूर्वजों को पिंडदान कर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति कराते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं.

  • राशन कार्ड धारक 1 अक्टूबर: से पहले जरूर कर लें यह काम… नहीं तो सरकारी अनाज मिलना हो जाएगा बंद

    राशन कार्ड धारक 1 अक्टूबर: से पहले जरूर कर लें यह काम… नहीं तो सरकारी अनाज मिलना हो जाएगा बंद

    राशन कार्ड धारक 1 अक्टूबर: से पहले जरूर कर लें यह काम… नहीं तो सरकारी अनाज मिलना हो जाएगा बंद

    Ration Card Cancel Rule: राशन कार्ड से सरकारी अनाज लेने वाले लाभार्थियों के लिए जरूरी खबर है. यदि आपने 6 महीने से राशन नहीं लिया है तो आपका राशन कार्ड बंद हो सकता है. ऐसे में आप e-KYC जरूर करा लें और प्राइस डिस्ट्रिबुशन सिस्टम यानी PDS दुकान से अनाज ले लें. ऐसा नहीं करने पर 1 अक्टूबर 2026 से आपका राशन कार्ड बंद हो जाएगा. आपको अनाज नहीं मिलेगा.

    Ration Card New System: यदि आप राशन कार्ड से सरकारी अनाज लेते हैं तो आपको लिए यह खबर बड़े काम की है. ऐसे राशन कार्ड धारकों की पहचान की जा रही है, जिन्होंने पिछले 6 महीने से प्राइस डिस्ट्रिबुशन सिस्टम यानी PDS दुकान से अनाज नहीं लिया है. ऐसे राशन कार्ड धारकों को साइलेंट राशन कार्ड धारक माना गया है. ऐसे चिह्नित राशन कार्ड को अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया जा सकता है. ऐसे में आप e-KYC जरूर करा लें और प्राइस डिस्ट्रिबुशन सिस्टम यानी PDS दुकान से अनाज ले लें. ऐसा नहीं करने पर 1 अक्टूबर 2026 से आपका राशन कार्ड बंद हो जाएगा.

    आपको मालूम हो राशन कार्ड हमेशा के लिए बंद नहीं हो जाएगा. e-KYC और वेरिफिकेशन के जरिए कार्ड दोबारा एक्टिव कराने का मौका मिलेगा. सरकार का मानना है कि कुछ लाभार्थियों ने राशन कार्ड तो बनवा लिया है लेकिन वे लंबे समय से PDS से राशन नहीं ले रहे हैं. कुछ मामलों में तो राशन कार्ड का उपयोग दूसरी सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए किए जाने की बात भी सामने आई है. ऐसे राशन कार्डों की जांच कर व्यवस्था को ज्यादा ट्रांसपरेंट बनाने की तैयारी है. यदि आपने पिछले 6 महीने से राशन नहीं लिया है तो PDS दुकान से अपना राशन जरूर उठा लें. ऐसा करने पर आपका राशन कार्ड एक्टिव रखने में मदद मिलेगी.

    नई SMART-PDS सिस्टम की जाएगी शुरू 1 अक्टूबर 2026 से नई SMART-PDS सिस्टम शुरू की जाएगी. खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के अनुसार SMART-PDS सिस्टम में साइलेंट राशन कार्ड और डुप्लीकेट लाभार्थियों से जुड़े मामलों को संभालने की नई सुविधा शुरू होगी. आपको मालूम हो कि यह व्यवस्था सभी राशन कार्ड धारकों पर लागू नहीं होगी. नई व्यवस्था को लागू करने का सरकार का मकसद फर्जी राशन कार्डों की पहचान करना और सरकारी राशन का फायदा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाना है.

    किनको करना होगा दोबारा e-KYC नई SMART-PDS सिस्टम सिर्फ उन राशन कार्ड धारकों और लाभार्थियों से जुड़ी है, जिन्हें सिस्टम में साइलेंट राशन कार्ड या डुप्लीकेट लाभार्थी के रूप में चिह्नित किया गया है. ऐसे राशन कार्ड को अस्थायी रूप से निष्क्रिय किया जा सकता है. साइलेंट राशन कार्ड के मामले में इसके बाद अगले 3 महीने के भीतर फील्ड वेरिफिकेशन के जरिए e-KYC कर लाभार्थी की पात्रता दोबारा जांची जाएगी. उधर, डुप्लीकेट लाभार्थी के रूप में चिह्नित व्यक्ति को भी 3 महीने का समय दिया जाएगा. इस दौरान लाभार्थी जरूरी दस्तावेज और e-KYC के जरिए अपनी पात्रता दोबारा साबित कर सकते हैं.

    क्या-क्या बदलेगा 1 अक्टूबर 2026 से

    1 अक्टूबर 2026 से SMAR-PDS सिस्टम में साइलेंट राशन कार्ड और डुप्लीकेट लाभार्थियों से जुड़े मामलों को संभालने की नई functionality शुरू होगी.

    यदि कोई लाभार्थी 21 सितंबर तक राशन नहीं उठाता है तो उसका कार्ड 1 अक्टूबर 2026 से अस्थायी रूप से इनएक्टिव किया जा सकता है.

    साइलेंट राशन कार्ड के मामले में 3 महीने के भीतर फील्ड वेरिफिकेशन और e-KYC के जरिए पात्रता दोबारा जांची जाएगी.

    जिन लोगों का कार्ड 1 अक्टूबर से अस्थायी रूप से बंद होगा, उन्हें 1 जनवरी 2027 तक e-KYC पूरा करने का मौका मिलेगा.

    डुप्लीकेट लाभार्थियों को भी 3 महीने के भीतर जरूरी दस्तावेज और e-KYC के जरिए अपनी पात्रता साबित करने का मौका मिलेगा.

    क्या सभी राशन कार्ड हो जाएंगे बंद आपको मालूम हो कि 1 अक्टूबर 2026 से सभी राशन कार्ड बंद नहीं होंगे और न ही हर राशन कार्ड धारक को दोबारा e-KYC कराने की जरूरत होगी. नई व्यवस्था सिर्फ उन्हीं मामलों से जुड़ी है, जिन्हें साइलेंट राशन कार्ड या डुप्लीकेट लाभार्थी के रूप में चिह्नित किया गया है. ऐसे में सामान्य रूप से राशन ले रहे पात्र लाभार्थियों को घबराने की जरूरत नहीं है.

  • क्या आपको बात-बात: पर गुस्सा आता है? कहीं ये तनाव या एंग्जायटी का संकेत तो नहीं? मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स से जानिए इसके लक्षण.

    क्या आपको बात-बात: पर गुस्सा आता है? कहीं ये तनाव या एंग्जायटी का संकेत तो नहीं? मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स से जानिए इसके लक्षण.

    क्या आपको बात-बात: पर गुस्सा आता है? कहीं ये तनाव या एंग्जायटी का संकेत तो नहीं? मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट्स से जानिए इसके लक्षण.

    30 साल का बब्लू पेशे से कामयाब बिजनेसमैन है, लेकिन उसका गुस्सा काफी तेज है। छोटी-सी बात पर उसका गुस्सा कब सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, न तो उसे खुद अंदाजा होता है और न ही आसपास के लोगों को। बब्लू का स्वभाव बचपन से ऐसा नहीं था। पिता के निधन के बाद वह कुछ ज्यादा चिड़चिड़ा और गुस्सैल रहने लगा। परिवार ने इसे खराब मूड या स्वभाव में आए बदलाव के तौर पर देखा और धीरे-धीरे नजरअंदाज कर दिया। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बार-बार और छोटी-छोटी बातों पर जरूरत से ज्यादा गुस्सा आना महज आदत नहीं हो सकता। यह लंबे समय से चले आ रहे तनाव (Stress), एंग्जायटी (Anxiety) या डिप्रेशन जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा लक्षण भी हो सकता है।

    बब्लू की परेशानी को लेकर जब जनसत्ता ने मनोचिकित्सक से बात की, तो उन्होंने बताया कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम के मनोचिकित्सक (Psychiatrist) डॉ. समीर भार्गव ने जनसत्ता को बताया कि बहुत ज्यादा गुस्सा आना कई मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की ओर इशारा कर सकता है। इनमें एंग्जायटी यानी घबराहट से जुड़ी समस्या भी शामिल है। इसमें व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता करने लगता है, जिससे चिड़चिड़ापन और गुस्सा बढ़ सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति में गुस्से की वजह एक जैसी नहीं होती। कुछ मामलों में यह व्यक्ति के स्वभाव से जुड़ा हो सकता है, जबकि कुछ लोगों में इसके पीछे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या हो सकती है।

    साइकोसिस हो सकता है गुस्से और अजीब स्वभाव की वजह

    डॉक्टर समीर ने बताया कि साइकोसिस जैसी मानसिक स्थिति में भी व्यक्ति को गुस्सा आ सकता है। इसमें व्यक्ति को ऐसे भ्रम हो सकते हैं, जिनमें उसे ऐसी बातों पर विश्वास होने लगता है जो वास्तविकता से मेल नहीं खातीं। कुछ लोगों को ऐसी चीजें दिखाई या सुनाई भी दे सकती हैं, जो वास्तव में मौजूद नहीं होतीं। इसके अलावा उनका व्यवहार असामान्य या अव्यवस्थित हो सकता है और वे अपने रोजमर्रा के काम या खुद की देखभाल ठीक से नहीं कर पाते।

    स्वभाव भी हो सकता है ज्यादा गुस्से की वजह

    हर बार गुस्से को किसी मानसिक बीमारी से जोड़ना सही नहीं है। डॉक्टर के मुताबिक, कुछ लोगों का स्वभाव या टेंपरामेंट ऐसा हो सकता है कि वे परिस्थितियों को संभालने में कम सक्षम महसूस करें। उनकी भावनात्मक सहनशीलता कम होने की वजह से उनमें चिड़चिड़ापन और गुस्सा जल्दी आ सकता है। ऐसे मामलों में जरूरी नहीं कि गुस्सा एंग्जायटी या साइकोसिस से जुड़ा हो। अगर किसी व्यक्ति को अचानक बहुत तेज गुस्सा आता है और वह उस समय खुद पर कंट्रोल नहीं रख पाता, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। डॉक्टर ने बताया कि कुछ स्थितियों में व्यक्ति अचानक गुस्से का आउटबर्स्ट कर सकता है और आवेग में प्रतिक्रिया दे सकता है। उन्होंने इसके पीछे मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स से जुड़ी गड़बड़ी या न्यूरोकेमिकल असंतुलन की संभावना का जिक्र किया। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ की सलाह जरूरी हो सकती है।

    नींद पूरी न होने से बढ़ सकती है चिड़चिड़ाहट

    नींद और मानसिक स्वास्थ्य का भी गहरा संबंध है। डॉक्टर समीर के मुताबिक नींद पूरी न होने पर एंग्जायटी और चिड़चिड़ापन बढ़ सकता है, जिससे व्यक्ति को ज्यादा गुस्सा आने की समस्या हो सकती है। डॉक्टर समीर ने बताया युवा वयस्कों को आमतौर पर पर्याप्त नींद लेने की जरूरत होती है। लगातार कम सोने से मूड, एकाग्रता और याददाश्त जैसी चीजें प्रभावित हो सकती हैं। अगर कोई व्यक्ति पूरे सप्ताह पर्याप्त नींद नहीं लेता और फिर एक दिन ज्यादा सोकर उसकी भरपाई करना चाहता है, तो इसे पूरी तरह से पर्याप्त नहीं माना जा सकता। डॉक्टर के अनुसार, नींद रोज होने वाली प्रक्रिया है। सोने के दौरान शरीर और मस्तिष्क में कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं होती हैं। अलग-अलग नींद के चरणों का अपना महत्व होता है, इसलिए रोज पर्याप्त नींद लेना जरूरी है।

    गुस्से के समय डोपामिन, नोरएपिनेफ्रीन और सेरोटोनिन की भूमिका

    डॉक्टर समीर ने बताया कि बहुत तेज गुस्सा या आवेश आने के दौरान मस्तिष्क के कुछ न्यूरोट्रांसमीटर की भूमिका हो सकती है। इनमें डोपामिन और नोरएपिनेफ्रीन शामिल हैं। एंग्जायटी जैसी स्थितियों में सेरोटोनिन भी अप्रत्यक्ष रूप से भूमिका निभा सकता है। हालांकि, गुस्से को केवल किसी एक केमिकल की कमी या बढ़ोतरी से समझना सही नहीं होगा, क्योंकि इसमें मानसिक स्थिति, परिस्थितियों और व्यवहार जैसे कई कारक शामिल हो सकते हैं।

    गुस्से के लिए आर्थिक कारक भी हो सकते हैं जिम्मेदार

    कुछ लोगों में फैमिली, आर्थिक परेशानी और रिश्तों का तनाव भी गुस्सा बढ़ा सकता है। पारिवारिक समस्याएं, आर्थिक तनाव और रिश्तों से जुड़ी परेशानियां भी व्यक्ति की चिंता और चिड़चिड़ेपन को बढ़ा सकती हैं। डॉक्टर के अनुसार, खासकर जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर जैसी स्थिति में व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर ज्यादा चिंता कर सकता है और इसका असर उसके व्यवहार पर पड़ सकता है।

    स्क्रीन टाइम और सोशल मीडिया भी बढ़ा सकते हैं चिड़चिड़ापन

    डॉक्टर ने लगातार और बिना जरूरत स्क्रीन देखने तथा सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग को भी चिड़चिड़ापन और गुस्से के लिए जिम्मेदार ठहराया है। सोशल मीडिया और लगातार मिलने वाले डिजिटल रिवॉर्ड मस्तिष्क की डोपामिन प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, इसे सीधे तौर पर गुस्से का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। अत्यधिक स्क्रीन टाइम नींद और रोजमर्रा की दिनचर्या को प्रभावित करके भी मूड पर असर डाल सकता है।

    कैसे पहचानें कि गुस्सा एंग्जायटी से जुड़ा है?

    एंग्जायटी में व्यक्ति हर छोटी बात को लेकर जरूरत से ज्यादा चिंता कर सकता है। वह हमेशा बेचैनी या घबराहट महसूस कर सकता है और उसे लगातार किसी बुरी घटना की आशंका रह सकती है। इसके अलावा नींद खराब होना, रात में दिमाग में लगातार विचार चलते रहना, ध्यान लगाने में परेशानी और पहले की तुलना में ज्यादा चिड़चिड़ापन भी देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति छोटी बात पर भी जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

    सामान्य गुस्सा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े गुस्से में क्या फर्क है?

    डॉक्टर समीर के मुताबिक यह देखने की जरूरत है कि गुस्से का असर व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, काम और रिश्तों पर पड़ रहा है या नहीं। अगर गुस्से की वजह से रिश्ते खराब होने लगें, काम प्रभावित हो, सहकर्मियों या परिवार के साथ समस्याएं बढ़ें या व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियां ठीक से पूरी न कर पाए, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। वहीं, परिस्थितियों के अनुसार कभी-कभार गुस्सा आना अपने आप में मानसिक बीमारी का संकेत नहीं है।

    गुस्से के साथ ये लक्षण हो सकते हैं रेड फ्लैग

    अगर गुस्से के साथ व्यक्ति की रोजमर्रा की दिनचर्या बिगड़ने लगे, काम पर ध्यान न लगे, रिश्ते खराब होने लगें, नींद या भूख में बदलाव आए, लगातार चिड़चिड़ापन और घबराहट बनी रहे या व्यक्ति बिना वजह शक करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर के अनुसार, ऐसे लक्षण मानसिक स्वास्थ्य समस्या की ओर इशारा कर सकते हैं और इस स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।

    गुस्सा आने पर तुरंत खुद को शांत करने के लिए क्या करें?

    गुस्सा आने के समय व्यक्ति कुछ देर के लिए उस स्थिति या जगह से खुद को अलग कर सकता है। डॉक्टर ने ब्रीदिंग एक्सरसाइज और 5-4-3-2-1 ग्राउंडिंग तकनीक का सुझाव दिया। इसमें आसपास की पांच चीजों को देखना, चार चीजों को छूकर महसूस करना, तीन आवाजों को सुनना, दो चीजों की गंध पर ध्यान देना और एक चीज का स्वाद महसूस करना शामिल है। इससे ध्यान वर्तमान क्षण पर लाने में मदद मिल सकती है। गुस्से में तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय कुछ समय लेकर जवाब देना भी उपयोगी हो सकता है।

    लगातार गुस्सा रहने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर

    अगर चिड़चिड़ापन और गुस्सा लंबे समय तक बना रहे, तो इसका असर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर पड़ सकता है। डॉक्टर ने बताया कि लंबे समय तक तनाव और खराब तरीके से भावनाओं से निपटने की आदतें आगे चलकर एंग्जायटी, अवसाद और तनाव से जुड़ी समस्याओं से जुड़ सकती हैं। इसके साथ ही कम शारीरिक गतिविधि, ज्यादा खाना या अन्य अस्वस्थ आदतों के कारण वजन, ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।

    गुस्सा कंट्रोल करने के लिए क्या करें?

    डॉक्टर समीर ने बताया गुस्सा कंट्रोल करने के लिए माइंडफुलनेस और मेडिटेशन करें। गुस्से को संभालने के लिए रोजमर्रा की आदतों में कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। डॉक्टर ने माइंडफुलनेस, मेडिटेशन और योग जैसी गतिविधियों को नियमित रूप से अपनाने की सलाह दी। इसके अलावा अपने वर्क प्लेस पर एक दूसरे को सॉरी और थैंक्यू कहने की आदत डालें। जरूरत पड़ने पर ‘थैंक यू’ और ‘सॉरी’ कहना तथा सकारात्मक संवाद बनाए रखना भी तनावपूर्ण माहौल को कम करने में मदद कर सकता है।

    हर गुस्सा मानसिक बीमारी नहीं होता

    सबसे जरूरी बात यह है कि केवल गुस्सा आने के आधार पर किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी से ग्रस्त नहीं माना जा सकता। गुस्से की वजह, उसकी तीव्रता, बार-बार होने की स्थिति और व्यक्ति की जिंदगी पर उसके प्रभाव को देखना जरूरी है। अगर गुस्सा लगातार बढ़ रहा है और काम, रिश्तों, नींद या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

    डिस्क्लेमर: यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से तैयार की गई है। यदि गुस्सा आपके दैनिक जीवन या रिश्तों को प्रभावित कर रहा है, तो किसी योग्य मनोचिकित्सक (Psychiatrist/Psychologist) से परामर्श अवश्य लें।

  • बच्चे को संस्कारी कैसे: बनाएं? जानें क्या सिखाएं 5 साल तक किन चीज़ों से रखें दूर 21 साल तक

    बच्चे को संस्कारी कैसे: बनाएं? जानें क्या सिखाएं 5 साल तक किन चीज़ों से रखें दूर 21 साल तक

    बच्चे को संस्कारी कैसे: बनाएं? जानें क्या सिखाएं 5 साल तक किन चीज़ों से रखें दूर 21 साल तक

    हर कोई चाहता है कि उनका बच्चा संस्कारी बने. लेकिन बच्चे को संस्कारी बने के लिए पहले खुद भी अच्छा व्यवहार रखना होता है. साथ ही बढ़ती उम्र के साथ उसे अलग-अलग तरीकों से संस्कार देने चाहिए.

    बच्चे का व्यवहार और उसकी आदतें बचपन से ही बननी शुरू हो जाती हैं. घर का माहौल, माता-पिता का व्यवहार, खान-पान, दोस्तों की संगति और रोजमर्रा की आदतें बच्चे के व्यक्तित्व पर गहरा असर डालती हैं. माना जाता है कि जन्म से लेकर करीब 21 वर्ष की उम्र तक बच्चे के संस्कार तेजी से बनते हैं. इसलिए हर उम्र में माता-पिता को कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए.

    5 साल तक खान-पान पर दें ध्यान

    बच्चे के जीवन के शुरुआती पांच साल बहुत अहम होते हैं. इस दौरान उसकी खाने-पीने की आदतें धीरे-धीरे मजबूत होती हैं. इसलिए बच्चे को पौष्टिक और घर का बना भोजन देने की कोशिश करें. बहुत ज्यादा फास्ट फूड, तला-भुना और जरूरत से ज्यादा मसालेदार खाना देने से बचें. इस उम्र में बच्चे आसपास के लोगों की बातों और व्यवहार की नकल भी करते हैं. इसलिए माता-पिता को उनके सामने अच्छे शब्दों और शांत व्यवहार का इस्तेमाल करना चाहिए.

    6 से 10 साल में सिखाएं सही और गलत का फर्क

    6 से 10 साल की उम्र में बच्चा अच्छी और बुरी आदतों को समझना शुरू करता है. इसी समय उसे घर के नियम, बड़ों का सम्मान, दूसरों की मदद और सही व्यवहार के बारे में समझाया जा सकता है. घर का माहौल बच्चे की सोच पर असर डालता है. इसलिए माता-पिता को खुद भी ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जिसे वे बच्चे में देखना चाहते हैं. बच्चे को डांटने के बजाय प्यार से सही और गलत का अंतर समझाएं.

    11 से 15 साल में समझें बच्चे की रुचि

    इस उम्र में बच्चे पढ़ाई, भविष्य और करियर को लेकर सोचने लगते हैं. माता-पिता को बच्चे की रुचि समझनी चाहिए और अपनी पसंद उस पर नहीं थोपनी चाहिए. पढ़ाई के साथ योग, ध्यान या प्रार्थना जैसी अच्छी आदतों के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है. बच्चे से उसकी परेशानी और पसंद के बारे में खुलकर बात करना जरूरी है.

    17 से 21 साल में दें जिम्मेदारी

    किशोरावस्था के बाद बच्चे में कई बदलाव आते हैं. इस समय उसे छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां खुद संभालने का मौका देना चाहिए. माता-पिता जरूरत पड़ने पर उसका मार्गदर्शन करें, लेकिन हर फैसला उसके लिए खुद न लें. उसकी संगति और दिनचर्या पर ध्यान रखें. परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताने और उनके अनुभव से सीखने के लिए प्रेरित करें.